Thursday, November 7, 2019

एक टुकड़ा ज़मीन दो टुकड़े भूख


आलोक कुमार



हैलो सेठ जी, राम-राम!
मोबाइल की घंटी बजते ही सुभाष ने मोबाइल की स्क्रीन पर देखा। वह मुस्कुराया और फिर स्पीकर आॅन कर अपने कान से लगा लिया। 
-'राम-राम प्रधान जी।' उधर से आवाज़ आई।
-'कैसे हैं सेठ जी? कहो कैसे याद किया।' सुभाष ने मुन्नू की ओर देखते हुए पूछा।
-'प्रधान जी! हम तो अनीता से बहुत दुःखी हो गए हैं।' उधर से आई आवाज़ को सुनकर मुन्नू घबरा गया। उसके हाथ में थमा फावड़ा छूटकर ज़मीन पर गिर गया और पलक झपकते ही उसका पूरा अस्तित्व सर्दी के बावजूद पसीना-पसीना हो गया। आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा तो वह ज़मीन पर बैठ गया और अपने दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया।
-'बात क्या है? सेठ जी!' सुभाष प्रधान ने मुन्नू पर ध्यान दिए बिना ही पूछा। जबकि हालत ख़राब होने के बावजूद मुन्नू के कान फ़ोन से आती आवाज़ पर ही लगे रहे।
-'बात क्या है? कुछ बताने लायक़ भी नहीं है। अनीता से बहुत कहते हैं कि सुबह को सब के साथ बैठकर चाय पी लिया कर मगर नहीं मानती।' उधर से कहा गया।
-'इसमें नाराज़गी की क्या बात है? जब मन होगा पी लेगी, हम समझा देंगे।' सुभाष ने समझाने का प्रयास किया।
-'लो भाई तुम ही बात कर लो!' उधर से आवाज़ आई और फिर कुछ देर के बाद एक महिला बोली 'नमस्ते भैया जी! कैसे हैं?'
-'मैं ठीक हूँ, तू सुना।'
-'सब ठीक हैं, सब लोग बहुत प्यार करते हैं।
-'फिर सुबह को चाय क्यों नहीं पीती है?'
-'अरे वो बस ऐसे ही।'
-'ले मुन्नू से बात करेगी?'
-'करा दो।
अब तक मुन्नू अपने आपको संभाल चुका था। सुभाष के फ़ोन आगे करते ही उसने ले लिया और कान से लगाते ही बोला- 'मौसा जी शिकायत कर रहे हैं, तू चाय पी लिया कर बहन।'
-'तूने पी?'
-'नहीं, सुबह जल्दी उठकर खेत में आ गया था।'
-'भाई भूखा रहे और बहन आनंद ले, ऐसा कैसे हो सकता है?' कहते हुए अनीता का गला रुंध गया था। 
सुनकर मुन्नू कुछ बोलना चाहता था परंतु उसके होंठ फड़फड़ाकर रह गए थे।
कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद प्रधान जी तो चले गए मगर मुन्नू अपने खेत के गन्ने के समान सीधा खड़ा रहा। 
तभी मगन वहाँ आ गया। सुभाष को राम-राम कहते हुए वह बोला-'भैया गन्ने का पैसा कब तक बैंक में आएगा?'
-'अब क्या पता? मिल वाले तो देना ही नहीं चाह रहे हैं।' सुभाष ने लाचारी से जवाब दिया।
-'सरकार तो कह रही है कि वो किसानों का हित कर रही है, मगर क्या हित हो रहा है? मगन ने ग़्ाुस्से से कहा था।
-'सरकार तब तक किसानों का कोई हित नहीं कर सकती है जब तक किसानों को वाजिब क़ीमत दिलाने के लिए सरकार के पास एक ठोस व्यवस्था नहीं होती।' सुभाष ने मगन को समझाने का प्रयास किया।
-'भैया मुझे तो लगता है कि सरकार किसान की आय दोगुनी कर रही है और भूख चार गुनी।' मगन ने निराश होकर कहा-'अबकी बार अगर फ़सल का अच्छा दाम नहीं मिला तो क़र्ज़ा पहाड़ हो जाएगा।'
सुभाष मगन की पीड़ा को समझ गया था। उसने दो साल पहले क़र्ज़ा लेकर अपनी बेटी का विवाह किया था। पिछले साल का पेमेंट अभी तक नहीं आया मगर कर्ज़े के ब्याज़ में कोई कटौती नहीं हुई अगर ऐसे ही लेट होता रहा तो यह सच है कि साहूकार का ब्याज़ दिन दोगुना रात चैगुना होता रहेगा। मगर मगन भी तो लापरवाह था। वह न तो समय पर खेत जोतता और न ही समय पर पानी देता, बस कँुवर साहबी में पड़ा रहता, वो तो अच्छा था कि ज़मीन काफ़ी है गुज़ारा चल रहा है।
सुभाष ने आख़िर कह ही दिया- 'जो किसान समय पर खेत जोतता है, समय पर बोता है और समय पर काटता है उसकी फ़सल सदैव ही सुखकारी होती है।'
मगन को जैसे करंट लगा हो। उसने पूछा-'कहने का मतलब क्या है तुम्हारा?' 
-'मेरी पत्नी की बीमारी के कारण ध्यान नहीं दिया और फ़सल कमज़ोर रह गई थी।' सुभाष ने बात घुमाते हुए कहा-'मुन्नू ने साधन न होते हुए भी समय पर अपनी ज़मीन जोती, समय पर गन्ना बोया और समय पर पानी देता है तो कितना अच्छा गन्ना हो गया है? भईया जिसका कोई नहीं उसका भगवान होता है।'
मगन ने मुँह बनाया और वहाँ से चलता बना तो सुभाष ने भी अपने घर की राह ली।
वह जाड़े की हाड़ कँपा देने वाली सुबह थी। मुन्नू अपनी फटी हुई कमीज़ और पाजामे को एक फटी हुई चादर से ढकने का असफल प्रयास करते हुए अपने खेत को निहार रहा था। लंबे और रसीले गन्ने को देख वह फूला नहीं समा रहा था। उसकी टुकड़ा भर ज़मीन गन्ने रूपी गहनों से लदी थी। गन्ने की एक-एक पंक्ति साफ़ नज़र आ रही थी। व्यवस्थित ढंग से बँधा गन्ना मानो किसी खेत में नहीं बल्कि माॅल में सजाया गया हो। मुन्नू अपने खेत को निहारते हुए शरीर को चीरने वाली हवा के झोके से उड़ती हुई चादर लपेटता हुआ गन्ने के पेड़ों की गोद में बैठ गया। गन्ने की सूखी पत्तियों के बिछौने पर उसे आराम मिला तो न जाने कब वह अतीत की यादों में खो गया।
पिछले वर्ष जब वह निराई करने आया था तो उसकी माँ रोटी लेकर आई थी। आम के पेड़ के नीचे खेत के किनारे बैठे सुगन के बदन का पसीना अपनी धोती के पल्लु से पोछते हुए माँ ने ढेरों आशीर्वाद देते हुए कहा था- -'बेटा ज़मीन किसान का गहना होता है, तेरे पिता ने ये एक टुकड़ा ज़मीन एक-एक पाई जोड़ कर ख़रीदी है। इसे बेच मत देना।'
-'नहीं माँ, देख नहीं रही कितनी मेहनत करता हूँ मैं।' मुन्नू ने कहा तो मैं जैसे निहाल हो गई। वह उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोली-'बेटे! ये सोना देती है, पेट पालती है, अब करना ही क्या है बस गीता की शादी तो करनी है। हो जाएगी राज करेगी तेरी बहना तेरे पिता जी ने किसी का दिल नहीं दुखाया। भूखे रहे पर किसी पड़ौसी को भनक नहीं लगने दी। अब तो मौज के दिन हैं बेटे।'
शीत लहर का एक झोका मुन्नू को यादों के समुद्र से बाहर ले आया। वह सोच रहा था, 'इस बार एक फ़ोन ज़रूर लूँगा अनीता का फ़ोन सुनने के लिए प्रधान के घर जाना पड़ता है।' परंतु अगले ही पल वह खुशी से खड़ा हो गया। उसके मस्तिष्क में आया- 'नहीं, फ़ोन के बिना तो काम चल रहा है। अनीता ने यदि बेटे को जन्म दिया तो उसके लिए पालना, कपड़े, मिठाई भी तो ख़रीदनी पड़ेंगी। मैं पैसा बचाकर रखूँगा। पड़ोस के अशोक की बहन के जब बेटा हुआ तो उसने कितना सामान दिया था? मैं कुछ तो दूँगा ही। मास्टर जी के पैसे भी चुकता कर दूँगा। पता नहीं कब ज़रूरत पड़ जाए?  ... अरे मैं तो भूल ही गया एक रज़ाई भी बनानी है, भाई भानजा जब गाँव आएगा तो किससे माँगूगा?' 
ढेरों प्रश्न और उनके उत्तरों की शृंखला के बीच समय कब गुज़र गया पता ही नहीं चला। उसने फुर्ती से खेत की डोल पर खड़ी घास काटी फिर दो गन्ने खाए पेट पर हाथ फिराया, गोया सुबह-सुबह किसी पंचसितारा होटल में बेहतरीन सूप पी लिया हो। उसे खेत पर काफ़ी देर हो गई थी। उसने गन्ने की डांडी भी घास के साथ बाँधी और सिर पर रखकर चल दिया। 
मुन्नू ने खेत से घर की ओर यह सोचकर क़दम बढ़ाए कि रसोई का भी तो इंतज़ाम करना है। कल विरेन्द्र के घर आलू के पराठे बने थे क्यों न आज मैं भी पराठे बनाऊँ? आँगन में खड़े आलू ही खोदूँगा कुछ तो निकलेगा। भई वाह गर्मा-गर्म पराठे क्या कहने पर मैं बनाऊँगा कैसे? फिर मन को समझाया- 'अरे हो जाएगा।' 
मुन्नू घर लौटा तो पड़ोसी बिरजू और उसकी पत्नी मुन्नू के घर बैठे हैं। मुन्नू ने पूछा-'अरे आज मेरे घर कैसे? मुझे बुला लिया होता।'
मगन की पत्नी बोली -'हमने देखा आज तो मुन्नू का चूल्हा सूना पड़ा है चलो हाल-चाल पूछ लें कुछ खाया या नहीं?'
मुन्नू ने कह दिया-'चाची खेत में गया था जंगली जानवर नुकसान कर रहे हैं।' बस वहीं देर हो गई।
-'क्यों इतनी मेहनत करता है तू, अकेली जान है।' मगन की पत्नी ने हमदर्दी दिखाई।
-'क्या करूँ चाची? मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। मेहनत नहीं करूँगा तो खाऊँगा क्या?' मुन्नू ने जवाब दिया।
-'एक पेट के लिए इतनी मेहनत?'
-'पेट तो एक ही है, पर भूख तो दो टुकड़े लगती है और ज़मीन कितनी है मेरे पास? मात्र एक ही टुकड़ा है। अब इसमें मेहनत नहीं करूँगा तो भूखा ही रहना होगा।' मुन्नू ने चिंता व्यक्त की। 
-कहीं नौकरी भी तो कर सकता है? ऐसे तो तेरा ब्याह भी होने से रहा, कौन करेगा दो बीघा ज़मीन पर तेरा ब्याह। हो भी गया तो क्या खिलाएगा अपनी पत्नी को?
-'नौकरी!'  मुन्नू ने विस्मय से कहा-'कौन देगा नौकरी? और कहीं कर भी ली तो इतना ख़ून कहाँ बचा है मेरी देह में कि कोई चूस सके।'
-'पहले भी तो करता था कहीं नौकरी, तो अब क्या बुराई है?'
-'चाची तू बड़ी भोली है।' मुन्नू ने समझाने का प्रयास करते हुए कहा-'जिस कंपनी में करता था, वह पैसे कम देते थे और काम अधिक लेते थे। जब मज़दूरी बढ़ाने की बात कहो तो नौकरी से निकालने की धौंस दी जाती थी। अब तू ही बता, सौ का काम दस में कैसे हो सकता है? मगर ये कंपनी वाले करते हैं ऐसा चमत्कार।'
-'पढ़ लेता तो कोई काम कर लेता। अभी तो पढ़ने की उमर है तेरी।' चाची ने पुनः समझाने का प्रयास किया तो मुन्नू ने विवशता जाहिर कर दी-'चाची! अब क्या मन लगेगा पढाई में? और फिर पढ़ने के लिए जितनी मेहनत करनी पड़ेगी उतनी ही मेहनत में खेत पेट भरने लगेगा।'
-'गन्ने में आख़िर मिलेगा ही कितना और जो मिलेगा वह भी कब मिलेगा कौन जानता है? जब तक चीनी मिल पैसा देते हैं उससे अधिक तो क़र्ज़ा हो जाता है।'
-'मैं क़र्ज़ा नहीं लूँगा चाची! जो है उसी में गुज़ारा करूँगा और अगले साल कुछ खेत ठेके पर लेकर खेती बढाऊँगा।'
तभी वहाँ अशोक आ जाता है और वह बताता है कि गन्ने का पैसा आने लगा है। यह जानकारी पाकर चाची बेहद खुश हो जाती है। उसके मुँह से अनायास ही निकलता है-'चलो कर्ज़े से मुक्ति मिलेगी।'
-'एक मदद मेरी भी करना चाची।' मुन्नू ने चाची के खिलते चेहरे की ओर देखते हुए कहा।
-'क्या?'
-'चाचा से कहकर अबकी बार दो बीघे ज़मीन मुझे ठेके पर दिला देना। मेरी पर्ची का पैसा तुम ले लेना एडवांस। मेरा क्या है? मैं तो गाय का दूध बेचकर भी अपना काम चला लूँगा।' मुन्नू ने कहा तो चाची ने सहमती में सिर हिलाया और वहाँ से चली गई।


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