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स्मृृतियों के कैनवास पर : स्व० हरिपाल त्यागी

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      बाबा नागार्जुन की पंक्तियाँ, रह-रह कर स्मरण आ रही है    सादौ कगद हो भले, सादी हो दीवाल। रेखन सौ जादू मरे कलाकार हरिपाल।। इत उत दीखै गगंजल, नहीं जहां अकाल। घरा धन्य बिजनौर की, जहां प्रगटे हरिपाल।।   और हरिपाल अंकल का, मुस्कुराता चेहरा स्मृतियों के कैनवास पर, अनायास साकार हो रहा है। बिजनौर की धरती, साहित्य कला, राजनीति, पत्रकारिता आदि विभिन्न सन्दर्भ में, उर्वरा रही है। स्व० हरिपाल त्यागी का मुझ पर असीम स्नेह और आर्शीवाद रहा। अपने बचपन में ही, घर पर आने वाली, पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों के माध्यम से बाल सुलभ जिज्ञासा के चलते शब्द ओर चित्रों का आकर्षण अपनी ओर खींचने लगा था। बचपन, अपने ननिहाल ग्राम पैंजनियाँ जनपद बिजनौर, उ0प्र0 में नाना श्री स्व0 शिवचरण सिंह के सरंक्षण में बीता। उनका स्थान, भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी इतिहास में, अपना एक अलग महत्व रखता हैप्रख्यात पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी (कानपुर) की उन पर महती अनुकम्पा थी, और उन्हीं के माध्यम व निर्देश पर नाना श्री के गांव पैजनियाँ में काकोरी काण्ड के ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खाँ, अवनीकांत मुकंजी (मिदन