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भूख

इन्द्रदेव भारती आदमखोरों को सरकारी, अभिरक्षण   वरदान  है । अपने हिंदुस्तान का भैया  अद्भुत......संविधान  है । इंसां  को  गुलदार मारे, उसको  पूरी   शह  यहाँ । गुलदार को  इन्सान  मारे, जेल   जाना   तय  यहाँ । रोज बकरा  यूँ  बलि  का बन    रहा   इन्सान   है । अपने हिंदुस्तान का भैया अद्भुत......संविधान  है । रोज  जंगल  कट  रहे हैं, जब   शहर   के  वास्ते । क्यूँ न जंगल ढूंढलें फिर खुद  शहर   के   रास्ते   इंसांं  हो   या   हो   हैवां, भूख का क्या विधान  है । अपने  इस  जहान   का, अज़ब ग़ज़ब विधान है ।  

रश्मि अग्रवाल एवं गौराश्री आत्रेय की पुस्तकें हुई विमोचित

परिलेख प्रकाशन से प्रकाशित दो पुस्तकों का विमोचन नजीबाबाद वरिष्ठ समाजसेवी एवं राष्ट्रपती द्वारा सम्मानित लेखिका रश्मि अग्रवाल के कविता संग्रह 'अरी कलम तू कुछ तो लिख' एवं बालिका कवयित्री गौराश्री की पुस्तक 'गौराश्री की कविताएँ' का विमोचन कार्यक्रम आर्यन कान्वेंट स्कूल में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का प्रारंभ माॅ सरस्वती के समक्ष अध्यक्ष एवं मुख्य अतिथि ने दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्प अर्पण के साथ-साथ गौराश्री आत्रेय के सरस्वती वंदना गायन से हुआ।   कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध शायर महेन्द्र अश्क तथा संचालन आलोक कुमार त्यागी ने किया। कार्यक्रम में डाॅ. सुधाकर आशावादी, राजेश मालवीय एवं सुचित्रा मालवीय मुख्य अतिथि रहे। अनेक पुस्तकें लिखने वाली रश्मि अग्रवाल ने बताया कि यह उनकी प्रथम काव्य पुस्तक है। जिसमें उनकी बीते लगभग दस वर्ष की मेहनत है। उन्होंने इन्द्रदेव भारती को अपना साहित्यिक आदर्श मानते हुए कहा कि लेखन मेहनत मांगता है परंतु प्रतिदिन इतने विषय मिलते हैं यदि जिन पर लिखने बैठो तो लगभग दो घंटे में एक अच्छा सा लेख लिखा जाता है। समाज में घटित होने वाली विभिन्न घटनाएँ और उन पर

सात ग़ज़लेें

अल्लामा ताजवर नजीबाबादी 1. बम चख़ है अपनी शाहे रईयत पनाह से   बम चख़ है अपनी शाहे रईयत पनाह से इतनी सी बात पर कि 'उधर कल इधर है आज' । उनकी तरफ़ से दार-ओ-रसन, है इधर से बम भारत में यह कशाकशे बाहम दिगर है आज । इस मुल्क में नहीं कोई रहरौ मगर हर एक रहज़न बशाने राहबरी राहबर है आज । उनकी उधर ज़बींने-हकूमत पे है शिकन अंजाम से निडर जिसे देखो इधर है आज । (२ मार्च १९३०-वीर भारत (लाहौर से छपने वाला रोज़ाना अखबार) (रईयत पनाह=जनता को शरण देने वाला, दार-ओ-रसन=फांसी का फंदा, कशाकशे- बाहम दिगर=आपसी खींचतान, रहरौ=रास्ते का साथी, रहज़न=लुटेरा, ज़बींने=माथा,शिकन=बल)   2. ऐ आरज़ू-ए-शौक़ तुझे कुछ ख़बर है आज   ऐ आरज़ू-ए-शौक़ तुझे कुछ ख़बर है आज हुस्न-ए-नज़र-नवाज़ हरीफ़-ए-नज़र है आज हर राज़दाँ है हैरती-ए-जलवा-हा-ए-राज़ जो बा-ख़बर है आज वही बे-ख़बर है आज क्या देखिए कि देख ही सकते नहीं उसे अपनी निगाह-ए-शौक़ हिजाब-ए-नज़र है आज दिल भी नहीं है महरम-ए-असरार-ए-इश्क़ दोस्त ये राज़दाँ भी हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज कल तक थी दिल में हसरत-ए-अज़ादी-ए-क़फ़स आज़ाद आज हैं तो ग़म-ए-बाल-ओ-पर है आज   3. ग़म-ए-मोहब्बत में दिल के

अल्लामा ताजवर नजीबाबादी

अल्लामा ताजवर नजीबाबादी (02 मई 1893-30 जनवरी 1951) का जन्म नैनीताल में हुआ। उनका पैतृक स्थान नजीबाबाद (उ.प्र.) था। वह शायर, अदीब, पत्रकार और शिक्षाविद थे। फ़ारसी व अरबी की आरम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद दारुलउलूम देवबंद से दर्से निज़ामिया की शिक्षा पूरी की। 1915 में पंजाब यूनिवर्सिटी से मौलवी फ़ाज़िल और मुंशी फ़ाज़िल के इम्तेहान पास किये। 1921 में दयालसिंह कालेज लाहौर में फ़ारसी और उर्दू के शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए। उन्होंने 'हुमायूँ' और 'मख्ज़न' पत्रिकाओं में काम किया और 'अदबी दुनिया' और 'शाहकार' पत्रिकाएँ जारी कीं। उन्होंने 'उर्दू मरकज़' के नाम से संकलन एवं सम्पादन की एक संस्था भी स्थापित की। साभार- http://www.hindi-kavita.com/HindiAllamaTajvarNazibabadi.php

समकालीन चुनौतियों और विडंबनाओ से मुठभेड़/पुस्तक समीक्षा

  वेदप्रकाश अमिताभ    समाचार पत्रों के 'संपादकीय' समसामयिक और कालांकित होते हैं। कुछ समय बाद उनके पुनःपाठ की जरूरत या गुंजाइश नहीं होती। लेकिन ऋषभदेव शर्मा रचित 'समकाल से मुठभेड़' (2019) में संकलित संपादकीय टिप्पणियाँ कुछ अलग प्रकृति की हैं। इनमें उठाए गए मुद्दे आज भी जीवंत हैं। एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में फरवरी 2019 से लेकर अगस्त 2019 के बीच 'संपादकीय' के रूप में छपी उनकी दैनिक टिप्पणियों में से कुछ को इस कृति में संगृहीत और समायोजित किया गया है। आठ खंडों में व्यवस्थित इस कृति में एक ओर 'मानवाधिकार की पुकार',  'वैश्विक तनाव और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद' तथा 'अफगान समस्या' पर विचार किया गया है, तो दूसरी ओर 'स्त्री प्रश्न' और 'पार्क चलित्तर' को उजागर करने वाली टिप्पणियाँ भी हैं। 'हरित विमर्श' में पर्यावरण-चिंता केंद्रस्थ है और 'खिचड़ी विमर्श' में शेष टिप्पणियाँ समाहित हैं। स्पष्ट है कि 'समकाल से मुठभेड़' की रेंज बहुत व्यापक है, अधिकतर समकालीन चुनौतियाँ और विडंबनाएँ इसमें सहेजी गई हैं।   दैनिक समाचार पत

तफ़ाउत

अख़्तर-उल-ईमान   हम कितना रोए थे जब इक दिन सोचा था हम मर जाएँगे और हम से हर नेमत की लज़्ज़त का एहसास जुदा हो जाएगा छोटी छोटी चीज़ें जैसे शहद की मक्खी की भिन भिन चिड़ियों की चूँ चूँ कव्वों का एक इक तिनका चुनना नीम की सब से ऊँची शाख़ पे जा कर रख देना और घोंसला बुनना सड़कें कूटने वाले इंजन की छुक छुक बच्चों का धूल उड़ाना आधे नंगे मज़दूरों को प्याज़ से रोटी खाते देखे जाना ये सब ला-यानी बेकार मशाग़िल बैठे बैठे एक दम छिन जाएँगे हम कितना रोए थे जब पहली बार ये ख़तरा अंदर जागा था इस गर्दिश करने वाली धरती से रिश्ता टूटेगा हम जामिद हो जाएँगे लेकिन कब से लब साकित हैं दिल की हंगामा-आराई की बरसों से आवाज़ नहीं आई और इस मर्ग-ए-मुसलसल पर इन कम-माया आँखों से इक क़तरा आँसू भी तो नहीं टपका

आख़िरी मुलाक़ात

अख़्तर-उल-ईमान आओ कि जश्ने-मर्गे-मुहब्बत मनाएँ हम आती नहीं कहीं से दिले-जिंदा की सदा सूने पड़े हैं कूच'ओ-बाज़ार इश्क के है शमए-अंजुमन का नया हुस्ने-जां-गुदाज़ शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले ताज़ा न रख सकेगी रिवायाते-दश्तो-दार वो फ़ितनासर गये जिन्हें कांटे अज़ीज़ थे अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलाएं हम आओ कि जश्ने-मर्गे-मुहब्बत मनाएँ हम सोचा न था कि आएगा ये दिन भी फिर कभी इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें क्या जाने अब न उल्फ़ते-देरीना याद आए इस हुस्ने-इख्तियार पे आँखें झुका तो लें बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़ संभले हुए तो हैं पे ज़रा डगमगा तो लें आओ कि जश्ने-मर्गे-मुहब्बत मनाएँ हम