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Showing posts from November 25, 2019

यमुना तीरे ...

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कविता वाचक्नवी   गर्मी अभी जलाने वाली नहीं हुई थी। आँगन में सोना शुरू हो चुका था। आँगन इतना बड़ा कि आज के अच्छे समृद्ध घर के दस-ग्यारह कमरे उसमें समा जाएँ। एक ओर छोटी-सी बगीची थी। बगीची के आगे आँगन और बगीची की सीमारेखा तय करती, तीन अँगुल चौड़ी और आधा बालिश्त गहरी, एक खुली नाली थी; जिसे महरी सींक के झाड़ू से, आदि से अंत तक एक ही `स्ट्रोक' में साफ़ करती हुई आँगन की दो दिशाएँ नाप जाती थी। नीचे हरी-हरी काई की कोमलता, ऊपर से बहता साफ़ पानी...। मैं कल्पना किया करती कि चींटियों के लिए तो यह एक नदी होगी...| ...और... मैं चींटी बन जाती अपनी कल्पना में। फिर उस नन्हें आकार की तुलना में इस तीन अंगुल चौड़ी नाली के बड़प्पन की गंभीरता में, एक फ़रलाँग की दूरी पर बहती यमुना याद आती। ...याद आता उसके पुल पर खड़े होकर नीचे गर्जन-तर्जन, भँवर, पुल के खंभों का दोनों दिशाओं में काफी बाहर की ओर निकला भाग, उनसे टकराती, बँटकर बहती धाराएँ। पुल पर खड़े-खड़े मैं इतना डूब जाती थी कि लगता पुल बह रहा है और मैं निरंतर आगे-आगे बहे जा रही हूँ...जंगला थामे खड़ी। आज भी डर लगता है। ... मैं जिसे भी यह समझाने की कोशिश

रेल का टिकट

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भदंत आनंद कौसल्यायन   भला हो सिस्टर निवेदिता का! उसने कहीं लिखा है कि यदि देश की सेवा करनी हो तो पहले अपने देश का परिचय प्राप्त करो। उसके लिए आवश्यक है कि घर-घर घूमो, गाँव-गाँव घूमो, नगर-नगर घूमो, शहर-शहर घूमो। मैं नहीं कह सकता कि मुझसे अपने देश की कुछ सेवा बन पड़ी अथवा नहीं, किन्तु सिस्टर निवेदिता के उस कथन की कृपा से मैं घूमा खूब हूँ। मेरे घूमने का उद्देश्य केवल देश-दर्शन था और साधनों के नाम पर एक प्रकार से 'शून्यवाद।' पैदल चलना और माँग कर खाना इन्हीं दो को में अपने उन दिनों के घुमक्कड़ी जीवन की आधार-शिला कह सकता हूँ। हाँ, साथ मैं थी 'हीरो एंड हीरो वर्शिप' अंग्रेजी किताब। उसका मुझ पर कम उपकार नहीं। *** जिस दिन की बात मैं कहने जा रहा हूँ, उस शाम को मैं एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएँ देखकर लौटा था। पैदल तो चला ही करता था किन्तु प्राय: रेल की पटरी के किनारे-किनारे, जिससे कभी-कभी रेल की सवारी का जुगाड़ भी लग ही जाता। सामान्य तौर पर मैं भोजनोपरांत ही किसी दूसरे स्थान के लिए प्रस्थान किया करता। शाम तक चलते रहकर किसी भी रेलवे स्टेशन के मुसाफिर-खाने में जा ठहरता। जब अधिक सन्

कुछ कहना ,कुछ सुनना हो,

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डॉ साधना गुप्ता   कुछ कहना ,कुछ सुनना हो, मन के सपनों को बुनना हो,   दें उतार मुखटो को आज कर ले स्व से पहचान आज, मानव-मानव हो एक समान,   धर्म रहे मानवतावादी, कर्म रहे कर्तव्य प्रधान, शिक्षा दे संस्कार आज    उत्तम हो आचार-विचार  नर-नारी का भेद न हो  निर्भय हो  सकल संसार    कुछ कहना ,कुछ सुनना हो,  मन के सपनों को बुुनना हो ।                                       मंगलपुरा, टेक, झालावाड़ 326001 राजस्थान