Wednesday, June 23, 2021

पं. पद्मसिंह शर्मा और ‘भारतोदय’




 - अमन कुमार ‘त्यागी’


पं. पद्मसिंह शर्मा का जन्म सन् 1873 ई. दिन रविवार फाल्गुन सुदी 12 संवत् 1933 वि. को चांदपुर स्याऊ रेलवे स्टेशन से चार कोस उत्तर की ओर नायक नंगला नामक एक छोटे से गाँव में हुआ था। इनके पिता श्री उमराव सिंह गाँव के मुखिया, प्रतिष्ठित, परोपकारी एवं प्रभावशाली व्यक्ति थे। इनके एक छोटे भाई थे जिनका नाम था श्री रिसाल सिंह। वे 1931 ई. से पूर्व ही दिवंगत हो गए थे। पं. पद्मसिंह शर्मा की तीन संतान थीं। इनमें सबसे बड़ी पुत्री थी आनंदी देवी, उनसे छोटे पुत्र का नाम श्री काशीनाथ था तथा सबसे छोटे पुत्र रामनाथ शर्मा थे। पं. पद्मसिंह शर्मा के पिता आर्य समाजी विचारधारा के थे। स्वामी दयानंद सरस्वती की प्रति उनकी अत्यंत श्रद्धा थी। इसी कारण उनकी रुचि विशेष रूप से संस्कृत की ओर हुई। उन्हीं की कृपा से इन्होंने अनेक स्थानों पर रहकर स्वतंत्र रूप से संस्कृत का अध्ययन किया। जब ये 10-11 वर्ष के थे तो इन्होंने अपने पिताश्री से ही अक्षराभ्यास किया। फिर मकान पर कई पंडित अध्यापकों से संस्कृत में सारस्वत, कौमुदी, और रघुवंश आदि का अध्ययन किया तथा एक मौलवी साहब से उर्दू व फारसी की भी शिक्षा ली। सन् 1894 ई. में कुछ दिन स्वर्गीय भीमसेन शर्मा इटावा निवासी की प्रयागस्थिति पाठशला में अष्टाध्यायी पढ़ी। उसके बाद काशी जाकर अध्ययन किया। पुनः मुरादाबाद, लाहौर, जालंधर, ताजपुर (बिजनौर) आदि स्थानों पर भी अध्ययन किया। अध्ययन समाप्ति के पश्चात् सन् 1904 ई. में गुरुकुल काँगड़ी में कुछ दिन अध्यापन कार्य किया। उन दिनों वहाँ पं. भीमसेन और आचार्य पं. गंगादत्त भी थे। उसी समय महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) ने पं. रुद्रदत्त जी के संपादकत्व में हरिद्वार से सत्यवादी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। उस समय पं. पद्मसिंह शर्मा भी उनके संपादकीय विभाग में थे। इनका संपादन एवं लेखन का प्रारंभ यहीं से हुआ। इसके बाद तो शर्मा जी का जीवन लेखन, संपादन एवं अध्यापन आदि में ही व्यतीत हुआ। प्रारंभ में ‘सत्यवादी’ में ही कई लेख लिखे। इसके बाद सन् 1908 के प्रारंभ में जब आचार्य गंगादत्त गुरुकुल काँगड़ी छोड़कर ऋषिकेश में रह रहे थे तो शर्मा जी ‘परापेकारी’ (मासिक) पत्रिका के ‘संपादक’ होकर अजमेर वैदिक यंत्रालय में गए। वहाँ पर इन्होंने ‘परोपकारी’ के साथ ही कुछ दिन तक ‘अनाथ रक्षणम्’ का भी संपादन किया। सन् 1909 ई. में इनका आगमन ज्वालापुर महाविद्यालय में हुआ। यहाँ इन्होंने ‘भारतोदय’ (महाविद्यालय का मुखपत्र, मासिक) का सम्पादन एवं साथ ही अध्ययन कार्य भी किया। सन् 1911 ई. में इन्होंने महाविद्यालय की प्रबंध समिति के मंत्री पद पर भी कार्य किया। इस प्रकार महाविद्यालय की अविरल सेवा करते रहे। इनके संपादकत्व में ‘भारतोदय’ पत्रिका ने खूब ख्याति प्राप्त की। सन् 1927 में इनके पिता जी का देहांत हो गया। इस कारण इन्हें महाविद्यालय छोड़ घर आना पड़ा।
महाविद्यालय छोड़ने के बाद श्रीयुत् शिवप्रसाद गुप्त के अनुरोध पर ये ज्ञान मंडल में गए।सन् 1920 को मुरादाबाद में संयुक्त प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति बने। इसी वर्ष इनकी माता जी का देहान्त हो गया था। सन् 1922 ई. में इन्हें ‘बिहारी सतसई’ पर मंगलाप्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन् 1928 में इन्होंने अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का मुजफ्फरपुर (बिहार) में सभापतित्व किया। इसी वर्ष इन्होंने गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय में हिंदी प्रोफेसर पद पर भी कार्य किया।
सन् 1911 ई. में ‘पद्मपराग’ और ‘प्रबंध मंजरी’ का प्रकाशन हुआ। एक बार ये संग्रहणी रोग से ग्रस्त हो गए तो इन्हें हरदुआगंज लाया गया, साथ में इनके पुत्र काशीनाथ शर्मा भी थे। जब वहाँ पर चिकित्सा से कोई लाभ न हुआ तो इन्हें मुरादाबाद लाया गया। वहाँ डा.ॅ गंगोली पीयूषपाणी की चिकित्सा करायी गई। किंतु ऐसी अवस्था में भी अविरत रूप से इन्होंने साहित्यिक सेवा की। उस समय भी ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जिसमें ये दस-पंद्रह चिट्ठियाँ अपने मित्रों को न लिखते हों (उस समय सेवा के लिए कवि ‘शंकर’ (पं. नाथूराम शर्मा के पुत्र) इनके पास थे) और इनके पास भी बड़े-बड़े साहित्यकारों की चिट्ठियां रोज आती थीं। उनका उत्तर ये अपनी भाषा में ही दिलवाते थे। डेढ़ मास तक इनकी चिकित्सा चलती रही। कोई लाभ न होने पर इन्होंने महाविद्यालय ज्वालापुर में आने की इच्छा प्रकट की ओर कहा-‘चलो महाविद्यालय चलो; मरना तो है ही, उसी पुण्य भूमि में प्राण त्यागूँगा, गंगा की गोद में।’ अतः स्पष्ट है महाविद्यालय के प्रति उनमें आत्मीयता एवं श्रद्धा का भाव था। उन्हें महाविद्यालय लाया गया; साथ में पं. भीमसेन शर्मा भी थे। उस समय महाविद्यालय में श्री विश्वनाथ मुख्याधिष्ठाता थे। यहाँ आने पर पं. हरिशंकर शर्मा वैद्यराज की पहली पुड़िया से ही इन्हें बहुत लाभ हुआ और ये बीस-बाईस दिन में ही पूर्ण स्वस्थ हो गए।
पं. पद्मसिंह शर्मा को पाँच बातें बहुत पसंद थी- 1. स्वाध्याय,  2. नवीन लेखकों को प्रोत्साहन,  3. साहित्यिकों से मिलना-जुलना,  4. अतिथि सत्कार,  5. मित्रमंडली के साथ यात्रा। वे साहित्यिक यात्रा बहुत करते थे। अपनी मृत्यु से पूर्व भी उनका विचार श्रावण में ब्रज की यात्रा करने का था। उनका कहना था-‘भाई अब की बार श्रावण में ब्रज की यात्रा करनी चाहिए। आगरे के मिश्र भी साथ हों, कलकत्ते से बनारसीदास जी तथा श्रीराम जी को भी बुलाया जाए। किंतु इस साहित्यिक यात्रा से पूर्व ही वे जीवन की अंतिम यात्रा पर निकल पड़े।
कविजी (पं. नाथूराम शर्मा) के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे। कवि जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘अनुराग रत्न’ लिखी और उसका समर्पण काव्य कानन केसरी पं. पद्मसिंह को ही किया जबकि एक सज्जन उन्हें इसके लिए पाँच हजार रुपए देने को तैयार थे। उन सज्जन के कहने पर उनका कहना था कि-मैं अपना प्रचुर परिश्रम एक कलाविद को ही अर्पण करूँगा और मेरी राय में पं. पद्मसिंह शर्मा इसके लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।
हिंदी जगत में ‘भारतोदय’
‘भारतोदय’ का प्रारंभ सन् 1909 ई. (ज्येष्ठ शुक्ल सं. 1966) में हुआ था। इसके संपादक, पद्मसिंह शर्मा और सहायक संपादक पं. नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ थे। इसे पं. शंकरदत्त शर्मा ने अपने प्रेस ‘धर्मदिवाकर प्रेस’ मुरादाबाद में छापा और पं. भीमसेन शर्मा ने गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर से प्रकाशित किया। इसका वार्षिक मूल्य डेढ़ रुपए तथा विद्यार्थियों के लिए एक रुपया था। यह गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर का ‘मासिक पत्र’ घोषित किया गया।
पत्रिका के आवरण पर सबसे ऊपर सूचना दी गई थी कि ‘‘अगली संख्या में कविवर ‘शंकर’ की मज़ेदार कविता ‘अंधेर खाता’ छपेगी’’ तत्पश्चात एक आकर्षक बार्डर और फिर ।।ओ3म।। के बाद आकर्षक साज-सज्जा के साथ लिखा गया था ‘भारतोदय’। पत्रिका के शीर्षक के नीचे ध्येय स्पष्ट किया गया था-
‘‘निशम्यतां लेखललाम संचय, प्रकाशने येन कृतोऽतिनिश्चयः।
गृहीतसद्धर्मविशेषसंशय, श्वकास्तिसोयंभुवि ‘भारतोदयः’’।।
‘भारतोदय’ के नियम इस प्रकार बनाए गए -
1. यह पत्र प्रतिमास गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर से प्रकाशित होता है।
2. उसका वार्षिक मूल्य सर्वसाधारण से डेढ़ रुपए लिया जाएगा। विद्यार्थियोें को एक रुपया में और महाविद्यालय के सभासदों को मुफ्त, पुस्तकालयों और असमर्थ विद्यारसिकों को डाकव्यय लेकर।
3. पत्र का मुख्य उद्देश्य महाविद्यालय ज्वालापुर को लोकप्रिय बनाना तथा तत्संबंधी समाचारों का प्रकाशित करना होगा।  इसमें धार्मिक, सामाजिक और शिक्षा संबंधी तथा लोकोपयोगी लेख रहा करेंगे, हिंदी साहित्य का सुधार भी इसका लक्ष्य होगा। किसी मत, जाति या व्यक्ति पर कोई असभ्य, अरुंतुद या कलहात्मक लेख इसमें प्रकाशित न होंगे।
4. बाहर से आये लेखों में काट छांट और न्यूनाधिक करने का पूरा अधिकार संपादक को रहेगा।
5. समालोचना की पुस्तकें, बदले के पत्र, लेख, संपादक के नाम आने चाहिएँ। और पत्र न पहुंचने की सूचनाएं, ग्राहक होने की दरख्वास्तें, मूल्य आदि, प्रकाशक अथवा प्रबंधकर्ता ‘भारतोदय’ के नाम।
6. पत्र में किसी प्रकार के असभ्य और धोखा देनेवाले विज्ञापन नहीं छपेंगे न तकसीम होंगे, ऐसे महाशयों को यह बात ध्यान में रखकर प्रार्थना करनी चाहिए। सब प्रकार का पत्रव्यवहार महाविद्यालय ज्वालापुर जिला सहारनपुर, इस पते पर होना चाहिए।
‘भारतोदय’ के प्रथम अंक के पृष्ठ संख्या 33 पर ‘‘भारतोदय की उदयकथा’’ शीर्षक से भी जानकारी दी गई है-
महाविद्यालय के संबंध में एक पत्र की आवश्यकता का अनुभव करके कमेटी के एक विशेष अधिवेशन में निश्चित हुआ कि विद्यालय की ओर से एक मासिक पत्र निकाला जाय जिसका मुख्य उद्देश्य विद्यालय को लोकप्रिय बनाना और तत्संबंधी समाचारों को सर्वसाधारण तक पहुँचाकर हितसाधन की चेष्टा तथा तद्र्थ सहाय्य प्राप्ति का उद्योग हो। इसके अतिरिक्त मतसंबंधी वितंडावादों से बचकर धार्मिक, सामाजिक और शिक्षा विषय पर भी उस में लिखा जाया करे, हिंदी साहित्य की पूर्ति और सुधार भी उस का प्रधान लक्ष्य हो। इत्यादि प्रयोजनों को सामने रखकर ‘भारतोदय’ का उदय हुआ है। जैसा कि पत्रों में सूचना दी गई थी, 1 म (प्रतिपदा), वैशाख से पत्र निकालने का विचार था, परंतु कई अनिवार्य विघ्नों से पत्र प्रतिज्ञात समय पर न निकल सका। जिसकारण अनेक भारतोदयाभिलाषी, सज्जनों ने बड़े उत्कंठा और उत्साह भरे शब्दों में पत्र प्रकाशन के लिए अनुरोध किया और इच्छा प्रकट की जिससे प्रकाशकों का उत्साह द्विगुणित हो गया। पत्र को रोचक और उपयुक्त बनाने का यथाशक्ति प्रयत्न किया जाएगा। प्रसिद्ध विद्वान और कवियों के लेख इसमें रहा करेंगे। बहुत से विद्वानों ने अपनी लेखमालिका द्वारा पत्र को अलंकृत करने का प्रण कर लिया है, जिनमें से दो चार के नाम प्रकाशित किये जाते हैं। यथा-श्रीयुत रावबहादुर मास्टर आत्मारामजी। श्रीमान् कविवर पण्डित नाथूराम शंकर शर्मा। श्रीयुक्त प्रोफेसर पूर्ण सिंहजी इंपीरियल फारेस्ट केमिस्ट। श्री बा.गंगा प्रसाद जी बी.ए., श्री बा. आशाराम जी बी.ए., श्री पं. रामनारायण मिश्र बी.ए., श्री पं. रामचन्द्र शर्मा इंजीनियर, वैद्यराज श्रीकल्याण सिंह जी, श्रीस्वामी मंगलदेव जी संन्यासी, इत्यादि।
पत्र का मूल्य बहुत ही कम। नाममात्र डेढ़ रुपए रखा गया है, इस पर विद्यार्थियों को एक में ही दिया जायगा, और विद्यालय कमेटी के मेम्बर मुफ्त पावेंगे। ऐसी दशा में ‘भारतोदयाभिलाषी’ महाशयों का कर्तव्य है कि वे स्वयं इसके ग्राहक बनें और दूसरों को बनावें, जिन सज्जनों के यहाँ अतिथि के रूप में ‘‘भारतोदय’’ पहुँचे, आशा है कि वे अपनी आतिथेयता का परिचय देंगे और इसे विमुख और निराश न लौटाएंगे क्योंकि:-
‘‘अतिथिर्यस्य भग्नाशो, गृहात्प्रतिनिवर्तते।
स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा, पुण्यमादाय गच्छति।।’’
भारतोदय का विषयवार अनुक्रम इस प्रकार था-
1. वेदमन्त्रार्थप्रकाश.........कृवेदतीर्थ                                                               1
2. भारतोदय (कविता)......श्री पं. नाथूराम शंकर शर्मा 4
3. सुखवाद.........श्री मास्टर गंगाप्रसाद बी.ए.                                                    9
4. महिलामंडल.........एक ब्राह्मण                                                                 14
5. भ्रातृभाव......सहायक संपादक                                                                   18
6. प्रकृतिस्तवः (संस्कृत कविता) ...... श्री पं. भीमसेन शर्मा 21
7. मेसमेरिज़्म और संध्या...... रा.ब.मा. आतमाराम जी 22
8. महाविद्यालय समारंभ.........                                                                  25
9. म.वि. समाचार, लोकवृत्त इत्यादि............                                                 34
लोकवृत्त के अंतर्गत जो समाचार प्रथम अंक में प्रकाशित किएगए थे, उनमें- ’देशभक्त.. श्री अरविंद घोष, कवि अध्यापक और बैरिस्टर (प्रो. इक़बाल संबंधी), अमीर की उदारता (अमीर काबुल के प्राणहरण की साज़िश संबंधी समाचार), फ़ारस और टर्की (दोनों राज्यों में खूनखराबी के बाद शांति संबंधी समाचार), जल प्रलय (दक्षिण में 7-8 मई को 48 घंटे के अंदर 23 इंच पानी की बरसात से आई जलप्रलय संबंधी समाचार हैदराबाद से प्राप्त हुआ था), सिंहल द्वीप (सिलोन) में विश्वविद्यालय स्थापना का समाचार आदि समाचारों के अतिरिक्त अनेक समाचार भी प्रकाशित किए जाते थे।
-ता. 11 मई की अमृत बाज़ार पत्रिका में किसी मुम्बई के व्यापारी महोदय के टाइम्स आफ इंडिया में लिखे हुए लेख का सारांश छपा है। उससे ज्ञात होता है कि अहर्निश स्वदेशी माल की ओर व्यापारियों का ध्यान आकर्षित हो रहा है। यह ज्ञात हुआ है कि पूर्व वर्ष की अपेक्षा मुम्बई में डेढ़ लक्ष कपास के गट्ठे अधिक आए। जापान ने 290000 गट्ठे मँगाए। इससे बढ़कर स्वदेशी की कृतकार्यता का क्या प्रमाण होगा कि 12 वर्ष पूर्व स्वदेशी माल पर टैक्स द्वारा ग्यारह लाख प्राप्त हुए थे। आज उसी पर सरकारी आय 33 लक्ष हो गई है।
- अमेरिका में बिनौलों से घी बनाने के पचासों कारखाने हैं। अब समाचार पत्रों में चर्चा है कि बम्बई में भी ऐसा कारखाना खुलने वाला है। (आशा है दुग्धद्रोही ला. देवीदास जी आर्य यह सुनकर बहुत खुश होंगे)। भारतवर्ष का करोड़ों मन घी परदेश चला जाता है। अब वह दिन आने वाला है जब बिनौलों का घी मिलेगा, अमेरिका वालों की खूब बनेगी। स्वदेशी के प्रेमी उद्योग करें कि भारत का घी भारत ही में रहे। परमात्मा इस नवीन घृत से बचावे।।
- पाश्चात्य विद्वानों के बुद्धिवैशद्य को देखकर आह्लाद हुए बिना नहीं रहता, पेरिस में प्रसिद्ध अनुभवी ज्योतिशास्त्र विशारदों की एक सभा होने वाली है जिसमें आकाश के प्रत्येक भाग का चित्र खींचा जावेगा। आकाश के 22054 विभाग किए गए हैं। प्रत्येक भाग का पृथक् पृथक् चित्र रहेगा, तारे, उनकी गति व उनका स्थिति स्थान आदि का भी अद्भुत दृश्य रहेगा। ग्रीनिच की वेधशाला की ओर से इसी विषय पर दो अद्भुत ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं जिनमें 19000 तारों का सचित्र वर्णन है। इस विषय में अन्वेषण करने के लिए अन्य वेधशालाएं भी यत्न कर रही हैं।
- एक ज्योतिर्विद् का कथन है कि ये इतने असंख्य तारागण क्यों बनाए गए। हमारे प्रकाश के लिए तो इन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जितना चंद्रमा है उससे वह कुछ और बड़ा हो तो रात्रि का काम और भी अच्छा चल सकता है। हमको वृथा संदेह में डालने के लिए कहें, तो ईश्वर का इस में क्या प्रयोजन है। इससे विदिता होता है कि तारे भी सूर्यवत् स्वतंत्र प्रकाश के गोलक हैं। और न जाने क्या क्या है।
- मिलौनी नामक विद्वान् का कथन है कि चंद्रमा की किरणों में भी उष्णता का कुछ अंश होता है। वेनिस, ल्फोरेन्स व पदना के वनस्पतिगृह में कई विद्वान ने इस विषय में बहुत कुछ अनुभव करके देखा है (कहीं यह विद्वान शकुंतला के दुष्यंत तो नहीं! उन्होंने भी चंद्रमा से अग्नि झड़ते देखी थी)
- रंगून के समाचार से विदित होता है दो जर्मन विद्वान पथिक मेकांग नदी के स्रोत की खोज लगाने के लिए जा रहे थे, मार्ग में किसी दुष्ट ने उनको मार दिया। वस्तुतः पाश्चात्य विद्वान ‘‘नाह्मस्मीति साहसम्’’ इस तत्व पर चलने वाले हैं। इसीलिए प्रत्येक कार्य में ऋद्धि व सिद्धि इनके सन्मुख हाथ जोड़े खड़ी रहती हैं। इन दो महानुभावों का नाम ब्रनहेबर व हरस्क्मिट्ज है। ‘‘लिखे जब तक जिए सफरनामे, चल दिए हाथ में कलम थामे।’’
- मिस्टर एफ़. ड्यूक चीफ सेक्रेटरी बंगाल गवर्मेन्ट ने एक प्रसिद्ध पत्रक निकाला है जिसमें पुलिस को दंगे फिसाद के मौके पर बंदूकें कैसी दाग़नी चाहिए और फिसादी लोगों पर रोब डालने के लिये क्या करना चाहिए इसका वर्णन किया है। अब तक सिर्फ डराने के लिए खाली बंदूकें छोड़ी जाती थीं अब सचमुच भरी हुई छोड़ी जावेंगे।
- लोकमान्य श्रीयुत तिलक भगवद्गीता पर कुछ लिख रहे हैं। गीता के भाग्य खुले। देखें यह महापुरुष गीता पर क्या लिखते हैं। आपके दो सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘‘द आर्कटिकहोम इन द वेदाज़’’(1903), ‘ओरिअन’(1893) देखने योग्य हैं-अगाध पांडित्य का प्रमाण हैं। आपका गीता भाष्य भी उज्ज्वल गुणों से उज्ज्वल होगा।
- बड़ोदा राज्य में प्राथमिक शिक्षा बिना शुल्कादि लिए ही दी जाती है। भारतवर्ष में यह एक ही स्टेट है जहाँ यह प्रबंध हुआ है। इस विषय में सरकार सोचते ही सोचते रह गई। आज तक कुछ न कर सकी बड़ौदा महाराज ने इस प्रथा का प्रारंभ ही कर डाला।
आर्य ‘सामाजिक समाचार’ भी अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित किए गए-
- गुरुकुल महाविद्यालय के उत्सव से लौटते हुए पं. गणपति शर्मा जी ने दो व्याख्यान सहारनपुर में अत्यंत प्रभावशाली दिए। फिर वहाँ से दिल्ली पहुँचे, और वहाँ एक सप्ताह व्याख्यानों की धूम मचा दी, दिल्ली वासियों पर उनका बहुत प्रभाव पड़ा।
- अप्रैल में गुरुकुल गुुजरांवाला का वार्षिकोत्सव बड़ी रौनक से हुआ। धर्मचर्चा में भिन्न भिन्न मतवादी सम्मिलित हुए थे, अच्छा आनंद रहा, म.वि. से श्री पं. नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ भी पधारे थे। गुरुकुल गुजरांवाला में इस समय 57 ब्रह्मचारी प्रविष्ट हैं। 3200 के करीब धन एकत्र हुआ। श्रीमान ला. रलारामजी का पुरुषार्थ प्रशंसनीय है।
- उसके पीछे आर्य समाज गुजरात (पंजाब) का उत्सव भी सानंद समाप्त हुआ। हमारे मुख्याधिष्ठाता श्री पं. नरदेव जी वहाँ भी पधारे थे।
- 28.05.09 से 1-6 तक दिल्ली सदर आर्य समाज का उत्सव बड़े समारोह से होगा, 3 दिन धर्मचर्चा के लिए रक्खे हैं। उस पर श्री पं. गणपति शर्मा जी, श्री पं. भीमसेन जी और श्री पं. नरदेव जी शास्त्री आदि अनेक विद्वान पधारेंगे।
अंत में ‘निवेदन’ किया गया
जिन सज्जनों ने ‘भारतोदय’ में समालोचना के लिए पुस्तकें भेजी हैं उनसे प्रार्थना है कि अगली संख्या में समालोचना निकलेगी, तब तक संतोष रखें। जिन सहयोगियों की सेवा में ‘भारतोदय’ पहुँचे, उनसे विनय है कि इसके बदले में अपने अमूल्य पत्र भेजकर अनुगृहीत करें। ‘भारतोदय’ को प्रथम अंक के बाद रजिस्ट्रेशन नं. । 476 प्राप्त हो गया। अगले अंक में यह नंबर प्रकाशित किया गया।
‘भारतोदय’का संघर्ष 
‘भारतोदय’ सा.प.(साप्ताहिक प्रकाशन) वर्ष 1 पुनर्जन्म में प्रकाशित इस लेख से पता चलता है-भारतोदय-इस नाम में कितनी जादू भरी है, यह नाम चित्त को जितना आह्लाद् देता है, इस नाम से रह रहकर जिन जिन बातों की याद आती है और याद कर कर जिस तरह जी भर आता है वह सब अनुभव करने की बातें हैं और प्रत्येक भारतवासी स्वयं अनुभव कर ही रहा है। शब्दों से मानसिक स्थिति का घणान अशक्य है। पर भारतोदय शब्द के अर्थ को प्राप्त करने के मार्ग में जो विकट घाटियाँ हैं उनको पार करते करते कभी कभी जो निराशा छा जाती है, वह भी अवर्णनीय है। पर सच्चे यात्री को यह निराशा स्वल्पकाल तक ही घेर सकती है। जिसकी दृष्टि उद्दिष्ट स्थल पर लगी हुई है वह कब कठिनाइयों की परवाह करता है? वह कब चैन लेता है? वह अपनों की हँसी मज़ाक भी सहता है, दूसरों की मनमानी भी सहता है, और पार हो ही जाता है। जब घाटी पर चढ़कर नीचे देखने लगता है तब पहले हँसने वाले लज्जा के मारे अपनी गर्दन झुका कर खड़े रहते हैं। ऐसे वीर पुंगव का आदर करने लगते हैं, उसके पीछे चलना सीखते हैं। जो दशा असली भारतोदय के सम्मुख है वही दशा कागज़ी भारतोदय के सम्मुख है। यह किस प्रकार मासिक रूप में निकला, फिर साप्ताहिक हुआ, फिर कटारपुर के दंगल के समय घबराकर पूर्व प्रकाशक ने किस प्रकार बिना सूचना दिए ही घर बैठे डिक्लेरेशन ख़ारिज कराया, किस प्रकार अनेक विपत्तियों से महाविद्यालय की व संचालकों की जान बची, किस प्रकार फिर उद्योग हुआ और प्रथम बार 1000 रुपए की व द्वितीयवार 2000 की जमानत माँगी गई। इन सब बातों के लिखने की आवश्यकता नहीं। हम चाहते, तो भारत भर में इस बात का हल्ला मचा देते पर महाविद्यालय के संचालक चुपचाप काम करना ही अधिक पसंद करते रहे इस विश्वास पर कि कभी तो इन कठिनाइयों का अंत होगा। सुदीर्घ परिश्रम के पश्चात् अब कहीं जाकर मुरादाबाद के कलेक्टर ने बिना जमानत ‘‘भारतोदय’’ के प्रकाशन की आज्ञा दी है और इसीलिए अब यह आपकी सेवा में फिर पहुँच रहा है। इसको अपनाइए, इसको पुचकारिए, इसकी सहायता कीजिए, इसका उत्साह बढ़ाइए। इसकी अनुपस्थिति में महाविद्यालयों में भी युगांतर उपस्थित हो गया था। उस युगांतर की राम कहानी लिखने का यह प्रसंग नहीं है। उनको याद कर जी भर आता है। जिन्होंने भुगता वही जान सकते हैं कि युगांतर था, कि बला थी, महाविद्यालय के जीवन का प्रश्न था, कि मरण का। भगवान की कृपा से युगांतर आया व गया। बलाएं आईं और गईं आगे की राम जाने। अब तक राम जी ने ही रक्षा की है। ‘चढ़ जा राम भली करेंगे’-यही तत्व संचालकों के सम्मुख है। भारतोदय की पुरानी नीति उस समय की उन उन परस्थितियों के कारण ‘स्वात्म-रक्षा’ थी। क्योंकि चहुँ ओर की मारधाड़ और जटिल तथा क्रूर संघटनों में उस नीति के बिना ‘महाविद्यालय’ की रक्षा होना असंभव था। अब समय बदल गया, शत्रु तथा मित्रों के दृष्टिकोण भी बदल गए, इसलिए भारतोदय में आगे बेहूदा खंडन-मंडन को स्थान न मिलेगा। रागद्वेषात्मक लेख रद्दी की टोकरियों में फेंक दिए जाएंगे। समय की गति के अनुसार जिससे भी भारतोदय होगा उन सब कार्यों में सहायक होना भारतोदय की नीति रहेगी। प्रमुख भाग निःशुल्क प्राचीन शिक्षा का रहेगा।
कुल मिलाकर ‘भारतोदय’ का प्रारंभ हिंदी साहित्य और पत्रकारिता जगत में महत्वपूर्ण घटना है। पत्रिका में हिंदी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी शब्दों से कोई परहेज नहीं रखा गया है, न ही पत्रिका के पाठक को।
संदर्भ
1. भारतोदय का प्रथम अंक
2. भारतोदय साप्ताहिक का पुनर्जन्मांक
3. गुरुकुल महाविद्यालय की स्मारिका (हीरक जयंती)


क्रांति का बीजपत्र : आंचलिक पत्रकरिता

 


- अरविंद कुमार सिंह

‘‘खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।’’
गंगा-यमुना और सरस्वती के संगम की रेती से जब ये क्रांतिकारी पंक्तियां अकबर इलाहाबादी की शायरी से जनमानस के दिलों में उतर रही थीं; तो प्रयाग वैसा नहीं था, जैसा आज दिखता है। तीर्थराज की यह धरती क्रांतिकारियों की संगम स्थली थी तो देश की राजनीति की एक प्रमुख धुरी। आनंद भवन, खुसरो बाग और कंपनी गार्डेन का अतीत भारत के महान क्रांतिकारियों की जीवंत कहानियों की कथाभूमि थी। राजकीय संग्रहालय की प्राचीरों के मध्य असंख्य साहित्य की अमर सर्जनाएं और कथाएं जन्मीं। जो देश और दुनिया के मानस पर पूरी आस्था और विश्वास के साथ आज भी जमी हैं और विश्वास है कि क़यामत तक लोगों के दिलों में स्पंदन करती रहंेगी। महान शायर अकबर इलाहाबादी ने ‘तोप’ जैसे घातक हथियार का भी मुकाबला ‘अख़बार’ से करने की बात की तो निश्चित ही इसमें ‘तोप’ से ज़्यादा घातक और मारक क्षमता होगी। अख़बार की यह क्षमता है कि वह व्यक्ति ही नहीं बल्कि व्यवस्था को बदल सकता है। तोप और गोली का लक्ष्य सीमित है लेकिन अख़बार समाज का मानस होता है। वह उसका शिक्षक और प्रशिक्षक भी होता है। क्रांति और शांति का बीजमंत्र उसके गर्भ में पलते हैं तो आंदोलन और परिवर्तन की ज़मीन भी तैयार करता है। दुनिया का पहला अख़बार सन् 1340 में चीन से जब निकला तब तक उसकी इस अपार शक्ति का अंदाजा शायद संसार को नहीं हुआ था।1 हिंदुस्तान को ‘बंगाल गजेट’2 के प्रकाशन के समय ही इसकी ताकत और प्रभाव का अहसास हो गया था। 
वैसे ‘संवाद’ की ताकत और क्षमता का परिचय हिंदुस्तान को राजतंत्री शासन और महाभारत काल में ही हो गया था। पौराणिक आख़्यानों में भी ‘नारद’ का चरित्र प्राथमिक पत्रकार का सा दिखता है, तो महाभारत के संजय की दिव्य-दृष्टि, युद्धक्षेत्र के दृश्यों का सजीव चित्रण धृतराष्ट्र से करते हुए दिखाई देती है। पत्रकारिता या अख़बार की यह शक्ति निश्चित ही ‘संवाद’ की शक्ति है, जो मनुष्य की प्राकृतिक शक्ति है, जिसके मूल में जिज्ञासा और रहस्यों से पर्दा उठाना है। संवाद करने और जानने की शक्ति ही पत्रकारिता की वास्तविक शक्ति है। संवाद की इस प्रक्रिया से आगे बढ़कर सन् 1447 में गुटेनबर्ग ने पिं्रटिंग प्रेस का ईजाद कर संसार में प्रिटिंग तकनीकी से क्रांति ला दी। आज की एडवांस तकनीकी के मूल में गुटेनबर्ग के विचारों का ही विस्तार है।
भारतीय संविधान के मूल अधिकारों में ‘वाक् स्वतंत्रता’3 प्रत्येक व्यक्ति को भाषण तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। इसी स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है। प्रेस की स्वतंत्रता सामाजिक तथा राजनीतिक समागम का मर्म है। ‘न्यायालयों का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वे प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखें और उन सभी विधियों या प्रशासनिक कार्यवाहियों को अविधिमान्य कर दें जो संवैधानिक समादेश के प्रतिकूल इसमें हस्तक्षेप करती हंै।’4 इसका अर्थ यह है कि ‘प्रत्येेक नागरिक अपने विचारों, विश्वासों और दृढ़ निश्चयों को निर्बाध रूप से तथा बिना किसी रोक-टोक के मौखिक शब्दों द्वारा, लेखन, मुद्रण, चित्रण के द्वारा अथवा किसी अन्य ढंग से अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है।’5 पत्रकारिता की इस शक्ति को भारतीय संविधान ने संरक्षण प्रदान किया है। यदि कोई सरकार या सरकारी संगठन इस पर रोक या सेंसरशिप लगाने का प्रयास करती है तो यह विधिमान्य नहीं हो सकता है। इसी क्रम में ‘किसी समाचार पत्र पर अनर्गल संेसरशिप लगाना’6 या उसे ‘ज्वलंत सामाजिक विषयों पर अपने या अपने संवाददाताओं के विचारों को प्रकाशित करने से रोकना, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा।’7 ‘यह अधिकार नागरिकों को भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर ही नहीं बल्कि इसकी सीमाओं के पार भी प्राप्त है।’8 यह संवाद की ताकत ही है कि हिंदुस्तान मंे पहला अख़बार निकालने की चेष्टा करने वाले विलियम वोल्ट्स ने भी यही इश्तहार (संवाद) जारी किया था। ‘‘मेरे पास बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो मुझे कहना है और जिनका संबंध हर व्यक्ति से है।’’ जिससे ‘घबरायी ‘ईस्ट इंडिया’ कम्पनी ने वोल्टस को बलात् स्वदेश रवाना कर दिया।’9 जिस अखंड हिंदुस्तान को लगभग छह सौ वर्षाें तक विदेशी और विजातीय हमलावरों, आक्रांताओं और शासकों के महत्वाकांक्षाओं के पैरों तले रौंदा गया, जिसकी सभ्यता और संस्कृति की अखंड और अक्षुण्ण परंपरा को विदेशी हमलों से कुचला गया; वह हिंदुस्तानी परंपरा और संस्कृति, लाख-लाख जख़्मों और वैदेशिक वज्रपातों के बाद भी अपनी स्वदेशी सभ्यता और संस्कृति की महक अखिल विश्व में सुवासित करती रही। बावजूद हिंदुस्तान ने जहां विदेशी सभ्यताओं का टकराव झेला है वहीं अपने को, समन्वय के अटूट बंधनों से भी बांधा है। ‘आर्यों और अनार्यों का संघर्ष देखा तो तुर्कों, शकों, हुणों, यूनानियों, सिथिनियों, चर्वरों, डचों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों और मुगलों का टकराव भी देखा।’10 ‘लूटा, टूटा, बँटा बावजूद मूल से कभी नहीं कटा’, यही ‘हिंदुस्तान’ की पहचान और परंपरा है, जिसे ऋषियों और मुनियों ने सपेरों और फ़कीरों के इस देश को आस्था और विश्वास के अटूट भाव से सींचा है। इस महादेश को जिन विदेशी शासकों ने सबसे अधिक समय तक अपने प्रभुत्व में रखा, वे दुनिया की सबसे बुद्धिमान जातियों में से एक अंग्रेज थे, जिनके साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। कारण, सूर्य की प्रथम किरणों के देश से लगायत अंतिम किरणों तक के देश, उनके उपनिवेश जो थे। आधी दुनिया से भी अधिक पर राज्य करने वाली क़ौम, हिंदुस्तान की सभ्यता, संस्कृति और समाजशास्त्र पर दो सौ वर्षाें तक अपनी मानसिकता थोपती रही, बावजूद हिंदुस्तानी संस्कृति, अपने मूल्यों और आदर्शों के साथ शाश्वत थी और आने वाले कल में भी शाश्वत रहेगी।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश के महान क्रांतिकारियों ने अपने लहू से ‘आजादी की देवी’ का शृंगार किया है। स्वतंत्रता आंदोलन की अलख को देश और देश के बाहर ‘दावानल’ में बदल देने की क्षमता जिन कलमकारों और पत्रकारों में थी वे सच्चे मायने में भारत के महान क्रांतिकारी थे, जिनकी कलम की स्याही से क्रांति का बीजमंत्र निकलता था, जो अंग्रेजी हुकूमत की संगे-बुनियाद को हिला कर रख देता था। कलमकारों और नामानिगारों ने अपनी कलम की कीमत, जान देकर या काला पानी की सज़ा पाकर चुकायी। अंडमान निकोबार का ‘सेल्युलर जेल’ क्रांतिधर्मी पत्रकारों और क्रांतिकारियों के बलिदानों की दास्तां का बयान आज भी करता है। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के पन्ने उलटने पर जो दृश्य सामने आता है उसमें हिंदी पत्रकारिता का बीजपत्र ‘उदंत मार्तंड’ (30 मई, 1826) के संपादक युगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता (तब कलकत्ता) से जब हिंदी का पहला पत्र निकाला तो उसका ध्येय वाक्य (श्लोक) का अर्थ था-‘‘सूर्य के प्रकाश के बिना जिस तरह अंधेरा नहीं मिटता उसी तरह समाचार सेवा के बिना अज्ञजन जानकार नहीं हो सकते।’’ अर्थात ‘पत्रकारिता के पुरखों को इस बात का अहसास था कि फिरंगियों की लूट-खसोट, अन्याय-अत्याचार- अनाचार पर प्रहार किया जाएगा तो उनके कोप का सामना भी करना पड़ेगा। बावजूद स्वातंत्र्यकामी संपादकों ने निर्भीक कलम चलाई।’11 ‘‘आज’’ ने अपने मुख्य पृष्ठ पर ध्येय वाक्य लिखा, ‘‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।’’ गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘‘प्रताप’’ का ध्येय वाक्य था-‘‘जिनको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है/वह नर नहीं, नर पशु निरा है, और मृतक समान है।’’ इलाहाबाद से प्रकाशित ‘स्वराज’12 का ध्येय वाक्य था-‘‘हिंदुतान के हम हंै, हिंदुस्तान हमारा है।’’ इस अख़बार के ढाई वर्ष की उम्र में 75 अंक निकल सके और कुल 8 संपादक लगे, जिन्हें इसके संपादन/प्रकाशन के कारण 125 साल की सज़ा मिली। यह दुनिया का पहला अख़बार और संपादकों का मंडल था, जिन्होंने इतनी लंबी सज़ा भोगी। बावजूद उनका उत्साह कम नहीं हुआ। एक को सज़ा मिलती तो दूसरा संपादक कार्य संभालने को तैयार हो जाता। इस अखबार में संपादक के लिए विज्ञापन निकलता था-‘‘एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी यह शरेह-तनख़्वाह (वेतन) है, जिस पर ‘स्वराज’ इलाहाबाद के वास्ते एक एडीटर मतलूब (आवश्यकता) है।’’ इलाहाबाद से ही प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘चाँद’ (सन् 1922) का ‘‘फाँसी’’ अंक (नवंबर 1928) देश और दुनिया में फाँसी देने के औचित्य, तरीकों और राज्यक्रांतियों पर नई बहस छेड़ती थी जो आज भी हर फाँसी के बाद चलती है। इस अंक को अंग्रेजों ने जब़्त कर लिया था। मृत्युदंड की अमानुषिक प्रथा पर सवाल खड़ा करने वाला चाँद के ‘फाँसी’ अंक में शहीदे आजम भगत सिंह ने भी कई छद्म नामों से लेख लिखा था। कहने का अर्थ है कि देश की क्रांति की ‘दावानल’ को धधकाने में जितना बम और गोली ने काम किया होगा, उससे कई गुना अधिक, पत्र और पत्रकारिता ने किया। राष्ट्रभक्ति को जनांदोलन का रूप देने और आजादी की लड़ाई में सर्वस्व न्यौछावर करने की राष्ट्रीय भावना का प्रसार पत्रकारिता ने ही किया। यही कारण है कि ब्रिटिश सरकार ने इसे हमेशा अंकुश और यातना के शिकंजे में रखा। इसी कारण 19वीं शताब्दी के तीसरे दशक में मद्रास के गवर्नर ‘‘सर टामस मुनरो’ ने प्रेस की आजादी को ‘आंग्ल सत्ता’ की समाप्ति का पर्याय माना’’13 जो आगे चलकर सही साबित हुआ। भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाएं और पत्रकारों ने जितनी तल्लीनता एवं निडरता से रणभेरी बजाई, उतनी राष्ट्रीय पत्रकारिता ने शायद नहीं। यही कारण है, आंचलिक पत्रकारिता ‘जन’ के ज्यादा निकट रही है। 
‘जनमत’ और ‘अभिमत’ तैयार करने में आंचलिक पत्र और पत्रकारों ने महती योगदान दिया। व्यावसायिक एवं लाभ से दूर क्षेत्रीय पत्रकारिता, विशुद्ध रूप से आजादी का ‘मिशन’ लेकर चल रही थीं और अपने स्तर पर उस ‘मिशन’ को जन-जन तक फैलाने में संलग्न थीं। आंचलिक पत्रकारिता इस देश की आत्मा (गांवों) की पत्रकारिता है। भारत जिन वजहों से जाना जाता है उस सभ्यता और संस्कृति के पोषण और संरक्षण की पत्रकारिता है। गाँव और अंचलों के सौंधी माटी और देशीयता के संवर्द्धन की पत्रकारिता है जिसके बिना इस देश आधी अधूरी ही तस्वीर बनती है जिसमें भारत की आत्मा नहीं होती है। अर्थात स्वदेशी पत्रकारिता है। उ.प्र. के बनारस से प्रकाशित पत्र ‘‘बनारस अखबार’’14 हिंदी प्रदेश का पहला अखबार था, जिसे शिवप्रसाद ‘सितारे हिंद’ ने प्रकाशित कराया था। 1850 में ‘सुधाकर’15 भी काशी से निकला। इसके दो वर्ष बाद आगरा से ‘बुद्धिप्रकाश’16 निकला। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 15 अगस्त, 1867 में काशी से ‘कविवचन सुधा’ निकाला। हिंदी पत्रकारिता का मूल्यांकन किया जाए तो 1826 से 1884 तक के काल को उद्बोधनकाल कहा जा सकता है, जिसमें उदंत मार्तंड, बंगदूत, समाचार सुधावर्षण, पयामे़ आजादी, कविवचन सुधा और हिंदी प्रदीप के द्वारा पूरे भारत में राष्ट्रीय चेतना का बीजवपन किया गया। 
सन् 1885-1919 तक को ‘जागरण काल’ के रूप में, ‘हिन्दोस्थान’, ‘नृसिंह’, ‘स्वराज’, ‘प्रभा’, ‘अभ्युदय’ ने भारतियों में आजादी पाने की अलख जगायी। सन् 1920-1947 तक को ‘क्रांतिकाल’ कहा जा सकता है जिसमें स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु जब भारतवासी जाग उठे तो उन्हें फिरंगियों द्वारा पीड़ित किया गया। बर्बर शासकों के विरुद्ध ‘प्रताप’, ‘कर्मवीर’, ‘सैनिक’, ‘स्वदेश’ तथा गुप्त प्रकाशनों में ‘रणभेरी’, ‘शंखनाद’, ‘तूफान’, ‘चिनगारी’, ‘क्रांति’ और ‘विप्लव’ आदि ने साम्राज्यवाद के सर्वनाश के लिए क्रांति की ज्वाला भड़काई। 
यह देश, ग्रामों और अंचलों का गणतंत्र है, जिसमें राष्ट्रीय आंदोलन, आंचलिक पत्रकारिता और पत्रों से मुखर हुई और राष्ट्रीय स्वर बनी। देशीय या भाषाई पत्रों की ताकत से अंग्रेजी सत्ता न केवल विचलित हुई बल्कि दहल भी गई। पूरा देश आंदोलनरत था, क्रांति बीज जो अख़बार और पत्रों ने जन के मानस में बोया था वह ज़वान और क्रांतिधर्मी हो चुकी थी़। तब देश के किसी भी बड़े शहर, चाहे दिल्ली या मुम्बई हो, कोई ऐसा राष्ट्रीय पत्र नहीं था, जो क्रांति की आग को न भड़का रहा था, बल्कि देश के छोटे-छोटे अंचलों एवं कस्बों से निकलने वाले ही पत्र थें, जिनमें देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना कूट-कूट कर भरी हुई थी-‘अंग्रेजी हुकूमत पर वज्रपात की तरह गिर रहे थें’। बड़े पत्र या राष्ट्रीय प्रसार वाले पत्रों की संख्या नगण्य के बराबर थी, जो थे भी, वह अंग्रेजों के थे या उनके संरक्षण में चल रहे थे। अर्थात आंचलिक पत्रकारिता देश में राष्ट्रीय भावना के साथ ही आंचलिक मूल्यों, आदर्शों एवं संस्कृतियों की भी वाहक एवं संरक्षक थी। देश की आंचलिकता इन पत्रों के माध्यम से मुख़रित एवं बलवती हुई और आजादी की लड़ाई में आंचलिक पत्रकारिता ने सबसे अधिक बलिदान दिया। यही कारण है कि 1947 तक आते आते ये आंचलिक पत्र, ब्रितानी सरकार के गले की फाँस बन गए और अंततः उन्हें हिंदुस्तान को अलविदा कह स्वदेश रवाना होना पड़ा। समय की रेखा पर पत्रकारिता के स्वरूप एवं उद्देश्यों में परिवर्तन होते रहे, आजादी की लड़ाई में हथियार बने आंचलिक पत्रकारिता, आजादी के 6 दशक बाद आज वही आंचलिक और भाषाई पत्रकारिता अपने अस्तित्व की रक्षा करने में अक्षम साबित हो रही है। आज अख़बारों कें पन्नों से ग्राम, मोहल्ला और अंचल गायब हैं। नगरों और महानगरों से पटा अख़बार पूरी तरह से व्यावसायिक रूप ग्रहण कर चुके हैं और उपभोक्तावाद को बढ़ावा दे रहे हैं। पत्रकारिता की आत्मा, ‘आंचलिक पत्रकारिता,’ जो वास्तव में स्वदेशी पत्रकारिता है, आज संक्रमण काल से गुजर रही है। गांव में अख़बार, शहरों के विज्ञापन एवं उपभोग के समान तो पहुंच रहे हैं लेकिन गांवों के अख़बारों में, गांव और गिराँव ही गायब हैं। अर्थात क्रांति का बीजपत्र, ‘आंचलिक पत्र’ आज अपने अस्तित्व के संकट के दौर से गुजर रहे हैं। देशीयता और भाषाई पत्रों की ताकत, कार्पोरेट अख़बारों और मीडिया घरानों के सामने मृतप्राय होती जा रही हैं जिसमें सरकारी नीतियाँ सहायक हो रही हैं जो वर्तमान पत्रकारिता का विद्रूप है।
संदर्भ
1. हेरम्ब मिश्र, संवाददाता: सत्ता और महत्ता, पृ. 5, किताब महल, नई दिल्ली
2. द बंगाल गजट आर केलकटा जनरल एडवरटाइजर, जेम्स आगस्टस हिकी, 29 जनवरी, 1780
3. अनुच्छेद-19 (1)(क)
4. एक्सपेे्रस न्यूज पेपर्स प्रा. लि. बनाम् भारत संघ, एआईआर 1995 SC 578; इंडियन एक्सप्रेस न्यूज पेपर्स बनाम् भारत संघ 1985 SC 641
5. सुभाष कश्यप, हमारा संविधान, पृ. 95, एनबीटी., नई दिल्ली
6. बृजभूषण बनाम दिल्ली, एआईआर-1950, SC 129
7. बीरेन्द्र बनाम पंजाब, एआईआर.1957 SC896
8. मानेका गांधी बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1978, SC 597 के मामले में न्यायमूर्ति भगवती के अनुसार
9. विजयदत्त श्रीधर, पहला संपादकीय, पृष्ठ 11, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
10. ए.एल.बासम, अदभुत भारत
11. विजयदत्त श्रीधर, पहला संपादकीय, पृ.13
12. 9 नवंबर-1907 सा. उर्दू
13. डाॅ. अर्जुन तिवारी, पत्रकारिता और राष्ट्रीय चेतना का विकास, पृष्ठ 16
14. सा. जनवरी, 1845
15. सा. तारामोहन मिश्र, 1850
16. मुंशी सदासुख लाल, 1882

सुधीर कुमार ‘तन्हा’ की ग़ज़लों में सामाजिक यथार्थ/मंजु सिंह



उत्तर प्रदेश में जनपद बिजनौर के ग्राम सीकरी बुजुर्ग में जन्मे सुधीर कुमार ‘तन्हा’ ग़ज़ल कहते हैं और उनकी ग़ज़ल हिंदी-उर्दू के बीच की कड़ी लगती है। न तो ठेठ हिंदी और न ही ठेठ उर्दू। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल में भी यही भाषा दिखाई देती है जो साहित्य के लिए बुरी नहीं बल्कि अच्छी बात है। बिजनौर के ही एक और विद्वान पं. पद्मसिंह शर्मा ने पहले पहल यह प्रयोग किया था। तब उनकी भाषा को कुछ विद्वानों ने उछलती कूदती भाषा कहा था तो कुछ विद्वानों ने उनकी भाषा को साहित्य के लिए बहुत अच्छा माना था। पंडित जी हिंदी से बहुत प्रेम करते थे परंतु वह अन्य किसी भाषा से या उसके शब्दों से द्वेष नहीं रखते थे। यही कारण है कि आज उनकी वही भाषा आम बोलचाल की भाषा बन गई है। कवि सुधीर कुमार ‘तन्हा’ भी ईष्र्या अर्थात् हसद को लाइलाज बीमारी मानते हुए इससे बचने की सलाह देते हैं-
हसद बहुत ही बुरा मरज़ है, हसद से ‘तन्हा’ गुरेज़ करना।
हर एक मरज़ की दवा है लेकिन, हसद की कोई दवा नहीं है।।1
ग़ज़ल ने अनेक प्रतिमान गढ़े हैं। आशिक और माशूक से निकल कर ग़ज़ल ने विषय विस्तार पाया है। आज ग़ज़ल हर विषय पर कही जा रही है। कवि सुधीर कुमार ‘तन्हा’ ने भी विभिन्न विषयों पर अशआर कहे हैं। उनके शेरों से सामाजिक यथार्थ का बोध होता है। 
आदमी की बदलती फितरत को क्या खूब कहा है-
भाग जाते हैं अलम लेके सिपाही ‘तन्हा’।
जंग में जिस घड़ी हो जाता है सरदार का क़त्ल।।2
कवि ‘तन्हा’ बेग़ैरती को मौत से भी बुरा मानते हैं-
बेग़ैरत का इस दुनिया में जीना क्या और मरना क्या।
मौत उसे आती है जिस की आँख में गै़रत होती है।।3
आदमी के चेहरे पर से नकाब भी उन्होंने खूब उतारी है। क़ातिल भी अपने आपको उपदेशक बना लेता है और बाकी समाज को उपदेश करता है-
एक आदमी का क़ातिल ये कहता फिर रहा था।
औरों के काम आना है काम आदमी का।।4
नफ़रतों से घर बंट जाते हैं इसलिए नफरत को बुरी चीज मानते हुए कवि धार्मिक नफरत से देश के बंट जाने की चिंता व्यक्त करता है-
इतनी नफ़रत पाल के तुमने घर आँगन तो बांट दिये।
अहले वतन को यूँ मत बाँटो मज़हब की दीवारों से।।5
और कहता है-
सारे बंधन सारे रिश्ते सारे तआल्लुक़ टूट गये।
आँगन में जिस दिन से, छाँव आई एक दीवार की।।6
कवि की चिंता निर्मूल नहीं है। धार्मिक नफरत बच्चों की मासूमियत को प्रभावित करती है। जो अभी ठीक से धर्म के बारे में नहीं जानता, वह भी धर्म के ठेकेदारों से पूछता है-
नन्हा बच्चा पूछ रहा है धर्म के ठेकेदारों से।
आज कबूतर क्यों ग़ायब हैं गुम्बद से मीनारों से।।7
दूसरों को बेघर करने वालों को कवि श्राप देता हुआ प्रतीत होता है-
दूसरों के निशाँ मिटाता है।
तू भी एक रोज़ बे निशाँ होगा।।8
जबकि कवि प्रेम को शक्ति मानते हुए लिखता है-
हम हैं तुम्हारे तुम हो हमारे, प्यार हमारी ताक़त है।
इस नुकते को ग़ौर से सोचो राम से रावण हारा क्यूँ।।9
माँ-बाप, भाई, मित्र और प्रेयसी से संबंधों को उन्होंने बड़ी ही खूबसूरती से पिरोया है।
माँ-बाप- कवि ने भगवान से भी अधिक महत्ता माँ-बाप को दी है। तभी तो कहा है-
उसका जलवा देखने वाले कहाँ भटकता फिरता है।
अपने माँ और बाप की ख़िदमत ऐन इबादत होती है।।10
कोई भी व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए परंतु माँ के लिए वह सदैव बच्चा ही रहता है। कवि ने इसी बात को बहुत ही सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया है-
वो मुझे दिन ढले बाहर नहीं जाने देती।
माँ की नज़़रों में हँू ‘तन्हा’ अभी बच्चा मैं भी।।11
और यदि किसी माँ का जवान बेटा गुस्से में घर से निकल जाए तो माँ की बेचैनी पहाड़ जैसी हो जाती है। जो भी उसे मिलता है वह उसी से पूछती है। पता नहीं क्या होगा? जवान बालक है-
जवान बेटा है ग़ुस्से में घर से निकला है।
हर एक शख़्स से माँ की नज़र सवाली है।।12
कवि ने उस बात को भी बड़ी ही सादगी और सुंदरता के साथ बयान कर दिया है जिसके लिए बड़े-बड़े समाजशास्त्री सर्वेक्षण करते रह गए। जहां से परिवार बिखरने की पहल हो ही जाती है। हर माँ अपने बेटे का विवाह बड़ी ही धूमधाम से करती है मगर जब सारा परिवार नवागत दुल्हन की ओर आकर्षित हो जाता है, यहाँ तक कि बूढ़ी माँ की सुध लेने वाला भी कोई नहीं होता तब कवि कहता है-
बूढ़ी माँ के कमरे में अब कोई नहीं आता।
घर का घर सिमट आया एक नई हथेली में।।13
दादा- सभी बच्चे दादा को बहुत प्यार करते हैं और दादा भी तो बच्चों को मूल से अधिक ब्याज की तरह प्यारे होते हैं। कवि ने बच्चों के इसी प्यार को उकेरा है-
तस्वीरों का ये अलबम है जान से भी प्यारा।
इस में मेरे दादा की तस्वीर पुरानी है।।14
भाई- भाई जैसा यदि दोस्त कोई नहीं होता तो भाई जैसा शत्रु भी कोई नहीं होता। एकाकी होते जा रहे परिवारों की वजह भाईयों में स्नेह की कमी होती है। कवि इस रिश्ते को बड़ी ही बेबाकी से अभिव्यक्त करता है-
अब भाई जुदा मुझसे होता है तो होने दो।
बँटवारा विरासत का घर-घर की कहानी है।15
किंतु कवि भाई से बिछड़ने की पीड़ा को भी जानता है। भाई के रिश्ते की पवित्रता और अटूटता को भी सुंदर शब्दों में व्यक्त करता है-
ख़ून के ये रिश्ते भी किस क़दर मुक़द्दस हैं।
हैं मेरी लकीरें भी भाई की हथेली में।।16
और फिर कवि की पहुंच भी निराली है। राम-लक्ष्मण जैसा प्यार अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता। वनवास तो राम को हुआ था पर कवि ने लक्ष्मण की पीड़ा को भी खूब समझा है-
दुःख तो ये है राम की ख़ातिर।
लक्ष्मण को बनवास मिला है।।17
बेटी-बेटा- समाज में दहेजप्रथा इतनी बढ़ गई है कि यह विशेष रूप से उस बाप के लिए अभिाशाप है जिसके पास पैसा नहीं है और बेटी जवान हो गई है। बाप को उसके विवाह की चिंता किसी भयानक दुख से कम नहीं होती-
दुःख भी हैं समुंदर से उस आदमी के जिसके।
पल्ले में नहीं कुछ भी बेटी भी सियानी है।।18
और ऐसे में यदि बेटा घर से चला जाए, तो दुख कितना बढ जाता है इसको एक बाप ही अच्छी तरह समझ सकता है-
आँखों में सजाया था जो सपना चला गया।
बेटी हुई जवान तो बेटा चला गया।।19
दुश्मन-दोस्त- दोस्त कब दुश्मन बन जाए कहा नहीं जा सकता न ही इसका कोई पैरामीटर ही है। इसलिए कहा जाता है कि एक अच्छा दोस्त जब दुश्मन बनता है तो यह दुश्मनी बड़ी ही खतरनाक होती है। कवि ने दुश्मन और दोस्तों पर भी कलम चलाई है। दोस्तों पर भरोसा किया और दुश्मनी पाल ली-
जिन दोस्तों पे मुझको भरोसा था आज तक।
हाथों में लिये बैठे हैं तलवार देख ले।।20
किंतु कवि यह भी मानता है कि सच्चा दोस्त कभी झूठी तसल्ली नहीं देता। वह तो स्पष्ट वक्ता होता है, बिना किसी लोभ-लालच के यथार्थ का ज्ञान कराता है परंतु जब दोस्त झूठी तसल्ली देने लगे तो कवि कहता है-
झूठी थीं दोस्त तूने जो दी थीं तसल्लियाँ।
कैसे गिरी है रेत की दीवार देख ले।।21
कई बार देखा जाता है कि आप किसी मित्र के लिए कितना भी त्याग करो मगर एक समय आता है जब वह आपका नाम लेना तो दूर की बात सुनना भी पसंद नहीं करता है-
जिसकी ख़ातिर मैंने अपना ख़ून दिया।
उसको मेरा नाम भी नश्तर लगता है।।22
और जब दोस्ती की आड़ में कोई दुश्मन वर करता है तब दृष्य कितना भयावह हो सकता है-
जंग यूँ भी हुई, गर्दन मेरी तलवार मेरी।
मेरे क़ातिल ने पहन रक्खी थी दस्तार मेरी।।23
कवि दोस्ती-दुश्मनी के सिद्धांतों को समझता है और किसी अनुचित माध्यम को अपनाने के बजाए हार जाना उचित समझता है-
मैंने भागे हुऐ दुश्मन पे नहीं वार किया।
दोस्तो इसलिए हर बार हुई हार मेरी।।24
कवि उन दोस्तों की शिकायत नहीं करता जिन्होंने उसे बहुत सताया है-
मुझे दोस्तों से शिकायत नहीं है।
मगर दोस्तों ने सताया बहुत है।।25
क्योंकि ऐसे दोस्तों की कुछ मजबूरी भी रही होगी-
शायद कुछ मजबूरी होगी यार की।
तोड़ चुकी दम हसरत भी दीदार की।।26
कवि उन लोगों के प्रति भी दोस्त को धैर्य बंधाता है जिनसे वह धोखा खा चुका होता है-
मेरे दोस्त मेरी तरह सब्र कर ले।
फ़रेब उससे मैंने भी खाया बहुत है।।27
कवि की परिकल्पना की यह पराकाष्ठा ही है कि वह दुश्मनों से भी मुस्कराकर मिलने की बात करता है-
अब तो दुश्मनों से भी मुस्कुरा के मिलते हैं।
दोस्ती गुलाबों की हो गई बबूलों से।।28
आशिक और माशूक- शायरी के इस पक्ष को भी कवि ने छोड़ा नहीं है, छोड़ता भी कैसे कविता की प्रेरणा का मुख्य तत्व प्रेम जो है। एक ख़त भर से कोई प्रेमी किस तरह खुश हो जाता है-
मुद्दतों बाद मेरे नाम तेरा ख़त आया।
एक दिया घोर अंधेरे में जला हो जैसे।।29
और जब कोई प्रेमी परदेस जाने लगे तो विरह की ज्वाला उसे जला ही डालती है। ऐसे में हर चीज़ जलती हुई प्रतीत होती है-
वो गया परदेस तो सारे वचन जलने लगे।
नर्म पलकों पर गुलाबों के सुमन जलने लगे।।30
जाना प्रेमी की मजबूरी है वह प्रेयसी को न घबराने और जल्दी आने का वादा करता है-
दूर सफ़र पर जाते हैं हम जाना भी मजबूरी है।
लौटके हम आयेंगे एक दिन देखो तुम घबराना मत।।31
विरह में प्रेमी को भी उन दिनों की याद सताने लगती हैं जब वह एक दूसरे से चोरी-चोरी मिलते थे-
क्या दिन थे जब इन साँसों में ख़ुशबुएँ सी बहती थीं।
उनकी काली आँखें मेरा रस्ता देखती रहती थीं।।32
उसके स्मृतिपटल पर तब की याद भी आने लगती है जब वह अपनी प्रेयसी की मिट्टी से तस्वीर बनाता था और पागल कहा जाता था-
मिट्टी से मैं रोज़ किसी की एक तस्वीर बनाता था।
गाँव की सारी गौरी मुझको पागल लड़का कहती थीं।।33
प्रेयसी भी ग़मों से घिरी है और वह अपने प्रेमी से शिकायत करती है-
एक तू ही था जो मेरे ग़मों में शरीक था।
कोई नहीं है अब मेरा ग़म-ख़्वार देख ले।।34
तब प्रेमी भी शिकायत करता है और कहता है-
साथ तुम भी तो दो प्यार की राह में।
बोझ ‘तन्हा’ ये कब तक उठाऊँगा मैं।।35
कवि ने उन प्रेमियों के बारे में कहा है जिनमें प्रेयसी का विवाह किसी अन्य के साथ हो जाता है और प्रेमी उसकी शहनाई बजते हुए देखकर अपने प्यार की हार स्वीकार कर लेता है-
दूर कहीं पर डोली उठी शहनाई बजी।
हार गये हम जीती बाज़ी प्यार की।।36
तवायफ- तवायफ भी इसी समाज का एक पक्ष है। भले ही यह समाज का काला पक्ष हो मगर उसकी बेबसी को कोई नहीं देखता है। तवायफ की मजबूरी को भी सुधीर तन्हा खूब जानते हैं-
किसी हालात की मारी तवायफ़ की कहानी है।
ये रंगीं रात और ये पायलों की आँख के आँसू।।37
सामाजिक पक्ष किसी भी कवि की कविता में अनायास ही चला आता है। इसका सबसे बड़ा कारण कवि का सामाजिक प्राणी होना है। कवि सुधीर कुमार ‘तन्हा’ का सामाजिक पक्ष प्रबल है और उनकी रचनाओं से सामाजिक तानेबाने का ज्ञान हो जाता है। उनकी रचनाएं यथार्थ का बोध कराती हैं।
संदर्भ
1. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 34
2. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 23
3. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 15
4. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 20
5. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 78
6. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 81
7. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 78
8. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 94
9. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 92
10. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 15
11. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 44
12. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 66
13. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 76
14. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 28
15. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 28
16. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 76
17. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 134
18. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 28
19. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 62
20. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 82
21. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 82
22. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 80
23. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 121
24. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 121
25. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 72
26. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 141
27. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 72
28. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 63
29. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 22
30. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 24
31. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 47
32. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 45
33. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 45
34. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 82
35. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 107
36. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 141
37. सुधीर कुमार ‘तन्हा’, सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 42

 

ग़ज़ल सम्राट: दुष्यंत कुमार

 




अमन कुमार  

आलोक कुमार 

दुष्यंत कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में जनपद बिजनौर के ग्राम राजपुर नवादा के जमींदार परिवार में 1 सितंबर 1933 को हुआ था। आपकी माता जी का नाम श्रीमती राम किशोरी देवी एवं पिता का नाम चैधरी भगवत सहाय था। कवि की प्रारंभिक शिक्षा गाँव की ही पाठशाला में हुई। 1948 में कवि ने एस.एन.एस.एम. हाई स्कूल नहटौर जनपद बिजनौर से दसवीं कक्षा पास कर 1950 में चंदौसी, मुरादाबाद के एस.एम. काॅलेज से इंटरमिडिएट किया। 1950-54 तक कवि ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र रहते हुए बी.ए. और हिंदी साहित्य से एम.ए. किया। 1957-58 में कवि ने मुरादाबाद से बी.एड. किया। चंदौसी में 30 नवंबर 1949 को राजेश्वरी कौशिक से कवि का विवाह सम्पन्न हुआ। कवि ने सर्व प्रथम जनपद बिजनौर के क़सबे किरतपुर में नौकरी। कवि ने यहाँ एक विद्यालय में अध्यापकी की। यहाँ अध्यापकी करने के बाद ही मुरादाबाद से बी.एड. किया। तत्पश्चात आकाशवाणी दिल्ली के हिंदी वार्ता-विभाग में स्क्रिप्ट राइटर के रूप में कार्य किया। 1960 के अंतिम दिनों में कवि स्थानांतरण पाकर भोपाल पहुँचे। कवि ने मध्य प्रदेश के संस्कृत संचालनालय के अंतर्गत भाषा-विभाग के सहायक संचालक पद पर नियुक्ति पाई। कवि ने कुछ समय के लिए आदिम जाति जनकल्याण विभाग की प्रतिनयिुक्तियों के अतिरिक्त शेष समय 30 दिसंबर 1975 तक इसी भाषा-विभाग में बिताया।
दुष्यंत कुमार अभिनंदन के विरोधी थे। वह कहा करते थे- ‘‘व्यक्तिगत रूप में मैं इन अभिनंदनों के खि़लाफ़ हूँ। एक तो इसलिए कि लेखक को अपनी पीठ पर भरसक कोई ऐसा अहसास नहीं लादना चाहिए जो उसकी स्वतंत्रता में बाधक बने और दूसरे इसलिए कि इससे लेखक को एक वर्ग के रूप में दूसरे वर्गों पर तरजीह मिलती है जो कि एक ग़लत बात है। आखि़र क्यों शासन उस क्लर्क का अभिनंदन न करे जिसने अपने जीवन के तीस अमूल्य वर्ष बड़ी निष्ठापूर्वक उन फाइलों में झौंक दिए जिनसे कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था। इसी प्रकार सुनार, बढ़ई, मोची, मज़दूर और मेहतर, हरेक की अपनी एक महत्वपूण सामाजिक भूमिका है। आखि़र उनका अभिनंदन क्यों नहीं होता?
फिर लेखक में ऐसे कौन-से सुर्ख़ाब के पर लगे हैं कि आम आदमी से अलग है? क्यों वह शासकीय और सार्वजनिक सम्मान की कल्पना करता है? क्यों वह राज्यपालों या मंत्रियों की परिचय परिधि में आना चाहता है? ;मैंने तो किसी राज्यपाल को किसी लेखक के सान्निध्य की इच्छा करते हुए नहीं देखाद्ध क्यों वह चाहता है कि सत्ताधारी उसकी लेखनी से परिचित्त हों और उससे सामान्य लोगों की अपेक्षा भिन्न प्रकार का व्यवहार करें? आखिर लेखक भी तो तो प्रोफे़सर, वकील, चित्रकार और मूर्तिकार आदि की तरह ही एक वर्ग है और इस व्यावसायिक युग में उन्हीं की तरह अपने ढंग से अपना पेट पालता है। अलबत्ता उसे यह अतिरिक्त सुविधा ज़रूर प्राप्त है कि वह अपने थोथे और घटिया से घटिया अहम् को भी शानदार अभिव्यक्ति दे सकता है। पिटकर आने के बाद वह जोशीली कविताएँ लिख सकता है या अपने पौरुष और बल का बखान कर सकता है। सर्वत्र उपेक्षा सहकर भी वह शिमला समझौते में मेरा विनम्र योगदान’ जैसा निबंध लिख सकता है या डाकुओं के समर्पण का श्रेय अपनी कल्पना में लूट सकता है। वह एक लेख में दस बार अपना नाम ठँूस सकता है और उस बनिए की ख़बर भी ले सकता है जो उसके घर रोज़ पैसों का तकाज़ा करने आता है।
आप लेखक के नाते अपने ‘मैं’ को झुनझुने की तरह बजाते हैं, मित्रों की प्रशंसा और शत्रुओं की निंदा करते हैं, साहित्य के नाम पर दिल की भड़ास निकालते हैं, मित्रों की प्रशंसा और शत्रुओं की निंदा करते हैं, साहित्य के नाम पर दिल की भड़ास निकालते हैं औ यह भी आशा करते हैं कि दुनियां आपको पूजे, लोग आपको चाहें, शासन आपको मान्यता दे।’’
साहित्य सृजन- कवि ने नहटौर में शिक्षा प्राप्ति के समय ही रचनाधर्मिता का निर्वाह प्रारंभ कर दिया था। यहाँ कवि ने विधिवत कविता-लेखन, कविता की पांडुलिपि तैयार कर चंदौसी में शिक्षा के दौरान अंतिम रूप दिया। समर्पण था छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत को। कवि ने पंत को द्रोणाचार्य और स्वयं को एकलव्य माना। कवि ने अपना उप नाम ‘परदेशी’ रखा। विवाह के समय निमंत्रण-पत्र पर भी दुष्यंत कुमार ‘परदेशी’ छपवाया गया। जब कवि उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद पहुँचे तब वहाँ उन्हें कमलेश्वर और मार्कंडेय जैसे अभिन्न मित्र मिले। तिकड़ी बनी तो ‘त्रिशूल’ नाम से प्रसिद्धि प्राप्त होते देर नहीं लगी। यहीं से तीनों ने मिलकर मासिक पत्रिका ‘विहान’ का प्रकाशन प्रारंभ किया।
कृतित्व- दुष्यंत कुमार के लेखन का प्रारंभ 1945 से ही हो गया था। प्रारंभ कविता से किया और बाद में कहानी भी लिखने लगे। प्रारंभ में कवि-सम्मेलनों के लिए मंचीय कविताएं लिखीं परंतु शीघ्र ही साहित्यिक गीतों और कभी-कभी ग़ज़ल की रचना भी करने लगे। 1949 में कविताओं की पांडुलिपि तैयार हो गई थी। 1954-55 में हैदराबाद से प्रकाशित कल्पना पत्रिका ;जनवरी 1955द्ध में नई कहानी: परंपरा और प्रयोग’ शीर्षक ऐतिहासिक आलोचना का प्रकाशन हुआ। 1956-57 में ‘सूर्य का स्वागत’ नामक शीर्षक से कविताओं का संचयन और प्रकाशन हुआ। इससे पहले अनेक पत्र-पत्रिकाओं-प्रतीक, निकश, संकेत, नई कविता आदि में प्रकाशन हो चुका था। ‘आवाजों़ के घेरे’ ;कविता संग्रहद्ध 1963 में प्रकाशित हुई। 1964 में ‘एक कंठ विषपाई’ ;काव्य-नाटकद्ध प्रकाशित हुआ। ‘छोटे-छोटे सवाल’ 1964 में और ‘आंगन में एक वृक्ष’ 1970 में शीर्षक से उपन्यास प्रकाशित हुए। 1973 में कविताओं का तीसरा संग्रह ‘जलते हुए वन का वसंत’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। अंतिम किंतु सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त करने वाली कृति ‘साये में धूप’ रही। 1975 में ऐतिहासिक ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ नाम से प्रकाशित किया गया। 
दुष्यंत कुमार कृत साये में धूप ;ग़ज़ल संग्रहद्ध
भूमिका भाग में दुष्यंत स्वीकारतेे हैं- मैं स्वीकार करता हूँ कि ग़ज़लों को भूमिका की जरूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में जरूरी है। कुछ उर्दू-दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज किया है। उनका कहना है कि शब्द ”शहर“ नहीं ‘शह्र’ होता है, ‘वज़न’ नहीं ‘वज़्न’ होता है।
- कि मैं उर्दू नहीं जानता लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि ‘शहर’ की जगह ‘नगर’ लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ, किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है, जिस रूप में वे हिंदी में घुल मिल गए हैं। उर्दू का ‘शह्र’ हिंदी में ‘शहर’ लिखा और बोला जाता है, ठीक उसी तरह जैसे हिंदी का ‘ब्राह्मण’ उर्दू में ‘बिरहमन’ हो गया है और ‘)तु’ ‘रुत’ हो गई है।
- कि उर्दू और हिंदी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा करीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गई हैं, जिसे मैं बोलता हूँ।
- कि ग़ज़ल कि विधा एक बहुत पुरानी, किंतु सशक्त विधा है, जिसमें बड़े-बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य-रचना की है। हिंदी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नए कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आजमाया है। परंतु अपनी सामथ्र्य और सीमाओं को जानने के बावजूद इस विधा में उतरते हुए मुझे आज भी संकोच तो है, पर उतना नहीं जितना होना चाहिए था। शायद इसका कारण यह है कि पत्र-पत्रिकाओं में इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें पढ़कर और सुनकर विभिन्न वादों, रूचियों और वर्गों की सृजनशील प्रतिभाओं ने अपने पत्रों मंतव्यों एवं टिप्पणियों से मुझे एक सुखद आत्म-विश्वास दिया है। इस नाते मैं उन सबका अत्यंत आभारी हूँ। -कृऔर कमलेश्वर! वह इस अफ़सानें में न होता तो ये सिलसिला शायद यहाँ तक न आ पाता। मैं तो-
हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।
हिंदी में आधुनिक ग़ज़ल का सबसे अधिक महत्वपूर्ण नाम दुष्यंत ही है। यह सही है, दुष्यंत के बाद हिंदी-ग़ज़ल काफ़ी आगे बढ़ी, कला और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर इसका उल्लेखनीय विकास हुआ, किंतु जो ख्याति एवं लोकप्रियता दुष्यंत को प्राप्त हुई, वह तो अद्वितीय ही है। हिंदी में ग़ज़लकारों ने अच्छे से अच्छा लिखने का प्रयास किया, किंतु कोई भी दुष्यंत को छू नहीं सका है। सच यही है कि दुष्यंत पहले ऐसे ग़ज़लकार हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को हिंदी में स्थापित करने का सफल प्रयास किया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग़ज़ल की लोकप्रियता का प्रारंभ दुष्यंत ने ही किया। हिंदी साहित्य में आज ग़ज़ल की चमक है। निरंतर ग़ज़ल-संग्रह छप रहे हैं। पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़ल खूब नज़र आ रही है। कवि-सम्मेलनों में ग़ज़ल ने धूम मचा रखी है। ‘‘इस अपार लोकप्रियता के मूल कारणों की खोज की जाए तो दुष्यंत का नाम और काम अवश्य नज़र आएगा। लेकिन वे कौन-से कारण हैं, जिनके रहते दुष्यंत एक ग़ज़लकार के रूप में स्वयं को स्थापित कर सके और लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचकर ग़ज़ल-सम्राट की उपाधि से सम्मानित हो सके। वस्तुतः दुष्यंत ने एक ओर तो ग़ज़ल को अपने युग की धड़कनों से जोड़ा तो दूसरी ओर उसे अभिव्यक्ति की वह नवीनता दी, जो हिंदी के लिए नितांत चैंका देने वाली थी। साहित्य में अंदाजे़-बयाँ या बात कहने की व्यक्तिगत शैली, अभिव्यक्ति का अनोखा और निराला ढंग जो चमत्कार कर दिखाता है, वह केवल शब्दों के द्वारा संभव नहीं होता। क्योंकि शब्द तो प्रायः वही होते हैं, जिनका प्रयोग अपने-अपने ढंग से हर साहित्यकार करता है, किंतु क़लम का धनी कलाकार इन शब्दों के प्रयोग का एक नया और सबसे अनोखा अंदाज़ ग्रहण करता है और उन पर अपने कलात्मक व्यक्तित्व की गहरी छाप छोड़ जाता है और इस प्रकार वह स्वयं अपने-आपको और अपने साहित्य दोनों को अमर कर जाता है। नवीनता शब्दों में नहीं, शब्दों के प्रयोग करने के ढंग में होती है, सोच में और विचार में होती है। दुष्यंत के काव्य में शब्दों के प्रयोग और सोच दोनों ही में असाधारण नवीनता थी, इसलिए उनकी आवाज़ ने हिंदी के विशाल क्षेत्र में फैले हुए अनगिनत पाठकों को चैंकाया और प्रभावित किया।’’
‘‘यह सही है कि हिंदी के सर्वप्रथम स्थापित ग़ज़लकार दुष्यंत की ग़ज़लों में व्याकरण-संबधी कुछ दोष अवश्य हैं, फिर भी दुष्यंत के महत्व और महानता में कोई कमी नहीं आ सकती। ग़ज़ल के प्रारंभिक दौर में वह न होते, कोई और होता, तब भी इस तरह के दोष का रह जाना संभव था, क्योंकि तब तक न तो हिंदीभाषी ग़ज़ल की संस्कृति से पूरी तरह जुड़ पाए थे, न उन्हें ग़ज़ल की परिपूर्ण जानकारी ही थी। ऐसी स्थिति में दुष्यंत ने जो कार्य कर दिखाया, वह महत्वपूण है। यद्यपि आज भी हिंदी-ग़ज़लकारों को ग़ज़ल की विधागत जानकारी संतोषजनक मात्रा में नहीं है, फिर भी कई ग़ज़लकार ऐसे हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को बड़ी हद तक समझा है और वे अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं। लेकिन प्रेरणा का सबसे बड़ा और सबसे पहला स्रोत दुष्यंत की आवाज़ और उनका लहजा ही है। उनके ग़ज़ल-संग्रह ‘साये में धूप’ के अब तक कितने ही संस्करण छप चुके हैं। आज भी ग़ज़ल-प्रेमियों को दुष्यंत के जितने ‘अशआर’ कंठस्थ हैं, शायद ही किसी दूसरे ग़ज़लकार के हों। इसका कारण है कि दुष्यंत की आवाज़, उनके लहजे और अंदाज़ में जो नयापन तथा आकर्षण है, उसमें जो प्रभाव और तेवर है, वह किसी और में उतना नहीं है।’’
दुष्यंत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने समय के सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों को अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया। उन्होंने ग़ज़ल के स्वरूप को छेड़ा नहीं बल्कि उसे ज्यों का त्यों अपना लिया। भाषा और विषय पर उनका जादू चल निकला। दुष्यंत ने जिन विषयों को चुना उन्हें भरपूर अभिव्यक्ति दी। दुष्यंत की ग़ज़ल के अशआर सामाजिक या राजनीतिक दस्तावेज़ ही बनकर नहीं रहे बल्कि ग़ज़ल की कलात्मकता का उदाहरण बन गए।
गूँगे निकल पड़े हैं, जबाँ की तलाश में,
सरकार के ख़िलाफ ये साज़िश तो देखिए।

उनकी अपील है कि उन्हें हम पसंद करें,
चाकू से पसलियों की गुज़ारिश तो देखिए।
स्पष्ट हो जाता है कि उक्त दोनों शेर तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में कहे गए हैं। इन शेरों को देखें-
वह आदमी नहीं है, मुकंबल बयान है,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।
फिसले जो इस जगह तो लुढकते चले गए,
हमको पतानहीं था कि इतना ढलान है।

‘माथे की चोट’ वाले आदमी को ‘मुकंबल बयान’ बताकर दुष्यंत ने स्वयं कुछ न कहते हुए सब कुछ कह दिया है। दुष्यंत माथे की चोट वाले आदमी की तरफ़ केवल इशारा करते हैं और उसे ‘मुकंबल बयान’ बताकर स्वयं दूर जाकर खड़े हो जाते हैं। दूसरे शेर से समझ में आ जाता है कि ऊँचाइयों पर ले जाने की बात करने वालों ने किस प्रकार आम आदमी को ऐसी राह पर धकेल दिया है, जहाँ ऐसा ढलान है कि आदमी खड़ा हो तो आगे मुँह के बल गिर जाने का ख़तरा दिखाई दे जाता है। दुष्यंत ने बखूबी प्रतीकों को से अपनी बात कही है। इन शेरों को देखें-
समुद्र और उठा, और उठा, और उठा,
किसी के वास्ते ये चाँदनी बबाल हुई।

उन्हें पता भी नहीं है कि उनके पाँवों से,
वो खूँ बहा है कि ये गर्द भी गुलाल हुई।

दोनों शेर ग़ज़लकार की कलाकारी का अद्भुत उदाहरण हैं। यहाँ समुद्र और चाँदनी जैसे प्रतीकों से विशेष प्रकार की कलात्मकता उत्पन्न हो गई है। चतुर्दशी की रात में समुद्र में ज्वार आता है और समुद्र उफनने लगता है। कवि  कहने में सफल हुआ है कि आजादी के बाद भारत में जो राजनीतिक उफान आया है वो स्वतंत्रता के कारण ही आया है। कवि इसी स्वतंत्रता को यहाँ चांदनी मानता है। दूसरे षेर में  कवि ने भयंकर कमाल कर दिखाया है। पाँवों से बहने वाले खून ने मिट्टी को भी गुलाल का रूप दे दिया है। यह बात दुष्यंत ने उन लोागों के लिए कही है जो दिनभर मेहनत-मजदूरी कर पेट भरने का प्रयास करते हैं। इस एक शेर ने भारतीय ग़रीबी के हालातों पर करारा प्रहार भी किया है। दुष्यंत के लिए हर आदमी का अपना दर्द था। उनका यह शेर देखें-
आज मेरा साथ दो, वैसे मुझे मालूम है,
पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं।
हालांकि कुछ विद्वान इन दोनों पंक्तियों में काल दोष ;पहली पंक्ति वर्तमान और दूसरी भविष्य मेंद्ध मानते हैं। मिथकों को तोड़ना और कलात्मकता के साथ अपने बात कहने में दुष्यंत को जैसे महारत हांसिल थी। सुभाष चंद बोस कहते हैं ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’। सुभाष जानते थे कि खून के बदले आजादी अवश्य मिल जाऐगी। यहाँ दुष्यंत भी जानते हैं कि लोग अगर साथ दें तो उन्हें उनके अधिकार मिल ही जाएंगे किंतु साथ ही वह यह भी जानते हैं कि भविष्य को संवारने के लिए आज कोई भी साथ देने वाला नहीं है। दुष्यंत यर्थाथ को जीते थे। वो सामाजिक स्थिति को दिन ब दिन ख़राब हो ते देख रहे थे-
हालाते-जिस्म, सूरते-जाँ और भी ख़राब,
चारों तरफ़ ख़राब, यहाँ और भी ख़राब।

यही नहीं वो आतंकी गतिविधयों को ध्यान में रखकर कहते हैं-
सैर के वास्ते सड़कों पे निकल आते थे,
अब तो आकाश से पथराव का डर लगता है।

जो लोग जानबूझकर बेवकूफ़ बने रहते हैं या बनने का नाटक करते हैं। उन लोगों के लिए दुष्यंत ने क्या खूब कहा है-
मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता,
हम घरों में भटके हैं, कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे।

दुष्यंत आशावादी कवि थे और लोगों को भी आशावादी बनने की प्रेरणा देते थे-
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

देखें दुष्यंत की कुछ ग़ज़लें-
कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।
न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफ़र के लिए।
खुदा नहीं, न सही, आदमी का ख़्वाब सही,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की,
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं,
गााते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।
एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों से तहख़ाने लगे हैं।
मौलवी से डँट खाकर अहले मक़तब,
फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं।

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।
यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।
ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,
वो सब-के-सब परीशँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा।

एक कंठ विषपाई ;काव्य नाटकद्ध- दुष्यंत कृत एक कंठ विषपाई एक काव्य नाटक है। जिसमें वर्तमान परिस्थितियों को बड़ी ही सरलता के साथ उकेरा गया है।
देवत्त्व और आदर्शों का परिधान ओढ़
मैने क्या पायाकृकृ?
निर्वासन!
प्रेयसी वियोग!!
हर परंपरा के मरने का विष
मुझे मिला
हर सूत्रपात का श्रेय ले गये लोग।
मैं ऊब चुका हँ
इस महिमा-मंडित छल सेकृकृ।

एक कंठ विषपाई की ये पंक्तियाँ क्या इस बात की ओर इशारा नहीं करती कि सह रास्ते पर चलने वाले आज के उन समस्त लोगों के लिए, जिन्हें पग-पग पर वैसी ही अवहेलना झेलनी पड़ रही है? क्योंकि आज तो हर कदम पर शिवत्व तिरस्कृत हो रहा है, न्याय की अवहेलना हो रही है। योग्यता की पूछ नहीं। काबिलों व उनके कैरियर की निर्मम हत्या हो रही है। उन्हें मिल रहा है- निर्वासन व जीवन का ज़हर और अयोग्यों को अन्याय कारणों से मिल रहा है-सत्ता, सम्मान व सुखकृकृसब कुछ।
       जलते हुए वन का वसंत ;काव्य संग्रहद्ध- दुष्यंत कुमार आम आदमी के कवि थे। तभी तो उन्होंने पुस्तक की भूमिका में लिखा- ‘ये कविताएँ इसी हद तक मेरी हैं कि मैंने इन्हें लिखा और भोगा है। यदि आपको इनमें पहचाना-सा स्वर, आत्मीय-सी भाषा और अपनी-सी बात नज़र आए तो यह मेरी सफलता है।’ कवि स्वीकार करता है कि ‘मेरे पास कविताओं के मुखौटे नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राएँ नहीं हैं और अजनबी शब्दों का लिबास नहीं है। मैं एक साधारण आदमी की पीड़ा, उत्तेजना, दबाव, अभाव और उसके संबंधों के उलझावों को जीता और व्यक्त करता हूँ।
कवि दुष्यंत ने किसी को चैंकाने या किसी चमत्कार के लिए कविता नहीं लिखी। कविता को परिभाषित करते हुए दुष्यंत स्वीकारते हैं-‘मैं कविता को चैंकाने या आतंकित करने के लिए इस्तेमाल नहीं करता, गो कि ऐसा करके लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा जा सकता है। परंतु कविता से केवल यह अपेक्षा, कितनी कम है। मैं जानता हूँ कि अहसास के अनेक स्तरों को चीरती हुई, व्यक्तित्व के भीतर दूर तक उतर जाने वाली चीज़, कविता होती है। उसे इतनी छोटी भूमिका नहीं दी जा सकती। समाज और व्यक्ति के संदर्भ में उसका दायित्व, इससे बहुत बड़ा है।’ कवि कहता है-‘कविता यातना से पैदा होती है।’
‘जलते हुए वन का वसंत’ कवि की कविताओं का तीसरा संग्रह है। जिसमें अवगाहन सहित कुल  45 कविताएँ हैं। संग्रह को तीन खंडों में बांटा गया है। पहले खंड को कवि ने इतिहास-बोध नाम दिया है और यह खंड शानी के नाम है। इसमें दस कविताएँ हैं जिनमें योग-संयोग, यात्रानुभूति, उपक्रम एक सफ़र पर, परवर्ती-प्रभाव, शगुन-शंका, सुबह: समाचार-पत्र के समय, आत्मालाप, अस्ति-बोध और वसंत आ गया शामिल की गई हैं। दूसरे खंड को देश-प्रेम का नाम दिया गया है। यह खंड सत्येन के नाम है।  इसमें देश-प्रेम, ईश्वर को सूली, चिंता, देश, जनता, मौसम, तुलना, युद्ध और युद्ध-विराम के बीच, मंत्री की मैना, सवाल, एक चुनाव-परिणाम, कहाँ से शुरू करें यात्रा, और गाते-गाते कुल 13 कविताएँ हैं। तीसरे खंड को चक्रवात नाम दिया गया है। यह खंड रमाकांत के नाम है। इसमें एक शाम की मनःस्थिति, वर्षों बाद, प्रतीति, गीत वर्षा, स्वस्तिक क्षण, एक निमंत्रण का उत्तर, पहुँच, विदा, विदा के बाद: प्रतीक्षा, एक जन्म दिन पर, यह साहस, एक साम्य, एक और प्रसंग, साँझ: एक विदा-दृश्य, सृष्टि की आयोजना, एक समझौता, होंठों के नीचे फिर, गीत, मेरे स्वप्न, और तुझे कैसे भूल जाऊँ कुल 21 कविताएँ हैं।
आंगन में एक वृक्ष ;उपन्यासद्ध- दुष्यंत कुमार ने बहुत कुछ लिखा पर जिन अच्छी कृतियों से उनके रचनात्मक वैभव का पता चलता है, यह उपन्यास उनमें से एक है। उपन्यास में एक सामन्ती परिवार और उसके परिवेश का चित्रण है। सामंत ज़मीन और उससे मिलने वाली दौलत को कब्जे में रखने के लिए न केवल ग़रीब किसानों, अपने नौकर-चाकरों और स्त्रियों का शोषण और उत्पीड़न करता है, बल्कि स्वयं को और जिन्हें वह प्यार करता है, उन्हें भी बर्बादी की तरफ ठेलता है, इसका यहाँ मार्मिक चित्रण किया गया है।
उपन्यास बड़ी शिद्दत से दिखाता है कि अंततः सामंत भी मनुष्य ही होता है और उसकी भी अपनी मानवीय पीड़ाएँ होती हैं, पर अपने वर्गीय स्वार्थ और शोषकीय रुतबे को बनाए रखने की कोशिश में वह कितना अमानवीय होता चला जाता है इसका खुद उसे भी अहसास नहीं होता। उपन्यास के सारे चरित्र चाहे वह चंदन, भैनाजी, माँ, पिताजी और मंडावली वाली भाभी हों या फिर मुंशीजी, यादराम, भिक्खन चमार आदि निचले वर्ग की हों सभी अपने परिवेश में पूरी जीवंतता और ताज़गी के साथ उभरते हैं। उपन्यासकार कुछ ही वाक्यों में उनके पूरे व्यक्तित्व को उकेरकर रख देता है और अपनी परिणति में कथा पाठक को स्तब्ध तथा द्रवित कर जाती है। दुष्यंत कुमार की भाषा के तेवर की बानगी यहाँ भी देखने को मिलती है- कहीं एक भी शब्द फालतू न सुस्त। अत्यंत पठनीय तथा मार्मिक कथा-रचना। 
और इसी दिन का मुझे इंतज़ार रहता। चंदन भाई साहब आते तो मेरे लिए घर में नुमाइश-सी लग जाती। रंग-बिरंगे कपड़े, अजीबो-ग़रीब खिलौने, जापानी पिस्तौल और गोलियाँ और इनके अलावा खूबसूरत डिब्बों में बंद टाफियाँ व चाॅकलेट ओर यह सब कुछ अकेले मेरे लिए। माँ हमेशा उन्हें डाँटती, 'चंदन, तू इतने पैसे क्यों फूँकता है रे?'
'कहाँ बीजी! देखो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी नहीं लाया इस बार।' भाई साहब बड़ी मधुर आवाज़ में, सहज मुस्कान होठों पर लाकर सफ़ाई देते। माँ बड़बड़ाती हुई रसोईघर में चली जाती है और मैं भाई साहब के और पास सरक आता। मेरी तरफ मुख़ातिब होते हुए वे धीरे-से मेरे कान में कहते, ”बीजी से ज़िक्र मत करना, उनके लिए भी साड़ी लाया हूँ। जाते हुए दूँगा।“ फिर अचानक गंभीर होकर पूछते, ”हाँ भई, क्या प्रोग्राम है आज का?“
मैं प्रोग्राम का मतलब नहीं समझता था। केवल उनकी ओर प्यार और श्रद्धा से निहारता रहता। वे हँसकर मुझे अपने से चिपटा लेते और खुद ही समझाते, ”तो फिर यह तय रहा कि दोपहर में म्यूजिक, शाम को शिकार और रात में यादराम के हाथ के पराठे और तीतर?“ मैं गरदन हिलाकर सहमति प्रकट करता और तत्काल मेरी आँखों में यादराम की गंजी चाँद और पराँठे बेलते समय उसकी कनपटियों पर बार-बार उभरती-गिरती नसों की मछलियाँ तैरने लगतीं।
यादराम भाई साहब का ख़ानसामा था। भाई साहब जब भी मुरादाबाद से आते, यादराम साथ ज़रूर आता। दोपहर का भोजन भाई साहब माँ के रसोईघर में बैठकर करते। मगर शाम को पिताजी और मैं दोनों ही उनके साथ यादराम के हाथ के पराँठे खाते। सिर्फ़ माँ अपनी रसोई अलग पकाती थीं।
”क्यों यादराम, तेरी चाँद के बाल कहाँ गए?“ मैं अक्सर यह सवाल उससे पूछा करता। और यादराम हमेशा इसका एक जवाब देता, ”बाबूजी के जूते चाट गए, लल्लू।“
माँ को यादराम एक आँख नहीं भाता था। शुरू-शुरू में उन्होंने मेरे वहाँ खाने का बड़ा विरोध किया। लेकिन कुछ तो मेरी अपनी ज़िद और कुछ भाई साहब के अनुनय-अनुरोध के सामने उन्हें झुक जाना पड़ा। मुझे खूब याद है कि स्वभाव से बहुत कठोर होने के बावजूद माँ भाई साहब की बात नहीं टालती थीं। यह और बात है कि उसके बाद भी वे मुझे लेकर बराबर भाई साहब और पिताजी, दोनों को यह ताना देती रहतीं कि उन्होंने ‘छोटे’ को भी म्लेच्छ बना दिया है। गाँव में भाई साहब एक भूचाल की तरह आते थे और डेढ़-दो हज़ार आदमियों की उस छोटी-सी बस्ती में, हर जगह, हर कदम पर अपने नक़्श और छाप छोड़ जाते थे। उनके जाने के बाद कई दिनों तक लोग क़िस्से-कहानियों की तरह उन्हें याद करते रहते ओर अक्सर यही ज़िक्र हुआ करता, ”देखो, कितना बड़ा आदमी है, मगर घमंड छू तक नहीं गया!“ भिक्खन चमार- जिसे भाई साहब ‘मूविंग रेडियो स्टेशन’ कहा करते थे, उनके चले जाने के बाद, अपने ठेठ किस्सागोई के अंदाज़ में उनकी कहानियाँ सुनाता, ”अरे भैया, बाबू आदमी थोड़ई हैं, फिरस्ते हैं। उस दिन सुबह-सुबह बंदूक लिए हुए आ गए। बोले- ‘‘क्यों मूविन रेडियो-टेसन’ अकेले-अकेले माल उड़ा रये हो!“ मैंने कहा- बाबू, माल कहाँ, खिचड़ी है, तुम्हारे खाने की चीज नईं। बस, बिगड़ गए। बोले- ‘अच्छा! तुम अकेले खाओगे और हम तुम्हारा मुँह देखेंगे?’ और साहब, भगवान झूठ न बुलाए, मैंने लुकमा बनाने के लिए थाली की तरफ हाथ बढ़ाया, तो धड़ाक। साला दिल धक् से हो गया और साहब, सूँ-सूँ करता हुआ एक कव्वा भड़ाक से थाली में आ गिरा। राम!!! राम!!! कहाँ का खाना! हाथ जोड़कर उठ खड़ा हुआ। क्या करता? मगर क्या बेचूक निशाना। साले उड़ते पंछी कू जहाँ चाहा, वहाँ गिरा दिया।“
निशाने की तारीफ़ भाई देवीसहाय जी भी किया करते थे। मगर उससे भी ज्यादा वे भाई साहब के गले पर मुग्ध थे। उनका तकिया-कलाम ‘ओख़्खो जी’ था। इसलिए भाई साहब उन्हें ‘ओख्खो भाई साहब’ कहा करते थे। उनके म्यूजिक प्रोग्राम में बुजुर्गों का प्रतिनिधित्व केवल ‘ओख्खो भाई साहब’ किया करते थे। हम बच्चों को इस प्रोग्राम में बैठने की इजाज़त नहीं होती थी। लिहाज़ा हम हाॅल के बंद दरवाज़ों के पास कान लगाकर सुना करते। तबले के ठोकने, हारमोनियम के स्वर मिलाने और भाई साहब के आलाप लेने से शुरू कर खत्म होने तक हम कई लड़के वहाँ खड़े रहते और जब भाई देवीसहाय जी कहते, ‘ओख्खो जी, क्या चीज़ सुनाई है, भाई चंदन!’ कहाँ से मार दी? तो बड़े लड़के कान लगाकर गौ़र से सुनने की कोशिश किया करते थे।
मुझे उस समय तक संगीत में इतनी दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए मुझे जब भी भाई साहब की याद आती, तो उनकी बातें और कहानियाँ सुनने के लिए मैं ओख्खो भाई साहब की बनिस्बत, भिक्खन चमार की बातें सुनना ज्यादा पसंद करता, जो उन्हें एक महान् और आदर्श नायक के रूप में पेश किया करता था।
लेकिन मंडावली वाली भाभी, जो रिश्ते में हमारी कुछ न होते हुए भी बहुत कुछ होती थी, न तो भाई साहब की महानता के किस्से सुनातीं और न पौरुष के, बल्कि कई घंटों अपनी ही शैली में, उनकी बड़ी-बड़ी आँखों का और उनके रंग-रूप का, उनके सौंदर्य काऔर उनकी शरारतों का हाव-भाव सहित वर्णन किया करती थीं। मेरी तरह उन्हें भी भाई साहब पसंद थे और भाई साहब की बातें सुनाने में वे उतना ही रस लेतीं थीं, जितना मैं सुनने में।
”पिछली बार मैंने खूब सुनाई“, भाभी सुनाया करती थीं, मैंने कहा- लालाजी, कहीं भले घर के लड़के पान खाया करते हैं! हमारे ख़ानदान में तो किसी लड़के ने शादी से पहले पान छुआ तक नहीं था। तुम्हारे ख़ानदान में अक्ल के चिराग़ ऐसे बुझ गए कि कोई कहनेवाला ही नहीं रहा।“ बस भैया, इतना सुनना था कि लगे हाथ-पाँव जोड़ने- ‘अरे मेरी प्यारी गुलाबी भाभी! मुझे माफ़ कर दो। मैं कान पकड़ता हूँ, अब कभी पान नहीं खाऊँगा।’
आवाज़ों के घेरे में ;काव्य संग्रहद्ध- अपने आप से अपने परिवेश और व्यवस्था से नाराज़ कवि के रूप में दुष्यंत कुमार की कविताएँ हिंदी का एक आवश्यक हिस्सा बन चुकी हैं। आठवें दशक के मध्य और उत्तराद्र्य में अपनी धारदार रचनाओं के लिए बहुचर्चित दुष्यंत जिस आग में होम हुए, उसे अपनी रचनाओं में लंबे समय तक महसूस किया जाता रहेगा।
आवाजों के घेरे दुष्यंत कुमार का एक ज़रूरी कविता-संग्रह है। इसमें धुआँ-धुआँ होती उस शख्सियत को साफ तौर पर पहचाना जा सकता है लेकिन रचनात्मक स्तर पर कवि का यह विरोध व्यवस्था से अधिक अपने आप से है, जहाँ व्यक्ति न होकर वह एक वर्ग है- मुठ्ठियों को बाँधता और खोलता। बाँधना, जो उसकी जरूरत है ओर खोलना, मजबूरी। एक प्रकार निरर्थकता और ठहराव का जो बोध इन कविताओं में है, वह सार्थक और गतिशील होने की गहरी छटपटाहट से भरा हुआ है। स्पष्टतः कवि का यही द्वंद्व और छटपटाहट इन कविताओं का रचनाधर्म है, जिसे सहज और सार्थक अभिव्यक्ति मिली है। दुष्यंत लय के कवि हैं, इसलिए मुक्तछंद होकर भी ये कविताएँ छंदमुक्त नहीं हैं। साथ ही यहाँ उनके कुछ गीत भी हैं और बाद में सामने आई बेहतरीन ग़ज़लों की आहटें भी। संक्षेप में, यह संग्रह दुष्यंत की असमय समाप्त हो गई काव्य-यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
आज
अक्षरों के इस निविड़ वन में भटकतीं
यह हज़ारों लेखनी इतिहास का पथ खोजती हैं
कृक्रांति!
कितना हँसो चाहे
किंतु ये जन सभी पागल नहीं।

रास्तों पर खड़े हैं पीड़ा भरी अनुगूँज सुनते
शीश धुनते विफलता की चीख़ पर जो कान
स्वर-लय खोजते हैं
ये सभी आदेश-बाधित नहीं।

इस विफल वातावरण में
जो कि लगता है कहीं पर कुछ महक-सी है
भावना होकृसवेरा होकृकृ
या प्रतीक्षित पक्षियों के गान-
किंतु कुछ है,
गंध-बासित वेणियों का इंतज़ार नहीं।

यह प्रतीक्षा: यह विफलता: यह परिस्थिति:
हो न इसका कहीं भी उल्लेख चाहे
खाद-सी इतिहास में बस काम आए
पर समय को अर्थ देती जा रही है।

आवाज़ों के घेरे
आवाजेंकृकृ
स्थूल रूप धरकर जो गलियों, सड़कों में मँडलाती हैं,
कीमती कपड़ों के जिस्मों से टकराती हैं,
मोटरों के आगे बिछ जाती हैं,
दुकानों को देखती ललचाती हैं,
प्रश्न चिन्ह बनकर अनायास आगे आ जाती हैं-
आवाजें! आवाजें, आवाजें!!

मित्रों!
मेरे व्यक्तित्व और मुझ-जैसे अनगिन व्यक्तित्वों का क्या मतलब?
मैं जो जीता हूँ, गाता हूँ, मेरे जीने, गाने
कवि कहलाने का क्या मतलब?
जब मैं आवाजों के घेरे में
पापों की छायाओं के बीच
आत्मा पर बोझा-सा लो हूँ

संपादन के क्षेत्र में दुष्यंत कुमार- दुष्यंत कुमार ने विभिन्न विधाओं को अपनाते हुए साहित्य सेवा की है। उन्होंने नवोदित साहित्यकारों का मार्गदर्शन भी किया है। इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका विहान इसका उदाहरण है। 
विहान ;द्वैमासिक पत्रिकाद्ध1953- इलाहाबाद से ‘विहान’ का संपादन दुष्यंत कुमार, कमलेश्वर और मार्कंडेय तीनों ने मिलकर किया था। इस पत्रिका के कुल कितने अंक प्रकाशित किए गए, यह तो ज्ञात नहीं हो पाया किंतु विहान का प्रथम अंक मार्च-अप्रैल 1953 में प्रकाशित हुआ था। विहान के प्रबंध संपादक विश्वनाथ प्रसाद जायसवाल थे। जबकि प्रबंध समिति में उमेश चंद्र उपाध्याय, हरिश्चंद्र श्रीवास्तव, दुष्यंत कुमार, जितेंद्र जायसवाल और राधेमोहन सिन्हा थे। विहान के प्रथम अंक के रूप सज्जाकार थे कमलेश्वर और आवरण पृष्ठ पर जो चित्र प्रयोग किया गया था वह था ‘भोर हुई बज उठी बाँसुरी’ यह चित्र चित्रकार के.बी. द्वारा बनाया गया था।
विहान के रचनाकार- विहान के प्रथम अंक के रचनाकार प्रकाश चंद्र गुप्त, भगवत शराण उपाध्याय, रघुपति सहाय ‘फ़िराक’, श्री कृष्णदास, नेमीचंद जैन, विद्यानिवास मिश्र ;लेख, निबंधद्ध, मार्कंडेय, कमलेश्वर, अमृतराय, परमानंद गौड़ ;कहानी, स्कैचद्ध, केदार, नागार्जुन, सतीश दत्त पांडे, गंगाप्रसाद श्रीवास्तव, अजित कुमार, दुष्यंत कुमार, युक्तिभद्र दीक्षित (कविताएं) रहे।
नए रचनाकारों को प्रोत्साहन- दुष्यंत कुमार ने नए रचनाकारों को भी खूब प्रोत्साहन दिया। विहान के अपने अग्रिम लेख में उन्होंने लिखा है- ‘इस अंक में हम तीन बिल्कुल अपरिचित्त प्रतिभाओं को आपसे परिचित्त करा रहे हैं। श्री सतीश पांडे, श्री युक्तिभद्र दीक्षित और श्री परमानंद गौड़। तीनों ही ऐसे लेखक हैं जिनकी लेखनी का लोहा एक न एक दिन सबको मानना पड़ेगा। हम चेष्टा करेंगे कि अगले अंकों में भी इनकी रचनाएँ देते रहें। और भी बहुत से नए लेखकों को खोज निकालने का जिम्मा हमने लिया है और विश्वास करते हैं कि हर अंक में आप से एक न एक नए लेखक दोस्त का परिचय कराते रहेंगे।’
दुष्यंत कुमार के बारे में अन्य विद्वानों के विचार
कमलेश्वर- दुष्यंत कुमार ने विस्फोटक ग़ज़लें लिखकर हिंदी कविता का रचनात्मक मिज़ाज और मौसम ही बदल दिया। हालांकि इसे हमारे बौद्धिकताग्रस्त रचनावादी-छद्म कलावादी और साहित्य के स्वर्ण कवि अभी खुलेआम स्वीकार करने की मुद्रा में नहीं हैं, पर वे जानते हैं कि उनके पैर तले की ज़मीन खिसक चुकी है। हमेशा से हिंदी साहित्य का सवर्ण अभिजात्य साहित्य के अनुशीलन और इतिहास पर गुंजलक मारकर बैठा रहा है। इसने लोक-स्वीकृति को हल्का बनाने के लिए उसी के वज़न पर एक शब्द-गढ़ा है-लोकप्रियता और इसे हेय माना गया है। यह रवैया उन्हीं अभिजात्य-वर्गीय साहित्यकारों का है जो साहित्य के सवालों पर बड़ी रेशमी बहसें करते हैं लेकिन अपने समय के सवालों का सामना नहीं कर पाते। ये लोग अपने ड्राइंगरूमों या मुर्दा सभागारों में ‘रचना का लोकतंत्र’ स्थापित करते रहते हैं और ज़रूरत पड़ी तो बहुत सोच-समझकर, आगा-पीछा देखकर सार्वजनिक सवालों पर जारी किए जाने वाले जनहितवादी बयानों पर अपना नाम देने की अनुमति भी दे देते हैं लेकिन शब्द-सृष्टि के यह वे उपजीव हैं, जो अपने संकुल समय की स्मृति की स्वीकृति न पाने के बावजूद ‘साहित्य के लिए’ किताबों से किताबों में जीवित बने रहने के गैर-साहित्यिक उपक्रम करते रहते हैं।
विजय बहादुर सिंह- जब वे पढ़ते थे, तब कक्षा में और कक्षा के बाहर की कक्षाओं में भी। लिखना शुरू किया, तो लेखन की सधी-बदी राहों, चैहदियों, फैशनों और काव्य-मुहावरों की भीड़ में भी। न तो वे कभी डरे, न सहमे। न झुके, न टूटे। दोस्तों के बीच, कभी-कभी दुश्मनों और दुश्मनों के दोस्तों के साथ भी, यारों के यार की तरह उठते-बैठते। उनकी दोस्ती अगर किसी बात से थी, तो इसी आज़ादी से थी और इसके लिए जिस पुरुषार्थ की जरूरत उन्हें थी, वह उनके स्वभाव और संस्कारों में जन्मना मौजूद था।
राजेश कुमार व्यास- हिंदी ग़ज़ल में दुष्यंत ने सर्वथा नया मुहावरा गढ़ा। इस नये मुहावरे में मनुष्य की जिजीविषा के साथ उसकी वेदना और टूटन को गहराई से महसूस किया जा सकता है। ख़ास बात यह भी कि जीवन के मर्म को समझाती उसकी ग़ज़लों में व्यक्ति और जीवन की बारीक़ पड़ताल है, उसके ख़तरे हैं, जो कुछ घटित हो रहा है, उस पर करारी चोट है और वह विशाल दृष्टिसंपन्नता भी, जिसमें सबकुछ अनुकूल न होते हुए भी भविष्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण छिपा है। ग़ज़ल की परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ती दुष्यंत की ग़ज़लों में जीवनाभुवों की इतनी विविधता है कि उससे दौर और दायरों की पहचान स्वतः ही होती है।
धर्मवीर भारती- सुविधाओं और पद-प्रतिष्ठा से लैस चंद आलोचक एक झूठा मुखौटा लगा कर एक बने-बनाए पूर्वग्रह के साथ जो एक नकली विद्रोही साहित्य-चिंतन और उससे उद्भूत तीसरे दर्जे का घटिया काव्यजाल पाठकों पर थोप रहे थे, उस कृत्रिम काव्य-संसार में एक प्रामाणिक दर्द भरी आवाज़ थी इन ग़ज़लों की, जो बिना किसी आलोचक की शब्दाडंबरी वकालत के पाठक को व्यापक स्तर पर छू गई। एक सच्ची और तीख़ी अकेली छूटी हुई रचना, झूठे शब्दजाल के विराट काव्याडंबर को कैसे पल भर में नक़ली और जाली साबित कर अपने को प्रतिष्ठित कर लेती है, इसका प्रमाण दुष्यंत की ग़ज़लें हैं।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना- दुष्यंत बड़ा मायावी था। बहुत कम लोग होते हैं, जो इतनी खुली ज़िंदगी जीते हों और फिर भी मायावी कहाते हों। स्वस्थ, सुंदर, दिलफेंक, ज़िंदादिल आदमी था वह। उसके दोस्त भी बहुत थे और दुश्मन भी। इस फ़ेहरिस्त को बढ़ाते जाना ही उसकी ज़िंदगी थी। यदि किसी लड़की के पीछे किसी ग़ैर मोहल्ले में उसका क़त्ल किए जाने की ख़बर आती या किसी शराबख़ाने में ज़हरीली शराब पी जाने से मरने की, तो किसी को उतना अचरज नहीं होता, लेकिन दिल के दौरे से उसका मरना बहुत बड़ा मज़ाक लगता है। उसे न तो दिल का कोई रोग था, न ही कभी कोई इस तरह की शिकायत थी। परेशानियों में अपने को फँसाना फिर बहुत सफ़ाई से उनसे निकल जाना, दिल में कोई मलाल न रखना, न कोई बोझ ढोना, अपने दोस्तों में वह सबसे ज़्यादा जानता था। वह बीमार आदमी नहीं था। न तन से, न मन से, न आदत से। वह बेहद हँसमुख था। अलमस्त, बेफ़िक्र, तनाव को गर्द की तरह झाड़ देना वह जानता था। उसे बहुत जल्दी ख़ुश किया जा सकता था। उसकी हवस दुनियादारी की हवस थी। वह सब कुछ पा लेना चाहता था। कभी बच्चों की तरह मचल कर, कभी जूझ कर, कभी हिसाब-किताब भिड़ाने के ख्वाब देखकर। जब उसका चाहा नहीं हो पाता, तो वह उदास होता, गालियाँ देता और अपने रास्ते के रोड़ों को नेस्तनाबूद करने के लिए ज़मीन और आसमान के कुलाबे मिलाता देखा जाता। पर, दुनिया उसके हिसाब से नहीं चलती थी और वह भी बहुत चाह कर भी दुनिया के हिसाब से नहीं चल पाता था और जितना नहीं चल पाता था, उसी की ताक़त से वह लिखता था।
निदा फ़ाज़ली- दुष्यंत नाम के दर्शन पहली बार महान नाटककार कालिदास की नाट्य रचना ‘शाकुंतलम्’ में होते हैं। उसमें यह नाम एक राजा का था, जो शकुंतला को अपने प्रेम की निशानी के रूप में एक अंगूठी देकर चला जाता है। और शकुंतला की जीवन यात्रा इसी अंगूठी के खोने और पाने के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। राजा दुष्यंत के सदियों बाद बिजनौर की धरती ने एक और दुष्यंत कुमार को जन्म दिया।
इस बार वह राजा नहीं थे, त्यागी थे, दुष्यंत कुमार। इस दुष्यंत कुमार के पास न राजा का अधिकार था, न अंगूठी का उपहार और न ही पहली नज़र में होने वाला प्यार था। 20 वीं सदी के दुष्यंत को कालिदास के युग की विरासत में से बहुत कुछ त्यागना पड़ा। इस नए जन्म में वह आम आदमी थे। आम आदमी का समाज उनका समाज था। आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना उनका रिवाज़ था। आम आदमी की तरह उनकी मंज़िल भी सड़क, पानी और अनाज था। दुष्यंत साहित्य में बहुत कुछ कर के और जीवन की बड़ी धूप-छाँव से गुज़र के ग़ज़ल विधा की ओर आए थे। दुष्यंत जिस समय ग़ज़ल संसार में दाखिल हुए उस समय भोपाल प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली और कैफ भोपाली की ग़ज़लों से जगमगा रहा था। इनके साथ हिंदी में जो आम आदमी अज्ञेय के ड्राइंगरूम से और मुक्तिबोध की काव्यभाषा से बाहर कर दिया गया था। बड़ी खामोशी से नागार्जुन और धूमिल की ‘संसद से सड़क तक’ की कविताओं में मुस्कुरा रहा था। इसी जमाने में फ़िल्मों में एक नए नाराज़ हीरो का आम आदमी के रूप में उदय हो रहा था। दुष्यंत की ग़ज़ल के इर्द-गिर्द के समाज को जिन आँखों से देखा और दिखाया जा रहा था वह वही आदमी था जो पहले कबीर, नज़ीर और तुकाराम के यहाँ नज़र आया था, जिसने नागार्जुन और धूमिल के शब्दों को धारदार बनाया था। उसी ने दुष्यंत की ग़ज़ल को चमकाया था। दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के गुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह गुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मों के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमाइंदगी करती है। विषय की तब्दीली के कारण, उनकी ग़ज़ल के क्राफ्ट में भी तब्दीली नज़र आती, जो कहीं-कही लाउड भी महसूस होती है। लेकिन इस तब्दीली ने उनके ग़ज़ल को नए मिज़ाज के क़रीब भी किया है। दुष्यंत कुमार ने हिंदी साहित्य में जो काम किया है अभी उसका उचित्त मूल्यांकन नहीं हो पाया है। दुष्यंत कुमार और उनके साहित्य पर शोध की आवश्यकता है।
संदर्भ
1. साये में धूप, दुष्यंत कुमार, राधकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
2. ग़ज़ल एक अध्ययन - चानन गोविंदपुरी
3. एक कंठ विषपाई - दुष्यंत कुमार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
4. यारों के यार-दुष्यंत कुमार -सं. विजय बहादुर सिंह
5. वर्तमान साहित्य ;मासिक पत्रिकाद्ध अलिगढ, दिसंबर 2008 ़ 
6. विहान -सं. दुष्यंत कुमार, कमलेश्वर, मार्कंडेय, मार्च-अप्रैलःअंक-1, 1953,  इलाहाबाद 
7. जलते हुए वन का वसंत, दुष्यंत कुमार, वाणी प्रकाशन दिल्ली
8. वर्धमान, बिजनौर अंक, वर्धमान महाविद्यालय बिजनौर 1998-99
9. लेख - साहित्य सत्ता की ओर क्यों देखता है: दुष्यंत कुमार
10. धूप उस पार की ;ग़ज़ल संग्रहद्ध - महेंद्र अश्क
11. सूर्य का स्वागत- दुष्यंत कुमार
12. आवाजों के घेरे - दुष्यंत कुमार, राजकमल प्रकाशन

मजदूरी और प्रेम

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