Thursday, November 7, 2019

आचार्य ब्रह्मानंद शुक्ल के संस्कृत काव्य  में देश-प्रेम की भावना


निधि


देश-प्रेम की भावना - देश के प्रति लगाव तथा समर्पण का भाव ही 'देशप्रेम' है। वह देश जहाँ हम जन्म लेते हैं, जिसमें निवास करते हैं उसके प्रति अपनापन स्वाभाविक है। एक सच्चा देश प्रेमी अपनी मातृभूमि को अपनी माँ के समान ही प्रेम करता हैं जो व्यक्ति देशप्रेम की भावना से पूर्ण होते हैं वे ही देश की उन्नति में सहायक होते हैं। देश की सुरखा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देना ही सही मायने में देश प्रेम है। देशप्रेम की भावना ही मनुष्य को अपनी मातृभूमि के प्रति कृतज्ञ बनाती हैं किसी भी देश की शक्ति उसमें निवास करने वाले लोग होते है जिस देश के लोगों में देशप्रेम की भावना जितनी अधिक पाई जाती है वह देश उतना ही विकसित एवं उन्नत होता हैं देश प्रेम की भावना एक पवित्र भावना है। देशप्रेम व्यक्ति के हृदय में त्याग और बलिदान की भावना को जाग्रत कर देता है जिससे व्यक्ति अपने प्राणों को त्यागकर भी देश के सम्मान की रक्षा करता है। जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बढ़कर बताया गया है-''जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदापिगरीयसी'' जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। हमारा देश 'अनेकता में एकता' की भावना वाला देश है जिसकी संस्कृति संपूर्ण विश्व में विख्यात है। देश के लिए पूर्णतः समर्पण का भाव रखने वाला व्यक्ति ही सच्चा देशभक्त होता है।
संस्कृत देशभक्त होता है। जिन्होंने देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत काव्य की रचना की है। इन्हीं विद्वानों में से एक आचार्य ब्रह्मानंद शुक्ल जी है जिन्होंने अपने श्री नेहरुचरितम् तथा श्रीगांधिचरितम् में देश-प्रेम को बहुत ही सुंदर ढंग से वर्णित किया है। इनकी ये दोनों संस्कृत रचनाएं राष्ट्रप्रेम या देशप्रेम को समर्पित हैं।
शुक्ल जी ने अपने श्री गांधिचरितम् में देश के चिरकाल तक शोभित होने की कामना की है जो उनके देशप्रेम को बताती है- ''गंगा आदि नदियाँ अमृत के तुल्य दिव्य जल से सदैव जिसको पवित्र करती है, भगवती लक्ष्मी एवं सरस्वती जिसका यश निरंतर गाती रहती हैं, 'भारत' नाम का वह सर्वप्रसिद्ध देश चिरकाल तक ;अपने अनुपम गुणों के द्वाराद्ध शोभित होता रहे।''
अर्थात् भारतवर्ष सदैव अमृत तुल्य जल वाली नदियों से पवित्र होता रहता है इसके यश को भगवती लक्ष्मी व सरस्वती द्वारा गान किया जाता है। भारत देश में प्रत्येक हृदय देशप्रेम के भाव से भरा हुआ है। इसी के का यह भारतदेश सर्वप्रसिद्ध है।
शुक्ल जी एक अन्य स्थान पर यह बताते हैं कि किस प्रकार देशप्रेम के कारण गांधी जी की माता उन्हें देश में ही रहकर विधा प्राप्त करने को कहती हैं- ''माता ;गांधी जी कीद्ध ने कहा- बेटा ;गांधी जीद्ध! तुम यह निश्चित रूप से समझ लो कि आचारहीन मनुष्यों के जीवन को पवित्र करने के लिए वेद भ्ीा समर्थ नहीं हैं इसलिए जिस देश की प्रत्येक पद पर देवता भी प्रतिष्ठा करते हैं उसी वंदनीय अपने देश में रहकर विद्या प्राप्त करें।''
यहाँ गांधी जी की माता अपने देश प्रेम के वशीभूत है तथा अपन देश की प्रतिष्ठा का उपदेश देते हुए अपने पुत्र को विदेश जाने के बजाय अपने देश में ही रहकर विद्या ग्रहण करने को कहती हैं उनको यही डर है कि कहीं देश से दूर रहकर उनका पुत्र आचारहीनता से ग्रसित न हो जाए।
शुक्ल जी श्रीगांधिचरितम् में बताते हैं कि गांधी जी अपने देश को पीड़ा से मुक्त कराना चाहते है। यहाँ उनका देशप्रेम झलकता है- ''बालक मोहन ने पुनः विचार किया-मैं अपने जीवन को यथार्थ जीवन बनाने के लिए ही निश्चित रूप से स्थिर प्रतिष्ठा होऊंगा और दरिद्रता दासत्व आदि से पीड़ित हुए अपने देश की मुक्ति का कारण बनूंगा।''
गांधी जी के हृदय में उनका जो देश प्रेम समाहित था उसी के कारण उनके हृदय अपने देशवासियों की दासना से द्रवीभूत हो गया तथा उन्हें यह निश्चय किया कि वे अपने देशवासियों को दरिद्रता, दासत्व आदि को पीड़ा से मुक्त करायेंगे।
आचार्य जी ने श्री गांधिचरितम् में इस श्लोक में भी देशप्रेम व्यक्त किया है- ''प्रार्थना करते हुए बालक ने कहा-भगवन्! दूसरों के सन्ताप को देखकर दुःख दूर करने के लिए मेरी बुद्धि धर्ममयी बनी रहे और मेरा मन अपने प्राण देकर भी दूसरों का दुःख दूर करने में अधिक सहानुभूति से परिपूर्ण रहे।''
अर्थात् शुक्ल जी ने अपने काव्य में गांधी जी के माध्यम से यह बताया है कि उनके मन में देशवासियों एवं देश के प्रति इतना अधिक प्रेम विद्यमान था कि प्रेम के कारण भगवान से यह प्रार्थना करने लगे कि अपने देश में रहने वाले लोगों के कष्टों को देखकर मैं उन्हें दूर करता रहूं, मेरी बुद्धि सदैव धर्म के कार्यों में लगी रहे, प्राणों को त्यागकर भी मैं दूसरों का हित करता रहूँ। उनके ये भाव देश के प्रति उनके प्रेम के द्योतक है।
आचार्य शुक्ल जी ने यहाँ भी मातृभूमि को माता बताकर देशप्रेम का परिचय दिया है- ''बहुत काल से चित्त में धारण की गई सत्पुरुषों से वंदनीय अपनी माता की भांति स्वदेश भूमि को प्रसन्नता युक्त नेत्रों से देखकर सिर झुकाकर मोहनदास ने प्रणाम किया।''
शुक्त जी बताते है कि विदेश जाने पर भी गांधी जी ने अपने हृदय से देशप्रेम को कम नहीं होने दिया। अपने इस भारतभूमि को जो कि सत्पुरुषों द्वारा वंदना किए जाने योग्य है अपने चित्त में धारण किए रहे और जब वह भारतभूमि या स्वदेशभूमि पर वापस आए तो माता के समान इसको प्रसन्नतापूर्वक देखा और अपनी मातृभूमि को सिर झुकाकर प्रणाम किया, ठीक उसी प्रकार जैसे कोई पुत्र अपनी माता को देखकर प्रसन्नचिन्त्त होकर उनका आशीर्वाद लेता है। ये सारी भावनाएँ किसी देशप्रेमी के हदय में ही हो सकती है। 
आचार्य ब्राह्मानंद जी के श्री मान्थिचरितम् में ही- '' वहाँ दक्षिण अफ्रीका में ;गांधी जीद्ध गए, और भारतीय जनों की उस दुर्दशा को देखकर अत्यंत संतप्त हुए। गौरांग लोगों ने पैरों की ठोकर लगाई किंतु वह अपने कर्तव्यपथ से विचलित नहीं हुआ।''
देशप्रेम को व्यक्त करते हुए शुक्त जी लिखते हैं-कि जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका गए थे तब वहाँ उन्होंने अपने देश के लोगों को बहुत ही बुरी हालत में देखा। वहाँ भारतीयों की बड़ी दुर्दशा थी जिसको देखकर गांधी जी का मन अत्यंत दुःखी हुआ। विदेशियों के अत्याचारों के सामने भी उन्होंने हार नहीं मानी। अपने हृदय में देशप्रेम की भावना के साथ वे कर्तव्यपथ पर चलते रहे।
विदेशियों के द्वारा अपने देशवासियों को तिरस्कृत हुआ देख गांधी जी को बहुत बेद हुआ। उनका मन अत्यंत विचलित सा हो गया। अपने बंधुओं के अपार दुःख को वे देख नहीं पा रहे थे और वे ये सोचने लगे कि मैं किस प्रकार अपने भाइयों के संताप को दूर करूँ।
शुक्त जी ने देशप्रेम के लिए प्राणों की बलि देकर भी देश सेवा की की बात श्रीगांधिचरितम् में कही है- ''अतः मैंने ;गांधी जीद्ध यही निश्चय किया है कि अपने प्राणों की बलि देकर भी इनकी सेवा कयंगा, इनके कष्टों को दूर करने के लिए मैं ;गांधी जीद्ध सेवा रूपी बंडग्धार ;पर चलनेद्ध का व्रत लूंगा।''
''गोरे और कालेधन से उत्पन्न किया हुआ भय यहाँ कैसा, सभी में- हम लोगों में और इनमें ;विदेशियोंद्ध आत्मा तो एक ही है। न वह काला है न गोरा। काला गोरापन तो शरीर का धर्म है। मैं ;गांधीद्ध अहिंसा और सत्य के बल से इन भारतीयों के संताप को अश्व ही दूर करूंगा। यह मेरा दृढ़ विश्वास है। आत्मा की पुकार है।''
इन श्लोकों में गांधी जी के देश प्रेम को बताया गया है- गांधी जी अपने देश व देश के नागरिकों के प्रति अगाध प्रेम रखते थे। वे देश सेवा के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करते और देश की सेवा करते हुए लोगों के कष्टों को दूर करने का प्रयास करते।
गांधी जी सभी मनुष्यों में एक ही आत्मा का वास मानते थे। इस कारण जब विदेशी लोग भारतवासियों को काला कहकर उनके साथ बुरा व्यवहार करते थे तो गांधी जी का मन बहुत दुःखी होता था। तब उन्होंने यह संकल्प लिया कि मैं सत्य और अहिंसा से इन भारतीयों के कष्टों को अवश्य दूर करूंगा।
श्री गांधिचरितम् के एक श्लोक में आचार्य ब्रह्मानंद जी प्रेम भाव से रहित लोगों के जीवन की निरर्थकता के विषय में कहते हैं-
''जो मनुष्य संपूर्ण जीवों की प्रेम-भाव से सेवा नहीं करता उस मनुष्य का 'धौंकनी' के समान फूले हुए आकार से या पृथ्वी पर निंदित जन्म लेने से ही क्या लाभ है?''
अर्थात् देश के सभी लोगों को आपस में प्रेम एवं सहानुभूति के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए। प्रेमभाव से दुःखी और असाहय लोगों की सेवा करनी चाहिए। क्योंकि देश के साथ प्रेम करना तथा देशवासियों की सेवा करना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है। जो लोग दूसरों के प्रति प्रेम और सेवा का भाव नहीं रखते पृथ्वी पर उनका जन्म लेना निन्दित अर्थात् निरर्थक ही है। उनके ऐसा जन्म लेने से क्या लाभ?
आचार्य ब्रह्मानंद शुक्ल जी ने अपने श्री गान्धिचरितम् ;संस्कृत, खंडकाव्यद्ध में देशप्रेम का अत्यंत हृदयस्पर्शी वर्णन किया है। इनका काव्य देशप्रेम की भावना से भर पड़ा है। 'श्रीगांधिचरितम्' की भांति ही इन्होंने अपने ''श्रीनेहरूचरितम्'' ;संस्कृत महाकाव्यद्ध में भी देशप्रेम की भावना को जन-जन तक पहुंचाया एवं उन्हें देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने लिए जाग्रत भी किया है।
शुक्ल जी के काव्य ''श्रीनेहरूचरितम्'' का यह श्लोक देशप्रेम के भाव को व्यक्त करता है- ''वात्सलयातिशय से युक्त होने पर भी पिता ;नेहरू केद्ध इसकी ;नेहरू कीद्ध 'भारतरत्न' की बुद्धि से ही रक्षा करते थे। 'यह मेरा बेटा है' इस प्रकार का मोह होने पर भी वे मन में उसे समस्त संसार के कल्याण के लिए ;हीद्ध उत्पन्न मानते थे।''
अर्थात् यहाँ देशप्रेम के विषय में शुक्ल जी ने लिखा है- कि नेहरू जी के पिता अपेन देश भारतवर्ष से अत्यधिक प्रेम करते थे उनके देशप्रेम के आगे उनका पुत्र-प्रेम कमतर ही रहता था वे पुत्र को प्रेम अवश्य करते थे परंतु उसको देश के कल्याण के लिए उत्पन्न मानते थे और इसी कारण अपने पुत्र की एक भारत-रत्न के समान ही रक्षा करते थे।
शुक्ल जी कहते है इस देशप्रेम के कारण ही नेहरू जी के पिता सोचते थे- ''जैसे सर्वेश्वर भगवान ;श्रीकृष्णचन्द्रद्ध ने वासुदेव के घर जन्म लेकर संसार के संताप का हरण किया था वैसे ही भारत की दीनता एवं पराधीनता का हरण करने के लिए यह योगी मेरे घर में अवतीर्ण हुआ है।''
अर्थात् नेहरू जी के पिता नेहरू जी को भगवान श्री कृष्ण की तरह भारत भूमि के कल्याण के लिए जन्म लेने वाला एक अवतार मानते थे, जो अपनी सेवा से भारत भूमि के प्रत्येक मनुष्य की दीनता एवं पराधीनता को, जिसका कारण समस्त भारतभूमि दुःखी थी, समाप्त कर देगा।
आचार्य शुक्ल जी ने 'श्रीनेहरूचरितम्' में बताया है कि नेहरू जी के पिता गांधी जी द्वारा स्वीकार किय ेगए अहिंसा के मार्ग ही उचित मानते थे ही मार्ग चुनने को कहा- ''सत्य से तथा अत्यध्किा परिश्रम से हिंसा के प्रयोग के बिना भी सफलता मिल सकती है। उन महात्मा गांधी ने आज सफलता के हेतु इस ;अहिंसारूपद्ध उपाय को देखलिया है और सही समझा है। बेटे! तुम भी यह समझ ली।''
अर्थात् यहाँ बताया गया है कि भारतभूमि से प्रेम करने वाले महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता रूपी सफलता को पाने के लिए अहिंसा के मार्ग को अपनाया। नेहरू जी के पिता नेहरू जी को भी इसी मार्ग पर चलकर देश सेवा करने का उपदेश किया और इसे ही स्वतंत्रता रूप लक्ष्य प्राप्ति का हेतु बताया।
शुक्ल जी राष्ट्र सेवा को सर्वोपरि बताते है- ''राष्ट्र की सेवा का व्रत असि-धारा ;पर चलनेद्ध के समान है'' यह चित्त में सावधनतापूर्वक समझना चाहिए। बेटे! हम लोगों की अभिलाषा को पूर्ण करेा यह मेरी बहुत बउ़ी सेवा होगी।''
यहाँ शुक्ल जी ने बताया है कि राष्ट्र की सेवा में स्वयं को समर्पित कर देना ये कार्य आसान नहीं है। देश-प्रेम और देश की सेवा करने का भाव सभी के हृदय में रहता है परंतु इस भाव के लिए जीवन को समर्पित कर देन ये सभी नहीं कर पाते इसीलिए देश की सेवा को तलवार की धार तथा इसका पालन करना तलवार की धार पर चलने के जैसा मुश्किल कार्य है। फिर भी नेहय जी के पिता यही चाहते थे कि उनका बेटा इस सेवा भाव को ग्रहण करे। अपने देश, अपने राष्ट्र से प्रेम करे और यदि वह अपने पिता के लिए कुछ करना ही चाहता हो तो राष्ट्र की सेवा करे यही उनके लिए उसकी ;नेहरू कीद्ध सबसे बड़ी सेवा होगी। और इस तरह नेहरू जी अपने पिता की अभिलाषा पूर्ण कर सकेंगे।
शुक्ल जी श्रीनेहरूचरितम् में आगे बताते हैं देश के अनेक रत्नों ने स्वतंत्रता के लिए कार्य किए है- ''इससे पहले से ही अनेक देश-रत्नों ने ;स्वातंत्रय-संघर्ष काद्ध मार्ग प्रशस्त कर रखा हैऋ उसमें तम ;नेहरूद्ध अपनी शक्ति से गति लाकर ;लोकद्ध सेवा में जुट जाओ।''
अर्थात् शुक्ल जी ने बताया है कि देश प्रेम के कारण अनेक देशप्रेमियों ने स्वतंत्रय संघर्ष के मार्ग को सभी देशवासियों के लिए बनाया है जिस मार्ग पर चलकर स्वतंत्रता को प्राप्त किया जा सके। जिस मार्ग पर चलकर देश-सेवा की जा सकती है।
शुक्ल जी बताते है कि अपने पिता से देश प्रेम की बाते सुनकर नेहरू जी ने निश्चय किया है कि वे अपने देश की सेवा करेंगे- ''उनकी ;पिता कीद्ध युक्ति-युक्त वाणी सुनकर देश-सेवा का व्रत अपने मन में धारण करके उन्होंने कर्तव्य-कर्म की पूर्ति के लिए, शांतिपूर्वक, विचार को स्थिर किया।''
शुक्ल जी अपने नेहरूचरितम् में आगे लिखते हैं कि किस प्रकार पुत्र को देश के प्रति समर्पित देखकर नेहरू जी की माता ने भी उन्हें ;नेहरूद्ध अपना आशीर्वाद दिया- '';परंतुद्ध पुत्र को देश-सेवा करने के लिए दृढ़ जानकर सुप स्नेह के वंशीभूत होने पर भी उन्होंने जैसे-तैसे ;अपनी सवीकृति दी।''
नेहरू जी की माता पहले पुत्र स्नेह के कारण यही चाहती थी कि विदेश से पढ़ाई समाप्त करके लौटा उनका पुत्र कुछ समय सुखपूर्वक रहे। परंतु जब उन्होंने नेहरू जी के देश-प्रेम के प्रति दृढ़ भावों को अनुभव किया फिर वे अपने पुत्र को देश-सेवा के लिए आशीर्वाद देने से रोक न सकी।
अर्थात् उपर्युक्त विवेचन से यह ज्ञात होता है कि आचार्य ब्रह्मानंद शुक्ल जी का काव्य देश-प्रेम के भावों से परिपूर्ण है। उनके महाकाव्य-''श्रीनेहरूचरितम्'' और खंडकाव्य ''श्रीगांधिचरितम्'' दोनों में ही देश-प्रेम के भाव कूट-कूट कर भरे हुए है। शुक्ल जी का संस्कृत काव्य देश-प्रेम को जाग्रत करने में पूर्णतः समर्थ है।
अतः हम कह सकते हे कि शुक्ल जी का संस्कृत काव्य देश-प्रेम की उदात्त भावना से युक्त है।
सन्दर्भ सूची-
1. आचार्य ब्रह्मानंद शुक्ल - श्रीगांधिचरितम्, श्लोक सं.-1
2. श्रीगांधिचरितम्, श्लोक सं.-23
3. वही - श्लोक सं. - 34
4. वही - श्लोक सं. - 36
5. वही - श्लोक सं. - 44
6. वही - श्लोक सं. - 56
7. वही - श्लोक सं. - 59
8. वही - श्लोक सं. - 60
9. वही - श्लोक सं. - 61
10. वही - श्लोक सं. - 62
11. आचार्य ब्रह्मानंद शुक्ल, श्रीनेहरूचरितम्-5/11
12. श्रीनेहरूचरितम् - 5/12
13. वही - 8/33
14. वही - 8/35
15. वही - 8/38
16. वही - 8/39
17. वही - 8/42


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