लौटे हुए मुसाफिर: एक अंतहीन विभाजन



मधुबाला पाण्डेय
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भारत- पाकिस्तान विभाजन की समस्या को लेकर हिंदी कथा साहित्य में ढेर सारे उपन्यास और कहानियाँ लिखी गई है। इस समस्या के विषय की समानता होने पर भी 'लौटे हुए मुसाफिर' उपन्यास की यह विशेषता है कि इसमें यथार्थवादी दृष्टि से समस्याओं के जड़ से लेकर अंत तक का चित्रण किया गया है। कमलेश्वर ने मुख्यतः मध्यमवर्गीय जीवन के यथार्थ को अपने साहित्य में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। उनके साहित्य में रूढियों के प्रति तिरस्कार एवं विद्रोह, प्रगतिशीलता एवं नवीन मूल्यों के आग्रह का सशक्त स्वर मिलता है।
विभाजन को विषय बनाकर लिखे गए उनके साहित्य में मानवीय संबंधों में पनपते शक, नफरत, अलगाव, तथा टूटते मानवीय मूल्यों, आस्थाओं की छटपटाहट और आकुलता तो है ही, साथ ही विभाजन के कारण मानव जीवन में उत्पन्न विडम्बना पूर्ण स्थितियों का मर्मस्पर्शी चित्रण भी है। विभाजन के दौरान, एहसास में निरंतर आनेवाली कमी को, जिसने मानवीय संबंधों में दरार और उलझनें पैदा की, उसी एहसास का चित्रण उन्होने अपने साहित्य में किया है। 
इस संदर्भ में डाॅ. सच्चिदानंद राय का कथन है कि- 'लौटे हुए मुसाफिर' में देश- अनुराग, आत्मविश्वास एवं कर्तव्यपरायणता का आज के गतिशील जीवन में आकर्षण चित्रण प्रस्तुत हुआ है'।  
उपन्यास के एक छोटी सी बस्ती में, विभाजन के पहले, विभाजन के समय, तथा विभाजन के बाद सबकी सोच में जो परिवर्तन हुआ है, उन सबका चित्रण इस लघु उपन्यास में कमलेश्वर ने किया है। उपन्यास के पहले ही वाक्य 'सिर्फ नफरत की आग ने इस बस्ती को जलाया था'।  से स्पष्ट होता है कि इंसान के दिलों में जो कड़वाहट है उसी के कारण ही हिंसा उत्पन्न होती है। कमलेश्वर जी ने स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद, इस बस्ती की दशा से उपन्यास का प्रारंभ किया हैं। आज इस उजड़ी हुई बस्ती को देखकर नसीबन का मन रो उठता है। 'विभाजन के वक्त और उसके पहले की सिर्फ यादें रह गई थीं... और जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती जा रही थी'।  
'लौटे हुए मुसाफिर' उपन्यास का आरंभ ही स्वातंत्रोत्तर भारत के बस्ती की समस्याओं से होता है, जहाँ उपन्यासकार हमें बस्ती के अतीत में ले जाता है। यहाँ पर सांप्रदायिक एकता का चित्र हमारे सामने प्रस्तुत होता है क्योंकि यहाँ की जनता संकुचित सांप्रदायिकता और राजनीति से अंजान थी। जब अंग्रेजों का राज आया तो दोनों ही कौमों ने उनके अत्याचारों के विरुद्ध मिलकर संघर्ष किया। वे लोग आजादी की लड़ाई में साथ लड़े थे, बँटवारे से एक दूसरे के दुश्मन हो गए। 
'अब यहाँ मुसलमानों की नहीं चलेगी। इतनी मजाल नहीं मुसल्लटों की कि यहाँ इस जिले में सिर उठा जाएँ'।  
'बस्ती आज भी लगभग वैसी ही है, जैसे आजादी के पहले थी। सिर्फ इस बस्ती को उदासी ने जकड़ लिया है, ठहरी शामें होती हैं और रुका हुआ वक्त है'। 
आज इस खामोश बस्ती को देखकर किसी को यकीन नहीं हो सकता कि कभी यहाँ इतनी रौनक बरसती थी और हर संप्रदायों के लोग यहाँ प्रेम और विश्वास से मिल- जुल कर रहते थे, एक दूसरे के त्योहारों में भाग लेते थे। राजनीति से बेखबर यह लोग एक दूसरे के सुख- दुरूख में शामिल थे। दिन बीतते गए, अंग्रेजों के आने के साथ- साथ छोटे- मोटे कार्यालय खुले। नौकरियों के लिए शिक्षित वर्ग यहाँ आया। यह तबका अपने- अपने घरों पर हिंदू या मुसलमान था, लेकिन साहब के सामने सिर्फ नौकर था। सन 1940 के आंदोलन में हिंदू- मुसलमान, दोनों ने भाग लिया था और इसके कुछ ही महीनों बाद इस बस्ती के मुसलमानों में जिन्ना साहब की चर्चा शुरू हुई और फिर सन 1945 का जमाना आया और देखते- देखते सब कुछ बदल गया।
बस्ती के दूसरे छोर पर मुसलमानो की बस्ती है। कथा का मुख्य केंद्र यही बस्ती है। बस्ती की विधवा नसीबन छोटे- मोटे काम करते हुए अपने बच्चों का पालन पोषण कर रही है। एक साईं है जो दिन भर इधर- उधर घूमता है शाम के समय धूनी रमाता है। सत्तार जो पहले किसी सर्कस कंपनी में काम करता था, अब इस बस्ती में आकर जम गया है। उसे नसीबन खाला की सहानुभूति है, साईं का आश्रय है, और सलमा का प्यार। 
सलमा इस बस्ती के जनाना अस्पताल में काम करती है। पति को छोड़कर, पिता के घर में रह रही है। बच्चन भी है, जिसकी पत्नी गुजर चुकी है। जिसके दो छोटे- छोटे बच्चे हैं जिनको नसीबन माँ से भी अधिक प्यार करती है। साइकिल दुकान वाला रतन भी है, ठाकुर, गुप्ता, जाफर मियाँ, चैबे भी हैं। 
राजनीतिक उथल- पुथल से अनजान अपने सुख- दुरूख में डूबे यह लोग, बड़ी शांति से अपनी- अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं। इस खूबसूरत बस्ती में एक दिन सलमा का पति मकसूद और अलीगढ़ का सियासी कारकुन यासीन आ जाते हैं और यहीं से नफरत की चिंगारी फैलने लगती है। मकसूद, यासीन और साईं तीनों मिलकर मस्जिद में बैठक करने लगते हैं। और ये तीनों बस्ती के लोगों के मन में हिंदुओं के प्रति, कांग्रेस और गांधीजी के प्रति, नफरत की आग फैलाते है।
जिसके फलस्वरूप बस्ती में संघ का प्रवेश होता है, नफरत की चिंगारी धीरे-धीरे फैलने लगती है, यासीन और मकसूद नफरत फैलाने के काम में पहले से ही लगे हैं, संघी भी इसमें लगन से जुट जाते हैं। उन्होंने हिंदू- मुस्लिम के बीच अफवाह फैला दी है जिसकी वजह से कल तक के दोस्त, हमसाया हिंदू- मुसलमान एक- दूसरे को अविश्वास की नजरों से देखने लगते हैं। साई इस आग को भड़काने की कोशिश कर रहा है। नसीबन, बच्चन और सत्तार को इससे नफरत है। दोनों ही जातियों में अपने हिंदू और मुसलमान होने का अहसास बढ़ता जा रहा है। हिंदू शायद अपने को एकाएक ज्यादा हिंदू समझने लगे हैं और मुसलमान अपने को ज्यादा मुसलमान। 
फिर एक दिन बस्ती में मौलाना साहब का आगमन होता है। वे समझाते हैंदृ 'हिंदुस्तान में दो कौमें रहती हैं और अब वे साथ- साथ नहीं रह सकती'। 16 अगस्त का दिन रंज- भरे दिन की तरह मनाएँ, मुसलमान हिंदू सरकार के मातहत नहीं रहेगा'।   
मौलाना के पूर्व इस बस्ती में संघ के अधिकारी आए थे। हिंदुओं की विशाल सभा में उन्होंने कहा था- 'हिंदू राष्ट्र ने आज अपना तीसरा नेत्र खोला है ...वह सब इसमें भस्म होगा जो विदेशी है।... वीरभोग्या वसुंधरा... और वीर वही है, जो हिंदू है'।  
16 अगस्त 1946 के दिन तो वातावरण में और अधिक जहर घुल जाता है, तभी पाकिस्तान बनने की घोषणा होती है। शहर के मुसलमान अंदर ही अंदर खुश हुए, ऊपर- ऊपर से कटे हुए थे। साथ ही उनमें कहीं भय और भी गहरा उतर गया था। किंतु नसीबन जानती है कि- 'पाकिस्तान बनने का कोई मतलब नहीं है इस बस्ती के लिए। अरे पूछो कोई क्या बदलेगा अपना नसीब जो है वही रहेगा'। 
विभाजन के बाद यहाँ के और आसपास के अमीर मुसलमान धीरे-धीरे पाकिस्तान की ओर जाने लगते हैं। दूसरे शहरों, कस्बों, से तरह- तरह की खबरें आने लगती हैं। हर सुबह एक नई खबर आती है हर शाम एक नया डर होता है। और इसी माहौल में अनेक लोग बस्ती छोड़कर जाने का निर्णय ले लेते हैं। चीकवों की इस पूरी बस्ती में केवल तीन ही घर ऐसे हैं जो कहीं नहीं जाते, साईं, इश्तिहार तांगेवाला और नसीबन। 
विवशता में सलमा, मकसूद और यासीन के साथ पाकिस्तान चली जाती है। और सलमा के विरह को सह पाने में असमर्थ सत्तार एक दिन आत्महत्या कर लेता है। सत्तार के इस खौफनाक अंत के बाद इश्तिहार भी चला जाता है, बच जाते हैं केवल नसीबन और साईं - जिसने नफरत की आग को फैलाने और बस्ती को उजाड़ने में सहायता की थी। 
'गरीबी, अपमान, भूख और बेबसी में भी वह हारे नहीं थे, पर नफरत की आग और शंकापूर्ण भय का धुआँ वे बर्दाश्त नहीं कर पाए'। 
तब से इतने वर्ष गुजर गए यहाँ कोई नहीं आया सिवाय इस इफ्तिकार के, उसी से पता चला कि यहाँ से जो लोग पाकिस्तान के लिए चले थे, वे पाकिस्तान पहुंच ही नहीं पाए, जो अमीर थे वह लोग पहुंच गए लेकिन गरीब जो बड़ी आशा और अरमानों के साथ पाकिस्तान जाकर अपनी गरीबी मिटाना चाहते थे पैसों के अभाव में वह पाकिस्तान तक पहुंच नहीं सके।
और आज सन 1961 से 1962 में कुछ नौजवान फिर इस बस्ती की ओर वापस लौट रहे हैं। यह वे ही नौजवान है, जिनके माँ- बाप पाकिस्तान और संपन्नता के सपने लेकर इस बस्ती को छोड़कर चले गए थे। किंतु पाकिस्तान पहुंच नहीं सके थे, उन्हीं के लड़के आज वापस लौट रहे हैं। इनका बचपन इसी बस्ती में बीता था नसीबन बहुत खुश है वह लौटे हुए मुसाफिर को उनके टूटे- फूटे घरों तक पहुंचाती है।
लेखक विभाजन की पृष्ठभूमि में एक बस्ती के परिवर्तन की कथा प्रस्तुत करता है। परिवर्तन के कारणों की खोज एवं परिवर्तन की भयावह प्रक्रिया को भी कथाकार ने इस उपन्यास में स्पष्ट किया है। इस उपन्यास में, बस्ती के करीब 60 वर्षों का इतिहास चित्रित है। आरंभ के पृष्ठों में सन 1957 की बस्ती का चित्र अंकित किया गया है।
1857 के बाद इस बस्ती में परिवर्तन शुरू हुए, अंग्रेज देश में हर जगह फैल गए, बस्तियों में कार्यालय खुलने लगे। 1942 के आंदोलन में भी यहाँ के हिंदू- मुसलमान युवकों ने हिस्सा लिया था। किंतु सन 1945 से ही बस्ती के नागरिकों के दिलों में एक  भूचाल आया। सन 1945 से 1947 इन तीन वर्षों में यहाँ के सर्वसामान्य हिंदू मुसलमानों की क्रिया प्रतिक्रियाओं को इसमें शब्दबद्ध किया गया है।
कथावस्तु में महत्वपूर्ण घटनाएं नहीं, घटनाओं की प्रतिक्रिया है। शांति पूर्वक जीवन जीने वाली यह बस्ती नफरत की आग में कैसे जल गई इसके विस्तृत विवेचन के साथ- साथ लेखक सलमा, सत्तार, नसीबन, बच्चन, साईं, यासीन जैसे पात्रों के व्यक्तिगत जीवन की कथा भी बयान करता है। इनके व्यक्तिगत जीवन तथा नफरत की आग फैलाने की घटनाओं में निकट संबंध है। कमलेश्वर के उपन्यास में समाज के उस शोषित निम्न वर्ग को भी  केंद्र में रखा गया है, नफरत की आग फैलाने में जिसका सबसे अधिक उपयोग राजनीतिज्ञों तथा धर्मांधों  ने किया है। इस वर्ग को केंद्र में रखकर लेखक ने विभाजन की समस्या को बिल्कुल नये ढंग से देखा है। 
राजनीति, धर्म संप्रदाय से अलग हटकर तटस्थ दृष्टि से लेखक ने इस बस्ती में फैलने वाली नफरत की आग का चित्र खींचा है। यह बस्ती भारत के किसी भी प्रांत के किसी भी हिस्से में हो सकती है। 1930 से 1947 तक इस प्रकार की प्रतिक्रिया प्रत्येक स्थान पर हुई है। इसीलिए लेखक बस्ती का नाम नहीं देता। यहाँ प्रदेश महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है नफरत की आग जो मानव मन की मूल समस्या है। 
1947-48 में अचानक नफरत की जिस ज्वालामुखी का विस्फोट हुआ उसका चित्रण करने के स्थान पर कमलेश्वर इस ज्वालामुखी का निर्माण कैसे हुआ इसकी खोज करते हैं। और इस सांप्रदायिकता के चिंगारी की खोज करने के लिए ही वह 1930 से 1945 तक के समय को महत्व देते हैं। वह राजनीति का विवेचन-विश्लेषण करने नहीं बैठते उनकी दृष्टि में मनुष्य का मन ही अवलंबन है। राजनीति उद्दीपन और बस्ती का राख हो जाना कार्य।
चैदह- पंद्रह वर्षों बाद इसी बस्ती में जिन्होंने बचपन गुजारे थे, वे नौजवान लौटकर उस दिन की याद कर रहे हैं- जिनके माता- पिता बस्ती के निवासी थे, लेकिन पाकिस्तान और संपन्नता के सपनों को लेकर बस्ती से निकल गए मगर पाकिस्तान तक नहीं जा सके। 
'इधर हमारे मकान थे... हम यहाँ पातालतोड़ कुओं के महकमे में मजदूरी करने आए हैं... आज ही हमारी भर्ती हुई है। अब रहने का ठौर- ठिकाना देख रहे है। इधर हमारे पुराने'।... चलते वक्त उनके अब्बा या घरवालों ने बताया था- उधर अपने घर हैं'। 
इन नौजवानों को देखकर बस्तीवालों के साथ नसीबन बहुत खुश है। 'नसीबन खुशी से रो पड़ी थी। वे सब बशीर, वाकर, रमजान, फत्ते वगैरह जवान होकर लौट आए थे'। 
अन्य उपन्यासों तथा इस उपन्यास में एक बड़ा अंतर यह है कि कमलेश्वर के 'मुसाफिर' वापस लौट आते हैं नफरत की आग में झुलसकर कुछ हमेशा के लिए गए, कुछ बीच रास्ते में ही रह गए, और कुछ वापस लौट आए, तब जब नफरत की आग समाप्त हो गई। इससे कमलेश्वर स्पष्ट करना चाहते हैं कि नफरत मनुष्य का शाश्वत धर्म नहीं है, शाश्वत है सहज, स्नेह और प्रेम वापस लौटने का एक मनोवैज्ञानिक कारण अपनी मातृभूमि के प्रति एक अज्ञात आकर्षण का भाव बना रहता है।
किसी भी समाज अथवा जाति को जड़ से उखाड़ कर कहीं और बसाना, न मनोवैज्ञानिक है, न स्वाभाविक। देश विभाजन की इस घटना के मूल में राजनीति तो है ही, लेकिन यहाँ प्रश्न उत्पन्न होता है कि राजनीति के इस अमानवीय खेल में जनता क्यों शामिल हो जाती है? कल तक के सहज मानवीय संबंधों को नकार कर एक दूसरे के खून की प्यासे क्यों बन जाते हैं? इसका कारण है प्रत्येक मनुष्य के हृदय में छिपी नफरत की वह आग, जो अनुकूल परिस्थितियों में सुलगती है। तभी बस्तियाँ जलती हैं, मानवता और जीवन के श्रेष्ठ मूल्य जलकर राख हो जाते हैं। इस भयावह वातावरण में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो नफरत की आग से अछूते रहते हैं। नसीबन और बच्चन इसी प्रकार के लोग हैं। 
'वस्तुतः लेखक का यह उपन्यास सामाजिक विषय को लेकर लिखा जाने पर भी मानव समाज के कुछ शाश्वत मूल्यों, समस्याओं तथा मानव हृदय की सूक्ष्म प्रवृत्तियों से संबंध रखता है। इसी कारण यह उपन्यास आज भी उतना ही नया है, जितना पहले था, तब तक नया रहेगा, जब तक कि विस्थापितों की समस्या विश्व में रहेंगी, जब तक स्थापितों को उखाड़कर सांप्रदायिक और प्रतिगामी शक्तियाँ उन्हें मुसाफिर बना देंगी, और जब तक यह मुसाफिर अपनी बस्ती को लौटते रहेंगे'। 
'लौटे हुए मुसाफिर' के माध्यम से लेखक ने विभाजन की कृत्रिमता को ही प्रमाणित करने की कोशिश की है। विभाजन के नाम पर सामान्य लोगों का जो शोषण हुआ उसकी ओर भी उन्होंने संकेत किया है। विभाजन का लाभ किस वर्ग को हुआ? विभाजन के बाद पाकिस्तान जाने में किस वर्ग को सफलता मिली? विभाजन के बाद निम्न वर्ग की क्या स्थिति हुई? यह प्रश्न कथानक के माध्यम से उभर कर हमारे सामने खड़ा होता है। 
विभाजन जिस आर्थिक व्यवस्था के कारण हुआ, इसकी अपेक्षा विभाजन के बाद आम आदमी की जो स्थिति हुई उसे लेखक ने अधिक महत्व दिया है। पाकिस्तान के प्रति सामान्य मुसलमानों में इतनी आशाएँ पैदा करा दी गई थी कि सत्तार भी कभी- कभी सोचता है कि- 'शायद पाकिस्तान बनने से एक नई जिंदगी की हदें खुल जाएँ'।   
इफ्तिखार इस घटना की ओर अधिक व्यवहारिक दृष्टि से देखता है। उसे यकीन है कि- 'नया राष्ट्र बनाने के बाद भी सामान्य मनुष्य की स्थिति में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होने वाला है'।  
उधर यासीन जैसे लोग पाकिस्तान की अत्युक्ति पूर्ण प्रशंसा करते हुए गरीबों को सब्जबाग दिखा रहे हैं। सभी गरीब मुसलमानों की निगाहें अमीर लोगों पर लगी हैं जो वह करेंगे वह ठीक होगा। किंतु अमीर जल्दी- जल्दी अपना प्रबंध करके चले जाते हैं। यासीन ने इन गरीब मुसलमानों से यह वादा किया था कि- 'वह उन्हें हवाई जहाज से पाकिस्तान पहुँचाएगा। अनेक सुनहरे सपने देखते चिकुवों की बस्ती के यह मुसलमान अपनी सारी पूंजी बेच कर घर से निकल पड़ते हैं। किंतु उनमें से कोई दिल्ली तक भी नहीं पहुंच पाता, पाकिस्तान की कौन कहे'।   
स्पष्टतः हम यह कह सकते हैं कि विभाजन के समय समाज का निम्न वर्ग और भी शोषित तथा पीड़ित हुआ। इस बस्ती में जीने वाले प्रत्येक पात्र का अपना महत्व है। अपनी ममतामयी संवेदन दृष्टि के कारण नसीबन, भावुक प्रेमी के रूप में सत्तार तथा सांप्रदायिक बहकावे में आकर बस्ती को उजाड़ने वाला साईं बरबस प्रभावित करते हैं।
'लौटे हुए मुसाफिर' में उजड़ी हुई बस्ती का यह दृश्य, बिंब, बस्ती के उदास वातावरण के साथ- साथ वहाँ के निवासियों की हताशा मनोस्थिति को भी सजीव करता है।
वस्तुतः 'लौटे हुए मुसाफिर' एक अंतहीन विभाजन की करूण त्रासदी है। ऐसी अंतहीन विभाजन की प्रक्रियाओं और शंकाओं से हम निरंतर घिरते जा रहे हैं।
संदर्भ
1. हिंदी लघु उपन्यास, डाॅ. अमर प्रसाद जायसवाल, पृ. 239 
2. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 7
3. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 110
4. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 56
5. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 11
6. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 72
7. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ.  57
8. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 96
9. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 105
10. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 112
11. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 112
12. हिंदी उपन्यासरू विविध आयाम, सूर्यनारायण रणसूभे, पृ. 146
13. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 33
14. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 35
15. लौटे हुए मुसाफिर, कमलेश्वर, पृ. 102