सुधीर कुमार ‘तन्हा’ की ग़ज़लों में सामाजिक यथार्थ/मंजु सिंह


सुधीर कुमार 'तन्हा'


उत्तर प्रदेश में जनपद बिजनौर के ग्राम सीकरी बुजुर्ग में जन्मे सुधीर कुमार 'तन्हा' ग़ज़ल कहते हैं और उनकी ग़ज़ल हिंदी-उर्दू के बीच की कड़ी लगती है। न तो ठेठ हिंदी और न ही ठेठ उर्दू। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल में भी यही भाषा दिखाई देती है जो साहित्य के लिए बुरी नहीं बल्कि अच्छी बात है। बिजनौर के ही एक और विद्वान पं. पद्मसिंह शर्मा ने पहले पहल यह प्रयोग किया था। तब उनकी भाषा को कुछ विद्वानों ने उछलती कूदती भाषा कहा था तो कुछ विद्वानों ने उनकी भाषा को साहित्य के लिए बहुत अच्छा माना था। पंडित जी हिंदी से बहुत प्रेम करते थे परंतु वह अन्य किसी भाषा से या उसके शब्दों से द्वेष नहीं रखते थे। यही कारण है कि आज उनकी वही भाषा आम बोलचाल की भाषा बन गई है। कवि सुधीर कुमार 'तन्हा' भी  ईर्ष्‍या अर्थात् हसद को लाइलाज बीमारी मानते हुए इससे बचने की सलाह देते हैं-



हसद बहुत ही बुरा मरज़ है, हसद से 'तन्हा' गुरेज़ करना।
हर एक मरज़ की दवा है लेकिन, हसद की कोई दवा नहीं है।।1
ग़ज़ल ने अनेक प्रतिमान गढ़े हैं। आशिक और माशूक से निकल कर ग़ज़ल ने विषय विस्तार पाया है। आज ग़ज़ल हर विषय पर कही जा रही है। कवि सुधीर कुमार 'तन्हा' ने भी विभिन्न विषयों पर अशआर कहे हैं। उनके शेरों से सामाजिक यथार्थ का बोध होता है। 
आदमी की बदलती फितरत को क्या खूब कहा है-
भाग जाते हैं अलम लेके सिपाही 'तन्हा'।
जंग में जिस घड़ी हो जाता है सरदार का क़त्ल।।2
कवि 'तन्हा' बेग़ैरती को मौत से भी बुरा मानते हैं-
बेग़ैरत का इस दुनिया में जीना क्या और मरना क्या।
मौत उसे आती है जिस की आँख में गै़रत होती है।।3
आदमी के चेहरे पर से नकाब भी उन्होंने खूब उतारी है। क़ातिल भी अपने आपको उपदेशक बना लेता है और बाकी समाज को उपदेश करता है-
एक आदमी का क़ातिल ये कहता फिर रहा था।
औरों के काम आना है काम आदमी का।।4
नफ़रतों से घर बंट जाते हैं इसलिए नफरत को बुरी चीज मानते हुए कवि धार्मिक नफरत से देश के बंट जाने की चिंता व्यक्त करता है-
इतनी नफ़रत पाल के तुमने घर आँगन तो बांट दिये।
अहले वतन को यूँ मत बाँटो मज़हब की दीवारों से।।5
और कहता है-
सारे बंधन सारे रिश्ते सारे तआल्लुक़ टूट गये।
आँगन में जिस दिन से, छाँव आई एक दीवार की।।6
कवि की चिंता निर्मूल नहीं है। धार्मिक नफरत बच्चों की मासूमियत को प्रभावित करती है। जो अभी ठीक से धर्म के बारे में नहीं जानता, वह भी धर्म के ठेकेदारों से पूछता है-
नन्हा बच्चा पूछ रहा है धर्म के ठेकेदारों से।
आज कबूतर क्यों ग़ायब हैं गुम्बद से मीनारों से।।7
दूसरों को बेघर करने वालों को कवि श्राप देता हुआ प्रतीत होता है-
दूसरों के निशाँ मिटाता है।
तू भी एक रोज़ बे निशाँ होगा।।8
जबकि कवि प्रेम को शक्ति मानते हुए लिखता है-
हम हैं तुम्हारे तुम हो हमारे, प्यार हमारी ताक़त है।
इस नुकते को ग़ौर से सोचो राम से रावण हारा क्यूँ।।9
माँ-बाप, भाई, मित्र और प्रेयसी से संबंधों को उन्होंने बड़ी ही खूबसूरती से पिरोया है।
माँ-बाप- कवि ने भगवान से भी अधिक महत्ता माँ-बाप को दी है। तभी तो कहा है-
उसका जलवा देखने वाले कहाँ भटकता फिरता है।
अपने माँ और बाप की ख़िदमत ऐन इबादत होती है।।10
कोई भी व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए परंतु माँ के लिए वह सदैव बच्चा ही रहता है। कवि ने इसी बात को बहुत ही सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया है-
वो मुझे दिन ढले बाहर नहीं जाने देती।
माँ की नज़़रों में हँू 'तन्हा' अभी बच्चा मैं भी।।11
और यदि किसी माँ का जवान बेटा गुस्से में घर से निकल जाए तो माँ की बेचैनी पहाड़ जैसी हो जाती है। जो भी उसे मिलता है वह उसी से पूछती है। पता नहीं क्या होगा? जवान बालक है-
जवान बेटा है ग़ुस्से में घर से निकला है।
हर एक शख़्स से माँ की नज़र सवाली है।।12
कवि ने उस बात को भी बड़ी ही सादगी और सुंदरता के साथ बयान कर दिया है जिसके लिए बड़े-बड़े समाजशास्त्री सर्वेक्षण करते रह गए। जहां से परिवार बिखरने की पहल हो ही जाती है। हर माँ अपने बेटे का विवाह बड़ी ही धूमधाम से करती है मगर जब सारा परिवार नवागत दुल्हन की ओर आकर्षित हो जाता है, यहाँ तक कि बूढ़ी माँ की सुध लेने वाला भी कोई नहीं होता तब कवि कहता है-
बूढ़ी माँ के कमरे में अब कोई नहीं आता।
घर का घर सिमट आया एक नई हथेली में।।13
दादा- सभी बच्चे दादा को बहुत प्यार करते हैं और दादा भी तो बच्चों को मूल से अधिक ब्याज की तरह प्यारे होते हैं। कवि ने बच्चों के इसी प्यार को उकेरा है-
तस्वीरों का ये अलबम है जान से भी प्यारा।
इस में मेरे दादा की तस्वीर पुरानी है।।14
भाई- भाई जैसा यदि दोस्त कोई नहीं होता तो भाई जैसा शत्रु भी कोई नहीं होता। एकाकी होते जा रहे परिवारों की वजह भाईयों में स्नेह की कमी होती है। कवि इस रिश्ते को बड़ी ही बेबाकी से अभिव्यक्त करता है-
अब भाई जुदा मुझसे होता है तो होने दो।
बँटवारा विरासत का घर-घर की कहानी है।15
किंतु कवि भाई से बिछड़ने की पीड़ा को भी जानता है। भाई के रिश्ते की पवित्रता और अटूटता को भी सुंदर शब्दों में व्यक्त करता है-
ख़ून के ये रिश्ते भी किस क़दर मुक़द्दस हैं।
हैं मेरी लकीरें भी भाई की हथेली में।।16
और फिर कवि की पहुंच भी निराली है। राम-लक्ष्मण जैसा प्यार अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता। वनवास तो राम को हुआ था पर कवि ने लक्ष्मण की पीड़ा को भी खूब समझा है-
दुःख तो ये है राम की ख़ातिर।
लक्ष्मण को बनवास मिला है।।17
बेटी-बेटा- समाज में दहेजप्रथा इतनी बढ़ गई है कि यह विशेष रूप से उस बाप के लिए अभिाशाप है जिसके पास पैसा नहीं है और बेटी जवान हो गई है। बाप को उसके विवाह की चिंता किसी भयानक दुख से कम नहीं होती-
दुःख भी हैं समुंदर से उस आदमी के जिसके।
पल्ले में नहीं कुछ भी बेटी भी सियानी है।।18
और ऐसे में यदि बेटा घर से चला जाए, तो दुख कितना बढ जाता है इसको एक बाप ही अच्छी तरह समझ सकता है-
आँखों में सजाया था जो सपना चला गया।
बेटी हुई जवान तो बेटा चला गया।।19
दुश्मन-दोस्त- दोस्त कब दुश्मन बन जाए कहा नहीं जा सकता न ही इसका कोई पैरामीटर ही है। इसलिए कहा जाता है कि एक अच्छा दोस्त जब दुश्मन बनता है तो यह दुश्मनी बड़ी ही खतरनाक होती है। कवि ने दुश्मन और दोस्तों पर भी कलम चलाई है। दोस्तों पर भरोसा किया और दुश्मनी पाल ली-
जिन दोस्तों पे मुझको भरोसा था आज तक।
हाथों में लिये बैठे हैं तलवार देख ले।।20
किंतु कवि यह भी मानता है कि सच्चा दोस्त कभी झूठी तसल्ली नहीं देता। वह तो स्पष्ट वक्ता होता है, बिना किसी लोभ-लालच के यथार्थ का ज्ञान कराता है परंतु जब दोस्त झूठी तसल्ली देने लगे तो कवि कहता है-
झूठी थीं दोस्त तूने जो दी थीं तसल्लियाँ।
कैसे गिरी है रेत की दीवार देख ले।।21
कई बार देखा जाता है कि आप किसी मित्र के लिए कितना भी त्याग करो मगर एक समय आता है जब वह आपका नाम लेना तो दूर की बात सुनना भी पसंद नहीं करता है-
जिसकी ख़ातिर मैंने अपना ख़ून दिया।
उसको मेरा नाम भी नश्तर लगता है।।22
और जब दोस्ती की आड़ में कोई दुश्मन वर करता है तब दृष्य कितना भयावह हो सकता है-
जंग यूँ भी हुई, गर्दन मेरी तलवार मेरी।
मेरे क़ातिल ने पहन रक्खी थी दस्तार मेरी।।23
कवि दोस्ती-दुश्मनी के सिद्धांतों को समझता है और किसी अनुचित माध्यम को अपनाने के बजाए हार जाना उचित समझता है-
मैंने भागे हुऐ दुश्मन पे नहीं वार किया।
दोस्तो इसलिए हर बार हुई हार मेरी।।24
कवि उन दोस्तों की शिकायत नहीं करता जिन्होंने उसे बहुत सताया है-
मुझे दोस्तों से शिकायत नहीं है।
मगर दोस्तों ने सताया बहुत है।।25
क्योंकि ऐसे दोस्तों की कुछ मजबूरी भी रही होगी-
शायद कुछ मजबूरी होगी यार की।
तोड़ चुकी दम हसरत भी दीदार की।।26
कवि उन लोगों के प्रति भी दोस्त को धैर्य बंधाता है जिनसे वह धोखा खा चुका होता है-
मेरे दोस्त मेरी तरह सब्र कर ले।
फ़रेब उससे मैंने भी खाया बहुत है।।27
कवि की परिकल्पना की यह पराकाष्ठा ही है कि वह दुश्मनों से भी मुस्कराकर मिलने की बात करता है-
अब तो दुश्मनों से भी मुस्कुरा के मिलते हैं।
दोस्ती गुलाबों की हो गई बबूलों से।।28
आशिक और माशूक- शायरी के इस पक्ष को भी कवि ने छोड़ा नहीं है, छोड़ता भी कैसे कविता की प्रेरणा का मुख्य तत्व प्रेम जो है। एक ख़त भर से कोई प्रेमी किस तरह खुश हो जाता है-
मुद्दतों बाद मेरे नाम तेरा ख़त आया।
एक दिया घोर अंधेरे में जला हो जैसे।।29
और जब कोई प्रेमी परदेस जाने लगे तो विरह की ज्वाला उसे जला ही डालती है। ऐसे में हर चीज़ जलती हुई प्रतीत होती है-
वो गया परदेस तो सारे वचन जलने लगे।
नर्म पलकों पर गुलाबों के सुमन जलने लगे।।30
जाना प्रेमी की मजबूरी है वह प्रेयसी को न घबराने और जल्दी आने का वादा करता है-
दूर सफ़र पर जाते हैं हम जाना भी मजबूरी है।
लौटके हम आयेंगे एक दिन देखो तुम घबराना मत।।31
विरह में प्रेमी को भी उन दिनों की याद सताने लगती हैं जब वह एक दूसरे से चोरी-चोरी मिलते थे-
क्या दिन थे जब इन साँसों में ख़ुशबुएँ सी बहती थीं।
उनकी काली आँखें मेरा रस्ता देखती रहती थीं।।32
उसके स्मृतिपटल पर तब की याद भी आने लगती है जब वह अपनी प्रेयसी की मिट्टी से तस्वीर बनाता था और पागल कहा जाता था-
मिट्टी से मैं रोज़ किसी की एक तस्वीर बनाता था।
गाँव की सारी गौरी मुझको पागल लड़का कहती थीं।।33
प्रेयसी भी ग़मों से घिरी है और वह अपने प्रेमी से शिकायत करती है-
एक तू ही था जो मेरे ग़मों में शरीक था।
कोई नहीं है अब मेरा ग़म-ख़्वार देख ले।।34
तब प्रेमी भी शिकायत करता है और कहता है-
साथ तुम भी तो दो प्यार की राह में।
बोझ 'तन्हा' ये कब तक उठाऊँगा मैं।।35
कवि ने उन प्रेमियों के बारे में कहा है जिनमें प्रेयसी का विवाह किसी अन्य के साथ हो जाता है और प्रेमी उसकी शहनाई बजते हुए देखकर अपने प्यार की हार स्वीकार कर लेता है-
दूर कहीं पर डोली उठी शहनाई बजी।
हार गये हम जीती बाज़ी प्यार की।।36
तवायफ- तवायफ भी इसी समाज का एक पक्ष है। भले ही यह समाज का काला पक्ष हो मगर उसकी बेबसी को कोई नहीं देखता है। तवायफ की मजबूरी को भी सुधीर तन्हा खूब जानते हैं-
किसी हालात की मारी तवायफ़ की कहानी है।
ये रंगीं रात और ये पायलों की आँख के आँसू।।37
सामाजिक पक्ष किसी भी कवि की कविता में अनायास ही चला आता है। इसका सबसे बड़ा कारण कवि का सामाजिक प्राणी होना है। कवि सुधीर कुमार 'तन्हा' का सामाजिक पक्ष प्रबल है और उनकी रचनाओं से सामाजिक तानेबाने का ज्ञान हो जाता है। उनकी रचनाएं यथार्थ का बोध कराती हैं।
संदर्भ
1. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 34
2. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 23
3. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 15
4. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 20
5. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 78
6. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 81
7. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 78
8. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 94
9. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 92
10. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 15
11. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 44
12. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 66
13. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 76
14. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 28
15. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 28
16. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 76
17. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 134
18. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 28
19. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 62
20. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 82
21. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 82
22. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 80
23. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 121
24. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 121
25. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 72
26. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 141
27. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 72
28. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 63
29. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 22
30. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 24
31. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 47
32. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 45
33. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 45
34. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 82
35. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 107
36. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 141
37. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 42