Monday, December 2, 2019

ख़ाके-हिन्द


बृज नारायण चकबस्त


 


अगली-सी ताज़गी है फूलों में और फलों में
करते हैं रक़्स अब तक ताऊस जंगलों में



अब तक वही कड़क है बिजली की बादलों में
पस्ती-सी आ गई है पर दिल के हौसलों में

गुल शमअ-ए-अंजुमन है,गो अंजुमन वही है
हुब्बे-वतन नहीं है, ख़ाके-वतन वही है

बरसों से हो रहा है बरहम समाँ हमारा
दुनिया से मिट रहा है नामो-निशाँ हमारा

कुछ कम नहीं अज़ल से ख़्वाबे-गराँ हमारा
इक लाशे -बे-क़फ़न है हिन्दोस्ताँ हमारा

इल्मो-कमाल-ओ-ईमाँ बरबाद हो रहे हैं
ऐशो-तरब के बन्दे ग़फ़लत, में सो रहे हैं

ऐ सूरे-हुब्बे-क़ौमी ! इस ख़्वाब को जगा दे
भूला हुआ फ़साना कानों को फिर सुना दे

मुर्दा तबीयतों की अफ़सुर्दगी मिटा दे
उठते हुए शरारे इस राख से दिखा दे

हुब्बे-वतन समाए आँखों में नूर होकर
सर में ख़ुमार हो कर, दिल में सुरूर हो कर

है जू-ए-शीर हमको नूरे-सहर वतन का
आँखों को रौशनी है जल्वा इस अंजुमन का

है रश्क़े- महर ज़र्र: इस मंज़िले -कुहन का
तुलता है बर्गे-गुल से काँटा भी इस चमन का

ग़र्दो-ग़ुबार याँ का ख़िलअत है अपने तन को
मरकर भी चाहते हैं ख़ाके-वतन क़फ़न को


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