Friday, October 25, 2019

दुष्यंत जैसा कौन होगा


                          
सत्यकुमार त्यागी


जीवन में बहुत लोग मिलते हैं बातें होती हैं। सामाजिक होने की सूरत में दायरा अधिक बड़ा होता है। इस जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो मानस पटल पर अंकित हो जाती हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। 
मेरा दुष्यंत से काफ़ी मिलना जुलना था। वो थे ही ऐसे इंसान कि रास्ते चलते आदमी से दोस्ती कर लें। जब भी भोपाल से अपने गाँव राजपुर नवादा आते, तुरंत मेरे लिए बुलावा भेज देते। घंटों सफ़र की कहानी सुनाते रहते, मैं शांत बैठा हाँ हूँ करता रहता। उनके पास पुरानी कार थी।  भोपाल से राजपुर नवादा के सफ़र में जितने भी छोटे बड़े शहर के कार मैकेनिक थे, उस कार ने उनसे दुष्यंत की पक्की दोस्ती करा दी थी। वो उनसे कार ही ठीक नहीं कराते बल्कि उनके घर भी जाते और खाना या चाय पीकर अपना सफ़र आगे बढ़ाते। 
एक बार जब दुष्यंत अपने पिता जी की मृत्यु के पश्चात् गंगा स्नान पर दीपदान करने आए शाम का समय था उनका नौकर मेरे घर आया और फ़रमान सुनाया बाबू जी ने आपको बुलाया है। मुझे ज़रूरी काम से कहीं जाना था परंतु दुष्यंत बुलाए और मैं इंकार कर दूँ ऐसा पहले भी कभी नहीं हुआ था। मैंने काम बाद में निपटाने का मन बनाया और दुष्यंत से मिलने उनके घर पहुँच गया। उस दिन उन्होंने वो गर्म जोशी नहीं दिखाई जिससे वो हर बार मिला करते थे। बल्कि उनके छोटे भाई मुन्नु जी बड़े अदब से मिले और नौकर को पानी लाने को कहा। मेरा माथा ठनका सो मैंने दुष्यंत से पूछा स्वास्थ्य तो ठीक है? दुष्यंत ने हाँ में सिर हिलाया और बोले ''पापा के बाद ज़िम्मेदारी बढ़ गई है। ...माँ जी को देखो सफ़ेद साड़ी में कैसी लग रही हैं। ज़मींदारनी की दशा देखी नहीं जाती आज माँ जी ने कुछ डायरी दी जिनमें हिसाब-किताब लिखा है। आप तो जानते ही हो पापा पैसे का लेन-देन करते थे और सबसे ज़्यादा एक हज़ार रुपए तुम्हारे नाम लिखे हैं?'
मैंने कहा-'हां मैंने अपनी बहन की शादी में लिए थे तुम तो आए ही थे शादी में।'' 
दुष्यंत जी बोले- 'वो तो ठीक है बड़ी रक़म है और कुछ प्रमाण भी नहीं है। इक़रारनामा लिख देते तोकृ...मुझे कुछ यक़ीन हो जाता।'
उनकी यह बात सुनकर मेरा शरीर पसीने-पसीने हो गया था। मैं चारपाई से खड़ा हो गया, सैकड़ों प्रश्न मेरे मन मैं तैरने लगे। जिसकी एक आवाज़ पर मैं हमेशा अपने काम छोड़कर हाज़िर हो जाता हूँ, न जाने कितने ही कामों और विवादों में मैंने साथ दिया है, वो कैसी बातें कर रहा है? ख़ैर मैं बेईमान नहीं था। वक़्त ज़रूरत पर कोई किसी के भी काम आ सकता है। मैंने जवाब दिया ''आप काग़ज़़ तैयार रखना मैं कल सुबह आऊँगा और हस्ताक्षर कर दूँगा।'' कहकर मैं चल दिया।
दुष्यंत ने उस दिन मुझे बैठने को नहीं कहा। उस दिन मुझे अपने घर का रास्ता लंबा नज़र आ रहा था। हज़ारों प्रश्न मेरे सामने खड़े थे और मांगी गई यह मदद अब मुझे कचैट रही थी। मैं मन ही मन बड़बड़ा रहा था- 'ज़मींदारी की ठसक है, आदमी की पहचान नहीं। हम कोई गुलाम हैं क्या? इसके बात करने का सलीक़ा देखो बनते हैं बड़े।' 
मेरा चेहरा उतरा हुआ था रात को ठीक से सो नहीं सका सुबह जल्दी नहा-धोकर दुष्यंत की बैठक पर पहुँच गया नौकर ने मेरे आने की ख़बर दुष्यंत को दी। दुष्यंत हाथ में स्टांप और पैन लेकर घर से बाहर आए और बोले चलो आनंदस्वरूप लाला के यहाँ वो ही लिखेंगे। मुझे फ़रमान सुना दिया गया। हम दोनों लाला जी की बैठक पर पहुँचे लाला जी स्वागत में खड़े हुए, चारपाई सही करते हुए बैठने को कहा। दुष्यंत ने बैठते हुए स्टांप उन्हें सौंप दिया। तभी लाला जी ने अपने बेटे से तीन चाय के लिए कहा। मेरे मन में ग़्ाुस्से का ग़्ाुबार था जिसके लिए न जाने कितनी बार मैंने रातें कुरबान कीं सैकड़ों बार इस आदमी के काम आया आज मेरे साथ कैसा व्यवहार कर रहा है? आज समझ में आया जब लोहा लोहे पर वार करता है तो आवाज़ तेज़ क्यों होती है। जिसे हम अपना समझते रहे वो इतनाकृ... मेरी आँंखें भीग जाना चाहती थीं मगर मैंने हिम्मत करके लाला से कहा आज मुझे कुछ ज़्यादा ही जल्दी है लाओ कहाँ हस्ताक्षर करने हैं मैं कर देता हूँ। और मैंने लगभग काग़ज़़ छीन कर अपने हाथ में लिए, पैन दुष्यंत की जेब से निकाला, लाला जी ने काग़ज़़ पर नीचे की तरफ़ अंगुली से इशारा किया तो मैंने हस्ताक्षर कर दिए और वहाँ से निकल गया। उस दिन दुष्यंत ने मुझे न रोका न टोका लाला जी ने कई बार रोकने का प्रयास किया लेकिन मैंने रुकना ठीक नहीं समझा। मुझे याद है शनिवार का दिन था। कैसे शाम ढली? मैं कभी इधर कभी उधर निराश हताश चक्कर काटता रहा। ग़म हस्ताक्षर का नहीं था, ग़म तो विश्वास का था। बाबू जी ने तो विश्वास पर पैसे दिए, ये तो दोस्त है अरे बड़े लोग होते ही ऐसे हैं। शाम को मैं अपनी बैठक पर चारपाई पर बैठा था, तभी दुष्यंत का नौकर आया और बोला बाबू 'जी ने आपको बुलाया है।' 
मेरा चेहरा ग़्ाुस्से से तमतमा गया। मैंने ज़ोर से कहा- 'मैं नौकर नही हूँ तेरे बाबू जी का, जा कह देना मैं नहीं आता।' 
नौकर बोला- 'बाबू जी ने कहा है ज़रूरत पड़े तो पैर पकड़कर ले आना लेकिन साथ लेकर ही आना।' 
मेरा गुस्सा मानो काफूर हो गया। मेरे मन में अच्छे ख़याल आने लगे। -'अरे वो है ही ऐसा, मेरी परीक्षा ले रहा होगा। चल मैं तेरे साथ चलता हूँ।' 
रास्ते में मैं नौकर से पूछता रहा मेरा क्या ज़िक्र हो रहा था? नौकर ने कहा कि-'मेरे सामने कोई बात नहीं हुई मैं तो घर के काम में लगा था।'
हम दुष्यंत जी की बैठक पर पहुँच कर बैठ गए कुछ देर बाद तीन गिलास पानी आया। मैं चैक गया। मैं अकेला और तीन गिलास पानी? दुष्यंत ज़मींदारी के गुरूर के साथ अपनी सफ़ेद लुंगी ठीक करते हुए बैठक पर आए और नौकर से कहा- 'वैद्य जी को बुलाकर लाओ।' 
वैद्य जी उनके पड़ोसी थे। उनका नाम ओमप्रकाश वैद्यक करने के कारण उन्हें सब वैद्य जी ही कहते थे। 
तुरंत वैद्य जी भी आ गए हम तीनों बैठ गए घर आदि की बातें हुईं दुष्यंत  ने अपना सिगार जलाया। मैंने बीड़ी जलाई और बातें शुरू हुईं। दुष्यंत  बोले 'बताओ वैद्य जी कितने पैसे दोगे इस काग़ज़ के?' 
सुनकर मैं चैंक गया। वही स्टांप था जिस पर मैंने हस्ताक्षर किए थे। वैद्य जी ने 4000 से बोली लगानी शुरू की और 20000 पर सौदा मेरे सामने हो गया। मेरा बदन पसीने से तर हो गया, आँखों के आगे तारे नृत्य करने लगे। 
दुष्यंत ने वैद्य जी से कहा-'जाओ पेशगी ले आओ।' 
वैद्य जी घर जाने के लिए चारपाई से उठे साथ ही मैं भी उठने लगा दुष्यंत ने मेरा हाथ पकड़ कर बैठाया, बोले-'बीड़ी जलाओ।' कहते हुए दुष्यंत ने बताया-'जानता है तूने क्या किया कोरे स्टांप पर हस्ताक्षर, और मैंने तेरी सारी ज़मीन का इक़रारनामा करा लिया अब तू ज़मीन से बेदख़ल, एक हज़ार की जगह दो लाख रुपए लिख दिए और वैद्य जी को दिखा दिया स्टांप वैद्य जी सुबह से मेरे पीछे हैं।'
सुनकर मुझे हंसी आ गई, साथ ही अपनी सोच पर गुस्सा भी। तभी दुष्यंत ने मुस्कुराते हुए कहा- 'ले इससे जला।' और स्टांप के एक कोने को जलाकर मेरे सामने कर दिया।  
तभी वैद्य जी पेशगी के 1000 रुपए लेकर आए और दुष्यंत को देने लगे दुष्यंत ने मेरी ओर इशारा करके कहा 'चालाक है, ये दुष्यंत का साथी है मेरे हाथ से छीनकर जला दिया स्टांप ये देखो राख।' वैद्य जी पर तो मानो वज्रपात हो गया हो। उनकी तो जैसे दुनिया ही लुट गई, दो लाख का माल बीस हज़ार में मिल रहा था, भारी नुकसान हो गया उनका। अब वो मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे मैं कोई खानदानी दुश्मन था उनका।
मैंने शर्म से सिर झुका लिया तो दुष्यंत ने वैद्य जी को सुनाते हुए कहा-'अब सर झुकाता है, सर उठा और गले मिल और वादा कर आज के बाद ज़मीन का कोई सौदा नहीं करेगा। ये ज़मीन पुरखों ने हमें दी है। हम अपने बच्चों को सौंप देंगे।'
आज जब मैं दुष्यंत से किए वादे के अनुसार अपनी ज़मीन की वसीयत अपने पौत्रों अनिरूद्ध 'नमन', निश्चल और स्वर्णिम के नाम करने का मन बना रहा हूँ तो बहुत याद आ रही है दुष्यंत की। 
मुझे खुशी है कि अब अमन और आलोक के सकारात्मक प्रयास से दुष्यंत स्मृति द्वार बन रहा है परंतु असली खुशी तो उस दिन होगी जब उनके खंडहर हो चुके मकान में रौनक़ आएगी।
;लेख श्री सत्यकुमार त्यागी जी से की गई वार्ता पर आधारित, श्री सत्यकुमार जी दुष्यंत के बाल सखा एवं मृत्युर्पंयत अभिन्न मित्र रहे हैं।द्ध


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