Wednesday, January 22, 2020

वैशु


निधि भंडारे


 


निशि बहुत बेचेन थी| रह रहकर उसके मन में वैशु का खयाल आ रहा था| अभी 16 साल की उम्र, छोटी बच्ची और शादी भी हो गई| वैशु, 10 दिन ही हुए थे वैशु को उसके ऑफिस में काम करते हुए| निशि को याद है सोनाली ने बताया था, “म्याम, एक लड़की आयी है, उसेही काम की बहुत ज़रूरत है, सफाई के लिए रख लू?
“तुम्हे ठीक लगता है तो रख लों,” सोनाली शादी में गई थी तो निशि जल्दी ऑफिस गई| जैसे ही ऑफिस पहुँची तो बाहर सीधियों में एक लड़की बैठी| निशि को लगा कोई बैठी होगी और निशि ने ऑफिस का ताला खोला और अंदर चली गई| तभी 5 मिनट बाद वही लड़की अंदर आयी|


नमस्ते मैडम” वो बोली|


नमस्ते, निशि ने जवाब दिया|  


मैडम, मैं वैशु, आपके ऑफिस में सफाई करती हूं, वो बोली|
निशि कुछ देर कुछ ना बोल पाई, छुपचाप उसे देखती रह गई|
मैडम, पंधरा साल, अभी दसवी में हूं, वैशु धीरे से बोली,


तो बेटा, पढाई करो, ये सब काम क्यों करती हो? निशि ने वैशु से कहा|
मैडम, अब पढाई नहीं होगी, शादी हो गई ना, वैशु बोली|


कब हुई शादी? निशि ने पूछा|


नौ महीने हो गये, वैशु ने बताया|


निशि को वैशु के घरवालों पर बहुत गुस्सा आया|


उसने पूछा, तुम्हारे माता पिता ने तुम्हारी इतनी छोटी सी उमर में शादी कैसे कर दि? निशि ने पूछा|


वो मैडम, माँ ने कर दि| वैशु बोली|



कैसी माँ है, ऐसे कैसे कर दी? निशि ने थोड़ा जोर से बोला|


मैडम, मेरी माँ की कोई गलती नहीं, वो मेरे पापा बहुत पीते है ना इसलिए, घर में पैसा नहीं होता, वैशु बोली|


अरे बेटा, तो ये काम मत करो, पढाई करो, मैं दाखिला करती हूं तुम्हारा, निशि बोली|



नहीं मैडम, मुझे अब नहीं पढ़ना, बस काम करूंगी और पति का हात बटाउंगी, वैशु बोली|



निशि उस बच्ची को देखती रह गई| निशि का कोचिंग इंस्टिट्यूट ही था, जिसमे दसवी, ग्यारवी, बारवी के बच्चे पढने आते थे| वो यही सोचती रह गई की ये वही कुछ बच्चों से उम्र में कितनी छोटी और उसका नशीब ऐसा|



तभी वैशु बोली, मैडम आप मुझे काम से तो नहीं निकालोगी, सोनाली दीदी बोल रही थी की जब आपको मेरी उम्र का पता चलेगा तो आप काम नहीं करने दोगी| वैशु बोली|


निशि बस मुस्कुरायी, कुछ ना बोली|


अच्चा मैडम, मैं काम कर लू आप बैठो, वैशु बोली, और काम करने क्लास रूम में चली गई|



तभी निशि को याद आया की निशि कैसे बाहर बैठी थी चुपचाप| निशि ने आवाज लगायी, वैशु,


वैशु, जी मैडम, और बाहर आयी|



वैशु जब मैं आयी तो तुम बाहर बैठी थी, सोनाली बोली, थी की तुम्हें एक छबी थी है ना? फिर ऐसे क्यों बैठी थी निशि ने पूछा,



वो मैडम, मुझे अच्छा लगता है यहां, बस यूँही, वैशु बोली|



निशि समझ गई की वो कुछ छुपा रही है| कुछ ही देर में वैशु काम करते चली गई| दिन भर निशि का कहीं मन नहीं लगा| उसके मन में बस वैशु का ही खयाल आता रहा| उसने सोचा ये तो वो एक वैशु से मिली, और ना जाने कितनी ऐसी वैशु होगीं|




तभी रवि ने पीछे से आवाज दि|


निशि, निशि,


निशि अपने पति रवि की आवाज सुनकर चौक पड़ी|


अरे क्या हुआ मेमसाहब को? रवि ने निशि से पूछा|


निशि ने रवि को सब कुछ बताया| रवि भी सोच में पड गया| कैसी अजीब दुनिया है ना, कैसा नसीब होता है कुछ लोगों का? रवि बोला|

तुम इतना परेशान मत हो निशि, सोचो वो तुम्हारे यहां काम पर आ रही है, उसके लिए कितना अच्छा. कहीं और गई होती तो ना जाने कैसे लोग मिलते, हैना, अब तुमसे जितना होगा उसके लिए करो, सिंपल, रवि बोला|



चलो अब खाना खाते हैं, ऐसे सोचने से कुछ नहीं होगा, करने से होगा, रवि निशि से बोला|


निशि और रवि ने खाना खाया और आराम करने चले गये| रवि तो बिस्तर पर जाते ही सो गया पर निशि तब भी वैशु के बारे में सोच रही थी| वो खुदके बारे में सोचने लगी की वो कितनी बड़ी बड़ी बातें करती थी पर वैशु का सोचकर इतनी लाचार महसूस कर रही थी| फिर पता नहीं कब उसकी आँख लग गई| सुबह अलार्म बोला तब उसकी आंख खुली| देखा तो रवि बिस्तर पर नहीं था|



बाहर आयी तो देखा रवि अकबार पढ़ रहा है| निशि को देखते ही बोला, मैडम, अदरक की चाय पिलाओ ना गरम गरम, आज ठंड बहुत है”


निशि किचेन की तरफ मुड़ गई| रवि 10 बजे ऑफिस निकल गये| निशि भी उसीके बाद निकल गई| आज भी सोनाली नहीं आने वाली थी| निशि जैसे ही ऑफिस पहुची तो देखा वैशु टेबल पौछ रही थी|



गुड मोर्निंग मैडम, वैशु निशि को देखते ही मुस्कुराते हुए बोली|


गुड मोर्निंग बेटा, निशि बोली|


तभी निशि की नजर उसके हाथ पर गई| हाथ पर झकम था| निशि ने पूछा, बेटा ये क्या हुआ?



कुछ नहीं मैडम हाथ जल गया खाना बनाते वक़्त, कल ननद आयी थी रात को खाने पर, वैशु बोली|



अरे पर ये तो बहुत जला है, रहने दे धुल मत साफ़ कर, इन्फेक्शन हो जायेगा, निशि चिंतित होते हुए बोली|

कोई नहीं मैडम ठीक हो जायेगा, वैशु बोली|

अछान, यहां बैठ मेरे पास, काम बाद में करना, निशि वैशु से बोली|
वैशु निशि के सामने की कुर्सी पर बैठ गई|


एक बात बोलूं मैडम आपसे? वैशु निशि से बोली|

हाँ बोल, निशि बोली|



मैडम, आप मुझे बहुत अच्छे लगते हो| कितने प्यार से बात करते हो| वैशु मासूमियत से बोली|



निशि जोर से हसी और बोली, बेटा तुम भी तो बहुत प्यारे हो|



मैडम, आप मुझे काम से कभी मत निकालना, मुझे अच्छा लगता है यहां, घर जैसा, वैशु बोली, फिर बोली, मैडम आप कितना काम करते हो? खाना ठीक से खाया करो,

निशि बड़े ध्यान से वैशु की बातें सुन रही थी, कितनी प्यारी बच्ची है सोच रही थी|
तभी निशि ने बीच में ही वैशु को बोला, वैशु सुन, तुम्हारे पती तुम्हें प्यार तो करते है ना?



हाँ मैडम, बहुत करते हैं, वैशु बोली|


सुनकर निशि को तस्सली हुई|


निशि बोली, सुन तुम्हें क्या अच्छा लगता है?



मैडम, मुझे गाना अच्छा लगता है बहुत, गाकर सुनाओ? वैशु ने निशि से पुछा


हाँ सुनाओ, निशि बोली|

लग जा गले की फिर ए हसीं रात हो ना हो.......वैशु ने गान शुरू किया और निशि उसकी आवाज़ सुनकर मंत्रमुग्ध हो गई|

गाना ख़त्म हुआ तो वैशु ने पूछा, मैडम कैसा था?


बहुत अछा, निशि बोलीं और अपनी जगह से उठी और वैशु के पास गई| उसके सर पे से हाथ घुमाया और बोली,


वैशु एक काम करते हैं, तुमने मैंने काम करने माना नहीं करूंगी पर एक बात तुम्हें भी माननी पड़ेगी, निशि बोली



हाँ मैडम, आपकी हर बात मानूंगी, वैशु बड़ी मासूमियत से बोली|



फिर एक मैडम हैं वो गाना सीखाती है, तुम्हें रोज़ वहां जाकर गाना सीखना पड़ेगा, निशि बोली, और सुन, अपने पति को बुलाकर लाना, मुझे बात करनी है, निशि आगे बोली|


निशि ने देखा वैशु की आँखों में एक चमक आ गई|


मैडम, कल लेकर आओ उन्हें? वैशु ने निशि से पूछा|



हाँ, लेकर आ, निशि बोली, निशि ने महसूस किया की वैशु उसकी ये बात सुनकर बहुत खुश हुई| श्याम को जब निशि घर आयी तो उसने रवि को सब बताया| रवि भी ये बात सुनकर खुश हुआ| अगले दिन वैशु अपने पती सुनील को लेकर निशि से मिलवाने लायी| निशि की बात सुनकर सुनील भी खुश हुआ|


बोला, मैडम, आप जैसे लोग कहाँ मिलते हैं हम जैसे को, आगे बोला, “मैडम मैं वैशु के गाँव का ही हूं| इसके पिताजी रोज़ पीते हैं, पुरे गाँव ने समझाया पर नहीं मानते| इसकी माँ ने फिर मुझसे शादी की| मेरा वतन भी सिर्फ 8000 है,| इसमें गुज़रा नहीं होता, इसलिए वैशु को काम करना पड राहा है| आप मिली तो मुझे चिंता नहीं पर मैं वो गाना सीखने के पैसे नहीं दे पाउँगा, सुनील बोला|



निशि मुस्कुराकर और बोली, अरे तुमसे किसने म्यानेज हैं, वो तो मेरी सहेली है , वो पैसे नहीं लेगी, निशि बोली|


सुनील ने आगे बढ़कर निशि के पैर पढ़े और बोला, मैडम मैं चलता हूं, काम पर जाना है, मेरे साब नाराज़ होंगे| सुनील वहां से चला गया|

वैशु जल्दी काम ख़त्म कर हम वो गाने की क्लास में जायेंगे| वैशु खुश हो गई, कुछ ही देर में निशि वैशु को लेकर अपनी सहेली मंजू के पास ले गई| उसी दिन से वैशु गाना सीखने लगी| वक़्त का पता ही नहीं चला| आठ महीने बीत गये, वैशु से अलग सा लग हो गया था निशि को| वो बहुत बातें करती निशि से, बहुत सवाल पूछती| निशि को उसकी मसुमियियत पर बहुत प्यार आता था|


तभी एक दिन मानो वैशु की जिंदगी फिर एक नयी करवट लेने चली हो, निशि को एक मेल आया, जिसमे इंडियन आइडल में वैशु को ऑडिशन के लिए चुन लिया था| निशि भूल ही गई थी की उसने जो वैशु के पहला गाना रिकॉर्ड किया था वो इंडियन आइडल वालो को भेज दिया था| निशि ने तुरंत रवि को ए खुश खबरी सुनाई, फिर सुनील को फोन किया और वैशु को लेकर घर बुलाया|


कुछ ही देर में किसी ने घर के दरवाजे की घंटी बजायी| निशि दरवाजा खोलने गई तो देखा सुनील और वैशु खड़े है| दोनों बहुत घबराये थे| सुनील निशि को देखते ही बोला,


मैडम इससे कोई गलती हुई हो तो माफ़ कर दीजिये पर इसे काम से मत निकालिए, मैं इसे बहु डाटा है|


 


निशि ने वैशु की तरफ देखा तो ऑंखें लाल थी उसकी, वो समझ गई की वैशु रोई है| निशि ने घुस्से में सुनील से पूछा, “ तुमसे किसने बोला की मैं वैशु को काम से निकाल रही हूं?

मैडम, आपने यूँ अचानक इसे लेकर घर बुलाया तो मुझे लगा, सुनील बोला|

बुलाने का ए मतलब नहीं होता की वैशु ने कुछ गलती की है, निशि बोली|

फिर मैडम, सुनील ने पूछा इतने में रवि भी ऑफिस से आ गया| हाथ में मीठायी का डब्बा था आते ही उसने डब्बा खोला का निशि को मिटाई खिलाई, फिल सुनील को दि, फिर वैशु की तरफ मुड़कर बोला,


ले बेटा मुह मीठा कर, अब तो तुम्हने मेहनत करनी है, वैशु और सुनील को कुछ नहीं समझ राहा था|



फिर निशि ने बैठकर उन दोनों को सब समझाया| फिर टीवी पर इंडियन आइडल दिखाया|


वैशु तो मानो कोई सपना देख रही हो| वो एकदम निशि के गले से लगकर रोने लगी|


निशि भी अपने आप को रोक नहीं पाई. रवि और सुनील की भी ऑंखें भर आयी|


वैशु निशि से बोली , मैडम पता नहीं मेरे जैसे ना जाने कितनी वैशु होंगी, काश सबको आप जैसी मैडम मिल जाएँ, तो सबकी ज़िन्दगी सुधर जाएगी|



मां


निधि भंडारे


 


राहुल ने अचानक घडी देखी, ६ बज गये थे, काम बहुत बाकी रह गया था| तभी उसकी नज़र रानू पे गई|


अरे रानू, क्या बात है? आज कैसे इतनी देर तक रुक गई? सतीश इंतजार कर रह होगा, राहुल ने पूछा|
उडा लो मजाक तुम, तुम्हारा वक्त आयेगा तब देखेंगे, रानू हस्ते हुई बोली.


तभी सखाराम, ऑफिस का पिओन आया और बोला


राहुल सर आपको बड़े साब ने तुरंत ऑफिस में बुलाया है,
रानू ने जैसे ही सुना हँसकर बोली, और उडाओ मजाक, अब देखो तुम्हारी क्लास लेंगे संजय सर|


राहुल मुस्कुराया और संजय सर के केबिन की तरफ चला गया|


मे आय कम इन सर?  राहुल ने पूछा|
यस माय डिअर, कम इन, संजय सर मुस्कुराते हुए बोले, “राहुल, सच में ऑफिस में तुम्हारे लोग हैं इसलिए हम इतना आगे बढे है|
थैंक यू सर, बस आशीर्वाद है, राहुल बोला|
एक जरुरी काम के लिए बुलाया है तुम्हें, संजय सर बोले|
हुकुम कीजिये सर, राहुल बोला|
कल रात तुमको कुछ जरुरी डॉक्यूमेंटस लेकर बिलासपुर निकलना होगा, वही पास एक गाँव हैं, करेली, वहां के पंच का साईन लाना है और ये काम सिर्फ तुम ही कर सकते हो, संजय सर बोले|
थोड़ी तकलीफ होगी तुम्हें क्योकि ट्रेन सिर्फ बिलासपुर तक जाति है| फिर वहां से तुम्हें करेली के लिए बस पकडनी पड़ेगी, संजय आगे बोले|
कोई बात नहीं सर, आय विल मैनेज, राहुल बोला|
तभी संजय ने ड्रावर में से कुछ पेपर निकाले और राहुल को दिये| साथ ही एक परचा दिया और बोला, इसमें पूरा पता है और सरपंच का फोन नंबर भी है| ट्रेन का टिकिट भी तैयार है तुम्हारा| कल रात को ७ बजे तुम्हारी गाड़ी है| जो सुबह 5 बजे बिलासपुर पहुंचेगी, संजय बोले|
जी सर, राहुल बोला|


कुछ परेशानी हुई तो फोन कर लेना मुझे, संजय मुस्कुराते हुए बोला, “अब जाओ और आराम करो, कल ऑफिस मत आना, संजय आगे बोले|
सर, मैं निकलू, राहुल ने पूछा|
यस राहुल, टेक केयर, संजय बोले|


राहुल संजय के केबिन से बाहर आया तो देखा रानू वही बाहर खडी उसका इंतजार कर रही थी|


राहुल को देखते ही उसने पूछा, ऑल फाइन?


हां रे, सब ठीक, राहुल मुस्कुराता हुआ बोला|


 


मैं डर गई की इतनी देर क्या हो रहा है, रानू चिंतित होते हुए बोली|


कल मुझे छुट्टी, राहुल मुस्कुराता हुआ बोला|
क्यूँ छुट्टी तुम्हे? ऐसे कौन से झंडे लगा दिये तुमने? रानू ने पूछा|


बॉस का फेवरेट हूं ना, राहुल रानू को चिडाता हुआ बोला|


जोक्स अपार्ट, रानू मुझे बिलासपुर जाना है कुछ ऑफिस का काम है, एक दिन में ही आ जाऊंगा डोन्ट वरी, राहुल मुस्कुराते हुए बोला|


ओके, टेक केयर, रानू बोली|


चलो निकलते हैं, लेट हुआ, राहुल बोला|


हाँ बाय, रानू बोली|
बाय, राहुल बोला और बैग लेकर निकल गया


घर पहुँचते पहुँचते 10 बज गया. बहुत अंधेरा था| 5 दिन में अमावस्या थी| राहुल के मन में सिर्फ बिलासपुर जाने का खयाल था| घर के दरवाजे पर खाने का डब्बा रखा था| राहुल ने दरवाजा खोला और डब्बा लेकर अन्दर आया|
मुह हाथ धोकर, खाना खाया और मोबाइल पर करेली ढूढने लगा, तभी उसका ध्यान टिकेट की तरफ गया| वो उठा जेब से टिकट निकाला और टाइम देखा| ठीक ७ बजे ट्रेन मैं स्टेशन से छुट ती है|
मन बडा बैचेन होरहा था| राहुल ने पानी पिया| दरवाजा खोला और बाहर टहलने निकल गया. तभी मोबाइल बजा तो देखा रानू का फोन था|


हेलो मिस्टर बिलासपुर, रानू हस्ते हुए बोली|


हेलो रानू, पहुंच गई घर, राहुल ने पूछा|


हाँ सतीष ने ड्रॉप किया, रानू बोली|


कल तो तुम आ नहीं रहे ऑफिस, हैना, “रानू ने आगे पूछा|


हां, कल तैयारी करूँगा थोड़ी, राहुल बोला, “पता करता हूं वहां से बस के टाइम”, राहुल आगे बोला|


चलो then, आराम करती हूं, टेक केयर, गुड नाईट, रानू बोली|


गुड नाईट, राहुल बोला|



राहुल ने फोन रख दिया,


राहुल अब बिलासपुर का ना सोचकर रानू के बारे में सोचने लगा|


कितना खयाल रखती है रानू उसका, सतीष कितना किस्मतवाला है जो रानू उसे मिली, राहुल ने सोचा|


चलते चलते वो वापिस घर आ गया| आकर लाइट बंद की और बिस्तर पर लेट गया| ना जाने कब उसकी आँख लग गई|


सूरज सर पर आ गया था| आखों पर रोशनी पड़ी तो राहुल की नींद खुली| घडी देखी तो 9 बज रह था| राहुल चौक कर उठा|


हें भगवान, मैं भी ना कितना आलसी हो गया हूं, राहुल खुदसे ही बडबडाया|


जल्दी से राहुल नहाकर तैयार हुआ| भगवान को नमस्कार किया और नाश्ता करने निकल गया| मन ही मन सोच रहा था की आज तो पोहे ख़त्म होगये होंगे| जैसे ही होटल पंहुचा तो देखा गंगू टेबल साफ़ करवा रहा था|



राहुल को देखते ही गंगू बोला, अरे साब, आज आप इतनी देर से? ऑफिस की छुट्टी क्या?

वही समझ, राहुल मुस्कुराते हुए बोला, अच्छा सुन, क्या है खाने को? बहुत भूख लगी है, राहुल ने पूछा|
साब, इडली सांभर खायेंगे या? गंगू ने पूछा|
चलेगा, ले आ पर गरम गरम, राहुल बोला|



राहुल वहीँ कुर्सी पर बैठ गया और मोबाइल में मेसेज देखने लगा.


तभी गंगू गरम गरम इडली लेकर आ गया|


साब पहले खा लीजिये फिर मोबाइल, गंगू बोला|
राहुल ने मुस्कुराते हुए मोबाइल बंद किया और खाने लगा|
इडली सांभर खाकर राहुल वापिस घर की तरफ निकल गया|


घर पहुचकर सोचा एक प्यांट शर्ट रख लूँ | एक ब्याग में प्यांट शर्ट रखकर राहुल बाझार चला गया| दो बिस्कुट पैकेट ले आया|

पता ही नहीं चला कब दिन निकल गया| तभी राहुल का फोन बजा| देखातों रानू का फोन था|


हेलो मि.बिलासपुर, रानू हस्ते हुए बोली|


हेलो मैडम, बोलिए, राहुल ने जवाब दिया.


निकल गये? रानू ने पूछा|
अरे बस दरवाजा ही बंद करने जा रहा था, घर के बाहर खड़ा हूं, राहुल बोला|
ओके, निकल जाओ नहीं तो लेट होगा, रानू बोली|


हैप्पी जर्नी, रानू फिर बोली|

थैंक यू , राहुल बोला और फोन रख दिया|


राहुल स्टेशन के लिए निकल गया| 10 मिनट में स्टेशन पहुच गया| प्लेटफार्म 3 पर गाडी आने वाली थी|


राहुल ने घडी देखी तो केवल 10 मिनिट बचे थे|


चारो तरफ बहुत लोग थे,


लोगों की हलचल बढ़ गई| तभी गाडी आकर रुकी| राहुल ने कोच नंबर देखा और 3 नंबर कोच में चढ़ गया|


अन्दर गया तो देखा वहां सिर्फ तीन लोग बैठे थे| उसने सीट नंबर देखा| बैग रखा और बैठ गया|

तभी सामने वाले आदमी ने पूछा


क्यूँ भैया, कहाँ जा रहे हो?


बिलासपुर, राहुल ने जवाब दिया|


अरे वाह हम भी वही जा रहे हैं| वो बोला|



जी अच्चा, राहुल मुस्कुराते हुए बोला|
तभी ट्रेन चल पड़ी| सभी आराम से अपनी जगह पर बैठने लगे| राहुल ने देखा गाड़ी में ज्यादा भीढ़ नहीं थी और वही स्टेशन पर मानो मेला लगा हो|
तभी सामने वाले ने पूछा, बिलासपुर के ही हो क्या?
राहुल बोला, नहीं, काम से जा रहा हूं|


तभी वो बोला, “हम तो वहीँ से हैं|


राहुल फिर बोला, मुझे बिलासपुर से आगे जाना है करेली|


करेली? उसने पूछा


अरे वहां के लिए तो केवल एक बस जाति है सुबह 7 बजे और वापिसी 7 बजे, वो आदमी राहुल से बोला|



पर ये गाड़ी तो 5 बजे पहुचती है ना? राहुल ने पूछा|


हाँ पहुचती तो है, वो बोला|


तभी राहुल सोच में पड गया| सोचने लगा की 5 बजे पहुचकर वो करेगा क्या? एक तो इतनी ठंड ऊपर से नयी जगह|


युही समय बीत गया| सभी सो गये| पर नींद मानो राहुल से कोसों दूर थी| रात भर बस ना जाने किस सोच में डूबा राहा|

ना जाने कब 5 बज गये। गाडी उस राईट टाइम थी। गाडी रुकी| वो आदमी भी उतर गया| जैसे ही राहुल नीचे उतरा देखा बिलकुल शांति थी| कुछ ही लोग थे जो उसके साथ उतरे थे, वो भी सब अपना अपना निकल गये|



राहुल ने इधर उधर देखा| घडी देखी तो 5.10 ही हुआ था| सोचा 2 घंटे क्या करूँ|


ठंड भी बहुत थी| तभी देखा दूर एक दुकान खुली थी| बैग लिए राहुल उस तरफ चल पड़ा|


दुकान के नजदीक पंहुचा तो देखा, एक छोटी सी लाइट जली थी और अन्दर नीचे कोई कम्बल ओढकर सोया था|


राहुल ने धीमे से आवाज लगायी, कोई है?


तभी खस्ते हुए एक आदमी उठा| राहुल ने देखा एक बुढा आदमी धीरे से उठा|


कौन है भाई? उसने खास्ते हुए पूछा|


बाबा, मुझे चाय मिलेगी क्या? राहुल ने पूछा|
हाँ बेटे, रुको| अंदर आओ यहां बैठो, वौठ्ते हुए बोला|
नहीं बाबा, ठीक है यहीं, बस चाय पिला दीजिये, राहुल बोला,
उठकर उसने एक पतिला लिया, दूध डाला, अदरक लिया और वही छोटा सा स्टोव था उसपर चडा दिया|

और बेटा कहाँ से आ रहे हो? बिलासपुर में कहाँ जाना है ? उसने पूछा|


बाबा, बिलासपुर में नहीं, करेली में काम है, राहुल बोला|

बेटा, करेली की बस 7 बजे है, तुम इतनी देर कहाँ खड़े रहोगे, अंदर आ जाओ और यहां बैठो, उसने बड़े प्यार से राहुल से कहा|

राहुल ने जुटे उतारे और अंदर चला गया| वही बाबा के बिस्तर पर बैठ गया| गरम गरम लगा, उसे थोड़ा सुकून मिला|
चाय पीते पीते दोनों की बातें होती रही| राहुल को लगा मानो ना जाने कबसे वो बाबा को जानता है|
तभी 6.40 हो गया| अंधेरा छट चूका था| राहुल ने बाबा से पूछा, बाबा, बस कहाँ से पकडनी पड़ेगी?

बाबा, बोले बस स्टेशन के बाहर ही मिल जाएगी, एक ही बस है जो वहां जाति है और वही बस शाम को वापिस आती है , वैसे तुम्हारी वापिसी कबकी है? उन्होंने आगे पूछा|
बाबा आज रात की ट्रेन है| राहुल बोला|



चलो फिर आ जाओ शाम को मिलते हैं बेटा, वो बोले|

राहुल ने जेब से 50 रुपये निकाले और बाबा को देने लगा| बाबा बोले, “ बाबा भी बोलते हो और पैसे भी देते हो बेटा|


नहीं बाबा, प्यार से दे रहा हूं बेटा समझकर| राहुल बोला और उनके सामने पैसे रख दिये और पैर पढ़ लिए|


बाबा की आँख भर आयी।


बोले,येसे बूढ़े को आजतक किसी ने इतनी इज्ज़त नहीं दी है।

राहुल बोला, बाबा शाम को मिलते हैं, बोलकर राहुल वहा से निकल गया|


स्टेशन के बाहर आते ही देखा तो सामने ही बस खडी थी| राहुल ने एक आदमी से जो वही खड़ा था, पुछा, भैय्या बस करेली जाएगी क्या?
हा जी, यही है, वो बोला।
राहुल तुरंत उसमे बैठ गया|


5 मिनिट में वो बस निकल गई| पहली बार राहुल ऐसी बस में बैठा था| वो सोच रहा था की जिन्दगी में भी कैसे कैसे मोड आते हैं| वो बाबा का सोच रहा था की जिन्दगी में भी कैसे कैसे मोड आते है| उस उम्र में भी चाय की छोटी सी दुकान चलाकर अपना गुजरा करते है| फिर उसने सोचा, अरे मैंने तो बाबा से उनके परिवार का पूछा ही नहीं| फिर सोचा कोई नहीं शाम को पूछूँगा | ये सब सोचते सोचते न जाने कब राहुल की नींद लग गई |
तभी एकदम राहुल को झटका लगा, उसकी नींद खुली तो देखा बस रुक गई| घडी देखी तो 10 बजे थे| सभी गाड़ी से उतरने लगे| वो समझ गया करेली आ गया|


राहुल जैसे ही गाड़ी से उतरा अचनैक एक औरत फटी हुई सारी पहने हाथ में एक कपड़ा लिए सफ़ेद बीखरे बाल, उसकी तरफ दौडकर आयी और उसके गले से लग गई |


राहुल एकदम डर गया|


वो बोली, मुझे पता था तु अपनी माँ को लेने आएगा , सब बोलते थे तु कभी नहीं आयेगा, देख तु आ गया, वो बोले जा रही थी और राहुल उसको दूर करने में लगा था| 
अरे मुझे छोडिये, अलग होइए, कौन हो आप? राहुल बोला|


उन्होंने उस औरत का हाथ छोड़ दिया. तभी कुछ लोग आये और उस औरत को अलग करने लगे|


बोले, “साब, ये पागल बुढिया है, जो भी शहर से जवान लड़का उतरता है उसेही अपना बेटा समझती है और पीछे पड जाति है|


राहुल को अजीब सा लगा, तभी कुछ लोगों ने ज़बरदस्ती उस औरत को अलग कर दिया और राहुल से बोले की साब आप जाईये हम इसे संभाल लेंगे|



वो औरत जोर जोर से चिल्लाने लगी| बेटा मुझे छोड़कर मत जा, चल अपनी माँ के साथ, घर चल|
ना जाने अचानक राहुल को क्या हुआ और वो जोर से उन लोगोसे बोला, इन्हें छोड़ दीजिये.


जैसे ही उन लोगों ने उस बुढिया का हाथ छोडा वो दौड़कर आकर राहुल के सीने से लग गई| राहुल ने देखा वो बहुत घबराई थी| राहुल बोला, “मत डरो अब आपको कोई नहीं पकड़ेगा|
राहुल की बात सुनकर वो एकदम खुश हो गई और बोली, “तु घर चलेगा ना माँ के साथ?

राहुल ने बस हमी भर दि | उस औरत ने राहुल का हाथ थमा और एक गली की तरफ मुड गई| राहुल चुपचाप उसके साथ चलता गया| तभी वो एक छोटी सी झोपडी के आगे रुकी और बोली, “तुझे याद ना अपना घर?
राहुल ने फिर मुस्कुराकर हमी भर डी.
उस झोपडी का दरवाजा बहुत छोटा था| वो बुढिया अन्दर गई और राहुल को बोली, “आजा बेटा आजा,
राहुल झुककर अंदर गया| बुढिया वही नीचे बैठ गई और उसको भी बैठने को बोली| राहुल वही बैठ गया| तभी उस बुढिया ने एक डब्बा निकला. उसे खोला तो राहुल ने देखा उसमे कुछ बिस्कुट थे| वो बोली, तुझे भूख लगी ना बहुत?



राहुल इससे पहले कुछ बोल पाता, वो बुढिया राहुल को अपने हाथ से बिस्कुट खिलाने लगी.



राहुल कुछ ना बोल पाया और बिस्कुट खाने लगा| वो राहुल से सर पर हाथ घुमाती, कभी उसका माता चूमती, कभी बालाएं लेती| तभी राहुल बोला, आप नहीं खाओगी?


तु खा लेगा, माँ का पेट भर जायेगा| वो बोली |

अचानक राहुल को काम याद आया | उसने घड़ी देखी, देखा तो 1 बज गया था | उसे याद आया की उसे वापिस भी जाना है. वो धीरे से बोला , मैं ज़रा काम करने जाऊ?


वो बुढिया बोली, “ तु वापिस छोड़कर तो नहीं जायेगा? राहुल ने देखा उस बुढिया के आँखों में आंसू थे|


राहुल ने उसका हाथ पकड़ा और बोला, आप आराम कर लों मैं जाकर आता हूं| तभी उसने देखा वो बुढिया एकदम सो गई| मानो बहुत थकी हो| राहुल मुस्कुराकर और धीरे से झोपडी के बाहर निकल आया| बाहर आकर उसने एक आदमी से पूछा की पंचायत कहाँ है|
उसने बताया की कुछ ही दुरी पर सामने एक लाल रंग की ईमारत है वही| राहुल उस और चल दिया| 5 मिनिट में ही उसे लाल रंग की ईमारत दिखी| वही एक आदमी बैठा था| राहुल ने सरपंच के बारे में पूछा| वो आदमी उसको अन्दर ले गया| राहुल जैसे ही अन्दर गया देखा सामने एक पगड़ी पहने एक बुज़ुर्ग बैठे हैं| मन में सोचा कल से मुझे केवल बूढ़े लोग ही मिल रहे है | सोचा वापिस जाकर रानू हो बताऊंगा|
तभी राहुल ने नमस्कार बोला| कुछ देर बाते की| सरपंच के साईन लिए|


तभी सरपंच बोले, “खाना खाकर जाईयेगा| राहुल ने मना किया तो उन्होंने लस्सी बुलवाई | राहुल ने लस्सी पी और सरपंच से इजाजत ली| राहुल वापिसी के लिए निकला, जैसे ही राहुल कुछ दूर पंहुचा देखा बहुत भीड़ जमा थी| उसे लगा ना जाने क्या हुआ? अभी तक तो कुछ ही लोग दिख रहेथे गाँव में| तभी उसने एक से पूछा, भैया, क्या हुआ? इतनी भीड़ कैसी?

वो बोला, कुछ नहीं बाबूजी, वो पागल बुढिया थी इस गाँव में वो मर गई|
सुनते ही राहुल का दिल बैठ गया| वो अपने काम में सुबह का किस्सा मानो भूल गया था| तभी एक आदमी बोला, “ इसकी लाश का क्या करे ? इसका तो कोई नहीं था|


तभी दूसरा बोला, बेचारी उम्र भर अपने लड़के का इंतज़ार करते करते मर गई|
राहुल को एकदम सदमा लगा, उसके सामने मानो सुबह का सब आँखों के सामने आ गया| कैसे उस बुढिया ने उसको बिस्कुट खिलाया| वापिस अपने को बोला ना जाने कब राहुल की आँखों से आसू बहने लगे| तभी एक आदमी बोला, चलो लाश का क्रिया कर्म कर दे, बेचारी बुढिया|


ये सुनकर अचानक राहुल बोला, “रुको, इनका क्रियाकरम मै करूँगा, मै हू इनका बेटा| सभीने मुडकर राहुल की तरफ देखा|
पर बाबूजी, एक आदमी बोला.

पर वर कुछ नहीं, मै हूं इनका बेटा, राहुल बोला,


सभी गाँव वालोकी मदद से पूरी तैयारी की गई| राहुल ने उस बुढिया को अग्नि दि, फिर वही खड़े होकर हाथ जोड़कर नमस्कार किया और बोला, “जा माँ अलविदा , आपने जाते जाते मुझ अनाथ को माँ के प्यार का अहसास दिलाया. जिस माँ के प्यार के लिए मैं जीवन भर तरसा, वो प्यार आपने मुझे कुछ पल में ही दे दिया| जा माँ अलविदा, अगले जनम में आप ही मेरी माँ बनना| और राहुल की आँखों से आसूं की झड लग गई| एक अनाथ को माँ का प्यार मिल गया था और एक माँ को दुनिया छोड़ते वक्त उसके बेटे का प्यार|







Tuesday, January 7, 2020

देश यही पागल बदलेगा


लगभग चालीस साल पहले प्रकाशित इन्‍द्रदेव भारती जी की कविता 'देश यही पागल बदलेगा' हाथ लगी तो सोचने पर मजबूर कर दिया. आप भी आनन्‍द लीजिए और झाडू वाले नेता के बारे में चालीस साल पहले की कल्‍पना का चमत्‍कार भी देखिए.


कविता के कॉपीराइट लेखक के पास है  



इन्‍द्रदेव भारती


भूख


इन्द्रदेव भारती


आदमखोरों को सरकारी,
अभिरक्षण   वरदान  है ।
अपने हिंदुस्तान का भैया 
अद्भुत......संविधान  है ।


इंसां  को  गुलदार मारे,
उसको  पूरी   शह  यहाँ ।
गुलदार को  इन्सान  मारे,
जेल   जाना   तय  यहाँ ।


रोज बकरा  यूँ  बलि  का
बन    रहा   इन्सान   है ।
अपने हिंदुस्तान का भैया
अद्भुत......संविधान  है ।


रोज  जंगल  कट  रहे हैं,
जब   शहर   के  वास्ते ।
क्यूँ न जंगल ढूंढलें फिर
खुद  शहर   के   रास्ते  


इंसांं  हो   या   हो   हैवां,
भूख का क्या विधान  है ।
अपने  इस  जहान   का,
अज़ब ग़ज़ब विधान है ।


 


Wednesday, January 1, 2020

रश्मि अग्रवाल एवं गौराश्री आत्रेय की पुस्तकें हुई विमोचित

परिलेख प्रकाशन से प्रकाशित दो पुस्तकों का विमोचन


नजीबाबाद
वरिष्ठ समाजसेवी एवं राष्ट्रपती द्वारा सम्मानित लेखिका रश्मि अग्रवाल के कविता संग्रह 'अरी कलम तू कुछ तो लिख' एवं बालिका कवयित्री गौराश्री की पुस्तक 'गौराश्री की कविताएँ' का विमोचन कार्यक्रम आर्यन कान्वेंट स्कूल में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का प्रारंभ माॅ सरस्वती के समक्ष अध्यक्ष एवं मुख्य अतिथि ने दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्प अर्पण के साथ-साथ गौराश्री आत्रेय के सरस्वती वंदना गायन से हुआ।  


कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध शायर महेन्द्र अश्क तथा संचालन आलोक कुमार त्यागी ने किया। कार्यक्रम में डाॅ. सुधाकर आशावादी, राजेश मालवीय एवं सुचित्रा मालवीय मुख्य अतिथि रहे।


अनेक पुस्तकें लिखने वाली रश्मि अग्रवाल ने बताया कि यह उनकी प्रथम काव्य पुस्तक है। जिसमें उनकी बीते लगभग दस वर्ष की मेहनत है। उन्होंने इन्द्रदेव भारती को अपना साहित्यिक आदर्श मानते हुए कहा कि लेखन मेहनत मांगता है परंतु प्रतिदिन इतने विषय मिलते हैं यदि जिन पर लिखने बैठो तो लगभग दो घंटे में एक अच्छा सा लेख लिखा जाता है। समाज में घटित होने वाली विभिन्न घटनाएँ और उन पर किया जाने वाला चिंतन यदि कागज पर उतार लिया जाए तो लेखन हो जाता है परंतु इन सब घटनाओं को काव्य रूप् देना कठिन काम है। कभी-कभी तो चार-चार दिन में भी एक पंक्ति नहीं लिखी जाती है और कभी एक दिन में ही पूरी कविता बन जाती है। विभिन्न विष्यों पर कलम चालाने वाली रश्मि अग्रवाल ने कहा कि लेखन हमें सकारात्मक दृष्टिकोण देता है। यदि कभी आपको क्रोध आए तो लिखने बैठ जाईए, इससे आपका क्रोध भी कुछ समय प्श्चात शांत हो जाएगा और किसी का कोई नुकसान भी नहीं होगा।


बाल कवयित्री ने अपनी कविता लेखन का श्रेय अपने विद्यालय एवं अपने परिवार को दिया। इन्द्रदेव भारती ने बताया कि जब मैंने उसकी डायरी देखी थी तब विश्वास नहींं हुआ तो परीक्षण के लिए उसी समय पर सरस्वती वंदना लिखने को कहा। भारती ने बताया कि उस समय मैं हत्प्रभ रह गया जब मात्र पाँच मिनट में सरस्वती वंदना उसने कागज़ पर उतार कर मेरे सामने रख दी। भारती ने गौराश्री की सराहना करते हुए कहा कि दादी का चश्मा और मोबाईल जैसे विषयों पर कविता लिखना गौराश्री की मौलिकता का परिचायक है।


कार्यक्रम को इन्द्रदेव भारती, मनोज मानव, डाॅ. पंकज भारद्वाज, डाॅ. अनिल शर्मा अनिल, रचना शास्त्री, मनोज त्यागी, डाॅ. रजनी शर्मा, डाॅ. एन. पी. शर्मा, डाॅ. एस. के. जौहर,  सत्यप्रकाश मित्तल, बब्बन जैदी आदि ने संबोधित किया। प्रकाशक अमन कुमार 'त्यागी' ने प्रकाशन की उपलब्धियों को गिनाया।


इस अवसर पर अनुपम माहेश्वरी, सुधीर कुमार राणा, धनिराम, गोविन्द सिंह, अशोक शर्मा, अक्षि त्यागी, तन्मय त्यागी, हिमांशु कुमार, लालबहादुर शास्त्री, नंदीनी शर्मा, दिव्या शर्मा, अभिनव आत्रेय, कृष्ण्अवतार वर्मा, डाॅ. वर्षा अग्रवाल, डाॅ. पूनम अग्रवाल, डाॅ. सविता वर्मा, डाॅ. मृदुला त्यागी, सरला शेखावत, नदीम साहिल, आदि उपस्थित रहे।


Monday, December 16, 2019

सात ग़ज़लेें


अल्लामा ताजवर नजीबाबादी



1.


बम चख़ है अपनी शाहे रईयत पनाह से


 



बम चख़ है अपनी शाहे रईयत पनाह से
इतनी सी बात पर कि 'उधर कल इधर है आज' ।
उनकी तरफ़ से दार-ओ-रसन, है इधर से बम
भारत में यह कशाकशे बाहम दिगर है आज ।
इस मुल्क में नहीं कोई रहरौ मगर हर एक
रहज़न बशाने राहबरी राहबर है आज ।
उनकी उधर ज़बींने-हकूमत पे है शिकन
अंजाम से निडर जिसे देखो इधर है आज ।


(२ मार्च १९३०-वीर भारत
(लाहौर से छपने वाला रोज़ाना अखबार)
(रईयत पनाह=जनता को शरण देने वाला, दार-ओ-रसन=फांसी का फंदा, कशाकशे- बाहम दिगर=आपसी खींचतान, रहरौ=रास्ते का साथी, रहज़न=लुटेरा, ज़बींने=माथा,शिकन=बल)


 


2.


ऐ आरज़ू-ए-शौक़ तुझे कुछ ख़बर है आज


 


ऐ आरज़ू-ए-शौक़ तुझे कुछ ख़बर है आज
हुस्न-ए-नज़र-नवाज़ हरीफ़-ए-नज़र है आज


हर राज़दाँ है हैरती-ए-जलवा-हा-ए-राज़
जो बा-ख़बर है आज वही बे-ख़बर है आज


क्या देखिए कि देख ही सकते नहीं उसे
अपनी निगाह-ए-शौक़ हिजाब-ए-नज़र है आज


दिल भी नहीं है महरम-ए-असरार-ए-इश्क़ दोस्त
ये राज़दाँ भी हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज


कल तक थी दिल में हसरत-ए-अज़ादी-ए-क़फ़स
आज़ाद आज हैं तो ग़म-ए-बाल-ओ-पर है आज


 



3.


ग़म-ए-मोहब्बत में दिल के दाग़ों से रू-कश-ए-लाला-ज़ार हूँ मैं


 



ग़म-ए-मोहब्बत में दिल के दाग़ों से रू-कश-ए-लाला-ज़ार हूँ मैं
फ़ज़ा बहारीं है जिस के जल्वों से वो हरीफ़-ए-बहार हूँ मैं


खटक रहा हूँ हर इक की नज़रों में बच के चलती है मुझ से दुनिया
ज़हे गिराँ-बारी-ए-मोहब्बत कि दोश-हस्ती पे बार हूँ मैं


कहाँ है तू वादा-ए-वफ़ा कर के ओ मिरे भूल जाने वाले
मुझे बचा ले कि पाएमाल-ए-क़यामत-ए-इंतिज़ार हूँ मैं


तिरी मोहब्बत में मेरे चेहरे से है नुमायाँ जलाल तेरा
हूँ तेरे जल्वों में महव ऐसा कि तेरा आईना-दार हूँ मैं


वो हुस्न-ए-बे-इल्तिफ़ात ऐ 'ताजवर' हुआ इल्तिफ़ात-फ़रमा
तो ज़िंदगी अब सुना रही है कि उम्र-ए-बे-एतिबार हूँ मैं


 



4.


मोहब्बत में ज़बाँ को मैं नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ कर लूँ


 



मोहब्बत में ज़बाँ को मैं नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ कर लूँ
शिकस्ता दिल की आहों को हरीफ़-ए-ना-तवाँ कर लूँ


न मैं बदला न वो बदले न दिल की आरज़ू बदली
मैं क्यूँ कर ए'तिबार-ए-इंक़लाब-ए-ना-तवाँ कर लूँ


न कर महव-ए-तमाशा ऐ तहय्युर इतनी मोहलत दे
मैं उन से दास्तान-ए-दर्द-ए-दिल को तो बयाँ कर लूँ


सबब हर एक मुझ से पूछता है मेरे होने का
इलाही सारी दुनिया को मैं क्यूँ कर राज़-दाँ कर लूँ


 



5.


मोहब्बत में ज़ियाँ-कारी मुराद-ए-दिल न बन जाए


 



मोहब्बत में ज़ियाँ-कारी मुराद-ए-दिल न बन जाए
ये ला-हासिल ही उम्र-ए-इश्क़ का हासिल न बन जाए


मुझी पर पड़ रही है सारी महफ़िल में नज़र उन की
ये दिलदारी हिसाब-ए-दोस्ताँ दर-दिल न बन जाए


करूँगा उम्र भर तय राह-ए-बे-मंज़िल मोहब्बत की
अगर वो आस्ताँ इस राह की मंज़िल न बन जाए


तिरे अनवार से है नब्ज़-ए-हस्ती में तड़प पैदा
कहीं सारा निज़ाम-ए-काएनात इक दिल न बन जाए


कहीं रुस्वा न हो अब शान-ए-इस्तिग़ना मोहब्बत की
मिरी हालत तुम्हारे रहम के क़ाबिल न बन जाए


 



6.


हश्र में फिर वही नक़्शा नज़र आता है मुझे


 



हश्र में फिर वही नक़्शा नज़र आता है मुझे
आज भी वादा-ए-फ़र्दा नज़र आता है मुझे


ख़लिश-ए-इश्क़ मिटेगी मिरे दिल से जब तक
दिल ही मिट जाएगा ऐसा नज़र आता है मुझे


रौनक़-ए-चश्म-ए-तमाशा है मिरी बज़्म-ए-ख़याल
इस में वो अंजुमन-आरा नज़र आता है मुझे


उन का मिलना है नज़र-बंदी-ए-तदबीर ऐ दिल
साफ़ तक़दीर का धोका नज़र आता है मुझे


तुझ से मैं क्या कहूँ ऐ सोख़्ता-ए-जल्वा-ए-तूर
दिल के आईने में क्या क्या नज़र आता है मुझे


दिल के पर्दों में छुपाया है तिरे इश्क़ का राज़
ख़ल्वत-ए-दिल में भी पर्दा नज़र आता है मुझे


इबरत-आमोज़ है बर्बादी-ए-दिल का नक़्शा
रंग-ए-नैरंगी-ए-दुनिया नज़र आता है मुझे


 



7.


हुस्न-ए-शोख़-चश्म में नाम को वफ़ा नहीं


 



हुस्न-ए-शोख़-चश्म में नाम को वफ़ा नहीं
दर्द-आफ़रीं नज़र दर्द-आश्ना नहीं


नंग-ए-आशिक़ी है वो नंग-ए-ज़िंदगी है वो
जिस के दिल का आईना तेरा आईना नहीं


आह उस की बे-कसी तू न जिस के साथ हो
हाए उस की बंदगी जिस का तू ख़ुदा नहीं


हैफ़ वो अलम-नसीब जिस का दर्द तू न हो
उफ़ वो दर्द-ए-ज़िंदगी जिस की तू दवा नहीं


दोस्त या अज़ीज़ हैं ख़ुद-फ़रेबियों का नाम
आज आप के सिवा कोई आप का नहीं


अपने हुस्न को ज़रा तू मिरी नज़र से देख
दोस्त! शश-जहात में कुछ तिरे सिवा नहीं


बे-वफ़ा ख़ुदा से डर ताना-ए-वफ़ा न दे
'ताजवर' में और ऐब कुछ हों बे-वफ़ा नहीं


अल्लामा ताजवर नजीबाबादी


अल्लामा ताजवर नजीबाबादी (02 मई 1893-30 जनवरी 1951) का जन्म नैनीताल में हुआ। उनका पैतृक स्थान नजीबाबाद (उ.प्र.) था। वह शायर, अदीब, पत्रकार और शिक्षाविद थे। फ़ारसी व अरबी की आरम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद दारुलउलूम देवबंद से दर्से निज़ामिया की शिक्षा पूरी की। 1915 में पंजाब यूनिवर्सिटी से मौलवी फ़ाज़िल और मुंशी फ़ाज़िल के इम्तेहान पास किये। 1921 में दयालसिंह कालेज लाहौर में फ़ारसी और उर्दू के शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए। उन्होंने 'हुमायूँ' और 'मख्ज़न' पत्रिकाओं में काम किया और 'अदबी दुनिया' और 'शाहकार' पत्रिकाएँ जारी कीं। उन्होंने 'उर्दू मरकज़' के नाम से संकलन एवं सम्पादन की एक संस्था भी स्थापित की।


साभार- http://www.hindi-kavita.com/HindiAllamaTajvarNazibabadi.php


वैशाली

  अर्चना राज़ तुम अर्चना ही हो न ? ये सवाल कोई मुझसे पूछ रहा था जब मै अपने ही शहर में कपडो की एक दूकान में कपडे ले रही थी , मै चौंक उठी थी   ...