Tuesday, December 3, 2019

अँधेरे में शब्द


ओमप्रकाश वाल्मीकि


 


रात गहरी और काली है
अकालग्रस्त त्रासदी जैसी


जहां हजारों शब्द दफन हैं
इतने गहरे
कि उनकी सिसकियाँ भी
सुनाई नहीं देतीं


समय के चक्रवात से भयभीत होकर
मृत शब्द को पुनर्जीवित करने की
तमाम कोशिशें
हो जाएँगी नाकाम
जिसे नहीं पहचान पाएगी
समय की आवाज भी


ऊँची आवाज में मुनादी करने वाले भी
अब चुप हो गए हैं
'गोद में बच्चा
गाँव में ढिंढोरा'
मुहावरा भी अब
अर्थ खो चुका है


पुरानी पड़ गई है
ढोल की धमक भी


पर्वत कन्दराओं की भीत पर
उकेरे शब्द भी
अब सिर्फ
रेखाएँ भर हैं


जिन्हें चिह्नित करना
तुम्हारे लिए वैसा ही है
जैसा 'काला अक्षर भैंस बराबर'
भयभीत शब्द ने मरने से पहले
किया था आर्तनाद
जिसे न तुम सुन सके
न तुम्हारा व्याकरण ही


कविता में अब कोई
ऐसा छन्द नहीं है
जो बयान कर सके
दहकते शब्द की तपिश


बस, कुछ उच्छवास हैं
जो शब्दों के अंधेरों से
निकल कर आए हैं
शून्यता पाटने के लिए !


बिटिया का बस्ता घर से निकल रहा था
दफ्तर के लिए
सीढ़ियां उतरते हुए लगा
जैसे पीछे से किसी ने पुकारा
आवाज परिचित आत्मीयता से भरी हुई
जैसे बरसों बाद सुनी ऐसी आवाज
कंधे पर स्पर्श का आभास


मुड़ कर देखा
कोई नहीं
एक स्मृति भर थी


सुबह-सुबह दफ्तर जाने से पहले
जैसे कोई स्वप्न रह गया अधूरा
आगे बढ़ा
स्कूटर स्टार्ट करने के लिए
कान में जैसे फिर से कोई फुसफुसाया


अधूरी किताब का आखिरी पन्ना लिखने पर
पूर्णता का अहसास
जैसे पिता की हिलती मूँछें
जैसे एक नए काम की शुरुआत
नया दिन पा जाने की विकलता


रात की खौफनाक, डरावनी प्रतिध्वनियों
और खिड़की से छन कर आती पीली रोशनी से
मुक्ति की थरथराहट
भीतर कराहते
कुछ शब्द
बचे-खुचे हौसले
कुछ होने या न होने के बीच
दरकता विश्वास


कितना फर्क है होने
या न होने में


सब कुछ अविश्वसनीय-सा
जोड़-तोड़ के बीच
उछल-कूद की आतुरता
तेज, तीखी प्रतिध्वनि में
चीखती हताशा


भाषा अपनी
फिर भी लगती है पराई-सी
विस्मृत सदियों-सी कातरता
अवसादों में लिपटी हुई


लगा जैसे एक भीड़ है
आस-पास, बेदखल होती बदहवास
चारों ओर जलते घरों से उठता धुआँ
जलते दरवाजे, खिड़कियाँ
फर्ज, अलमारी
बिटिया का बस्ता
जिसे सहेजकर रखती थी करीने से
एक-एक चीज
पेंसिल, कटर, और रबर
कॉपी, किताब
हेयर-पिन, फ्रेंडिशप बैंड


बस्ता नहीं एक दुनिया थी उसकी
जिसमें झांकने या खंगालने का हक
नहीं था किसी को


जल रहा है सब कुछ धुआँ-धुआँ
बिटिया सो नहीं रही है
अजनबी घर में
जहाँ नहीं है उसका बस्ता
गोहाना की चिरायंध
फैली है हवा में
जहाँ आततायी भाँज रहे हैं
लाठी, सरिये, गंड़ासे,
पटाखों की लड़ियाँ
दियासलाई की तिल्ली
और जलती आग में झुलसता भविष्य


गर्व भरे अट्टहास में
पंचायती फरमान
बारूदी विस्फोट की तरह
फटते गैस सिलेंडर
लूटपाट और बरजोरी


तमाशबीन
शहर
पुलिस
संसद
खामोश
कानून
किताब
और
धर्म


कान में कोई फुसफुसाया -
सावधान, जले मकानों की राख में
चिनगारी अभी जिन्दा है !


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