प्रेमधाम: आश्रम और उसकी शिक्षा सेवा (प्रेमधाम आश्रम नजीबाबाद के संदर्भ में)


धनीराम


कुदरत भी दुनिया में नए-नए करिश्में करती रहती है किसी को दुनिया भर की नियामतों से नवाज़ देती है तो वहीं कुछ को मूलभूत ज़रूरतों से भी महरूम कर देती है। दरअसल कुदरत पर किसी का कोई जोर नहीं है लेकिन कुदरत की इस बेरहमी का शिकार कुछ मासूम और लाचार बच्चों के लिये रोशनी की किरण बना है प्रेमधाम आश्रम। प्रेमधाम आश्रम उन अनाथ या शारीरिक, मानसिक रूप से दिव्यांग बालकों का है, जिनके सगे-संबंधियों या माता-पिता ने इस बेरहम दुनिया में अकेला छोड़ दिया। यहाँ उन दिव्यांगों को अपनों से ज्यादा प्यार मिलता है। शारीरिक व मानसिक रूप से निःशक्त बच्चों की तमाम जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर लेकर यहाँ के प्रत्येक सेवक व कर्मचारी इनकी पढ़ाई-लिखाई, सेहत, इलाज आदि कार्य को पूर्ण करते हैं। साथ ही इनको संस्कार भी दिए जा रहे हैं। यहाँ के सेवकों के साथ-साथ दूसरे अन्य सेवक भी सेवा करते हैं, दान देते हैं। इस आश्रम में दूर-दूर से लोग सेवा के लिए आते हैं।
प्रेमधाम आश्रम में फादर शीबू व फादर बेनी को देखकर लगता है कि वह दुनिया के सबसे अधिक सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं क्योंकि ये दोनों उस कार्य को कर रहे हैं जिसके लिए उन्हें चुना गया है। ईश्वर ने इन दोनों के अंदर एक माँ का प्यार भी जाग्रत किया और पिता का दुलार भी। यहाँ सभी दिव्यांग इनकी संताने हैं। इन की सेवा करना ही प्रभु का आदेश है।
प्रेमधाम आश्रम उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर की नजीबाबाद तहसील में स्थित है। यह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा से सटा हुआ है। पहले यह कोटद्वार रोड पर था लेकिन अब यह नजीबाबाद में ही नजीबाबाद रेलवे जंक्शन से मात्र 2-3 किलोमीटर दूर हरिद्वार रोड पर प्राचीन नदी मालन के तट के समीप साहनपुर से पहले पड़ता है। प्रेमधाम एक ऐसा धाम है या एक ऐसा आश्रम है जहाँ उन्हें भी प्रेम मिलता है जिन्हें उन्हीं के परिजनों ने शारीरिक, मानसिक दिव्यांगता के चलते त्याग दिया है। यहाँ ऐसे बच्चों को आश्रय दिया जाता है जो किसी भी शारीरिक तथा मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, उन बच्चों को यहाँ लाकर उनकी देखभाल की जाती है, उनको सामान्य जीवन जीने की कला सिखाई जाती है। 
इस आश्रम में ऐसे दिव्यांग बच्चे हैं जो भूख लगने पर किसी को बता भी नहीं सकते, उनको सेवक वहीं पर खाना खिलाते हैं। कुछ चल फिर नहीं सकते, वे अपने विस्तर में ही लेटे रहते हैं, कुछ बच्चे कपड़ों में ही शौच कर लेते हैं, स्वयं सेवक ही उनकी सफाई करते हैं, उनको कपड़े पहनाते हैं, उनको पेस्ट कराते हैं, नहलाते हैं, साफ-सुथरा करके दैनिक कार्यों के लिये तैयार करते हैं।
दिव्यांग बच्चों के लिये शिक्षा या साक्षरता की आवश्यकता
प्रेमधाम आस-पास के क्षेत्र के साथ-साथ अन्य प्रदेश के दिव्यांगों की सेवा का केंद्र बन गया है। इस संस्था में शारीरिक, मानसिक दिव्यांग तथा निःशक्त, असहाय व उपेक्षित लगभग 172 बच्चे हैं। जिसमें 40 शय्याग्रसत हैं, 15 व्हील चेयर और लगभग 103 ऐसे दिव्यांग हैं जो चल-फिर सकते हैं और बोल सकते हैं। इस आश्रम में सेवकों और प्रशिक्षित ट्रेनरों की संख्या लगभग 24 है, जो इन बच्चों की देखभाल करते हैं और उनको सामान्य जीवन जीने की कला सिखाते हैं। इन सभी बच्चों को सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार करने में सबसे पहले आवश्यक है इनको शिक्षित किया जाए और जो बच्चे सामान्य शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते, उन्हें साक्षर बनाया जा सके।
शिक्षा का व्यवस्था
शिक्षा की व्यवस्था के लिए प्रेमधाम को सरकार से कोई सहयोग नहीं मिलता है। यहाँ के सभी बच्चों की आवश्यकता आश्रम प्रबंधकीय कमेटी ही पूरा करती है।
यहाँ दिव्यांग को लाकर उसकी देखभाल के साथ-साथ उसकी शिक्षा की व्यवस्था भी की जाती है। उनकी तमाम आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। जैसे- भोजन, कपड़े, शिक्षा आदि। प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर यहाँ 5 प्रशिक्षित अध्यापक नियुक्त हैं, जो विशेष शिक्षा में प्रशिक्षण प्राप्त हैं। ये समय पर उपस्थित होकर प्रेमधाम आश्रम में शिक्षा देने का कार्य करते हैं। शिक्षा से संबंधित जितना भी खर्च होता है, जैसे- स्टेशनरी व अध्यापकों का वेतन आदि उस सबकी व्यवस्था प्रेमधाम आश्रम ही वहन करता है। यह आश्रम शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को आवासीय प्रशिक्षण देकर स्वावलंबी व आत्मनिर्भर बनाता है और उन्हें समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का कार्य करता है।
प्रशिक्षित अध्यपक
बच्चों को शिक्षा देने के लिए अथवा साक्षर बनाने के लिए आश्रम में पाँच प्रशिक्षित अध्यापक नियुक्त हैं। अध्यापक जयकुमार एमए अर्थशास्त्र तथा दो वर्षीय स्पेशल डीएड प्रशिक्षण प्राप्त हैं। अभिषेक गर्ग, पारूल, चारूल, ममता भी सभी प्रशिक्षित अध्यापक इस महान कार्य में संलग्न हैं।
ये सभी अध्यापक पूर्ण लगन और निष्ठा से कार्य करते हैं। प्रातः 9ः30 से कक्षाओं का संचालन किया जाता है जो शाम 04ः00 बजे तक चलता है। सभी शिक्षक मिलकर दिव्यांग बच्चों को विभिन्न समूहों में बांट कर शिक्षण कार्य करते हैं।
उच्च शिक्षा के भी अवसर
विभिन्न प्रशिक्षित अध्यापकों द्वारा संस्था की ओर से बच्चों को साक्षर किया जाता है, जो बालक साक्षर हो जाते हैं, कुछ लिखना-पढ़ना सीख लेते हैं और सामान्य बच्चों की तरह व्यवहार करते हैं। ऐसे बच्चों को आश्रम से बाहर बच्चों के साथ सरकारी या निजि विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेज दिया जाता है। वर्तमान में ऐसे छात्रों की संख्या आठ है।
एक ऐसा ही दिव्यांग छात्र इस आश्रम में रहता है जिसका नाम नवीन है। उसने आश्रम से बाहर विभिन्न सामान्य विद्यालयों से शिक्षा ग्रहण की माध्यमिक शिक्षा उत्र्तीण करने के पश्चात् साहू जैन महाविद्यालय से एमए हिंदी अंतिम वर्ष की परीक्षा 2020 में देने जा रहा है।
इसके साथ-साथ एक दिव्यांग किशोर कैलाश है। जिसके दोनों हाथ व दोनों पैर नहीं हैं, उसने दोनों हाथों की कलाई से लिखकर हाईस्कूल तथा इंटर की परीक्षा उत्र्तीण की और इस समय वह कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से बीबीए की शिक्षा ग्रहण कर रहा है।
कैलाश अपने दोनों हाथों की कलाई से अपनी कल्पनाओं को उड़ान दे रहा है। वह एक अच्छा चित्रकार भी है और विभिन्न पुरस्कार भी प्राप्त कर चुका है।
शिक्षा की प्रक्रिया-
-सामान्य शिक्षा
-संगीत एवं कला व नृत्य
-खेल कूद
-व्यवसायिक शिक्षा
इस आश्रम में कुल दिव्यांगों की संख्या 172 है। इनमें 0 वर्ष से 18 वर्ष तक के 30 बच्चे आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते हैं, 08 बच्चे आश्रम से बाहर शिक्षा ग्रहण करते हैं 02 डिग्री काॅलेज में अध्यन कर रहे हैं।
आश्रम में सभी दिव्यांग बच्चों को शिक्षा के समान अवसर दिए जाते हैं। सामान्य रूप में उनको भाषा, गणित आदि विभिन्न विषयों की शिक्षा दी जाती है। उनको अक्षरों का ज्ञान कराया जाता है, उनको व्यवहारिक ज्ञान भी दिया जाता है।
आश्रम में ही सभी को संगीत, कला, नृत्य, खेलकूद, व्यवसायिक शिक्षा भी दी जाती है। दीपावली व अन्य त्यौहार पर उनके द्वारा बनायी गई मोमबत्ती, झालर, आदि सामान बाजार में बेचा जाता है। जिससे बच्चों को सीखने, करने व देखने का अवसर तो मिलता ही है, साथ ही उनके सामान को बाजार मिलने से आय भी हो जाती है। अन्य सामग्री, पेंटिंग, चटाई, गमले आदि भी बनाकर बाजार में बेचा जाता है।
ख्ेालकूद में क्रिकेट, रेस, मेंढक दौड़, रस्सी खींच, फुटबाॅल, बैडमिंटन आदि खेल सिखाए जाते हैं।
संगीत में गायन के साथ-साथ ढोलक, तबला, हारमोनियम, ड्रम, बाजा, बैंड आदि सिखाया जाता है।
राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर्वों का आयोजन-
प्रेमधाम आश्रम में सभी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर्वों का आयोजन भी किया जाता है। 14 नवंबर 2019 को प्रेमधाम आश्रम के दिव्यांग बच्चों के बहुत से कार्यक्रमों  के सजीव प्रसारण आकाशवाणी केंद्र नजीबाबाद से किए गए हैं। व्यवसायिक शिक्षा में राजीव शर्मा तथा रजनी रोबर्ट का विशेष योगदान है। 5 जून अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस, 15 अगस्त, 26 जनवरी को बहुत से संस्कृति, देशभक्ति कार्यक्रम किए जाते हैं। 05 सितंबर को शिक्षक दिवस, 2 अक्टूबर को गांधी जयंती, 03 दिसंबर को विकलांग दिवस को बहुत ही हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसके साथ जितने भी धार्मिक त्यौहार है जैसे ईद, दिवाली, होली, क्रिसमस आदि।
शिष्ट अतिथियों का आगमन 
बिजनौर जिले के जिलाधिकारी एवं नजीबाबाद एसडीएम ने भी प्रेमधाम पहुँचकर यहाँ के फादर शीबू थाॅमस एवं फादर बेनी तकेकरा से मुलाकात की और इस अवसर इन दोनों के नेतृत्व में दिव्यांग बच्चों ने अतिथियों का स्वागत किया। डीएम ने दिव्यांगों और मानसिक अस्वस्थ बच्चों के लिए आश्रम प्रबंधन द्वारा की गई व्यवस्थाओं को जाना। फादर शीबू ने बताया कि बच्चों के मेडिकल की सुविधा आश्रम में होने के साथ-साथ फिजियोथैरेपी एवं अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हैं। उन्होंने बच्चों को पढ़ने के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनाए जाने की जानकारी दी।
प्रेमधाम आश्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कुरियन 
आश्रम में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस मुख्य अतिथि के रूप में पहुँचे। इस कार्यक्रम में मौजूद 100 दिव्यांग बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से सिलाई मशीन वितरण की और उनको प्रमाण पत्र भी वितरित किए। दिव्यांग बच्चों को आत्मसुरक्षा एवं स्वावलंबी बनने की शिक्षा दी और कहा कि हमें अपने जीवन में निराश नहीं होना चाहिए। 
सारांश 
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पूर्ण रूप से मानव सेव के लिए समर्पित यह प्रेमधाम न जाने कितने बेसहारा लोगों के लिए अपना घर है। यहाँ माँ के जैसा प्यार भी मिलता है और पिता के जैसा दुलार भी। यहां पर इन बच्चों को जीवन के लिए इस तरह तैयार किया जाता है कि वह भविष्य में अपने जीवन में कुछ अच्छा कर सकें या अपने पैरों पर खड़ा हो सकें। बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए प्रेमधाम आश्रम उनको साक्षर भी बनाता है और शिक्षित भी। शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जिसको पाकर बालक का चहुँमुखी विकास होता है। शिक्षक मनोविज्ञान के आधार पर बालक की विभिन्नताएं, आवश्यकताएं और रुचियों को ध्यान में रखकर शिक्षण कार्य करते हैं। यहाँ पर शिक्षा के माध्यम से बालक का मानसिक, सामाजिक, शारीरिक, आध्यात्मिक, संवेगात्मक विकास किया जाता है।