Tuesday, December 3, 2019

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं


कृष्ण बिहारी नूर


 


ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं


इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं


सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं


जड़ दो चांदी में चाहे सोने में
आईना झूठ बोलता ही नहीं


 


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