Monday, November 25, 2019

यमुना तीरे ...


कविता वाचक्नवी


 


गर्मी अभी जलाने वाली नहीं हुई थी। आँगन में सोना शुरू हो चुका था। आँगन इतना बड़ा कि आज के अच्छे समृद्ध घर के दस-ग्यारह कमरे उसमें समा जाएँ। एक ओर छोटी-सी बगीची थी। बगीची के आगे आँगन और बगीची की सीमारेखा तय करती, तीन अँगुल चौड़ी और आधा बालिश्त गहरी, एक खुली नाली थी; जिसे महरी सींक के झाड़ू से, आदि से अंत तक एक ही `स्ट्रोक' में साफ़ करती हुई आँगन की दो दिशाएँ नाप जाती थी। नीचे हरी-हरी काई की कोमलता, ऊपर से बहता साफ़ पानी...। मैं कल्पना किया करती कि चींटियों के लिए तो यह एक नदी होगी...| ...और... मैं चींटी बन जाती अपनी कल्पना में। फिर उस नन्हें आकार की तुलना में इस तीन अंगुल चौड़ी नाली के बड़प्पन की गंभीरता में, एक फ़रलाँग की दूरी पर बहती यमुना याद आती। ...याद आता उसके पुल पर खड़े होकर नीचे गर्जन-तर्जन, भँवर, पुल के खंभों का दोनों दिशाओं में काफी बाहर की ओर निकला भाग, उनसे टकराती, बँटकर बहती धाराएँ। पुल पर खड़े-खड़े मैं इतना डूब जाती थी कि लगता पुल बह रहा है और मैं निरंतर आगे-आगे बहे जा रही हूँ...जंगला थामे खड़ी।


आज भी डर लगता है।


... मैं जिसे भी यह समझाने की कोशिश करती, सब हँसते। इसीलिए जब कभी वहाँ से गुज़रती, एकदम बीचों-बीच होकर। पुल के किनारों की ओर चलने में मुझे हर समय भय लगता। आज भी वैसा ही है। सड़क के बीच `डिवाईडर' पर खड़े होकर `ट्रैफिक' रुकने की प्रतीक्षा करनी पड़े तो चक्कर आ जाता है...गिर ही जाऊँ, ... इसलिए उस से सटकर नीचे सड़क पर ही खड़े होना बेहतर लगता है।


नाली को नदी और स्वयं को चींटी बनाकर जाने कितनी बार मैंने नाली सूखने की प्रतीक्षा की होगी।


... और यह वह ऋतु थी, जब दोपहर दो बजे तक के रसोई के कामकाज निपटने के बाद पाँच बजे तक नाली आराम करती-करती ऐंठना शुरू हो जाती। अप्रैल से ज्यों-ज्यों धूप बढ़ने के दिन आने लगते, दोपहर बाद ही से नाली का हरित-सौंदर्य बुढ़ापे की खाल-सा सूखा व बेजान होकर दीवारों से अंदर की ओर मुड़ने लगता। पपड़ियाँ बनकर तुड़ते-मुड़ते मुझे विचलित करता रहता। उधर मुझे पानी के नीचे काई के लंबे-लंबे हरे तंतु कोमलता से बहते ऐसे लगा करते थे, जैसे नदी की धार के विपरीत मुँह करके सिर का पिछला भाग पानी में ढीला छोड़ देने पर लंबे-लंबे बाल सुलझे-से होकर धार में लहराते-तिरते हैं। पर अप्रैल आते-आते नाली कुरूप हो जाती।


नदी और नाली! कोई संयोग नहीं। कोई मेल नहीं। बिल्कुल ही बेमतलब बात हो गई।


होली में नाली रंग-बिरंगी हो जाती, उस पर स्वच्छ पानी बहता तो उसमें होली के छींटें देख मुझे हरी घास पर गिरे, बिखरे फूलों की रंगीन पाँखुरियाँ याद आतीं।


...पर आज यह सब क्यों याद आ रहा है?


तो यों होली व बैसाखी आकर नाली के रंग-ढंग बदल जातीं। जब कभी घर में पुताई होती, नाली उसमें भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती, बिना हील-हुज्जत के।


इस नाली को नदी का रूप तब और भी मिलता, जब आती बैशाखी। हमारे यमुना की रेत में पगे कपड़े पछारकर, पानी सारी रेत नाली के छोर पर छोड़ देता; तो और भी असली रूप लगता उसका। किताबों में डेल्टा' पढ़ा-ही-पढ़ा होगा उन दिनों, क्योंकि 'डेल्टा' का रूप भी मैंने नाली के उल्टे बहाव की कल्पना करके वहीं समझने की कोशिशें की थीं - हमारे बीस लोगों के परिवार के कपड़ों की रेत खाई बैशाखी की दुपहरी की नाली में।


आज फिर बैसाखी है। पर वे दिन अतीत बन गए हैं।


'केबल' का एक चैनल दरबार-साहब' (स्वर्ण-मंदिर) से 'गुरुबाणी' का सीधा प्रसारण फेंक रहा है। मन में बैशाखी उमगती ही नहीं अब। उमगती हैं - केवल यादें, ... जिनसे जोड़-जोड़ कर मैं आज के बच्चों के लिए पश्चाताप से उमड़ती-तड़पती रहती हूँ। कितनी चीज़ों से वंचित हैं ये। न ये खुली नाली वाले आँगन जानते हैं, न छतों पर सोना, न आँगन में देर रात तक चारपाइयाँ सटाए खुसर-पुसर बतियाना, न गर्मी में बाण की चारपाई पर केवल गीली चादर बिछा कर सोने का मज़ा, न सत्तू का स्वाद, न कच्ची लस्सी, न कड़े के गिलास, न चूल्हे की लकड़ियों के अंगार पर फुलाई गरमागरम पतली छोटी चपातियाँ, न भूसी में लिपटी बर्फ़ की सिल्ली से तुड़वाकर झोले में टपकाते लाई बर्फ़, जिसे झोले सहित गालों से छुआया जा सकता है ... और ज़्यादा ही शैतानी की नौबत आ जाए तो चुपके से, घर पहुँचने से पहले, चुस्का भी जा सकता है, न गर्मियों में सूर्यास्त के बाद ईंटों-जड़े आँगन में बाल्टियों से पानी फेंकना, ताकि खाना खाने और सोने के लिए आँगन में चारपाइयाँ डाली जाने से पूर्व 'हवाड़' निकल जाए और ठंडा हो जाए, न इस प्रक्रिया में जहाँ-तहाँ खड़े होकर अपने ऊपर बाल्टी भर-भर पानी उड़ेलने, भीगने व भागने की आज़ादी का रोमांच व मज़ा।


ये तो बंद बाथरूम में नहाते हैं- शयनकक्ष के भी भीतर।


कभी-कभी मौका लगता तो ४०-४५ फुट लंबे चिकने बरामदे में खूब पानी फैलाकर फिसला-फिसली का खेल या 'खुरे' की नाली में कपड़ा ठूँस कर डेढ़ बालिश्त गहरी तलैया का मज़ा, जिसमें एक-दूसरों पर खूब पानी फेंकने, धक्का-मुक्की करने और हाथों की छपाकियों से पानी उड़ाने...हो-हल्ला करने से बाज़ नहीं आते थे हम।


मैं अपने बच्चों के लिए कलपती हूँ कि कितना कुछ नहीं देखा इन्होंने। हमारा बचपन भी इन बच्चों की विरासत में न आया।


इन सारी कारगुज़ारियों में हैंडपंप और टोंटी, दोनों ही पानी का अवदान देते न अघाते। दोनों 'खुरे' के भीतर मुख किए आमने-सामने डटे थे। इतना सब होते-हवाते `हैंडपंप' का पानी इतना ठंडा हो जाता कि एक गिलास पीने में दाँत 'ठिर' (ठिठुर) जाते। आज 'बोर-वेल' के पानी के 'टैस्ट' करवाने के बावजूद हाथ के नल्के की गुंजाइश नहीं मिलती, मोटर से चलाते हैं और पीने में घबराते हैं।


हमारे लिए बैशाखी कमरों से शाम की मुक्ति के पर्व मनाने आती थी। दादी जी, जिन्हें हम 'भाब्बी जी' कहकर बुलाते थे, पिछली ही रात ताकीद कर देतीं, " कुड़ियों! जे सवेरे जमना जी जाणा होए ते रातीं छेत्ती सो जाणा, गल्लां नाँ करदियाँ रहणा। छड्ड जाणै नईं ते आप्पाँ... जे नाँ उठ्ठियाँ ते"। ( अर्थात् - " लड़कियो! यदि सुबह यमुना जी जाना हो तो सुबह जल्दी उठ जाना, न उठीं तो हम घर में ही छोड़ जाएँगे)| दादी जी दुल्हन बनकर नन्हीं-सी बालिका के रूप में ही इस घर आई थीं। परिवार की सबसे बड़ी वधू। सास थी नहीं। तीन-तीन गबरू-गँवार और पेंडू देवर! पहला संबोधन इस खानदान में आते ही दादी को 'भाब्बी' मिला। उन्हीं की देखा-देखी अपने बच्चे भी 'भाब्बी' कहते। हमें झाई जी ने "भाब्बी जी" कहना जीभ पर चढ़वाया|


सुवख्ते मुँह-अंधेरे उठ जाती थीं भाब्बी जी, वड्ढे झाई जी, विजय, दीदी (बुआ), पम्मी, चाची जी, मैं, कद्दू (छोटे भाई का प्यार का नाम) और चाचा लोग। हालाँकि बिस्तर से उठने की ज़रा इच्छा नहीं होती थी। हम हर बार कहते - "असीं नईं जाणाँ" (हमें नहीं जाना)। दीदी कहतीं - " फ़ेर रोवोगियाँ..." (बाद में रोती रह जाओगी) ... और अपनी पतली-पतली नाज़ुक उँगलियों वाले नन्हें-नन्हें हाथों से हमें गुदगुदी करके उठा देतीं। झोलों में पिछली रात ही कपड़े वगैरह भर लिए जाते थे। हम तीनों बच्चे अधमुँदी आँखों से खीझे-खीझे नाक और गालों को ऊपर चढ़ाए ऊँह-ऊँह, डुस-डुस करते, हाथ पकड़े हुए, लगभग लाद-लूदकर ले जाए जाते।


तारे अभी आकाश में होते थे। हम में से कोई पूछता - "जमना किन्नी दूर हैगी अजे" (यमुना अभी कितनी दूर और है)। भाब्बी जी डपटतीं - "सौ वारी सखाया ए, जमना 'जी' आक्खी दै। चज्ज नल नाँ वी लित्ता नईं जांद्दा, ते चल्ले ने वसाक्खी न्हाणं" (सौ बार सिखाया है, जमुना 'जी' कहते हैं, ठीक से नाम भी नहीं लिया जाता और चले हैं बैशाखी नहाने)।


वहाँ पहुँच डुबकियाँ लगाती भीड़, दूर दूसरी ओर नहाते पुरुष, महिलाओं-बच्चों का शोरगुल... सारी नींद उड़ा देता। धीरे-धीरे, सहमते-सहमते हाथ पकड़कर 'जमना जी' में उतरना, पैर रखते ही रेत का दरक जाना, या पैर का धीरे-धीरे और-और अंदर गड़ना, डराने के लिए काफी होता। ठंडा पानी छू-छू कर हमारे दुस्साहस को उकसाता। हमें तो कपड़े पहने ही पानी में उतरना होता था। ब्याहता स्त्रियाँ कंधों के नीचे बगलों में पेटीकोट बाँध लेतीं। ढँकने योग्य भाग ढँक जाता, लगभग घुटनों तक का। हम सभी घेरा बनाकर एक-दूसरे के हाथ पकड़ लेते। एक साथ पानी के भीतर जाते एक साथ उठ खड़े होते। कूल्हों तक के पानी में उतरना निरापद माना जाता था। वैसे आसपास भीड़ के कारण यों भी डर कम रहता। इतने पानी के माप में पहुँचना यानि यमुना के मध्य भाग के एक ओर का तीसरा भाग। हम लोग, यानि बच्चे, तो फिर पानी से निकलने का नाम ही नहीं लेते थे। पौ फटने को होती तो सब लोग जल्दी मचाते और हम बच्चों में से कोई तर्क देता कि अभी तो उँगलियाँ भी बूढ़ी नहीं हुई हैं। पेल-पाल कर हमें निकाला जाता। घर से फर्लांग-भर ही दूरी थी, अतः हमें वहाँ खुले में कपड़े नहीं बदलने दिए जाते थे| हम चाहते भी यही थे। उन्हीं भीगे टपकते कपड़ों में चमकीली, हल्के हरे-नीले रंग की रेत आँज कर, रेत सनी चप्पलें पहने घर लौटते।


बैशाखी के सारे आयोजनों में इतना-भर मतलब का लगता। बाकी दिन क्या पका, क्या हुआ, वह कुछ भी काम का नहीं लगता। या याद हैं तो "जट्टा आई वसाक्खी" का गीत और पंजाबी भंगडे-गिद्दे, 'वारणे' और 'दंगल' के छोटे-छोटे फ्लैशेज़।


अब घर जाते हुए दिल्ली में बस की खिड़की से झाँकने पर यमुना का पराई-सी लगना तो दूर, 'यमुना रही ही नहीं' दीखती है। नीचे नदी में किसी गड्ढे में मैले पानी का ज़रा-सा जमाव है बस। यमुना का अपना पानी कहीं नहीं सूझता है। नगर के लिए वह 'सीवर-लाइन' फेंकने का गड्ढा-भर है। अभी कुछ समय पहले दिल्ली में एक स्कूल-बस के यमुना में गिरने से बच्चों की मौत का भयानक समाचार कई दिन की दहशत भर गया था। उम्र के इस पड़ाव पर यमुना से इतनी दूर के हिस्से में बैठे, न अपनी स्मृतियों की यमुना से यह मेल खाया, न दुर्घटना से पहले देखी यमुना के उस रूप से, जिसमें पानी नदारद था और ट्रकों से रेत लादने के लिए उन्हें सूखी नदी में उतारा गया था।


बैशाखी अब फिर आई है। इस दिन सदा मुझे अपने पैतृक नगर अमृतसर के सरोवर और जलियाँवाला बाग़ के लाश-भरे कुएँ के साथ-साथ अपनी यमुना की यह यादें ही बस आती हैं।


... और लो, इन्हीं के सहारे बैशाखी बीत भी गई है।


यमुना का एक रूप टोकरी में कृष्ण के साथ जुड़ा है... बालक कृष्ण को बचाने वाली यमुना।


रंग-स्थली यमुना का एक दूसरा रूप है, `


निराला' की 'यमुना के प्रति' की यमुना का भी एक अपना रूप है


... और एक रूप मेरी यादों में बसी यमुना का है।


पर मेरे बच्चों के पास यमुना की कोई याद नहीं !


इनमें से कोई कान्हा के गीतों वाली यमुना को कैसे तलाशे?


कैसे लिखेगा कोई 'यमुना के प्रति' ?


बैशाखी की असली संजोने लायक स्मृतियाँ बनी ही नहीं इनकी। हाँ! इस युग में स्कूल-बस यमुना में गिरने से पूरी बस के बच्चे मारे अवश्य गए थे - इतना तो अख़बार और इतिहास याद रखेंगे और रखवाते रहेंगे ।


मैं नहीं जानती इस बीच यमुना के साथ हुई किन-किन दुर्घटनाओं में मरा कौन है।


क्या यमुना?


क्या बच्चे?


क्या स्मृतियाँ?


क्या भविष्य?


या बचपन?


स्मृतिविहीन भविष्य के लिए कौन कान्हा गुँजा सकता है वंशी की धुन? या कैसे बजेंगी अब झाँझरें रुनझुन?


हमारी पाँचवी कक्षा की पाठ्य.पुस्तक वाली वह कविता तो पच्चीस वर्ष पहले से ही हटा दी गई है।


सुनाऊँ?


" यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे


मैं भी इस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे- धीरे


ले देती यदि मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली ,


किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली..."


...औरों को भी कभी तो याद आती होगी ना शायद ...!!


 


रेल का टिकट


भदंत आनंद कौसल्यायन


 


भला हो सिस्टर निवेदिता का! उसने कहीं लिखा है कि यदि देश की सेवा करनी हो तो पहले अपने देश का परिचय प्राप्त करो। उसके लिए आवश्यक है कि घर-घर घूमो, गाँव-गाँव घूमो, नगर-नगर घूमो, शहर-शहर घूमो। मैं नहीं कह सकता कि मुझसे अपने देश की कुछ सेवा बन पड़ी अथवा नहीं, किन्तु सिस्टर निवेदिता के उस कथन की कृपा से मैं घूमा खूब हूँ।


मेरे घूमने का उद्देश्य केवल देश-दर्शन था और साधनों के नाम पर एक प्रकार से 'शून्यवाद।' पैदल चलना और माँग कर खाना इन्हीं दो को में अपने उन दिनों के घुमक्कड़ी जीवन की आधार-शिला कह सकता हूँ।


हाँ, साथ मैं थी 'हीरो एंड हीरो वर्शिप' अंग्रेजी किताब। उसका मुझ पर कम उपकार नहीं।


***


जिस दिन की बात मैं कहने जा रहा हूँ, उस शाम को मैं एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएँ देखकर लौटा था। पैदल तो चला ही करता था किन्तु प्राय: रेल की पटरी के किनारे-किनारे, जिससे कभी-कभी रेल की सवारी का जुगाड़ भी लग ही जाता।


सामान्य तौर पर मैं भोजनोपरांत ही किसी दूसरे स्थान के लिए प्रस्थान किया करता। शाम तक चलते रहकर किसी भी रेलवे स्टेशन के मुसाफिर-खाने में जा ठहरता। जब अधिक सन्ध्या हो जाती तो छोटे-छोटे स्टेशनों पर तो प्राय: स्टेशन मास्टर के ही कमरे में जाकर बड़ी ही साधुता से पूछते - ''क्या आप मुझे यहाँ बैठकर लैम्प के प्रकाश में थोड़ी देर कुछ पढ़ते रहने की आज्ञा देंगे?'' किसी का क्या बिगड़ता था। सामान्य साधु से लोग पढ़ने-लिखने की बहुत आशा नहीं रखते। मेरे अपने वस्त्र भी एक धेले के राम रज में रँगे ही थे। प्रकाश में बैठकर पढ़ने की आज्ञा कौन नहीं देगा? प्राय: सभी दे देते थे। किन्तु, पाँच-दस मिनट भी न बीते होंगे कि उनकी उत्सुकता उन्हें चैन न लेने देती। कभी तो वे केवल पूछते भर थे - "महराज, क्या पढ़ रहे हैं?" कभी स्वयं उठकर झाँकते। जब उन्हें पता लगता कि मैं एक अंग्रेजी किताब पढ़ रहा हूँ और वह भी कोई सामान्य स्कूली किताब नहीं है तो मैं तुरन्त 'दया भाजन' से तरक्की करके 'आदर भाजन' बन जाता। थोड़े ही प्रश्नों के बाद वे भोजन के बारे में पूंछते। मैं समय, स्थान पूछने वाले की सुविधा-असुविधा का ध्यान धर यथा-योग्य उत्तर देता।


उस दिन शाम को ज्वराक्रांत होने के कारण मैंने भोजन नहीं स्वीकार किया। थोड़ा गर्म पानी पीकर रह गया। स्टेशन मास्टर ने मेरी आगे की यात्रा के बारे में पूछा। बना-बनाया उत्तर तैयार था - "कल प्रात: काल नासिक की ओर चल दूँगा।"


"अभी एक गाड़ी जाती है उससे क्यों नहीं चले जाते?"


"मेरे पास टिकट के लिए पैसे नहीं हैं।''


"उसकी व्यवस्था हम कर देंगे, आप चले जाइए।''


सारा संसार यूँ ही 'सुविधावादी' है, और उस पर उस दिन मुझे कुछ ज्वर भी था। मैंने रेल की यात्रा करना स्वीकार किया। पैदल चलना कुछ सिद्धांत का विषय तो था नहीं। यह था केवल रुपये आने पाई का। रात के नौ बजे या दस बजे रेल आई। स्टेशन मास्टर ने कहा -"चलिए स्वामी जी।" उन्होंने मुझे एक डिब्बे में बिठाया और गार्ड को मेरे बारे में कुछ कहा दिया। मैं निश्चिन्त था।


इसी तरह पहले भी एक-दो बार रेल बाबूओं की कृपा से मुझे रेल की मुफ्त की सवारी का चस्का लग चुका था। एक बार एक रेल बाबू जलगाँव स्टेशन की ओर दूर तक मुझे साथ-साथ ले आये किन्तु न जाने बीच में स्वयं कहाँ उतर गये? मुझे चिंता हुई कि अब कोई टिकट पूछेगा तो क्या करूँगा? सोचा पहले से गार्ड को कह देना चाहिए। उसके लिए भी उपाय सूझा - किसी स्टेशन पर टहलते रहना और जब गाड़ी सीटी दे, तब सीधे गार्ड के डब्बे में जा चढ़ना। केवल मुझे डिब्बे से उतारने के लिए तो गार्ड गाड़ी रोकने से रहा। मैंने डरते हुए बहुत साहस के साथ ऐसा ही किया।


गार्ड ने मुझे देखते ही कहा - 'आइए, आइए।' अपने बक्से पर एक कम्बल बिछाकर मुझे उस पर बैठने का इशारा किया। अपराधी की भाँति गार्ड के डिब्बे में पैर रखा था। इस अप्रत्याशित आदर से मुझे स्वयं आश्चर्य हुआ। मैं गार्ड साहब को कहना ही चाहता था कि मैं बिना टिकट यात्रा कर रहा हूँ कि उन्होंने मुझे बीच में ही रोक दिया। कुछ कहने ही न दिया। पूछा, "कुछ दूध लेंगे?" तुरन्त कुछ जल पान की व्यवस्था हो गई।


मैं सोच रहा था यह सब क्यों हो रहा है? मेरा साधु होना इस 'आतिथ्य' की पर्याप्त व्याख्या न थी। जलपान कर चुकने पर ज्यों ही मैं आसन जमाकर बैठा, गार्ड साहब ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया - स्वामी जी! कुछ जानते ही होंगे...। अब सब मामला साफ था। चूरा, दूध इसी हाथ देखने की फीस थी। मेहनताना पहले चुका दिया गया था, मेहनत अब ली जा रही थी।


हाँ, तो पहले भी इस प्रकार के कई अनुभव हो चुके थे। उस दिन भी नासिक के एक या दो स्टेशन इधर तक, मैं निश्चिंत चला आया। अब नासिक में उतरना था। उतरने के पहले अपने कृपालु गार्ड को धन्यवाद देना चाहिए, सोच मैं अपने पूर्व अभ्यस्त ढंग से गार्ड के डिब्बे में जा चढ़ा। "कहाँ! कहाँ!! कहाँ!!! चले आ रहे हो।?" आपने मेरा स्वागत किया। "मैं ही हूँ जिसके बारे में स्टेशन मास्टर ने आपसे कहा था कि यह नासिक तक जायेंगे।"


"तो तुम्हारा टिकट कहाँ है?"


"टिकट तो मेरे पास है नहीं। स्टेशन मास्टर ने बारे में कहा ही था…।


"रेलगाड़ी स्टेशन मास्टर के बाप की है? निकालो किराया।"


"किराये के पैसे तो मेरे पास नहीं हैं।"


"अच्छा तो करता हूँ पुलिस के हवाले।"


आज बुरी तरह से फँसा था। मैंने गार्ड से कुछ कहना चाहा। किन्तु वह तो मुझे बोलने ही नहीं देता था। शुद्ध गालियों में बात करता था। मेरे पास तो गालियाँ थीं नहीं। यदि कहीं मन के कोने में एकाध पड़ी होगी तो एकदम बुझी हुई। अब मैं बदले मैं क्या देता? मौन ही एकमात्र अवलम्ब था। इसी का सहारा लिया।


थोड़ी ही देर पास बैठने से पता लगा कि गार्ड साहब 'पिये' हैं। अब तो जो थोड़ा बहुत बोल सकता था वह भी बेकार।


गार्ड साहब बीच-बीच में जो मन में आता सुनाते जाते थे। सुनते रहने के सिवाय और मैं कर ही क्या सकता था?


आदमी को स्वभाव से ही मैंने कभी 'बुरा' नहीं माना। सोच रहा था कि गार्ड साहब ऐसे 'बुरे' कैसे निकले? क्या स्टेशन मास्टर ने इन्हें कहा ही नहीं? कहा तो मेरे सामने था। तब यदि यह चाहते थे कि मैं गाड़ी में न चलूँ तो इन्होंने वहीं इन्कार क्यों नहीं कर दिया? सोचते-सोचते यही बात समझ में आई कि प्याले के नशे में यह भूल गये हैं। उनकी यह 'भूल' मेरी 'शूल' बन चुकी थी। पुलिस के हाथ में पड़ना, भय का कारण तो था ही, साथ ही अपमान का भी। मैं दोनों से समान रूप से भयभीत था।


मैं अपने तीसरे दर्जे के डिब्बे में आया। जो थोड़ा-बहुत सामान था उसे बटोरने लगा-कम्बल, बालटी और एकाध और चीज। उसे समेटते समय ख्याल आया कि पुलिस को तो वह सौंपने वाला ही है, थोड़ा विलम्ब करके क्यों न चलूँ। गुस्सा होकर आयेगा तो पुलिस को ही तो सौंपेगा। थोड़ा विलम्ब करने पर भी जब वह न आया तो मुझे सूझा कि यह सम्भव है कि वह शायद इस बात को भी भूल जाए कि उसने मुझे अपना सामान लेकर आने को कहा है। काफी देर प्रतीक्षा करते रहने पर भी जब मुझे उधर से कोई आता दिखाई नहीं दिया, तब मैं भी उधर नहीं ही गया। मैं पुल की ओर बढ़ा और जो बाबू टिकट ले रहा था उससे सब-कुछ सच-सच कह दिया। बाबू बोला, 'जाइए 'स्वामी जी!'


उस दिन उस यमराज सदृश गार्ड के बन्धन से मुक्त होने में मुझे जो आनन्द हुआ, उसकी तुलना मैं अब किस आनन्द से करूँ?


***


उक्त अनुभव 22 वर्ष पुराना है। एक अनुभव एकदम इधर का है। वर्धा से प्रयाग और दिल्ली आना-जाना तो रोज का काम है। टिकट कभी नागपुर का, कभी इटारसी तक का, कभी प्रयाग या दिल्ली तक का। हाँ, प्राय: तीसरे दर्जे का ही। इसका मतलब यह नहीं कि मैं सदैव गांधी क्लास में ही चलता हूँ। रेल में चलना मेरे लिए आज भी केवल आराम और रुपये आने पाई में समझौते करने का ही प्रश्न है। हर बार कहीं-न-कहीं समझौता हो ही जाता है। नियत समय पर नियत स्थान पर पहुँच न होने से प्राय: यात्रा अनिवार्य रहती है। टिकट चाहे जिस दर्जे का लिया हो, किसी-न-किसी दर्जे में चढ़ चलने का संकल्प लेकर ही मैं स्टेशन की ओर अग्रसर होता हूँ। जिस दिन की बात मैं कहने जा रहा हूँ, उस दिन पूर्व प्रदत्त वचनबद्ध होने के कारण थोड़ा ज्वरांश रहते भी मैं वर्धा से निकल पड़ा। नागपुर से ही दूसरी गाड़ी पकड़नी थी, इसलिए टिकट नागपुर तक का ही लिया गया। रात की मुसाफिरी और तबियत खराब, सोचा सेकंड क्लास का टिकट लूँगा। उसमें जगह न थी, इसलिए टिकट न मिला, यह पुरानी सेकंड क्लास की बात है; नई की नहीं। एक भिन्न बातचीत में ऐसा फँसा कि नागपुर से आगे का टिकट लेने की बात गाड़ी के सीटी देने पर ध्यान में आई। गार्ड अर्धपरिचित थे। उन्होंने कहा, स्वामी जी, लेटे रहिए, इटारसी चल कर ही व्यवस्था हो जायेगी।


पैसेंजर गाड़ी के देर से पहुँचने पर आश्चर्य क्या जब उन दिनों ग्रैंड ट्रंक नौ-नौ घंटे लेट होती थी। उस दिन गाड़ी स्टेशन पर पहुँची तो पंजाब मेल तैयार मिला। पंजाब मेल भी लेट थी। जल्दी-जल्दी सामान उठाकर पुल पार किया। मैं तो टिकट की चिंता में लगा और अपने साथी को जहाँ सींग समाये वहाँ सामान डालने को कहा। टिकट बाबू पैसे ले चुका था। रसीद काटने जा ही रहा था कि गाड़ी चल दी। मैंने यह सोचा कि 'दिनेश' कहीं-न-कहीं चढ़ ही गया होगा, इसलिए मैं भी गाड़ी के पायदान पर खड़ा हो गया। तो भी 'दिनेश' चढ़ा या नहीं, यह निश्चित रूप से जान लेना आवश्यक था। बहुत इधर-उधर झाँका। वह कहीं दिखाई नहीं दिया। सोचा अगले स्टेशन पर उतर कर देखूँगा। और चारा भी क्या था? दिल्ली की ओर इटारसी के बाद पहला स्टेशन होशंगाबाद ही है। मैं वहाँ उतरा। गाड़ी केवल तीन मिनिट रुकती है। मैं गाड़ी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक दौड़ गया। 'दिनेश' कहीं दिखाई न दिया। क्या 'दिनेश' गाड़ी में न चढ़ सका? हो सकता है कि चढ़ा हो, किन्तु भीड़-भाड़ में मुझे दिखाई न दिया हो। उसे क्या मालूम कि मैं स्टेशन पर उसे ढूँढ़ने उतर पड़ूँगा। नहीं तो शायद सिर बाहर निकाले रहता। हो सकता है कि सिर बाहर निकाले ही हो, किन्तु हो प्लेटफार्म की दूसरी ओर की खिड़की के बाहर। यदि वह न चढ़ सका, तब तो बिचारा बिना टिकट के सारा सामान लिये इटारसी स्टेशन पर ही खड़ा होगा। और उसके पास कुछ पैसे भी तो नहीं। तो क्या मैं इस गाड़ी में न जाऊँ?


किन्तु यदि चढ़ गया होगा तो बिना टिकट और बिना पैसे के उसका क्या हाल होगा? भूखा-प्यासा किसी तरह दिल्ली पहुँच भी गया तो आगे कहाँ और कैसे जायगा? गार्ड ने दो-तीन बार मेरी ओर देखा कि यह महाशय कब गाड़ी में बैठते हैं? मैं पागल की तरह एक सिरे से दूसरे तक बड़ी तेजी से घूम रहा था। अन्त में जब उसने देखा कि उन्हें तो केवल गाड़ी नापना भर है, उसने सीटी बजाई और अपनी गाड़ी लेकर चला गया। मैं कुछ निश्चय न कर सका। यदि कर सका तो यह कि मुझे होशंगाबाद स्टेशन पर ही खड़ा रहना चाहिए। गाड़ी चली गई, और अपना सा मुँह लेकर स्टेशन पर खड़ा रह गया।


उस दिन की याद कर इस समय तो मुझे भी हँसी छूट रही है। अब सोचता हूँ, काश, उस समय मेरा कोई फोटो ले लेता। पंत जी की एक पंक्ति है-


"सुखों में दु:ख की स्मृतियाँ मधुर।"


अब आप ही सोचिए कि प्रात: कृत्यों का समय। पास में लोटा भी नहीं। क्या दुर्दशा थी? मैं स्टेशन मास्टर के पास गया। अर्ज की, 'जरा पिछले स्टेशन पर मेरे साथी की पूछताछ कर दें।' बोला, 'फोन बिगड़ा है।' सचमुच रहा ही होगा। किन्तु फोन को भी क्या उसी दिन बिगड़ना था?


मैंने सोचा कि मैं यहाँ से होशंगाबाद गुरुकुल जाऊँगा, और वहाँ पर जाकर कहूँगा कि मैं आनन्द कौसल्यायन हूँ। असंभव नहीं कि किसी-न-किसी ने आनन्द कौसल्यायन नाम सुन-पढ़ न रखा हो, और यह भी सम्भव है कि कोई विश्वास भी कर ले। यही तय कर मैं कोई मील भर चला आया। देखता क्या हूँ कि उधर से एक मालगाड़ी चली आ रही है। मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ आया। स्टेशन मास्टर से निवेदन किया कि वे मुझे उस मालगाड़ी से वापस इटारसी भेज दें।


स्टेशन मास्टर ने कहा, एक एक्सप्रेस पीछे आ रही है। आप उससे चले जायँ, वह पहले पहुँचेगी। टिकट एक्सप्रेस का नहीं मिल सकता था, क्योंकि होशंगाबाद इटारसी से कुल 11 मील था, और टिकट लेने के लिए कम-से-कम सौ मील की मुसाफिरी की शर्त थी। मैं बिना टिकट ही गाड़ी में बैठ गया। घड़ी देखकर मिनटों की गिनती आपने भी बहुत बार की है। मैंने भी की है। किन्तु उस दिन तो सैकंडों का भी हिसाब लग रहा था।


गाड़ी इटारसी पहुँची। मुझे देखते ही इटारसी का एक टिकट बाबू बोला, "स्वामी जी, वह लड़का यहीं छूट गया," और देखता क्या हूँ 'दिनेश' बेतहाशा भागा आ रहा है। सभ्यता ने उस दिन उसे छाती से लगा लेने नहीं दिया। परस्पर कितनी प्रसन्नता हुई।


ज्वरांश तो मुझे था ही। थकावट और प्रसन्नता ने मिलकर उसे गड़ा दिया। मैं सैकंड क्लास वेटिंग रूम में बिस्तर बिछाकर जा लेटा।


कुछ कहना ,कुछ सुनना हो,


डॉ साधना गुप्ता


 


कुछ कहना ,कुछ सुनना हो,


मन के सपनों को बुनना हो,

 

दें उतार मुखटो को आज

कर ले स्व से पहचान आज,

मानव-मानव हो एक समान,

 

धर्म रहे मानवतावादी,

कर्म रहे कर्तव्य प्रधान,

शिक्षा दे संस्कार आज 

 

उत्तम हो आचार-विचार 

नर-नारी का भेद न हो 

निर्भय हो  सकल संसार 

 

कुछ कहना ,कुछ सुनना हो, 

मन के सपनों को बुुनना हो ।

        

 

                          

मंगलपुरा, टेक, झालावाड़ 326001 राजस्थान 

मजदूरी और प्रेम

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