ग्रामीण भारत: समस्याएं और भी बहुत हैं


डाॅ. नरेन्द्र पाल सिंह


एसोसिएट प्रोफेसर, वाणिज्य विभाग, 
साहू जैन काॅलेज नजीबाबाद उ.प्र. 246763
ई-मेल: drnps62@gmail.com



भारतीय कृषि संबंधी समस्याएं एवं समाधान


भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है और आर्थिक विकास की ओर अग्रसर होते हुए भी यहाँ गरीबों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है। आजादी के बाद से देश का संतुलित विकास करने तथा भारतीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से आर्थिक विकास की नीति को अपनाया है। भारत की अधिकांश जनसंख्या की आजीविका का साधन खेती है तथा देश की कार्यशील जनसंख्या का 52 प्रतिशत भाग कृषि पर निर्भर है, जिनमें 31.7 प्रतिशत कृषक के रूप में तथा शेष मजदूर के रूप में खेती में कार्यरत है, देश की कुल जनसंख्या का 72.2 प्रतिशत भाग गाँव में वास करता हैं, जिनका मुख्य व्यवसाय खेती ही है हमारे यहाँ कुल कृषि भूमि का लगभग 66 प्रतिशत भाग खाद्यान्न फसलों में तथा शेष 34 प्रतिशत भाग व्यापारिक फसलों के काम में लिया जाता है, देश में जनसंख्या की अधिकता के कारण कृषि जोतों का आकार निरंतर घटता जा रहा है, यहाँ की 80 प्रतिशत जोते दो हेक्टेयर या इससे भी कम है और कुल जोतों का औसत आकार 1.4 हेक्टेयर है जो अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम है। भारत में आधुनिक कृषि तकनीकि उपलब्ध होने के बावजूद जोतों का आकार छोटा होने के कारण, उसका पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता की दर भी नीची रहती है। भारत में जहाँ एक हेक्टेयर भूमि में 2806 किग्रा गेहूँ पैदा होता है, वहीं ब्रिटेन में 7770 किग्रा गेहूँ पैदा होता है। आजादी के 67 साल बीतने के बाद भी मात्र कुल कृषि भूमि का 40 प्रतिशत भाग ही सिंचित क्षेत्र है जबकि 60 प्रतिशत भाग मानसून पर निर्भर है, यदि रोजगार की दृष्टि से देखें तो सभी किसानों व कृषि श्रमिकों को पूरे साल भर रोजगार सुविधायें उपलब्ध नहीं हो पाती और किसान लगभग 150 व श्रमिक 270 दिन तक बेकार रहते हैं, इसीलिए कृषि के क्षेत्र में अदृश्य बेरोजगारी देखने को मिलती है, यहाँ कृषि जोत बहुत छोटी होने के कारण किसान केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही कृषि उत्पादन कर पाता है और विपणन हेतु बहुत कम मात्रा में अधिक्य उपलब्ध होता है जिससे उसकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं हो पाती और वह कृषि में पूंजीगत साधनों और कृषि उपकरणों का उपयोग भी समुचित रूप से नहीं कर पाता। इन सब के बावजूद राष्ट्रीय आय में कृषि एवं उससे संबंधित क्षेत्र का योगदान 20 प्रतिशत है। भारतीय कृषि, जनसंख्या के आधे से अधिक भाग को, प्रत्यक्ष रूप से रोजगार दे रही है साथ ही राष्ट्रीय आय में भी पांचवें हिस्से का योगदान कर रही है। कृषि, उद्योगों को कच्चे माल के रूप में आपूर्ति कर, उनको आधार प्रदान करती है। खाद्यान्नों की आवश्यकताओं की अधिकांश पूर्ति भारतीय कृषि के द्वारा ही की जा रही है तथा अतिरिक्त खाद्यान्न को निर्यात कर सरकार के राजस्व में भी योगदान करती है। इन सब के बावजूद भी भारतीय कृषि क्षेत्र में अनेकों समस्याएं आज भी विद्यमान हैं, जिनमें प्रमुख निम्न हैं।
- आजादी के दशकों बाद भी हम कृषि क्षेत्र के लिए आधारभूत ढाँचा तैयार नहीं कर पाए हैं, वर्षा-जल का उचित संरक्षण नहीं हो रहा है, जिस कारण हम जल के महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत का दोहन नहीं कर पा रहे हैं, अधिकांश गाँव अभी भी पक्की सड़कों से नहीं जुड़ सके हैं, जिस कारण किसानों के समस्त क्रियाकलाप एक छोटे से क्षेत्र में ही सीमित रह गए हैं।
- भारत में कृषि क्षेत्र में विकास की बाधा का दूसरा बड़ा कारण यह है कि हमारे गाँव अभी भी मूलभूत आवश्यकताओं की कमी से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य, भोजन, आवास एवं शिक्षा जैसी आवश्यक आवश्यकताओं का स्तर बहुत नीचा है। अधिकांश किसान आज भी परंपरागत स्थितियों का अनुसरण किए हुए हैं, ऐसी परिस्थितियों में ऊँची उत्पादकता प्राप्त करना दिवास्वपन ही होगा। यहाँ शिक्षा का अर्थ, महज़ औपचारिक शिक्षा से नहीं वरन् किसान तक नवीन विचार तथा नवीन तकनीक पहुँचे और वह उनको खुले दिल से स्वीकार करने के लिए तैयार हो, यही शिक्षा का असली उद्देश्य है, किंतु हमारी योजनाएं इस दिशा में पूर्ण सफल नहीं हो पायी हैं।
- भारतीय कृषि की सबसे प्रमुख समस्या उत्पादन की अधिक लागत है, सिंचाई के लिए पानी दर, रासायनिक खादों के मूल्य, भूमिकर में मूल्यों की अपेक्षा काफी वृद्धि हुई है, जिस कारण उत्पादन लागत निरंतर बढ़ी है, जहाँ तक कृषि में पूँजीगत लागत का प्रश्न है, जोतों के छोटा होने के कारण उत्पादन के अनेक आधुनिक यंत्रों का पूर्ण दोहन नहीं हो पा रहा है, इसमें ट्रैक्टर, ट्यूबवैल, कीटनाशक छिड़कने के यंत्र, बुवाई एवं कटाई की आधुनिक मशीने सभी शामिल हैं। इनके लिए बैंक से ऋण तो आसानी से मिल जाता है किंतु उसके मूल एवं ब्याज की लागत भूमि की उपज में जुड़ जाती है और किसान की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। छोटी जोतों में पूर्ण एवं आधुनिक यांत्रिकीकरण संभव नहीं है और महंगे कृषि-यंत्र, मात्र कुछ बड़े किसानों द्वारा ही उपयोग में लाये जा रहे हैं।
- हमारे देश की एक बड़ी समस्या यह भी है कि हमारे किसान अनुगामी नहीं हैं। अशिक्षा एवं दोशपूर्ण नीतियों के कारण अनुसंधानों का लाभ अन्तिम सिरे तक नहीं पहुँचा है सामान्य एवं छोटे किसान इन अनुसंधानों के लाभ से वंचित रहे हैं तथा बड़े किसानों ने इन अनुसंधानों का लाभ उठाकर अपनी स्थिति को बेहतर किया है, जबकि छोटे एवं सीमान्त किसान अभी भी पुरानी तकनीक पर ही कार्य करने को विवश हैं, जिससे इनकी उत्पादन लागत मानकों से बहुत अधिक है। 
- भारतीय किसान आज भी कर्ज़ में डूबे रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महाजनों एवं साहूकारों की शोषण-नीति के कारण किसान ऋण से मुक्त नहीं हो पाते, जबकि सरकार एवं बैंकों द्वारा ऋण के क्षेत्र में काफी सराहनीय प्रयास किए हैं किंतु इनका फ़ायदा बड़े किसान ही उठाते हैं जबकि छोटे एवं सीमांत किसान इससे वंचित रह जाते हैं और वे भूमि-सुधार, और यंत्रीकरण आदि में पर्याप्त पूँजी लगाने में असमर्थ रहते हैं।
- कृषि में लगने वाले उपादान, यथा- बीज, खाद, यंत्र, आदि लगातार महंगे होते जा रहे हैं और सरकार द्वारा भी अनुदानों में निरंतर कमी की जा रही है, जिसका बोझ सीधे-सीधे किसानों पर पड़ रहा है। 
- किसानो द्वारा अनेक क्षेत्रों में आज भी जानकारी के अभाव में वर्ष में मात्र एक अथवा दो फसलें ही उगायी जा रही हैं, जबकि आधुनिकीकरण के इस युग में बहु-फ़सली खेती का दौर है। 
- भारतीय किसान आज भी फ़सल मिलते ही उसको बेचने के लिए विवश है क्योंकि फ़सलों के भंडारण की समस्या अभी भी बनी हुई है। किसान के सामने अपनी फ़सल का भण्डारण न कर पाने की समस्या के कारण फसल आते ही उसको बाज़ार में लाना उसकी मजबूरी होती है, जिस कारण फ़सल आते ही उसका मूल्य गिर जाता है और किसान अपनी फ़सल का उचित मूल्य नहीं लें पाते।
- किसानों के समक्ष एक बड़ी समस्या उनके लिए धन की आवश्यकता है। किसानों को अपने विभिन्न कार्य, मात्र फ़सल से प्राप्त आय से ही पूरे करने होते हैं, जबकि उन्हें बचत नहीं हो पाती और वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विभिन्न स्रोतों से धन उधार लेते रहते हैं जिसका भुगतान फ़सल आने पर उन्हें करना होता है, अतः फ़सल आते ही उसे बेचना, उनकी मजबूरी है। 
- भारत में कृषि वस्तुओं के क्रय विक्रय के लिए संगठित एवं सुव्यवस्थित बाज़ार का अभाव रहा है। अतः किसान, कृषि कार्यों में व्यस्तता के कारण, अपनी उपज को मंडियों में ले जाने के बजाय गाँव में ही साहूकार, महाजनों एवं दुकानदारों को ओने-पोने भाव पर ही बेचता है। 
- हमारे किसानों को बाज़ार के बारे में सही जानकारी एवं अनुमान नहीं हो पाता है। अतः वे सही फ़सल के उत्पादन के बारे में फैसला करने में चूक कर जाते हैं। प्रायः देखा गया है कि यदि एक वर्ष किसी फ़सल के मूल्य में वृद्धि होती है, तो अगले वर्ष अधिकांश किसान उसी फ़सल को पैदा करते हैं, जिस कारण अगले वर्ष उस फ़सल का उत्पादन, बाज़ार माँग की अपेक्षा बहुत अधिक हो जाता है, परिणामस्वरूप उस वस्तु का विक्रय मूल्य घट जाता है और किसान फिर हानि उठाते हैं।
- हमारे किसान आज भी पारंपरिक फसलों की ही खेती कर रहे हैं। वह अभी तक नए उत्पादों को जानकारी के अभाव में, उनका उत्पादन करने में सक्षम नहीं हो रहे हैं। ये किसान लाभकारी फ़सलें, जैसे- फल, सब्जी, औषधीय एवं मसालों की खेती नहीं कर पा रहे हैं, जो पारंपरिक फसलों के मूल्य की तुलना में अधिक आय देने वाली होती हैं।
- हमारे छोटे एवं सीमान्त किसान, शिक्षा एवं जानकारी के अभाव में अपनी फ़सल के विक्रय के समय पूरा मोल भाव नहीं कर पाते और ये ही वे किसान होते हैं, जिनको धन की तुरन्त आवश्यकता होती है और वे अपनी फ़सल शीघ्र बेचने के लिए बाध्य होते हैं। परिणामस्वरूप उनको अपनी फ़सल का मूल्य भी कम मिलता है। 
- जो किसान ऋण लिए रहते हैं, उन पर बैंक, साहूकार एवं महाजन अपना ऋण एवं किस्त वसूलने के लिए फसल आते ही दबाव बनाना प्रारंभ कर देते हैं। अतः किसान फ़सल आते ही उसे बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
- अधिकांश लघु एवं सीमान्त किसानों के पास वर्ष भर के लिए काम नहीं होता है। वे वर्ष के चार से आठ माह तक बेरोज़गार रहते हैं, तथा इस समय के सदुपयोग की कोई भी योजना उनके पास नहीं होती है। 
- भारत की कृषि मानसून एवं प्रकृति पर निर्भर है। वर्शा कभी अधिक तो कभी कम हो जाती है, यहाँ की मिट्टी में कहीं नाइट्रोजन की कमी, तो कहीं भूमि का कटाव, तथा कहीं पानी का भराव आदि देखने को मिलता है, जो कृषि उपज को प्रभावित करते हैं।
- भारत में कृषि की एक प्रमुख समस्या फसलों को कीड़े-मकौड़ों व रोगों से सुरक्षा न कर पाना भी है। भारत में कुल खाद्यान्नों का 16 प्रतिशत इन कीड़ों व रोगों से नष्ट हो जाता है। 
उपरोक्त सभी समस्याओं का प्रभाव यह है कि भारतीय किसान, ग़रीबी के दुश्चक्र में फँसा हुआ है, जिसमें से छूट पाना उसके लिए संभव नहीं हो पा रहा है। सरकारी स्तर पर किए जा रहे प्रयासों को यदि देखा जाय तो ये राजनैतिक अधिक प्रतीत होते है तथा इनसे किसानों की भलाई बहुत ही कम हुई है। किसान इन समस्याओं को अपनी अगली पीढ़ी को भी दे रहे हैं, जिस कारण से अभी लंबे समय तक किसानों का इस दुश्चक्र से बाहर निकलना संभव नहीं दिख रहा है। 
कृषि के क्षेत्र में उपरोक्त समस्याओं को देखते हुए सरकार द्वारा समय-समय पर कृषि उत्पादन बढ़ाने एवं देश का विकास करने हेतु निम्न कदम उठाए गए हैं।
- सरकार द्वारा कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना की गई है, ताकि अधिक उपज देने वाले बीज तैयार कर, इन्हें समुचित रूप से किसानों के मध्य वितरित किया जा सके। नई पौध, प्रजातियों के विकास हेतु अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय बीज-नीति 2002 बनाई गई है। 
- कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने हेतु रासायनिक खादों का प्रयोग भी तेजी से बढ़ा है, जिसके लिए भिन्न-भिन्न स्थानों पर रासायनिक खाद-कारखाने, भारतीय खाद निगम व अन्य संस्थाओं द्वारा खोले गए हैं।
- सिंचाई सुविधाओं को बढ़ाने के लिए लघु, मध्यम व बड़ी सिंचाई परियोजनायें शुरू की गई हंै। विभिन्न क्षेत्रों में सिंचाई हेतु सरकारी नलकूपों का निर्माण भी कराया गया है। 
- फसलों को रोग एवं कीड़े-मकौड़ों से बचाने हेतु 14 केंद्रीय फ़सल संरक्षण केंद्रों की स्थापना की गई हैं।
- सरकार द्वारा तकनीकी व्यक्तियों में व्यावसायिक साहस की क्षमता को विकसित करने के उद्देश्य से कृषि सेवा केंद्र स्थापित किए गए है, जो किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।
- सरकार द्वारा हरित क्रान्ति के अंतर्गत बहुफ़सली कार्यक्रम को अपनाया गया है। वर्तमान में सरकार द्वारा 57 अग्रगामी परियोजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें दो या तीन फसलों को पैदा करने से संबंधित प्रयोग एवं प्रदर्शन किए जाते हैं तथा किसानों को नवीन तकनीक को समझाने तथा उनको कार्यरूप देने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई है। 
- कृषि भूमि का उपविभाजन व अपखंडन होने से किसानों के छोटे-छोटे व बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर करने के लिए चकबंदी कार्यक्रम लागू किया गया है। वर्ष 2011 तक लगभग 1739.01 लाख एकड़ भूमि में चकबंदी की जा चुकी है। 
- कृषि यंत्रों, ट्रैक्टरों तथा अन्य उपकरणों के प्रयोग को किसानों के बीच लोकप्रिय बनाने के प्रयास सरकार द्वारा किए गए हैं, जिसके लिए किसानों को सहकारी समितियों, ब्लाक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, भूमि विकास बैंक तथा अन्य बैंकों के माध्यम से सस्ती दर पर ऋण किसान क्रेडिट कार्ड तथा अन्य योजनाओं के माध्यम से उपलब्ध कराये जा रहे हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों को अपनी शाखायें खोलने के लिए भी निर्देशित किया गया है। 
- कृषि उपज के मूल्यों में स्थिरता लाने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की स्थापना सरकार द्वारा की गई है जो कृषि उपज मूल्यों के निर्धारण में सरकार को समय-समय पर सुझाव देता है। 
- सरकार द्वारा कृषि भूमि के विकास के लिए भूमि सर्वेक्षण कर इसको समतल बनाने, ढलान देने, कटान रोकने तथा सीढ़ीदार खेत बनाने आदि के प्रबंध किए गए है तथा वैज्ञानिक ढंग से खेती करने के गुरों को भी किसानों को बताया जाता है, जिसके लिए टेलीफोन के टोल फ्री नंबर पर किसान अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं।
- कृषि क्षेत्र को बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा ग्रामीण विद्युतीकरण निगम की स्थापना की गई है, जहाँ 1950-51 में केवल तीन हजार गाँवों को बिजली मिलती थी, वहीं आज 90 प्रतिशत गाँवों का विद्युतीकरण किया जा चुका है। 
- सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में जोतों को अधिक छोटा होने से रोकने के लिए संबंधित कानून में संशोधन किए गए हैं तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों द्वारा अन्य जाति के लोगों को भूमि हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाया गया है। 
- कृषि अनुसंधान एवं पशु पालन विकास हेतु अनेक कृषि एवं पशु पालन अनुसंधान केंद्र तथा विश्वविद्यालय खोले गए हैं।
कृषि क्षेत्र की समस्याओं एवं सरकारी प्रयासों का विवेचन करने से स्पष्ट होता है कि कृषि क्षेत्र की उन्नति, सरकारी प्रयासों या कम दर पर प्रदत्त ऋणों के द्वारा संभव नहीं है। जब तक किसान की उत्पादन क्षमता का विकास नहीं होगा, तब तक किसी भी सकारात्मक परिणाम की आशा नहीं की जा सकती है। ऐसी परिस्थिति में सरकार को भी कुछ अन्य उपायों को अपनाने की जरूरत है, ताकि उक्त समस्याओं का निस्तारण किया जा सके। कृषि क्षेत्र की  कुछ समस्याओं का निस्तारण केंद्र सरकार के अधीन है और कुछ का निस्तारण राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, अतः आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र एवं राज्य सरकार के बीच समन्वय हो और दोनों सरकारें मिलकर ही कुछ ठोस प्रयास करें। अतः कृषि समस्याओं के संबंध में निम्न सुझाव लाभकारी हो सकते हैं।
- देश में लघु एवं सीमांत किसानों की स्थिति सर्वाधिक शोचनीय हैं क्योंकि साधनों के अभाव में ना तो वे नई तकनीक का उपयोग कर सकते हैं और न ही आधुनिक कृषि यंत्रीकरण का। अतः सरकार को चाहिए कि वह योजना बनाते समय प्रयास करे कि ऐसे किसानों को परती पड़ी भूमि आवंटित कर दी जाय, ताकि वे लघु एवं सीमान्त कृषक की सीमाओं से बाहर आ सकें। एक प्रयास यह भी किया जा सकता है कि ये किसान अनुबंधित खेती, सहकारी अथवा सामूहिक कृषि या स्वयं सहायता समूह के माध्यम से कृषि जोतो का आकार बड़ा बनाकर समुचित सुविधाओं एवं यान्त्रिकीकरण का लाभ उठा सकें।
- वैसे तो फसल बीमा की योजना हमारे देश में लागू कर दी गई है किंतु यह अभी भी सच्चे अर्थों में पूर्णतः क्रियान्वित नहीं हो पायी है। छोटे एवं सीमान्त किसानों तथा भूमिहीन मजदूरों के लिए, इसके प्रीमियम का भुगतान सरकार द्वारा वहन किया जा सकता है। यदि किसान की फ़सल ख़राब होती है तो फ़सल बीमा धारक को इतना न्यूनतम भुगतान अवश्य किया जाय कि वह अपने परिवार का गुजारा कर सके अन्यथा की स्थिति में उसे धनराशि के स्थान पर खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जा सकती है। - बैंकों द्वारा कृषि ऋणों के लिए प्रतिभूति एवं मार्जिन संबंधी नियमों को सरल बनाया जाना चाहिए। यदि बैंकों द्वारा ऋण के प्रति, भूमि बंधक करने में छूट दी जाय तो इससे ऋण लेने की लागत भी गिर जाएगी और किसान भी अधिक ऋण प्राप्त कर सकेंगे, जो पहले अधिक मार्जिन संबंधी आवश्यकताओं के कारण ऋण प्राप्त करने में अक्षम थे।
- यदि किसान प्राकृतिक आपदा जैसे सूखा, बाढ़, फसलों में बीमारी आदि आने पर ऋण की किस्त नहीं चुका पाते तथा जल्दी-जल्दी एक से अधिक बार प्राकृतिक आपदा का शिकार हो गए है उनके पुराने ऋणो को पुनर्निर्धारित कर साथ में नया )ण भी बैकों एवं सरकार द्वारा दिया जाना चाहिए।
- यदि किसान द्वारा पूर्व में किन्हीं कारणों से ऋण न चुकाने की स्थिति में समझौता प्रक्रिया द्वारा खाता बंद कराया गया हो तो ऐसे किसानों को भी पुनः नए ऋण प्रदान किए जाने चाहिए क्योंकि ऐसे किसानों के ऋण आवेदन-पत्रों को निरस्त कर दिया जाता हैं।
- छोटे एवं सीमान्त किसानों को ऋण की एक सीमा तक ब्याज दर में छूट दी जानी चाहिए। वैसे तो सरकार द्वारा किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से यह योजना चलाई गई है किंतु देखने में आया है कि इस योजना का लाभ भी बड़े किसानों द्वारा ही उठाया जा रहा है। जिन छोटे किसानों को इस योजना के अंतर्गत लाभ मिला है किंतु चीनी मिलों द्वारा उनके गन्ने का भुगतान नहीं किया गया है, तो वे किसान या तो अधिक ब्याज देने के लिए बाध्य हुए हैं या फिर बैंक अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा कुछ अतिरिक्त पैसा लेकर उनके ऋण खातों को परिवर्तित कर दिया गया है अतः इस प्रवृत्ति पर रोक लगाई जानी चाहिए।
- कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि आदान जैसे-बीज, खाद, कीटनाशक दवाई आदि को उचित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में ग्राम पंचायत के माध्यम से सरकार द्वारा उचित व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि उसका लाभ आखिरी कड़ी तक पहुँच सके।
- कृषि में पर्याप्त विनियोग को प्रोत्साहित करने के लिए यह भी आवश्यक है कि कृषि मूल्यों में उतार-चढ़ाव को रोका जाय तथा फ़सल बुवाई से पहले ही सरकार उन मूल्यों की घोशणा अवश्य करे, जिस पर तैयार फ़सल सरकार द्वारा अथवा बाजार में खरीदी जा सके।
- छोटे एवं सीमान्त किसानों द्वारा अपनी भूमि का पूर्ण उपयोग करने के लिए एक विकल्प अनुबंधित खेती के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है, इससे किसानों को धन के साथ-साथ नयी तकनीक की जानकारी एवं रोजगार भी उपलब्ध हो जाएंगे।
- खेती की जमीन का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने हेतु किसानों द्वारा मिश्रित एवं गहन खेती की जानी चाहिए। फ़सलों के साथ-साथ पशुपालन, डेयरी एवं सब्जियों आदि का उगाना तथा कृषि आधारित सहायक उद्योगों को भी विकसित किया जाना चाहिए।
- मानसून पर कृषि की निर्भरता को कम करने तथा दोहरी फ़सले उगाने के लिए सिंचाई सुविधाओं का विकास किया जाना चाहिए, साथ ही जहाँ-जहाँ बाढ़ की समस्या है, वहाँ बाढ़ नियंत्रण की व्यवस्था भी की जाय।
- सरकार द्वारा किसानों के प्रशिक्षण की विशेष व्यवस्था की जाय ताकि वे कृषि की नवीनतम तकनीक से परिचित हो सकंे और नवीनतम अनुसंधानों का लाभ उठा सकंे। ग्राम्य विकास विभाग इस दिशा में सार्थक सिद्ध हो सकता है। 
- सरकार द्वारा किसानों को उनकी फ़सल के बदले में समर्थन मूल्य का भुगतान करने के साथ-साथ उन्हें एक फसल बांड भी जारी किया जा सकता है, जिसका विक्रय किसान एक वर्ष की अवधि में कभी भी कर सकते हैं। बांड का मूल्य फसल के समर्थन मूल्य से जब अधिक हो तब किसान अपने बांड को भुनाकर शेष धनराशि प्राप्त कर सकता है। ये बांड एक प्रकार से कृषक की तरलता के साथ-साथ फ़सल का बेहतर मूल्य दिलाने में सक्षम हो सकते हैं।
मुख्य रूप से हमें यह सोचना है कि जब तक हम अपने किसानों में उत्पादन एवं क्रय क्षमता का सृजन नहीं करेंगे तब तक उनका उत्थान संभव नहीं है। कृषि हमारे देश में केवल जीवन-यापन का साधन या उद्योग धंधा ही नहीं है बल्कि अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है। खेती को सर्वाधिक प्राथमिकता देने की जरूरत है अन्यथा देश का पूर्ण विकास संभव नहीं है। सरकार को कृषि क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी कार्य पद्धति में परिवर्तन करना होगा, तभी हम, देश एवं किसानों का भला कर कृषि संबंधी समस्याओं से निजात पा सकेंगे और देश को विकास की राह पर ले जाने में सफ़ल हो सकेंगे।



भुगतान संकट से उभरता चीनी उद्योग
भारतवर्ष को गन्ने और चीनी के मूल स्थान के रूप में देखा जाता है, जोदुनिया में ब्राजील के बाद चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। अर्थव्यवस्था में भी भारत के चीनी उद्योग ने अनेक उपलब्धियाँ हासिल की हैं। भारत में यह उद्योग बहुत विकसित है और देश की समस्त आबादी इसकी उपभोक्ता है, साथ ही यह दूसरे नंबर का कृषि प्रसंस्करण उद्योग है। केंद्र और राज्य सरकार के राजकोशों में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। चीनी उद्योग में करोड़ो लोगों को सीधे रोजगार मिला हुआ है एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भी कृषि से जुड़े अधिकांश परिवार भी इसी उद्योग पर निर्भर हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में लगभग 32 लाख गन्ना किसान गन्ना उत्पादन पर निर्भर हैं। भारत में चीनी उद्योग बहुत ही बिखरा हुआ है और प्रमुखत: महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश राज्यों में विकसित हुआ है। लगभग 60 प्रतिशत चीनी मिलें सहकारी क्षेत्र में 35 प्रतिशत निजी क्षेत्र में और बाकी सार्वजनिक क्षेत्र में लगाई गई हैं। देश में गन्ने की खेती लगभग 49 लाख हेक्टेयर भू-क्षेत्र में की जाती हैजिसमें से अकेले उत्तर प्रदेश का रकबा लगभग 20 लाख हेक्टेयर है। देश में गन्ने की औसत उपज लगभग 68 टन प्रति हेक्टेयर है। उत्तर प्रदेश में चालू सत्र में 116 चीनी मिलों ने गन्ना पेराई की है। इनमें 91 निजी 24 सहकारी तथा 1 चीनी निगम की मिल है। जिन्होंने 7963.89 लाख कुंटल गन्ने की पेराई कर 842.44 लाख कुंटल चीनी का उत्पादन किया है। जबकि विगत सत्र में यह 117 चीनी मिलों द्वारा 6368.35 लाख कुंटल गन्ने की पेराई कर 675.21 लाख कुंटल चीनी बनाई थी। चीनी उद्योग की प्रगति एवं वर्तमान स्थिति को निम्न तालिका द्वारा दर्शाया गया है। 
यह लगभग हर वर्ष की कहानी है कि गन्ना किसानों को अपने पिछले बकाए का भुगतान और गन्ने के दाम बढ़ाने के लिए मजबूर होकर सड़कों पर उतरना पड़ता है, किंतु गन्ना किसानों की मूलभूत माँगों को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और चीनी मिल मालिकों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। राज्य सरकार ने चार वर्ष पूर्व 2012-2013 में गन्ने के 17 प्रतिशत दाम बढ़ाकर 280 रुपए प्रति कुंटल किए थे जो वर्ष 2016-17 में बढ़ाकर 305 रुपए प्रति कुंटल किए गए है। पिछले चार वर्ष में यदि मुद्रा स्फीति को देखें तो किसानों की गन्ने का दाम बढ़ाने की मांग वाजिब लगती है। दूसरी तरफ चीनी मिल मालिकों की दलील है कि चीनी के दामों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। अतः वह अधिक भुगतान देने की स्थिति में नहीं हैं। किंतु इस वर्ष चीनी की रिकवरी बढ़कर 10.58 प्रतिशत रहने और चीनी के भाव बढ़ने से मिलों की स्थिति में सुधार आया है। विडम्बना तो यह है कि गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य घोषित हो या न हो किसानों को अपना गन्ना मिलों तक पहुँचाना ही होता है। संभवतः ऐसा कोई और उद्योग-धन्धा नहीं है जिसमें उत्पादक अपने उत्पाद को बाजार में बेच आये और उसे यह भी पता न हो कि आखिर उसे इसके एवज में दाम क्या मिलेगा? इस वर्ष भी यही हुआ, जब राज्य सरकार ने पेराई सत्र शुरू होने के डेढ़ महीने बाद गन्ने के दाम तय किए। 
गन्ने के मूल्य एवं उसकी लागत में 2007-08 के बाद तेजी से वृद्धि हुई है। जबकि एक कुंटल गन्ने में दस किलो तक चीनी बन रही थी। जो बढ़कर इस वर्ष औसत 10.58 प्रतिशत हो गई है। जिन मिल क्षेत्रों में अगेती गन्ने का रकबा अधिक है वहाँ तो चीनी का उत्पादन एक कुंटल में ग्यारह किलो तक आ रहा है, साथ ही रिजेक्ट प्रजातियों के गन्ने का क्षेत्र भी निरंतर कम हो रहा है। उत्तर प्रदेश में चार साल में गन्ने के रकबे में 3.72 लाख हैक्टेयर की कमी आई है, यानि हर साल 93 हजार हैक्टेयर रकबा कम हो रहा है। वर्ष 2012-13 से 2014-15 के बीच गन्ना उत्पादन में भी 104.92 लाख टन की कमी आई है। किंतु चालू वर्ष में गन्ने की प्रजातियों में सुधार आने से पैदावार बढ़ी है। अब नई पीढ़ी के लोगों का मन गाँव, खेत-खलिहानों से हट रहा है दूसरी ओर प्रत्येक घर में बंटवारे की वजह से भी खेती का रकबा तेजी से घट रहा है। अतः नई-नई तकनीक एवं तरीके अपनाकर खेती की लागत कम करना और उत्पादन को बढ़ाकर आमदनी को बढ़ाना है जिससे गन्ने की फसल भी प्रभावित हुई है। 
उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान शाहजहांपुर द्वारा गन्ना उत्पादन लागत मूल्य 282.14 रुपए प्रति कुंटल का आकलन किया गया है। लगातार बढ़ रही मजदूरी की लागत, जुताई, कटाई, विद्युत, उर्वरकों, कीटनाशकों के बढ़ते रेट तथा भूमि के बढ़ते किराये के कारण पिछले तीन वर्शों में गन्ना उत्पादन लागत लगभग 25 प्रतिशत बढ़ गई है। किसानों के आकलन में एक एकड़ खेत में गन्ना उत्पादन करने पर 77,710 रुपए की लागत आती है, इसमें जुताई, पाटा चलाना, बीज, निराई गुड़ाई, छिलाई, मेढ बनाने, खाद, दवा से लेकर बधाई और ट्रांसपोर्टेशन तक का खर्च शामिल है। प्रति एकड़ गन्ने की उपज औसतन करीब 256 कुंटल मिलती है। इस हिसाब से एक कुंटल गन्ना उगाने पर किसान 303 रुपए लगाता है मगर उसे विगत वर्षों में मिलते थे सिर्फ 280-290 रुपए जो वर्ष 2016-17 में 305-315 रुपए हो गए हैं।
चीनी मिलें, चीनी मूल्य को ही गन्ना खरीद का आधार बनाती हैं। जबकि गन्ने से चीनी के अलावा शीरा, खोई और मैली भी मिलती है, इसके अलावा एथेनाॅल, एलकोहल, प्लाईवुड, टाॅफी आदि सह-उत्पादों का भी निर्माण होता है। इन उप-उत्पादों एवं सह-उत्पादों से मिलने वाले फायदों को चीनी मिलें छिपा लेती हैं और इस वर्ष तो चीनी की रिकवरी भी गत वर्ष के मुकाबले औसतन 0.8 प्रतिशत ज्यादा मिल रही है। एक विश्लेषण के अनुसार चीनी मिल दस कुंटल गन्ने की पेराई पर 1300 रुपए का लाभ अथवा एक कुंटल गन्ने पर करीब 130 रुपया कमा रही है। 
दस कुंटल गन्ने से प्राप्त उत्पादों की कुल कीमत 4500 रुपए आती है जबकि एक कुंटल चीनी की मय दस कुंटल गन्ना उत्पादन लागत 3200 रुपया होती है। अतः प्रति कुंटल गन्ने पर औसतन 130 रुपया अभी भी चीनी मिलों को फायदा हो रहा है। इसके अलावा विगत वर्ष में एसएपी का भुगतान दो किृतों में करने की छूट दी गई थी।
विगत वर्ष में चीनी उद्योग का कहनाथा कि उत्पादन लागत के मुकाबले चीनी का मूल्य कम होने के कारण मिलें लगातार घाटे की ओर बढ़ रही थी। चीनी मिलों को संकट से उबारने के लिए केंद्र सरकार ने एक अरब दस करोड़ रुपए का ब्याज मुक्त ऋण तथा छः हजार करोड़ रुपए का राहत पैकेज सीधा किसानों के खाते में भेजदिया था। जिसका ब्याज 600 करोड़ रुपया चीनी विकास निधि से दिया गया। इसके अतिरिक्त 4000 रुपया प्रति टन चीनी पर निर्यात सब्सिडी और एथेनाॅल पर उत्पाद शुल्क में छूट भी दी गई थी। किसानों के खातों में 4.50 रुपए प्रति कुंटल की दर से 1147 करोड़ रुपए प्रोत्साहन सब्सिडी भेजने का फैसला भी किया गया था। पर यह राशि एफआरपी का ही हिस्सा बनी रही। इससे किसानों को सीधे कोई लाभ नहीं हुआ। सरकार द्वारा चीनी मिलों पर पिछले वर्ष का देय 490 करोड़ ब्याज भी माफ कर दिया गया था किंतु फिर भी प्रदेश के किसानों का 1800 करोड़ रुपया और विगत वर्ष का 8000 करोड़ रुपए का भुगतान चीनी मिलों पर शेष था। वर्तमान सरकार के गठन के बाद अब तक 2923 करोड़ रुपए गन्ना मूल्य का भुगतान किसानों को कराया गया है। गत वर्ष की तुलना में वर्तमान वर्ष में 7918 करोड अर्थात् 21 प्रतिशत अधिक गन्ना मूल्य का भुगतान हुआ है। चालू सीजन में स्थिति में काफी सुधार आया है और 17921.99 करोड़ रुपए कुल गन्ना मूल्य का भुगतान किया गया है। जो कुल भुगतान का 81.08 प्रतिशत है। जहां तक बकाया की स्थिति है वर्ष 2014-15 का 43.75 करोड़ रुपए वर्ष 2015-16 का 162.63 करोड़ रुपए शेष है और इस वर्ष बजाज समूह पर जिसकी 15 मिलें है 2325.18 करोड़ रुपए, सिंभावली (3 मिले) 408.45 करोड रुपए, मोदी समूह (2 मिले) 397.25 करोड़ रुपए मवाना समूह (2 मिले) 305.04 करोड़ रुपए उत्तम ग्रुप (3 मिले) 123.67 करोड़ रुपए व ऐरा (एकल समूह) 108.76 करोड़ रुपए बकाया है। यहाँ सवाल यह भी उठता है कि जब देश की सहकारी मिलें भुगतान कर सकती हैं तो निजी मिले क्यों नहीं? वर्तमान में चीनी का मूल्य भी बाजार में बढ़ा है। चीनी मिलों द्वारा चीनी बाजार में न बेचकर अपने गोदामों में भाव बढ़ने की प्रत्याशा में, रखे हुए थे और किसानों के भुगतान पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा था। सहकारी एवं सरकारी चीनी मिलों के द्वारा तो भुगतान में सरकार के दबाव में कुछ तेजी आई है किंतु निजी चीनी मिलों में यह प्रगति अभी भी पूर्णतः दिखायी नहीं दे रही है। किसानों से बात करने पर आम किसान का कहना था कि सरकार, चुनाव के लिए निजी चीनी मिलों से पैसा उगहाकर किसानों के हितों पर ध्यान नहीं देती थी। जिससे आम किसान के सम्मुख भुगतान संकट बना रहता था। अब शायद इस स्थिति में सुधार होगा।
वर्ष 2010-11 में चीनी उद्योग की हालत खराब होने से बसपा सरकार ने जुलाई से अक्टूबर 2010 और जनवरी से मार्च 2011 के बीच दो चरणों में क्रमशः दस और ग्यारह चीनी मिलों को बेच दिया था पहले दौर की बिक्री वाली दस मिलों को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन पोटास लिमिटेड ने खरीदा जबकि दूसरे दौर की ग्यारह मिलो को एक ही प्रबंधन में अलग-अलग कंपनियों के नाम से खरीद लिया था। पहले दौर की दस चालू मिलों में अमरोहा, चांदपुर, जरवल रोड, सिसवा बाजार, बुलन्दशहर, सहारनपुर, खड्डा, रोहाना कला, सकौती टांडा की चीनी मिले बेची गई जबकि ग्यारह बंद चीनी मिलों में देवरिया, बेतालपुर, भटनी, शाहगंज, लक्ष्मीगंज, रामकोला, छितौनी, घुघली, बरेली, हरदोई और बाराबंकी मिल शामिल रही इन सभी चीनी मिलों के पास बेशकीमती जमीन है इसकी आधी चैथाई कीमत भी नहीं वसूली गई साथ ही मिल प्लांट और मशीनरी भी नाम मात्र में बिकी। राज्य सरकार ने इक्कीस चीनी मिलों की अनुमानित कीमत मात्र 725.52 करोड रुपए आंकी थी इनका विक्रय मूल्य 542.44 करोड़ रुपए तय किया गया इसके विपरीत ये मिले मात्र 427.45 करोड़ रुपए में बिक गई। सैद्धांतिक रूप से चार जून 2007 को राज्य चीनी निगम की मिलों को बेचने का निर्णय ले लिया गया था। इक्कीस चीनी मिलों की बिक्री पर भारत के नियंत्रक महापरीक्षक ने अपने प्रतिवेदन में मिलों को बेचने में 1179.84 करोड़ रुपए का नुकसान माना था और कहा था कि चीनी मिलों का मूल्यांकन तर्क संगत नहीं किया गया और बीडिंग प्रक्रिया में स्पर्धा की कमी रही, अव्यवहारिक रूप से बिड वापस ली गई। अर्हता के मानकों को बदला गया, स्टांप ड्यूटी एवं प्रक्रियात्मक खामियां रहीं, उसके बाद सपा सरकार ने भी इस घोटाले पर पर्दा डाल दिया जबकि अब नयी सरकार के आने से नए सिरे से जांच का फैसला लिया गया है। 1180 करोड़ रुपए के इस घोटाले ने चीनी उद्योग की कमर तोड़ दी थी।
चीनी उत्पादन के अतिरिक्त मिलों को दूसरे बाई प्रोडक्ट भी मिलते हैं। वहीं किसान गन्ना देकर भी भुगतान के लिए भटकता रहता है। वास्तव में समय आ गया है जब प्रदेश के 50 लाख गन्ना किसानों की माँगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर सुनियोजित व्यवस्था बनाई जाय, ताकि उन्हें सम्मानजनक तरीके से भुगतान हो सके और किसान एवं चीनी मिल अपनी खोई हुई खुशहाली को पुनः प्राप्त कर सकें, साथ ही चीनी मिलों को भी आवश्यकता इस बात की है कि अपने संसाधनों का बेहतर प्रबंधन एवं अधिकतम इस्तेमाल की तरफ ध्यान आकृष्ट कर अपनी लागतों को न्यूनतम करें, ताकि चीनी उद्योग को बर्बादी से बचाया जा सके और किसानों का भी भला हो सके। अन्यथा सरकार और चीनी मिल मालिकों के बीच चल रही नूराकुश्ती में किसान बुरी तरह फंसकर रह जाएगा।
ग्रामीण विकास में बैंक ऋण का योगदान
आजादी के बाद से ही हमारी सरकार की प्राथमिकता, ग्रामीण विकास के लिए सर्वोपरि रही है किंतु छः दशक बीत जाने के बाद भी हमारा अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र अविकसित अवस्था में पड़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, बिजली, स्वास्थ्य, परिवहन, बैंकिंग और अन्य ढाँचागत सुविधाओं की कमी एवं गरीबी के चलते लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। ग्रामीण लोग, खेती पर आधारित होने के कारण गरीबी की मार झेलते हैं और गुणवत्तापरक शिक्षा के अभाव में अपनी उन्नति भी नहीं कर पाते। ग्रामीण परिवेश में मूल समस्या ऋण प्राप्त करने एवं उसकी अदायगी से संबंधित है। ग्रामीण विकास में बाधक कुछ सामाजिक समस्याएं जैसे-जाति व्यवस्था, जनसंख्या की अधिकता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी, निरक्षरता, बाल विवाह, छुआछूत, कृषि पर अधिक निर्भरता आदि भी है। स्वतंत्रता के समय ग्रामीण ऋणों में सर्वाधिक हिस्सेदारी 44.8 प्रतिशत साहूकारों की, उसके बाद 24.9 प्रतिशत बड़े किसान एवं महाजनों की तथा 14.2 प्रतिशत रिश्तेदारों की थी, सबसे कम भाग 0.9 प्रतिशत वाणिज्य बैंकों द्वारा, 3.3 प्रतिशत सरकार द्वारा, 3.1 प्रतिशत सहकारिताओं द्वारा तथा 5.5 प्रतिशत व्यापारी एवं आढ़तियों का था। किंतु वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देशों ने स्थिति को बिलकुल ही उलट दिया है और बैंकों के लिए निवल बैंक ऋण का कम से कम 40 प्रतिशत कृषि, लघु उद्योग तथा अन्य प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में विनियोजित किए जाने की बाध्यता रखी है तथा निवल बैंक ऋण का 18 प्रतिशत केवल कृषि क्षेत्र को ही प्रदत्त किया जाना चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित इन मानदंडों को प्राप्त करने हेतु बैंकों द्वारा लचीले, आसान एवं लागत प्रभावी ऋण प्रदान करने के लिए प्रतिस्पर्धात्मक ब्याज दरों को अपनाया गया है। सरकार का रुझान भी अब किसानों के प्रति और बढ़ा है। सरकार द्वारा किसानों की कर्ज माफी योजना एवं राहत योजना जो वर्ष 2008 में लागू की थी, उसको बढ़ाकर 31 दिसंबर 2009 तक कर दिया गया है, जिसके तहत चार सौ लाख किसानों को समाविष्ट करते हुए लगभग 71 हजार करोड़ रुपए की एक मुश्त बैंक कर्ज माफी की गई है। दो हेक्टेयर से अधिक भूमि मालिकों को अपने बकाया के 75 प्रतिशत का भुगतान करने के लिए 30 जून 2009 तक का समय दिया गया था जिसमें छः महीने की और वृद्धि की गई है। कुछ राज्यों में बहुत से किसानों ने महाजनों से ऋण ले रखे है और उनकी हालत काफी खराब है और वे सरकार की ऋण माफी योजना में भी नहीं आए हैं अतः सरकार ने इन किसानों पर विशेष ध्यान देने और गहन जांच करने तथा भविश्य की कार्ययोजना से संबंधित सुझाव देने के लिए एक कार्यदल का गठन भी किया है। वित्त मंत्री द्वारा कृषि क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि को लगभग 4 प्रतिशत सुनिश्चित करने के लिए किसानों को सात प्रतिशत ब्याज दर पर तीन लाख रुपया प्रति किसान तक अल्पावधि फसल ऋण हेतु ब्याज सहायता योजना भी जारी रखने की घोषणा की गई है। जो किसान अल्पावधि फसल ऋणों की अदायगी निर्धारित समय पर करेंगे उन किसानों को ब्याज दर में एक प्रतिशत ब्याज की छूट भी सुनिश्चित की गई है। अभी तक निजी एवं विदेशी बैंक अपने व्यापार को शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रखते थे किंतु अब वह दौर शुरू हो गया है कि ये बैंक भी ग्रामीण क्षेत्रों में संभावनाएं तलाशने लग गए हैं। किसान क्रेडिट कार्ड, स्वयं सहायता समूह का वित्त पोषण लघु ऋण जैसे नए-नए क्षितिज ग्रामीण बैंकिंग के क्षेत्र में उदय एवं लोकप्रिय हो रहे हैं। 
ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रमुख रूप से कृषि पर ही आधारित है। आजादी से पूर्व गाँव में फैले लघु एवं कुटीर उद्योगों को अंग्रेज सरकार द्वारा बंद करने के लिए अनेक नीतियां अपनायी गई, साथ ही किसानों का शोशण निजी स्तर पर, ब्याज पर पैसा देने वाले सेठ, साहूकारों एवं महाजनों द्वारा भी किया गया। आजादी के बाद से ही सरकार यह प्रयास करती आ रही है कि किसानों को कैसे इनके चंगुल से मुक्त कराया जाए। बैंको की सेवायें जन-जन को उपलब्ध कराने के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना, सहकारी बैंकिंग को प्रोत्साहन, भूमि विकास बैंक एवं राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण बैंक की स्थापना, भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक का गठन ;जो कि लघु उद्योग क्षेत्र में योगदान कर रहा हैद्ध भी ग्रामीण विकास के क्षेत्र की वित्तीय समस्याओं के निराकरण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
बैंकों द्वारा कृषि ऋण को, सरकार द्वारा सांविधिक बाध्यता के रूप में न अपनाकर, अपने कारोबार के मुख्य हिस्से के रूप में अपनाना चाहिए तभी ग्रामीण विकास को सुनिश्चित करने में बैंकों की हिस्सेदारी हो सकेगी, अतः बैंकों को चाहिए कि - ग्रामीण ऋणों में वृद्धि करने के लिए वे ऋण प्रक्रिया में स्थानीय भाषा का प्रयोग करें। ग्रामीण ऋण में वृद्धि हेतु बैंक किसानों के कृषि उत्पादों की बिक्री में उनकी सहायता करें। बैंकों की कृषि शाखाओं को चाहिए कि वे कृषक हितैशी उत्पादों (ऋण) का समुचित प्रचार-प्रसार करें। बैंक, ग्रामीण ऋण योजनाओं को किसी समय के लिए प्रतिबंधित न करें। बैंकों द्वारा शाखा स्तर पर कृषि मूल्यांकनकर्ताओं की नियुक्ति की जाए। बैंकों को चाहिए कि वह क्षेत्रीयता के आधार पर जहां जो भी फसल अधिक मात्रा में उगाई जाती है अथवा दुग्ध एवं मुर्गी पालन होता है, उसके उत्पादकों से सीधा संपर्क एवं ताल-मेल रखे। ग्रामीण ऋणों की संभावना तलाशने के लिए तहसील अथवा ब्लाॅक स्तर पर कृषि विभाग से जुड़े कर्मचारियों की सहायता ली जाए। ग्रामीण ऋण प्रस्तावों पर निर्णय लेने हेतु बैंक द्वारा कम से कम समय लगाया जाना चाहिए किंतु साथ ही गुणवत्ता का ध्यान भी रखा जाए। ग्रामीण ऋणों में वृद्धि हेतु बैंकों को चाहिए कि वे कृषि परियोजनाओं, कोल्ड स्टोरेज इकाईयों, कृषि क्लीनिकों एवं ग्रामीण गोदामों पर वित्तीयन हेतु सक्रिय प्रयास करें। बैंकों द्वारा शाखा स्तर पर ग्रामीणों को आमंत्रित कर ऋण की उपयोगिता के बारे में जानकारी प्रदान की जाए। बैंक कर्मियों द्वारा ग्रामीणों को विभिन्न ऋण/जमा योजनाओं के बारे में एक निश्चित समय अंतराल पर जानकारी दी जाए, विशेष तौर पर ब्याज दर की जानकारी अवश्य दी जाए एवं जमा रसीदों तथा ऋण खातों को समय पर पूरा करने और उनको सुरक्षित रखने की सलाह दी जाए। बैंकों द्वारा अपनी ग्रामीण अंचल की शाखाओं की मासिक आधार पर समीक्षा की जाए तथा ग्राहक गोष्ठी का भी आयोजन किया जाए। कृषि ऋणों में वृद्धि के लिए बैंकों को चाहिए कि वे कृषि से संबंधित उपकरणों, खाद, बीज, कीटनाशक दवाओं के विक्रेताओं से सीधा संपर्क स्थापित करें और वहीं पर ऋण प्रदान करें। बैंकों को चाहिए कि वे ऋण अनुभाग में अनुभवी एवं पूर्ण जानकारी वाले कर्मचारी ही नियुक्त करें ताकि ग्रामीणों को वह अच्छी तरह योजना के बारे में जानकारी दे सके ताकि आपसी शंकाएं उत्पन्न न हों। 
बैंक एवं सरकार, ग्रामीण विकास के लिए ऋण प्रदान करते हैं, उससे ग्रामीण विकास तो हो रहा है किंतु ऋण ब्याज सहित वापिस नहीं होता है अतः बैंक के सम्मुख वसूली संबंधी अनेक समस्यायें आती हैं। कुछ ऋणी तो अधिक जोखिम वाले कारोबार के लिए ऋण स्वीकृत करा लेते हैं और बाद में कोई भी जोखिम आने पर ऋण वापिस नहीं करते। कुछ ऋणी पहले से ही ऋण वापिस न करने की मंशा बना लेते हैं और इन्तजार करते हैं कि सरकार ऋण माफी कर देगी अथवा बैंक से ही सेटलमेंट करा लेंगे। कुछ ऋणी जानबूझकर ऋण वापिस नहीं करते क्योंकि उनकी पहुँच ऊपर राजनैतिक स्तर पर होती है और उन्हें विश्वास होता है कि बैंक उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही में आसानी से सफल नहीं हो पाएंगे। कुछ परिस्थितियों में बैंक द्वारा ऐसी परियोजनाओं के लिए ऋण स्वीकृत कर दिए जाते हैं जो धन के अभाव में पूरी नहीं हो पाती और वसूली में कठिनाई आती है। बैंक यदि सरकारी तंत्र, तहसील, ब्लाॅक स्तर के कर्मचारियों का सहयोग लेते हैं तो कुछ मामलों में मिलीभगत कर कर्मचारी ही ऋणों को अनर्जक बना देते हैं। सरकार यदि बैंकों द्वारा प्रदत्त कृषि ऋण को माफ करती है तो जो ईमानदार कृषक अथवा ऋणी हैं और ऋण की समय से अदायगी करता है, अपने को बेवकूफ एवं ठगा महसूस करता हैं, क्योंकि उसी के सामने ऋण की परवाह नहीं करने वाला, ऋण माफी का लाभ उठाता है। अतः भविष्‍य में जो ऋण की अदायगी करने वाले लोग हैं, वे भी ऋण माफी का इन्तजार करते हैं, जो बैंकों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सरकार द्वारा, बैंकों की ऋण वसूली का ध्यान रखते हुए, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों को आर्थिक विकास की योजनाओं से जोड़ा जाना चाहिए। ग्रामीण ऋणों की वसूली में बैंकों के सम्मुख समस्या यह भी है कि उनका नेटवर्क ग्रामीण क्षेत्र में अभी तक पूर्ण रूप से नहीं फैला है और क्षेत्र विस्तृत होने से बैंकों पर कार्यभार की अधिकता रहती है। बैंक में खातेदार तो अधिक होते हैं किंतु उनके खातों में जमा धनराशि कम रहती है अतः वसूली की समस्या सदैव ही बनी रहती है, जिसमें जानबूझकर चूक, ऋणों का दुरुपयोग, अनुवर्ती कार्यवाही की कमी, ऋण प्राप्तकर्ताओं का गलत चयन, बेनामी ऋण, कर्मचारियों का आंदोलन और सरकारी नीतियां भी बाधक बनती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण प्राप्तकर्ता अधिकांश कमजोर वर्ग के होते हैं जो समय पर बैंकों की ऋण अदायगी नहीं करते है तथा उनके पास ऋण प्राप्ति के समय भी जमा करने के लिए प्रतिभूति पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होती और ऋणों के लक्ष्य प्राप्त करने हेतु ऋण स्वीकृत कर दिए जाते हैं। 
ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक एवं उधारकर्ताओं के बीच बैंकिंग संस्कृति विकसित करने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण व्यक्ति आज भी ऋण लेने में डरता है किंतु यदि बैंक स्वयं सहायता समूह के माध्यम से ऋण प्रदान करते हैं तो उसमें ऋण अदायगी की संभावना अधिक होती है और समूह भी अपना उद्देश्य प्राप्त करने की कोशिश करता है। अतः बैंकों को चाहिए कि ग्रामीण परियोजनाओं के चयन एवं कार्यान्वयन के लिए मानक लागू करें और ऋणी के कार्य निष्पादन के लिए भी निरंतर निगरानी की व्यवस्था करें ताकि ऋणों का समुचित एवं प्रभावपूर्ण उपयोग हो सके। किसानों के लिए क्रेडिट कार्ड तथा लघु उद्योग आदि के लिए नये-नए उत्पाद निर्गत किए जाएं और आधारभूत संरचना के लिए भी ऋण दिए जाए। ग्रामीण क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए नवोन्मेशी कदम उठाये जाएं। आज ग्रामीण क्षेत्र को ऋण प्रदान करना सामाजिक दायित्व भर न होकर एक सोची समझी रणनीति एवं अपना व्यापार बढ़ाने का तरीका है, इसीलिए आज निजी एवं विदेशी क्षेत्र के बैंक भी अपना बाजार ग्रामीण क्षेत्र में ही तलाशने में जुटे हुए हैं। बिना बैंकों के ऋण प्रदान किए हमारा ग्रामीण विकास संभव नहीं हो सकता, अतः ग्रामीण क्षेत्रों में विकास हेतु ऋण की आज भी महती आवश्यकता है। 
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