Tuesday, November 19, 2019

चाय वाली ताई


आलोक त्यागी                                                   


पढ़ाई पूरी करते-करते मेरा चयन, एक प्रसिद्ध दवाई की कंपनी में सहायक मेडिकल आॅफिसर के लिए हो गया तो मैं हरिद्वार अपने बच्चों के साथ रहने लगा। मेरा काम आॅफिस के अतिरिक्त फील्ड में जाना भी है। अपनी नौकरी का कत्र्तव्य निभाने के लिए प्रत्येक माह कम से कम दो बार मैं क्षेत्र में जरूर जाता हूँ। मेरे कार्यक्षेत्र के एक कस्बे के सभी दवा विक्रेताओं से मेरी अच्छी जान पहचान भी हो गयी। जब भी किसी दवाई की दुकान पर संपर्क करने जाता हूँ या किसी डाॅक्टर से मिलता हूँ, तो चाय अवश्य ही झेलनी पड़ती है। 
यहां एक खास बात यह है कि डाॅक्टर चाय मंगवाए या दवा विक्रेता, आॅर्डर देने के दस मिनट में चाय लेकर हमेशा ताई ही आती है, चाय भी स्पेशल कुल्हड़ में, कम मीठी, इलायची और अदरक की मिलीजुली महक, कड़क पत्ताी, जो सारी थकान पलों में उतार देती। 
शुरू में तो मुझे सामान्य लगा लेकिन मेरे मन मंे जिज्ञासा हुई। मैंने एक दिन दवा विक्रेता से पूछा- आप हमेशा ताई से ही चाय क्यों मंगवाते हो, दुकानें तो और भी हैं? लेकिन सन्तोषजनक उत्तर न मिला। मैंने डाॅक्टर से भी पूछा मगर वह भी टालते से लगे तो मेरेे प्रश्न के उत्तरों की चाह ने, मुझे ताई की दुकान की ओर आकर्षित किया।
दुकान क्या? एक छोटा सा तख्त, उस पर कोने में रखा बिस्तर, कुछ बर्तन और ताई की दुकान का सामान। मैंने इधर-उधर नजरें दौड़ा कर देखा तो ताई ने कहा- 'बेटा! बैठने को कुछ नहीं मिलेगा। यहाँ चाय खड़े होकर ही पीनी पड़ेगी है। वैसे भी चाय खड़े होकर पीने के कई फायदे हैं।' ताई किसी दार्शनिक की भांति बोलती जा रही थी और मैं उनके सामान को एकटक देख रहा था। 
दुकान क्या वो मुझे ताई का घर लगा। मैं अभी देख ही रहा था कि ताई कब उठकर पड़ौसी की दुकान से कुर्सी ले आयी मुझे पता ही नहीं चला। ताई ने मेरा हाथ पकड़कर हिलाया- 'बैठो बेटा!' 
मैं जैसे निद्रा से जागा। ताई के पड़ौसी दुकानदार ने उत्सुकता से मुझे देखते हुए ताई से पूछ ही लिया-'कोई रिश्तेदार है क्या?'
मुझे लगा कि शायद मैं पहला व्यक्ति था जिसके लिए ताई कुर्सी ले कर आई थी। 
- 'नहीं भईया, ये तो अफसर हैं। कहते हुए ताई ने चाय का कुल्हड़ मेरे हाथ में पकड़ा दिया।
मेरे हाथ किसी मशीन की तरह चले जैसे कोई अनैच्छिक क्रिया हुई हो। अनैच्छिक क्रिया पर याद आ रहा है कि यह क्रिया रीढ़ के माध्यम से होती है। ऐसी क्रियाओं में दिमाग़ का कोई लेना देना नहीं होता है। मुझे उस दिन वास्तव में अहसास हुआ कि रीढ़ वाले लोगों को ही समाज में होना चाहिए। दिमाग़ वाले लोग क्या-क्या कर गुज़रते हैं यह कोई कहने या सुनने वाली बात नहीं है। 
ताई भी रीढ़ वाली थी। तभी तो वह मुझे बैठाने के लिए कुर्सी लेकर आई थी। पड़ौसी के पूछने के अंदाज से मैं अनुमान लगा चुका था कि ताई सबका इतना सम्मान नहीं करती, जितना कि उसने मेरा किया। मैं भी तो उसमें एक ऐसी औरत को तलाशने में जुटा था जो अपना स्वाभिमान बचाने के लिए तपती धूप में पत्थर तोड़ने से भी गुरेज नहीं करती है।
- 'बेटा बिस्कुट चलेगा या मठरी?' ताई ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
-हाँ-हाँ कुछ भी। अनायास ही मेरे मुंह से निकला। ताई ने प्लेट में रखी मठरी मेरे सामने रख दी तो मैंने बड़े ही सहज भाव से पूछा- 'ताई कब से यहाँ चाय की दुकान चलाती हो?'
ताई का चेहरा एकदम लाल-भभूका हो गया। ताई से ऐसी उम्मीद नहीं थी मुझे। ...लगा कि ताई की दुखती रग पे हाथ रखा गया है। ताई के चेहरे को देखकर मैं हत्प्रभ था। 
- 'चाय पियो चाय।' कहते हुए ताई ने मेरी ओर से अपना चेहरा घुमा लिया। मैं नहीं समझ पा रहा था कि आखिर मुझसे कौन सा अपराध हो गया है, बस एक साधारण सा प्रश्न ही तो किया था। मैं नहीं समझ पा रहा था कि मैं अब क्या करूं? मैंने किसी अबोध बच्चे की तरह मचलते हुए कहा- 'नहीं अम्मा! मैं तो पूछ कर ही रहँूंगा।'
सुनते ही क्रोध से तमतमाए और फिर एकदम से मुरझाए ताई के चेहरे को मैं देखता रह गया। परंतु धीरे से ताई ने अपनी सांसों और क्रोध पर असफल नियंत्रण पाने की कोशिश के साथ पूछा- 'क्या कहां?' और इसी के साथ उसके गले में जैसे कुछ अटक गया हो। आगे कुछ कहना चाहती थी मगर शब्दों ने उसके गले में ही दम तोड़ दिया। उसका गला भर आया। परंतु मैं भी अपने उस प्रश्न का उत्तर पाना चाहता था जिसके लिए मैं यहां आया था। सच कहूं तो इस प्रश्न ने पिछली कई रातों से मुझे सोने नहीं दिया। मैंने हिम्मत कर पुनः दोहराया- 'माँ! आज मैं पूछ कर ही रहूंँगा।'
मेरे दोबारा पूछने पर, ताई अपने आँसुओं को नहीं रोक पाई। रुक-रुक कर चल रहा स्टोव उसने बंद कर दिया और चेहरा छुपाकर अपने आँचल से आंसू पोछने लगी और एक क्षण में सामान्य होने का नाटक करने लगी। लेकिन आँसुओं की बरसात ने रुकने का नाम नहीं लिया। मेरे अंदर सैंकड़ों प्रश्न दौड़ने लगे- 'अगले टर्न पर पूछ लूंगा।' लेकिन मेरे पैरों ने भी चलने से इंकार कर दिया। इस सन्नाटे में हम दोनो शांत थे। तभी फोन की घंटी घनघना उठी। 
ताई ने फोन रिसीव किया, शायद चाय का आर्डर  था। ताई ने पुनः स्टोव चलाने का प्रयास किया लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे। मैंने स्थिति को समझते हुए स्टोव जलाने में ताई की मदद की। ताई के आंसुओं की धार थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। मैं अजीब पसोपेश मे था, क्या कंरू? 
चाय उबल गयी कुल्हड़ में भी हो गई। ताई की स्थिति ऐसी थी कि वो चाय लेकर जा नहीं सकती थी।
मैंने पूछा-'चाय किस दुकान पर जानी है?'
उसने सामने की ओर इशारा किया- 'अजीत मेडिकल पर।'
मेरे पास उसका फोन नंबर था। मैंने फोन करके उससे बता दिया और उसका नौकर चाय लेकर चला गया। 
ताई ने सामान्य हो कर पूछा-'अब बताओ बाबूजी! क्या पूछना है?'
ताई के मुंह से अपने लिए बाबू जी शब्द सुनना अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने उसे कुरेदने की गरज से पूछा-'क्या अपने बेटे को भी बाबू जी ही कहती हो?'
शायद ताई को भी मेरे द्वारा पूछे गए इस सवाल की उम्मीद नहीं थी। मुझे लगा कि वह दीपावली की रात में जलाए गए चिराग़ की सुबह सी हो गई है। उसका यूं मुरझाना मुझे कतई अच्छा नहीं लगा तो मैंने मनुहार भरे अंदाज में कहा-'बाबूजी नहीं बेटा कहो  माँ जी।'
ताई ने शिकारी के भय से छिपती हुई हिरनी की आंखों से मुझे देखा। मैं ताड़ गया कि वह बेहद परेशान है। उसकी परेशानी की वजह जानने के लिए मैं जैसे मरा जा रहा था।
-'आप कब से चाय की दुकान चलाती हैं?' मैंने धीरे से पूछा।
अबकी बार ताई ने जैसे मेरी मुराद पूरी करने का निर्णय ले ही लिया। उसने मेरी आंखों में झांकते हुए बताया-'बेटा कई बरस हो गये। तेरे ताऊ जी की मौत के बाद मैं अकेली हो गयी। 
-'आपका घर?' मैंने पूछा। 
-'घर भी था, खेती की जमीन भी थी।'
-'आपके बच्चे?'
-'हाँ है, मेरा बेटा दुबई में इंजीनियर है। मेरा विकासकृ...हमने कितने चाव से पढ़ाया, और वो पढ़ा भीकृ...सब कहते थे। विकास से होशियार कोई नहीं, उसने आईआईटी से पढ़ाई की और उसका नंबर नौकरी के लिए दुबई आ गया। ...वहीं रहता है।'
-'माँ! विकास आपको लेने नहीं आया?'
-'आया था, अपने पिताजी की मौत पर... 13 दिन रहा। बोला माँ अब यहाँ पर क्या है? मेरे साथ चलो ये घर और खेती की ज़मीन बेच देते हैं।... मैंने कहा-बेटा सब कुछ तो तेरा है। जैसा तेरा मन करे वैसा कर ले...।' कहते-कहते ताई का गला रुँध गया। उसने किसी तरह अपने आप पर काबू पाया और पुनः बताने लगी-'बस फिर क्या था? तेरे ताँऊ के अरमानांे के घर और उनकी कर्मभूमि, खेती की ज़मीन का सौदा होने लगा। मेरे सामने ही लहलहाती फसल को मानो कोई सैलाब बहा कर ले गया हो। मैंने हिम्मत करके विकास से कहा, घर मत बेचो, उसने समझाया, माँ हम सब तो विदेश में रहेंगे। इस घर का क्या करना? वैसे भी मिट्टी का ही तो है। मेरा तो जैसे कालेजा बैठ गया, हिम्मत करके मैंने कहा, बेटा तेरे बापू ने इसे अपने हाथों से इसे बनाया था। दिन-रात लगे रहते थे। उनकी निशानी है। लेकिन वह बोला, माँ जब पिता जी ही नहीं रहे तो अब इस घर की देखभाल कौन करेगा।' बताते हुए ताई की आंखों से पानी बहने लगा। मैं शांत ही रहा। मुझे पता था कि अब ताई पूरी बात बताएगी ही। उसकी बात सुनने के लिए मेरा शांत ही रहना बेहतर था। हुआ भी यही।
कुछ ही देर बाद वह बोलने लगी- 'और फिर उसने सब कुछ बेच दिया, बेटा!'
ताई के मुंह से निकलने वाले यह सात शब्द मानों कयामत हों। ताई के बोलने से  ऐसा लग रहा था कि मानों चंद्रयान दो मिशन पर विक्रम लैंडर नहीं उतर पाने का दुःख व्यक्त किया हो या फिर चीन के द्वारा अक्साई चीन पर कब्जे का दुःख झेल रही हो। अपनी जमीन चले जाने का दुःख क्या होता है? यह वही बता सकता है जिसने जमीन को मां समझा हो। लेकिन जो लोग अपनी माँ को ही भूल जाते हैं उन्हें भला जमीन का दुख क्या होगा? मैंने पुनः हिम्मत करने के बाद पूछा-'विकास आपको अपने साथ लेकर नहीं गया अम्मा?'
ताई पहले तो शांत रही मगर फिर धीरे से बोली- 'जिस दिन सुबह हम जाने वाले थे। उसी रात पुलिस की गाड़ी आकर रूकी और पुलिस वाले विकास को भला-बुरा कहने लगे। मुहल्ले के लोग इकठ्ठा होने लगे। एक पुलिस वाला कह रहा था, विकास बहुत बड़ा चोर है। हम इसे लेकर दिल्ली जा रहे हैं। इसका सामान भी जप्त किया जाता है। मैं रोती बिलखती रही। वो मेरे विकास को लेकर चले गए। ...मेरे विकास ने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा। शायद वो नही चाहता था कि माँ मुझे देखकर रोये, मैंने ही हिम्मत करके कहा, विकास तू फिक्र मत कर, मैं खुद थाने आऊँगी। तुझे कुछ नहीं होगा। ...और पुलिस उसको सामान सहित ले गई।' कहते-कहते ताई अचेत हो गई।
मैंने उसे संभाला और आराम से लिटा दिया तभी उसका पड़ोसी रईस भी वहाँ आ गया। रईस ताई की दुकान के पास हजामत बनाने का काम करता है। उसने अपने चेले को आवाज़ दी और ताई के पास रहने को कहा। 
मैने समय को भाँपते हुए कहा-'मैं ताई के गुज़रे हुए कल के बारे में पूछ रहा था और ताई बेहोश...कृ।'
अभी मैं बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि रईस ने मुहँ पर अंगुली रखकर शांत रहने का इशारा किया और मेरी बाह पकड़कर दुकान से दूर ले आया। 
-'साहब इस बेचारी को तो वास्तविकता का पता ही नहीं। जिस रात विकास को पुलिस ले गई थी, उसके अगले दिन मैं प्रधान जी के साथ थाने गया था। थानेदार से सारी बातें बताईं। तब थानेदार ने ऐसे किसी भी मामले की जानकारी से इंकार किया। उसने बताया कि जब किसी दूसरे थाने की पुलिस आती है तो स्थानीय थाने की पुलिस को जरूर सूचित किया जाता है परंतु हमें ऐसी कोई सूचना नहीं है। हमारी बार-बार की विनती करने पर थानेदार गाॅव मे आया और लोगों से पूछताछ की। खोजबीन के बाद उसने हमें बताया कि कोई ऐसा रिकार्ड ज़िले भर में नहीं है, जिससे विकास को अपराधी साबित किया जा सके। 
घटना के दो दिन बाद विकास के एक दोस्त का फोन मेरे पास आया था। फोन मैंने ही सुना था। जिसकी बात सुनकर मैं अपने कानों पर भरोसा नहीं कर पाया। 
-'क्या बताया उसने?' मैंने जिज्ञासावश पूछा।
-'उसने बताया, विकास ने अपनी माँ को धोखा दिया है। वह हमें पुलिस वाला बनाकर लाया था। परंतु जब हमें पता चला कि उसने अपनी माँ को अपने साथ ले जाने से बचने के लिए ये नाटक रचा है तो मेरी आत्मा ने मुझे धिक्कारा। अब विकास की सच्चाई तुम्हें बताकर मन हल्का हो गया है।' कहकर उधर से फोन काट दिया गया।
बताते-बताते रईस की जुबान भी लड़खड़ा गई, उसने रुमाल निकालकर आँसू पोछे। फिर संभल कर बोला-'साहब मैंने, ये सच्चाई ताई को नहीं बताई है। ये बेचारी तो इसी भ्रम में जिंदा है कि जब विकास उसे लेने आएगा। तो कहाँ ढूंढेगा? इसलिए अपनी किसी रिश्तेदारी में भी नहीं जाती। 
रईस के बताते-बताते शाम हो गई थी। पास ही स्थित मंदिर से जैसे ही  लाउडस्पीकर के बजने की ध्वनी सुनाई दी, मैंने तुरंत मोबाइल में समय देखा। ठीक छः बज रहे थे। मैं सकपकाया। अचानक मुझे याद आया कि आज तो अहोई अष्टमी है। माँ वृत खोलने के लिए मेरा इंतजार कर रही होगी। मैंने अपनी जेब से रुमाल निकाला और आँखों को साफ करते हुए अपने घर की ओर चल दिया। 
जैसे-जैसे मेरे कदम आगे बढ़ रहे थे वैसे-वैसे मंदिर से आती आरती की ध्वनि तेज़ हो रही थी।
-'पूत कपूत सुने हैं पर माता सुनी ना कुमाता।...... 


 


अम्माएँ


दूधनाथ सिंह


 


वह विशाल, हरा पेड़... जैसे वह पूरी धरती पर अकेला था।


और दूर-दूर तक, जहाँ तक नजर जाती, धरती फटी हुई थी। उसमें बड़ी-बड़ी दरारें थीं। केवल चिलचिलाता वीराना था, जिसमें कहीं-कहीं धूसर-मटमैली, न–दिखती-हुई-सी बस्तियाँ थीं - मिट्टी के तितर-बितर ढूहों के खँडहर, जो हमारे रजिस्टर में दर्ज थे। अनंत-अछोर उन सूखे मैदानों में किसानों ने अपने डाँगर छोड़ दिए थे। चौंधा मारती धूप के उस सन्‍नाटे में हड्डियों के हिलते-काँपते झुंड अचानक दिख जाते, जो न जाने किधर और कहाँ दबी-ढँकी घास की हरी-हरी पत्तियाँ ढूँढ़ते, सूखे और काले निचाट में थूथन लटकाए इधर-उधर डोल रहे थे। हमारी जीप धूल उड़ाती, उस छतनार पेड़ की ओर बढ़ रही थी। उसके पास ही तीन-चार घरों का एक खँडहर था। हमने वहाँ पहुँचकर जीप रोकी और नीचे उतरकर खड़े हो गए। एक खँडहर से सात-आठ बच्‍चे किलबिल करते निकले और हमें देखते ही अंदर भाग गए। हमने समझा कि वे कपड़े-वपड़े पहनने गए होंगे! क्‍योंकि वे सभी नंग-धड़ंग थे। इतनी भीषण गर्मी है और हवा बंद है, इन खुले-बेछोर मैदानों में भी आर-पार बंद है, ऐसे में कपड़े तन पर काटते हैं - यही हमने सोचा और बच्‍चों के फिर से बाहर आने का इंतजार करने लगे। और पाकड़ का यह विशाल वृक्ष! वह कहाँ से रस खींचता हुआ इतना बड़ा हुआ था? क्‍योंकि पिछले छह-सात सालों से इधर, पूरे बुंदेलखंड में बारिश की एक बूँद नहीं गिरी थी। लोग बताते थे कि इतना लंबा सूखा तो उनके होश में कभी नहीं पड़ा था। बाग-बगीचे, बँसवारियाँ, यहाँ तक कि घर छाने वाले सरपत भी राख हो चुके थे। अब वे दुबारा कभी नहीं उगेंगे, क्‍योंकि धरती के अंतस का सारा जल खतम है...


तभी जनगणना आ गई थी।


हमें इस इलाके की जनसंख्‍या रजिस्‍टर में भरनी थी। फॉर्म में तरह-तरह के कॉलम थे। हमारी जीप एक बस्‍ती से दूसरी खँडहर बस्‍ती। अक्‍सर लोग जीप की घर्र-घर्र सुनते ही घरों से भाग जाते। हम महीने-भर से इधर ही थे। हमें क्‍या और कैसे बोलना था, हमें रट गया था।


नाम?


पिता का नाम?


क्‍योंकि हमारे एक कारकुन ने 'बाप का नाम' बोला था तो पिट गया था। 'बाप' बोलता है? और वह आदमी चढ़ बैठा था। बीच-बचाव करना पड़ा था और फिर सारे मर्द गाँव छोड़कर भाग गए थे। सरकारी लोग हैं, पुलिस आ सकती है। तब से हम 'बाप' की जगह 'पिता' का नाम पूछने लगे थे। पता - हवाल?


साकिन-मौजा?


बच्‍चे कितने?


बच्‍चों का क्या करोगे? वह आदमी बाघ की तरह चौकन्‍ना हो गया था।


पेशा? माने, क्या करते हो?


उम्र? कितनी?


नकारात्‍मक सिर।


सही-सही बोलना। छिपाना मत।


तुम्‍हारा नाम इस रजिस्‍टर में दर्ज होगा तभी सब कुछ होगा।


'क्‍या सब-कुछ होगा' - चेहरे पर यह भाव।


अगर नहीं, तो तुम कहाँ के बाशिंदे हो, तुम्‍हारे पुरनियाँ कौन थे, तुम्‍हारी जमीन? खुदकाश्‍त, भूमिधरी, बँटाई, अधिया, सिकमी?


कुछ पता नहीं चलेगा।


पुलिस तुम्‍हें धर लेगी।


तुम चोर-डकैत-खूनी। चंबल के बीहड़ों में घूमने वाले!


तुम्‍हारे ऊपर कोई भी इल्‍जाम आ सकता है।


तुम हवालात में, जेल में, पुलिस के डंडे के नीचे।


यह खबर आग की तरह फैली।


नतीजा? सारे मर्द गायब।


'अगर इस हादसे की शिकायत हुई तो हम नप जाएँगे' - एक क्लर्क ने कहा।


बैठने की और कोई जगह नहीं थी। सिर्फ उस पेड़ की घनी छाँह, जो सुकून थी, एक अविश्‍वसनीय सपना थी। हमने अपनी बड़ी-सी सफरी दरी निकाली और चार जनों ने चारों कोने पकड़कर उसे धूल के ऊपर बिछाया। वहाँ चींटियों के बड़े-बड़े बिल थे। धूल, जो हल्‍की गर्म थी। और हवा गुम। और चारों ओर एक गर्म सन्‍नाटा।


हमारा चपरासी उस मिट्टी के खँडहर तक गया।


सामने का किवाड़ बंद था, लेकिन बगल से आधा घर टूटा हुआ था।


उधर से छोटे-छोटे, नंग-धड़ंग बच्‍चे निकलकर झाँकते और अंदर भाग जाते। 'अंदर कौन-कौन है? बाहर निकलो और नाम-पता लिखाओ।' चपरासी उस बंद किवाड़ के पास जाकर चिल्‍लाया।


तीन-चार बच्‍चों ने घर के टूटे हुए हिस्‍से की तरफ से झाँका, खिलखिलाकर हँसे और अंदर भाग गए।


'ए, भीतर कौन-कौन है?' चपरासी ने फिर हाँक लगाई।


बच्‍चों का एक झुंड फिर घर के उस ढहे हुए ढूह से बाहर निकला।


'हमारी अम्‍माएँ हैं, और कोई नहीं है।' एक बच्‍चे ने साहस किया।


अब वे सभी खँडहर की टूटी-फूटी दीवारों पर चढ़कर खड़े हो गए।


'अपनी अम्‍माओं से बोलो कि बाहर आकर नाम-पता लिखाएँ। अपनी अम्‍माओं से बोलो कि डरें नहीं। हम लोग सरकारी आदमी हैं।' चपरासी कुछ इस तरह ऊँची आवाज में बोल रहा था, जिससे अंदर बैठी औरतें सुन लें।


'भीतर कितनी अम्‍माएँ हैं?' चपरासी ने पूछा।


एक लड़के ने पंजे की तीन उँगलियाँ ऊपर कीं, दूसरे ने चार, तीसरे ने पूरा पंजा। फिर वे खिलखिल करते भीतर भाग गए।


'बड़ा चक्‍कर है साहब, और मरद-मानुस कोई दिख नहीं रहा।' चपरासी पसीने से तर-ब-तर था।


'बच्‍चे खेल कर रहे हैं, शायद अंदर कोई है नहीं।' मैंने कहा।


'अंदर कोई नहीं होगा, तो इतने बच्‍चे कहाँ से आए!' चपरासी को जैसे मेरी नादानी पर तरस आया।


'आगे बढ़ते हैं।' हमारे बीच से कोई बोला।


'लेकिन यह खँडहर दर्ज है साहब, छूट जाएगा।' कारकुन ने लिस्‍ट चेक की।


'छूट जाएगा तो कौन जनसंख्‍या की कमी हो जाएगी!' इस पर एक साथ सभी लोग हँसे।


'सब नंगे थे।' बच्‍चों के बारे में।


'चिरकुट भी नहीं था।' चपरासी ने कहा।


'कितनी गर्मी है।'


'फिर भी साहेब, इस तरह नंगे थोड़े कोई रहेगा!'


मेरा दिमाग अजब फितूरी है। बाहर कुछ और होता रहता है और भीतर कुछ और चलता रहता है। जितनी बार बच्‍चे निकले, चाहे झुंड में, या वह अकेला किशोर-वय - सभी निपट नंगे थे। तो भीतर क्‍या-कुछ चल रहा है? स्त्रियाँ बाहर क्‍यों नहीं आ रहीं? और मर्द लोग? वे इस निपट वीराने में इस जनसंख्‍या को इस तरह निपट-निराधार छोड़कर कहाँ चले गए हैं? जब यह दृश्‍य घटित हो रहा था, मैं अचानक गुड़गाँव के मॉल्‍स में टहल रहा था। चारों ओर वस्‍त्रों के ढेर के ढेर की सजावट। कोई अपनी नाजनीं से फुसफसा रहा था, 'इसमें चलते-चलते थक जाओगी, यह एक-डेढ़ किलोमीटर लंबा है। जो खरीदना है, ले लो।' इतने कपड़े, इतनी तरह के, इतनी नाप के... वस्‍त्रों के उस लंबे गलियारे में... यहाँ से न जाने कहाँ तक। जयपुर हाइवे के बिल्‍कुल बगल तक। मैंने काँच की चमकती, विशाल दीवार के पार देखा। इतने रंग एक साथ झूल रहे थे। और इतनी सुहानी ठंडक, जैसे मैं शिमला के मॉल के नीचे की सीढ़ियों से उतरकर विंडो-शॉपिंग कर रहा हूँ। कुछ खरीद नहीं रहा, लेकिन जेम्‍स बांड की तरह अपने ओवरकोट की जेबों में हाथ डाले मेरी चहलकदमी पर किसी को भी एतराज नहीं है, और सभी मंद-मंद मुस्‍कुरा रहे हैं। ठीक इसी तरह मेरी आत्‍मा वहाँ मीलों लंबे वस्‍त्र-बाजार में टहल रही थी, जबकि मैं वहाँ था, उस पेड़ के नीचे, चूतड़ों पर गर्म-धूल और चींटियों के बिल और अपने कारकुनों के साथ, एक खँडहर का सामना करते हुए, जिसके भीतर शायद एक निर्वसन-निचाट खलबली थी। इसी तरह... ठीक इसी तरह, जब उन बच्‍चों में से एक ने कहा, 'अम्‍माएँ हैं, और कोई नहीं हैं' तो वहाँ बैठे-बैठे मैं अपनी माँ को सोच रहा था, जो बेवजह और मामूली घरेलू फसाद पर गुस्‍सा होकर कुएँ में डूब मरी।


तभी एकाएक सामने का दरवाजा खुला। एक हट्टी-कट्टी औरत एक मुचड़ी हुई, चमकीली, धराऊँ साड़ी पहने, उसकी तुड़ी-मुड़ी सलवटें हाथ से सहलाती बाहर निकली। हम सभी उठकर खड़े हो गए। नहीं, किसी दहशत में नहीं, उसके इस तरह स्‍तब्‍धता से प्रकट होने पर। उधर खँडहर पर सारे नंग-धड़ंग बच्‍चे निकलकर चुपचाप खड़े हो गए। जैसे कोई दुर्घटना होने जा रही हो। चपरासी, जो फिर आवाज लगाने जा रहा था, सहमा हुआ, कुछ दूरी बनाए हुए उसके पीछे चल रहा था।


'हाँ, पूछिए।' उस औरत ने अत्‍यंत विनम्र और निडर आवाज में कहा।


'आपका नाम?'


'नहीं पता,' औरत ने हाथों से इनकार किया।


'आपके पति का नाम?'


'नहीं लेते।'


कारकुन मुस्‍कुराया।


'कोई औरत इधर नहीं लेती जी।' एक क्लर्क ने कहा।


'कहाँ हैं आपके पति?'


'पता नहीं।'


'आप लोग अकेले रहते हैं यहाँ?'


'नहीं तो।' उस औरत ने बच्‍चों की ओर नजर दौड़ाई।


'ये आपके बच्‍चे हैं?'


'नहीं, हम तीनों के।'


'अंदर तीन अम्‍माएँ होंगी साहब!' चपरासी ने कहा।


औरत ने चपरासी की ओर देखा।


'तो उन्‍हें भी बुलाइए।' मैंने कहा।


'थोड़ी देर लगेगी।' औरत ने कहा।


'क्‍यों? देर क्‍यों लगेगी?' मुझे थोड़ा-थोड़ा गुस्‍सा चढ़ रहा था। चींटियाँ न जाने किधर से दरी पर चढ़ी आ रहीं थीं और इधर-उधर दौड़ भाग रही थीं।


'क्‍यों देर लगेगी?' मैंने एक चींटी को मसलते हुए पूछा।


'नहीं बता सकते।' औरत ने कहा।


'क्‍यों... क्‍यों-क्यों?'


'नहीं बता सकते।'


औरत ने फिर दुहराया। 'तो मत बताइए, उन लोगों को भेजिए फिर।' मेरा गुस्‍सा भड़क रहा था।


'थोड़ी देर लगेगी।'


'फिर वही बात।' मैं बिफर पड़ा।


'हुजूर, नंगी तो नहीं आ सकतीं। वो तो बच्‍चे हैं, उसने खँडहर पर खड़े बच्‍चों की ओर देखा, 'मैं जाऊँगी, यह साड़ी खोलूँगी, तब न! साड़ी बाँधने में थोड़ी देरी तो लगेगी कि नहीं?' औरत मुड़ी और उस अधखुले दरवाजे के भीतर गुम हो गई।


फिर दरवाजे के बंद होने की आवाज हुई फटाक।


हमने पलटकर उधर देखा।


हम सबका मुँह खुला। हम सबने एक ही कल्‍पना की - अम्‍माएँ और बच्‍चे। उस आदिम अवस्‍था की कल्‍पना में हमारी आँखें फटी रह गईं। हमारा चपरासी कुछ बोल रहा था, 'वो दूसरी-तीसरी भी कुछ नहीं बोलेंगी साहब! तो क्‍या जरूरत है साहब! कुछ भी लिख लीजिए साहब - तीन अम्‍माएँ और बच्‍चे पता नहीं सात-आठ कि नौं,' 'और इनके आदमी?' चपरासी ने चिलकती धुंध में देखा, 'यहाँ से भागिए साहब।'


मैंने घबराकर चारों ओर चौंधियाती धूप में बंजर धरती पर नजरें गड़ाईं।


डाँगर पशुओं का एक झुंड हिलता-काँपता न जाने किधर को बढ़ रहा था।


सब कुछ बेआवाज।


जन्मभूमि


देवेन्द्र सत्यार्थी


 


गाड़ी हरबंसपुरा के स्टेशन पर खड़ी थी। इसे यहाँ रुके पचास घंटे से ऊपर हो चुके थे। पानी का भाव पाँच रुपये गिलास से एकदम पचास रुपये गिलास तक चढ गया और पचास रुपये हिसाब से पानी खरीदते समय लोगों को बडी नरमी से बात करनी पडती थी । वे डरते थे कि पानी का भाव और न चढ जाएे । कुछ लोग अपने दिल को तसल्ली दे रहे थे कि जो इधर हिन्दुओं पर बीत रही है वही उधर मुसलमानों पर भी बीत रही होगी, उन्हें पानी इससे सस्ते भाव पर नहीं मिल रहा होगा, उन्हें भी नानी याद आ रही होगी।


प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े मिलिटरी वाले भी तंग आ चुके थे। ये लोग सवारियों को हिंफांजत से नए देश में ले जाने के लिए जिम्मेवार थे। पर उनके लिए पानी कहाँ से लाते? उनका अपना राशन भी कम था। फिर भी बचे-खुचे बिस्कुट और मूँगफली के दाने डिब्बों में बाँटकर उन्होंने हमदर्दी जताने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी। इस पर सवारियों में छीना-झपटी देखकर उन्हें आश्चर्य होता और वे बिना कुछ कहे-सुने परे को घूम जाते।


जैसे सवारियों के मन में यमदूतों की कल्पना उभर रही हो, और जन्म-जन्म के पाप उनकी आँखों के सामने नाच रहे हों। जैसे जन्मभूमि से प्रेम करना ही उनका सबसे बड़ा दोष हो। इसीलिए तो वे जन्मभूमि को छोड़कर भाग निकले थे। कहकहे और हँसी-ठठोले जन्मभूमि ने अपने पास रखे लिए थे। गोरी स्त्रियों के चेहरों पर जैसे किसी ने काले-नीले धब्बे डाल दिये हों। अभी तक उन्हें अपने सिरों पर चमकती हुई छुरियाँ लटकती महसूस होती थीं। युवतियों के कानों में गोलियों की सनसनाहट गूँज उठती, और वे काँप-काँप जातीं। उनकी कल्पना में विवाह के गीत बलवाइयों के नारों और मारधाड़ के शोर में हमेशा के लिए दब गये थे। पायल की झंकार घायल हो गयी थी। उनके गालों की लालिमा मटमैली होती चली गयी। जीवन का संगीत मृत्यु की खाइयों में भटककर रह गया। कहकहे शोक में डूब गये और हँसी-ठठोलों पर मानो श्मशान की राख उड़ने लगी। पाँच दिन की यात्रा में सभी के चेहरों की रौनक खत्म हो गयी थी।


यह सब क्यों हुआ, कैसे हुआ? इस पर विचार करने की किसे फुरसत थी? यह सब कैसे हुआ कि लोग अपनी ही जन्मभूमि में बेगाने हो गये? हर चेहरे पर खौफ था, त्रास था। बहुतों को इतना इतमीनान जरूर था कि जान पर आ बनने के बाद वे भाग निकलने में सफल हो गये। एक ही धरती का अन्न खाने वाले लोग कैसे एक-दूसरे के खून से हाथ रँगने लगे? यह सब क्यों हुआ, कैसे हुआ?


नए देश की कल्पना उन्हें इस गाड़ी में ले आयी थी। अब यह गाड़ी आगे क्यों नहीं बढ़ती? सुनने में तो यहाँ तक आया था कि स्टेशन पर बलवाइयों ने गाड़ी की पूरी-की-पूरी सवारियों के खून से हाथ रंग लिए थे। पर अब हालत काबू में थी। यद्यपि कुछ लोग पचास रुपये गिलास के हिसाब से पानी बेचनेवालों को बदमाश बलवाइयों के शरींफ भाई मानने के लिए तैयार न थे। नए देश में ये सब मुसीबतें तो न होंगी। वहाँ सब एक-दूसरे पर भरोसा कर सकेंगे। पर जब प्यास के मारे ओठ सूखने लगते और गले में प्यास के मारे साँस अटकने लगती तो वे तड़पकर रह जाते।


इनमें ऐसे लोग भी थे, जिनके घर जला दिये गये। वे बिलकुल खामोश थे। जैसे उनके दिल बुझ गये हों, दिमाग बुझ गये हों। कुछ ऐसे भी थे, जिनकी हालत पर झट यह कहा जा सकता था कि न आषाढ़ में हरे न सावन में सूखे।


जन्मभूमि में हाथ हमेशा खाली रहे। अब नए देश में भी कौन-से उनके हाथ भर जाएँगे? वे बढ़-बढ़कर बातें करने लगते। सौ से छूटते ही उनके बोल लाखों पर आकर रुकते। पर प्यास के मारे उनका बुरा हाल था।


खचाखच भरे हुए डिब्बे पर आलुओं की बोरी का गुमान होता था। एक अधेड़ आयु की स्त्री जो बहुत दिनों से बीमार थी, एक कोने में बैठी थी। उसके तीन बच्चे थे। एक लड़की सात बरस की थी, एक पाँच बरस की, और तीसरा बच्चा अभी दूध पीता था। यह गोद का बच्चा ही उसे बुरी तरह परेशान कर रहा था। कभी-कभी तंग आकर वह उसका मुँह झटक देती। इस स्त्री का पति कई बार बच्चे को अपनी बाँहों में थामकर खड़ा हो जाता और अपनी पत्नी की आँखों में झाँककर यह कहना चाहता कि यह तीसरा बच्चा पैदा ही न हुआ होता तो बहुत अच्छा होता।


बच्चे को अपनी गोद में लेते हुए बीमार स्त्री का पति कह उठा, ''तुम घबराओ मत। तुम ठीक हो जाओगी। बस अब थोड़ा-सा फासला और रहता है।''


बीमार स्त्री खामोश बैठी रही। शायद वह कहना चाहती थी कि यदि गाड़ी और रुकी रही तो बलवाई आ पहुँचेंगे और ये गिनती के मिलिटरी वाले भला कैसे हमारी जान बचा सकेंगे। जैसे ये सब सवारियाँ लाशें हों और गिध्द इनकी बू सूँघसकतेहों।


पास से किसी ने पूछ लिया, ''बहिन जी को क्या कष्ट है?''


''उस गाँव में कोई डाक्टर न था जहाँ मैं पढ़ाता था।'' बीमार स्त्री का पति कह उठा।


''तो आप स्कूल मास्टर हैं?''


''यह कहिए कि स्कूल मास्टर था,'' बीमार स्त्री के पति ने एक लम्बी आह भरते हुए कहा, ''अब भगवान जाने नए देश में हम पर क्या बीतेगी।''


 


दो


वह अपने मन को समझाता रहा। जरा गाड़ी चले तो सही। वे बहुत जल्द अपने राज्य में पहुँचने वाले हैं। वहाँ डाक्टरों की कमी न होगी। कहीं-न-कहीं उसे स्कूल मास्टर की जगह मिल ही जाएगी। उसकी आमदनी पहले से बढ़ जाएगी। वह अपनी पत्नी से कहना चाहता था कि जो चीज जन्मभूमि में आज तक नहीं मिल सकी, अब नए देश और जनता के राज्य में उसकी कुछ कमी न होगी।


बड़ी लड़की कान्ता ने बीमार माँ के समीप सरककर पूछा, ''माँ, गाड़ी कब चलेगी?''


छोटी लड़की शान्ता खिड़की के बाहर झाँक रही थी।


कान्ता और शान्ता का भैया ललित पिता की बाँहों में बराबर रोये जा रहा था।


स्कूल मास्टर को अपने स्कूल का ध्यान आ गया, जहाँ वह पिछले दस बरस से हेडमास्टर था। टैक्सला के समीप के इस गाँव को शुरू-शुरू में यह स्वीकार न था कि वहाँ स्कूल ठहर सके। उसने बड़े प्रेम से लोगों को समझाया था कि यह गाँव टैक्सला से दूर नहींटैक्सला जिसका प्राचीन नाम तक्षशिला है और जहाँ एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय था और जहाँ दूर-दूर के देशों के विद्यार्थी शिक्षा पाने आया करते थे। यह विचार आते ही उसकी कल्पना को झटका-सा लगा क्योंकि इस युग के लोगों ने एक-दूसरे के खून से हाथ रँगने की कसमें खायीं और अत्याचार की ये घटनाएँ ढोलों और शहनाइयों के संगीत के साथ-साथ हुईं। शिक्षित लोग भी बलवाइयों के संग-संगाती बनते चले गये। शायद उन्हें भूलकर भी खयाल न आया कि अभी तो प्राचीन तक्षशिला की खुदाई के बाद हाथ आने वाले मूर्ति-कला के बहुमूल्य नमूने भी बराबर अपना सन्देश सुनाए जा रहे थे। यह कैसी जन्मभूमि थी? इस जन्मभूमि पर किसे गर्व हो सकता था, जहाँ कत्लेआम के लिए ढोल और शइनाइयाँ बजाना जरूरी समझा गया।


इतिहास पढ़ाते समय उसने अनेक बार विद्यार्थियों को बताया कि यही वह उनकी जन्मभूमि है, जहाँ कभी कनिष्क का राज्य था, जहाँ अहिंसा का मन्त्र फूँका गया था, जहाँ भिक्षुओं ने त्याग, शान्ति और निर्वाण के उपदेश दिये और अनेक बार गौतम बुद्ध के बताये हुए मार्ग की ओर उँगली उठायी। आज उसी धरती पर घर जलाये जा रहे थे, और शायद ढलती बर्फों के शीतल जल से भरपूर नदियों के साथ-साथ गरम-गरम खून की नदी बहाने का मनसूबा बाँधा जा रहा था।


डिब्बे में बैठे हुए लोगों के कन्धे झिंझोड़-झिंझोड़कर वह कहना चाहता था कि गौतम बुध्द को संसार में बार-बार आने की आवश्यकता नहीं। अब गौतम बुद्ध कभी जन्म नहीं लेगा, क्योंकि उसकी अहिंसा का सदा के लिए अन्त हो गया। अब लोग निर्वाण नहीं चाहते। उन्हें दूसरों की आबरू उतारने में आनन्द आता है।


अब तो नग्न स्त्रियों और युवतियों के जुलूस निकालने की बात किसी के टाले टल नहीं सकती। आज जन्मभूमि अपनी सन्तानों की लाशों से पटी पड़ी है। अब यह इनसान के मांस और रक्त की सड़ाँध कभी खत्म नहीं होगी।


नन्हा ललित रो-रोकर सो गया था। कान्ता और शान्ता बराबर सहमी-सहमी निगाहों से कभी माँ की तरफ और कभी खिड़की के बाहर देखने लगती थीं। एक-दो बार उनकी निगाह ललित की तरफ भी उठ गयी। वे चाहती थीं कि थोड़ी देर और उनका पिता ललित को उठाये खड़ा रहे। क्योंकि उसकी जगह उन्हें आराम से टाँगें फैलाने का अवसर मिल गया था।


शान्ता ने कान्ता के बाल नोंच डाले और कान्ता रोने लगी। पास से माँ ने शान्ता के चपत दे मारी, और इस पर शान्ता भी रोने लगी। उधर ललित भी जाग उठा और वह बेसुरे अन्दांज से रोने-चीखने लगा।स्कूल मास्टर के विचारों का क्रम टूट गया। प्राचीन तक्षशिला के विश्वविद्यालय और भिक्षुओं के उपदेश से हटकर वह यह कहने के लिए तैयार हो गया कि कौन कहता है कि इस देश में कभी गौतम बुध्द का जन्म हुआ था। वह कान्ता और शान्ता से कहना चाहता था कि रोने से कुछ लाभ नहीं। नन्हा ललित तो बेसमझ है और इसलिए बार-बार रोने लगता है, तुम तो समझदार हो। तुम्हें तो बिलकुल नहीं रोना चाहिए। क्योंकि यदि तुम इसी तरह रोती रहोगी तो बताओ तुम्हारे चेहरों पर कमल के फूल कैसे खिल सकते हैं? पास से किसी की आवांज आयी, ''यह सब फिरंगी की चाल है। जिस बस्तियों ने बड़े-बड़े हमलावरों के हमले बरदाश्त किये, अनगिनत सदियों से अपनी जगह पर कायम रहीं, आज वे भी लुट गयीं।''


''ऐसे-ऐसे कत्लेआम तो उन हमलावरों ने भी न किये होंगे। हमारे स्कूलों में झूठा और मनगढ़न्त इतिहास पढ़ाया जाता रहा है !'' एक और मुसाफिर ने ज्ञान बघारा।


स्कूल मास्टर ने चौंककर उस मुसाफिर की तरफ देखा। वह कहना चाहता था कि तुम सच कहते हो। मुझे मालूम न था। नहीं तो मैं कभी इस झूठे मनगढ़न्त इतिहास का समर्थन न करता। वह यह भी कहना चाहता था कि इसमें उसका तो कोई दोष नहीं। क्योंकि सभ्यता के चेहरे से सुन्दर खोल साँप की केंचुली की तरह अभी-अभी उतरा है, और अभी-अभी मालूम हुआ है कि मानव ने कुछ भी उन्नति नहीं की, बल्कि यह कहना होगा कि उसने पतन की तरफ ही बड़े वेग से पग बढ़ाये हैं।


''जिन्होंने बलवाइयों और हत्यारों का साथ दिया और मानवता की परंपरा का अपमान किया,'' स्कूल मास्टर ने साहस दिखाते हुए कहा, ''जिन्होंने नग्न स्त्रियों और युवतियों के जुलूस निकाले, जिन्होंने अपनी इन माताओं और बहनों की आबरू पर हाथ डाला, जिन्होंने माताओं के दूध-भरे स्तन काट डाले और जिन्होंने बच्चों की लाशों को नेंजों पर उछाल कर कहकहे लगाये, उनकी आत्माएँ सदा अपवित्र रहेंगी। और फिर यह सब कुछ यहाँ भी हुआ और वहाँ भी,जन्मभूमि में भी और नए देश में भी!''


इसके उत्तर में सामने वाला मुसांफिर चुप बैठा रहा। उसकी खामोशी ही उसका उत्तर था। शायद वह कहना चाहता था कि इन बातों से क्या लाभ। ऊपर से उसने इतना ही कहा, ''हमें यह कैसी आजादी मिली है?''


 


तीन


कान्ता और शान्ता के आँसू थम गये थे। ललित भी कुछ क्षणों के लिये खामोश हो गया। स्कूल मास्टर की निगाहें अपनी बीमार पत्नी की ओर गयीं, जो खिड़की के बाहर देख रही थी। शायद वह पूछना चाहती थी कि जन्मभूमि छोड़ने पर हम क्यों मजबूर हुए। या क्या यह गाड़ी यहाँ इसीलिए रुक गयी है कि हमें फिर से अपने गाँव लौट चलने का विचार आ जाए।


स्कूल मास्टर के होंठ बुरी तरह सूख रहे थे। उसका गला बुरी तरह खुश्क हो चुका था। उसे यह महसूस हो रहा था कि कोई उसकी आत्मा में काँटे चुभे रहा है। एक हाथ सामने वाले मुसाफिर के कन्धे पर रखते हुए वह बोला


''सरदार जी, बताओ तो सही कि कल का इनसान उस अन्न को भला कैसे अपना भोजन बनाएगा, जिसका जन्म उस धरती की कोख से होगा, जिसे अनगिनत मासूम बेगुनाहों की लाशों की खाद प्राप्त हुई?''


सरदार जी का चेहरा तमतमा उठा। जैसे वह ऐसे विचित्र प्रश्न के लिए तैयार न हों। किसी कदर सँभलकर उसने भी प्रश्न कर डाला, ''आप बताओ, इसमें धरती का क्या दोष है?''


''हाँ-हाँ इसमें धरती का क्या दोष है?'' स्कूल मास्टर कह उठा, ''धरती को तो खाद चाहिए। फिर वह कहीं से भी क्यों न मिले।''


सरदार जी प्लेटफार्म की ओर देखने लगे। बोले, ''यह गाड़ी भी अजीब ढीठ है, चलती ही नहीं। बलवाई जाने कब आ जाएँ!''


स्कूल मास्टर के मन में अनगिनत लाशों का दृश्य घूम गया, जिनके बीचोबीच बच्चे रेंग रहे हों। वह इन बच्चों के भविष्य पर विचार करने लगा। यह कैसी नई पौध है? वह पूछना चाहता था। यह नई पौध भी कैसी सिध्द होगी? उसे उन अनगिनत युवतियों का ध्यान आया, जिनकी इंज्जत पर हाथ डाला गया था। पुरुष की दहशत के सिवा इन युवतियों की कल्पना में और क्या उभर सकता है? उनके लिए निश्चत ही यह आजादी बरबादी बनकर आयी। वे निश्चय ही आंजादी के नाम पर थूकने से भी नहीं कतराएँगी। उसे उन कन्याओं का ध्यान आया, जो अब माताएँ बननेवाली थीं। ये कैसी माताएँ बनेंगी? वह पूछना चाहता था। ये घृणा के बीज भला क्या फल लाएँगे? उसने सोचा, इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास न होगा। वह डिब्बे में एक-एक व्यक्ति का कन्धा झिंझोड़कर कहना चाहता था कि मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो। नहीं तो यदि यह गाड़ी पचास-पचपन घंटों तक रुकने के पश्चात् आगे चलने के लिए तैयार भी होगी तो मैं जंजीर खींचकर गाड़ी को रोक लूँगा।


''क्या यह गाड़ी अब आगे नहीं जाएगी, हे भगवान्?'' बीमार स्त्री ने अपने चेहरे से मक्खियाँ उड़ाते हुए पूछ लिया।


''निराश होने की क्या जरूरत है? गाड़ी आखिर चलेगी ही।'' स्कूल मास्टर कह उठा।


स्कूल मास्टर खिड़की से सिर निकालकर बाहर की ओर देखने लगा। एक-दो बार उसका हाथ जेब की तरफ बढ़ा अन्दर गया और फिर बाहर आ गया। इतना महँगा पानी खरीदने का उसे साहस न हुआ। जाने क्या सोचकर उसने कहा, ''गाड़ी अभी चल पड़े तो नए देश की सीमा में घुसते उसे देर न लगेगी। फिर पानी की कुछ कमी न होगी। ये कष्ट के क्षण बहुत शीघ्र बीत जाएँगे।''


 


चार


कन्धे पर पड़ी हुई फटी-पुरानी चादर को वह बार-बार सँभालता था। इसे वह अपनी जन्मभूमि से बचाकर लाया था। बलवाइयों के अचानक गाँव में आ जाने के कारण वह कुछ भी तो नहीं निकाल सका था। बड़ कठिनाई से वह अपनी बीमार पत्नी और बच्चों के साथ भाग निकला था। अब इस चादर पर उँगलियाँ घुमाते हुए उसे गाँव का जीवन याद आने लगा। एक-एक घटना मानो एक-एक तार थी और इन्हीं तारों की सहायता से समय के जुलाहे ने जीवन की चादर बुन डाली थी। इसी चादर पर उँगलियाँ घुमाते हुए उसे मानो उस मिट्टी की सुगन्ध आने लगी, जिसे वह वर्षों से सूँघता आया था। जैसे किसी ने उसे जन्मभूमि की कोख से जबरदस्ती उखाड़कर इतनी दूर फेंक दिया। जाने अब गाड़ी कब चलेगी?


अब यह जन्मभूमि नहीं रह गयी। देश का बँटवारा हो गया। अच्छा चाहे बुरा। जो होना था सो हो गया। अब देश के बँटवारे को झुठलाना सहज नहीं। पर क्या जीवन का बँटवारा भी हो गया?


अपनी बीमार पत्नी के समीप झुककर वह उसे दिलासा देने लगा, ''इतनी चिन्ता नहीं किया करते। नए देश में पहुँचने भर की देर है। एक अच्छे से डाक्टर से तुम्हारा इलाज कराएँगे। मैं फिर किसी स्कूल में पढ़ाने लगूँगा। तुम्हारे लिए फिर से सोने की बालियाँ घड़ा दूँगा।'' कोई और समय होता तो वह अपनी पत्नी से उलझ जाता कि भागते समय इतना भी न हुआ कि चुड़ैल अपनी सोने की बालियाँ ही उठा लाती। बल्कि वह उस कजलौटी तक के लिए झगड़ा खड़ाकर देता, जिसे वह दर्पण के समीप छोड़ आयी थी । कजलौटी, जिसकी सहायता से वह इस अधेड़ आयु में भी कभी-कभी आँखों में बीते सपनों की याद जाता कर लेती थी।


कान्ता ने झुककर शान्ता की आँखों में कुछ देखने का प्रयास किया। जैसे वह पूछना चाहती हो कि बताओ पगली, हम कहाँ जा रहे हैं।


''मेरा झुनझुना?'' शान्ता ने पूछ लिया।


''मेरी गुड़िया!'' कान्ता बोली।


''यहाँ न झुनझुना है, न गुड़िया!'' स्कूल मास्टर ने अपनी आँसू-भरी आँखों से अपनी बच्चियों की ओर देखते हुए कहा, ''मेरी बेटियो! झुनझुने बहुतेरे,गुड़ियाँ बहुतेरी, नए देश में हर चीज मिलेगी।''


पर रह-रहकर उसका मन पीछे की तरफ मुड़ने लगता। यह कैसा आकर्षण है? यह जन्मभूमि पीछे रह गयी। अब नया देश समीप है। गाड़ी चलने भर की देर है। उसने झुँझलाकर इधर-उधर देखा। जैसे वह डिब्बे में बैठे हुए एक-एक व्यक्ति से पूछना चाहता हो कि बताओ गाड़ी कब चलेगी।


''जन्मभूमि हमेशा के लिए छूट रही है!'' उसने अपने कन्धों पर पड़ी हुई चादर को बायें हाथ की उँगलियों से सहलाते हुए कहना चाहा। जैसे इस चादर के भी कान हों, और वह सब सुन सकती हो। खिड़की से सिर निकालकर उसने पीछे की तरफ देखा और उसे यों लगा जैसे जन्मभूमि अपनी बाँहें फैलाकर उसे बुला रही हो। जैसे वह कह रही हो कि मुझे यों छोड़कर चले जाओगे, मेरा आशीर्वाद तो तुम्हारे लिए हमेशा था और हमेशा रहेगा!


स्कूल मास्टर की बीमार पत्नी ने नन्हे ललित से समझौता कर लिया था। इस दूध की एक-एक बूँद पर पचासों रुपये निछावर किए जा सकते थे। यह दूध पचास रुपये गिलास के हिसाब से बिकने वाले दूध से अवश्य महँगा था।


चादर पर दायें हाथ की उँगलियाँ फेरते हुए स्कूल मास्टर को जन्मभूमि की धरती का ध्यान आ गया, जो शताब्दियों से रुई की खेती के लिए विख्यात थी।


उसकी कल्पना में कपास के दूर तक फैले हुए खेत उभरे। यह इसी कपास का जादू ही तो था कि जन्मभूमि रुई के अनगिनत ढेरों पर गर्व कर सकती थी।


जन्मभूमि में रुई से कैसे-कैसे बारीक तार निकाले जाते थे। घर-घर चरखे चलते थे। सजीव चरखा कातने वालियों की रंगीली महफिलें, वे 'त्रिंजन'! वह बढ़-बढ़कर सूत कातने की होड़! वे सूत की अंटियाँ तैयार करने वाले हाथ! वे जुलाहे जो परंपरागत कथाओं में मूर्ख समझे जाते थे, पर जिनकी उँगलियों को महीन-से-महीन कपड़ा बुनने की कला आती थी। जैसे जन्म-भूमि पुकार-पुकारकर कह रही होतुम कद के लम्बे हो और शरीर के गठे हुए। तुम्हारे हाथ-पाँव मजबूत हैं। तुम्हारा सीना कितना चौड़ा है। तुम्हारे जबड़े इतने संख्त हैं कि पत्थर तक चबा जाओ। यह सब मेरे कारण ही तो है। देखो, तुम मुझे छोड़कर मत जाओ...स्कूल मास्टर ने झट खिड़की के बाहर देखना बन्द कर दिया और उसकी आँखें अपनी बीमार पत्नी के चेहरे पर जम गयीं।


 


पाँच


वह कहना चाहता था कि मुझे वे दिन अभी तक याद हैं, ललित की माँ, जब तुम्हारी आँखें काजल के बिना ही काली-काली और बड़ी-बड़ी नंजर आया करती थीं। मुझे याद हैं वे दिन, जब तुम्हारे शरीर में हिरनी की-सी मस्ती थी। उन दिनों तुम्हारे चेहरे पर चाँद की चाँदनी थी, सितारों की चमक थी। मुस्कान, हँसी,कहकहा तुम्हारे चेहरे पर खुशी के तीनों रंग थिरक उठते थे। तुम पर जन्मभूमि कितनी दयालु थी। तुम्हारे सिर पर वे काले घुँघराले केश! उन सावन के काले-काले मेघों को अपने कन्धों पर सँभाले तुम मटक-मटक कर चला करती थीं गाँव की गलियों में, और पगडंडियों पर! घुर-घुर धाँ-भाँ जैसे मटकी में गिरते समय ताजा दुहे जाने वाला दूध बोल उठे। स्कूल मास्टर को यों लगा, जैसे अभी बहुत कुछ बाकी हो।


जैसे वह वर्षों के घूमते हुए भँवर में चमकती हुई किरन के दिल की बात भाँपकर कह सकता हो कि बीते सपने कल्पना के कला-भवन में सदैव थिरकते रहेंगे। जैसे वह ताक में पड़ी सुराही से कह सकती हो , ओ सुराही, तेरी गरदन टेढ़ी है, भला मैं वे दिन कैसे भूल सकता हँ जब तुम नई-नई इस घर में आयी थी।


वह चाहता था कि गाड़ी जल्द-से-जल्द नए देश की सीमा में प्रवेश कर जाए। फिर उसके सब कष्ट मिट जाएँगे। पत्नी का इलाज भी हो सकेगा। जन्मभूमि पीछे रह जाने के विचार से कुछ उलझन-सी अवश्य महसूस हुई। पर उसने तुरन्त अपने मन को समझा लिया। वह यह प्रयास करने लगा कि नए देश में जन्मभूमि की कल्पना कायम कर सके। आखिर एक गाँव को तो जन्मभूमि नहीं कहते , जन्मभूमि तो बहुत विशाल है, बहुत महान् है। उसकी महिमा का गान तो देवता भी पूरी तरह नहीं कर सकते। जिधर से गाड़ी यहाँ तक आयी थी, और जिधर गाड़ी को जाना था, दोनों तरफ एक-जैसी भूमि दूर तक चली गयी थी। उसे विचार आया कि भूमि तो सब जगह एक-जैसी है। जन्मभूमि और नए देश की भूमि में बहुत अधिक अन्तर तो नहीं हो सकता। वह चाहता था कि जन्मभूमि की वास्तविक कल्पना कायम करे। पौ फटने से पहले का दृश्यदूर तक फैला हुआ क्षितिज किनारे-किनारे पहाड़ियों की झालर आकाश पर बगलों की पंक्ति खुली कैंची के रूप में उड़ती हुई पूरब की ओर उषा का उजाला !...


धरती ऐसी जैसी किसी युवती की गरदन के नीचे ऊँची घाटियों के बीचो-बीच ताजा श्वेत मक्खन दूर तक फैला हुआ हो। वह चिल्लाकर कहना चाहता था कि जन्मभूमि का यह दृश्य नए देश में भी जरूर नजर आएगा। अपने कन्धों पर पड़ी हुई चादर को वह दायें हाथ की उँगलियों से सहलाने लगा।


जैसे वह इस चादर के मुख से अपना समर्थन चाहता हो। लटकती डालियाँ, महकती कलियाँ, इन्द्रधनुष के रंग, आकाश-गंगा का दूधिया-सौन्दर्य, युवतियों के कहकहे, नव कुलवधुओं की लाजजन्मभूमि का रूप इन्हीं पर कायम था।


अपने खमीर पर, अपनी तासीर पर जन्मभूमि मुसकराती आयी है और मुसकराती रहेगी। वह कहना चाहता था कि नए देश में भी जन्मभूमि का रूप किसी से कम थोड़ी होगा, वहाँ भी गेहँ के खेत दूर तक फैले हुए नंजर आएँगे।


जन्मभूमि का यह दृश्य नए देश में भी उसके साथ-साथ जाएगा, उसे विश्वास था।


उसके बायें हाथ की ऍंगुलियाँ बराबर कन्धे पर पड़ी हुई फटी-पुरानी और मैली चादर से खेलती रहीं। जैसे ले-देकर आज यही चादर जन्मभूमि की प्रतीक बन गयीहो।


''फिरंगी ने देश का नक्शा बदल डाला,'' सरदारजी कह रहे थे, पास से कोई बोला, ''यह उसकी पुरानी चाल।''


एक बुढ़िया ने कहा, ''फिरंगी तो बहुत दिनों से इस देश में बस गया था। मैं न कहती थी कि हम बुरा कर रहे हैं जो फिरंगी को उनके बंगलों से निकालने की सोच रहे हैं? मैं न कहती थी कि फिरंगी का सराप लगेगा?''


दूसरी बुढ़िया बोली, ''यह सब फिरंगी का सराप ही तो है, बहिन जी!''


स्कूल मास्टर को पहली बुढ़िया पर बहुत क्रोध आया। उसकी आवांज में जन्मभूमि के सन्देह बोल उठे, उसने सोचा। दूसरी बुढ़िया उससे भी कहीं अधिक मूर्ख थी जो बिना सोचे हाँ में हाँ मिलाये जा रही थी।


परे कोने में एक कन्या चीथड़ों में लिपटी हुई बैठी थी। जैसे उसकी सहमी-सहमी निगाहें इस डिब्बे के प्रत्येक यात्री से पूछना चाहती होंक्या ये मेरे आखिरी घाव हैं? उसके बायीं तरफ उसकी माँ बैठी थी, जो शायद फिरंगी से कहना चाहती थी कि मेरी गुलामी मुझे लौटा दो, क्योंकि गुलामी में मेरी बिटिया की आबरू नहीं लुटी थी।


डिब्बे में बैठे हुए जो लोग भीड़ के कारण बेहद भिंचे हुए थे, उनकी आँखों में भय की यह दशा थी कि वे प्रतिक्षण बड़े वेग से बुङ्ढे हो रहे थे। सरदारजी बोले, ''इतनी लूट तो बाहर से आने वाले हमलावरों ने भी न की होगी।''


पास से किसी ने कहा, ''इतना सोना लूट लिया गया कि सौ-सौ पीढ़ियों तक खत्म नहीं होगा।''


''लूट का सोना ज्यादा दिन नहीं ठहरता।'' एक और यात्री बोल उठा।


सरदारजी का चेहरा तमतमा उठा। बोले, ''पुलिस के सिपाही भी तो सोना लूटने वालों के साथ रहते थे। पर लूट का सोना पुलिस के सिपाहियों के पास भी कितने दिन ठहरेगा? आज भी दुनिया सतगुरु नानक देव जी महाराज की आज्ञा पर चले तो शान्ति हो सकती है।''


 


छह


छप्पन, सत्तावन, अट्ठावन इतने घंटों से गाड़ी हरबंसपुरा के स्टेशन पर रुकी खड़ी थी। अब तो प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े मिलिटरी वालों के तने हुए शरीर भी ढीले पड़ गये थे। किसी में इतनी हिम्मत न थी कि डिब्बे से नीचे जाकर देखे कि आखिर गाड़ी रुकने का कारण क्या है। डिब्बे में हर किसी का दम घुटा जा रहा था, और हर कोई चाहता था कि और नहीं तो इस डिब्बे से निकलकर किसी दूसरे डिब्बे में कोई अच्छी-सी जगह ढूँढ़ ले। पर यह डर भी तो था कि कहीं यह न हो कि न इधर के रहें न उधर के और गाड़ी चल पड़े।


''फिरंगी का सराप खत्म होने पर ही चलेगी गाड़ी!'' बुढ़िया बोली।


''सच है, बहिन जी!'' दूसरी बुढ़िया कह उठीं।


स्कूल मास्टर ने उड़ने वाले पक्षी के समान बाँहें हवा में उछालते हुए कहा, ''फिरंगी को दोष देते रहने से तो न जन्मभूमि का भला होगा न नए देश का।''


पहली बुढ़िया ने रूखी हँसी हँसते हुए कहा, ''फिरंगी चाहे तो गाड़ी अभी चल पड़े।''


कान्ता ने खिड़की सो झाँककर दूसरे डिब्बे की खिड़की में किसी को पानी पीते देख लिया था। वह भी पानी के लिए मचलने लगी। उसकी बीमार माँ ने कराहती हुई आवाज में कहा, ''पानी का तो अकाल पड़ रहा है, बिटिया!''


अब शान्ता भी पानी की रट लगाने लगी। सरदारजी ने जेब में हाथ डाल कर कुछ नोट निकाले और पाँच-पाँच रुपये के पाँच नोट स्कूल मास्टर की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ''इससे आधा गिलास पानी ले लिया जाए।''


स्कूल मास्टर ने झिझकते हाथों से नोट स्वीकार किये। आधा गिलास पानी की कल्पना से उसकी आँखें चमक उठीं। खाली गिलास उठाकर वह पानी की तलाश में नीचे प्लेटफार्म पर उतर गया। अब 'हिन्दू पानी!' और 'मुस्लिम पानी!' का भेद नहीं रह गया था। बड़ी कठिनाई से एक व्यक्ति के पास पानी नंजर आया।


बावन रुपये गिलास के हिसाब से पच्चीस रुपये का पानी आधे गिलास से कुछ कम ही आना चाहिए था। पानी बेचने वाले ने पेशगी रुपये वसूल कर लिए और बड़ी मुश्किल से एक-तिहाई गिलास पानी दिया।


डिब्बे में आकर सरदारजी के गिलास में थोड़ा पानी उड़ेलते समय जल्दी में कोई एक घूँट पानी फर्श पर गिर गया। झट से पानी का गिलास कान्ता के मुँह पर थमाते हुए उसने कहा, ''पी ले बेटा!'' उधर से शान्ता ने हाथ बढ़ाये।


स्कूल मास्टर ने कान्ता के मुँह से गिलास हटाकर उसे शान्ता के मुँह पर थमा दिया।


फिर काँपते हाथों से यह गिलास उसने अपनी बीमार पत्नी के होंठों की तरफ बढ़ाया जिसने आँखों-ही-आँखों में अपने पति से कहा कि पहले आप भी अपने होंठ गीले कर लेते। पर पति इसके लिए तैयार न था।


कान्ता और शान्ता ने मिलकर जोर से गिलास पर हाथ मारे। बीमार माँ के कमजोर हाथों से छूटकर गिलाश फर्श पर गिर पड़ा। स्कूल मास्टर ने झट लपककर गिलास उठा लिया। बड़ी मुश्किल से इसमें एक घूँट पानी बच पाया था। यह एक घूँट पानी उसने झट अपने गले में उँड़ेल लिया।


सरदारजी कह रहे थे, ''इतना कुछ होने पर भी इनसान जिन्दा है और जिन्दा रहेगा।''


स्कूल मास्टर कह उठा, ''इनसानियत जन्मभूमि का सबसे बड़ा वरदान है। जैसे एक पौधे को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर लगाया जाता है, ऐसे ही हम नए देश से जन्मभूमि का पौधा लगाएँगे। हमें इसकी देखभाल करनी पड़ेगी और इस पौधे को नई जमीन में जड़ पकड़ते कुछ समय अवश्य लगेगा।''


यह कहना कठिन था कि बीमार औरत के गले में कितने घूँट पानी गुंजरा होगा। पर इतना तो प्रत्यक्ष था कि पानी पीने के बाद उसकी अवस्था और भी डावाँडोल हो गयी। अब उसमें इतनी शक्ति न थी कि बैठी रह सके। सरदारजी ने न जाने क्या सोचकर कहा, ''दरिया भले ही सूख जाएे, पर दिलों के दरिया तो सदा बहते रहेंगे। दिल दरिया समुन्दरों डूबें!'


 


सात


स्कूल मास्टर कह उठा, ''कभी ये दिलों के दरिया जन्मभूमि में बहते थे। अब ये दरिया नए देश में बहा करेंगे।''


बीमार स्त्री बुखार से काँपने लगी। सरदारजी बोले, ''यह अच्छा होगा कि इसे थोड़ी देर के लिए नीचे प्लेटफार्म पर लिटा दिया जाए। बाहर की खुली हवा इसके लिए अच्छी रहेगी।''


स्कूल मास्टर ने एहसान-भरी निगाहों से सरदारजी की तरफ देखा और उनकी मदद से बीमार पत्नी को डिब्बे से उतार कर प्लेटफार्म पर लिटा दिया।


सरदारजी फिर अपनी जगह पर जा बैठे और स्कूल मास्टर अपनी पत्नी के चेहरे पर रूमाल से पंखा करने लगा। वह धीरे-धीरे उसे दिलासा देने लगा, ''तुम अच्छी हो जाओगी। हम बहुत जल्द नए देश में पहुँचने वाले हैं। वहाँ मैं अच्छे-अच्छे डाक्टरों से तुम्हारा इलाज करवाऊँगा।''


बीमार औरत के चेहरे पर दबी-दबी-सी मुसकान उभरी। पर उसके मुख से एक भी शब्द न निकला, मानो उसकी खुली-खुली आँखें कह रही होंमैं जन्मभूमि को नहीं छोड़ सकती। मैं नए देश में नहीं जाना चाहती। मैं इस धरती की कोख से जन्मी और इसी में समा जाना चाहती हँ!


उसकी साँस जोर-जोर से चलने लगी। उसकी आँखें पथराने लगीं। स्कूल मास्टर घबराकर बोला, ''यह तुम्हें क्या हो रहा है? गाड़ी अब और नहीं रुकेगी। नया देश समीप ही तो है। अब जन्मभूमि का विचार छोड़ दो। हम आगे जाएँगे।''


खिड़की से कान्ता और शान्ता फटी-फटी आँखों से देख रही थीं, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। सरदारजी ने खिड़की से सिर बाहर निकालकर पूछा, ''अब बहनजी का क्या हाल है?''


स्कूल मास्टर बोला, ''यह अब जन्मभूमि में ही रहेंगी।''


सरदार जी बोले, ''कहो तो थोड़ा पानी खरीद लें।''


बीमार औरत ने बुझते दीप की तरह साँस लिया और उसके प्राण-पखेरू निकल गये।


लाश के समीप खड़े-खड़े स्कूल मास्टर ने बड़े ध्यान से देखा और कहा, ''अब वह पानी नहीं पीएगी।''


उधर इंजन ने सीटी दी और गाड़ी धीरे-धीरे प्लेटफार्म के साथ-साथ रेंगने लगी। उसने एक बार पत्नी की लाश की तरफ देखा फिर उसकी निगाहें गाड़ी की तरफ उठ गयीं। खिड़की से कान्ता और शान्ता उसकी तरफ देख रही थीं। लाश के साथ रह जाएे या लपककर डिब्बे में जा बैठे, यह प्रश्न बिजली के कौंध की तरह उसके हृदय और मस्तिष्क को चीरता चला गया।


उसने अपने कन्धे से झट वह फटी-पुरानी मैली चादर उतारी, जिसे वह जन्मभूमि से बचाकर लाया था और जिसके धागे-धागे में अभी तक जन्मभूमि साँस ले रही थी।


इस चादर को उसने अपने सामने पड़ी हुई लाश पर फैला दिया और गाड़ी की तरफ लपका। कान्ता की आवाज एक क्षण के लिए वातावरण में लहरायीं, ''माँ!''


गाड़ी तेज हो गयी थी, कान्ता की आवाज हवा में उछलकर रह गयी थी। स्कूल मास्टर ने शान्ता को गोद में उठा लिया और पलटकर लाश की तरफ न देखा।


टोबा टेकसिंह


सआदत हसन मंटो


 


बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय।


मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल, दानिशमंदों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कांफ्रेंसें हुई और िदन आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छान बीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके लवाहिकीन (सम्बन्धी ) हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दु सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में सरहद पर पहुंचा दिये गये।


उधर का मालूम नहीं। लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चीमेगोइयां होने लगी। एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज बाकायदगी के साथ जमींदार पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा-


-- मोल्हीसाब। ये पाकिस्तान क्या होता है ?


तो उसने बड़े गौरो फिक्र के बाद जवाब दिया-


-- हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बनते हैं।


ये जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया।


इसी तरह एक और सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा--


-- सरदार जी हमें हिन्दुस्तान क्यों भेजा जा रहा है - हमें तो वहां की बोली नहीं आती।


दूसरा मुस्कराया-


-- मुझे तो हिन्दुस्तान की बोली आती है - हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ -आकड़ फिरते हैं।


एक मुसलमान पागल ने नहाते-नहाते 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' का नारा इस जोर से बुलन्द किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया।


बाज पागल ऐसे थे जो पागल नहीं थे। उनमें अकसरियत ऐसे कातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे- दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जायें। ये कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्या तकसीम हुआ और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सही वाकेआत से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उनकी गुफ्तगू (बातचीत) से भी वो कोई नतीजा बरआमद नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे आजम कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलाहेदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है। यह कहां है ?इसका महल-ए-वकू (स्थल) क्या है इसके मुतअल्लिक वह कुछ नहीं जानते थे। यही वजह है कि पागल खाने में वो सब पागल जिनका दिमाग पूरी तरह माउफ नहीं हुआ था, इस मखमसे में गिरफ्तार थे कि वो पाकिस्तान में हैं या हिन्दुस्तान में। अगर हिन्दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है। अगर वो पाकिस्तान में है तो ये कैसे हो सकता है कि वो कुछ अरसा पहले यहां रहते हुए भी हिन्दुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान, और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ्तार हुआ कि और ज्यादा पागल हो गया। झाडू देते-देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और टहनी पर बैठ कर दो घंटे मुस्तकिल तकरीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के नाजुक मसअले पर थी। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वो और ऊपर चढ़ गया। डराया, धमकाया गया तो उसने कहा-


-- मैं न हिन्दुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में। मैं इस दरख्त पर ही रहूंगा।


एक एम. एससी. पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग, बाग की एक खास रविश (क्यारी) पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नमूदार हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर दफादार के हवाले कर दिये और नंगधंडंग़ सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।


यन्यूट के एक मौटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक सरगर्म कारकुन था और दिन में पन्द्रह-सोलह मरतबा नहाता था, यकलख्त (एकदम) यह आदत तर्क (छोड़)कर दी। उसका नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उसने एक दिन अपने जिंगले में ऐलान कर दिया कि वह कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखादेखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जिंगले में खून-खराबा हो जाय, मगर दोनों को खतरनाग पागल करार देकर अलहदा-अलहदा बन्द कर दिया गया।


लाहौर का एक नौजवान हिन्दू वकील था जो मुहब्बत में मुब्तिला होकर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। इसी शहर की एक हिन्दू लड़की से उसे मुहब्बत हो गयी थी। गो उसने इस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको नहीं भूला था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल मिलाकर हिन्दुस्तान के दो टुकड़े कर दिये-- उसकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गयी और वह पाकिस्तानी।


जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे,उसको हिन्दुस्तान वापस भेज दिया जायेगा। उस हिन्दुस्तान में जहां उसकी महबूबा रहती है। मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था-- इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी।


यूरोपियन वार्ड में दो एंग्लो-इण्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान को आजाद करके अंग्रेज चले गये हैं तो उनको बहुत रंज हुआ। वह छुप-छुप कर इस मसअले पर गुफ्तगू करते रहते कि पागलखने में उनकी हैसियत क्या होगी। यूरापियन वार्ड रहेगा या उड़ जायगा। ब्रेकफास्ट मिलेगा या नहीं। क्या उन्हें डबलरोटी के बजाय ब्लडी इण्डियन चपाती तो जहरमार नहीं करनी पड़ेगी ?


एक सिख था जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक्त उसकी जबान पर अजीबोगरीब अल्फाज सुनने में आते थे, 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी बाल आफ दी लालटेन।' वो न दिन में सोता था न रात में। पहरेदारों का कहना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्से में एक एक लम्हे के लिए भी नहीं सोया। लेटा भी नहीं था। अलबना किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।


हर वक्त खड़ा रहने से उसके पांव सूज गये थे। पिंडलियां भी फूल गयीं थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुतअिल्लक जब कभी पागलखाने में गुफ्तगू होती थी तो वह गौर से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या खयाल है तो बड़ी संजीदगी से जवाब देता, 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।'


लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह गवर्नमेंट ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है जहां का वो रहने वाला है। लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि वो पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में। जो यह बताने की कोशिश करते थे वो खुद इस उलझाव में गिरफ्तार हो जाते थे कि स्याल कोटा पहले हिन्दुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है कल हिन्दुस्तान में चला जायगा या सारा हिन्दुस्तान हीं पाकिस्तान बन जायेगा। और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब नहीं हो जायेंगे।


उस सिख पागल के केस छिदरे होके बहुत मुख्तसर रह गये थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था इसलिए दाढ़ी और बाल आपस में जम गये थे जिनके बाइस (कारण) उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गयी थी। मगर आदमी बेजरर (अहानिकारक) था। पन्द्रह बरसों में उसने किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने मुलाजिम थे वो उसके मुतअलिक इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में उसे बांधकर लाये और पागलखाने में दाखिल करा गये।


महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी खैर-खैरियत दरयाफ्त करके चले जाते थे। एक मुप्त तक ये सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान हिन्दुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना बन्द हो गया।


उसका नाम बिशन सिंह था। मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसको ये मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने दिन बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उसके अजीज व अकारिब (सम्बन्धी) उससे मिलने के लिए आते तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वो दफादार से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघा करता। अपने कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवा के पहनता और यूं सज-बन कर मिलने वालों के पास आता। वो उससे कुछ पूछते तो वह खामोश रहता या कभी-कभार 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी वेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी लालटेन ' कह देता। उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गयी थी। बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी आपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आंख में आंसू बहते थे।पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है। जब इत्मीनान बख्श (सन्तोषजनक) जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब- दिन बढ़ती गयी। अब मुलाकात नहीं आती है। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बन्द हो गयी थी जो उसे उनकी आमद की खबर दे दिया करती थी।


उसकी बड़ी ख्वाहिश थी कि वो लोग आयें जो उससे हमदर्दी का इजहार करते थे ओर उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वो उनसे अगर पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो यकीनन वो उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में, क्योंकि उसका ख्याल था कि वो टोबा टेकसिंह ही से आते हैं जहां उसकी जमीनें हैं।


पागलखाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में तो उसने हस्बेआदत (आदत के अनुसार) कहकहा लगाया और कहा--


-- वो न पाकिस्तान में है न हिन्दुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं लगाया।


बिशन सिंह ने इस खुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत समाजत से कहा कि वो हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वो बहुत मसरूफ था, इसलिए कि उसे ओर बेशुमार हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ वाहे गुरूजी दा खलसा एन्ड वाहे गुरूजी की फतह। जो बोले सो निहाल सत सिरी अकाल।' उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमान के खुदा हो, सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते। तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान दोस्त मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हट गया और वापस आने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका-- -- ये तुमसे मिलने आया है - तुम्हारा दोस्त फजलदीन है।


बिशन सिंह ने फजलदीन को देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फजलदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा।


-- मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फुर्सत ही न मिली। तुम्हारे सब आदमी खैरियत से चले गये थे मुझसे जितनी मदद हो सकी मैने की। तुम्हारी बेटी रूप कौर...। वह कुछ कहते कहते रूक गया । बिशन सिंह कुछ याद करने लगा --


-- बेटी रूप कौर ।


फजलदीन ने रूक कर कहा-


-- हां वह भी ठीक ठाक है। उनके साथ ही चली गयी थी।


बिशन सिंह खामोश रहा। फजलदीन ने कहना शुरू किया-


-- उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी खैर-खैरियत पूछता रहूं। अब मैंने सुना है कि तुम हिन्दुस्तान जा रहे हो। भाई बलबीर सिंह और भाई बिधावा सिंह से सलाम कहना-- और बहन अमृत कौर से भी। भाई बलबीर से कहना फजलदीन राजी-खुशी है। वो भूरी भैंसे जो वो छोड़ गये थे उनमें से एक ने कट्टा दिया है दूसरी के कट्टी हुई थी पर वो छ: दिन की हो के मर गयी और और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना, मै। हर वक्त तैयार हूं और ये तुम्हारे लिए थोड़े से मरून्डे लाया हूं।


बिशन सिंह ने मरून्डे की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फजलदीन से पूछा- -- टोबा टेकसिंह कहां है?


--टोबा टेकसिंह... उसने कद्रे हैरत से कहा-- कहां है! वहीं है, जहां था।


बिशन सिंह ने पूछा-- पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में?


--हिन्दुस्तान में...। नहीं-नहीं पाकिस्तान में...।


फजलदीन बौखला-सा गया। बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया-- ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान एन्ड हिन्दुस्तान आफ दी हए फिटे मुंह।


तबादले की तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की फेहरिस्तें (सूचियां) पहुंच गयी थीं, तबादले का दिन भी मुकरर्र हो गया था। सख्त सर्दियां थीं। जब लाहौर के पागलखाने से हिन्दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफिज दस्ते के साथ् रवाना हुई तो मुतअल्लिका (संबंधित ) अफसर भी हमराह थे। वाहगा के बार्डर पर तरफैन के (दोनों तरफ से) सुपरिटेंडेंट एक दूसरे से मिले और इब्तेदाई कार्रवाई खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया जो रात भर जारी रहा।


पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रजामन्द होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे उनको कपड़े पहनाये जाते, तो वो फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते क़ोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है। आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, रो रहे हैं, बक रहे हैं। कान पड़ी आवाज सुनायी नही देती थी-- पागल औरतों का शेरोगोगा अलग था और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत बज रहे थे।


पागलों की अकसरियत इस तबादले के हक में नहीं थी। इसलिए कि उनकी समझ में आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। चन्द जो कुछ सोच रहे थे-- 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' के नारे लगा रहे थे। दो-तीन मरतबा फसाद होते-होते बचा, क्योंकि बाज मुसलमान और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ गया।


जब बिशन सिंह की बारी आयी ओर वाहगा के उस पार मुतअल्लका अफसर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा-- टोबा टेकसिंह कहां है? पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में? -मुतअल्लका अफसर हंसा--पाकिस्तान में।


यह सुनकर विशनसिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने बाकी मांदा साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे। मगर उसने चलने से इन्कार कर दिया, और जोर-जोर से चिल्लाने लगा--टोबा टेकसिंह कहां है ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी टोबा टेकसिंह एन्ड पाकिस्तान।


उसे बहुत समझाया गया कि देखों अब टोबा टेकसिंह हिन्दुस्तान में चला गया है। अगर नहीं गया तो उसे फौरन वहां भेज दिया जायगा। मगर वो न माना। जब उसको जबरदस्ती दूसरी तरफ ले जाने की कोशिश की गयी तो वह दरम्यान में एक जगह इस अन्दाज में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे वहां से कोई ताकत नहीं हटा सकेगी।


आदमी चूंकि बेजरर था इसलिए उससे मजीद जबरदस्ती न की गयी। उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और बाकी काम होता रहा। सूरज निकलने से पहले साकित व साकिन (शान्त) बिशनसिंह हलक से एक फलक शगाफ (आसमान को फाड़ देने वाली ) चीख निकली -- इधर-उधर से कई अफसर दौड़ आये और देखा कि वो आदमी जो पन्द्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा, औंधे मुंह लेटा था। उधर खारदार तारों के पीछे हिन्दुस्तान था-- इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। दरमियान में जमीन के इस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था।


राष्ट्र का सेवक


प्रेमचंद


 


राष्ट्र के सेवक ने कहा - देश की मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है नीचों के साथ भाईचारे का सलूक, पतितों के साथ बराबरी का बर्ताव। दुनिया में सभी भाई हैं, कोई नीच नहीं, कोई ऊँच नहीं।


दुनिया ने जय-जयकार की - कितनी विशाल दृष्टि है, कितना भावुक हृदय!


उसकी सुंदर लड़की इंदिरा ने सुना और चिंता के सागर में डूब गई।


राष्ट्र के सेवक ने नीची जाति के नौजवान को गले लगाया।


दुनिया ने कहा - यह फरिश्ता है, पैगंबर है, राष्ट्र की नैया का खेवैया है।


इंदिरा ने देखा और उसका चेहरा चमकने लगा।


राष्ट्र का सेवक नीची जाति के नौजवान को मंदिर में ले गया, देवता के दर्शन कराए और कहा - हमारा देवता गरीबी में है, जिल्लत में है, पस्ती में है।


दुनिया ने कहा - कैसे शुद्ध अंतःकरण का आदमी है! कैसा ज्ञानी!


इंदिरा ने देखा और मुसकराई।


इंदिरा राष्ट्र के सेवक के पास जाकर बोली - श्रद्धेय पिताजी, मैं मोहन से ब्याह करना चाहती हूँ।


राष्ट्र के सेवक ने प्यार की नजरों से देखकर पूछा - मोहन कौन है?


इंदिरा ने उत्साह भरे स्वर में कहा - मोहन वही नौजवान है, जिसे आपने गले लगाया, जिसे आप मंदिर में ले गए, जो सच्चा, बहादुर और नेक है।


राष्ट्र के सेवक ने प्रलय की आँखों से उसकी ओर देखा और मुँह फेर लिया।


क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


हरिवंश राय बच्चन


 


अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर,
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


'यह अधिकार कहाँ से लाया!'
और न कुछ मैं कहने पाया -
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में -
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


चेर्नोबिल की आवाजें


स्वेतलाना अलेक्सियाविच


अनुवाद - शिवप्रसाद जोशी


 


स्वेतलाना अलेक्सियाविच लेखक और कहानीकार से पहले एक पत्रकार हैं। उन्होंने अपनी पत्रकारिता को साहित्य से कुछ ऐसा जोड़ा है जैसा लातिन अमेरिकी कथाकार गाब्रिएल गार्सिया मार्केस और लातिन अमेरिका के ही एक और बड़े लेखक पत्रकार एदुआर्दो गालियानो ने। उनका गद्य बेहद तीक्ष्ण लेकिन ठंडे निर्विकार अंदाज में चीजों और घटनाओं की पड़ताल करता है और उनके निष्कर्ष किसी लेखकीय चमत्कार से नहीं आते। वे उन वृतांतों , विवरणों , संस्मरणों और टिप्पणियों से सीधे आते हैं जिनके जरिए वे दर्द , यातना और शोषण का कथानक बुनती हैं। स्वेतलाना ने पत्रकारिता और साहित्य में अपना एक जॉनर विकसित किया है। मनुष्य तकलीफों की तफ्सील उन्हीं की जबानी। चेर्नोबिल की आवाजें इस विधा की एक अद्भुत मिसाल है। वहाँ नाटकीयता और संदर्भ नहीं हैं। वे आवाजें ही संदर्भ हैं। और एक भीषण पर्यावरणीय दुर्घटना का एक जीवंत और सबसे प्रामाणिक दस्तावेज दुनिया के सामने आ पाता है। चेर्नोबिल की याद आते ही हमारे सामने यानी इस भारतवर्ष और दक्षिण एशियाई जमात के सामने सहसा भोपाल गैस त्रासदी आ जाती है। 80 के दशक की ये दोनों बड़ी दुर्घटनाएँ चार साल के अंतराल में घटित हुई थीं। स्थानीय लोग और पूरा विश्व स्तब्ध रह गया था और लगने लगा था कि 20 वीं शताब्दी इन्हीं असामयिक , अचानक दुर्घटनाओं के हवाले होगी और 21 वीं सदी नए किस्म की और बड़ी दुर्घटनाओं का सामना करेगी। यही हो रहा है। (प्रस्तुति और अनुवाद - शिवप्रसाद जोशी)


26 अप्रैल, 1986 रात एक बजकर 23 मिनट 58 सेकंड। एक के बाद एक विस्फोटों ने उस इमारत में स्थित रिएक्टर को नष्ट कर दिया जहाँ चेर्नोबिल एटमी ऊर्जा स्टेशन का एनर्जी ब्लॉक 4 रखा हुआ था। चेर्नोबिल का विनाश बीसवीं सदी की सबसे बड़ी तकनीकी बरबादी साबित हुई। ...छोटे से बेलारूस के लिए (आबादी : एक करोड़), ये एक राष्ट्रीय तबाही थी...। आज, हर पाँच में से एक बेलारूसी संक्रमित जमीन पर रहता है। और ये आँकड़ा बढ़कर बीस लाख लोगों का हो जाता है जिनमें से सात लाख बच्चे हैं। गोमेल और मोगीलेव इलाकों में जहाँ चेर्नोबिल का सबसे ज्यादा असर पड़ा और सबसे ज्यादा तबाही हुई, वहाँ मृत्यु दर, जन्म दर से बीस गुना अधिक है। - बेलारूस का इनसाइक्लोपीडिया, 1996, चेर्नोबिल, पेज 24


29 अप्रैल 1986 को रेडियोधर्मिता की जाँच करने वाले उपकरणों ने पोलेंड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और रोमानिया में उच्च स्तर का विकिरण दर्ज किया। 30 अप्रैल को स्विट्जरलैंड और उत्तरी इटली में। एक मई और दूसरी मई को फ्रांस, बेल्जियम, द नीदरलैंड्स, ब्रिटेन, और उत्तरी यूनान में। तीन मई को इजरायल, कुवैत और तुर्की में... हवा के साथ जहरीली गैस के कण पूरे भूमंडल का दौरा कर रहे थे : 2 मई को वे जापान में दर्ज किए गए। पाँच मई को भारत में, और पाँच और छह मई को अमेरिका और कनाडा में। - "बेलारूस में चेर्नोबिल हादसे के नतीजे", मिन्स्क स्थित द सखारोव इंटरनेशलन कॉलेज ऑन रेडियोइकॉलजी, मिन्स्क, 1992


 


ल्युजमिला इग्नातेंको, मृत दमकलकर्मी (फायरमैन) वासिली इग्नातेंको की पत्नी


हमारी नई नई शादी हुई थी। हम अभी भी हाथ में हाथ डालकर घूमते थे। स्टोर भी जाते तो एक दूसरे का हाथ थामकर। मैं उसे कहती, "तुम्हें प्यार करती हूँ।" लेकिन उस समय मैं नहीं जानती थी कि कितना। मुझे नहीं पता था... हम लोग उस फायर स्टेशन की डॉरमेटरी में रहते थे जहाँ वो काम करता था। मैं हमेशा जानती थी कि क्या हो रहा था - वो कहाँ है, वो कैसा है।


एक रात मैंने एक शोर सुना। मैंने खिड़की से बाहर देखा। उसने मुझे देखा, "खिड़की बंद कर दो और सो जाओ। रिएक्टर में आग लग गई है। मैं जल्द ही लौट आऊँगा।"


मैंने खुद विस्फोट नहीं देखा। सिर्फ लपटें। हर चीज रोशन हो गई थी। पूरा आकाश। एक ऊँची लपट। और धुआँ। गर्मी भयानक थी। और वो अभी तक नहीं लौटा था।


वे लोग जिस हालत में थे, अपनी पोशाकों में, वैसे ही चले गए थे। किसी ने उन्हें नहीं बताया था। उन्हें आग पर काबू पाने के लिए बुलाया गया था। बस इतना ही।


सुबह के सात बजे। सात बजे मुझे बताया गया कि वो अस्पताल में है। मैं वहाँ भागी। लेकिन पुलिस ने पहले ही घेरेबंदी कर दी थी। और वे किसी को जाने नहीं दे रहे थे। सिर्फ एंबुलेंस जा रही थीं। पुलिस वाले चिल्लाते थे : "एंबुलेंस रेडियोएक्टिव हैं, दूर रहो!" मैंने एक दोस्त की तलाश की, वो अस्पताल में डॉक्टर थी। जब वो एक एंबुलेंस से बाहर आई तो मैंने उसका सफेद कोट पकड़ लिया। "मुझे अंदर जाने दो!" "नहीं जाने दे सकती। उसकी हालत खराब है, सबकी हालत बुरी है।" मैं उससे लिपट गई। "सिर्फ उसे देखने के लिए!" "ठीक है," उसने कहा। "मेरे साथ आओ, सिर्फ पंद्रह या बीस मिनट के लिए।"


मैंने उसे देखा। वो हर जगह से सूज गया था और फूला हुआ था। उसकी आँखें नहीं दिखती थी।


"उसे दूध की जरूरत है। बहुत ज्यादा दूध की," मेरी दोस्त ने कहा। "उनमें से हरेक को कम से कम तीन लीटर दूध पीना चाहिए।"


"लेकिन उसे दूध अच्छा नहीं लगता है।"


"वो अब उसे पी लेगा।"


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(सारे मरीजों को मॉस्को शिफ्ट करने का पता चलने के बाद)


मैं छह महीने की गर्भवती थी। लेकिन मुझे मॉस्को पहुँचना था।


जो सबसे पहला पुलिस अधिकारी दिखा उसे हमने पूछा, चेर्नोबिल के अग्निशमन दल को को कहाँ रखा गया है। और उसने हमें बताया, ये सबके लिए आश्चर्य था, "अस्पताल संख्या 6, श्खूकिन्सकाया स्टॉप।"


ये रेडियोलॉजी के लिए एक विशेष अस्पताल था और बिना पास के आप अंदर नहीं जा सकते थे। मैंने दरवाजे पर खड़ी महिला को कुछ पैसे दिए, और उसने कहा : "जाओ।" फिर मुझे किसी और से पूछना पड़ा। मैं गिड़गिड़ाई। आखिरकार मैं हेड रेडियोलॉजिस्ट के दफ्तर तक पहुँच गई, आंजेलिना वासिलयेव्ना गुस्कोवा। उसने तपाक से यही पूछा : "क्या तुम्हारे बच्चे हैं?"


मैं उसे क्या बताऊँ? मैंने पहले ही भाँप लिया था कि मुझे ये छिपाना है कि मैं पेट से हूँ। वरना वे मुझे उससे मिलने नहीं देंगे! अच्छा है कि मैं पतली हूँ, आप मुझे देखकर कुछ नहीं बता सकते हैं। "हाँ," मैंने कहा।


"कितने?"


मैं सोच रही हूँ, कि मुझे उसे बताना चाहिए - दो। अगर एक कहूँगी तो वो मुझे जाने नहीं देगी।


"एक लड़का और एक लड़की।"


"तो फिर तुम्हें और पैदा करने की जरूरत नहीं है। ठीक है। सुनो : "उसका केंद्रीय तंत्रिका तंत्र बेकार हो चुका है, उसकी खोपड़ी काम नहीं करती है।"


ओके, मैं सोच रही हूँ, वो थोड़ा बेकल और अधीर ही तो होगा। "और सुनो : अगर तुम रोने लगी, तो तुम्हें फौरन निकाल बाहर करूँगी। गले नहीं मिलना है और कोई चूमना वगैरा नहीं। उसके नजदीक जाने की कोशिश भी मत करना। तुम्हारे पास आधा घंटा है।"


लेकिन मैं पहले से जानती थी कि मैं उसे छोड़कर नही जा रही हूँ। अगर मैं जाऊँगी, तो उसे लेकर। मैंने खुद की कसम खाई।


मैं अंदर गई। वे सब बिस्तर पर बैठे हैं, ताश खेल रहे हैं और हँस रहे हैं। वास्या, उन्होंने आवाज दी। वो पलटा : "ओह, अच्छा, अब खेल खत्म हुआ। इसने तो मुझे यहाँ भी ढूँढ़ लिया।" वो इतना बेढंगा लगता है, 48 साइज वाला पैजामा, और उसका साइज 52 है। आस्तीन बहुत छोटे है, पैंट बहुत छोटी। लेकिन उसका चेहरा अब सूजा हुआ नहीं है। उन्हें कुछ खास तरह का द्रव दिया गया था।


मैंने कहा : "तुम भला कहाँ भागते?" वो मुझसे लिपटना चाहता है। डॉक्टर ऐसा नहीं करने देगी। "बैठो, बैठ जाओ," वो कहती है, "यहाँ गले लगना मना है।"


हम किसी तरह मजाक करने लगे। और फिर सब वहीं जुट गए। उस जहाज में ये 28 लोग लाए गए थे।


मैं उसके साथ अकेला रहना चाहती थी, एक मिनट के लिए सही। उसके दोस्तों ने इस बात को महसूस कर लिया और बहाना कर हॉल से बाहर निकल गए। फिर मैंने उसे गले लगाया और उसे चूमा। वो अलग हट गया।


"मेरे नजदीक मत बैठे। कुर्सी ले लो।"


"ये बेवकूफी है", मैने कहा।


अगले दिन मैं पहुँची तो वे अपने अपने कमरों में पड़े हुए थे। उन्हें हॉल के गलियारों में जाने से मना कर दिया गया था। एक दूसरे से बातचीत करने से भी मनाही हो गई थी। वे दीवारों पर दस्तक देते रहते थे अपनी अँगुलियों के पोरों से। ठक ठक ठक ठक। डॉक्टरों ने दीवारों का विकिरण भी नाप लिया था।


उसमें बदलाव आ रहा था - हर रोज मैं एक नए व्यक्ति से मिल रही थी। जलने की चोटें सतह पर आ रही थीं। उसके मुँह में, उसकी जीभ पर, उसके चेहरे पर - पहले पहल छोटे छोटे जख्म उभरे थे और फिर वे बढ़ने लगे। परतों में सब कुछ उधड़ने लगा... किसी सफेद फिल्म की तरह... उसके चेहरे का रंग... उसका शरीर... नीला... लाल... धूसर, भूरा। और ये सब भी मेरा ही था। इसका वर्णन करना असंभव है। इसे लिखना असंभव है। इससे निजात पाना तो और भी असंभव। जिस एक चीज ने मुझे बचाया वो ये थी कि ये सब कुछ बहुत तेजी से हुआ, सोचने का जरा भी वक्त नहीं था, रोने का भी वक्त नहीं था।


निवासियों का कोरस : वे जो लौट आए


ओह, मैं तो इस पर बात भी नहीं करना चाहती हूँ। वो एक डरावनी घटना थी। उन्होंने हमें निकाल बाहर किया। सैनिकों ने हमें खदेड़ा। सेना की बड़ी मशीनें अंदर घुस आईं। एक बूढ़ा आदमी - पहले ही मैदान पर जा गिरा था। मरता हुआ। वो आखिर कहाँ जाना चाह रहा था? "मै उठ जाऊँगा," वो रो रहा था, "और कब्रिस्तान तक खुद जाऊँगा। मैं ये काम अपने आप करूँगा।"


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हम जा रहे थे - मैंने अपनी माँ की कब्र से कुछ मिट्टी उठा ली, एक छोटे से झोले में रख ली। घुटनों पर बैठ गई और कहा : "हमें माफ कर दो माँ, तुम्हें छोड़ कर जा रहे हैं।" मैं रात में वहाँ पहुँची और मैं डरी हुई नहीं थी। लोग घरों पर अपने नाम लिख रहे थे। लकड़ी पर, फेंस पर, डामर पर। मैंने घर धुला, चूल्हे को ब्लीच किया। टेबल पर कुछ डबलरोटियाँ और कुछ नमक, एक छोटी प्लेट और तीन चम्मच रख देने चाहिए। उतने चम्मच जितनी आत्माएँ हैं इस घर में। और हो सकता है हम लौट आएँ।


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मुर्गे मुर्गियों की कलगियाँ काली पड़ गई थीं, वे अब लाल नहीं रह गई थीं, विकिरण की वजह से। और आप चीज नहीं बना सकते थे। हम लोग एक महीना चीज और कॉटेज चीज के बगैर रहे। दूध खट्टा नहीं हो गया था - वो फटकर पाउडर बन गया था, सफेद पाउडर। विकिरण की वजह से।


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पुलिस वाले चिल्ला रहे थे। वे कारों में भरकर आए और हम जंगलों की ओर भाग गए। जैसे जर्मनों से भागे होंगे। एक बार वो वकील को ले आए, वो हाँफा, चीखा, हमें धारा 10 के तहत जेल में डालने की धमकी मिली। मैंने कहा : "ठीक है मुझे एक साल जेल में रख दो। मैं सजा काटकर लौटूँगा, यहीं लौटूँगा।" उनका काम है चिल्लाना, हमारा काम है खामोश रहना। मेरे पास मेडल है - मैं इलाके का सबसे अच्छा किसान था। और वो मुझे धारा 10 के नाम पर डरा रहा है।


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इस एक रिपोर्टर ने कहा कि हम लोग महज अपने घरों को नहीं लौट रहे थे, हम सौ साल पीछे लौट चुके थे। हम कटाई के लिए एक हथौड़े और कटाई के लिए एक हँसिया का इस्तेमाल करते हैं। हम गेंहू की बालियों को ठीक डामर के ऊपर पीटते हैं।


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हमने फौरन रेडियो बंद कर दिया। हम किसी समाचार के बारे में नहीं जानते लेकिन जिंदगी शांतिपूर्ण है। हम लोग नाराज नहीं होते हैं। लोग आते हैं, वे हमें कहानियाँ सुनाते हैं - हर जगह युद्ध है। और कहते हैं कि समाजवाद खत्म हो गया है और हम पूँजीवाद के साए में रह रहे हैं। और जार लौट रहा है। क्या ये सच है?


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लोग अंडे ले जाते हैं, रोल ले जाते हैं और जो कुछ भी उनके पास होता है उसे लेकर क्रबिस्तान पहुँचते हैं। हर कोई अपने परिवार के साथ बैठता है। वे उन्हें बुलाते हैं : "बहन, मैं तुम्हें मिलने आया हूँ। आओ लंच करते हैं।" या "माँ, प्यारी माँ। पापा, प्यारे पापा।" वे दूर स्वर्ग से आत्माओं को बुलाते हैं। जिनके लोग इस साल मरे, वे रोते हैं, और जिनके लोग पहले मर गए वे नहीं रोते हैं। वे बाते करते हैं। याद करते हैं। हर कोई प्रार्थना करता है। और जो नहीं जानता है कि प्रार्थना कैसे की जाती है वो भी प्रार्थना करता है।


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हमारे पास यहाँ हर चीज है - कब्र। हर कहीं कब्रें। डंप करने वाले ट्रक काम पर लगे हैं और बुलडोजर भी। मकान गिराए जा रहे हैं। कब्र खोदने वाले मशक्कत कर रहे हैं। उन्होंने स्कूल को दफनाया, मुख्यालय को और स्नानघरों को। ये वही दुनिया है, लेकिन लोग अलग हैं। एक चीज जो मुझे समझ नहीं आती कि क्या लोगों में आत्मा का वास होता है? आत्मा किस तरह की होती है? मेरे दादा दो दिन में मरे। मैं चूल्हे के पीछे छिपा था और इंतजार कर रहा था : वो उसके शरीर से कैसे उड़ कर जाएगी? मैं गाय दुहने चला गया था - मैं लौटा और दादा को आवाज दी। वो वहाँ पड़े थे, उनकी आँखें खुली हुई थीं। उनकी आत्मा पहले ही उड़ गई थी। या ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था। और फिर मैं उनसे कैसे मिलूँगा?


सैनिकों का कोरस


हमारी रेजिमेंट को ताकीद कर दी गई थी। हम लोग जब मॉस्को में बेलोरुस्काया ट्रेन स्टेशन पहुँच गए तब जाकर हमें बताया गया कि हम जा कहाँ रहे हैं। एक फौजी, वो शायद लेनिनग्राद का था, उसने विरोध करना शुरू कर दिया। उसे बताया गया कि उसे सैन्य ट्रिब्यूनल के सामने पेश कर दिया जाएगा। कमांडर ने टुकड़ी के सामने ठीक यही बात कही थी : "तुम्हें जेल में ठूँस दिया जाएगा या गोली मार दी जाएगी।" मेरे मन में अलग ही भावनाएँ थी, उस फौजी से बिल्कुल उलट। मैं कुछ हीरो जैसा करना चाहता था। हो सकता है ये बच्चों का मामला हो। लेकिन मेरे जैसे और भी लोग थे। डर तो था लेकिन मजेदार भी था, किसी वजह से।


तो हमें पहुँचा दिया गया। हमें सीधे पावर स्टेशन ले जाया गया। हमें सफेद लबादे और सफेद टोपियाँ दे दी गईं। गेज सर्जिकल मास्क भी। हमने इलाके की सफाई कर दी। रोबोट ये नहीं कर सकते थे, उनके सिस्टम बैठ गए थे। लेकिन हमने काम किया। और हमें इस बात का गर्व था।


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ये रहा वो छोड़ा हुआ मकान। ये बंद है। खिड़की की सिल पर एक बिल्ली है। मैं सोचता हूँ : जरूर मिट्टी की बिल्ली होगी। मैं आगे जाता हूँ और ये तो असली बिल्ली है। उसने घर में रखे सारे फूल खा लिए हैं। जिरेनियम के फूल। वो अंदर कैसे आई? या घर के लोगों ने ही उसे यहाँ छोड़ दिया था?


दरवाजे पर एक नोट चिपका हुआ है : प्रिय दयालु व्यक्ति, यहाँ किसी कीमती चीज की खोजबीन न करना। हमारे पास ऐसी कोई चीज कभी नहीं थी। जो चाहे वो इस्तेमाल कर लेना, लेकिन जगह को गंदा मत करना। हम लौटकर आएँगे। मैंने अन्य मकानों में अलग अलग रंगों के निशान देखे थे - प्यारे घर, हमें माफ कर दो! लोग अपने घरों को ऐसे अलविदा कह रहे थे जैसे कि वे भी लोग हों। या उन्होंने लिखा था : हम लोग सुबह निकल रहे हैं या हम लोग रात में निकल रहे हैं। और उन्होंने तारीखें भी लिख दी थीं और समय भी। स्कूल की कॉपियों के पन्नों पर नोट लिखे हुए थे : बिल्ली को मारना मत। वरना चूहे सब कुछ खा जाएँगे। और फिर एक बच्चे की राइटिंग में लिखा था : हमारी जुल्का को मत मार देना। वो एक अच्छी बिल्ली है।


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हम घर लौटे। मैंने अपने सारे कपड़े उतारे और उन्हें नष्ट करने के लिए ट्रैश शूट में डाल दिया। अपनी कैप मैंने छोटे बेटे को दे दी। वो वाकई उसे चाहता था। और वो हर वक्त उसे पहने रहता था। दो साल बाद उसकी बीमारी की पहचान की गई : उसके दिमाग में ट्युमर हो गया था... इसके बाद की बातें आप खुद ही लिख लीजिए। मैं और बात नहीं करना चाहता हूँ।


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हम लोग घटनास्थल पर पहुँचे। अपने उपकरण उठाए। "सिर्फ एक हादसा," कप्तान ने हमें कहा। "बहुत समय पहले हो चुकी है ये दुर्घटना, तीन महीने हो गए। अब कोई खतरे वाली बात नहीं है।" "ठीक है सब, कोई दिक्कत नहीं," सार्जेंट ने कहा, "बस खाने से पहले अपने हाथ जरूर धुल लेना।"


मैं घर लौटा। मैं डांस करने जाऊँगा। मैं अपनी पसंद की लड़की से मिलूँगा और कहूँगा, "चलो एक दूसरे को बेहतर ढंग से जान लें।"


"आखिर क्यों, किसलिए? तुम अब एक चेर्नोबिलाइट हो। मुझे तुम्हारे बच्चे पैदा करने में डर लगता है," वह कहेगी।


मरात फिलिपोविच कोखानोव , बेलारूस एकेडमी ऑफ सांइसेस में एटमी ऊर्जा संस्थान के पूर्व मुख्य अभियंता


मई के आखिर में, हादसे के करीब एक महीने बाद, हमें तीस किलोमीटर के दायरे से परीक्षण और जाँच के लिए संक्रमित चीजें भेजी जाने लगीं। हमें पालतू और गैरपालतू जानवरों के शरीरों के हिस्से भेजे गए। पहले परीक्षणों से ही साफ हो गया कि हमारे पास जो आ रहा है वो मीट नहीं है बल्कि रेडियोएक्टिव उपोत्पाद यानी बायप्रॉडक्ट है। हमने दूध का परीक्षण किया, वो दूध नहीं था। वो एक रेडियोधर्मी बायप्रॉडक्ट था।


कुछ गाँवों में हमने वयस्कों और बच्चों में थायरॉयड की माप की। ये निर्धारित डोज से सौ, कभी कभी दो सौ और तीन सौ गुना अधिक थी। ट्रैक्टर चल रहे थे, किसान अपनी जमीनों को खोद रहे थे। बच्चे रेत के बक्सों पर बैठे और खेल रहे थे। हमने एक औरत को देखा जो अपने घर के पास एक बेंच पर बैठी थी, अपने बच्चे को दूध पिलाती हुई - उसके दूध में सीजियम था - वो चेर्नोबिल की मेडोना है।


हमने अपने बॉसों को पूछा : "हम क्या करें? कैसे काम करें?" उन्होंने कहा : "अपने माप लो, टीवी देखो।" टीवी पर गोर्बाच्योव लोगों को दिलासा दे रहे थे : "हमने तत्काल प्रभाव से कदम उठाए हैं।" मैंने इस पर भरोसा किया। मैने बतौर इंजीनियर बीस साल तक काम किया था। मैं भौतिकी के नियमों से भलीभाँति परिचित था। मैं जानता था कि हर जीवित चीज को वो जगह छोड़नी होगी, चाहे थोड़े समय के लिए ही। लेकिन हमने निष्ठापूर्वक अपने माप लिए और टीवी देखा। हमें विश्वास कर लेने की आदत पड़ गई थी।


जोया दानिलोव्ना ब्रुक , पर्यावरण इंस्पेक्टर


मैं पर्यावरण रक्षा के निगरानी केंद्र में तैनात थी। हम लोग किसी तरह के निर्देश का इंतजार कर रहे थे लेकिन एक भी निर्देश नहीं मिला। उनकी हरकत तभी शुरू हुई जब बेलारूसी लेखक अलेक्सई आदमोविच ने मॉस्को में मामला उठाया और खतरे की चेतावनी दी। वे उससे कितनी नफरत करते थे! उनके बच्चे यहाँ रहते हैं, और उनके नाती-पोते भी, लेकिन उनकी बजाय एक लेखक दुनिया को बता रहा है : हमें बचाओ! आप सोचेंगे कि कुछ आत्मरक्षा का कोई तरीका निकल आएगा। इसके बजाय, तमाम पार्टी बैठकों में और धूम्रपान के लिए होने वाले ब्रेक्स में आप बस "उन्हीं निरे लेखकों" के बारे में सुनते थे। "वे अपनी नाक उस मामले में क्यों घुसा रहे है जिससे उनका लेना-देना नहीं? हमारे पास निर्देश हैं! हमें आदेशों का पालन करना होगा! वो क्या जानता है? वो कोई भौतिकविद् है क्या?!"


रेडियोधर्मी मिट्टी को दबाने के लिए उनके पास लिखित में प्रोटोकॉल है। हमने मिट्टी को मिट्टी में दबाया - एक अजीब मनुष्य गतिविधि। निर्देशों के मुताबिक, किसी भी चीज को दबाने से पहले हमें एक भूगर्भीय सर्वे करना था ये जानने के लिए दफन क्षेत्र के चार से छह मीटर के दायरे में भूजल तो नहीं है। हमें ये भी सुनिश्चित करना था कि गड्ढे की गहराई बहुत ज्यादा न हो। और उसकी दीवारें और तल पर पॉलीथाइलीन की परत चढ़ा दी जाए। लेकिन वास्तविकता में होता कुछ और ही था। हमेशा की तरह। कोई भूर्गभीय सर्वे नहीं। वे अपनी अँगुलियों से इशारा कर देते और कहते, यहाँ खोदो। खोदने वाली मशीन खोद देती। कितना भीतर गए हो। भला कौन जानता है। मैं रुक गई जब मैं पानी से टकराई। वे पानी में ही खुदाई कर रहे थे।


मेरा सबसे बड़ा एसाइनमेंट क्रास्नोपोल्स्क क्षेत्र में था, जहाँ हालत बहुत खराब थे। रेडियोन्यूक्लाइड, मैदानों के जरिए नदियों में न चले जाएँ, इसके लिए हमें फिर से निर्देशों का पालन करना था। दोगुने खाँचों को जोतना था, अंतराल छोड़ना था, और दोगुनी खापें भरनी थीं और ये सिलसिला बनाए रखन था। तमाम छोटी नदियों का दौरा करना था और उन्हें चेक करना था। जाहिर है मुझे एक कार की जरूरत थी। लिहाजा मैं क्षेत्रीय कार्यकारिणी के चेयरमैन के पास गई। अपना सिर अपने हाथों से पकड़े वो अपने दफ्तर में बैठा हुआ था : किसी ने योजना नहीं बदली थी, किसी ने फसल काटने के काम में रद्दोबदल नहीं किया था। जैसे उन्होंने मटर के दाने बोए थे, वैसा ही वे उसे काट रहे थे। जबकि सभी ये जानते थे कि मटर में सबसे ज्यादा विकिरण घुसता है, जैसे कि तमाम बीन्स में। उसके पास मेरे लिए समय नहीं था। सारे के सारे रसोइए और नर्सें बाल विहार (किंडरगार्टन) से भाग गए थे। बच्चे भूखे हैं। किसी का एपेन्डिक्स निकालना है तो आपको उसे एंबुलेंस में अगले इलाके की ओर ले जाना होगा। साठ किलोमीटर का सड़क का सफर। सारे सर्जनों ने हाथ खड़े कर दिए। कहाँ की कार कहाँ के दोगुने खाँचे, उसके पास मेरे लिए समय नहीं था।


लिहाजा मैं सेना के लोगों के पास चली गई थी। वे युवा लोग थे। छह महीनों से वहाँ डटे थे। लेकिन अब वे भयानक रूप से बीमार थे, उन्होंने मुझे चालक दल के साथ एक हथियारबंद निजी वाहन दे दिया। अच्छा था कि ये एक सुसज्जित सैन्य वाहन था जिसमें आगे मशीनगन लगी हुई थी। हम लोग इसमें जा रहे थे अपने जंगलों अपनी सड़कों से होते हुए। महिलाएँ अपने अपने दीवारों के पास खड़ी थी और रो रही थी - युद्ध के बाद से उन्होंने ऐसे वाहन नही देखे थे। उन्हें डर था कि नया युद्ध छिड़ गया है।


हम एक बूढ़ी महिला से मिले।


"बच्चों, मुझे बताओ, क्या मैं अपनी गाय का दूध पी सकती हूँ?"


हमने निगाहें झुका दीं, हमारे पास आदेश थे - सिर्फ डैटा जमा करने का। डैटा जमा करना लेकिन स्थानीय लोगों से मेलजोल मत करना।


आखिरकार हमारे वाहन का ड्राइवर बोल उठता है, "दादी अम्मा, आप कितने साल की हैं?"


"ओह, हाँ, अस्सी से ज्यादा। या उससे भी ज्यादा। मेरे दस्तावेज युद्ध के दौरान जल गए थे।"


"तो फिर आप जो मन करे वो सब पीती रहें।।"


मैं समझ गई थी। उस समय फौरन नहीं। लेकिन कुछ साल बाद कि हम सब उस अपराध में भागीदार थे।


विक्टर लातुन , फोटोग्राफर


ज्यादा समय नहीं हुआ जब हमने अपने एक दोस्त को वहाँ दफनाया था। वो रक्त कैंसर से मरा था। हम जगे और स्लाविक परंपरा के मुताबिक हमने पी। और फिर आधी रात तक बातचीत होती रही। पहले उसके बारे में, जो मर गया था। लेकिन उसके बाद? देश की किस्मत और ब्रह्मांड के मंसूबे के बारे में। क्या रूसी फौज चेचन्या से हटेगी या नहीं? क्या काकेशस का दूसरा युद्ध होगा या वो पहले से ही शुरू हो चुका है। ब्रिटिश शाही खानदान और राजकुमारी डायना के बारे में। रूसी राजशाही के बारे में। चेर्नोबिल के बारे में, अलग अलग बातें। अलग अलग थ्योरियाँ। कुछ कहते हैं कि एलियन्स को इस विनाश का पता था और उन्होंने हमारी मदद की। दूसरे लोग कहते हैं कि ये प्रयोग था और जल्द ही अविश्वसनीय प्रतिभा वाले बच्चे पैदा होने लगेंगे। या बेलारूस के लोग गायब हो जाएँगे, स्काइथियनों, सरमतों, किमरीयों, हुआस्तेकों की तरह। हम लोग तत्वज्ञानी हैं। हम लोग इस धरती पर नहीं रहते हैं, बल्कि अपने सपनों में रहते हैं, अपने संवादों में। क्योंकि इस साधारण जीवन में आपको कुछ और जोड़ने की जरूरत होती है, इसे समझने के लिए। तब भी जब आप मौत के करीब होते हैं।


व्लादीमिर मातवीविच इवानोव , स्तावगोरोद क्षेत्रीय पार्टी कमेटी के पूर्व प्रथम सेक्रेट्री


मैं अपने समय का प्रॉडक्ट हूँ। मैं परम कम्युनिस्ट हूँ। अब हम पर तोहमतें लगाना सुरक्षित हैं। ये फैशन में है। सारे कम्युनिस्ट अपराधी हैं। अब हम हर चीज का जवाब दें, भौतिकी के नियमों का भी।


मैं कम्युनिस्ट पार्टी की क्षेत्रीय कमेटी में प्रथम सचिव था। अखबारों में लिखा गया कि कुसूर, आप जानते हैं, किसका था, कम्युनिस्टों का : उन्होंने कमजोर, सस्ते एटमी संयंत्र बनाए, उन्होंने पैसे बचाने की कोशिश की, और लोगों की जिंदगियों की परवाह नहीं की। लोग उनके लिए महज रेत थे, इतिहास के उर्वरक। ठीक है। भाड़ मे जाएँ ऐसा लिखने वाले! भाड़ में! ये सब शापित सवाल हैं : क्या करें और किस को दोषी बताएँ? ये ऐसे सवाल हैं जो बने रहते हैं। हर कोई अधीर है, वे बदला लेना चाहते हैं। उन्हें खून चाहिए।


अन्य लोग खामोश हैं, लेकिन मैं आपको बताता हूँ। अखबार लिखते हैं कि कम्युनिस्टों ने लोगों को मूर्ख बनाया, उनसे सच्चाई छिपाई। लेकिन ऐसा करना पड़ा। हमें केंद्रीय कमेटी और क्षेत्रीय कमेटी से तार मिले थे, जिनमें हमें बताया गया था : तुम लोग दहशत फैलने से रोको। और ये सच है, दहशत एक डरावनी चीज है। उस समय डर था और अफवाहें भी फैली हुई थीं। लोग विकिरण से नहीं मरे थे, बल्कि घटनाओं से मरे थे। हमें एक दहशत को रोकना था।


क्या हो जाता अगर मैं कह देता कि लोगों को बाहर नहीं जाना चाहिए? वे कहते : "तुम मई दिवस में व्यवधान डालना चाहते हो?" ये एक राजनैतिक मामला था। वो मेरे पार्टी टिकट के बारे में मुझसे दरयाफ्त कर सकते थे। (हल्का सा शांत होकर) वे इस बात को नहीं समझते थे कि भौतिकी जैसी चीज भी आखिर होती है। ये एक चेन रिएक्शन है। और कोई आदेश या सरकारी प्रस्ताव उस चेन रिएक्शन को रोक नहीं सकता है। दुनिया भौतिकी के नियमों पर बनी हुई है, मार्क्स के विचारों पर नहीं। लेकिन अगर मैं ऐसा कह देता तब क्या होता? मई दिवस की परेड को रोक देने की कोशिश करता? (फिर से गुस्सा होते हुए।) अखबारों में वे लिखते हैं कि लोग सड़कों पर निकल आए थे और हम भूमिगत बंकरों में थे। मैं जबकि ट्रिब्यून में उस कड़ी धूप में दो घंटे तक खड़ा रहा था, बगैर हैट बगैर रेनकोट! और नौ मई को, विजय दिवस के मौके पर मैं अपने बुजुर्गों के जुलूस के साथ चला। उन्होंने हार्मोनिका बजाया था। लोग नाचे थे और उन्होंने खूब पी थी। हम सब उस सिस्टम का हिस्सा थे। हम यकीन करने वाले लोग थे, विश्वास करने वाले लोग थे। हमें ऊँचे आदर्शों पर विश्वास था, जीत पर? हम चेर्नोबिल को हरा देंगे...!


वासिली बोरिसोवित नेस्तेरेंको , बेलारूस एकेडमी ऑफ सांइसेस में एटमी ऊर्जा संस्थान के पूर्व निदेशक


उस दिन, 2 अप्रेल, मैं अपने काम से मॉस्को में था। वहाँ मुझे हादसे का पता चला।


मैंने मिन्स्क में बेलारूस की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी के महासचिव स्लाइयुनकोव को फोन लगाया। एक बार, दो बार, तीन बार मैंने कोशिश की लेकिन मेरी उनसे बात नहीं कराई गई। फिर मैंने उनके सहायक को फोन मिलाया, वो मुझे अच्छी तरह जानता था।


"मैं मॉस्को से बोल रहा है। मेरी स्लाइयुनकोव से बात करा दो। मेरे पास उनके लिए एक जरूरी संदेश है। आपात सूचना।"


आखिरकार करीब दो घंटे बाद मेरी स्लाइयुनकोव से बात हो पाई।


"मुझे पहले ही रिपोर्टें मिल गई हैं," स्लाइयुनकोव कहता है। "आग लगी थी, लेकिन बुझा दी गई।"


मैं ये बर्दाश्त न कर सका। "ये झूठ है! ये एक खुला झूठ है!"


29 अप्रैल को - मुझे हर चीज बहुत अच्छी तरह याद है, तारीख के साथ - आठ बजे सुबह, मैं स्लाइयुनकोव के दफ्तर के स्वागत कक्ष में बैठा हुआ था। मुझे अंदर जाने नहीं दिया जा रहा था। मैं वहाँ पर, ये समझिए कोई साढ़े पाँच बजे तक बैठा रहा। साढ़े पाँच बजे एक प्रसिद्ध कवि स्लाइयुनकोव के दफ्तर से बाहर निकले। मैं उन्हें जानता था। उन्होंने मुझसे कहा, "कॉमरेड स्लाइयुनकोव और मैंने बेलारूस की संस्कृति पर बात की।"


"बेलारूस की संस्कृति नही बचने वाली है," मैं फट पड़ा था, "या आपकी किताबों को भी पढ़ने के लिए कोई नहीं बचेगा, अगर हमने फौरन चेर्नोबिल से हर व्यक्ति को निकाला नहीं तो! अगर हमने उनकी जान नहीं बचाई तो!"


"क्या मतलब है तुम्हारा? आग तो पहले ही बुझा दी गई है।"


आखिरकार मुझे स्लाइयुनकोव से मिलने का अवसर मिल ही गया।


"तुम्हारे आदमी (संस्थान के कर्मचारी) शहर में गाइगर काउंटर (रेडियोएक्टिव विकिरण की जाँच के लिए उपकरण) लिए क्यों भागे फिर रहे हैं, हर किसी को डराते हुए? मैंने मॉस्को से पहले ही बात कर ली है। मेरी अकादमिक इल्यीन से बात हो गई है। उनका कहना है कि सब कुछ सामान्य है। और सरकारी आयोग स्टेशन पर मौजूद है, प्रोसीक्यूटर का दफ्तर भी वहीं है। हमने सेना बुला ली है। हमारा सारा सैन्य साजोसामान तैयार है।"


वे लोग अपराधियों का गिरोह नहीं थे। इसे जहालत और फर्माबरदारी की साजिश के रूप में देखना चाहिए। उनके जीवन का सिद्धांत यही था, पार्टी मशीन ने उन्हें जो एक चीज बताई थी वो यही थी कि कभी भी अपनी गर्दन मत घुसाओ। हर किसी को खुश रखना बेहतर है...। मैं शर्तिया कह सकता हूँ कि क्रेमलिन से फोन जरूर आया होगा। सीधे गोर्बाच्योव से। उन्होंने ये कहा होगा कि "मुझे उम्मीद है बेलारूस के तुम लोग दहशत न फैलने दोगे, पश्चिम ने तो शोर मचाना शुरू कर दिया है।" ...अब इसके बाद क्या होता है... लोग अपने से ऊपर के लोगों यानी अपने वरिष्ठों से ज्यादा डरते हैं, एटम बम से नहीं।


मैं भी गाइगर काउंटर लेकर निकला था। सचिव और शोफर कहते थे, "प्रोफेसर आप सबको डराते क्यों घूम रहे हैं? क्या आप सोचते हैं कि बेलारूस की फिक्र करने वाले आप अकेले हैं? और वैसे भी जान लें, कि लोगों को किसी न किसी वजह से मरना ही पड़ता है। धूम्रपान से, या वाहन दुर्घटना से या फिर आत्महत्या से।"


नताल्या आरसेनयेव्ना रोस्लोवा, चेर्नोबिल के बच्चों के लिए गठित मोगिलेव वीमेन्स कमेटी की प्रमुख


वो महान साम्राज्य चूर चूर हुआ और ढह गया। पहले अफगानिस्तान और फिर चेर्नोबिल। जब वो गिरा, तो हम सबने खुद को अकेला महसूस किया। मैं ये कहने से डरती हूँ, लेकिन हम चेर्नोबिल से प्यार करते हैं। उससे हमारे जिंदगी में मानी पैदा होते हैं। हमारी तकलीफ के मायने। युद्ध की तरह। दुनिया को हमारे वजूद के बारे में चेर्नोबिल के बाद पता चला। हम इसके शिकार हैं लेकिन इसके पुजारी भी हैं। ये कहने से डर लगता है, लेकिन बात यही है।


और ये एक खेल की तरह है, एक शोर जैसा। मैं मानवीय मदद के एक काफिले के साथ हूँ और कुछ विदेशियों के साथ जो ये मदद लेकर पहुँचे हैं। भले ही ईसा के नाम पर या किसी और बहाने। और बाहर, कीचड़ में और मिट्टी में, अपने कोट और अपने दस्तानों में मेरा कबीला है। अपने सस्ते बूटों में। और अचानक मेरे भीतर एक बेरहम और घिनौनी इच्छा आती है। मैं आपको कुछ दिखाऊँगी, मैं कहती हूँ। ऐसा आप अफ्रीका में कभी नहीं देखेंगें। ऐसा आप कहीं नहीं देखेंगे। दो सौ तरकारियाँ, तीन सौ तरकारियाँ।


(रूसी से कीथ गैसन के अनुवाद का रूपांतर , द पेरिस रिव्यू से साभार)


रानी केतकी की कहानी


सैयद इंशा अल्ला खां


 


यह वह कहानी है कि जिसमें हिंदी छुट।


और न किसी बोली का मेल है न पुट॥


सिर झुकाकर नाक रगडता हूं उस अपने बनानेवाले के सामने जिसने हम सब को बनाया और बात में वह कर दिखाया कि जिसका भेद किसी ने न पाया। आतियां जातियां जो साँ सें हैं, उसके बिन ध्यान यह सब फाँ से हैं। यह कल का पुतला जो अपने उस खिलाडी की सुध रक्खे तो खटाई में क्यों पडे और कडवा कसैला क्यों हो। उस फल की मिठाई चक्खे जो बडे से बडे अगलों ने चक्खी है। देखने को दो आँखें दीं ओर सुनने को दो कान। नाक भी सब में ऊँची कर दी मरतों को जी दान।। मिट्टी के बसान को इतनी सकत कहाँ जो अपने कुम्हार के करतब कुछ ताड सके। सच हे, जो बनाया हुआ हो, सो अपने बनाने वाले को क्या सराहे और क्या कहें। यों जिसका जी चाहे, पडा बके। सिर से लगा पांव तक जितने रोंगटे हैं, जो सबके सब बोल उठें और सराहा करें और उतने बरसों उसी ध्यान में रहें जितनी सारी नदियों में रेत और फूल फलियां खेत में हैं, तो भी कुछ न हो सके, कराहा करें। इस सिर झुकाने के साथ ही दिन रात जपता हूं उस अपने दाता के भेजे हुए प्यारे को जिसके लिए यों कहा है- जो तू न होता तो मैं कुछ न बनाता; और उसका चचेरा भाई जिसका ब्याह उसके घर हुआ, उसकी सुरत मुझे लगी रहती है। मैं फूला अपने आप में नहीं समाता, और जितने उनके लडके वाले हैं, उन्हीं को मेरे जी में चाह है। और कोई कुछ हो, मुझे नहीं भाता। मुझको उम्र घराने छूट किसी चोर ठग से क्या पडी! जीते और मरते आसरा उन्हीं सभों का और उनके घराने का रखता हूं तीसों घडी। डौल डाल एक अनोखी बात का एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिंदणी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो। अपने मिलने वालों में से एक कोई पढे-लिखे, पुराने-धुराने, डाँग, बूढे धाग यह खटराग लाए। सिर हिलाकर, मुंह थुथाकर, नाक भी चढाकर आंखें फिराकर लगे कहने - यह बात होते दिखाई नहीं देती। हिंदणीपन भी निकले और भाखापन भी न हो। बस जैसे भले लोग अच्छे आपस में बोलते चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँह किसी की न हो, यह नहीं होने का। मैंने उनकी ठंडी साँस का टहोका खाकर झुंझलाकर कहा - मैं कुछ ऐसा बढ-बोला नहीं जो राई को परबत कर दिखाऊं, जो मुझ से न हो सकता तो यह बात मुँह से क्यों निकलता? जिस ढब से होता, इस बखेडे को टालता। इस कहानी का कहने वाला यहाँ आपको जताता है और जैसा कुछ उसे लोग पुकारते हैं, कह सुनाता है। दहना हाथ मुँह फेरकर आपको जताता हूँ, जो मेरे दाता ने चाहा तो यह ताव-भाव, राव-चाव और कूंद-फाँद, लपट झपट दिखाऊँ जो देखते ही आपके ध्यान का घोडा, जो बिजली से भी बहुत चंचल अल्हडपन में है, हिरन के रूप में अपनी चौकडी भूल जाए। टुक घोडे पर चढ के अपने आता हूं मैं। करतब जो कुछ है, कर दिखाता हूं मैं॥ उस चाहने वाले ने जो चाहा तो अभी। कहता जो कुछ हूं। कर दिखाता हूं मैं॥ अब आप कान रख के, आँखें मिला के, सन्मुख होके टुक इधर देखिए, किस ढंग से बढ चलता हूं और अपने फूल के पंखडी जैसे होंठों से किस-किस रूप के फूल उगलता हूँ। कहानी के जीवन का उभार और बोलचाल की दुलहिन का सिंगार किसी देश में किसी राजा के घर एक बेटा था। उसे उसके माँ-बाप और सब घर के लोग कुंवर उदैभान करके पुकारते थे। सचमुच उसके जीवन की जोत में सूरज की एक स्त्रोत आ मिली थी। उसका अच्छापन और भला लगना कुछ ऐसा न था जो किसी के लिखने और कहने में आ सके। पंद्रह बरस भरके उसने सोलहवें में पाँव रक्खा था। कुछ यों ही सीमसें भीनती चली थीं। पर किसी बात के सोच का घर-घाट न पाया था और चाह की नदी का पाट उसने देखा न था। एक दिन हरियाली देखने को अपने घोडे पर चढ के अठखेल और अल्हड पन के साथ देखता भालता चला जाता था। इतने में जो एक हिरनी उसके सामने आई, तो उसका जी लोट पोट हुआ। उस हिरनी के पीछे सब छोड छाडकर घोडा फेंका। कोई घोडा उसको पा सकता था? जब सूरज छिप गया और हिरनी आँखों से ओझल हुई, तब तो कुंवर उदैभान भूखा, प्यासा, उनींदा, जै भाइयाँ, अँगडाइयाँ लेता, हक्का बक्का होके लगा आसरा ढूंढने। इतने में कुछ एक अमराइयां देख पडी, तो उधर चल निकला; तो देखता है वो चालीस-पचास रंडियां एक से एकजोबन में अगली झूला डाले पडी झूल रही हैं और सावन गातियां हैं। ज्यों ही उन्होंने उसको देखा - तू कौन? तू कौन? की चिंघाड सी पड गई। उन सभी में एक के साथ उसकी आँख लग गई।



कोई कहती थी यह उचक्का है। कोई कहती थी एक पक्का है। वही झूले वाली लाल जोडा पहने हुए, जिसको सब रानी केतकी कहते थीं, उसके भी जी में उसकी चाह ने घर किया। पर कहने-सुनने की बहुत सी नांह-नूह की और कहा - इस लग चलने को भला क्या कहते हैं! हक न धक, जो तुम झट से टहक पडे। यह न जाना, यह रंडियां अपने झूल रही हैं। अजी तुम तो इस रूप के साथ इस रव बेधडक चले आए हो, ठंडे ठंडे चले जाओ। तब कुंवर ने मसोस के मलीला खाके कहा - इतनी रुखाइयां न कीजिए। मैं सारे दिन का थका हुआ एक पेड की छांह में ओसका बचाव करके पडा रहूंगा। बडे तडके धुंधलके में उठकर जिधर को मुंह पडेगा चला जाऊंगा। कुछ किसी का लेता देता नहीं। एक हिरनी के पीछे सब लोगों को छोड छाड कर घोडा फेंका था। कोई घोडा उसको पा सकता था? जब तलक उजाला रहा उसके ध्यान में था। जब अंधेरा छा गया और जी बहुत घबरा गया, इन अमराइयों का आसरा ढूंढ कर यहां चला आया हूं। कुछ रोकटोक तो इतनी न थी जो माथा ठनक जाता और रुका रहता। सिर उठाए हां पता चला आया। क्या जानता था - वहां पदिमिनियां पडी झूलती पेंगे चढा रही हैं। पर यों बढी थी, बरसों मैं भी झूल करूंगा। यह बात सुनकर वह जो लाल जोडे वाली सबकी सिरधरी थी, उसने कहा - हाँ जी, बोलियां ठोलियां न मारो और इनको कह दो जहां जी चाहे, अपने पडे रहें, ओर जो कुछ खानेको मांगें, इन्हें पहुंचा दो। घर आए को आज तक किसी ने मार नहीं डाला। इनके मुंहका डौल, गाल तमतमाए और होंठ पपडाए, और घोडे का हांफना, ओर जी का कांपना और ठंडी सांसें भरना, और निढाल हो गिरे पडना इनको सच्चा करता है। बात बनाई हुई और सचौटी की कोई छिपती नहीं। पर हमारे इनके बीच कुछ ओट कपडे लत्ते की कर दो। इतना आसरा पाके सबसे परे जो कोने में पांच सात पौदे थे, उनकी छांव में कुंवर उदैभान ने अपना बिछौना किया और कुछ सिरहाने धरकर चाहता था कि सो रहें, पर नींद कोई चाहत की लगावट में आती थी? पडा पडा अपने जी से बातें कर रहा था। जब रात सांय-सांय बोलने लगी और साथ वालियां सब सो रहीं, रानी केतकी ने अपनी सहेली मदनबान को जगाकर यों कहा - अरी ओ! तूने कुछ सुना है? मेरा जी उस पर आ गया है; और किसी डौल से थम नहीं सकता। तू सब मेरे भेदों को जानती है। अब होनी जो हो सो हो; सिर रहता रहे, जाता जाय। मैं उसके पास जाती हूं। तू मेरे साथ चल। पर तेरे पांवों पडती हूं कोई सुनने न पाए। अरी यह मेरा जोडा मेरे और उसके बनाने वाले ने मिला दिया। मैं इसी जी में इस अमराइयों में आई थी। रानी केतकी मदनबान का हाथ पकडे हुए वहां आन पहुंची, जहां कुंवर उदैभान लेटे हुए कुछ-कुछ सोच में बड-बडा रहे थे। मदनबान आगे बढके कहने लगी - तुम्हें अकेला जानकर रानी जी आप आई हैं। कुंवर उदैभान यह सुनकर उठ बैठे और यह कहा - क्यों न हो, जी को जी से मिलाप है? कुंवर और रानी दोनों चुपचाप बैठे; पर मदनबान दोनों को गुदगुदा रही थी। होते होते रानी का वह पता खुला कि राजा जगतपरकास की बेटी है और उनकी मां रानी कामलता कहलाती है। उनको उनके मां बाप ने कह दिया है - एक महीने अमराइयों में जाकर झूल आया करो। आज वहीं दिन था; सो तुमसे मुठभेड हो गई। बहुत महाराजों के कुंवरों से बातें आई, पर किसी पर इनका ध्यान न चढा। तुम्हारे धन भाग जो तुम्हारे पास सबसे छुपके, मैं जो उनके लडकपन की गोइयां हूं। मुझे अपने साथ लेके आई है। अब तुम अपनी बीती कहानी कहो - तुम किस देस के कौन हो। उन्होंने कहा - मेरा बाप राजा सूरजभान और मां रानी लक्ष्मीबास हैं। आपस में जो गठजोड हो जाय तो कुछ अनोखी, अचरज और अचंभे की बात नहीं। यों ही आगे से होता चला आया है। जैसा मुँह वैसा थप्पड। जोड तोड टटोल लेते हैं। दोनों महाराजों को यह चितचाही बात अच्छी लगेगी, पर हम तुम दोनों के जी का गठजोड चाहिए। इसी में मदनबान बोल उठी - सो तो हुआ। अपनी अपनी अंगूठियां हेरफेर कर लो और आपस में लिखौती लिख दो। फिर कुछ हिचर-मिचर न रहे। कुंवर उदैभान ने अपनी अंगूठी रानी केतकी को पहना दी और रानी ने भी अपनी अंगूठी कुंवर की उंगली में डाल दी और एक धीमी सी चुटकी भी ले ली। इसमें मदनबाल बोली जो सच पूछा तो इतनी भी बहुत हुई। मेरे सिर चोट है। इतना बढ चलना अच्छा नहीं। अब उठ चलो और इनको सोने दो; और रोएं तो पडे रोने दो। बातचीत तो ठीक हो चुकी। पिछले पहर से रानी तो अपनी सहेलियों को लेके जिधर से आई थी, उधर को चली गई और कुंवर उदैभान अपने घोडे की पीठ लगाकर अपने लोगों से मिलके अपने घर पहुँचे।



कुंवर ने चुपके से यह कहला भेजा - अब मेरा कलेजा टुकडे-टुकडे हुए जाता है। दोनों महाराजाओं को आपस में लडने दो। किसी डौल से जो हो सके, तो मुझे अपने पास बुला लो। हम तुम मिलके किसी और देस निकल चलें; होनी हो सो हो, सिर रहता रहे, जाता जाय। एक मालिन, जिसको फूलकली कर सब पुकारते थे, उसने उस कुंवर की चिट्ठी किसी फूल की पंखडी में लपेट लपेट कर रानी केतकी तक पहुंचा दी। रानी ने उस चिट्ठी को अपनी आंखों से लगाया और मालिन को एक थाल भरके मोती दिए; और उस चिट्ठी की पीठ पर अपने मुंह की पीक से यह लिखा -ऐ मेरे जी के ग्राहक, जो तू मुझे बोटी बोटी कर चील-कौवों को दे डाले, तो भी मेरी आंखों चैन और कलेजे सुख हो। पर यह बात भाग चलने की अच्छी नहीं।


 


इसमें एक बाप-दादे के चिट लग जाती है; अब जब तक मां बाप जैसा कुछ होता चला आता है उसी डोल से बेटे-बेटी को किसी पर पटक न मारें और सिर से किसी के चेपक न दें, तब तक यह एक जो तो क्या, जो करोड जी जाते रहें तो कोई बात हैं रुचती नहीं। यह चिट्ठी जो बिस भरी कुंवर तक जा पहुंची, उस पर कई एक थाल सोने के हीरे, मोती, पुखराज के खचाखच भरे हुए निछावर करके लुटा देता है। और जितनी उसे बेचैनी थी, उससे चौगुनी पचगुनी हो जाती है और उस चिट्ठी को अपने उस गोरे डंड पर बांध लेता है। आना जोगी महेंदर गिर का कैलास पहाड पर से और कुंवर उदैभान और उसके मां-बाप को हिरनी हिरन कर डालना जगतपरकास अपने गुरू को जो कैलाश पहाड पर रहता था, लिख भेजता है- कुछ हमारी सहाय कीजिए। महाकठिन बिपताभार हम पर आ पडी है। राजा सूरजभान को अब यहां तक वाव बॅ हक ने लिया है, जो उन्होंने हम से महाराजों से डौल किया है। सराहना जोगी जी के स्थान का कैलास पहाड जो एक डौल चाँदी का है, उस पर राजा जगतपरकास का गुरू, जिसको महेंदर गिर सब इंदरलोक के लाग कहते थे, ध्यान ज्ञान में कोई 90 लाख अतीतों के साथ ठाकुर के भजन में दिन रात लगा रहता था। सोना, रूपा, तां बे, रॉगे का बनाना तो क्या और गुटका मुंह में लेकर उड ना परे रहे, उसको और बातें इस इस ढब की ध्यान में थीं जो कहने सुनने से बाहर हैं। मेंह सोने रूपे का बरसा देना और जिस रूप में चाहना हो जाना, सब कुछ उसके आगे खेल था। गाने बजाने में महादेव जी छूट सब उसके आगे कान पकडते थे। सरस्वती जिसकी सब लोग कहते थे, उनने भी कुछ कुछ गुनगुनाना उसी से सीखा था। उसके सामने छ: राग छत्तीस रागिनियां आठ पहर रूप बंदियों का सा धरे हुए उसकी सेवा में सदा हाथ जोडे खडी रहती थीं। और वहां अतीतों को गिर कहकर पुकारते थे-भैरोगिर, विभासगिर, हिंडोलगिर, मेघनाथ, केदारनाथ, दीपकसेन, जोतिसरूप सारंगरूप। और अतीतिनें उस ढब से कहलाती थीं-गुजरी, टोडी, असावरी, गौरी, मालसिरी, बिलावली। जब चाहता, अधर में सिधासन पर बैठकर उडाए फिरता था और नब्बे लाख अतीत गुटके अपने मुंह में लिए, गेरूए वस्तर पहने, जटा बिखेरे उसके साथ होते थे। जिस घडी रानी केतकी के बाप की चिट्ठी एक बगला उसके घर पहुंचा देता है, गुरु महेंदर गिर एक चिग्घाड मारकर दल बादलों को ढलका देता है। बघंबर पर बैठे भभूत अपने मुंह से मल कुछ कुछ पढंत करता हुआ बाण घोडे भी पीठ लगा और सब अतीत मृगछालों पर बैठे हुए गुटके मुंह में लिए हुए बोल उठे - गोरख जागा और मुंछदर जागाऔर मुंछदर भागा। एक आंख की झपक में वहां आ पहुंचता है जहां दोनों महाराजों में लडाई हो रही थी। पहले तो एक काली आंधी आई; फिर ओले बरसे; फिर टिड्डी आई। किसी को अपनी सुध न रही। राजा सूरजभान के जितने हाथी घोडे और जितने लोग और भीडभाड थी, कुछ न समझा कि क्या किधर गई और उन्हें कौन उठा ले गया। राजा जगत परकास के लोगों पर और रानी केतकी के लोगों पर क्योडे की बूंदों की नन्हीं-नन्हीं फुहार सी पडने लगी। जब यह सब कुछ हो चुका, तो गुरुजी ने अतीतियों से कहा - उदैभान, सूरजभान, लछमीबास इन तीनों को हिरनी हिरन बना के किसी बन में छोड दो; और जो उनके साथी हों, उन सभों को तोड फोड दो। जैसा गुरुजी ने कहा, झटपट वही किया। विपत का मारा कुंवर उदैभान और उसका बाप वह राजा सूरजभान और उनकी मां लछमीबास हिरन हिरनी बन गए। हरी घास कई बरस तक चरते रहे; और उस भीड भाड का तो कुछ थल बेडा न मिला, किधर गए और कहां थे बस यहां की यहीं रहने दो। फिर सुनो। अब रानी केतकी के बाप महाराजा जगतपरकास की सुनिए। उनके घर का घर गुरु जी के पांव पर गिरा और सबने सिर झुकाकर कहा - महाराज, यह आपने बडा काम किया। हम सबको रख लिया। जो आप न पहुंचते तो क्या रहा था। सबने मर मिटने की ठान ली थी।



महाराज ने कहा - भभूत तो क्या, मुझे अपना जी भी उससे प्यारा नहीं। मुझे उसके एक पहर के बहल जाने पर एक जी तो क्या जो करोर जी हों तो दे डालें। रानी केतकी को डिबिया में से थोडा सा भभूत दिया। कई दिन तलक भी आंख मिचौवल अपने माँ-बाप के सामने सहेलियों के साथ खेलती सबको हँसाती रही, जो सौ सौ थाल मोतियों के निछावर हुआ किए, क्या कहूँ, एक चुहल थी जो कहिए तो करोडों पोथियों में ज्यों की त्यों न आ सके। रानी केतकी का चाहत से बेकल होना और मदन बान का साथ देने से नहीं करना। एक रात रानी केतकी उसी ध्यान में मदनबान से यों बोल उठी-अब मैं निगोडी लाज से कुट करती हूँ, तू मेरा साथ दे। मदनबान ने कहा-क्यों कर? रानी केतकी ने वह भभूत का लेना उसे बताया और यह सुनाया यह सब आँख-मिचौवल के झाई झप्पे मैंने इसी दिन के लिये कर रखे थे। मदनबान बोली-मेरा कलेजा थरथराने लगा। अरी यह माना जो तुम अपनी आँखों में उस भभूत का अंजन कर लोगी और मेरे भी लगा दोगी तो हमें तुम्हें कोई न देखेगा। और हम तुम सबको देखेंगी। पर ऐसी हम कहाँ जी चली हैं। जो बिन साथ, जोबन लिए, बन-बन में पडी भटका करें और हिरनों की सींगों पर दोनों हाथ डालकर लटका करें, और जिसके लिए यह सब कुछ है, सो वह कहाँ? और होय तो क्या जाने जो यह रानी केतकी है और यह मदनबान निगोडी नोची खसोटी उजडी उनकी सहेली है। चूल्हे और भाड में जाय यह चाहत जिसके लिए आपकी माँ-बाप को राज-पाट सुख नींद लाज छोड कर नदियों के कछारों में फिरना पडे, सो भी बेडौल। जो वह अपने रूप में होते तो भला थोडा बहुत आसरा था। ना जी यह तो हमसे न हो सकेगा। जो महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता का हम जान-बूझकर घर उजाडें और इनकी जो इकलौती लाडली बेटी है, उसको भगा ले जायें और जहाँ तहाँ उसे भटकावें और बनासपत्ति खिलावें और अपने घोडें को हिलावें। जब तुम्हारे और उसके माँ बाप में लडाई हो रही थी और उनने उस मालिन के हाथ तुम्हें लिख भेजा था जो मुझे अपने पास बुला लो, महाराजों को आपस में लडने दो, जो होनी हो सो हो; हम तुम मिलके किसी देश को निकल चलें; उस दिन समझीं। तब तो वह ताव भाव दिखाया। अब जो वह कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप तीनों जी हिरनी हिरन बन गए। क्या जाने किधर होंगे। उनके ध्यान पर इतनी कर बैठिए जो किसी ने तुम्हारे घराने में न की, अच्छी नहीं। इस बात पर पानी डाल दो; नहीं तो बहुत पछताओगी और अपना किया पाओगी। मुझसे कुछ न हो सकेगा। तुम्हारी जो कुछ अच्छी बात होती, तो मेरे मुँह से जीते जी न निकलता। पर यह बात मेरे पेट में नहीं पच सकती। तुम अभी अल्हड हो। तुमने अभी कुछ देखा नहीं। जो ऐसी बात पर सचमुच ढलाव देखूँगी तो तुम्हारे बाप से कहकर यह भभूत जो बह गया निगोडा भूत मुछंदर का पूत अवधूत दे गया है, हाथ मुरकवाकर छिनवा लूँगी। रानी केतकी ने यह रूखाइयाँ मदनबान की सुन हँ सकर टाल दिया और कहा-जिसका जी हाथ में न हो, उसे ऐसी लाखों सूझती है; पर कहने और करने में बहुत सा फेर है। भला यह कोई अँधेर है जो माँ बाप, रावपाट, लाज छोड कर हिरन के पीछे दौडती करछालें मारती फिरूँ। पर अरी ते तो बडी बावली चिडिया है जो यह बात सच जानी और मुझसे लडने लगी। रानी केतकी का भभूत लगाकर बाहर निकल जाना और सब छोटे बडों का तिलमिलाना दस पन्द्रह दिन पीछे एक दिन रानी केतकी बिन कहे मदनबान के वह भभूत आँखों में लगा के घर से बाहर निकल गई। कुछ कहने में आता नहीं, जो मां-बाप पर हुई। सबने यह बात ठहराई, गुरूजी ने कुछ समझकर रानी केतकी को अपने पास बुला लिया होगा। महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता राजपाट उस वियोग में छोड छाड के पहाड की चोटी पर जा बैठे और किसी को अपने आँखों में से राज थामने को छोड गए। बहुत दिनों पीछे एक दिन महारानी ने महाराज जगतपरकास से कहा-रानी केतकी का कुछ भेद जानती होगी तो मदनबान जानती होगी। उसे बुलाकर तो पूँछो। महाराज ने उसे बुलाकर पूछा तो मदनबान ने सब बातें खोलियाँ। रानी केतकी के माँ बाप ने कहा-अरी मदनबान, जो तू भी उसके साथ होती तो हमारा जी भरता। अब तो वह तुझे ले जाये तो कुछ हचर पचर न कीजियो, उसको साथ ही लीजियो। जितना भभूत है, तू अपने पास रख। हम कहाँ इस राख को चूल्हें में डालेंगे। गुरूजी ने तो दोनों राज का खोज खोया-कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप दोनों अलग हो रहे। जगतपरकास और कामलता को यों तलपट किया। भभूत न होत तो ये बातें काहे को सामने आती। मदनबान भी उनके ढूँढने को निकली। अंजन लगाए हुए रानी केतकी रानी केतकी कहती हुई पडी फिरती थी।



फुनगे से लगा जड तलक जितने झाड झंखाडों में पत्ते और पत्ती बँधी थीं, उनपर रूपहरी सुनहरी डाँक गोंद लगाकर चिपका दिया और सबों को कह दिया जो सही पगडी और बागे बिन कोई किसी डौल किसी रूप से फिर चले नहीं। और जितने गवैये, बजवैए, भांड-भगतिए रहस धारी और संगीत पर नाचने वाले थे, सबको कह दिया जिस जिस गाँव में जहाँ हों अपनी अपनी ठिकानों से निकलकर अच्छे-अच्छे बिछौने बिछाकर गाते-नाचते घूम मचाते कूदते रहा करें। ढूँढना गोसाई महेंदर गिर का कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप को, न पाना और बहुत तलमलाना यहाँ की बात और चुहलें जो कुछ है, सो यहीं रहने दो। अब आगे यह सुनो। जोगी महेंदर और उसके 90 लाख जतियों ने सारे बन के बन छान मारे, पर कहीं कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप का ठिकाना न लगा। तब उन्होंने राजा इंदर को चिट्ठी लिख भेजी। उस चिट्ठी में यह लिखा हुआ था-इन तीनों जनों को हिरनी हिरन कर डाला था। अब उनको ढूँढता फिरता हूँ। कहीं नहीं मिलते और मेरी जितनी सकत थी, अपनी सी बहुत कर चुका हूं। अब मेरे मुंह से निकला कुँवर उदैभान मेरा बेटा मैं उसका बाप और ससुराल में सब ब्याह का ठाट हो रहा है। अब मुझपर विपत्ति गाढी पडी जो तुमसे हो सके, करो। राजा इंदर चिट्ठी का देखते ही गुरू महेंदर को देखने को सब इंद्रासन समेट कर आ पहुँचे और कहा-जैसा आपका बेटा वैसा मेरा बेटा। आपके साथ मैं सारे इंद्रलोक को समेटकर कुँवर उदैभान को ब्याहने चढूँगा। गोसाई महेंदर गिर ने राजा इंद से कहा-हमारी आपकी एक ही बात है, पर कुछ ऐसा सुझाइए जिससे कुँवर उदैभान हाथ आ जावे।


 


राजा इंदर ने कहा-जितने गवैए और गायनें हैं, उन सबको साथ लेकर हम और आप सारे बनों में फिरा करें। कहीं न कहीं ठिकाना लग जाएगा। गुरू ने कहा-अच्छा। हिरन हिरनी का खेल बिगडना और कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप का नए सिरे से रूप पकड ना एक रात राजा इंदर और गोसाई महेंदर गिर निखरी हुई चाँदनी में बैठे राग सुन रहे थे, करोडों हिरन राग के ध्यान में चौकडी भूल आस पास सर झुकाए खडे थे। इसी में राजा इंदर ने कहा-इन सब हिरनों पर पढ के मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ के एक छींटा पानी का दो। क्या जाने वह पानी कैसा था। छीटों के साथ ही कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जनें हिरनों का रूप छोड कर जैसे थे वैसे हो गए। गोसाई महेंदर गिर और राजा इंदर ने उन तीनों को गले लगाया और बडी आवभगत से अपने पास बैठाया और वही पानी घडा अपने लोगों को देकर वहाँ भेजवाया जहाँ सिर मुंडवाते ही ओले पडे थे। राजा इंदर के लोगों ने जो पानी की छीटें वही ईश्वरोवाच पढ के दिए तो जो मरे थे सब उठ खडे हुए; और जो अधमुए भाग बचे थो, सब सिमट आए। राजा इंदर और महेंदर गिर कुँवर उदैभान और राजा सूरजभान और रानी लक्ष्मीबास को लेकर एक उड न-खटोलो पर बैठकर बडी धूमधाम से उनको उनके राज पर बिठाकर ब्याह का ठाट करने लगे। पसेरियन हीरे-मोती उन सब पर से निछावर हुए। राजा सूरजभान और कुँवर उदैभान और रानी लछमीबास चितचाही असीस पाकर फूली न समाई और अपने सो राज को कह दिया-जेवर भोरे के मुंह खोल दो। जिस जिस को जो जा उकत सूझे, बोल दो। आज के दिन का सा कौन सा दिन होगा। हमारी आँखों की पुतलियों से जिससे चैन हैं, उस लाडले इकलौते का ब्याह और हम तीनों का हिरनों के रूप से निकलकर फिर राज पर बैठना। पहले तो यह चाहिए जिन जिन की बेटियाँ बिन ब्याहियाँ हों, उन सब को उतना कर दो जो अपनी जिस चाव चीज से चाहें; अपनी गुडियाँ सँवार के उठावें; और तब तक जीती रहें, सब की सब हमारे यहाँ से खाया पकाया रींधा करें। और सब राज भर की बेटियाँ सदा सुहागनें बनी रहें और सूहे रातें छुट कभी कोई कुछ न पहना करें और सोने रूपे के केवाड गंगाजमुनी सब घरों में लग जाएँ और सब कोठों के माथे पर केसर और चंदन के टीके लगे हों। और जितने पहाड हमारे देश में हों, उतने ही पहाड सोने रूपे के आमने सामने खडे हो जाएँ और सब डाँगों की चोटियाँ मोतियों की माँग ताँगे भर जाएँ; और फूलों के गहने और बँ धनवार से सब झाड पहाड लदे फँदे रहें; और इस राज से लगा उस राज तक अधर में छत सी बाँध दो। और चप्पा चप्पा कहीं ऐसा न रहें जहाँ भीड भडक्का धूम धडक्का न हो जाय। फूल बहुत सारे बहा दो जो नदियाँ जैसे सचमुच फूल की बहियाँ हैं यह समझा जाय। और यह डौल कर दो, जिधर से दुल्हा को ब्याहने चढे सब लाड ली और हीरे पन्ने पोखराज की उमड में इधर और उधर कबैल की टट्टियाँ बन जायँ और क्यारियाँ सी हो जायें जिनके बीचो बीच से हो निकलें। और कोई डाँग और पहाडी तली का चढाव उतार ऐसा दिखाई न दे जिसकी गोद पंखुरियों से भरी हुई न हों।



इस धूमधाम के साथ कुँवर उदैभान सेहरा बाँधे दूल्हन के घर तक आ पहुँचा और जो रीतें उनके घराने में चली आई थीं, होने लगियाँ। मदनबान रानी केतकी से ठठोली करके बोली-लीजिए, अब सुख समेटिए, भर भर झोली। सिर निहुराए, क्या बैठी हो, आओ न टुक हम तुम मिल के झरोखों से उन्हें झाँकें। रानी केतकी ने कहा-न री, ऐसी नीच बातें न कर। हमें ऐसी क्या पडी जो इस घडी ऐसी झेल कर रेल पेल ऐसी उठें और तेल फुलेल भरी हुई उनके झाँकने को जा खडी हों। बदनबान उसकी इस रूखाई को उड नझाई की बातों में डालकर बोली- बोलचाल मदनबान की अपनी बोली के दोनों में- यों तो देखो वाछडे जी वा छडे जी वा छडे। हम से जो आने लगी हैं आप यों मुहरे कडे॥ छान मारे बन के बन थे आपने जिनके लिये। वह हिरन जीवन के मद में हैं बने दूल्हा खडे॥ तुम न जाओ देखने को जो उन्हें क्या बात है। ले चलेंगी आपको हम हैं इसी धुन पर अडे। है कहावत जी को भावै और यों मुडिया हिले। झांकने के ध्यान में उनके हैं सब छोटे बडे।। साँस ठंडी भरके रानी केतकी बोली कि सच। सब तो अच्छा कुछ हुआ पर अब बखेडे में पडे॥ वारी फेरी होना मदनबान का रानी केतकी पर और उसकी बास सूँघना और उनींदे पन से ऊंघना उस घडी मदनबान को रानी केतकी का बादले का जूडा और भीना भीनापन और अँखडियों का लजाना और बिखरा बिखरा जाना भला लग गया, तो रानी केतकी की बास सँूघने लगी और अपनी आँखों को ऐसा कर लिया जैसे कोई ऊँघने लगता है। सिर से लगा पाँव तक वारी फेरी होके तलवे सुहलाने लगी। तब रानी केतकी झट एक धीमी सी सिसकी लचके के साथ ले ऊठी : मदनबान बोली-मेरे हाथ के टहोके से, वही पांव का छाला दुख गया होगा जो हिरनों की ढूँढने में पड गया था। इसी दु:ख की चुटकी से रानी केतकी ने मसोस कर कहा-काटा अडा तो अडा, छाला पडा तो पडा, पर निगोडी तू क्यों मेरी पनछाला हुई। सराहना रानी केतकी के जोबन का केतकी का भला लगना लिखने पढने से बाहर है। वह दोनों भैवों का खिंचावट और पुतलियों में लाज की समावट और नुकीली पलकों की रूँ धावट हँसी की लगावट और दंतडियों में मिस्सी की ऊदाहट और इतनी सी बात पर रूकावट है। नाक और त्योरी का चढा लेना, सहेलियों को गालियाँ देना और चल निकलना और हिरनों के रूप में करछालें मारकर परे उछलना कुछ कहने में नहीं आता। सराहना कुँवर जी के जोबन का कुँवर उदैभान के अच्छेपन का कुछ हाल लिखना किससे हो सके। हाय रे उनके उभार के दिनों का सुहानापन, चाल ढाल का अच्छन बच्छन, उठती हुई कोंपल की काली फबन और मुखडे का गदराया हुआ जोबन जैसे बडे तड के धुंधले के हरे भरे पहाडों की गोद से सूरज की किरनें निकल आती हैं। यही रूप था। उनकी भींगी मसों से रस टपका पडता था। अपनी परछाँई देखकर अकडता जहाँ जहाँ छाँव थी, उसका डौल ठीक ठीक उनके पाँव तले जैसे धूप थी। दूल्हा का सिंहासन पर बैठना दूल्हा उदैभान सिंहासन पर बैठा और इधर उधर राजा इंदर और जोगी महेंदर गिर जम गए और दूल्हा का बाप अपने बेटे के पीछे माला लिये कुछ गुनगुनाने लगा। और नाच लगा होने और अधर में जो उड न खटोले राजा इंदर के अखाडे के थे। सब उसी रूप से छत बाँधे थिरका किए। दोनों महारानियाँ समधिन बन के आपस में मिलियाँ चलियाँ और देखने दाखने को कोठों पर चन्दन के किवाडों के आड तले आ बैठियाँ। सर्वाग संगीत भँड ताल रहस हँसी होने लगी। जितनी राग रागिनियाँ थीं, ईमन कल्यान, सुध कल्यान झिंझोटी, कन्हाडा, खम्माच, सोहनी, परज, बिहाग, सोरठ, कालंगडा, भैरवी, गीत, ललित भैरी रूप पकडे हुए सचमुच के जैसे गाने वाले होते हैं, उसी रूप में अपने अपने समय पर गाने लगे और गाने लगियाँ। उस नाच का जो ताव भाव रचावट के साथ हो, किसका मुंह जो कह सके। जितने महाराजा जगतपरकास के सुखचैन के घर थे, माधो बिलास, रसधाम कृष्ण निवास, मच्छी भवन, चंद भवन सबके सब लप्पे लपेटे और सच्ची मोतियों की झालरें अपनी अपनी गाँठ में समेटे हुए एक भेस के साथ मतवालों के बैठनेवालों के मुँह चूम रहे थे।



पर कुंवर जी का रूप क्या कहूं। कुछ कहने में नहीं आता। न खाना, न पीना, न मग चलना, न किसी से कुछ कहना, न सुनना। जिस स्थान में थे उसी में गुथे रहना और घडी-घडी कुछ सोच सोच कर सिर धुनना। होते-होते लोगों में इस बात का चरचा फैल गई। किसी किसी ने महाराज और महारानी से कहा - कुछ दाल में काला है। वह कुंवर बुरे तेवर और बेडौल आंखें दिखाई देती हैं। घर से बाहर पांव नहीं धरना। घरवालियां जो किसी डौल से बहलातियां हैं, तो और कुछ नहीं करना, ठंडी ठंडी सांसें भरता है। और बहुत किसी ने छेडा तो छपरखट पर जाके अपना मुंह लपेट के आठ आठ आंसू पडा रोता है। यह सुनते ही कुंवर उदैभान के माँ-बाप दोनों दौड आए। गले लगाया, मुंह चूम पांच पर बेटे के गिर पडे हाथ जोडे और कहा - जो अपने जी की बात है सो कहते क्यों नहीं? क्या दुखडा है जो पडे-पडे कहराते हो? राज-पाट जिसको चाहो दे डालो। कहो तो क्या चाहते हो? तुम्हारा जी क्यों नहीं लगता? भला वह क्या है जो नहीं हो सकता? मुंह से बोलो जी को खोलो। जो कुछ कहने से सोच करते हों, अभी लिख भेजो। जो कुछ लिखोगे, ज्यों की त्यों करने में आएगी। जो तुम कहो कुंए में गिर पडो, तो हम दोनों अभी गिर पडते हैं। कहो - सिर काट डालो, तो सिर अपने अभी काट डालते हैं। कुंवर उदैभान, जो बोलते ही न थे, लिख भेजने का आसरा पाकर इतना बोले - अच्छा आप सिधारिए, मैं लिख भेजता हूं। पर मेरे उस लिखे को मेरे मुंह परकिसी ढब से न लाना। इसीलिए मैं मारे लाज के मुखपाट होके पडा था और आपसे कुछ न कहना था। यह सुनकर दोनों महाराज और महारानी अपने स्थान को सिधारे। तब कुंवर ने यह लिख भेजा - अब जो मेरा जी होंठों पर आ गया और किसी डौल न रहा गया और आपने मुझे सौ-सौ रूप से खोल और बहुत सा टटोला, तब तो लाज छोड के हाथ जोड के मुंह फाड के घिघिया के यह लिखता हूं- चाह के हाथों किसी को सुख नहीं। है भला वह कौन जिसको दुख नहीं॥ उस दिन जो मैं हरियाली देखने को गया था, एक हिरनी मेरे सामने कनौतियां उठाए आ गई। उसके पीछे मैंने घोडा बगछुट फेंका। जब तक उजाला रहा, उसकी धुन में बहका किया। जब सूरज डूबा मेरा जी बहुत ऊबा। सुहानी सी अमराइयां ताड के मैं उनमें गया, तो उन अमराइयों का पत्ता-पत्त्ता मेरे जी का गाहक हुआ। वहां का यह सौहिला है। कुछ रंडियां झूला डाले झूल रही थीं। उनकी सिरधरी कोई रानी केतकी महाराज जगतपरकास की बेटी हैं। उन्होंने यह अंगूठी अपनी मुझे दी और मेरी अंगूठी उन्होंने ले ली और लिखौट भी लिख दी। सो यह अंगूठी लिखौट समेत मेरे लिखे हुए के साथ पहुंचती है। अब आप पढ लीजिए। जिसमें बेटे का जी रह जाय, सो कीजिए। महाराज और महारानी ने अपने बेटे के लिखे हुए पर सोने के पानी से यों लिखा - हम दोनों ने इस अंगूठी और लिखौट को अपनी आंखों से मला। अब तुम इतने कुछ कुढो पचो मत। जो रानी केतकी के मां बाप तुम्हारी बात मानते हैं, तो हमारे समधी और समधिन हैं। दोनों राज एक हो जाएंगे। और जो कुछ नांह - नूंह ठहरेगी तो जिस डौल से बन आवेगा, ढाल तलवार के बल तुम्हारी दुल्हन हम तुमसे मिला देंगे। आज से उदास मत रहा करो। खेलो, कूदो, बोलो चालो, आनंदें करो। अच्छी घडी- शुभ मुहूरत सोच के तुम्हारी ससुराल में किसी ब्राह्मन को भेजते हैं; जो बात चीत चाही ठीक कर लावे और शुभ घडी शुभ मुहूरत देख के रानी केतकी के मां-बाप के पास भेजा। ब्राह्मन जो शुभ मुहूरत देखकर हडबडी से गया था, उस पर बुरी घडी पडी। सुनते ही रानी केतकी के मां-बाप ने कहा - हमारे उनके नाता नहीं होने का।



उनके बाप-दादे हमारे बाप दादे के आगे सदा हाथ जोडकर बातें किया करते थे और दो टुक जो तेवरी चढी देखते थे, बहुत डरते थे। क्या हुआ, जो अब वह बढ गए, ऊंचे पर चढ गए। जिनके माथे हम न बाएं पांव के अंगूठे से टीका लगावें, वह महाराजों का राजा हो जावे। किसी का मुंह जो यहबात हमारे मुंह पर लावे! ब्राह्मण ने जल-भुन के कहा - अगले भी बिचारे ऐसे ही कुछ हुए हैं। राजा सूरजभान भी भरी सभा में कहते थे - हममें उनमें कुछ गोत का तो मेल नहीं। यह कुंवर की हठ से कुछ हमारी नहीं चलती। नहीं तो ऐसी ओछी बातें कब हमारे मुंह से निकलती। यह सुनते ही उन महाराज ने ब्राह्मन के सिर पर फूलों की चंगेर फेंक मारी और कहा - जो ब्राह्मण की हत्या का धडका न होता तो तुझको अभी चक्की में दलवा डालता। और अपने लोगों से कहा- इसको ले जाओ और ऊपर एक अंधेरी कोठरी में मूंद रक्खो। जो इस ब्राह्मन पर बीती सो सब उदैभान ने सुनी। सुनते ही लडने के लिए अपना ठाठ बांध के भादों के दल बादल जैसे घिर आते हैं, चढ आया। जब दोनों महाराजों में लडाई होने लगी, रानी केतकी सावन-भादों के रूप रोने लगी; और दोनों के जी में यह आ गई - यह कैसी चाहत जिसमें लोह बरसने लगा और अच्छी बातों को जी तरसने लगा।



इन पापियों से कुछ न चलेगी, यह जानते थे। राजपाट हमारा अब निछावर करके जिसको चाहिए, दे डालिए; राज हम से नहीं थम सकता। सूरजभान के हाथ से आपने बचाया। अब कोई उनका चचा चंद्रभान चढ आवेगा तो क्योंकर बचना होगा? अपने आप में तो सकत नहीं। फिर ऐसे राज का फिट्टे मुंह कहां तक आपको सताया करें। जोगी महेंदर गिर ने यह सुनकर कहा - तुम हमारे बेटा बेटी हो, अनंदे करो, दनदनाओ, सुख चैन से रहो। अब वह कौन है जो तुम्हें आंख भरकर और ढब से देख सके। यह बघंबर और यह भभूत हमने तुमको दिया। जो कुछ ऐसी गाढ पडे तो इसमें से एक रोंगटा तोड आग में फूंक दीजियो। वह रोंगटा फुकने न पावेगा जो बात की बात में हम आ पहुंचेंगे। रहा भभूत, सो इसीलिए है जो कोई इसे अंजन करे, वह सबको देखें और उसे कोई न देखें, जो चाहे सो करें। जाना गुरुजी का राजा के घर गुरु महेंदर गिर के पांव पूजे और धनधन महाराज कहे। उनसे तो कुछ छिपाव न था। महाराज जगतपरकास उनको मुर्छल करते हुए अपनी रानियों के पास ले गए। सोने रूपे के फूल गोद भर-भर सबने निछावर किए और माथे रगडे। उन्होंने सबकी पीठें ठोंकी। रानीकेतकी ने भी गुरुजी को दंडवत की; पर जी में बहुत सी गुरु जी को गालियां दी। गुरुजी सात दिन सात रात यहां रहकर जगतपरकास को सिंघासन पर बैठाकर अपने बंधवर पर बैठ उसी डौल से कैलाश पर आ धमके और राजा जगत परकास अपने अगले ढब से राज करने लगा। रानी केतकी का मदनबान के आगे रोना और पिछली बातों का ध्यान कर जान से हाथ धोना। दोहरा (अपनी बोली की धुन में) रानी को बहुत सी बेकली थी। कब सूझती कुछ बुरी भली थी॥ चुपके-चुपके कराहती थी। जीना अपना न चाहती थी॥ कहती थी कभी अरी मदनबान। हैं आठ पर मुझे वही ध्यान॥ यां प्यास किसे किसे भला भूख। देखूं वही फिर हरे हरे रुख॥ टपके का डर है अब यह कहिए। चाहत का घर है अब यह कहिए॥ अमराइयों में उनका वह उतरना। और रात का सांय सांय करना॥ और चुपके से उठके मेरा जाना। और तेरा वह चाह का जताना॥ उनकी वह उतार अंगूठी लेनी। और अपनी अंगूठी उनको देनी॥ आंखों में मेरे वह फिर रही है। जी का जो रूप था वही है॥ क्योंकर उन्हें भूलूं क्या करूं मैं। मां बाप से कब तक डरूं मैं॥ अब मैंने सुना है ऐ मदनबान। बन बन के हिरन हुए उदयभान॥ चरते होंगे हरी हरी दूब। कुछ तू भी पसीज सोच में डूब॥ मैं अपनी गई हूं चौकडी भूल। मत मुझको सुंघा यह डहडहे फूल॥ फूलों को उठाके यहां से ले जा। सौ टुकडे हुआ मेरा कलेजा॥ बिखरे जी को न कर इकट्ठा। एक घास का ला के रख दे गट्ठा॥ हरियाली उसी की देख लूं मैं। कुछ और तो तुझको क्या कहूं मैं॥ इन आंखों में है फडक हिरन की। पलकें हुई जैसे घासवन की॥ जब देखिए डबडबा रही हैं। ओसें आंसू की छा रही हैं॥ यह बात जो जी में गड गई है। एक ओस-सी मुझ पे पड गई है। इसी डौल जब अकेली होती तो मदनवान के साथ ऐसे कुछ मोती पिरोती। रानी केतकी का चाहत से बेकल होना और मदनवान का साथ देने से नाहीं करना और लेना उसी भभूत का, जो गुरुजी दे गए थे, आँख मिचौबल के बहाने अपनी मां रानी कामलता से। एक रात रानी केतकी ने अपनी मां रानी कामलता को भुलावे में डालकर यों कहा और पूछा - गुरुजी गुसाई महेंदर गिर ने जो भभूत मेरे बाप को दिया है, वह कहां रक्खा है और उससे क्या होता है? रानी कामलता बोल उठी - आंख मिचौवल खेलने के लिए चाहती हूं। जब अपनी सहेलियों के साथ खेलूं और चोर बनूं तो मुझको कोई पकड न सके। महारानी ने कहा - वह खेलने के लिए नहीं है। ऐसे लटके किसी बुरे दिन के संभलने को डाल रखते हैं। क्या जाने कोई घडी कैसी है, कैसी नहीं। रानी केतकी अपनी मां की इस बात पर अपना मुंह थुथा कर उठ गई और दिन भर खाना न खाया। महाराज ने जो बुलाया तो कहा मुझे रूच नहीं। तब रानी कामलता बोल उठी - अजी तुमने सुना भी, बेटी तुम्हारी आंख मिचौवल खेलने के लिए वह भभूत गुरुजी का दिया मांगती थी। मैंने न दिया और कहा, लडकी यह लडकपन की बातें अच्छी नहीं। किसी बुरे दिन के लिए गुरुजी गए हैं। इसी पर मुझसे रूठी है। बहुतेरा बहलाती है, मानती नहीं।



राजा इंदर का कुँवर उदैभान का साथ करना राजा इंदर ने कह दिया, वह रंडियाँ चुलबुलियाँ जो अपने मद में उड चलियाँ हैं, उनसे कह दो-सोलहो सिंगार, बास गूँधमोती पिरो अपने अचरज और अचंभे के उड न खटोलों का इस राज से लेकर उस राज तक अधर में छत बाँध दो। कुछ इस रूप से उड चलो जो उडन-खटोलियों की क्यारियाँ और फुलवारियाँ सैंकडों कोस तक हो जायें। और अधर ही अधर मृदंग, बीन, जलतरंग, मँुहचग, घँुगरू, तबले घंटताल और सैकडों इस ढब के अनोखे बाजे बजते आएँ। और उन क्यारियों के बीच में हीरे, पुखराज, अनवेधे मोतियों के झाड और लाल पटों की भीड भाड की झमझमाहट दिखाई दे और इन्हीं लाल पटों में से हथफूल, फूलझडियाँ, जाही जुही, कदम, गेंदा, चमेली इस ढब से छूटने लगें तो देखने वालों को छातियों के किवाड खुल जायें। और पटाखे जो उछल उछल फूटें, उनमें हँसती सुपारी और बोलती करोती ढल पडे। और जब तुम सबको हँसी आवे, तो चाहिए उस हँसी से मोतियों की लडियाँ झडें जो सबके सब उनको चुन चुनके राजे हो जायें। डोमनियों के जो रूप में सारंगियाँ छेड छेड सोहलें गाओ। दोनों हाथ हिलाके उगलियाँ बचाओ। जो किसी ने न सुनी हो, वह ताव भाव वह चाव दिखाओ; ठुड्डियाँ गिनगिनाओ, नाक भँवे तान तान भाव बताओ; कोई छुटकर न रह जाओ। ऐसा चाव लाखों बरस में होता है। जो जो राजा इंदर ने अपने मुँह से निकाला था, आँख की झपक के साथ वही होने लगा। और जो कुछ उन दोनों महाराजों ने कह दिया था, सब कुछ उसी रूप से ठीक ठीक हो गया। जिस ब्याह की यह कुछ फैलावट और जमावट और रचावट ऊपर तले इस जमघट के साथ होगी, और कुछ फैलावा क्या कुछ होगा, यही ध्यान कर लो। ठाटो करना गोसाई महेंदर गिर का जब कुँवर उदैभान को वे इस रूप से ब्याहने चढे और वह ब्राह्मन जो अँधेरी कोठरी से मुँदा हुआ था, उसको भी साथ ले लिया और बहुत से हाथ जोडे और कहा-ब्राह्मन देवता हमारे कहने सुनने पर न जाओ। तुम्हारी जो रीत चली आई है, बताते चलो। एक उडन खटोले पर वह भी रीत बता के साथ हो लिया। राजा इंदर और गोसाई महेंदर गिर ऐरावत हाथी ही पर झूलते झालते देखते भालते चले जाते थे। राजा सूरजभान दुल्हा के घोडे के साथ माला जपता हुआ पैदल था। इसी में एक सन्नाटा हुआ। सब घबरा गए। उस सन्नाटे में से जो वह 90 लाख अतीत थे, अब जोगी से बने हुए सब माले मोतियों की लडियों की गले में डाले हुए और गातियाँ उस ढब की बाँधे हुए मिरिगछालों और बघंबरों पर आ ठहर गए। लोगों के जियों में जितनी उमंगें छा रही थी, वह चौगुनी पचगुनी हो गई। सुखपाल और चंडोल और रथों पर जितनी रानियाँ थीं, महारानी लछमीदास के पीछे चली आतियाँ थीं। सब को गुदगुदियाँ सी होने लगीं इसी में भरथरी का सवाँग आया। कहीं जोगी जातियाँ आ खडे हुए। कहीं कहीं गोरख जागे कहीं मुछंदारनाथ भागे। कहीं मच्छ कच्छ बराह संमुख हुए, कहीं परसुराम, कहीं बामन रूप, कहीं हरनाकुस और नरसिंह, कहीं राम लछमन सीता सामने आई, कहीं रावन और लंका का बखेडा सारे का सारा सामने दिखाई देने लगा कहीं कन्हैया जी की जनम अष्टमी होना और वसुदेव का गोकुल ले जाना और उनका बढ चलना, गाए चरानी और मुरली बजानी और गोपियों से धूमें मचानी और राधिका रहस और कुब्जा का बस कर लेना, वही करील की कुंजे, बसीबट, चीरघाट, वृंदावन, सेवाकुंज, बरसाने में रहना और कन्हैया से जो जो हुआ था, सब का सब ज्यों की त्यों आँखों में आना और द्वारका जाना और वहाँ सोने का घर बनाना, इधर बिरिज को न आना और सोलह सौ गोपियों का तलमलाना सामने आ गया। उन गोपियों में से ऊधो क हाथ पकड कर एक गोपी के इस कहने ने सबको रूला दिया जो इस ढब से बोल के उनसे रूँधे हुए जी को खोले थी। चौचुक्का जब छांडि करील को कुँजन को हरि द्वारिका जीउ माँ जाय बसे। कलधौत के धाम बनाए घने महाजन के महाराज भये। तज मोर मुकुट अरू कामरिया कछु औरहि नाते जाड लिए। धरे रूप नए किए नेह नए और गइया चरावन भूल गए। अच्छापन घाटों का कोई क्या कह सके, जितने घाट दोनों राज की नदियों में थे, पक्के चाँदी के थक्के से होकर लोगों को हक्का बक्का कर रहे थे। निवाडे, भौलिए, बजरे, लचके, मोरपंखी, स्यामसुंदर, रामसुंदर, और जितनी ढब की नावे थीं, सुनहरी रूपहरी, सजी सजाई कसी कसाई और सौ सौ लचकें खातियाँ, आतियाँ, जातियाँ, ठहरातियाँ, फिरातियाँ थीं। उन सभी पर खचाखच कंचनियाँ, रामजनियाँ, डोमिनियाँ भरी हुई अपने अपने करतबों में नाचती गाती बजाती कूदती फाँदती घूमें मचातियाँ अँगडातियाँ जम्हातियाँ उँगलियाँ नचातियाँ और ढुली पड तियाँ थीं और कोई नाव ऐसी न थी जो साने रूपे के पत्तरों से मढी हुई और सवारी से भरी हुई न हो। और बहुत सी नावों पर हिंडोले भी उसी डब के थे। उन पर गायनें बैठी झुलती हुई सोहनी, केदार, बागेसरी, काम्हडों में गा रही थीं। दल बादल ऐसे नेवाडों के सब झीलों में छा रहे थे।



आ पहुँचना कुँवर उदैभान का ब्याह के ठाट के साथ दूल्हन की ड्योढी पर बीचों बीच सब घरों के एक आरसी धाम बना था जिसकी छत और किवाड और आंगन में आरसी छुट कहीं लकडी, ईट, पत्थर की पुट एक उँगली के पोर बराबर न लगी थी। चाँदनी सा जोडा पहने जब रात घडी एक रह गई थी। तब रानी केतकी सी दुल्हन को उसी आरसी भवन में बैठकर दूल्हा को बुला भेजा। कुँवर उदैभान कन्हैया सा बना हुआ सिर पर मुकुट धरे सेहरा बाँधे उसी तडावे और जमघट के साथ चाँद सा मुखडा लिए जा पहुँचा। जिस जिस ढब में ब्राह्मन और पंडित बहते गए और जो जो महाराजों में रीतें होती चली आई थी, उसी डौल से उसी रूप से भँवरी गँठजोडा हो लिया। अब उदैभान और रानी केतकी दोनों मिले। घास के जो फूल कुम्हालाए हुए थे फिर खिले॥ चैन होता ही न था जिस एक को उस एक बिन। रहने सहने सो लगे आपस में अपने रात दिन॥ ऐ खिलाडी यह बहुत सा कुछ नहीं थोडा हुआ। आन कर आपस में जो दोनों का, गठजोडा हुआ। चाह के डूबे हुए ऐ मेरे दाता सब तिरें। दिन फिरे जैसे इन्हों के वैसे दिन अपने फिरें॥ वह उड नखटोलीवालियाँ जो अधर में छत सी बाँधे हुए थिरक रही थी, भर भर झोलियाँ और मुठ्ठियाँ हीरे और मोतियाँ से निछावर करने के लिए उतर आइयाँ और उडन-खटोले अधर में ज्यों के त्यों छत बाँधे हुए खडे रहे। और वह दूल्हा दूल्हन पर से सात सात फेरे वारी फेर होने में पिस गइयाँ। सभों को एक चुपकी सी लग गई। राजा इंदर ने दूल्हन को मुँह दिखाई में एक हीरे का एक डाल छपरखट और एक पेडी पुखराज की दी और एक परजात का पौधा जिसमें जो फल चाहो सो मिले, दूल्हा दूल्हन के सामने लगा दिया। और एक कामधेनू गाय की पठिया बछिया भी उसके पीछे बाँध दी और इक्कीस लौंडि या उन्हीं उडन-खटोलेवालियों में से चुनकर अच्छी से अच्छी सुथरी से सुथरी गाती बजातियाँ सीतियाँ पिरोतियाँ और सुघर से सुघर सौंपी और उन्हें कह दिया-रानी केतकी छूट उनके दूल्हा से कुछ बातचीत न रखना, नहीं तो सब की सब पत्थर की मूरत हो जाओगी और अपना किया पाओगी। और गोसाई महेंदर गिर ने बावन तोले पाख रत्ती जो उसकी इक्कीस चुटकी आगे रक्खी और कहा-यह भी एक खेल है। जब चाहिए, बहुत सा ताँबा गलाके एक इतनी सी चुटकी छोड दीजै; कंचन हो जायेगा। और जोगी जी ने सभी से यह कह दिया-जो लोग उनके ब्याह में जागे हैं, उनके घरों में चालीस दिन रात सोने की नदियों के रूप में मनि बरसे। जब तक जिएँ, किसी बात को फिर न तरसें। 9 लाख 99 गायें सोने रूपे की सिगौरियों की, जड जडाऊ गहना पहने हुए, घुँघरू छमछमातियाँ महंतों को दान हुई और सात बरस का पैसा सारे राज को छोड दिया गया। बाईस सौ हाथी और छत्तीस सौ ऊँट रूपयों के तोडे लादे हुए लुटा दिए। कोई उस भीड भाड में दोनों राज का रहने वाला ऐसा न रहा जिसको घोडा, जोडा, रूपयों का तोडा, जडाऊ कपडों के जोडे न मिले हो। और मदनबान छुट दूल्हा दूल्हन के पास किसी का हियाव न था जो बिना बुलाये चली जाए। बिना बुलाए दौडी आए तो वही और हँसाए तो वही हँसाए। रानी केतकी के छेडने के लिए उनके कुँवर उदैभान को कुँवर क्योडा जी कहके पुकारती थी और ऐसी बातों को सौ सौ रूप से सँवारती थी। दोहरा घर बसा जिस रात उन्हीं का तब मदनबान उसी घडी। कह गई दूल्हा दुल्हन से ऐसी सौ बातें कडी॥ जी लगाकर केवडे से केतकी का जी खिला। सच है इन दोनों जियों को अब किसी की क्या पडी॥ क्या न आई लाज कुछ अपने पराए की अजी। थी अभी उस बात की ऐसी भला क्या हडबडी॥ मुसकरा के तब दुल्हन ने अपने घूँघट से कहा। मोगरा सा हो कोई खोले जो तेरी गुलछडी॥ जी में आता है तेरे होठों को मलवा लूँ अभी। बल बें ऐं रंडी तेरे दाँतों की मिस्सी की घडी॥



बहुत दिनों पीछे कहीं रानी केतकी भी हिरनों की दहाडों में उदैभान उदैभान चिघाडती हुई आ निकली। एक ने एक को ताडकर पुकारा-अपनी तनी आँखें धो डालो। एक डबरे पर बैठकर दोनों की मुठभेड हुई। गले लग के ऐसी रोइयाँ जो पहाडों में कूक सी पड गई। दोहरा छा गई ठंडी साँस झाडों में। पड गई कूक सी पहाडों में। दोनों जनियाँ एक अच्छी सी छांव को ताडकर आ बैठियाँ और अपनी अपनी दोहराने लगीं। बातचीत रानी केतकी की मदनबान के साथ रानी केतकी ने अपनी बीती सब कही और मदनबान वही अगला झींकना झीका की और उनके माँ-बाप ने जो उनके लिये जोग साधा था, जो वियोग लिया था, सब कहा। जब यह सब कुछ हो चुकी, तब फिर हँसने लगी। रानी केतकी उसके हंसने पर रूककर कहने लगी- दोहरा हम नहीं हँसने से रूकते, जिसका जी चाहे हँसे। हैं वही अपनी कहावत आ फँसे जी आ फँसे॥ अब तो सारा अपने पीछे झगडा झाँटा लग गया। पाँव का क्या ढूँढती हाजी में काँटा लग गया॥ पर मदनबान से कुछ रानी केतकी के आँसू पँुछते चले। उन्ने यह बात कही-जो तुम कहीं ठहरो तो मैं तुम्हारे उन उजडे हुए माँ-बाप को ले आऊँ और उन्हीं से इस बात को ठहराऊँ। गोसाई महेंदर गिर जिसकी यह सब करतूत है, वह भी इन्हीं दोनों उजडे हुओं की मुट्ठी में हैं। अब भी जो मेरा कहा तुम्हारे ध्यान चढें, तो गए हुए दिन फिर सकते हैं। पर तुम्हारे कुछ भावे नहीं, हम क्या पडी बकती है। मैं इस पर बीडा उठाती हूँ। बहुत दिनों पीछे रानी केतकी ने इस पर अच्छा कहा और मदनबान को अपने माँ-बाप के पास भेजा और चिट्ठी अपने हाथों से लिख भेजी जो आपसे हो सके तो उस जोगी से ठहरा के आवें। मदनबान का महाराज और महारानी के पास फिर आना चितचाही बात सुनना मदनबान रानी केतकी को अकेला छोड कर राजा जगतपरकास और रानी कामलता जिस पहाड पर बैठी थीं, झट से आदेश करके आ खडी हुई और कहने लगी-लीजे आप राज कीजे, आपके घर नए सिर से बसा और अच्छे दिन आये। रानी केतकी का एक बाल भी बाँका नहीं हुआ। उन्हीं के हाथों की लिखी चिट्ठी लाई हूँ, आप पढ लीजिए। आगे जो जी चाहे सो कीजिए। महाराज ने उस बधंबर में एक रोंगटा तोड कर आग पर रख के फूँक दिया। बात की बात में गोसाई महेंदर गिर आ पहुँचा और जो कुछ नया सर्वाग जोगी-जागिन का आया, आँखों देखा; सबको छाती लगाया और कहा- बघंबर इसीलिये तो मैं सौंप गया था कि जो तुम पर कुछ हो तो इसका एक बाल फूँक दीजियो। तुम्हारी यह गत हो गई। अब तक क्या कर रहे थे और किन नींदों में सोते थे? पर तुम क्या करो यह खिलाडी जो रूप चाहे सौ दिखावे, जो नाच चाहे सौ नचावे। भभूत लडकी को क्या देना था। हिरनी हिरन उदैभान और सूरजभान उसके बाप और लछमीबास उनकी माँ को मैंने किया था। फिर उन तीनों को जैसा का तैसा करना कोई बडी बात न थी। अच्छा, हुई सो हुई। अब उठ चलो, अपने राज पर विराजो और ब्याह को ठाट करो। अब तुम अपनी बेटी को समेटो, कुँवर उदैभान को मैंने अपना बेटा किया और उसको लेके मैं ब्याहने चढूँगा। महाराज यह सुनते ही अपनी गद्दी पर आ बैठे और उसी घडी यह कह दिया सारी छतों और कोठों को गोटे से मढो और सोने और रूपे के सुनहरे सेहरे सब झाड पहाडों पर बाँध दो और पेडों में मोती की लडियाँ बाँध दो और कह दो, चालीस दिन रात तक जिस घर में नाच आठ पहर न रहेगा, उस घर वाले से मैं रूठा रहूँगा, और छ: महिने कोई चलने वाला कहीं न ठहरे। रात दिन चला जावे। इस हेर फेर में वह राज था। सब कहीं यही डौल था। जाना महाराज, महारानी और गुसाई महेंदर गिर का रानी केतकी के लिये फिर महाराज और महारानी और महेंदर गिर मदनबान के साथ जहाँ रानी केतकी चुपचाप सुन खींचे हुए बैठी हुई थी, चुप चुपाते वहाँ आन पहुँचे। गुरूजी ने रानी केतकी को अपने गोद में लेकर कुँवर उदैभान का चढावा दिया और कहा-तुम अपने माँ-बाप के साथ अपने घर सिधारो। अब मैं बेटे उदैभान को लिये हुए आता हूं। गुरूजी गोसाई जिनको दंडित है, सो तो वह सिधारते हैं। आगे जो होगी सो कहने में आवेंगी-यहाँ पर धूमधाम और फैलावा अब ध्यान कीजिये। महाराज जगतपरकास ने अपने सारे देश में कह दिया-यह पुकार दे जो यह न करेगा उसकी बुरी गत होवेगी। गाँव गाँव में अपने सामने छिपोले बना बना के सूहे कपडे उन पर लगा के मोट धनुष की और गोखरू, रूपहले सुनहरे की किरनें और डाँक टाँक टाँक रक्खो और जितने बड पीपल नए पुराने जहाँ जहाँ पर हों, उनके फूल के सेहरे बडे-बडे ऐसे जिसमें सिर से लगा पैदा तलक पहुँचे बाँधो। चौतुक्का पौदों ने रंगा के सूहे जोडे पहने। सब पाँण में डालियों ने तोडे पहने।। बूटे बूटे ने फूल फूल के गहने पहने। जो बहुत न थे तो थोडे-थोडे पहने॥ जितने डहडहे और हरियावल फल पात थे, सब ने अपने हाथ में चहचही मेहंदी की रचावट के साथ जितनी सजावट में समा सके, कर लिये और जहाँ जहाँ नई ब्याही ढुलहिनें नन्हीं नन्हीं फलियों की ओर सुहागिनें नई नई कलियों के जोडे पंखुडियों के पहने हुए थीं। सब ने अपनी गोद सुहाय और प्यार के फूल और फलों से भरी और तीन बरस का पैसा सारे उस राजा के राज भर में जो लोग दिया करते थे जिस ढण से हो सकता था खेती बारी करके, हल जोत के और कपडा लत्ता बेंचकर सो सब उनको छोड दिया और कहा जो अपने अपने घरों में बनाव की ठाट करें। और जितने राज भर में कुएँ थे, खँड सालों की खँडसालें उनमें उडेल गई और सारे बानों और पहाड तनियाँ में लाल पटों की झमझमाहट रातों को दिखाई देने लगी। और जितनी झीलें थीं उनमें कुसुम और टेसू और हरसिंगार पड गया और केसर भी थोडी थोडी घोले में आ गई।


मजदूरी और प्रेम

- सरदार पूर्ण सिंह हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन ...