Tuesday, October 29, 2019

चित्रा मुद्गल की कहानियों में व्यक्तिपरक यथार्थ

 



डॉ.संगीता शर्मा


चित्रा मुदगल हमारे समय की अग्रणी कथाकार है। इन्होंने उपन्यास और कहानी दोनों ही विधाओं में कथ्य और भाषा सभी क्षेत्रों में नई जमीन तोडी है।


चित्रा मुद्गल का जन्म 10 दिसंबर 1943 को सामंती परिवेश के निहाल खेड़ा, जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश के एक संपन्न अमेठिहन ठाकुर परिवार में हुआ। पिता साहसी और रोबदार व्यक्ति थे वहीं माताजी सीधी-सादी घरेलू महिला गांव के रोबदार ठाकुर परिवार में जन्म होने के कारण उन्होंने अपने परिवार द्वारा निम्न वर्ग का घरेलू शोषण देखा जिससे उनका बालमन विचलित हो उठा।बालपन से ही उनके मन में अंतर्विरोध जाग उठा मुंबई में 'सारिका' पत्रिका के संपादक अवधनारायण मुद्गल से अंतर्जातीय विवाह किया जिससे परिवार ने उनसे संबंध तोड़ लिए। आर्थिक तंगी का सामना करते हए वे एक चॉल में रहते थे तथा अवधनारायण मदगल ने कविताएं. कहानियां लिखना छोड़ एजेंसियों में विज्ञापन लिखने शुरू किए और चित्राजी ने अनुवाद


इन सब परिस्थितियों के बीच भी इन्होंने अपनी साहित्य साधना नहीं रोकी तथा समय-समय पर कई पत्र पत्रिकाओं में इनके लेख, कविताएं, कहानियां छपती रही। इसी बीच में कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी। महिलाओं की सामाजिक संस्था 'जागरण' से जुड़ी रही, जो उच्च वर्ग द्वारा काम करने वाली नौकरानियों के साथ होने वाले शोषण का विरोध कर उनका अधिकार दिलवाने के प्रति कृत संकल्प थी।


उनकी अनेक कहानियों में विविधता मिलती है इन्होंने अपनी कहानियों में व्यक्तिपरक यथार्थ की गहन पड़ताल अहंभाव, दांपत्य जनित कुंठा मानसिक द्वंद्व, भावनाओं का संघर्ष,घुटन,संत्रास, अकेलापन और आत्मनिर्वासन की अभिव्यक्ति की कसौटी पर की गई है


उनकी अनेक कहानियों में यह मनोवैज्ञानिक यथार्थ भी अनेक स्थलों पर दृष्टव्य है कि अहं एक ओर तो इदम् की अवांछनीय मांगों को नियंत्रित करता है दूसरी ओर पराहम् की कठोर नैतिक धारणाओं को भी संबोधित करता है।व्यक्ति के संदर्भ में अहं का जो विकास होता है, उसमें अनुभव,प्रशिक्षण एवं शिक्षा का प्रमुख स्थान है। इसके अलावा व्यक्तित्व के नैतिक एवं विचारशील पक्ष का संबंध पराहम् से होता है। जिस प्रकार अहं का ध्यान अधिकतर यथार्थ की ओर होता है।उसी प्रकार पराहम् आदर्श से प्रेरित होता है।सच तो यह है कि व्यक्तित्व की जो संस्कृति है, उसकी जो सांस्कृतिक मान्यताएं है,वे सब पराहम् के विकास में सहायक होती है।पराहम् भी व्यक्ति में बाल्यकाल से ही विकसित होने लगती है और समाजीकरण के माध्यम से बालक अपने समाज के नैतिक मल्यों एवं आदर्शों को अपने व्यक्तित्व का अंग बना लेता है।


सामान्य भाषा में अंतःकरण का प्रयोग उसी तथ्य को व्यक्त करने के लिए करते हैं जिसे फ्रायड ने पराहम् का नाम दिया है। व्यक्ति के जीवन में इसका वही स्थान है जो कि समाज में व्यक्ति के माता-पिता और शिक्षक का होता है पराहम् व्यक्ति की असामाजिक प्रवृत्तियों में मुख्य रूप से कामवासना और आक्रामक व्यवहार है।पराहम् इनसे जुड़ी असमाजिक एवं अनैतिक प्रवृत्तियों को रोकने का कार्य करता है। व्यक्तिपरक यथार्थ का आधार व्यक्तित्व और उसका वैशिष्ट्य है तथा इस वैशिष्ट्य का निर्धारण इदं,अहं और पराहम् की उपर्युक्त सरणियों द्वारा होता है। अतः व्यक्ति का व्यवहार इन्हीं तीन प्रवृत्तियों के माध्यम से अभिव्यक्ति प्राप्त करता है। लेखिका चित्रा मुद्गल ने अपनी कहानियों में विभिन्न पात्रों के जीवन व्यवहारगत व्यक्तिपरक यथार्थ को उभारते हुए उनकी इन प्रवृत्तियों को यथा स्थान वर्णित किया है।


__ अहं भाव से संचालित व्यक्ति 'मैं' की भावना से ग्रसित रहता है।वह अपने होने के भाव को दूसरों के द्वारा स्वीकार करना चाहता है इससे उसकी रिकग्निशन की वृत्ति को तोष मिलता है यही 'मैं' पन उसमें उपजे दूसरों के प्रति तुच्छता भाव को उजागर करता है।


___ 'मैं' के भाव को दूसरों पर थोपने की कोशिश है अहं भाव। यही बात लेखिका 'ताशमहल' कहानी में उजागर करती है कि पति निशीथ पत्नी द्वारा अपने पहले पति से उत्पन्न बच्चे,बच्चू को आंख की किरच समझता है।वह यह तक कहने से नहीं चूकता कि-"इस घर में, अपने और तुम्हारे बीच इसे मैं और नहीं बर्दाश्त कर सकता"


लेखिका ने पुरुष अहं को पति और पत्नी के बीच, मैं की विभाजन रेखा सिद्ध किया है। जहां निशीथ उसे हमारे बीच कह सकता था, लेकिन वह जोर देकर कहता है-“अपने और तुम्हारे बीच"यहां तक कहता है कि तुम मेरे बच्चे के साथ सौतेला व्यवहार कर रही हो।यह न कहते हुए कि “हमारे बच्चे के साथ मेरे' पर विशेष जोर दिया तो क्या बच्चा केवल उसी का है वह भागीदार नहीं ममता का विभाजन वह यह सोचने पर मजबूर हो गयी कि तेरे-मेरे की विभाजन रेखा कब उन दोनों के बीच दबे पांव आ बैठी।


भारतीय समाज की यह विडंबना है कि अहं द्वारा संचालित पुरुष चाहे जो करे उसे खुली छूट है। अय्याशी या व्यभिचार भी मानो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है यह वास्तविकता ही चित्रा मुद्गल ने “प्रमोशन कहानी में दर्शाई है।पति यदि पदोन्नति करे तो उसकी मेहनत व लगन परन्तु पत्नी तरक्की करे तो वह किसी अर्थात “डॉ.कोठारी की अनुकम्पा है...... और बीच में शरीर आये बिना यह संभव नहीं अर्थात शरीर के आधार पर ही उसे तरक्की मिल सकती है, काबिलियत के आधार पर नही। धैर्य खोकर पति यहां तक कह उठता है कि डॉ.कोठारी के साथ तुम्हारा काम करना मुझे बर्दाश्त नहीं"।


वह पत्नी की पदोन्नति को आंखों में धूल झोंकना समझता है।यह पुरुषाहंकार की पराकाष्ठा का नमूना है


_ 'रुना आ रही है' कहानी में लेखिका ने एक बहुत ही संवेदनशील विषय को लिया है कि बुआ-भतीजी की उम्र में केवल एक साल का ही फर्क है।असल से ब्याज प्यारा होता है उसी तरह पिताजी के व्यवहार से आहत,यह चोट रूना (भतीजी) के प्रति ईर्ष्या बन कर सामने आती है।उसी से खार खाते हुए भी वही उसका कवच थी,वही मुसीबतों और क्रोध से बचाती। अपनी चाह को उसके द्वारा पूर्ति करवाती, बातें मनवाती ईर्ष्या का यह कैसा स्वरूप है जिसे वह खुद नहीं समझ पाती।


जब व्यक्ति को सामने वाला ठेस पहुंचाता है या ऐसी बात करता है जिससे उसके अहं को ठेस पहुंचती है तो वह क्रोध की अति से बावरा हो जाता है। लेखिका ने 'केंचुल' कहानी में यही बताया है कि सरना अपनी मां से जब यह कहती है कि “मैं तुम्हारी तरह भांडा कटका नही करेगी.... तेरे सरखा भट्ठी नहीं सुलगाएगी.....तेरे जैसे नौरा(दुल्हा) नई मंगता मेरे को......"। इस जुमले ने कमला को छलनी कर दिया। उसकी अपनी बेटी उससे इस तरह कह रही है। बात सीधे नश्तर सी दिल में चुभ गई। इस प्रकार चित्रा मुद्गल ने अहं भाव से ग्रस्त व्यक्ति के मनोभाव, आचरण और विकृतियों का प्रभावी अंकन अपनी कहानियों में किया है


जहां परिवार होता है वहां आपसी विचार,सोच, इच्छाएं टकराती है।एक दूसरे के प्रति अहं की भावना को जन्म देती है, तो कभी-कभी कुंठा पैदा कर देती है। परिवार ही नहीं, पति-पत्नी में कुंठाएँ पैदा होती है, आपसी समझ कम होने पर कोई झुकने को तैयार नहीं होता एक दूसरे पर आक्षेप, दोषारोपण, नीचा दिखाना कटु वचन कहना ही उद्देश्य रह जाता है और यही दांपत्य जनित कुंठा रिश्तों में खटास भर कर स्थिति संबंध विच्छेद तक पहुंच जाती है


__ "इस हमाम में, कहानी में सोमेश रूढ़िवादी विचारों का पुरूष है जो स्त्री को पांव की जूती,घर की सजावट की वस्तु, बच्चे पैदा करने वाली मशीन समझता है। उसे पत्नी का नौकरी करना, घर से बाहर निकलना तनिक भी पसंद नहीं।बस यही चाहता है कि वह घर पर ही समय व्यतीत करें। जब वह उसके नौकरी के प्रस्ताव पर बिफर पड़ता है तो दिवा को यह महसूस होता है “जैसे वह मात्र संचालित देह है"। सुभाष की रोज की नोंक-झोंक और कुंठित मानसिकता की टिप्पणीयां। ललिता को लगा मानो सुभाष को न रोकना उसकी विकृत मानसिकता को बढ़ावा देना होगा। जो मिथ्या आरोप वह ललिता पर लगा रहा था कि नौकरी छोड़ दो क्योंकि तुम्हारा प्रमोशन तुम्हारे बॉस की देन है। ललिता यह सह नहीं पायी कि उसका प्रमोशन उसकी काबिलियत का नहीं उसकी देह का प्रमोशन है। अतः उसे कहना पड़ा कि “मानसिक तौर पर रूग्ण तुम हो, मैं नहीं। तुम्हारी कुंठाओं द्वारा रचा हुआ सत्य मेरी नियति नही बन सकता।


ईंट, मिट्टी,गारे की दीवारों से बना ही घर नहीं होता। पति-पत्नी का रिश्ता वह है जो आपसी समझदारी और विश्वास के गारे मिट्टी चुने से बनाया जाता है। जिस पर दांपत्य के विश्वास की नींव रखी जाती है


'अकेलापन'वह अवस्था है जिसमें मनुष्य अपनों, रिश्तेदारों, पहचान वालों, चहेते लोगों के साथ रहने पर भी खुद को अकेला महसूस करता है।वस्तुत: जब हमारी कोमल भावनाओं पर चोट पहुंचती है तो सब रिश्ते-नाते सभी संबंध स्वार्थ और शोषण पर आधारित प्रतीत होते है।संशय, संदेह, अविश्वास से भरा वह एकाकी रहना पसंद करता है। सामाजिक संबंधों से उसे चिढ़ हो जाती है। परिणामस्वरूप जब व्यक्ति परिवार और समाज से कटकर अपने आपको अलग कर लेता है तो इस मनोदशा को 'आत्मनिर्वासन' कहा जाता है।


'आत्मनिर्वासन वह दशा है जिसमें व्यक्ति हताश, निराश, अकेला, टूटा चूर- चूर स्वयं को अपने आप में समेट लेता है।उसे कहीं कुछ अच्छा नहीं लगता।उसे किसी से बात करना नहीं भाता तथा वह अकेला रहना पसंद करता है


यह दशा अकेलेपन से होकर गुजरती है और आत्मनिर्वासन तक अपने चरम पर आ जाती है। सुख-दुख, आशा-निराशा, राग-द्वेष, ईर्ष्या- क्रोध,आक्रोश,हर्ष, संतोष,सारी भावनाएं इस दशा तक आकर मौन हो जाती हैसमाज, घर-परिवार,रिश्ते- नाते भी इस अवस्था को छु नहीं पाते।मन की दशा बड़ी विचित्र होती है।यह असामंजस्य की परमावस्था है।


व्यक्ति यथार्थ का सामना करता हुआ अहंभाव द्वारा संचालित होता है। परंतु भावनाओं के संघर्ष और अंतत्वंद्व से गुजरते हुए कई प्रकार की इच्छा-आकांक्षा के कारण यातनाएं,संत्रास, परेशानी और डर से गुजरता हुआ कभी जब वह घुटन के अंतिम द्वार तक पहुंचता है तो अपने आप में सिमट जाता है। अकेलापन उसे अच्छा लगने लगता है।वह एक ऐसी अवस्था में पहुंच जाता है। जहां से आना बहुत ही कठिन होता है,जिसे आत्मनिर्वासन भी कहते है। ऐसे व्यक्ति के लिए विभिन्न व्यक्ति होकर भी नहीं होते।यथा "उन्हें आज तक नहीं समझा पाई-जिस एक से अलग हो गई थी, वही तो सारे संबंधों का पर्याय थी।वह छुट गयी तो सभी छूट गए। सबथे ही कहां मेरे लिए"


चित्रा मुद्गल की कहानी 'रूना आ रही है' में निम्मो को बुढ़ापे की औलाद,पीठ की कूबड समझ कोई उसे नहीं चाहता। यहां तक की पिता भी भतीजी रूना को ही चाहते,प्यार करते, जिससे ईर्ष्या होती। परंतु रुना बुआ को बहुत चाहती थी। दोनों में एक साल का अंतर था जिससे दोनों में बड़ी दोस्ती और प्रेम था। अंतर्जातीय विवाह करने पर निम्मो का परिवार से नाता टूटा ही रुना भी विमुख हो गई वह शैकत को यह नहीं समझा पाती कि ओर सब रिश्ते थे ही कहां उसके लिए। एक रूना से रिश्ता टूट गया तो सारे रिश्ते गौण हो गए।'सब' रिश्ते न उसके लिए महत्व रखते ,न वह उनके लिए।रुना ही तो सब रिश्तों का पर्याय थी।वही छूट गई तो सब अपने आप छूट गये और निम्मो अकेलेपन का शिकार होकर आत्मनिर्वासन की दशा में पहुंच गई


अकेलापन व्यक्ति को सांप की तरह इसता था ऐसे में वह एक ऐसी अवस्था में पहुंच जाता है जहां सभी कटघरे में खड़े नजर आते है।शक में उसे कोई अपना पराया नज़र नहीं आते सभी अजनबी लगते। अग्निरेखा'की मनु रात-दिन यही सोचती है कि “अमरेन्द्र और शशि उससे कुछ छिपा रहे हैं और मानसिक सकून के बहाने उसे ज्यादा से ज्यादा नींद में रखने की कोशिश की जा रही है"।


मनु अकेलेपन की उस अवस्था को भी पार कर चुकी है जिसे आत्मनिर्वासन कहते हैं।वह सांसारिक चीजों से ऊपर उठ चुकी है। रात-दिन बिस्तर पर पड़े-पड़े,अब दिन, तारीखें,प्रसंग सब अपना अर्थ खो चुके ।


पहले ही वह इस विषय पर डॉक्टर से बात कर चुकी थी।उसे हर पल हवा में “अपने खिलाफ साजिशों” के घोंसले टंगे नज़र आते। उसने स्वयं डॉक्टर से सविनय प्रार्थना की “लिथड रही हूं ठीक होने की उम्मीद में, पर अब सहन नहीं होता। धीरे-धीरे शरीर के निचले हिस्से की लुंजता उसके दिमाग और दिल पर भी छाने लगी। हर कोई षड्यंत्रकारी लगता और मौत उसका आखिरी विकल्प"। यह वह अवस्था है जिससे घबराकर मनुष्य आत्महत्या को अंगीकर कर लेता है


स्पष्ट है कि अहंभाव, दांपत्य जनित कुंठा, मानसिक द्वंद्व और भावनाओं का संघर्ष,घुटन और संत्रास के साथसाथ अकेलेपन और आत्मनिर्वासन से जुड़े व्यक्तिपरक यथार्थ को भी चित्रा मुद्गल ने अपनी कहानियों में पूरी भयावहता,सच्चाई और लेखकीय निष्ठा से उभारा है


संदर्भ ग्रंथ सूची


1)आदि-अनादि - 1 2009


सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली


2) आदि-अनादि -2 2009 सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली


3)आदि-अनादि। -3 2009 सामयिक प्रकाशन,नई दिल्ली


डॉ.संगीता शर्मा अत्तापूर-हैदराबाद 


sangeeta.dr3101@gmail.com


 


Friday, October 25, 2019

दुष्यंत कुमार: विद्रोही कवि


दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में जनपद बिजनौर के ग्राम राजपुर नवादा के ज़मींदार परिवार में 1 सितंबर 1933 को हुआ था। आपकी माता जी का नाम श्रीमती राम किशोरी देवी एवं पिता का नाम चैधरी भगवत सहाय था। कवि की प्रारंभिक शिक्षा गाँव की ही पाठशाला में मुख्याध्यापक पं. चिरंजीलाल शर्मा की छत्रछाया में संपन्न हुई। 1948 में कवि ने एस.एन.एस.एम. हाई स्कूल नहटौर जनपद बिजनौर से दसवीं कक्षा पास कर 1950 में चंदौसी, मुरादाबाद के एस.एम. काॅलेज से इंटरमिडिएट किया। 1950-54 तक कवि ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र रहते हुए बी.ए. और हिंदी साहित्य से एम.ए. किया। 1957-58 में कवि ने मुरादाबाद से बी.एड. किया। चन्दौसी में 30 नवंबर 1949 को राजेश्वरी कौशिक से कवि का विवाह संपन्न हुआ। कवि ने सर्व प्रथम जनपद बिजनौर के क़सबे किरतपुर में नौकरी की। कवि ने यहाँ एक विद्यालय में अध्यापकी की। यहाँ अध्यापकी करने के बाद ही मुरादाबाद से बी.एड. किया। तत्पश्चात आकाशवाणी दिल्ली के हिंदी वार्ता-विभाग में स्क्रिप्ट राइटर के रूप में कार्य किया। 1960 के अंतिम दिनों में कवि स्थानांतरण पाकर भोपाल पहुँचे। कवि ने मध्य प्रदेश के संस्कृत संचालनालय के अंतर्गत भाषा-विभाग के सहायक संचालक पद पर नियुक्ति पाई। कवि ने कुछ समय के लिए आदिम जाति जनकल्याण विभाग की प्रतिनयिुक्तियों के अतिरिक्त शेष समय 30 दिसंबर 1975 तक इसी भाषा-विभाग में बिताया। कवि ने नहटौर में शिक्षा प्राप्ति के समय ही रचनाधर्मिता का निर्वाह प्रारंभ कर दिया था। यहाँ कवि ने विधिवत कविता-लेखन, कविता की पांडुलिपि तैयार कर चंदौसी में शिक्षा के दौरान अंतिम रूप दिया। समर्पण था छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत के प्रति। कवि ने पंत को द्रोणाचार्य और स्वयं को एकलव्य माना। कवि ने अपना उप नाम 'परदेशी' रखा। विवाह के समय निमन्त्रण-पत्र पर भी दुष्यंत कुमार त्यागी 'परदेशी' छपवाया गया।
जब कवि उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद पहुँचे तब वहाँ उन्हें कमलेश्वर और मार्कंडेय जैसे अभिन्न मित्र मिले। तिकड़ी बनी तो 'त्रिशूल' नाम से प्रसिद्धि प्राप्त होते देर नहीं लगी। यहीं से तीनों ने मिलकर मासिक पत्रिका 'विहान' का प्रकाशन प्रारंभ किया। दुष्यंत कुमार के लेखन का प्रारंभ 1945 से ही हो गया था। प्रारंभ कविता से किया और बाद में कहानी भी लिखने लगे। प्रारंभ में कवि-सम्मेलनों के लिए मंचीय कविताएं लिखीं परंतु शीघ्र ही साहित्यिक गीतों और कभी-कभी ग़ज़ल की रचना भी करने लगे। 1949 में कविताओं की पाण्डुलिपि तैयार हो गई थी। 1954-55 में हैदराबाद से प्रकाशित कल्पना पत्रिका ;जनवरी 1955द्ध में नई कहानी: परंपरा और प्रयोग' शीर्षक ऐतिहासिक आलोचना का प्रकाशन हुआ। 1956-57 में 'सूर्य का स्वागत' नामक शीर्षक से कविताओं का संचयन और प्रकाशन हुआ। इससे पहले अनेक पत्र-पत्रिकाओं -प्रतीक, निकष, संकेत, नई कविता आदि में प्रकाशन हो चुका था। 'आवाजों़ के घेरे' ;कविता संग्रहद्ध 1963 में प्रकाशित हुई। 1964 में 'एक कंठ विषपायी' (काव्य-नाटक) प्रकाशित हुआ। 'छोटे-छोटे सवाल' 1964 में और 'आंगन में एक वृक्ष' 1970 में शीर्षक से उपन्यास प्रकाशित हुए। 1973 में कविताओं का तीसरा संग्रह 'जलते हुए वन का वसन्त' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। अंतिम किंतु सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त करने वाली कृति 'साये में धूप' रही। 1975 में ऐतिहासिक ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' नाम से प्रकाशित किया गया। 



अभिनंदन के विरोधी थे दुष्यंत
व्यक्तिगत रूप में मैं इन अभिनंदनों के खि़लाफ़ हूँ। एक तो इसलिए कि लेखक को अपनी पीठ पर भरसक कोई ऐसा अहसास नहीं लादना चाहिए जो उसकी स्वतंत्रता में बाधक बने, और दूसरे इसलिए कि इससे लेखक को एक वर्ग के रूप में दूसरे वर्गों पर तरजीह मिलती है जो कि एक ग़लत बात है। आखि़र क्यों शासन उस क्लर्क का अभिनंदन न करे जिसने अपने जीवन के तीस अमूल्य वर्ष बड़ी निष्ठापूर्वक उन फ़ाइलों में झोंक दिए जिनसे कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था। इसी प्रकार सुनार, बढ़ई, मोची, मज़दूर और मेहतर, हरेक की अपनी एक महत्त्वपूण सामाजिक भूमिका है। आखि़र उनका अभिनंदन क्यों नहीं होता? फिर लेखक में ऐसे कौन-से सुर्ख़ाब के पर लगे हैं कि आम आदमी से अलग है? क्यों वह शासकीय और सार्वजनिक सम्मान की कल्पना करता है? क्यों वह राज्यपालों या मंत्रियों की परिचय परिधि में आना चाहता है? ;मैंने तो किसी राज्यपाल को किसी लेखक के सान्निध्य की इच्छा करते हुए नहीं देखाद्ध क्यों वह चाहता है कि सत्ताधारी उसकी लेखनी से परिचित हों और उससे सामान्य लोगों की अपेक्षा भिन्न प्रकार का व्यवहार करें? आख़िर लेखक भी तो तो प्रोफे़सर, वकील, चित्रकार और मूर्तिकार आदि की तरह ही एक वर्ग है और इस व्यावसायिक युग में उन्हीं की तरह अपने ढंग से अपना पेट पालता है। अलबत्ता उसे यह अतिरिक्त सुविधा ज़रूर प्राप्त है कि वह अपने थोथे और घटिया से घटिया अहम् को भी शानदार अभिव्यक्ति दे सकता है। पिटकर आने के बाद वह जोशीली कविताएँ लिख सकता है या अपने पौरुष और बल का बखान कर सकता है। सर्वत्र उपेक्षा सहकर भी वह शिमला समझौते में मेरा विनम्र योगदान' जैसा निबंध लिख सकता है या डाकुओं के समर्पण का श्रेय अपनी कल्पना में लूट सकता है। वह एक लेख में दस बार अपना नाम ठँूस सकता है और उस बनिये की ख़बर भी ले सकता है जो उसके घर रोज़ पैसों का तक़ाज़ा करने आता है। आप लेखक के नाते अपने 'मैं' को झुनझुने की तरह बजाते हैं, मित्रों की प्रशंसा और शत्रुओं की निंदा करते हैं, साहित्य के नाम पर दिल की भड़ास निकालते हैं, और यह भी आशा करते हैं कि दुनिया आपको पूजे, लोग आपको चाहें, शासन आपको मान्यता दे।



दुष्यंत कुमार कृत साए में धूप (ग़ज़ल संग्रह)



भूमिका भाग में दुष्यंत स्वीकारतेे हैं-
मैं स्वीकार करता हूँ - कि ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में ज़रूरी है। कुछ उर्दू-दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज किया है। उनका कहना है कि शब्द 'शहर' नहीं 'शह्र' होता है, 'वज़न' नहीं 'वज़्न' होता है।
- कि मैं उर्दू नहीं जानता लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि 'शहर' की जगह 'नगर' लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ, किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है, जिस रूप में में वे हिंदी में घुल मिल गए हैं। उर्दू का 'शहन' हिंदी में 'शहर' लिखा और बोला जाता है, ठीक उसी तरह जैसे हिंदी का 'ब्राह्मण' उर्दू में 'बिरहमन' हो गया है और ' ऋतु' 'रुत' हो गई है।
- कि उर्दू और हिंदी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फ़र्क़ कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गई हैं, जिसे मैं बोलता हूँ।
- कि ग़ज़ल की विधा एक बहुत पुरानी, किंतु सशक्त विधा है, जिसमें बड़े-बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य-रचना की है। हिंदी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नए कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आज़माया है। परंतु अपनी सामथ्र्य और सीमाओं को जानने के बावजूद इस विधा में उतरते हुए मुझे आज भी संकोच तो है, पर उतना नहीं जितना होना चाहिए था। शायद इसका कारण यह है कि पत्र-पत्रिकाओं में इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें पढ़कर और सुनकर विभिन्ना वादों, रूचियों और वर्गों की सृजनशील प्रतिभाओं ने अपने पत्रों मन्तव्यों एवं टिप्पणियों से मुझे एक सुखद आत्म-विश्वास दिया है। इस नाते मैं उन सबका अत्यंत आभारी हूँ।
-..... और कमलेश्वर! वह इस अफ़सानें में न होता तो ये सिलसिला शायद यहाँ तक न आ पाता। मैं तो-
 हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
 कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।
हिंदी में आधुनिक ग़ज़ल का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण नाम दुष्यंत ही है। यह सही है, दुष्यंत के बाद हिंदी में ग़ज़ल काफ़ी आगे बढ़ी, कला और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर इसका उल्लेखनीय विकास हुआ, किंतु जो ख्याति एवं लोकप्रियता दुष्यंत को प्राप्त हुई, वह तो अद्वितिय ही है। हिंदी में ग़ज़लकारों ने अच्छे से अच्छा लिखने का प्रयास किया, किंतु कोई भी दुष्यंत को छू नहीं सका है। सच यही है कि दुष्यंत पहले ऐसे ग़ज़लकार हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को हिंदी में स्थापित करने का सफल प्रयास किया। इस प्रकार कहा जा सकता है हिक ग़ज़ल की लोकप्रियता का प्रारंभ दुष्यंत ने ही किया। हिंदी साहित्य में आज ग़ज़ल की चमक है। निरंतर ग़ज़ल-संग्रह छप रहे हैं। पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़ल ख़ूब नज़र आ रही है। कवि-सम्मेलनों में ग़ज़ल ने धूम मचा रखी है। ''इस अपार लोकप्रियता के मूल कारणों की खोज की जाए तो दुष्यंत का नाम और काम अवश्य नज़र आएगा। लेकिन वे कौन-से कारण हैं, जिनके रहते दुष्यंत एक ग़ज़लकार के रूप में स्वयं को स्थापित कर सके और लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचकर ग़ज़ल-सम्राट की उपाधि से सम्मानित हो सके। वस्तुतः दुष्यंत ने एक ओर तो ग़ज़ल को अपने युग की धड़कनों से जोड़ा तो दूसरी ओर उसे अभिव्यक्ति की वह नवीनता दी, जो हिंदी के लिए नितांत चैंका देने वाली थी। साहित्य में अंदाजे़-बयाँ या बात कहने की व्यक्तिगत शैली, अभिव्यक्ति का अनोखा और निराला ढंग जो चमत्कार कर दिखाता है, वह केवल शब्दों के द्वारा संभव नहीं होता। क्योंकि शब्द तो प्रायः वही होते हैं, जिनका प्रयोग अपने-अपने ढंग से हर साहित्यकार करता है, किंतु क़लम का धनी कलाकार इन शब्दों के प्रयोग का एक नया और सबसे अनोखा अंदाज़ ग्रहण करता है और उन पर अपने कलात्मक व्यक्तित्व की गहरी छाप छोड़ जाता है और इस प्रकार वह स्वयं अपने-आपको और अपने साहित्य दोनों को अमर कर जाता है। नवीनता शब्दों में नहीं, शब्दों के प्रयोग करने के ढंग में होती है, सोच में और विचार में होती है। दुष्यंत के काव्य में शब्दों के प्रयोग और सोच दोनों ही में असाधारण नवीनता थी, इसलिए उनकी आवाज़ ने हिंदी के विशाल क्षेत्र में फैले हुए अनगिनत पाठकों को चैंकाया और प्रभावित किया।''
''यह सही है कि हिंदी के सर्वप्रथम स्थापित ग़ज़लकार दुष्यंत की ग़ज़लों में व्याकरण-संबधी कुछ दोष अवश्य हैं, फिर भी दुष्यंत के महत्त्व और महानता में कोई कमी नहीं आ सकती। ग़ज़ल के प्रारंभिक दौर में वह न होते, कोई और होता, तब भी इस तरह के दोष का रह जाना संभव था, क्योंकि तब तक न तो हिंदीभाषी ग़ज़ल की संस्कृति से पूरी तरह जुड़ पाए थे, न उन्हें ग़ज़ल की परिपूर्ण जानकारी ही थी। ऐसी स्थिति में दुष्यंत ने जो कार्य कर दिखाया, वह महत्त्वपूण है। यद्यपि आज भी हिंदी-ग़ज़लकारों को ग़ज़ल की विधागत जानकारी संतोषजनक मात्रा में नहीं है, फिर भी कई ग़ज़लकार ऐसे हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को बड़ी हद तक समझा है और वे अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं। लेकिन प्रेरणा का सबसे बड़ा और सबसे पहला स्रोत दुष्यंत की आवाज़ और उनका लहजा ही है। उनके ग़ज़ल-संग्रह 'साये में धूप' के अब तक कितने ही संस्करण छप चुके हैं। आज भी ग़ज़ल-प्रेमियों को दुष्यंत के जितने 'अशआर' कंठस्थ हैं, शायद ही किसी दूसरे ग़ज़लकार के हों। इसका कारण है कि दुष्यंत की आवाज़, उनके लहजे और अंदाज़ में जो नयापन तथा आकर्षण है, उसमें जो प्रभाव और तेवर है, वह किसी और में उतना नहीं है।''
दुष्यंत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने समय के सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों को अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया। उन्होंने ग़ज़ल के स्वरूप को छेड़ा नहीं बल्कि उसे ज्यों का त्यों अपना लिया। भाषा और विषय पर उनका जादू चल निकला। दुष्यंत ने जिन विषयों को चुना उन्हें भरपूर अभिव्यक्ति दी। दुष्यंत की ग़ज़ल के अशआर सामाजिक या राजनीतिक दस्तावेज़ ही बनकर नहीं रहे बल्कि  ग़ज़ल की कलात्मकता का उदाहरण बन गए।
  गूँगे निकल पड़े हैं, ज़बाँ की तलाश में,
  सरकार के ख़िलाफ ये साज़िश तो देखिए।
स्पष्ट हो जाता है कि उक्त दोनों शेर तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में कहे गए हैं। 
 इन शेरों को देखें-
  वह आदमी नहीं है, मुकम्मल बयान है,
  माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।
'माथे की चोट' वाले आदमी को 'मुकम्मल बयान' बताकर दुष्यंत ने स्वयं कुछ न कहते हुए सब कुछ कह दिया है। दुष्यंत माथे की चोट वाले आदमी की तरफ़ केवल इशारा करते हैं और उसे 'मुकम्मल बयान' बताकर स्वयं दूर जाकर खड़े हो जाते हैं। 
दूसरे शेर से समझ में आ जाता है कि ऊँचाइयों पर ले जाने की बात करने वालों ने किस प्रकार आम आदमी को ऐसी राह पर धकेल दिया है, जहाँ ऐसा ढलान है कि आदमी खड़ा हो तो आगे मुँह के बल गिर जाने का ख़तरा दिखायी दे जाता है। 
दुष्यंत ने बख़ूबी प्रतीकों को से अपनी बात कही है। इन शेरों को देखें-
 समुद्र और उठा, और उठा, और उठा,
 किसी के वास्ते ये चाँदनी बवाल हुई।


 उन्हें पता भी नहीं है कि उनके पाँवों से,
 वो ख़ूँ बहा है कि ये गर्द भी गुलाल हुई।
दोनों शेर ग़ज़लकार की कलाकारी का अद्भुत उदाहरण हैं। यहाँ समुद्र और चाँदनी जैसे प्रतीकों से विशेष प्रकार की कलात्मकता उत्पन्न हो गई है। चतुर्दशी की रात में समुद्र में ज्वार आता है और समुद्र उफनने लगता है। कवि  कहने में सफल हुआ है कि आज़ादी के बाद भारत में जो राजनीतिक उफान आया है वो स्वतंत्रता के कारण ही आया है । कवि इसी स्वतंत्रता को यहाँ चांदनी मानता है। दूसरे शेर में  कवि ने भयंकर कमाल कर दिखाया है। पाँवों से बहने वाले ख़ून ने मिट्टी को भी गुलाल का रूप दे दिया है। यह बात दुष्यंत ने उन लोागों के लिए कही है जो दिनभर मेहनत-मज़दूरी कर पेट भरने का प्रयास करते हैं। इस एक शेर ने भारतीय ग़रीबी के हालातों पर करारा प्रहार भी किया है। 
दुष्यंत के लिए हर आदमी का अपना दर्द था। उनका यह शेर देखें-
 आज मेरा साथ दो, वैसे मुझे मालूम है,
 पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं।
हालांकि कुछ विद्वान इन दोनों पंक्तियों में काल दोषद्ध पहली पंक्ति वर्तमान और दूसरी भविष्य मेंद्ध मानते हैं। मिथकों को तोड़ना और कलात्मकता के साथ अपने बात कहने में दुष्यंत को जैसे महारत हासिल थी। सुभाषचंद बोस कहते हैं 'तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा'। सुभाष जानते थे कि ख़ून के बदले आज़ादी अवश्य मिल जाएगी। यहाँ दुष्यंत भी जानते हैं कि लोग अगर साथ दें तो उन्हें उनके अधिकार मिल ही जाएंगे किंतु साथ ही वह यह भी जानते हैं कि भविष्य को संवारने के लिए आज कोई भी साथ देने वाला नहीं है।
दुष्यंत यर्थाथ को जीते थे। वो सामाजिक स्थिति को दिन-ब-दिन ख़राब होते देख रहे थे-
 हालाते-जिस्म, सूरते-जाँ और भी ख़राब,
 चारों तरफ़ ख़राब, यहाँ और भी ख़राब।
यही नहीं वो आतंकी गतिविधयों को ध्यान में रखकर कहते हैं-
 सैर के वास्ते सड़कों पे निकल आते थे,
 अब तो आकाश से पथराव का डर लगता है।
जो लोग जानबूझकर बेवकूफ़ बने रहते हैं या बनने का नाटक करते हैं। उन लोगों के लिए दुष्यंत ने क्या ख़ूब कहा है-
 मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता,
 हम घरों में भटके हैं, कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे।
दुष्यंत आशावादी कवि थे और लोगों को भी आशावादी बनने की प्रेरणा देते थे-
 सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
 मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
 मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
 हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।



दुष्यंत कुमार कृत अन्य कृतियाँ



एक कंठ विषपायी (काव्य नाटक)



दुष्यंत कृत एक कंठ विषपायी एक काव्य नाटक है। जिसमें वर्तमान परिस्थितियों को बड़ी ही सरलता के साथ उकेरा गया है।
 देवत्त्व और आदर्शों का परिधान ओढ़
 मैने क्या पाया....?
 निर्वासन!
 प्रेयसी वियोग!!
 हर परंपरा के मरने का विष
 मुझे मिला
 हर सूत्रपात का श्रेय ले गए लोग।
 मैं ऊब चुका हँ
 इस महिमा-मंडित छल से....।
'एक कंठ विषपायी' की ये पंक्तियाँ क्या इस बात की ओर इशारा नहीं करती कि सही रास्ते पर चलने वाले आज के उन समस्त लोगों के लिए, जिन्हें पग-पग पर वैसी ही अवहेलना झेलनी पड़ रही है? क्योंकि आज तो हर क़दम पर शिवत्व तिरस्कृत हो रहा है, न्याय की अवहेलना हो रही है। योग्यता की पूछ नहीं। क़ाबिलों व उनके कैरियर की निर्मम हत्या हो रही है। उन्हें मिल रहा है- निर्वासन व जीवन का ज़हर और अयोग्यों को अन्य कारणों से मिल रहा है-सत्ता, सम्मान व सुख....सब कुछ।



जलते हुए वन का वसन्त (काव्य संग्रह)



दुष्यंत कुमार आम आदमी के कवि थे। तभी तो उन्होंने पुस्तक की भूमिका में लिखा- 'ये कविताएँ इसी हद तक मेरी हैं कि मैंने इन्हें लिखा और भोगा है। यदि आपको इनमें पहचाना-सा स्वर, आत्मीय-सी भाषा और अपनी-सी बात नज़र आए तो यह मेरी सफलता है।' कवि स्वीकार करता है कि 'मेरे पास कविताओं के मुखौटे नहीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राएँ नहीं हैं और अजनबी शब्दों का लिबास नहीं है। मैं एक साधारण आदमी की पीड़ा, उत्तेजना, दबाव, अभाव और उसके संबंधों के उलझावों को जीता और व्यक्त करता हूँ।
कवि दुष्यंत ने किसी को चैंकाने या किसी चमत्कार के लिए कविता नहीं लिखी। कविता को परिभाषित करते हुए दुष्यंत स्वीकारते हैं-'मैं कविता को चैंकाने या आतंकित करने के लिए इस्तेमाल नहीं करता, गो कि ऐसा करके लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा जा सकता है। परंतु कविता से केवल यह अपेक्षा, कितनी कम है। मैं जानता हूँ कि अहसास के अनेक स्तरों को चीरती हुई, व्यक्तित्व के भीतर दूर तक उतर जाने वाली चीज़, कविता होती है। उसे इतनी छोटी भूमिका नहीं दी जा सकती। समाज और व्यक्ति के संदर्भ में उसका दायित्व, इससे बहुत बड़ा है।' कवि कहता है-'कविता यातना से पैदा होती है।'
'जलते हुए वन का वसंत' कवि की कविताओं का तीसरा संग्रह है। जिसमें अवगाहन सहित कुल  45 कविताएँ हैं। संग्रह को तीन खंडों में बांटा गया है। पहले खंड को कवि ने इतिहास-बोध नाम दिया है और यह खंड शानी के नाम है। इसमें दस कविताएँ हैं जिनमें योग-संयोग, यात्रानुभूति, उपक्रम एक सफ़र पर, परवर्ती-प्रभाव, शगुन-शंका, सुबह: समाचार-पत्र के समय, आत्मालाप, अस्ति-बोध और वसंत आ गया शामिल की गई हैं। 
दूसरे खंड को देश-प्रेम का नाम दिया गया है। यह खंड सत्येन के नाम है।  इसमें देश-प्रेम, ईश्वर को सूली, चिंता, देश, जनता, मौसम, तुलना, युद्ध और युद्ध-विराम के बीच, मंत्री की मैना, सवाल, एक चुनाव-परिणाम, कहाँ से शुरू करें यात्रा, और गाते-गाते कुल 13 कविताएँ हैं। 
तीसरे खंड को चक्रवात नाम दिया गया है। यह खंड रमाकांत के नाम है। इसमें एक शाम की मनःस्थिति, वर्षों बाद, प्रतीति, गीत वर्षा, स्वस्तिक क्षण, एक निमंत्रण का उत्तर, पहुँच, विदा, विदा के बाद: प्रतीक्षा, एक जन्म दिन पर, यह साहस, एक साम्य, एक और प्रसंग, साँझ: एक विदा-दृश्य, सृष्टि की आयोजना, एक समझौता, हांठों के नीचे फिर, गीत, मेरे स्वप्न, और तुझे कैसे भूल जाऊँ कुल 21 कविताएँ हैं।



आंगन में एक वृक्ष (उपन्यास)



दुष्यंत कुमार ने बहुत कुछ लिखा पर जिन अच्छी कृतियों से उनके रचनात्मक वैभव का पता चलता है, यह उपन्यास उनमें से एक है। उपन्यास में एक सामंती परिवार और उसके परिवेश का चित्रण है। सामंत ज़मीन और उससे मिलने वाली दौलत को क़ब्जे में रखने के लिए न केवल ग़रीब किसानों, अपने नौकर-चाकरों और स्त्रियों का शोषण और उत्पीड़न करता है, बल्कि स्वयं को और जिन्हें वह प्यार करता है, उन्हें भी बर्बादी की तरफ़ ठेलता है, इसका यहाँ मार्मिक चित्रण किया गया है।
उपन्यास बड़ी शिद्दत से दिखाता है कि अंततः सामंत भी मनुष्य ही होता है और उसकी भी अपनी मानवीय पीड़ाएँ होती हैं, पर अपने वर्गीय स्वार्थ और शोषकीय रुतबे को बनाए रखने की कोशिश में वह कितना अमानवीय होता चला जाता है इसका ख़ुद उसे भी अहसास नहीं होता।
उपन्यास के सारे चरित्र चाहे वह चंदन, भैनाजी, माँ, पिताजी और मंडावली वाली भाभी हों या फिर मुंशीजी, यादराम, भिक्खन चमार आदि निचले वर्ग की हों सभी अपने परिवेश में पूरी जीवन्तता और ताज़गी के साथ उभरते हैं। उपन्यासकार कुछ ही वाक्यों में उनके पूरे व्यक्तित्व को उकेरकर रख देता है और अपनी परिणति में कथा पाठक को स्तब्ध तथा द्रवित कर जाती है। दुष्यंत कुमार की भाषा के तेवर की बानगी यहाँ भी देखने को मिलती है- कहीं एक भी शब्द फालतू, न सुस्त। 
अत्यंत पठनीय तथा मार्मिक कथा-रचना।
और इसी दिन का मुझे इन्तज़ार रहता। चंदन भाई साहब आते तो मेरे लिए घर में नुमाइश-सी लग जाती। रंग-बिरंगे कपड़े, अजीबो-ग़रीब खिलौने, जापानी पिस्तौल और गोलियाँ और इनके अलावा ख़ूबसूरत डिब्बों में बंद टाफ़ियाँ व चाॅकलेट ओर यह सब कुछ अकेले मेरे लिए। माँ हमेशा उन्हें डाँटती, ”चंदन, तू इतने पैसे क्यों फूँकता है रे?“
”कहाँ बीजी! देखो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी नहीं लाया इस बार।“ भाई साहब बड़ी मधुर आवाज़ में, सहज मुस्कान होठों पर लाकर सफ़ाई देते। माँ बड़बड़ाती हुई रसोईघर में चली जाती है और मैं भाई साहब के और पास सरक आता। मेरी तरफ़ मुख़ातिब होते हुए वे धीरे-से मेरे कान में कहते, ”बीजी से ज़िक्र मत करना, उनके लिए भी साड़ी लाया हूँ। जाते हुए दूँगा।“ फिर अचानक गंभीर होकर पूछते, ”हाँ भई, क्या प्रोग्राम है आज का?“
मैं प्रोग्राम का मतलब नहीं समझता था। केवल उनकी ओर प्यार और श्रद्धा से निहारता रहता। वे हँसकर मुझे अपने से चिपटा लेते और ख़ुद ही समझाते, ”तो फिर यह तय रहा कि दोपहर में म्यूज़िक, शाम को शिकार और रात में यादराम के हाथ के पराठे और तीतर?“
मैं गरदन हिलाकर सहमति प्रकट करता और तत्काल मेरी आँखों में यादराम की गंजी चाँद और पराँठे बेलते समय उसकी कनपटियों पर बार-बार उभरती-गिरती नसों की मछलियाँ तैरने लगतीं।
यादराम भाई साहब का ख़ानसामा था। भाई साहब जब भी मुरादाबाद से आते, यादराम साथ ज़रूर आता। दोपहर का भोजन भाई साहब माँ के रसोईघर में बैठकर करते। मगर शाम को पिताजी और मैं दोनों ही उनके साथ यादराम के हाथ के पराँठे खाते। सिर्फ़ माँ अपनी रसोई अलग पकाती थीं।
”क्यों यादराम, तेरी चाँद के बाल कहाँ गए?“ मैं अक्सर यह सवाल उससे पूछा करता। और यादराम हमेशा इसका एक जवाब देता, ”बाबूजी के जूते चाट गए, लल्लू।“
माँ को यादराम एक आँख नहीं भाता था। शुरू-शुरू में उन्होंने मेरे वहाँ खाने का बड़ा विरोध किया। लेकिन कुछ तो मेरी अपनी ज़िद और कुछ भाई साहब के अनुनय-अनुरोध के सामने उन्हें झुक जाना पड़ा। मुझे ख़ूब याद है कि स्वभाव से बहुत कठोर होने के बावजूद माँ भाई साहब की बात नहीं टालती थीं। यह और बात है कि उसके बाद भी वे मुझे लेकर बराबर भाई साहब और पिताजी, दोनों को यह ताना देती रहतीं कि उन्होंने 'छोटे' को भी म्लेच्छ बना दिया है।
गाँव में भाई साहब एक भूचाल की तरह आते थे और डेढ़-दो हज़ार आदमियों की उस छोटी-सी बस्ती में, हर जगह, हर क़दम पर अपने नक़्श और छाप छोड़ जाते थे। उनके जाने के बाद कई दिनों तक लोग क़िस्से-कहानियों की तरह उन्हें याद करते रहते ओर अक्सर यही ज़िक्र हुआ करता, ”देखो, कितना बड़ा आदमी है, मगर घमंड छू तक नहीं गया!“ भिक्खन चमार- जिसे भाई साहब 'मूविंग रेडियो स्टेशन' कहा करते थे, उनके चले जाने के बाद, अपने ठेठ क़िस्सागोई के अंदाज़ में उनकी कहानियाँ सुनाता, ”अरे भैया, बाबू आदमी थोड़ई हैं, फिरस्ते हैं। उस दिन सुबह-सुबह बन्दूक लिए हुए आ गए। बोले- 'क्यों मूविन रेडियो-टेसन' अकेले-अकेले माल उड़ा रये हो!“ मैंने कहा- बाबू, माल कहाँ, खिचड़ी है, तुम्हारे खाने की चीज नईं। बस, बिगड़ गए। बोले- 'अच्छा! तुम अकेले खाओगे और हम तुम्हारा मुँह देखेंगे?' और साहब, भगवान झूठ न बुलाए, मैंने लुक़मा बनाने के लिए थाली की तरफ़ हाथ बढ़ाया, तो धड़ाक। साला दिल धक् से हो गया और साहब, सूँ-सूँ करता हुआ एक कव्वा भड़ाक से थाली में आगे गिरा। राम!!! राम!!! कहाँ का खाना! हाथ जोड़कर उठ खड़ा हुआ। क्या करता? मगर क्या बेचूक निशाना। साले उड़ते पंछी कू जहाँ चाहा, वहाँ गिरा दिया।“
निशाने की तारीफ़ भाई देवीसहाय जी भी किया करते थे। मगर उससे भी ज़्यादा वे भाई साहब के गले पर मुग्ध थे। उनका तकिया-कलाम 'ओख़्ख़ो जी' था। इसलिए भाई साहब उन्हें 'ओख़्ख़ो भाई साहब' कहा करते थे। उनके म्यूजिक प्रोग्राम में बुज़्ाुर्गों का प्रतिनिधित्व केवल 'ओख़्ख़ो भाई साहब' किया करते थे। हम बच्चों का इस प्रोग्राम में बैठने की इजाज़त नहीं होती थी। लिहाज़ा हम हाॅल के बंद दरवाज़ों के पास कान लगाकर सुना करते। तबले के ठोकने, हारमोनियम के स्वर मिलाने और भाई साहब के आलाप लेने से शुरू कर ख़त्म होने तक हम कई लड़के वहाँ खड़े रहते और जब भाई देवीसहाय जी कहते, 'ओख़्ख़ो जी, क्या चीज़ सुनाई है, भाई चंदन!' कहाँ से मार दी? तो बड़े लड़के कान लगाकर गौ़र से सुनने की कोशिश किया करते थे।



आवाज़ों के घेरे में (काव्य संग्रह)



अपने आप से अपने परिवेश और व्यवस्था से नाराज़ कवि के रूप में दुष्यंत कुमार की कविताएँ हिंदी का एक आवश्यक हिस्सा बन चुकी हैं। आठवें दशक के मध्य और उत्तराद्र्ध में अपनी धारदार रचनाओं के लिए बहुचर्चित दुष्यंत जिस आग में होम हुए, उसे अपनी रचनाओं में लंबे समय तक महसूस किया जाता रहेगा।
आवाज़ों के घेरे दुष्यंत कुमार का एक ज़रूरी कविता-संग्रह है। इसमें धुआँ-धुआँ होती उस शख़्सियत को साफ़ तौर पर पहचाना जा सकता है लेकिन रचनात्मक स्तर पर कवि का यह विरोध व्यवस्था से अधिक अपने आप से है, जहाँ व्यक्ति न होकर वह एक वर्ग है- मुठ्ठियों को बाँधता और खोलता। बाँधना, जो उसकी ज़रूरत है ओर खोलना, मजबूरी। एक प्रकार निरर्थकता और ठहराव का जो बोध इन कविताओं में है, वह सार्थक और गतिशील होने की गहरी छटपटाहट से भरा हुआ है। स्पष्टतः कवि का यही द्वन्द्व और छटपटाहट इन कविताओं का रचनाधर्म है, जिसे सहज और सार्थक अभिव्यक्ति मिली है।
दुष्यंत लय के कवि हैं, इसलिए मुक्तछंद होकर भी ये कविताएँ छंदमुक्त नहीं हैं। साथ ही यहाँ उनके कुछ गीत भी हैं और बाद में सामने आई बेहतरीन ग़ज़लों की आहटें भी। संक्षेप में, यह संग्रह दुष्यंत की असमय समाप्त हो गई काव्य-यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।
 आज अक्षरों के इस निविड़ वन में भटकतीं
 यह हज़ारों लेखनी इतिहास का पथ खोजती हैं
 ...क्रांति! ........ कितना हँसो चाहे
 किंतु ये जन सभी पागल नहीं।
आवाज़ों के घेरे
 आवाज़ें....
 स्थूल रूप धरकर जो गलियों, सड़कों में मँडलाती हैं,
 क़ीमती कपड़ों के जिस्मों से टकराती हैं,
 मोटरों के आगे बिछ जाती हैं,
 दुकानों को देखती ललचाती हैं,
 प्रश्न चिह्न बनकर अनायास आगे आ जाती हैं-
 आवाज़ें! आवाज़ें, आवाज़ें!!



संपादन के क्षेत्र में दुष्यंत कुमार



दुष्यंत कुमार ने विभिन्न विधाओं को अपनाते हुए साहित्य सेवा की है। उन्होंने नवोदित साहित्यकारों का मार्गदर्शन भी किया है। इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका विहान इसका उदाहरण है। 



विहान (द्वैमासिक पत्रिका)1953



इलाहाबाद से 'विहान' का सम्पादन दुष्यंत कुमार, कमलेश्वर और मार्कण्डेय तीनों ने मिलकर किया था। इस पत्रिका के कुल कितने अंक प्रकाशित किये गए, यह तो ज्ञात नहीं हो पाया किंतु विहान का प्रथम अंक मार्च-अप्रैल 1953 में प्रकाशित हुआ था। विहान के प्रबंध संपादक विश्वनाथ प्रसाद जायसवाल थे। जबकि प्रबन्ध समिति में उमेशचंद्र उपाध्याय, हरिश्चंद्र श्रीवास्तव, दुष्यंत कुमार त्यागी, जितेन्द्र जायसवाल और राधेमोहन सिन्हा थे। विहान के प्रथम अंक के रूप सज्जाकार थे कमलेश्वर और आवरण पृष्ठ पर जो चित्र प्रयोग किया गया था वह था 'भोर हुई बज उठी बाँसुरी' यह चित्र चित्रकार के.बी. द्वारा बनाया गया था।



विहान के रचनाकार



विहान के प्रथम अंक के रचनाकार प्रकाशचंद्र गुप्त, भगवत शराण उपाध्याय, रघुपति सहाय 'फ़िराक', श्री कृष्णदास, नेमीचंद जैन, विद्यानिवास मिश्र ;लेख, निबन्ध, मार्कण्डेय, कमलेश्वर, अमृतराय, परमानंद गौड़ ;कहानी,स्कैच, केदार, नागार्जुन, सतीश दत्त पांडे, गंगाप्रसाद श्रीवास्तव, अजित कुमार, दुष्यंत कुमार, युक्तिभद्र दीक्षित (कविताएं) रहे।
नए रचनाकारों को प्रोत्साहन
दुष्यंत कुमार ने नए रचनाकारों को भी ख़ूब प्रोत्साहन दिया। विहान के अपने अग्रिम लेख में उन्होंने लिखा है- 'इस अंक में हम तीन बिल्कुल अपरिचित प्रतिभाओं को आपसे परिचित करा रहे हैं। श्री सतीश पांडे, श्री युक्तिभद्र दीक्षित और श्री परमानंद गौड़। तीनों ही ऐसे लेखक हैं जिनकी लेखनी का लोहा एक न एक दिन सबको मानना पड़ेगा। हम चेष्टा करेंगे कि अगले अंकों में भी इनकी रचनाएँ देते रहें। और भी बहुत से नए लेखकों को खोज निकालने का ज़िम्मा हमने लिया है और विश्वास करते हैं कि हर अंक में आप से एक न एक नए लेखक दोस्त का परिचय कराते रहेंगे।'



दुष्यंत कुमार के बारे में अन्य विद्वानों के विचार



कमलेश्वर



दुष्यंत कुमार ने विस्फोटक ग़ज़लें लिखकर हिंदी कविता का रचनात्मक मिज़ाज और मौसम ही बदल दिया। हालांकि इसे हमारे बौद्धिकताग्रस्त रचनावादी-छद्म कलावादी और साहित्य के स्वर्ण कवि अभी खुलेआम स्वीकार करने की मुद्रा में नहीं हैं, पर वे जानते हैं कि उनके पैर तले की ज़मीन खिसक चुकी है। हमेशा से हिंदी साहित्य का सवर्ण अभिजात्य साहित्य के अनुशीलन और इतिहास पर गुंजलक मारकर बैठा रहा है। इसने लोक-स्वीकृति को हल्का बनाने के लिए उसी के वज़न पर एक शब्द-गढ़ा है-लोकप्रियता और इसे हेय माना गया है। यह रवैया उन्हीं अभिजात्य-वर्गीय साहित्यकारों का है जो साहित्य के सवालों पर बड़ी रेशमी बहसें करते हैं लेकिन अपने समय के सवालों का सामना नहीं कर पाते। ये लोग अपने ड्राइंगरूमों या मुर्दा सभागारों में 'रचना का लोकतंत्र' स्थापित करते रहते हैं और ज़रूरत पड़ी तो बहुत सोच-समझकर, आगा-पीछा देखकर सार्वजनिक सवालों पर जारी किए जाने वाले जनहितवादी बयानों पर अपना नाम देने की अनुमति भी दे देते हैं लेकिन शब्द-सृष्टि के यह वे उपजीव हैं, जो अपने संकुल समय की स्मृति की स्वीकृति न पाने के बावजूद 'साहित्य के लिए' किताबों से किताबों में जीवित बने रहने के गैर-साहित्यिक उपक्रम करते रहते हैं।



विजय बहादुर सिंह



जब वे पढ़ते थे, तब कक्षा में और कक्षा के बाहर की कक्षाओं में भी। लिखना शुरू किया, तो लेखन की सधी-बदी राहों, चैहदियों, फ़ैशनों और काव्य-मुहावरों की भीड़ में भी। न तो वे कभी डरे, न सहमे। न झुके, न टूटे। दोस्तों के बीच, कभी-कभी दुश्मनों और दुश्मनों के दोस्तों के साथ भी, यारों के यार की तरह उठते-बैठते। उनकी दोस्ती अगर किसी बात से थी, तो इसी आज़ादी से थी और इसके लिए जिस पुरुषार्थ की ज़रूरत उन्हें थी, वह उनके स्वभाव और संस्कारों में जन्मना मौजूद था।



राजेश कुमार व्यास



हिंदी ग़ज़ल में दुष्यंत ने सर्वथा नया मुहावरा गढ़ा। इस नये मुहावरे में मनुष्य की जिजीविषा के साथ उसकी वेदना और टूटन को गहराई से महसूस किया जा सकता है। ख़ास बात यह भी कि जीवन के मर्म को समझाती उसकी ग़ज़लों में व्यक्ति और जीवन की बारीक़ पड़ताल है, उसके ख़तरे हैं, जो कुछ घटित हो रहा है, उस पर करारी चोट है और वह विशाल दृष्टिसंपन्नता भी, जिसमें सबकुछ अनुकूल न होते हुए भी भविष्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण छिपा है। ग़ज़ल की परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ती दुष्यंत की ग़ज़लों में जीवनानुभवों की इतनी विविधता है कि उससे दौर और दायरों की पहचान स्वतः ही होती है।



धर्मवीर भारती 



सुविधाओं और पद-प्रतिष्ठा से लैस चंद आलोचक एक झूठा मुखौटा लगा कर एक बने-बनाए पूर्वग्रह के साथ जो एक नक़ली विद्रोही साहित्य-चिंतन और उससे उद्भूत तीसरे दर्जे का घटिया काव्यजाल पाठकों पर थोप रहे थे, उस कृत्रिम काव्य-संसार में एक प्रामाणिक दर्द भरी आवाज़ थी इन ग़ज़लों की, जो बिना किसी आलोचक की शब्दाडंबरी वकालत के पाठक को व्यापक स्तर पर छू गई। एक सच्ची और तीख़ी अकेली छूटी हुई रचना, झूठे शब्दजाल के विराट काव्याडंबर को कैसे पल भर में नक़ली और जाली साबित कर अपने को प्रतिष्ठित कर लेती है, इसका प्रमाण दुष्यंत की ग़ज़लें हैं।



सर्वेश्वर दयाल सक्सेना



दुष्यंत बड़ा मायावी था। बहुत कम लोग होते हैं, जो इतनी खुली ज़िन्दगी जीते हों और फिर भी मायावी कहाते हों। स्वस्थ, सुन्दर, दिलफेंक, ज़िंदादिल आदमी था वह। उसके दोस्त भी बहुत थे और दुश्मन भी। इस फ़ेहरिस्त को बढ़ाते जाना ही उसकी ज़िन्दगी थी। यदि किसी लड़की के पीछे किसी ग़ैर मोहल्ले में उसका क़त्ल किये जाने की ख़बर आती या किसी शराबख़ाने में ज़हरीली शराब पी जाने से मरने की, तो किसी को उतना अचरज नहीं होता, लेकिन दिल के दौरे से उसका मरना बहुत बड़ा मज़ाक लगता है। उसे न तो दिल का कोई रोग था, न ही कभी कोई इस तरह की शिकायत थी। परेशानियों में अपने को फँसाना फिर बहुत सफ़ाई से उनसे निकल जाना, दिल में कोई मलाल न रखना, न कोई बोझ ढोना, अपने दोस्तों में वह सबसे ज़्यादा जानता था। वह बीमार आदमी नहीं था। न तन से, न मन से, न आदत से। वह बेहद हँसमुख था। अलमस्त, बेफ़िक्र, तनाव को गर्द की तरह झाड़ देना वह जानता था। उसे बहुत जल्दी ख़ुश किया जा सकता था।
उसकी हवस दुनियादारी की हवस थी। वह सब कुछ पा लेना चाहता था। कभी बच्चों की तरह मचल कर, कभी जूझ कर, कभी हिसाब-किताब भिड़ाने के ख़्वाब देखकर। जब उसका चाहा नहीं हो पाता, तो वह उदास होता, गालियाँ देता और अपने रास्ते के रोड़ों को नेस्तनाबूद करने के लिए ज़मीन और आसमान के कुलाबे मिलाता देखा जाता। पर, दुनिया उसके हिसाब से नहीं चलती थी और वह भी बहुत चाह कर भी दुनिया के हिसाब से नहीं चल पाता था और जितना नहीं चल पाता था, उसी की ताक़त से वह लिखता था।



निदा फ़ाज़ली



दुष्यंत नाम के दर्शन पहली बार महान नाटककार कालिदास की नाट्य रचना 'शाकुंतलम्' में होते हैं। उसमें यह नाम एक राजा का था, जो शकुंतला को अपने प्रेम की निशानी के रूप में एक अंगूठी देकर चला जाता है। और शकुंतला की जीवन यात्रा इसी अंगूठी के खोने और पाने के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। राजा दुष्यंत के सदियों बाद बिजनौर की धरती ने एक और दुष्यंत कुमार को जन्म दिया।
इस बार वह राजा नहीं थे। त्यागी थे। दुष्यंत कुमार त्यागी। इस दुष्यंत कुमार त्यागी के पास न राजा का अधिकार था, न अंगूठी का उपहार और न ही पहली नज़र में होने वाला प्यार था। 20 वीं सदी के दुष्यंत को कालिदास के युग की विरासत में से बहुत कुछ त्यागना पड़ा। इस नए जन्म में वह आम आदमी थे। आम आदमी का समाज उनका समाज था। आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना उनका रिवाज़ था। आम आदमी की तरह उनकी मंज़िल भी सड़क, पानी और अनाज था।
दुष्यंत साहित्य में बहुत कुछ कर के और जीवन की बड़ी धूप-छाँव से गुज़र के ग़ज़ल विधा की ओर आए थे। दुष्यंत जिस समय ग़ज़ल संसार में दाखिल हुए उस समय भोपाल प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली और क़ैफ भोपाली की ग़ज़लों से जगमगा रहा था। इनके साथ हिंदी में जो आम आदमी अज्ञेय के ड्राइंगरूम से और मुक्तिबोध की काव्यभाषा से बाहर कर दिया गया था। बड़ी ख़ामोशी से नागार्जुन और धूमिल की 'संसद से सड़क तक' की कविताओं में मुस्कुरा रहा था। इसी ज़माने में फ़िल्मों में एक नए नाराज़ हीरो का आम आदमी के रूप में उदय हो रहा था।
दुष्यंत की ग़ज़ल के इर्द-गिर्द के समाज को जिन आँखों से देखा और दिखाया जा रहा था वह वही आदमी था जो पहले कबीर, नज़ीर और तुकाराम के यहाँ नज़र आया था, जिसने नागार्जुन और धूमिल के शब्दों को धारदार बनाया था। उसी ने दुष्यंत की ग़ज़ल को चमकाया था।
दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़्ाुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़्ाुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मों के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमाइंदगी करती है। विषय की तब्दीली के कारण, उनकी ग़ज़ल के क्राफ्ट में भी तब्दीली नज़र आती, जो कहीं-कही लाउड भी महसूस होती है। लेकिन इस तब्दीली ने उनके ग़ज़ल को नए मिज़ाज के क़रीब भी किया है।
दुष्यंत ने हिंदी साहित्य में जो काम किया है उसका उचित मूल्यांकन नहीं हो पाया है। दुष्यंत और उनके साहित्य पर अभी और शोध की आवश्यक्ता है।



संदर्भ ग्रंथ
1. एक कंठ विषपायी - दुष्यंत कुमार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
2. यारों के यार-दुष्यंत कुमार -सं. विजयबहादुर सिंह
3. वर्तमान साहित्य ;मासिक पत्रिकाद्ध अलिगढ़, दिसंबर 2008 ़ 
4. विहान -सं. दुष्यंत कुमार, कमलेश्वर, मार्कंडेय, मार्च-अप्रैल: अंक-1, 1953, इलाहाबाद 
5. जलते हुए वन का वसन्त, दुष्यंत कुमार, वाणी प्रकाशन दिल्ली
6. साए में धूप, दुष्यंत कुमार, राधकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
7. वर्धमान, बिजनौर अंक, वर्धमान महाविद्यालय बिजनौर1998-99
8. सूर्य का स्वागत- दुष्यंत कुमार
9. आवाज़ों के घेरे - दुष्यंत कुमार, राजकमल प्रकाशन


दुष्यंत जैसा कौन होगा


                          
सत्यकुमार त्यागी


जीवन में बहुत लोग मिलते हैं बातें होती हैं। सामाजिक होने की सूरत में दायरा अधिक बड़ा होता है। इस जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो मानस पटल पर अंकित हो जाती हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। 
मेरा दुष्यंत से काफ़ी मिलना जुलना था। वो थे ही ऐसे इंसान कि रास्ते चलते आदमी से दोस्ती कर लें। जब भी भोपाल से अपने गाँव राजपुर नवादा आते, तुरंत मेरे लिए बुलावा भेज देते। घंटों सफ़र की कहानी सुनाते रहते, मैं शांत बैठा हाँ हूँ करता रहता। उनके पास पुरानी कार थी।  भोपाल से राजपुर नवादा के सफ़र में जितने भी छोटे बड़े शहर के कार मैकेनिक थे, उस कार ने उनसे दुष्यंत की पक्की दोस्ती करा दी थी। वो उनसे कार ही ठीक नहीं कराते बल्कि उनके घर भी जाते और खाना या चाय पीकर अपना सफ़र आगे बढ़ाते। 
एक बार जब दुष्यंत अपने पिता जी की मृत्यु के पश्चात् गंगा स्नान पर दीपदान करने आए शाम का समय था उनका नौकर मेरे घर आया और फ़रमान सुनाया बाबू जी ने आपको बुलाया है। मुझे ज़रूरी काम से कहीं जाना था परंतु दुष्यंत बुलाए और मैं इंकार कर दूँ ऐसा पहले भी कभी नहीं हुआ था। मैंने काम बाद में निपटाने का मन बनाया और दुष्यंत से मिलने उनके घर पहुँच गया। उस दिन उन्होंने वो गर्म जोशी नहीं दिखाई जिससे वो हर बार मिला करते थे। बल्कि उनके छोटे भाई मुन्नु जी बड़े अदब से मिले और नौकर को पानी लाने को कहा। मेरा माथा ठनका सो मैंने दुष्यंत से पूछा स्वास्थ्य तो ठीक है? दुष्यंत ने हाँ में सिर हिलाया और बोले ''पापा के बाद ज़िम्मेदारी बढ़ गई है। ...माँ जी को देखो सफ़ेद साड़ी में कैसी लग रही हैं। ज़मींदारनी की दशा देखी नहीं जाती आज माँ जी ने कुछ डायरी दी जिनमें हिसाब-किताब लिखा है। आप तो जानते ही हो पापा पैसे का लेन-देन करते थे और सबसे ज़्यादा एक हज़ार रुपए तुम्हारे नाम लिखे हैं?'
मैंने कहा-'हां मैंने अपनी बहन की शादी में लिए थे तुम तो आए ही थे शादी में।'' 
दुष्यंत जी बोले- 'वो तो ठीक है बड़ी रक़म है और कुछ प्रमाण भी नहीं है। इक़रारनामा लिख देते तोकृ...मुझे कुछ यक़ीन हो जाता।'
उनकी यह बात सुनकर मेरा शरीर पसीने-पसीने हो गया था। मैं चारपाई से खड़ा हो गया, सैकड़ों प्रश्न मेरे मन मैं तैरने लगे। जिसकी एक आवाज़ पर मैं हमेशा अपने काम छोड़कर हाज़िर हो जाता हूँ, न जाने कितने ही कामों और विवादों में मैंने साथ दिया है, वो कैसी बातें कर रहा है? ख़ैर मैं बेईमान नहीं था। वक़्त ज़रूरत पर कोई किसी के भी काम आ सकता है। मैंने जवाब दिया ''आप काग़ज़़ तैयार रखना मैं कल सुबह आऊँगा और हस्ताक्षर कर दूँगा।'' कहकर मैं चल दिया।
दुष्यंत ने उस दिन मुझे बैठने को नहीं कहा। उस दिन मुझे अपने घर का रास्ता लंबा नज़र आ रहा था। हज़ारों प्रश्न मेरे सामने खड़े थे और मांगी गई यह मदद अब मुझे कचैट रही थी। मैं मन ही मन बड़बड़ा रहा था- 'ज़मींदारी की ठसक है, आदमी की पहचान नहीं। हम कोई गुलाम हैं क्या? इसके बात करने का सलीक़ा देखो बनते हैं बड़े।' 
मेरा चेहरा उतरा हुआ था रात को ठीक से सो नहीं सका सुबह जल्दी नहा-धोकर दुष्यंत की बैठक पर पहुँच गया नौकर ने मेरे आने की ख़बर दुष्यंत को दी। दुष्यंत हाथ में स्टांप और पैन लेकर घर से बाहर आए और बोले चलो आनंदस्वरूप लाला के यहाँ वो ही लिखेंगे। मुझे फ़रमान सुना दिया गया। हम दोनों लाला जी की बैठक पर पहुँचे लाला जी स्वागत में खड़े हुए, चारपाई सही करते हुए बैठने को कहा। दुष्यंत ने बैठते हुए स्टांप उन्हें सौंप दिया। तभी लाला जी ने अपने बेटे से तीन चाय के लिए कहा। मेरे मन में ग़्ाुस्से का ग़्ाुबार था जिसके लिए न जाने कितनी बार मैंने रातें कुरबान कीं सैकड़ों बार इस आदमी के काम आया आज मेरे साथ कैसा व्यवहार कर रहा है? आज समझ में आया जब लोहा लोहे पर वार करता है तो आवाज़ तेज़ क्यों होती है। जिसे हम अपना समझते रहे वो इतनाकृ... मेरी आँंखें भीग जाना चाहती थीं मगर मैंने हिम्मत करके लाला से कहा आज मुझे कुछ ज़्यादा ही जल्दी है लाओ कहाँ हस्ताक्षर करने हैं मैं कर देता हूँ। और मैंने लगभग काग़ज़़ छीन कर अपने हाथ में लिए, पैन दुष्यंत की जेब से निकाला, लाला जी ने काग़ज़़ पर नीचे की तरफ़ अंगुली से इशारा किया तो मैंने हस्ताक्षर कर दिए और वहाँ से निकल गया। उस दिन दुष्यंत ने मुझे न रोका न टोका लाला जी ने कई बार रोकने का प्रयास किया लेकिन मैंने रुकना ठीक नहीं समझा। मुझे याद है शनिवार का दिन था। कैसे शाम ढली? मैं कभी इधर कभी उधर निराश हताश चक्कर काटता रहा। ग़म हस्ताक्षर का नहीं था, ग़म तो विश्वास का था। बाबू जी ने तो विश्वास पर पैसे दिए, ये तो दोस्त है अरे बड़े लोग होते ही ऐसे हैं। शाम को मैं अपनी बैठक पर चारपाई पर बैठा था, तभी दुष्यंत का नौकर आया और बोला बाबू 'जी ने आपको बुलाया है।' 
मेरा चेहरा ग़्ाुस्से से तमतमा गया। मैंने ज़ोर से कहा- 'मैं नौकर नही हूँ तेरे बाबू जी का, जा कह देना मैं नहीं आता।' 
नौकर बोला- 'बाबू जी ने कहा है ज़रूरत पड़े तो पैर पकड़कर ले आना लेकिन साथ लेकर ही आना।' 
मेरा गुस्सा मानो काफूर हो गया। मेरे मन में अच्छे ख़याल आने लगे। -'अरे वो है ही ऐसा, मेरी परीक्षा ले रहा होगा। चल मैं तेरे साथ चलता हूँ।' 
रास्ते में मैं नौकर से पूछता रहा मेरा क्या ज़िक्र हो रहा था? नौकर ने कहा कि-'मेरे सामने कोई बात नहीं हुई मैं तो घर के काम में लगा था।'
हम दुष्यंत जी की बैठक पर पहुँच कर बैठ गए कुछ देर बाद तीन गिलास पानी आया। मैं चैक गया। मैं अकेला और तीन गिलास पानी? दुष्यंत ज़मींदारी के गुरूर के साथ अपनी सफ़ेद लुंगी ठीक करते हुए बैठक पर आए और नौकर से कहा- 'वैद्य जी को बुलाकर लाओ।' 
वैद्य जी उनके पड़ोसी थे। उनका नाम ओमप्रकाश वैद्यक करने के कारण उन्हें सब वैद्य जी ही कहते थे। 
तुरंत वैद्य जी भी आ गए हम तीनों बैठ गए घर आदि की बातें हुईं दुष्यंत  ने अपना सिगार जलाया। मैंने बीड़ी जलाई और बातें शुरू हुईं। दुष्यंत  बोले 'बताओ वैद्य जी कितने पैसे दोगे इस काग़ज़ के?' 
सुनकर मैं चैंक गया। वही स्टांप था जिस पर मैंने हस्ताक्षर किए थे। वैद्य जी ने 4000 से बोली लगानी शुरू की और 20000 पर सौदा मेरे सामने हो गया। मेरा बदन पसीने से तर हो गया, आँखों के आगे तारे नृत्य करने लगे। 
दुष्यंत ने वैद्य जी से कहा-'जाओ पेशगी ले आओ।' 
वैद्य जी घर जाने के लिए चारपाई से उठे साथ ही मैं भी उठने लगा दुष्यंत ने मेरा हाथ पकड़ कर बैठाया, बोले-'बीड़ी जलाओ।' कहते हुए दुष्यंत ने बताया-'जानता है तूने क्या किया कोरे स्टांप पर हस्ताक्षर, और मैंने तेरी सारी ज़मीन का इक़रारनामा करा लिया अब तू ज़मीन से बेदख़ल, एक हज़ार की जगह दो लाख रुपए लिख दिए और वैद्य जी को दिखा दिया स्टांप वैद्य जी सुबह से मेरे पीछे हैं।'
सुनकर मुझे हंसी आ गई, साथ ही अपनी सोच पर गुस्सा भी। तभी दुष्यंत ने मुस्कुराते हुए कहा- 'ले इससे जला।' और स्टांप के एक कोने को जलाकर मेरे सामने कर दिया।  
तभी वैद्य जी पेशगी के 1000 रुपए लेकर आए और दुष्यंत को देने लगे दुष्यंत ने मेरी ओर इशारा करके कहा 'चालाक है, ये दुष्यंत का साथी है मेरे हाथ से छीनकर जला दिया स्टांप ये देखो राख।' वैद्य जी पर तो मानो वज्रपात हो गया हो। उनकी तो जैसे दुनिया ही लुट गई, दो लाख का माल बीस हज़ार में मिल रहा था, भारी नुकसान हो गया उनका। अब वो मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे मैं कोई खानदानी दुश्मन था उनका।
मैंने शर्म से सिर झुका लिया तो दुष्यंत ने वैद्य जी को सुनाते हुए कहा-'अब सर झुकाता है, सर उठा और गले मिल और वादा कर आज के बाद ज़मीन का कोई सौदा नहीं करेगा। ये ज़मीन पुरखों ने हमें दी है। हम अपने बच्चों को सौंप देंगे।'
आज जब मैं दुष्यंत से किए वादे के अनुसार अपनी ज़मीन की वसीयत अपने पौत्रों अनिरूद्ध 'नमन', निश्चल और स्वर्णिम के नाम करने का मन बना रहा हूँ तो बहुत याद आ रही है दुष्यंत की। 
मुझे खुशी है कि अब अमन और आलोक के सकारात्मक प्रयास से दुष्यंत स्मृति द्वार बन रहा है परंतु असली खुशी तो उस दिन होगी जब उनके खंडहर हो चुके मकान में रौनक़ आएगी।
;लेख श्री सत्यकुमार त्यागी जी से की गई वार्ता पर आधारित, श्री सत्यकुमार जी दुष्यंत के बाल सखा एवं मृत्युर्पंयत अभिन्न मित्र रहे हैं।द्ध


भारतीय उच्च शिक्षा में मूल्य एवं गुणवत्ता



डाॅ0 नरेन्द्र पाल सिंह 


उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हमारे देश में पर्याप्त विकास एवं विस्तार हुआ है, उच्च शिक्षा की प्रगति का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि यह वृद्धि संख्यात्मक रूप से उल्लेखनीय है किन्तु गुणात्मक रूप से तो इसमें कमी आयी है। देश में प्रदान की जा रही शिक्षा को उसके भविष्य के रूप में देखा जाता है, क्योंकि हम जैसी शिक्षा अपनी वर्तमान पीढ़ी को देंगे वैसा ही उसका भविष्य भी होगा। वर्तमान उच्च शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन सही रूप से न हो पाने के कारण, उच्च शिक्षा की कमजोरियों के लिये आर्थिक मजबूरियों को दोषी माना जाता है। उच्च शिक्षा के लिये संसाधनों की उतनी कमी नहीं है जितनी कि अच्छे प्रबन्धन की है। महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों पर सरकार अथवा इनका प्रबन्धन चाहे जितना खर्च कर ले तब तक सुधार सम्भव नहीं है जब तक कि इनके अच्छे प्रबन्धन पर जोर नहीं दिया जाता। उच्च शिक्षा का उद्देश्य, प्रशासन, उद्योग, वाणिज्यिक व्यवसाय व ज्ञान-विज्ञान में अधिकतम नेतृत्व करना तथा राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना उत्पन्न कर, जीवन को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करना है, अर्थात् यदि किसी राष्ट्र द्वारा मानवीय संसाधनों के त्वरित विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता तो वह राष्ट्र अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी समुचित विकास नहीं कर पाता। मानवीय संसाधनों के ज्ञान, कुशलता, क्षमता और दक्षता में वृद्धि उच्च शिक्षा द्वारा ही सम्भव होती है, परन्तु दुःखद बात यह है कि आज भवन तथा भौतिक संरचना को अधिक महत्वपूर्ण समझा जा रहा है और सभी समस्याओं के हल में धन को देखा जाता है। विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में प्रवेश की समस्याओं को देखकर लोगों ने जगह-जगह स्ववित्तपोषित नये-नये काॅलेज खोले हैं किन्तु जब उनमें भी प्रवेश की समस्या हल नहीं हो पाती तो पत्राचार के माध्यम से डिग्रियां थोक में प्रदान की जाती हैं और सभी नियमों का उल्लंघन कर उनको ताक पर रख दिया जाता है। ये ऐसे काॅलेज एवं संस्थान न तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं और न ही इनके पास पर्याप्त भवन एवं संसाधन होते हैं।



हमारे देश में उच्च शिक्षा व्यवस्था की शुरूआत सन् 1818 में अंग्रेजी शासन द्वारा की गयी। सन् 1857 में तीन केन्द्रीय विश्वविद्यालय कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में खोले गये, जिनका उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा अपने लोगों को शिक्षित करना था किन्तु आजादी के समय तक उच्च शिक्षा में प्रगति बहुत धीमी रही और 90 साल में मात्र 18 विश्वविद्यालय ही देश में खोले गये। स्वतन्त्रता के बाद निजीकरण एवं उदारीकरण का दौर आया और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उत्तरोत्तर वृद्धि होती चली गयी। संस्थागत रूप से अध्ययन करने वाले छात्रों का प्रतिशत 88 है जबकि दूरस्थ शिक्षा के क्षेत्र में 12 प्रतिशत छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। कुल छात्र संख्या का 86 प्रतिशत स्नातक स्तर पर, 12 प्रतिशत परास्नातक, 1 प्रतिशत छात्र शोध व पी.एच.डी. एवं 1 प्रतिशत डिप्लोमा अथवा सर्टीफिकेट स्तर पर अध्ययनरत हैं। उच्च शिक्षा में आज लगभग 20 मिलियन छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जिसमें 37 प्रतिशत कला संकाय में, 19 प्रतिशत विज्ञान संकाय में, 18 प्रतिशत वाणिज्य एवं प्रबन्धन में तथा 16 प्रतिशत छात्र इंजीनियरिंग एवं टेक्नोलोजी में, बाकी शिक्षा, चिकित्सा विज्ञान, विधि, कृषि, पशुचिकित्सा विज्ञान में लगभग 11 प्रतिशत छात्र शिक्षा पा रहे हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में समस्त विद्यार्थियों में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार कुल साक्षरता दर 73.0 प्रतिशत थी, जिसमें लड़कों का 80.9 प्रतिशत एवं लड़कियों का 64.6 प्रतिशत है। इसका अर्थ है कि छात्राओं में शिक्षा के प्रति जाग्रति बढ़ी है, जो कि हमारे देश के विकास के लिये अच्छा संकेत है। आज हमारे देश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले लोगों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है किन्तु उनको देश में समुचित रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। 



आज उच्च शिक्षा के लिये, सरकार एवं सभी संस्थान, आम छात्रों के लिये उसकी अधिगम्यता एवं सभी के लिये समानता लाने में प्रयासरत है। पहले गरीब एवं ग्रामीण छात्र की पहुँच उच्च शिक्षा तक नहीं हो पाती थी किन्तु आज प्रवेश के लिये प्रतियोगिता के माध्यम से सभी छात्रों को समानता का अवसर प्रदान किया जा रहा है। प्रतिभाशाली एवं गरीब छात्रों को उच्च शिक्षा एवं शोध कार्य हेतु छात्रवृत्तियां प्रदान की जा रही हैं, साथ ही विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में इन छात्रों को शिक्षण हेतु पुस्तकालयों से पुस्तकें भी उपलब्ध करायी जा रही हैं। महंगाई एवं उच्च शिक्षा पर व्यय को देखते हुए सरकारी संस्थानों में शिक्षण शुल्क भी नगण्य है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सभी को समानता का अवसर प्रदान करने के लिये आरक्षण व्यवस्था को भी निरन्तर अपनाया जा रहा है। वर्तमान में सरकार का उद्देश्य एवं लक्ष्य समान शैक्षणिक प्रतिमान निर्धारित कर, सभी को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराना है तथा सभी स्तरों पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा शिक्षा के स्तर में समानता लाने हेतु स्नातक, स्नातकोत्तर एवं तकनीकी शिक्षा हेतु एक समान पाठ्यक्रम एवं सेमेस्टर सिस्टम को भी लागू किया गया है। सरकार द्वारा सभी विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों को उनकी ग्रेडिंग के अनुसार अनुदान देने हेतु नेक संस्था द्वारा उनका मूल्यांकन कराया जा रहा है। सभी विश्वविद्यालयों को अपने शैक्षणिक सत्र को नियमित करने हेतु निर्देशित किया गया है और अधिकांश विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक सत्र अब नियमित भी हो गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी शिक्षा के स्तर एवं गुणवत्ता में सुधार, उच्च शिक्षा सुविधाओं में सामाजिक विषमता, भारी क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करना, पाठ्यक्रमों को अधिक उपयोगी समान और सार्थक बनाने के लिये नये सिरे से तैयार करना आदि को अपने उद्देश्य में शामिल किया है। भारत सरकार ने शिक्षा का मौलिक अधिकार घोषित करके सही दिशा में कदम उठाया है।



उच्च शिक्षा में गुणवत्ता का स्तर



उच्च शिक्षा में गुणवत्ता के स्तर पर यदि दृष्टि डाले तो प्राइवेट एवं स्ववित्तपोषित काॅलेजों द्वारा दी जा रही शिक्षा में गुणवत्ता पर कोई विशेष ध्यान नहीं रखा गया है और उनका उद्देश्य व्यवसायिकता पर आधारित हो गया है, क्योंकि जिस गति से जनसंख्या बढ़ी है, छात्र संख्या भी उसी अनुपात में निरन्तर बढ़ रही है। निजी एवं स्ववित्तपोषित काॅलेज अच्छे भवन एवं आधुनिक सुविधाओं के नाम पर अच्छी फीस रखकर अपने स्तर को ऊँचा बनाने का प्रयास करते हैं जबकि अति आवश्यक फैकल्टी के नाम पर योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जाती है। यदि सरकारी काॅलेजों को देखा जाय तो उसमें भी आधे से अधिक पद स्थायी शिक्षकों के भर्ती न हो पाने के कारण रिक्त पड़े हुए हैं। इंजीनियरिंग और मेडिकल काॅलेजों तक में भी योग्य शिक्षकों का अभाव होने से शिक्षा की गुणवत्ता एवं स्तर में निरन्तर गिरावट आ रही है। आज लगभग 90 प्रतिशत इंजीनियरिंग काॅलेज पूर्णतः निजी क्षेत्र में खोले गये हैं जबकि 1960 में इनका प्रतिशत मात्र 15 था। इसका सीधा अर्थ है कि सरकार उच्च शिक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी बखूबी नहीं निभा रही है, अधिकांश महाविद्यालयों में आधारभूत सुविधायें, पुस्तकालय, मानक के अनुरूप भवन, खेल मैदान, कम्प्यूटर लैब, शोध सुविधाओं हेतु प्रयोगशाला तथा विभागीय कक्ष आदि उपलब्ध नहीं हैं। सरकारी काॅलेजों में भी स्ववित्तपोषण योजना के अन्तर्गत विभिन्न कक्षाओं में प्रवेश कर उन छात्रों को नियमित छात्रों की अनुपस्थिति एवं स्टाफ की कमी के कारण उन्हें भी साथ ही कक्षाओं में बैठाते हैं और उनके लिये अलग से स्टाफ नियुक्त नहीं किया जाता है। अतः उसको आय के स्रोत के रूप में अपनाकर चलते हैं जबकि ऐसी शिक्षा गुणवत्ताविहीन हो जाती है। राजकीय एवं अशासकीय महाविद्यालयों में आज ऐसी स्थिति बन चुकी है कि गैर शिक्षक कर्मचारियों के अभाव में कार्यालय कार्य भी शिक्षकों द्वारा ही किया जाता है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है और उसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है। महाविद्यालय स्तर पर शिक्षकों को एक नियमित समय के लिये काॅलेज में रुकना अनिवार्य तो कर दिया गया है जबकि आधारभूत सुविधाओं के अभाव में उनकी गुणवत्ता एवं कार्यक्षमता गिर जाती है, क्योंकि शिक्षकों के लिये बैठने का उचित स्थान एवं विभाग अधिकांश महाविद्यालयों में उपलब्ध नहीं हैं और वह अतिरिक्त समय में अनर्गल राजनीति करते हैं। स्नातक स्तर पर महाविद्यालयों में कुल छात्रों का 90 प्रतिशत का दबाव बना हुआ है जबकि स्नातकोत्तर स्तर पर भी दो तिहाई छात्र महाविद्यालयों में ही शिक्षा ग्रहण करते हैं। अतः छात्रों का संख्यात्मक दबाव बढ़ने से उनकी गुणवत्ता को बनाए रखना सम्भव नहीं हो पाता है। उच्च शिक्षा में गुणवत्ता को प्रमुख रूप से निम्न बातें प्रभावित कर रही हैं।



- अधिकांश विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में आज भी शिक्षण शुल्क बहुत ही कम रखा गया है और उसकी भी प्रतिपूर्ति सरकार द्वारा कर दी जाती है। अतः छात्र कक्षाओं में उपस्थिति के प्रति लापरवाही बरतते हैं और फेल होने पर पुनः प्रवेश अथवा परीक्षा सुधार परीक्षाओं में शामिल हो जाते हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा के स्तर में गिरावट आ जाती है।
- संबद्ध महाविद्यालयों की तुलना में विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों की संख्या बहुत कम होती है जबकि मानकों के अनुरूप परिव्यय अधिक मात्रा में किया जाता है किन्तु छात्रों का अधिकांश दबाव तो सम्बद्ध महाविद्यालयों में ही रहता है, जिसका परिणाम यह होता है कि उनको पर्याप्त व्ययों एवं मानकों के अभाव में गुणात्मक शिक्षा नहीं मिल पाती।
- उच्च शिक्षा केवल उन्हीं छात्रों को प्रदान की जाय जो उसमें रूचि रखते हों अथवा उनके लिये आवश्यक हो और वे पर्याप्त रूप से सक्षम भी हों, यदि उच्च शिक्षा का लक्ष्य भी सभी के लिये निर्धारित किया जायेगा तो निश्चित रूप से इसकी गुणवत्ता में गिरावट आ जायेगी।
- उच्च शिक्षा में प्रवेश ले रहे छात्रों की संख्या में जिस अनुपात में वृद्धि हो रही है, उस अनुपात में शिक्षकों के नये पदों का सृजन नहीं हो रहा है। छात्रों की संख्या में वृद्धि औसतन पांच प्रतिशत है जबकि शिक्षकों में वृद्धि की दर 3.35 प्रतिशत है और यह अन्तर लगातार बढ़ता ही जा रहा है, जो शिक्षा की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करता है।
- उच्च शिक्षा के अन्तर्गत विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के प्राध्यापकों को पूर्ण सुविधायें मुहैया नहीं करायी जाती है, जिससे वह अपने शिक्षण कार्य की जिम्मेदारी से बचकर अन्य कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं और शिक्षण कार्य प्रभावित होता है।
- विश्वविद्यालयों में खाली पदों पर नियुक्ति विश्वविद्यालय स्वयं करता है। अतः शैक्षणिक पद प्रायः अधिक समय तक खाली नहीं रहते जबकि उनसे सम्बद्ध महाविद्यालयों में प्राध्यापकों की नियुक्ति का अधिकार प्रदेश के उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग को होता है, जो रिक्त पदों पर कई-कई वर्षों तक नियुक्ति नहीं कर पाता हैं और अधिकांश मामले न्यायालय में लम्बित हो जाते हैं। राजकीय महाविद्यालयों में तो एक प्राध्यापक को दो अथवा तीन काॅलेजों से भी सम्बद्ध कर दिया जाता है। प्रदेश के उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग अधिकांशतः राजनीति के शिकार हो जाते हैं क्योंकि उसमें अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राजनैतिक आधार पर की जाती है और जब भी राज्य सरकारें बदलती हैं तभी उनके कार्य में बाधा उत्पन्न कर दी जाती है, जिसका उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- उच्च शिक्षा व्यवस्था में सरकार द्वारा मानदेय अथवा अस्थायी रूप से नियुक्ति की व्यवस्था एक सत्र के लिये की जाती है, ताकि सरकार पर अधिक व्यय का भार न पड़े। इन नियुक्तियों के अन्तर्गत भी अधिकांश महाविद्यालयों के प्रबन्धतन्त्र अपनी मर्जी से अच्छे एवं योग्य उम्मीदवारों को संस्तुत न करके अपने चहेतों को नियुक्त करा लेते हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- सम्बद्ध महाविद्यालयों में जहाँ पर स्थायी पद रिक्त हैं, प्रबन्धतन्त्र द्वारा नितान्त अस्थायी व्यवस्था के अन्तर्गत काम चलाने हेतु बहुत ही कम वेतन पर बेरोजगार शिक्षक चार से छः माह के लिए नियुक्त कर लिये जाते हैं, जो शिक्षक की न्यूनतम योग्यता भी पूरी नहीं करते और फिर हम शिक्षक की गुणवत्ता पर विचार करे तो निरर्थक है।
- विश्वविद्यालय एवं उनसे सम्बद्ध महाविद्यालयों में प्राध्यापकों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जैसे निर्धारित समय पर अगले वेतनमान में प्रोन्नति न मिलना, असमान वेतनमान होना, सम्बद्ध महाविद्यालयों में प्रोफेसर पद का सजृन न करना, मूलभूत सुविधायें उपलब्ध न होना, चयन वेतनमानों की प्रक्रिया अत्यन्त जटिल होना, प्राइवेट काॅलेजों में प्रबन्धतन्त्र द्वारा मनमानी करना एवं प्राध्यापकों का शोषण करना और सेवा-शर्तों का असुरक्षित होना आदि। साथ ही यदि कोई प्राध्यापक अच्छा कार्य पूर्ण निष्ठा एवं लगन के साथ करता है, तो भी उसको पुरस्कार स्वरूप कोई पदोन्नति अथवा कोई पदक प्रदान नहीं किया जाता है।
- उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बनाये रखने के लिये प्राध्यापकों को अपने ज्ञान का स्तर अद्यतन रखना चाहिये जिसके लिये समय-समय पर प्रशिक्षण हेतु विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा एकेडमिक स्टाफ काॅलिज के माध्यम से ओरियन्टेशन, रिफ्रेशर कोर्स की व्यवस्था की गई है, जिसके लिये प्राध्यापक स्वेच्छा से इन कोर्स में हिस्सा नहीं लेते, बल्कि मजबूरी में अगला वेतनमान पाने हेतु इसमें भाग लिया जाता है। अतः इसे कड़ाई से लागू किया जाना चाहिये अन्यथा शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा।
- उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिये विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में जहाँ-जहाँ शोध की सुविधायें हैं और स्तरीय कार्य नहीं हो पा रहे हैं, ऐसे दोहरे निम्नस्तरीय शोध कार्य पर अनिवार्यतः प्रतिबन्ध होना चाहिये।
- उच्च शिक्षा की गुणवत्ता छात्रों द्वारा की जा रही अनुशासनहीनता से भी प्रभावित हो रही है क्योंकि अधिकांश छात्र राजनीति की चपेट में आकर हिंसक अथवा अहिंसक आन्दोलन का रास्ता अपनाते हैं, परिणामस्वरूप विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों की करोड़ो रुपये की सम्पत्ति का नुकसान हो जाता है, जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
- महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर प्राचार्य, कुलपति अथवा विभागाध्यक्ष द्वारा कार्य में पारदर्शिता नहीं बरती जाती और दबाव में गलत निर्णय चाहे वे प्रवेश से सम्बन्धित हों या परीक्षा अथवा प्रशासन सम्बन्धी बातें हों, उनमें पक्षपात बरता जाता है, जिससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता कहीं न कहीं प्रभावित होती है, साथ ही प्राचार्य एवं कुलपतियों द्वारा नियुक्ति, नये विभाग खोलने, नये विषयों की सम्बद्धता देने, सरकारी वित्तीय सहायता प्रदान करने अथवा वरिष्ठता सम्बन्धी मामले लम्बित पड़े रहते हैं, जिसमें किसी की भी जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती और शिक्षण कार्य प्रभावित होता रहता है।
- उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट आने का एक मुख्य कारण हमारी परीक्षा प्रणाली भी है। प्रश्नपत्रों को तैयार करना, छपवाना और उनकी गोपनीयता बनाये रखना पूर्ण रूप से विश्वविद्यालय का उत्तरदायित्व है, जिसे बखूबी नहीं निभाया जाता। प्रश्नपत्रों में प्रश्नों को पाठ्यक्रम से न पूछना, केवल वर्णननात्मक प्रश्नों को पूछना, प्रश्नपत्रों को किसी पुस्तक विशेष से बनाना, प्रश्नपत्रों का निर्माण विषय विशेषज्ञों द्वारा न कराया जाना, कुछ ऐसे कारण हैं जो उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह खड़े करते हैं।
- उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट उत्तर पुस्तिकाओं के ढीले एवं सही मूल्यांकन के न होने की वजह से भी हो रहे हैं। इसमें मूल्यांकन के समय परीक्षकों को प्रश्नपत्र का हल उपलब्ध न कराना, सीमा से अधिक उत्तर पुस्तिकाएं देना, विषय विशेषज्ञों को सम्बन्धित विषय की उत्तर पुस्तिकाएं न मिलना, केन्द्रीय मूल्यांकन के अन्तर्गत भी उत्तर पुस्तिकाएं मूल्यांकित करने को घर पर देना आदि ऐसे कारण हैं, जिससे निश्चित रूप से शिक्षा की गुणवत्ता पर फर्क पड़ता है।
- हमारी परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं की मूल्यांकन व्यवस्था भी शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करती है क्योंकि महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाने वाला प्राध्यापक अलग होता है, जबकि परीक्षा हेतु प्रश्न पत्र अन्य शिक्षक तैयार करता है और मूल्यांकन तीसरे प्राध्यापक द्वारा किया जाता है। यदि पुनर्मूल्यांकन कराना हो तो चैथे प्राध्यापक द्वारा कराया जाता है, जबकि मूल्यांकन की निरन्तर प्रक्रिया होनी चाहिये, जो पढ़ाने वाले प्राध्यापक के हाथ में हो और उसमें पारदर्शिता बरती जाय। मूल्यांकन चाहे आन्तरिक हो या वाह्य उसके लिये पूर्व में ही विषय विशेषज्ञों एवं परीक्षकों की सूची बनाकर उन्हीं से मूल्यांकन कराया जाय।
- उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में फर्जी अंकतालिका अथवा प्रमाणपत्र तथा सिफारिश द्वारा प्रयोगात्मक परीक्षाओं अथवा उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में अंकों की वृद्धि करना, परीक्षा में नकल व अन्य धाँधलियां करना भी आड़े आती हैं। 
- सरकार द्वारा उच्च शिक्षा को पूर्ण रूप से अनुत्पादक माना जाता है। अतः प्राध्यापक वर्ग यदि अपने हितों के लिये हड़ताल करते हैं तो सरकार इस ओर जल्दी से ध्यान नहीं देती, इस कारण छात्रों का काफी अहित होता है और सत्र में शिक्षण कार्य दिवस भी पूरे नहीं हो पाते, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अनिवार्यता के बाद भी देश के सभी विश्वविद्यालयों ने समान पाठ्यक्रम को लागू नहीं किया है, जिससे छात्रों को एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में स्थानान्तरण के समय प्रश्न पत्रों की भिन्नता की समस्या आती है, जबकि कुछ विश्वविद्यालय द्वारा नित नये-नये हो रहे परिवर्तनों को भी अपने पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है और अनेक वर्षों तक पुराना पाठ्यक्रम चलता रहता है, जो कि उपयोगी एवं रोजगारपरक नहीं है, इससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
- अधिकांश विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालयों की सम्बद्धता व नये विषयों को चालू कराने की अनुमति स्ववित्तपोषण योजना के अन्तर्गत दी जा रही है। अतः ऐसे नये कोर्स को चलाने के लिये पहले तो योग्य छात्र ही उपलब्ध नहीं होते, उसके बाद विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय मनमानी फीस वसूलकर न तो मूलभूत सुविधायें मुहैया कराते हैं और न ही योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षक। कुछ स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों में अनुमोदन तो किसी योग्य शिक्षक के नाम से होता है, जबकि कक्षायें किसी अन्य अयोग्य व्यक्ति से पढ़वाते हैं, परिणामस्वरूप शिक्षा की गुणवत्ता गिर जाती है।
- उच्च शिक्षा में गिरावट का कारण विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के पुस्तकालयों में स्तरहीन एवं घटिया स्तर की पुस्तकें खरीदा जाना भी है, क्योंकि पुस्तकें खरीदते समय न तो सम्बन्धित शिक्षक की सहमति ली जाती है और न ही पुस्तकालय समिति का अनुमोदन। पुस्तकालय में सन्दर्भित पुस्तकों का भी अभाव रहता है और इस पर भी प्रभावशाली शिक्षक अधिकांश पुस्तकें निर्गत कराकर घर पर रख लेते हैं जबकि छात्र उनके आवश्यक प्रयोग से वंचित रह जाते हैं।
- उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट, छात्रों द्वारा विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालयों की कक्षाओं में अनुपस्थित रहने के कारण भी देखी जा रही है। यदि शिक्षक छात्रों को अनुपस्थित दर्शाता है तो वह आपसी राजनीति का शिकार बन जाता है और प्राचार्य अथवा कुलपति स्तर पर उनको शिथिलता प्रदान कर दी जाती है। यदि उनको राहत न मिले तो न्यायालय की शरण लेकर वह परीक्षा में सम्मिलित हो जाते हैं।
- उच्च शिक्षा में आजकल शोर्टनोट्स, कुंजी, गैसपेपर्स, सम्भावित प्रश्नपत्र, शोर्ट सीरिज या घटिया स्तर की पुस्तकें बाजार में बेरोक टोक उपलब्ध हैं। अतः छात्र पाठ्यक्रम एवं सन्दर्भित पुस्तकें न खरीदकर उक्त पुस्तकें खरीदकर पढ़ते हैं, जो शिक्षा की गुणवत्ता को गिराने का काम करती हैं।
- उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी का उद्देश्य मात्र लाभ कमाना रह गया है और समाज के गरीब छात्रों एवं शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता, बल्कि संख्यात्मक निष्पादन पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाता है।
- उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लागू एवं देय वेतन की तुलना यदि वाणिज्यिक क्षेत्र से की जाय तो वह बहुत कम है। अतः उच्च योग्यता धारक व्यक्ति उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आना पसन्द नहीं करते और वह शिक्षा के क्षेत्र को अपनी तीसरी प्राथमिकता पर रखते हैं।
- महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में जो प्राध्यापक शोध कार्य करते एवं कराते हैं, वे शोध कार्य न कराने वाले लोगों को देखकर हतोत्साहित होते हैं क्योंकि उन्हें इसके बदले कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है। वे भी कुछ समय पश्चात् गुणवत्ता के प्रति लापरवाही बरतने लगते हैं।
- अशासकीय कालेजों में उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग द्वारा भेजे गये प्राचार्य प्रबन्धतन्त्र से तालमेल न बैठने के कारण असफल हो जाते हैं और प्रबन्धतन्त्र अपने चहेते कार्यवाहक प्राचार्य को कार्यभार सौंप देते हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है।
- आज अधिकांश छात्र एवं अभिभावक शिक्षा की तुलना व्यवसायिक गतिविधियों से करने लगे हैं। वे सोचते हैं कि महाविद्यालय जाने की बजाय सुबह अथवा शाम को अतिरिक्त समय में शिक्षक से ट्यूशन पढ़कर, दिन का समय अपने अभिभावक के व्यवसाय में लगाकर, उनकी सहायता करेंगे तथा कई गुणा धन कमा लेंगे, किन्तु इस प्रकार वे शिक्षा के प्रति लापरवाही बरतते हैं और उसकी गुणवत्ता बनाये नहीं रख पाते।
- उच्च शिक्षा में ट्यूशन को सामाजिक बुराई के रूप में शिक्षण पेशे के खिलाफ माना जाता है। देखा यह गया है कि ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षक सम्बन्धित विषय में अधिक पारंगत हो जाते हैं जबकि पाम्परिक शिक्षक जो विषय को साल में एक बार पढ़ते और पढ़ाते हैं, उनसे मुकाबला नहीं कर पाते। शिक्षा की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए ऐसे शिक्षकों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे समय से कक्षायें लें और अपना कोर्स समय पर कक्षा में पूर्ण करायें व शिक्षा का व्यवसायीकरण न करें, अन्यथा शिक्षा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार सम्भव नहीं है।
उच्च षिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु सुझाव
आजादी के बाद से ही हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था आम छात्रों के लिए दुर्लभ, अप्रासंगिक एवं उद्देश्यहीन रही है। किसी भी देश के विकास का आकलन वहाँ रह रही शिक्षित जनता से हो सकता है न कि वहाँ की आर्थिक प्रगति से, जो कि शिक्षित मानव विकास पर आधारित होता है। उच्च शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य समाज को शिक्षित एवं रोजगारपरक बनाना होना चाहिए, जिसको हमारी उच्च शिक्षा प्रदान नहीं कर पायी है। महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में वृद्धि कर उच्च शिक्षा की पहुंच को सरल बनाने का प्रयास अवश्य किया गया है किन्तु पर्याप्त योजना के अभाव में उच्च शिक्षा में निरन्तर गुणवत्ता का ह्रास हो रहा है। अतः उच्च शिक्षा व्यवस्था में पर्याप्त सुधार हेतु प्रमुख सुझाव निम्न हो सकते हैं-
- सभी के लिए गुणात्मक उच्च शिक्षा सरकार की ओर से प्रदान की जानी चाहिए।
- उच्च शिक्षा में ''स्टार व्यवस्था'' में पिछड़े विश्वविद्यालय एक निश्चित समय में अपने स्तर को सुधारने का प्रयास करें।
- उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी अथवा निजी क्षेत्र के स्थान पर दोनों की मिलीजुली सहभागिता सुनिश्चित की जाय ताकि जवाबदेहिता सुनिश्चित की जा सके।
- उच्च शिक्षा में उन्नयन हेतु संस्थानों में लागू नियमों का प्रकटीकरण एवं पारदर्शिता अनिवार्य रूप से सुनिश्चित की जाय। यह सम्बद्धता, अनुमोदन, फीस ढांचा, प्रवेश प्रक्रिया, आधारभूत ढांचागत सुविधायें, वित्त, पाठ्यक्रम, परीक्षा प्रणाली आदि से सम्बन्धित हो सकते हैं।
- उच्च शिक्षा के उन्नयन हेतु इसके व्यवसायीकरण पर कानून बनाकर पूर्णतः प्रतिबन्ध होना चाहिए साथ ही जिन क्षेत्रों में व्यवसायीकरण अनिवार्य हो, उसको अलग से परिभाषित किया जाना चाहिए।
- उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सरकार द्वारा ऊँचे व्यवसायिक समूह/घरानों को आमन्त्रित कर उनकी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए और उन्हें ऊँचे पदों पर आसीन करना चाहिए, साथ ही यह भी ध्यान रखा जाय कि गुणवत्ता के साथ कोई समझौता न हो।
- सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जो छात्र, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं और उसको वित्तीय समस्या आड़े आती है, तो उसको पूर्णतः सहायता प्रदान की जाय न कि जातीय अथवा क्षेत्रीय आधार पर चयन कर सुविधा मुहैया करायी जाय।
- उच्च शिक्षा हेतु राष्ट्रीय स्तर पर समान पाठ्यक्रम के लिए समान फीस निर्धारित की जाये।
- उच्च शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार लाने हेतु नियमित शिक्षकों का चयन अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय स्तर पर नैट अथवा स्लैट के माध्यम से किया जाय साथ ही पाठ्यक्रम का निर्धारण भी यूजीसी द्वारा समान रूप से किया जाय।
- उच्च शिक्षा व्यवस्था में स्ववित्तपोषित तथा सांध्यकालीन व्यवस्था अविलम्ब समाप्त की जानी चाहिए।
- विश्वविद्यालयों एवं स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में शोध कार्यों को अनिवार्य बनाया जाय और उसको शिक्षकों के कैरियर पदोन्नति, फैलोशिप एवं अनुदान से जोड़ा जाना चाहिए, जिसकी समय-समय पर समीक्षा की जाय।
- उच्च शिक्षा पद्धति छात्रों पर केन्द्रित होनी चाहिए, जिसके लिए छात्रों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- उच्च शिक्षा में छात्रों की प्रवेश नीति प्रतियोगिता पर आधारित होनी चाहिए तथा कक्षाओं में 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य कर, उसका कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।
- छात्रों की समस्याओं के समाधान हेतु ''कैरियर काउंसलिंग प्रोग्राम'' लागू किया जाय जो फोन अथवा इंटरनेट पर हर समय छात्रों को उपलब्ध हो।
- उच्च शिक्षा को राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाय।
- उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति देने का आधार गुणवत्ता भी हो ऐसी व्यवस्था की जाय।
- पुराने पाठ्यक्रमों को समय-समय पर संशोधित एवं अद्यतन किया जाय, जिसमें प्रायोगिक हिस्सा बढ़ाकर उसको व्यवहार में लागू कराया जाय, साथ ही समय-समय पर सेमीनारों का आयोजन भी पाठ्यक्रम के अन्तर्गत ही अनिवार्य बनाया जाय।
- परीक्षाओं की पद्धति एवं स्तर में सुधार किया जाय। राष्ट्रीय स्तर पर, प्रश्न बैंक के माध्यम से  प्रश्नपत्र के विभिन्न सेट बनाये जाय, जो पूरे पाठ्यक्रम को सम्मलित करते हों।
- मूल्यांकन व्यवस्था में भी आमूल-चूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, जिसमें पर्याप्त पारदर्शिता बरती जाय।
- उच्च शिक्षा व्यवस्था में कोचिंग व्यवस्था, नियमित छात्रों के लिए पूर्णतः प्रतिबन्धित की जाय।
- उच्च शिक्षा में सुधार एक निरंतर प्रक्रिया है, इसको संस्थान, प्रबन्धतन्त्र, शिक्षक एवं छात्र सभी मिलकर सुधार सकते हैं। अतः समय-समय पर सभी का मूल्यांकन कर सुधार प्रक्रिया जारी रखी जानी चाहिए।
- उच्च शिक्षा के उन्नयन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका पुस्तकालय की होती है, जिसमें सन्दर्भग्रन्थ, पाठ्यपुस्तकें और शोध पत्रिकाओं हेतु अलग-अलग विभाग बनाये जाय। पुस्तकालय को कम्प्यूटराइज कर, इन्टरनेट से जोड़ा जाय, साथ ही वरिष्ठ शिक्षकों की एक समिति विभिन्न सुझावों हेतु बनायी जाय।
- उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रत्येक शैक्षणिक सत्र में कम से कम 180 शैक्षणिक कार्य दिवस सुनिश्चित किये जाने चाहिए, जिनमें समय-समय पर शैक्षणिक माहौल सुधारने एवं समस्याओं के लिए स्टाफ मीटिंग की जानी चाहिए। सभी स्टाफ सदस्यों एवं छात्रों को सत्र का कैलेन्डर भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
- उच्च शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक सुधार लाने हेतु महाविद्यालय, संकाय, स्टाफ एवं प्रबन्धतन्त्र स्व-मूल्यांकन करे तथा छात्रों, अभिभावकों एवं सभी सदस्यों के माध्यम से भी मूल्यांकन कराया जाना चाहिए, जिस पर बाद में पूर्णतः विश्लेषण एवं चिंतन किया जाय।
- उच्च शिक्षा में उन्नयन हेतु समय-समय पर प्रबन्धतन्त्र एवं प्राचार्य द्वारा स्टाफ काउन्सिल की मीटिंग आहूत की जाय, जिसमें सभी समस्याओं, प्रगति एवं निष्पादन पर विचार-विमर्श किया जाय तथा प्राप्त सुझावों को अमल में लाया जाय।
- उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के बीच बढ़ रही अनुशासनहीनता को नियन्त्रित करने के लिए भरसक प्रयत्न किये जाय और रैगिंग एवं छात्र-संघों पर पूर्णतः प्रतिबन्ध एवं कड़े दण्ड का प्रावधान किया जाना चाहिए।
- उच्च शिक्षा के क्षेत्र में स्वायत्त महाविद्यालयों की स्थापना की जाय। जिन विश्वविद्यालयों में कैम्पस शिक्षण हो रहा हो उनसे महाविद्यालयों को सम्बद्ध न किया जाय तथा प्रत्येक विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय की छात्र संख्या पर प्रतिबन्ध लगाया जाय और प्राइवेट छात्रों को दूरस्थ शिक्षा प्रणाली के माध्यम से जोड़ा जाय।
- प्राचार्य के पद को प्रभावकारी बनाने के लिए उसे प्रबन्धतन्त्र के साथ-साथ विश्वविद्यालय के प्रति भी जवाबदेह बनाये, ताकि शिक्षा की गुणवत्ता को बनाये रखा जा सके, रिक्त पड़े पदों पर भर्ती की त्वरित कार्यवाही की जाय।
विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में यदि देखा जाय तो काम के घन्टों पर भी विचार करना होगा। सामान्यतः एक शिक्षक को प्रति सप्ताह 40 घण्टे कार्य करना होता है, जिसमें से प्रायः 24 घण्टे पढ़ाने के लिए व बाकी समय तैयारी के लिए चाहिए। तैयारी का समय घर पर या महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में व्यतीत कर सकता है, परन्तु मूलभूत समस्या यह है कि महाविद्यालयों में अधिकांश प्राध्यापकों के लिए बैठने हेतु उचित रूप से कुर्सी-मेज एवं शांत वातावरण, जिसमें बैठकर तैयारी कर सकें, उपलब्ध नहीं है। विज्ञान वर्ग में यदि प्रयोगात्मक विषय के सम्बन्ध में देखें तो प्रयोगशाला का कार्य अधिकांश महाविद्यालयों में नवम्बर से शुरू करके फरवरी में बंद कर दिया जाता है और कुछ चयनित प्रयोग कराकर ही पाठ्यक्रम समाप्त कर दिया जाता है तथा उन्हीं प्रयोगों में से परीक्षा में भी पूछ लिया जाता है। सही रूप में तो शिक्षकों का मूल्यांकन छात्रों द्वारा किया जाना चाहिए लेकिन इसका प्रयोग दण्डात्मक कार्यवाही के लिए नहीं होना चाहिए क्योंकि यदि दण्डात्मक रूप में इस मूल्यांकन का प्रयोग किया जायेगा तो शिक्षक इसका विरोध करेंगे और यह व्यवस्था लागू नहीं हो पायेगी। इसका प्रयोग सुधारात्मक रूप में होना चाहिए और शिक्षकों को इससे सुधार की सीख लेनी चाहिए तथा ऐसा मूल्यांकन गोपनीय रखा जाना चाहिए और यह शिक्षक की सम्पत्ति होनी चाहिए।



उपरोक्त सभी बातों को मद्देनजर रखकर यदि सोचा जाय और उनमें सुधार किया जाय, छात्रों एवं शिक्षकों का मनोबल ऊँचा रखा जाय, रोजगारपरक शिक्षा प्रदान की जाय, मूलभूत सुविधाओं को बनाए रखा जाय, मानकों का सख्ती से पालन किया जाय तो कोई कारण नहीं कि हमारी शिक्षा प्रणाली भी बुलन्दियों को न छू सके और हम निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त न कर सकें। इसके लिए हम सभी को मिलकर विचार करना ही होगा।


संदर्भ
1. झा विनोदानन्द, भारत में शिक्षा व्यवस्था, योजना, 538 योजना भवन, संसद मार्ग नई दिल्ली, फरवरी 2012, पृष्ठ संख्या 49
2. तमंग अनिषा, The challenge of Ensuring Equal Access to Education for women : A critical Analysis, कुरुक्षेत्र अंग्रेजी, नरीमन भवन, ग्रामीण विकास मंत्रालय नई दिल्ली, सितम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 15
3. सिंह नरेन्द्र पाल एवं हुसैन नजाकत, भारत में उच्च शिक्षा व्यवस्था: एक मूल्यांकन, कुरुक्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र एवं रोजगार मंत्रालय, कृषि भवन नई दिल्ली, सितम्बर 1996 पृष्ठ संख्या 39
4. कुमार आनन्द, शिक्षा परिदृश्य में गुणवत्ता क्रांति की आवश्यकता, योजना, 538 योजना भवन संसद मार्ग नई दिल्ली, अक्टूबर 2013, पृष्ठ संख्या 56
5. कुमार डाॅ0 धर्मेन्द्र, अध्यापक शिक्षा की गुणवत्ता हेतु अध्यापक-प्राध्यापक की भूमिका, कवितांजलि, टीचर्स अपार्टमेन्ट इन्दिरा बिहार काॅलोनी बिजनौर, अगस्त 2012, पृष्ठ संख्या 90
6. विलानिलम जे.वी., भारत में शिक्षा व्यवस्था, योजना, 538 योजना भवन संसद मार्ग नई दिल्ली, अगस्त 2012, पृष्ठ संख्या 24
7. यादव डाॅ0 वीरेन्द्र सिंह, बदलते वर्तमान परिदृश्य में भारतीय उच्च शिक्षा की चुनौतियां और समाधान की दिशाएं, समाज विज्ञान शोध पत्रिका, आर्यवृत काॅलोनी मुरादाबाद गेट अमरोहा, अक्टूबर 2014 से मार्च 2015, पृष्ठ संख्या 108
8. www.highereducation.org


 


एसोसिएट प्रोफेसर,  वाणिज्य विभाग, साहू जैन काॅलेज नजीबाबाद-246763 (उप्र)  email-drnps62@gmail.com


ग़ज़ल परंपरा में नया प्रयोग है ‘तिरोहे’ 


सत्येंद्र गुप्ता


सारांश
अरबी से फ़ारसी साहित्य में आकर यह विधा शिल्प के स्तर पर तो अपरिवर्तित रही किंतु कथ्य की दृष्टि से उनसे आगे निकल गई। उनमें बात तो दैहिक या भौतिक प्रेम की ही की गई किंतु उसके अर्थ विस्तार द्वारा दैहिक प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम में बदल दिया गया। अरबी का इश्के मजाज़ी फ़ारसी में इश्के हक़ीक़ी हो गया। फ़ारसी ग़ज़ल में प्रेमी को सादिक़ ;साधकद्ध और प्रेमिका को माबूद ;ब्रह्मद्ध का दर्जा मिल गया। ग़ज़ल को यह रूप देने में सूफ़ी साधकों की निर्णायक भूमिका रही। वली दकनी, सिराज दाउद आदि इसी प्रथा के शायर थे जिन्होंने एक तरह से अमीर खुसरो की परंपरा को आगे बढ़ाया। जब ग़ज़ल ने हिंदी में पदार्पण किया तो जैसे चमत्कार हो उठा। हिंदी में ग़ज़ल को आशिक़ और माशूक़ के अलावा भी काफ़ी विषय मिल गए। हिंदी के अनेक कवियों ने शिल्प से छेड़छाड़ किए बिना ग़ज़ल को अपनाया। ऐसे कवियों में अमीर खुसरो, कबीर, गोविंद चाननपुरी, निराला, शमशेर, बलबीर सिंह रंग, भवानी शंकर, जानकी वल्लभ शास्त्री, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, त्रिलोचन, दुश्यंत कुमार, गोपालदास नीरज, डाॅ. श्यामानंद सरस्वती, कुंवर बेचैन आदि प्रमुख हैं। ऐसे ही एक और ग़ज़लकार हैं सत्येंद्र गुप्ता। सत्येंद्र गुप्ता जी ने तिरोहे लिखकर क़तआ को नई दिशा देने का प्रयास किया है।


तिरोहे को जानने से पहले ग़ज़ल और उसके अशआर को जानना अत्यंत आवश्यक है। ग़ज़ल अरबी साहित्य की प्रसिद्ध काव्य विधा है जो बाद में फ़ारसी, उर्दू और हिंदी साहित्य में भी लोकप्रिय हुई। अरबी में ग़ज़ल का अर्थ औरतों से या औरतों के बारे में बातें करना है। यह भी कहा जा सकता है कि ग़ज़ल आशिक़ और माशूक़ की बात करती है। ग़ज़ल का मतलब हिरन की आँख भी होता है। ग़ज़ल एक ही बहर और वज़न के अनुसार लिखे गए कुछ शेरों का समूह है। इसके पहले शेर अर्थात मुखड़े को मतला कहते हैं। जबकि ग़ज़ल के अंतिम शेर को मक़ता कहते हैं। जिसमें शायर अपने नाम का प्रयोग करता है। ग़ज़ल में शेरों की संख्या विषम तीन, पाँच, सात होती है। ग़ज़ल अपने प्रारंभिक दौर में बहुत लंबी होती थी। बाद में 25 शेर तक होने लगी परंतु अब 5 से 7 शेर तक रह गई है। ये शेर एक दूसरे से स्वतंत्र होते हैं। सभी का अर्थ भी प्रायः अलग ही होता है और जब एक से अधिक शेर मिलकर अर्थ देते हैं तो ऐसे शेर क़ता या बंद कहलाते हैं। ग़ज़ल के शेर में तुकांत शब्दों को क़ाफ़िया कहा जाता है और शेरों में दोहराए जाने वाले शब्दों को रदीफ़ कहा जाता है। शेर की एक पंक्ति को मिसरा कहा जाता है। मतले के दोनों मिसरों में क़ाफ़िया आता है और बाद के शेरों में दूसरी पंक्ति में क़ाफ़िया आता है। रदीफ हमेशा क़ाफ़िये के बाद आता है। रदीफ और क़ाफ़िया एक ही शब्द के भाग भी हो सकते हैं और बिना रदीफ़ का शेर भी हो सकता है जो क़ाफ़िये पर समाप्त होता हो। ग़ज़ल के सबसे अच्छे शेर को शाह-ए-बैत कहा जाता है। ग़ज़ल के संग्रह को दीवान कहते हैं। उर्दू का पहला दीवान शायर क़ुली कुतुबशाह का माना गया है।
तुक के आधार पर ग़ज़ल दो प्रकार की होती है-
मुअद्दस ग़ज़ल- जिस ग़ज़ल के अशआरों में रदीफ़ और क़ाफ़िया दोनों का ध्यान रखा जाता है।
मुकफ़्फ़ा ग़ज़ल- जिस ग़ज़ल के अशआरों में केवल क़ाफ़िया का ध्यान रखा जाता है।
भाव के आधार पर भी ग़ज़ल दो प्रकार की होती हैं-
मुसल्सल ग़ज़ल- जिसमें शेर का भावार्थ एक दूसरे से शुरु सेआख़ीर तक जुड़ा रहता है।
गैर मुसल्सल ग़ज़ल- जिसमें हरेक शेर का भाव स्वतंत्र होता है।
यह ग़ज़ल का सामान्य सा शिल्प होता है। अरबी से फ़ारसी साहित्य में आकर यह विधा शिल्प के स्तर पर तो अपरिवर्तित रही किंतु कथ्य की दृष्टि से उनसे आगे निकल गई। उनमें बात तो दैहिक या भौतिक प्रेम की ही की गई किंतु उसके अर्थ विस्तार द्वारा दैहिक प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम में बदल दिया गया। अरबी का इश्के मजाज़ी फ़ारसी में इश्के हक़ीक़ी हो गया। फ़ारसी ग़ज़ल में प्रेमी को सादिक़ ;साधकद्ध और प्रेमिका को माबूद ;ब्रह्मद्ध का दर्जा मिल गया। ग़ज़ल को यह रूप देने में सूफ़ी साधकों की निर्णायक भूमिका रही। सूफ़ी साधना विरह प्रधान साधना है। इसलिए फ़ारसी ग़ज़लों में भी संयोग के बजाय वियोग पक्ष को ही प्रधानता मिली। फ़ारसी से उर्दू में आने पर भी ग़ज़ल का शिल्प ज्यों का त्यों बना रहा मगर कथ्य भारतीय हो गया। ऐसा माना जाता है कि हिन्दोस्तानी ग़ज़लों का जन्म बहमनी सल्तनत के समय दक्कन में हुआ जहाँ गीतों से प्रभावित ग़ज़लें लिखी गईं। भाषा का नाम रेख़्ता ;गिरा-पड़ाद्ध पड़ा। वली दकनी, सिराज दाउद आदि इसी प्रथा के शायर थे जिन्होंने एक तरह से अमीर खुसरो की परंपरा को आगे बढ़ाया। दक्किनी उर्दू के ग़ज़लकारों ने अरबी फ़ारसी के बदले भारतीय प्रतीकों, काव्य रूढ़ियों, एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को लेकर रचना की।
यह वह समय था जब उत्तर भारत में राजकाज की भाषा फ़ारसी थी इसलिए ग़ज़ल जब उत्तर भारत में आई तो पुनः उस पर फ़ारसी का प्रभाव बढ़ने लगा। ग़ालिब जैसे उर्दू के श्रेष्ठ ग़ज़लकार भी फ़ारसी ग़ज़लों को ही महत्वपूर्ण मानते रहे और उर्दू ग़ज़ल को फ़ारसी के अनुरूप बनाने की कोशिश करते रहे। बाद में दाउद के दौर में फ़ारसी का प्रभाव कम हुआ। जब ग़ज़ल ने हिंदी में पदार्पण किया तो जैसे चमत्कार हो उठा। हिंदी में ग़ज़ल को आशिक़ और माशूक़ के अलावा भी काफ़ी विषय मिल गए। हिंदी के अनेक कवियों ने शिल्प से छेड़छाड़ किए बिना ग़ज़ल को अपनाया। ऐसे कवियों में अमीर खुसरो, कबीर, गोविंद चाननपुरी, निराला, शमशेर, बलबीर सिंह रंग, भवानी शंकर, जानकी वल्लभ शास्त्री, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, त्रिलोचन, दुश्यंत कुमार, गोपालदास नीरज, डाॅ. श्यामानंद सरस्वती, कुंवर बेचैन आदि प्रमुख हैं। ऐसे ही एक और ग़ज़लकार हैं सत्येंद्र गुप्ता। सत्येंद्र गुप्ता जी ने तिरोहे लिखकर क़तआ को नई दिशा देने का प्रयास किया है। सत्येंद्र गुप्ता जी नजीबाबाद निवासी हैं जिन्होंने क़तआ अथवा मुक्तक में एक पंक्ति कम करके तीन पंक्तियों से अपनी बात कहने का प्रयास किया है। 
जैसा कि ग़ज़ल, क़तआ अथवा मुक्तक की चर्चा हुई है उसी तरह से 'तिरोहे' भी ग़ज़ल शिल्प में एक महत्वपूर्ण विधा बन गई है। तीन पद की रचना को कवि सत्येंद्र गुप्ता ने तिरोहे नाम दिया है। जिसके बारे में वह लिखते हैं-''मैंने इनमें शेर की तरह दो लाइनों के साथ, एक नई लाइन और जोड़ने की कोशिश की है, जिससे पहले दोनों लाइनों का वुजूद और बढ़ गया। उनकी क़ैफ़ियत में चार चाँद लग गए। तीसरी पंक्ति प्रथम दो पंक्तियों को और बुलंदियों तक ले जाती है।''1 
तिरोहे से पहले गुलजार और डाॅ. श्यामानंद सरस्वती ने भी तीनपदीय कविता 'त्रिवेणी' की रचना की है। तिरोहे भी तीन पदीय शायरी है। शेर में दो पद अथवा दो मिसरे होते हैं। पहला मिसरा-ए-ऊला और दूसरा मिसरा ए सानी जबकि ग़ज़ल का मतला अर्थात मुखड़े में दोनों पद मिसरा-ए-सानी ही होते हैं। तिरोहे में पहले मिसरा-ए-ऊला को मिसरा-ए-ख़ास कहा गया है। कवि ने अपनी बात में स्वीकारा है कि-''तिरोहे एक शेर की तरह अपने आप में स्वतंत्र हैं। दूसरा और तीसरा मिसरा रदीफ़ क़ाफ़िए में है।''2 
उनके जन्म एवं उनकी शिक्षा-दीक्षा के बारे में अशोक अग्रवाल बताते हैं, ''हिंदी साहित्य ;कविता, शायरी,द्ध में गहन रुचि रखने वाले डाॅ. सतयेन्द्र गुप्ता का जन्म 13 मई 1944 को देहरादून ;उत्तराखंडद्ध में हुआ। आपने अपनी उच्च शिक्षा विज्ञान विषय में देहरादून में ग्रहण की। आपने अपने अथक परिश्रम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। आपने अपनी गहन ज्ञान गंगा से हिंदी साहित्य को अनेक कृतियों ;जिनकी संख्या 10 हैद्ध के द्वारा नए आयाम दिए हैं।''3 डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता की पुस्तक के संबंध में एज़ाज़ुल हसन ज़ैदी कहते हैं-''सत्येन्द्र गुप्ता जी की  पुस्तक 'मेरी कोशिश' एक नए अनोखे अंदाज़ में पिरोई हुई शायरी की एक बेमिसाल फ़नकारी जिसका कोई जवाब नहीं वो जिस अंदाज़ से अपनी बात कहते हैं और फिर जिस शिद्दत से तंज़ करते हैं वह आज के बहुत कम रचनाकारों के बस में होता है। कमाल की लाजवाब शायरी के रहबर को मैं दिल से सलाम करता हूँ।''4 
एज़ाज़ुल हसन ज़ैदी तिरोहे को मान्यता देते हुए लिखते हैं-''डाॅ. गुप्ता जी की पुस्तक 'मेरी कोशिश' एक नई पहल मानी जाएगी इसमें दोहे और चैपाई के बीच तीन पदों में विषय को पूरा किया गया है इसे हिंदी प्रेमी त्रिपदी तथा उर्दू प्रेमी सलासी ;तीन पदों वालीद्ध का नाम दे सकते हैं।''5 एज़ाज़ुल हसन ज़ैदी साहब तिरोहे की ख़ासियत बताते हुए कहते हैं-''अनुप्रास तथा यमक आदि अलंकारों की छटा मिलती है अन्त्यानुप्रास तो प्रत्येक त्रिपद में देखा जा सकता है। संक्षेप में अगर पहले पद को निकाल दिया जाए तो पूरी पुस्तक एक ग़ज़ल का संग्रह बन जाएगी क्योंकि प्रत्येक शेर हमक़ाफ़िया और हमरदीफ़ है। इसके साथ-साथ लगभग 60 त्रिपद प्रेम मिलन विरह से समावेशित हैं जो उर्दू ग़ज़ल का आधार हैं।''6 
भाषा और शैली के विषय पर डाॅ. सुनील 'तरुण' का मानना  हैं कि-''आपकी भाषा पर पकड़ और शब्दों का माधुर्य पाठकों को बाँधे रखने में पूर्ण रूप से सक्षम रहा है।''7 एज़ाज़ुल हसन ज़ैदी साहब ने भी उनकी भाषा और शैली पर विचार करते हुए कहा है कि-''सबसे अलबेली इसकी भाषा है। हिंदी उर्दू का ऐसा सुन्दर संगम या तो हिंदी-उर्दू के जनक सूफ़ी अमीर ख़ुसरो के यहाँ मिलता है या गद्य में मुंशी प्रेमचंद तथा कुछ-कुछ भारतेंदु जी के यहाँ पाया जाता है और दोनों भाषाओं हिंदी तथा उर्दू में समान रूप से आदरणीय भाव से देखा जाता है। जहाँ तक छंदों का प्रश्न है इस समय में जबकि काव्य छंद विहीन हो गया है यह रचना छंदोबद्ध व गेय पदों वाली ही समझी जाएगी।''8 
विषय चयन के संबंध में डाॅ. सुनील 'तरुण' का मानना है कि-''उन्होंने अपनी इस तीन मिसरी शायरी संग्रह में जीवन के लगभग हर पहलू को छुआ है।''9 
देवेन्द्र माँझी ने भी माना है कि-''सत्येन्द्र गुप्ता जी काफ़ी समय से ग़ज़ल विधा में सतत् प्रयासरत हैं और उनके अनेक संग्रह प्रकाशित होकर चर्चा का विषय बन चुके हैं। अब उन्हें इल्हाम हुआ है कि शेर की दो पंक्तियों की अपेक्षा तीन पंक्तियों ;मिसरोंद्ध में बात को अपने मुक़ाम तक पहुँचाना अधिक सहज और बेहतर है। अपनी इसी सोच से प्रेरित होकर उन्होंने शायरी की एक नई विधा 'तिरोहे' को जन्म दिया है।''10  देवेन्द्र माँझी उनके छंदों की तारीफ़ करते हुए लिखते हैं-''हर छंद क़ाबिले-ज़िक्र है।''11 
तिरोहे और तिरोहे की व्याकरण शोध का विषय है। तिरोहे का छंदविधान स्पष्ट नज़र आ जाता है, व्याकरण को भी इसमें नकारा नहीं जा सकता है परंतु फिर भी कवि ने लिखा है कि ''तिरोहे किसी भी व्याकरण से मुक्त हैं।''12  वहीं वह यह भी कहते हैं कि ''मैंने ग़ज़ल और गीत कहने में भी इनका प्रयोग किया है।''13 
दृष्टव्य हैं-


 उसकी शान में कुछ तो अता कर
 हर चीज़ मिल जाती है दुआ से
 मांग कर तो देख ले ख़ुदा से14


जैसा कि नाम से ही प्रतीत हो रहा है। प्रस्तुत तिरोहे में तीन पंक्ति हैं और यह तिरोहा पुस्तक का प्रारंभ भी है। प्रारंभ ईश्वर के नाम पर किया जाता है इसीलिए यह मंगलाचरण है।
प्रथम पंक्ति में एक साधारण सी बात कही गई है जिसमें मनुष्य से कहा जा रहा है कि 'तू भी तो भगवान को कुछ दे।'
सत्येन्द्र गुप्ता आशावादी हैं। तभी तो कहते हैं-
 तू मिसरा है जिस ग़ज़ल का ज़िंदगी
 उस ग़ज़ल के अशआर हम भी हैं
 तेरे इश्क़ के हक़दार हम भी हैं15
गुप्ता जी ईश्वर से मांगते हैं और ऐसा मांगते हैं कि उनके माँगने पर कौन इंकार कर सकता है-
 तेरे दिल में क्या है उसे सब पता है
 देता है सबको वो अपनी रज़ा से
 अजनबी नहीं है वह तेरी सदा से16


 मुझको ऐसा न बनाना मेरे ख़ुदा
 मुझसे मिलते हुए लोग डरने लगें
 मुझसे दूर-दूर सब रहने लगें17


 मुझको ऐसा बना देना मेरे ख़ुदा
 तेरी ख़ुश्बू मेरे साथ चलने लगे
 जिस गली मैं चलूँ, महकने लगे18
मंगलाचरण के बाद उन्होंने माँ को याद किया है- 
 बहुत तकलीफ़ सहकर पाला माँ ने
 माँ की झुर्रिया बेटे की जवानी हो गई
 वक़्त बीतते-बीतते माँ कहानी हो गई19


 मुद्दत से नींद नहीं आई माँ
 लोरी कोई नई सुना दे मुझे
 थपकी दे कर सुला दे मुझे20


 भूखे पेट माँ ने सोने नहीं दिया
 ख़ुद सो गई मुझे खिलाते-खिलाते
 थक गई माँ कहानी सुनाते-सुनाते21
मुहावरों और अलंकारों का उपयोग भी तिरोहे में भरपूर है। जिससे कहा जा सकता है कि उनके तिरोहे काव्य में काव्य-कौशल की कोई कमी नहीं अखरती है। विभिन्न विषयों पर तिरोहेकार की क़लम ख़ूब चली है। आशिक़ी पर कवि ने क्या ख़ूब कहा है-
 रोशनाई इश्क़ की सारी उड़ गई
 ख़ाली मगर दिल की दवात न हुई
 मिलके भी लगा मुलाक़ात न हुई22


 हसरत बनकर रह गई मोहब्बत
 शाम क़ूचा-ए-यार में गुज़्ार गई
 सुबह इश्क़िया ख़ुमार में गुज़्ार गई23
अमीरी-ग़रीबी का भेद किसी भी समाज के लिए अभिशाप है। कवि ने इस बात को भी नए अंदाज़ में कहा है- 
 अमीरी चमकती है ग़रीबी सिसकती है
 दुनिया यूं ही चलती रुमानी लगती है।
 हर चेहरे की हसीं परेशानी लगती है24
दुनियावी समस्याओं पर कवि की क़लम रुकती नहीं है। कवि के पास विषय का अथाह भंडार नज़र आता है। दृष्टव्य हैं कुछ तिरोहे- 
 फ़ासला तो रहना चाहिए बीच में
 आग से छेड़खानी भी अच्छी नहीं
 हवा की तेज़ रवानी भी अच्छी नहीं25


 ज़ख्मों को रख सके तिजोरी में
 इतना भी कोई साहूकार नहीं होता
 ज़ख़्मों का कभी व्यापार नहीं होता26


 होंगे लाख ऐब मुझमें भी तो
 कौन है यहाँ जो दूध का धुला है
 भरोसा अब किसी पर न रहा है27


 ता-उम्र मर-मर कर जिए हम
 इतनी महँगी ज़िन्दगी यार क्या करते
 क़यामत का इंतज़ार क्या करते28


 शायद क़िस्मत में यही लिखा था
 जिसको भी मैंने हवा से बचाया
 उसी चिराग़ ने घर मेरा जलाया29


 हम सफ़र बनकर साथ चला जो
 पहले तो उसने गले से लगाया
 तन्हाई का उसने ही फ़ायदा उठाया30
तिरोहे से पूर्व भी तिरोहे की ही तरह तीन पंक्तियों वाली रचना प्रकाश में आती है जिसे त्रिपदी या त्रिवेणी कहा गया है। त्रिवेणी के सशक्त हस्ताक्षर डाॅ. श्यामानंद सरस्वती 'रोशन' भी 'जीवन नाम प्रवाह का' का प्रारंभ मंगलाचरण से करते हैं। उनकी तीन पंक्तियों की रचना में भी रदीफ और क़ाफ़िया है। दृष्टव्य है रोशन साहब की कुछ रचनाएं-
 हंसवाहिनी! कर कृपा
 हंस सरीखा हो चयन
 हंस सरीखा हो सृजन31


 विनय यही माँ शारदे!
 जो नश्तर का काम दे
 लेखन में वह धार दे32


 माँ! मेरा हर छंद ही
 आग जलाए क्रांति की
 वर्षा लाए शांति की33


 माँ! ऐसी हो तब कृपा
 हर पल छांदस वृष्टि हो
 लाभान्वित यह सृष्टि हो34
त्रिपद छंद के लिए डाॅ. श्यामानंद सरस्वती 'रोशन' लिखते हैं-
 शब्द चयन की दक्षता
 भाव पक्ष की भव्यता
 त्रिपद छंद की पूर्णता35


 त्रिपद छंद में देखिए
 सूर्य-चंद्रमा-सी झलक
 कुछ कह पाने की ललक36


 त्रिपद छंद की बात क्या
 अनुपम और ललाम है
 दिव्य त्रिवेणी धाम है37
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि 'तिरोहे' ग़ज़ल शिल्प में एक नया प्रयोग है। जिसमें प्रथम प्रयोगकर्ता सत्येन्द्र कुमार गुप्ता ने रदीफ़ और क़ाफ़िया का पूरा ध्यान रखा है। विषय की दृष्टि से भी 'तरोहे' को संपन्न कहा जा सकता हैं।
संदर्भ
1 . डाॅ. सत्येंद्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 18
2 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 19
3 . अशोक अग्रवाल, पुस्तक समीक्षा, विमोचन समारोह में प्रस्तुतकृकृकृ
4 . एज़ाज़ुल हसन ज़ैदी, पुस्तक समीक्षा, विमोचन समारोह में प्रस्तुतकृकृकृ
5 . एज़ाज़ुल हसन ज़ैदी, पुस्तक समीक्षा, विमोचन समारोह में प्रस्तुतकृकृकृ
6 . एज़ाज़ुल हसन ज़ैदी, पुस्तक समीक्षा, विमोचन समारोह में प्रस्तुतकृकृकृ
7 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 9
8 .  एज़ाज़ुल हसन ज़ैदी, पुस्तक समीक्षा, विमोचन समारोह में प्रस्तुतकृकृकृ
9 .  डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 7
10 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 10
11 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 11
12 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 19
13 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 19
14 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 21
15 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 22
16 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 21
17 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 23
18 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 23
19 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 28
20 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 27
21 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 31
22 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 40
23 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 29
24 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 127
25 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 154
26 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 23
27 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 29
28 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 30
29 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 30
30 . डाॅ. सत्येन्द्र गुप्ता, मेरी कोशिश, अविचल प्रकाशन बिजनौर, प्रथम संस्करण 2018, पृ. 30
31 . डाॅ. श्यामानंद सरस्वती 'रोशन', जीवन नाम प्रवाह का, अमृत प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृ. 17
32 . डाॅ. श्यामानंद सरस्वती 'रोशन', जीवन नाम प्रवाह का, अमृत प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृ. 17
33 . डाॅ. श्यामानंद सरस्वती 'रोशन', जीवन नाम प्रवाह का, अमृत प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृ. 17
34 . डाॅ. श्यामानंद सरस्वती 'रोशन', जीवन नाम प्रवाह का, अमृत प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृ. 18
35 . डाॅ. श्यामानंद सरस्वती 'रोशन', जीवन नाम प्रवाह का, अमृत प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृ. 20
36 . डाॅ. श्यामानंद सरस्वती 'रोशन', जीवन नाम प्रवाह का, अमृत प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृ. 20
37 . डाॅ. श्यामानंद सरस्वती 'रोशन', जीवन नाम प्रवाह का, अमृत प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृ. 20


 



Thursday, October 24, 2019

कितना जरूरी है स्मार्ट कक्षा – कक्ष


डॉ. इस्‍पाक अली


डी.लिट वैज्ञानिक अविष्कारों ने मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष एवं क्रिया को प्रभावित किया । इससे हमारी शिक्षा भी अछूती नहीं रह सकीशिक्षण एक सतत प्रक्रिया है। एक शिक्षक अपनी शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए अनेक प्रकार की तकनीकियों का प्रयोग करता है। परंतु एक शिक्षक में सम्प्रेषण कौशल का होना अति आवश्यक है, जिससे वह अपनी पाठ्य वस्तु को छात्रों को प्रभावपूर्ण ढंग से समझा सके। यदि वह शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाना चाहता है तो उसको नवीन तकनीकियों को कक्षा में प्रयोग करता होता है और साथ ही साथ शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए आधुनिक शिक्षण अधिगम तक तकनीकियों का उपयोग भी करता होता । शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाने हेतु कुछ महत्वपूर्ण शिक्षण अधिगम तकनीकियों को अपनाना पड़ता हैवर्तमान में इसमें स्मार्ट कक्षा कक्ष (SMART CLASSES) बहुत ही उपयोगी शिक्षण अधिगम तकनीकी के रूप में उभर कर आया हैं।


आज के प्रतियोगितावादी युग में शिक्षा में गुणवत्ता एक मूल आवश्यकता होती जा रही है। आज तकनीकी मानवीय जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित कर रहा हैभारत में स्मार्ट कक्षा कक्ष एक आधुनिक शिक्षण विधि के रूप में उभर रही है जो छात्रों को गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने में सहयोग प्रदान कर रही है। स्मार्ट कक्षा कक्ष शिक्षण विधि के माध्यम से छात्रों में प्रत्यय निर्माण, प्रत्यय का विस्तावरण, पठन कौशल में सुधार तथा शैक्षिक उपलब्धियों में गुणात्मकता को प्राप्त किया जा सकता है। शिक्षा मैं संप्रेषण के लिए तकनीकी हमारे लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो रही है। प्राचीन समय में छात्र गुरुकुलो में अध्ययन किया करते थे। इन गुरुकुलों में शिक्षकों को गुरुओं द्वारा मुख्यतः – मौखिक ज्ञान प्रदान किया जाता था, परंतु आजकल गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को आधुनिक संस्कृति के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है


वर्तमान भारत में स्मार्ट कक्षा कक्ष को एक नवीन शिक्षण विधि के रूप में अपनाया जाने लगा हैइस स्मार्ट कक्षा कक्ष में आनुदेशनात्कम सामग्री तथा त्रि-आयाम एनीमेशन मोडयूल (3D Animated Module) का उपयोग किया जाने लगा है। आज सभी अच्छे विद्यालय स्मार्ट कक्षा-कक्ष शिक्षण प्रक्रिया को अपना रहे हैं। आज का छात्र इस नवाचार प्रत्यय तथा अंतः क्रियात्मक अधिगम प्रक्रिया को रुचिपूर्वक अपना रहा हैं और ज्ञान को स्थाई रूप प्रदान करने लगा हैं। डिजिटल कक्षा-कक्ष से न केवल शिक्षा को रुचि पूर्ण बनाया जा रहा है बल्कि यह छात्रों के उपलब्धि स्तर में भी निरंतर प्रगति कर रहा हैं। स्मार्ट कक्षा कक्ष वर्तमान शिक्षा प्रणाली का प्रमुख अंग बनाता जा रहा हैस्मार्ट कक्षा कक्ष से शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाया जा रहा है। जिसमें शिक्षक और छात्र अधिक रुचि लेते हैं। आज शिक्षक कक्षा में किसी भी शिक्षण सामग्री के रूप में वास्तविक पदार्थ जैसे शिक्षण सामग्री दिखा सकता हैवह वृहद शिक्षण प्रकरणों को सरलता से कम समय में समझा सकता है। और छात्रों को अधिक स्थाई ज्ञान प्रदान कर सकता है। स्मार्ट कक्षा-कक्ष में सर्वप्रथम 'स्मार्ट' शब्द से अभिप्राय जानना अति आवश्यक हो जाता है। स्मार्ट को अंग्रेजी मे (SMART) लिखा जाता है, जिसमें प्रत्येक अक्षर का अपना एक अर्थ छिपा है जो इस प्रकार है - S = Specified = fallgroo M = Measurable = मापनीय A = Achievable = प्राप्त करने योग्य R = Reliable = विश्वसनीय T = Time restricted = समय पाबंद - स्मार्ट कक्षा-कक्ष एक ऐसी कक्षा है जिसमें एक अनुदेशक विभिन्न प्रकार के तकनीकी यत्रों का उपयोग करके शिक्षण करता है, जिसमें कंप्यूटर तथा उससे संबंधित श्रव्य और दृश्य माध्यमों का उपयोग किया जाता हैस्मार्ट कक्षा में शिक्षक शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए अनेक तकनीकी यंत्रों जैसे, डी.वी.डी. प्ले बैक, पावर पावरपॉइन्ट प्रेजेनटेशन, डेटा प्रोटेक्टर, कंप्यूटर, ऐपीस्कोप, ऐपिडिया स्कोप, टेलिविजन आदि का उपयोग करता है“A smart classroom is a classroom that has an instructor station equipped with computer and audiovisual equipment, allowing the instructor to teach using a wide variety of media. These include DVD and VHS playback, Power point presentation, and more all displayed through a data projector. Some smart classrooms have a semi-permanent unit in the room called a Smart Console. These Smart Consoles have similar equipment housed inside them as the other smart classrooms.” स्मार्ट कक्षा-कक्ष की संरचना :स्मार्ट कक्षा-कक्ष की संरचना में कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी यंत्रों की आवश्यकता होती है, जो इस प्रकार हो सकते – 1) स्मार्ट बोर्ड (Smart Board) 2) ड्राई इरेज़ व्हाइटबोर्ड (Dray Erase White Board), 3) पर्दा (Wall Screen), 4) डिजिटल प्रोजेक्टर (Digital Projector) 5) वी. सी. डी. तथा डी. वी. डी. (VCD&DVD)] 6) वायरलैस माउस तथा पावर पाइंट स्लाइड-शो कंट्रोलर (Wireless Mouse & Powerpoint slideshow controller), 7) चार्ट कंप्यूटर अथवा लैपटॉप कंप्यूटर (Chart Computer and Laptop Computer) 8) डॉक्यूमेंट कैमरा (Document Camera), सामान्यतः स्मार्ट कक्षा-कक्ष में इन तकनीकी यंत्रों का होना आवश्यक है परंतु सामान्यतः कक्षा में केवल स्मार्ट बोर्ड, कंप्यूटर तथा प्रोजेक्टर ही उपलब्ध हो तो भी स्मार्ट कक्षा-कक्ष की अवधारणा को पूर्ण किया जा सकता है। इन उपकरणों के अलावा और भी उपकरण हो सकते हैस्मार्ट बोर्ड (Smart Board) स्मार्ट बोर्ड एक अतंकियात्मक वाइटबोर्ड है जिसका निर्माण Calgary, Alberata-based company SmartTechnologies ने किया हैस्मार्ट बोर्ड एक अंतःक्रियात्मक व्हाइटबोर्ड है, जिससे टच तकनीकी के माध्यम से भी इनपुट दिया जाता है। स्मार्ट बोर्ड पर कक्षा संचालन के लिए एक कंप्यूटर तथा प्रोजेक्टर की अति आवश्यकता होती हैताकि शिक्षक कक्षा के मध्य आवश्यकतानुसार ऑडियो अथवा वीडियो या अन्य शैक्षिक संस्थानों का प्रयोग करके छात्रों को वास्तविक ज्ञान प्रदान कर सके। वैसे तो स्मार्ट बोर्ड अपने आप में भी अनेक विशेषताएं लिए हुए होता है। इस स्मार्ट बोर्ड पर शिक्षक अथवा छात्र अपने हाथ की उंगली से भी लिख सकते हैं तथा मिटा सकते है। फिर भी यह स्मार्ट बोर्ड इतना सॉफ्ट होता है कि यदि किसी भी प्रकार के थोड़ा सख्त पैन का इस बोर्ड पर प्रयोग किया जा सकता है। इस बोर्ड पर छात्र ड्राइंग बना सकते हैं, रेखागणित के अनेक कोण बना सकते हैं, सीधी तथा तिरछी रेखाए आदि खींच सकते हैं स्मार्ट कक्षा कक्ष की विशेषताएं इस प्रकार स्मार्ट कक्षा-कक्ष शिक्षण ज्ञान बांटने, ज्ञान का सूजन करने, ज्ञान प्रदान करने तथा ज्ञान प्राप्त के लिए एक नवाचार है। इसके उपयोग से छात्रों तथा शिक्षकों के कौशलो का सरलता से आकलन किया जा सकता हैस्मार्ट कक्षा-कक्ष की निम्नलिखित विशेषताएं हैं - 1. स्मार्ट कक्षा-कक्ष शिक्षण प्रक्रिया से कक्षा की अवधि कम की जा सकती है , अर्थात इस प्रक्रिया के द्वारा छात्र कम समय में अधिक-से-अधिक पाठ्यवस्तु को गहनता से सीख सकते हैइसमें शिक्षक और छात्र के मध्य अतःक्रिया संभव होती है2. ज्ञान की गहनता के आधार पर यह शिक्षण प्रक्रिया मितव्ययी मानी जाती है। 3. स्मार्ट कक्षा-कक्ष शिक्षण प्रक्रिया से सिखाई गई पाठ्यवस्तु का ज्ञान अधिक समय तक स्थायी होता है। 4. इससे शिक्षक द्वारा प्रदान किए गए लिखित नोट्स को संचित किया जा सकता है5. स्मार्ट कक्षा-कक्ष शिक्षण प्रक्रिया में आवाज को रिकॉर्ड किया जा सकता है जिससे छात्र जब चाहे तब उस रिकॉर्ड आवाज को सुनकर ज्ञान प्राप्त कर सकता है6. स्मार्ट कक्षा-कक्ष शिक्षण प्रक्रिया से शिक्षक छात्रों को विभिन्न प्रकार की वीडियो शिक्षक सामग्री का उपयोग करके शिक्षण कौशलों में विकास कर सकता है। ___7. स्मार्ट कक्षा-कक्ष शिक्षण में शिक्षकों को पाठ्यवस्तु के प्रस्तुतीकरण हेतु विभिन्न प्रकार की तकनीकियों का उपयोग करना होता है, जिससे वह अनेक तकनीकियों के उपयोग को सीख जाता है, उनमें समायोजन करना भी उसे सरलता से आ जाता हैस्मार्ट कक्षा कक्ष की सीमाएं स्मार्ट कक्षा-कक्ष के शिक्षा के क्षेत्र में अनेक लाभ है ,परंतु इसकी कुछ सीमाएं भी है, जैसे - 1. स्मार्ट कक्षा-कक्ष अधिक खर्चीली विधि है, आर्थिक रूप से संपन्न विद्यालय ही इस विधि का उपयोग कर सकते हैं2. जिन विद्यालयों में सरकार द्वारा स्मार्ट कक्षा-कक्ष की व्यवस्था की गई हैविद्यालयों में इस आधुनिक तकनीकी से शिक्षा कराने के लिए योग्य शिक्षक ही नहीं हैऐसी स्थिति में यंत्र मात्र प्रदर्शन का केंद्र बने हुए हैं। ___3. कुछ शहरी विद्यालयों को छोड़कर ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में स्थापित विद्यालयों में स्मार्ट कक्षा-कक्ष के संचालन में बिजली की समस्या एक अभिशाप बनी हुई 4. एक सर्वेक्षण अनुसार यह पाया गया है कि अधिकांश शिक्षक आधुनिक तकनीकी के ज्ञान को प्राप्त करना ही नहीं चाहते बल्कि इस प्रकार के विकास को व्यर्थ ही मानते हैं। 5. अधिकांश विद्यालयों में कंप्यूटर का शिक्षण सुविधा तथा अनुबंधित होता है जो केवल एक या दो वर्ष विद्यालय से सेवानिवृत्त हो जाता हैं। इस प्रकार स्मार्ट कक्षा-कक्ष के संचालन में विद्यालय को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हैइस प्रकार हम देखते हैं कि स्मार्ट कक्षा सीखने के साधनों की योजना तथा व्यवस्था के लिए एक आवश्यक आधार प्रदान करता है। स्मार्ट कक्षा शैक्षिक उद्देश्यों, पाठ्यवस्तु, विधियों, शिक्षण सामग्री, वातावरण, छात्रों का व्यवहार, अनुदेशन का व्यवहार तथा उनके पारस्पारिक संबंध को अधिक प्रभावशाली बनाता है। प्राचार्य लाल बहादुर शिक्षा महाविद्यालय, 113/114, एस. सी. रोड, शेषाद्रिपुरम बेंगलूर-20 म – 9845432221


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भारतीय परिदृष्य में मीडिया में नारी चित्रण / डाॅ0 गीता वर्मा

  डाॅ0 गीता वर्मा एसोसिऐट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, बरेली कालेज, बरेली।    “नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में। पीयूशस्त्रोत ...