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राजनीति को वोट की जरूरत होती है

अमन  कुमार त्‍यागी   अंधे को आंख की लंगड़े को टांग की लूले को हाथ की गूंगे को जीभ की बहरे को कान की जैसे जरूरत होती है वैसे ही राजनीति को वोट की जरूरत होती है भूखे को ब्रेड की प्रिय को प्रेम की नंगे को वस्त्र की योद्धा को अस्त्र की बच्चे को मां की जैसे जरूरत होती है वैसे ही राजनीति को वोट की जरूरत होती है वोट की जरूरत दिखाई देती है बटन दबाने तक या मोहर लगाने तक उसके बाद होता है खेल रेलमपेल धकमधकेल धकमधकेल रेलमपेल

बोलो हिन्दुस्तान

- इन्द्रदेव भारती   बोलो हिन्दुस्तान """""""""""""""""""""""""""""" " बोलो  हिन्दुस्तान  कहाँ तक, कितनी  हिंसा  और  सहोगे ।  आज अगर चुप बैठे तो कल, कहने   लायक  नहीं  रहोगे ।     बारूदी   शब्दों   की  भाषा, किसनेआखिर क्यूँ बोली है । अंबर   ने   बरसाये   पत्थर, धरती  ने  उगली  गोली  है ।    प्यार के  गंगाजल में   कैसे, नफरत का  तेज़ाब घुला है । गौतम, गाँधी का  ये आंगन, सुबह लहू से धुला मिला है ।   किस  षड्यंत्री  ने  फेंकी  है,  षड्यंत्रों   की   ये  चिंगारी । गलियों, सड़कों, चौराहों  पे, मौत   नाचती  है   हत्यारी ।   यहीं जन्म लेकर के आखिर, कहो अकारण क्यूँ मर जाएं । क्यूँ अपना घर,गली,ये बस्ती, छोड़ वतन हम कहाँपे जायें ।   कहाँपे जायें ?  कहाँपे जायें ? कहाँपे जायें ?  कहाँपे जायें ?                 - इन्द्रदेव भारती

हम आये तुम आये चले जायेंगे इक रोज

    हम आये तुम आये चले जायेंगे इक रोज समय के शिलापट्ट पर कालजयी कुछ होता नहीं । एक दो रोज पढ़े जाओगे एक दो रोज सब गुनगुनायेंगे। दोहरायेंगे कुछ दिन वेद ऋचा सा फिर सब तुम्हें भूल जायेंगे। दो चार दिन आँसू बहाते हैं सब कोई हम पर जनम भर रोता नहीं ये खजुराहो के मंदिर ये अजंता एलोरा की गुफायें। कुछ प्रतिबिंब अधूरी तपस्याओं के कुछ में चित्रित हैं कुंठित वासनाये। देह पर ही लिखे गए हैं नेह के इतिहास सारे जग में मन जैसा कुछ भी होता नहीं । क्यूँ नाचती है मीरा दीवानी सूफी किसके लिये गीत गाते। प्रीत की चादर बुनते किसके लिए कबीरा सूर किसको रहे अंत तक बुलाते। वाचन मात्र मानस का होता यहाँ राम चरित में कोई भी खोता नहीं । समय के शिलापट्ट पर कालजयी कुछ होता नहीं ।  

स्मृृतियों के कैनवास पर : स्व० हरिपाल त्यागी

      बाबा नागार्जुन की पंक्तियाँ, रह-रह कर स्मरण आ रही है    सादौ कगद हो भले, सादी हो दीवाल। रेखन सौ जादू मरे कलाकार हरिपाल।। इत उत दीखै गगंजल, नहीं जहां अकाल। घरा धन्य बिजनौर की, जहां प्रगटे हरिपाल।।   और हरिपाल अंकल का, मुस्कुराता चेहरा स्मृतियों के कैनवास पर, अनायास साकार हो रहा है। बिजनौर की धरती, साहित्य कला, राजनीति, पत्रकारिता आदि विभिन्न सन्दर्भ में, उर्वरा रही है। स्व० हरिपाल त्यागी का मुझ पर असीम स्नेह और आर्शीवाद रहा। अपने बचपन में ही, घर पर आने वाली, पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों के माध्यम से बाल सुलभ जिज्ञासा के चलते शब्द ओर चित्रों का आकर्षण अपनी ओर खींचने लगा था। बचपन, अपने ननिहाल ग्राम पैंजनियाँ जनपद बिजनौर, उ0प्र0 में नाना श्री स्व0 शिवचरण सिंह के सरंक्षण में बीता। उनका स्थान, भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी इतिहास में, अपना एक अलग महत्व रखता हैप्रख्यात पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी (कानपुर) की उन पर महती अनुकम्पा थी, और उन्हीं के माध्यम व निर्देश पर नाना श्री के गांव पैजनियाँ में काकोरी काण्ड के ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खाँ, अवनीकांत मुकंजी (मिदनापुर), राम

मुझको मत मरवाय री

  गीतकार इन्द्रदेव भारती   कन्या भ्रूण  की  गुहार का  ये गीत  'शोधादर्श' पत्रिका   में प्रकाशित करने के लिये संपादक श्री अमन  कुमार त्यागी का हार्दिक आभार। -------------- मुझको  मत  मरवाय  री । -------------- माँ !  मैं  तेरी  सोनचिरैया,  मुझको  मत  मरवाय  री । काली गैया  जान  मुझे  तू, प्राण - दान दिलवाय री ।   हायरी मैया,क्या-क्या दैया जाने    मुझे   दबोचे   री । यहाँ-वहाँ से,जहाँ-तहाँ से, काटे  है  री,.....नोचे  री । सहा न जावे,और तड़पावे चीख़  निकलती जाय री । मुझको.................री ।।   यह कटी  री, उँगली मेरी, कटा अँगूठा जड़  से  री । पंजा काटा, घुटना काटा, टाँग कटी झट धड़ से री । माँ लंगड़ी ही,जी लूँगी री, अब  तो  दे  रुकवाय री । मुझको.................री ।।   पेट भी  काटा, गुर्दा काटा, आँत औ दिल झटके में री । कटी सुराही, सी गर्दन भी, पड़े   फेफड़े  फट  के  री । नोने - नोने  हाथ  सलोने, कटे   पड़े   छितराय  री । मुझको..................री ।।   आँख निकाली कमलकली सी गुल - गुलाब से  होंठ  कटे । नाक कटी री,  तोते - जैसी, एक-एक करके  कान कटे । जीभ कटी वो,माँ कहती जो, कंठ  रहा......गुंग

बाबा नागार्जुन को पढ़ते हुए

इन्द्रदेव भारती भिखुआ उजरत लेके आया, बहुत दिनों के बाद झोपड़िया ने दिया जलाया, बहुत दिनों के बाद खाली डिब्बे और कनस्तर फूले नहीं समाये नून, मिरच, घी, आटा आया, बहुत दिनों के बाद हरिया हरी मिरच ले आया, धनिया, धनिया लाई सिल ने बट्टे से पिसवाया, बहुत दिनों के बाद चकला, बेलन, तवा, चीमटा खड़के बहुत दिनों में चूल्हा चन्दरो ने सुलगाया, बहुत दिनों के बाद फूल के कुप्पा हो गयी रोटी, दाल खुशी से उबली भात ने चौके को महकाया, बहुत दिनों के बाद काली कुतिया कूँ-कूँ करके आ बैठी है दुआरे छक कर फ़ाक़ो ने फिर खाया, बहुत दिनों के बाद दिन में होली, रात दीवाली, निर्धनिया की भैया घर-भर ने त्योहार मनाया, बहुत दिनों के बाद ए-3, आदर्श नगर, नजीबाबाद-246763 (बिजनौर) उप्र

एक बेबाक शख्सियत : इस्मत चुगताई

आरती कुमारी पीएच. डी. हिंदी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, त्रिपुरा, अगरतला            साहित्य के क्षेत्र में अनेक विद्वानों का योगदान रहा हैं, वर्तमान  में विभिन्न विषयों से जुड़े, एक नई दृष्टि लिए रचनाकार हमारे समक्ष आ चुके हैं ।  भारतीय साहित्य में इस्मत चुगताई का भी एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, जिनका जन्म 21 अगस्त 1915 ई .  को बदायूं उत्तरप्रदेश में हुआ था। जिनका पूरा जीवन संघर्षशील तथा समस्याओं से घिरा रहा परंतु कभी  भी जिंदगी से हार नहीं मानती,जितना अनुभव जीवन में मिल पाया उसे जीवन के अंत समय तक कभी भूल नहीं पाई ।  इस्मत चुगताई उर्दू की प्रमुख व प्रसिद्ध लेखिका के रूप में जानी जाती रही हैं , उनकी प्रत्येक रचना विभिन्न भाषाओं में अनुवादित हो चुकी हैं ।  वह एक स्वतंत्र विचारक , निडर , बेखौफ, जिद्दी , जवाबदेही, तार्किक तथा विरोधी स्वभाव की थी जिन्होंने अपने जीवन में उन सभी बातों का विरोध किया जिससे जिंदगी एक जगह थम सी जा रही हो ।  इस्मत चुगताई का परिवार एक पितृसत्तात्मक विचारों वाला था उसके बावजूद वह अपने परिवार के प्रत्येक सदस्यों से विपरीत रही । स्त्रियों की समस्याओं को लेकर आजा