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कालिंदी 


ज्योत्सना भारती



कालिंदी सुंदर और प्रतिभा सम्पन्न तो थी ही, एक अच्छी वकील भी थी। उसके विवाह को अभी कुछ ही समय हुआ था कि उसकी चाची सास लखनऊ से उसके पास कुछ दिन रहने के लिए आ गईं। चाची जी बहुत ही नेक और समझदार महिला थीं। उन्होंने आते ही अपनी पसंद और नापसंद के बारे में कालिंदी को सब कुछ बता दिया था। साथ ही ये भी बता दिया कि वो कितने दिन तक रुकने वाली हैं। चाची जी का प्रोग्राम सुनकर उसे कुछ परेशानी तो महसूस हुई मगर उसने बड़ी ही चतुरता से स्वयं को संभाल लिया। असल मे उसकी परेशानी का मुख्य कारण चाची जी नही थीं बल्कि ये था कि उसको न तो घर का कोई कार्य आता था और न ही सीखने में रुचि थी। ऐसे में वो चाची जी की सेवा और नित नई फरमाइशें कैसे पूरी करेगी।
चाची जी को उसके पास आए तीन दिन हो गए थे परंतु न तो उसके पास उनके साथ बैठने का समय था और न ही बात करने की फुर्सत। घर में फुल टाइम नौकरानी थी जो सारा घर संभालती थी। कालिंदी को तो आॅफिस और फोन से ही समय नही मिलता था। अतः जो चीज नौकरानी नहीं बना पाती थी वो बाहर से आॅर्डर कर दी जाती थी। जैसा खाना बन जाता था वैसा ही सबको खाना पड़ता था। चाची जी को उसका बनाया हुआ खाना बिल्कुल अच्छा नही लगता था इसलिए पिछले तीन दिनों से खाना और नाश्ता दोनों ही बाहर से आ रहे थे।
आज सुबह  कालिंदी आॅफिस के लिए तैयारी कर ही रही थी कि चाची जी ने उस को आवाज लगाई -'कालिंदी बेटा, इधर तो आओ, कुछ देर हमारे पास भी बैठो। फिर तो हम चले ही जाएंगे।'
कालिंदी सकपका कर उनके पास आकर बैठ गई। उसे आया देख कर चाची जी बड़े प्यार से समझाते हुए बोली - 'बेटा मैं पिछले तीन दिनों से देख रही हूँ कि तुम आॅफिस से आने के बाद भी फोन से ही चिपकी रहती हो, कभी घर का कोई काम  नहीं देखतीं, नौकरानी के भरोसे काम थोड़े ही चलता है। स्वयं भी देखना पड़ता है तभी घर ठीक से चल पाता है। तीन दिनों से देख रही हूँ कि खाना भी बाहर से ही आ रहा है। ऐसा क्यों बेटा?'
चाची जी के इतना कहते ही कालिंदी भड़क उठी। कुछ जोर से चीखते हुए से स्वर में  बोलींं-'चाची जी, आपने हम बहुओं को समझ क्या रखा है, क्या हम बस एक चलती फिरती मशीन हैं जो घर का सारा काम चुपचाप करते रहें और सबके ताने उलाहने भी सुनते रहें और एक चूं तक भी न करें। आपके बेटे की तरह मैं भी तो दिन भर मेहनत करती हूँ, मेरा भी दिमाग़ खर्च होता है, तो क्या मुझे थकान नहीं होती, क्या मेरा मन नहीं करता कि मैं भी घर आकर आराम करूँ। ऐसे में अगर मैंने बाहर से खाना आॅर्डर कर दिया तो क्या कुछ ग़लत किया। आपको तो समय से आपकी पसंद का खाना मिल ही रहा है न। और फिर बाहर काम करने वाली अधिकांश महिलाएं ऐसा ही करती हैं। और हाँ, ये घर के काम मुझसे नहीं होते, न तो मैंने कभी ये काम किए हैं और न ही मुझे पसंद हैं।'
चाची जी अवाक उसका मुँह देखती रह गईं। वो सोच रहीं थीं कि क्या इसीलिए लोग पढ़ी-लिखी लड़की को बहू बना कर लाते हैं कि वो ससुराल आकर घर के काम से जी चुराए और बड़ों को जवाब देकर उनकी बेइज्जती करे। क्या पढ़-लिख कर अपने सारे संस्कार भुला दिए जाने चाहिए। यदि ऐसा है तो वो अनपढ़ ही ठीक हैं। चाची जी को सारी उम्र यही दुख सालता रहा था कि वो अनपढ़ हैं परंतु आज उनको स्वयं पर गर्व महसूस हो रहा था क्योंकि उन्होंने अपने घर, परिवार और बच्चों को एक सुसंकृत वातावरण में पाला और उन्हें एक अच्छा नागरिक बनने में उचित सहायता प्रदान की। यही कारण है कि आज उनके तीनों बेटे और बहुएँ मिलजुल कर एकसाथ रहते हैं, एक दूसरे के काम आते हैं और अपने बच्चों को भी भरपूर समय देकर उनको भली भाँति संस्कारित भी करते हैं। जिससे वो बड़े होकर एक अच्छे नागरिक बन कर शांति पूर्ण प्रेम और सद्भाव के साथ जीवन-यापन कर सकें।


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