Tuesday, December 10, 2019

तब्दीली


अख़्तर-उल-ईमान


 


इस भरे शहर में कोई ऐसा नहीं


जो मुझे राह चलते को पहचान ले


और आवाज़ दे बे सर-फिरे


दोनों इक दूसरे से लिपट कर वहीं


गिर्द-ओ-पेश और माहौल को भूल कर


गालियाँ दें हँसें हाथा-पाई करें


पास के पेड़ की छाँव में बैठ कर


घंटों इक दूसरे की सुनें और कहें


और इस नेक रूहों के बाज़ार में


मेरी ये क़ीमती बे-बहा ज़िंदगी


एक दिन के लिए अपना रुख़ मोड़ ले


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