Monday, November 11, 2019

दोहे मेरे गाँव के


इंद्रदेव शर्मा 'भारती'


 



जित देखूँ उत ही दिखै, गाँव-गाँव अंधियार
उमर बिताई ढूँढते, दिनकर सा उजियार


धनवानों के शीष पै, महल-दुमैली छाँव
ऊपर नभ, नीचै धरा, निर्धनिया की ठाँव


लिखी हवेली साहू को, लिखे खेत और बाग
पर कच्चा कोठा लिखा, क्यों होरी के भाग


हारे की हंडिया कढ़ा, दूध पियै गुड़ संग
मखना वाले छाछ में, दिखंै गाँव के रंग


धूल उड़ि गौधूलि की, गईयन लौटें धाम
दिये जलैं हर द्वार पै, गाँवन उतरी शाम


बैठ जुगाली कर रहे, गाय, भैंस और बैल
भजन-आरती गाये हैं, गाँवन की खपरैल


दाता कच्ची कोठरी, निर्धनिया के नाम
पक्के कोठे लिख दिये, मुखियाओं के नाम


पेड़ माँगने लग गये, बादल जी सै छाँव
अब तो बरसो राम जी, पड़ैं तुम्हारे पाँव


चूल्हे सुलगैं शाम के, लकड़ी करतीं बात
चकला-बेलन बाजते, नाचैं तवा-परात


तवे बगड़ की रोटियाँ, हाँडी खदकै साग
जीरे, मिरचा, हींग का, छौंक लगावै आग


ढोलक, ढपली, बाँसुरी, खो गयी रे खड़ताल
आल्हा गूँजैं थे जहाँ, दिखैं न वो चैपाल


कली खिलै कचनार की, मादक जिसकी गंध
स्वाद कसैला होय है, होय बड़ी गुणवंत


होरी, धनिया, गोबरा, साहू, जुम्मन शेख
देख सकै तो गाँव को, दाता इनमें देख


हरुआ काँधे पै सजै, हाथन हँसिया होय
सर्दी, गर्मी, बारिशें, अन्न किसनवा बोय


राजा खेतन के चलैं, भयी धरा पै भोर
रानी घुँघटा काढ़ि कै, खड़ी द्वार को मोड़


बैलिन हल सै खोलि कै, अमुआ नीचै बाँध
सानी-पानी रख दियो, माटी वाली नाँद


धर कतनी मैं रोटियाँ, गंठी और अचार
रानी लावै छाछ संग, गुड़ की डलियाँ चार


हरुआ गावै खेत मैं, हँसिया देवै ताल
भरी दुपहरी नाचती, पीपल वाली डाल


बैठ मुंडासे, पगड़ियाँ, टोपिन के संग-साथ
हुक्के गुड़-गुड़ कर रहे, परधानी की बात


गाँवों में चैपाल पर, बजै ढोल-खड़ताल
कहीं बजै है बाँसुरी, कहीं घड़े पै ताल



ए-3, आदर्श नगर, नजीबाबाद-246763 (बिजनौर) उप्र


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