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कंचन

  रविन्द्रनाथ टैगोर  मैं विदेश लौटकर छोटा नागपुर के एक चन्द्रवंशीय राजा के दरबार में नौकरी करने लगा। उन्हीं दिनों मेरी देशव्यापी कीर्ति की पटल पर अचानक एक छोटी-सी कहानी खिल उठी। उन दिनों गगन टेसू की रक्तिमाभा से विभोर था। शाल वृक्ष की टहनियों पर मंजरियां झूल रही थीं। मधुमक्खियों के समूह मंडराते फिर रहे थे। व्यापारी लोगों का लाख संग्रह का समय आ गया था। बेर और शहतूत के पत्तों से रेशम के कीड़े इकट्ठे किए जा रहे थे। संथाल जाति महुए बीनती हुई फिर रही थी। नूपुर की झंकार के समान गूंजती हुई नदी वहीं पर बही जा रही थी। मैंने स्नेह से उस नदी का नाम रखा था- 'तनिका'। उस समय का वातावरण अनोखे आवेश से परिपूर्ण था। उसका मेरे मन पर भी अधिकार हो गया था। जिससे कार्य की गति मंथर पड़ गई थी। तब मैं अपने पर ही खीझ उठा था। दिन ढल रहा था। एक स्थान पर दोआबा बनाती हुई नदी दो शाखाओं में विभक्त होकर चली गई है। उसी बालू के टीले पर बगुलों की पंक्ति शान्त बैठी थी। अपनी झोली में रंग-बिरंगे पत्थरों को भरे मैं कोठी को लौट रहा था। यह सोचकर कि अपनी विज्ञान-शाला में इनकी परीक्षा करूंगा। निर्जन वन में अकेले आदमी का समय

कसबे का आदमी

  कमलेश्वर सुबह पाँच बजे गाड़ी मिली। उसने एक कंपार्टमेंट में अपना बिस्तर लगा दिया। समय पर गाड़ी ने झाँसी छोड़ा और छह बजते-बजते डिब्बे में सुबह की रोशनी और ठंडक भरने लगी। हवा ने उसे कुछ गुदगुदाया। बाहर के दृश्य साफ़ हो रहे थे, जैसे कोई चित्रित कलाकृति पर से धीरे-धीरे ड्रेसिंग पेपर हटाता जा रहा हो। उसे यह सब बहुत भला-सा लगा। उसने अपनी चादर टाँगों पर डाल ली। पैर सिकोड़कर बैठा ही था कि आवाज़ सुनाई दी, "पढ़ो पटे सित्तारम स़ित्तारम. . . "  उसने मुड़कर देखा, तो प्रवचनकर्ता की पीठ दिखाई दी। कोई ख़ास जाड़ा तो नहीं था, पर तोते के मालिक, रूई का कोट, जिस पर बर्फ़ीनुमा सिलाई पड़ी थी और एक पतली मोहरी का पाजामा पहने नज़र आए। सिर पर टोपा भी था और सीट के सहारे एक मोटा-सा सोंटा भी टिका था। पर न तो उनकी शक्ल ही दिखाई दे रही थी और न तोता। फिर वही आवाज़ गूँज उठी, "पढ़ो पटे सित्तारम सित्तारम. . ." सभी लोगों की आँखें उधर ही ताकने लग गईं। आख़िर उससे न रहा गया। वह उठकर उन्हें देखने के लिए खिड़की की ओर बढ़ा। वहाँ तोता भी था और उसका पिंजरा भी, और उसके हाथ में आटे की लोई भी, जिससे वे फुरती से

खोल दो

  सआदत हसन मन्टो अमृतसर से स्पेशल ट्रेन दोपहर दो बजे चली और आठ घंटों के बाद मुगलपुरा पहुंची। रास्ते में कई आदमी मारे गए। अनेक जख्मी हुए और कुछ इधर-उधर भटक गए।   सुबह दस बजे कैंप की ठंडी जमीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक उमड़ता समुद्र देखा तो उसकी सोचने-समझने की शक्तियां और भी बूढ़ी हो गईं। वह देर तक गंदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा। यूं ते कैंप में शोर मचा हुआ था, लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान तो जैसे बंद थे। उसे कुछ सुनाई नहीं देता था। कोई उसे देखता तो यह ख्याल करता की वह किसी गहरी नींद में गर्क है, मगर ऐसा नहीं था। उसके होशो-हवास गायब थे। उसका सारा अस्तित्व शून्य में लटका हुआ था। गंदले आसमान की तरफ बगैर किसी इरादे के देखते-देखते सिराजुद्दीन की निगाहें सूरज से टकराईं। तेज रोशनी उसके अस्तित्व की रग-रग में उतर गई और वह जाग उठा। ऊपर-तले उसके दिमाग में कई तस्वीरें दौड़ गईं-लूट, आग, भागम-भाग, स्टेशन, गोलियां, रात और सकीना...सिराजुद्दीन एकदम उठ खड़ा हुआ और पागलों की तरह उसने चारों तरफ फैले हुए इनसानों के समुद्र को खंगालना शुरु कर दिया

मैमूद

शैलेश मटियानी महमूद फिर ज़ोर बाँधने लगा ,  तो जद्दन ने दायाँ कान ऐंठते हुए ,  उसका मुँह अपनी ओर घुमा लिया। ठीक थूथने पर थप्पड़ मारती हुई बोली , '' बहुत मुल्ला दोपियाजा की-सी दाढ़ी क्या हिलाता है ,  स्साले! दूँगी एक कनटाप ,  तो सब शेखी निकल जाएगी। न पिद्दी ,  न पिद्दी के शोरबे ,  साले बहुत साँड बने घूमते हैं। ऐ सुलेमान की अम्मा ,  अब मेरा मुँह क्या देखती है , रोटी-बोटी कुछ ला। तेरा काम तो बन ही गया ?  देख लेना ,  कैसे शानदार पठिये देती है। इसके तो सारे पठिये रंग पर भी इसी के जाते हैं। '' अपनी बात पूरी करते-करते ,  जद्दन ने कान ऐंठना छोड़कर ,  उसकी गरदन पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। अब महमूद भी धीरे-से पलटा ,  और सिर ऊँचा करके जद्दन का कान मुँह में भर लिया ,  तो वह चिल्ला पड़ी , '' अरी ओ सुलेमान की अम्मी ,  देख तो साले इस शैतान की करतूत जरा अपनी आँखों से! चुगद कान ऐंठने का बदला ले रहा है। ए मैमूद ,  स्साले ,  दाँत न लगाना ,  नहीं तो तेरी खैर नहीं। अच्छा ,  ले आयी तू रोटियाँ ?  अरी ,  ये तो राशन के गेहूँ की नहीं ,  देसी की दिखती हैं। ला इधर। देखा तूने ,  हरामी कैसे मे

ख़ुशी की कीमत

  "अरे तुम तैयार क्यों नहीं हो रही हो| " "क्या पहनूं जी, ढंग की साड़ियां ही नहीं है |" "पूरी अलमारी तो साड़ियो से भरी पड़ी है और तुम कह रही हो कि साड़ियां ही नहीं है|" "सब पुरानी साड़िया हैं | नयी दिलाई हैं क्या आपने ?" "अरे अभी तो खरीदी थीं तुमने, अपने भाई की शादी में|'' "अभी नहीं पति महोदय, पूरे दो साल हो गये | कितनी बार पहना है उन्हें,पता है ?बबलू की शादी में, भाई की शादी में, मिन्टी की सगाई में और ...." "हाँ तो क्या हुआ, वही पहन लो| अरे, बस-बस कुछ भी पहन लो, चलो जल्दी देर हो रही है| अगले महीने तनख्वाह मिलते ही और दिला दूँगा | अहा ! देखो, हँसते हुए कितनी प्यारी लगती हो | पक्का, १००० सिर्फ साड़ी के लिये दूँगा " "१००० रूपये, बस ! इतने में क्या होगा जी |" कनिका तुनक कर बोली | "तो फिर कितना ?" "आजकल ५०० रुपये तो ब्लाउज पर ही खर्च हो जाते है | महंगाई बढ़ गई है | कम से कम ५००० चाहिए ..." ''इतना? जितनी चादर हो उतना ही पाँव पसारना चाहिए, कनिका |" "यह कहावत पुरानी हो गयी जी| अब प

मौन

  अमन कुमार बूढ़ा मोहन अब स्वयं को परेशान अनुभव कर रहा था। अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाना अब उसके लिए भारी पड़ रहा था। परिवार के अन्य कमाऊ सदस्य अपने मुखिया मोहन की अवहेलना करने लगे थे। मोहन की विधवा भाभी परिवार के सदस्यों की लगाम अपने हाथों में थामे थी। वह बड़ी चालाक थी। वह नहीं चाहती थी कि मोहन अथवा परिवार का कोई भी सदस्य उसकी अवहेलना करे। यूं भी कहा जा सकता है कि मोहन घर का मुखिया था, परन्तु घर के मामलों में सभी महत्वपूर्ण निर्णय सोमती देवी ही लेती थीं। मोहन को अपने लिये मौन के सिवा दूसरा कोई रास्ता नजर ही नहीं आता था। दरअसल मोहन का बड़ा भाई सोहन सिंह बड़ा ही बलशाली और दबंग था। एक दुर्घटना में उसकी व मां इन्द्रो की मृत्यु हो गयी थी। तभी से घर-परिवार की जिम्मेदारी, मोहन और उसकी विधवा भाभी सोमती देवी दोनों ने संयुक्तरूप से सम्हाली थी। मोहन को अपना वह वचन आज भी याद है, जिसमें उसने अपनी भाभी सोमती देवी से कहा था- ‘आप बड़ी हैं, जैसा चाहेंगी हम करते जायेंगे।’ बस इसी एक बात का भरपूर लाभ सोमती देवी उठाना चाहती थीं। सोमती देवी ने अपने पुत्र रोलू को राजकुमार बनाने का सपना देख लिया था। मोहन की माँ

मजदूरी और प्रेम

- सरदार पूर्ण सिंह हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन किया करते हैं। खेत उनकी हवनशाला है। उनके हवनकुंड की ज्वाला की किरणें चावल के लंबे और सुफेद दानों के रूप में निकलती हैं। गेहूँ के लाल-लाल दाने इस अग्नि की चिनगारियों की डालियों-सी हैं। मैं जब कभी अनार के फूल और फल देखता हूँ तब मुझे बाग के माली का रुधिर याद आ जाता है। उसकी मेहनत के कण जमीन में गिरकर उगे हैं और हवा तथा प्रकाश की सहायता से मीठे फलों के रूप में नजर आ रहे हैं। किसान मुझे अन्न में, फूल में, फल में आहुति हुआ सा दिखाई पड़ता है। कहते हैं, ब्रह्माहुति से जगत् पैदा हुआ है। अन्न पैदा करने में किसान भी ब्रह्मा के समान है। खेती उसके ईश्वरी प्रेम का केंद्र है। उसका सारा जीवन पत्ते-पत्ते में, फूल-फूल में, फल-फल में बिखर रहा है। वृक्षों की तरह उसका भी जीवन एक प्रकार का मौन जीवन है। वायु, जल, पृथ्वी, तेज और आकाश की निरोगता इसी के हिस्से में है। विद्या यह नहीं पढ़ा; जप और तप यह नहीं करता; संध्या-वंदनादि इसे नहीं आते; ज्ञान, ध्यान का इसे पता नहीं; मंदि