Tuesday, December 3, 2019

नाखून क्यों बढ़ते हैं?


हजारी प्रसाद द्विवेदी


 


बच्‍चे कभी-कभी चक्‍कर में डाल देनेवाले प्रश्‍न कर बैठते हैं। अल्‍पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछ दिया कि आदमी के नाखून क्‍यों बढ़ते हैं, तो मैं कुछ सोच ही नहीं सका। हर तीसरे दिन नाखून बढ़ जाते हैं, बच्‍चे कुछ दिन तक अगर उन्‍हें बढ़ने दें, तो माँ-बाप अक्‍सर उन्‍हें डॉटा करते है। पर कोई नहीं जानता कि ये अभागे नाखून क्‍यों इस प्रकार बढ़ा करते है। काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्‍वीकार कर लेंगे, पर निर्लज्‍ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर। आखिर ये इतने बेहया क्‍यों हैं?


कुछ लाख ही वर्षों की बात है, जब मनुष्‍य जंगली था, वनमानुष जैसा। उसे नाखून की जरूरत थी। उसकी जीवन रक्षा के लिए नाखून बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्‍त्र थे। दाँत भी थे, पर नाखून के बाद ही उनका स्‍थान था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था, प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ना पड़ता था। नाखून उसके लिए आवश्‍यक अंग था। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्‍तुओं का सहारा लेने लगा। पत्‍थर के ढेले और पेड़ की डालें काम में लाने लगा (रामचंद्रजी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अस्‍त्र थे)। उसने हड्डियों के भी हथियार बनाए। इन हड्डी के हथियारों में सबसे मजबूत और सबसे ऐतिहासिक था देवताओं के राजा का वज्र, जो दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था। मनुष्‍य और आगे बढ़ा। उसने धातु के हथियार बनाए। जिनके पास लोहे के शस्‍त्र और अस्‍त्र थे, वे विजयी हुए। देवताओं के राजा तक को मनुष्‍यों के राजा से इसलिए सहायता लेनी पड़ती थी कि मनुष्‍यों के राजा के पास लोहे के अस्‍त्र थे। असुरों के पास अनेक विद्याएँ थीं, पर लोहे के अस्‍त्र नहीं थे, शायद घोड़े भी नहीं थे। आर्यों के पास ये दोनों चीजें थी। आर्य विजयी हुए। फिर इतिहास अपनी गति से बढ़ता गया। नाग हारे, सुपर्ण हारे, यक्ष हारे, गंधर्व हारे, असुर हारे, राक्षस हारे। लोहे के अस्‍त्रों ने बाजी मार ली। इतिहास आगे बढ़ा। पलीते-वाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक वायुयानों ने इतिहास को किस कीचड़-भरे घाट तक घसीटा है, यह सबको मालूम है। नख-धर मनुष्‍य अब एटम-बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। पर उसके नाखून अब भी बढ़ रहे हैं। अब भी प्रकृति मनुष्‍य को उसके भीतरवाले अस्‍त्र से वंचित नहीं कर रही है, अब भी वह याद दिला देती है कि तुम्‍हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम वही लाख वर्ष पहले के नखदंतावलंबी जीव हो - पशु के साथ एक ही सतह पर विचरनेवाले और चरनेवाले।


ततः किम्। मैं हैरान होकर सोचता हूँ कि मनुष्‍य आज अपने बच्‍चों को नाखून न काटने के लिए डाँटता है। किसी दिन - कुछ थोड़े लाख वर्ष पूर्व - वह अपने बच्‍चों को नाखून नष्‍ट करने पर डाँटता रहा होगा। लेकिन प्रकृति है कि वह अब भी नाखून को जिलाए जा रही है और मनुष्‍य है कि वह अब भी उसे काटे जा रहा है। वे कंबख्‍त रोज बढ़ते हैं, क्‍योंकि वे अंधे हैं, नहीं जानते कि मनुष्‍य को इससे कोटि-कोटि गुना शक्तिशाली अस्‍त्र मिल चुका है। मुझे ऐसा लगता है कि मनुष्‍य अब नाखून को नहीं चाहता। उसके भीतर बर्बर-युग का कोई अवशेष रह जाय, यह उसे असह्य है। लेकिन यह कैसे कहूँ। नाखून काटने से क्‍या होता है? मनुष्‍य की बर्बरता घटी कहाँ है, वह तो बढ़ती जा रही है। मनुष्‍य के इतिहास में हिरोशिमा का हत्‍याकांड बार-बार थोड़े ही हुआ है? यह तो उसका नवीनतम रूप है। मैं मनुष्‍य के नाखून की ओर देखता हूँ, तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ। ये उसकी भयंकर पाशवी वृत्ति के जीवन प्रतीक हैं। मनुष्‍य की पशुता को जितनी बार भी काट दो, वह मरना नहीं जानती।


कुछ हजार साल पहले मनुष्‍य ने नाखून को सुकुमार विनोदों के लिए उपयोग में लाना शुरू किया था। वात्‍स्‍यायन के 'कामसूत्र' से पता चलता है कि आज से दो हजार वर्ष पहले का भारतवासी नाखूनों को जमके सँवारता था। उनके काटने की कला काफी मनोरंजक बताई गई है। त्रिकोण, वर्तुलाकार, चंद्राकार, दंतुल आदि विविध आकृतियों के नाखून उन दिनों विलासी नागरिकों के न जाने किस काम आया करते थे। उनको सिक्‍थक (मोम) और अलक्‍तक (आलता) से यत्‍नपूर्वक रगड़कर लाल और चिकना बनाया जाता था। गौड़ देश के लोग उन दिनों बड़े-बड़े नखों को पसंद करते थे और दाक्षिणात्‍य लोग छोटे नखों को। अपनी-अपनी रुचि है, देश की भी और काल की भी। लेकिन समस्‍त अधोगामिनी वृत्तियों की ओर नीचे खींचनेवाली वस्‍तुओं को भारतवर्ष ने मनुष्‍योचित बनाया है, यह बात चाहूँ भी तो भूल नहीं सकता।


मानव-शरीर का अध्‍ययन करनेवाले प्राणि-विज्ञानियों का निश्चित मत है कि मानव-चित्त की भाँति मानव-शरीर में भी बहुत-सी अभ्‍यासजन्‍य सहज वृत्तियाँ रह गई हैं। दीर्घकाल तक उनकी आवश्‍यकता रही है। अतएव शरीर ने अपने भीतर एक ऐसा गुण पैदा कर लिया है कि वे वृत्तियाँ अनायास ही, और शरीर के अनजान में भी, अपने-आप काम करती है। नाखून का बढ़ना उसमें से एक है, केश का बढ़ना दूसरा है, दाँत का दुबारा उठना तीसरा है, पलकों का गिरना चौथा है। और असल में सहजात वृत्तियाँ अनजान की स्‍मृतियाँ को ही कहते हैं। हमारी भाषा में भी इसके उदाहरण मिलते हैं। अगर आदमी अपने शरीर की, मन की और वाक् की अनायास घटनेवाली वृत्तियों के विषय में विचार करे, तो उसे अपनी वास्‍तविक प्रवृत्ति पहचानने में बहुत सहायता मिले। पर कौन सोचता है? सोचना तो क्‍या, उसे इतना भी पता नहीं चलता कि उसके भीतर नख बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्‍व का प्रमाण है। उन्‍हें काटने की जो प्रवृत्ति है, वह उसकी मनुष्‍यता की निशानी है और यद्यपि पशुत्‍व के चिह्न उसके भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्‍व को छोड़ चुका है। पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्‍ता खोजना चाहिए। अस्‍त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्‍यता की विरोधिनी है।


मेरा मन पूछता है - किस ओर? मनुष्‍य किस ओर बढ़ रहा है? पशुता की ओर या मनुष्‍यता की ओर? अस्‍त्र बढ़ाने की ओर या अस्‍त्र काटने की ओर? मेरी निर्बोध बालिका ने मानो मनुष्‍य जाति से ही प्रश्‍न किया है - जानते हो, नाखून क्‍यों बढ़ते हैं? यह हमारी पशुता के अवशेष हैं। मैं भी पूछता हूँ - जानते हो, ये अस्‍त्र-शस्‍त्र क्‍यों बढ़ रहे हैं? ये हमारी पशुता की निशानी हैं। भारतीय भाषाओं में प्रायः ही अँग्रेजी के 'इंडिपेंडेस' शब्‍द का समानार्थक शब्‍द नहीं व्‍यवहृत होता। 15 अगस्‍त को जब अँग्रेजी भाषा के पत्र 'इंडिपेंडेन्‍स' की घोषणा कर रहे थे, देशी भाषा के पत्र 'स्‍वाधीनता दिवस' की चर्चा कर रहे थे। 'इंडिपेंडेन्‍स' का अर्थ है अनधीनता या किसी की अधीनता का अभाव, पर 'स्‍वाधीनता' शब्‍द का अर्थ है अपने ही अधीन रहना। अँग्रेजी में कहना हो, तो 'सेल्‍फडिपेंडेन्‍स' कह सकते हैं। मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि इतने दिनों तक अँग्रेजी की अनुवर्तिता करने के बाद भी भारतवर्ष 'इंडिपेंडेन्‍स' को अनधीनता क्‍यों नहीं कह सका? उसने अपनी आजादी के जितने भी नामकरण किए स्‍वतंत्रता, स्‍वराज्‍य, स्‍वाधीनता - उन सबमें 'स्‍व' का बंधन अवश्‍य रखा। यह क्‍या संयोग की बात है या हमारी समूची परंपरा ही अनजान में, हमारी भाषा के द्वारा प्रकट होती रही है? मुझे प्राणि-विज्ञानी की बात फिर याद आती है - सहजात वृत्ति अनजानी स्‍मृतियों का ही नाम है। स्‍वराज होने के बाद स्‍वभावतः ही हमारे नेता और विचारशील नागरिक सोचने लगे हैं कि इस देश को सच्‍चे अर्थ में सुखी कैसे बनाया जाय। हमारे देश के लोग पहली बार यह सब सोचने लगे हों, ऐसी बात नहीं है। हमारा इतिहास बहुत पुराना है, हमारे शास्‍त्रों में इस समस्‍या को नाना भावों और नाना पहलुओं से विचारा गया है। हम कोई नौसिखुए नहीं है, जो रातों-रात अनजान जंगल में पहुँचाकर अरक्षित छोड़ दिए गए हों। हमारी परंपरा महिमामयी उत्तराधिकार विपुल और संस्‍कार उज्ज्वल हैं। हमारे अनजान में भी ये बातें हमें एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देती हैं। यह जरूर है कि परिस्थितियाँ बदल गई है। उपकरण नए हो गए हैं और उलझनों की मात्रा भी बहुत बढ़ गई है, पर मूल समस्‍याएँ बहुत अधिक नहीं बदली हैं। भारतीय चित्त जो आज भी 'अनधीनता' के रूप में न सोचकर 'स्‍वाधीनता' के रूप में सोचता है, वह हमारे दीर्घकालीन संस्‍कारों का फल है। वह 'स्‍व' के बंधन को आसानी से नहीं छोड़ सकता। अपने आप पर अपने-आपके द्वारा लगाया हुआ बंधन हमारी संस्‍कृति की बड़ी भारी विशेषता है। मैं ऐसा तो नहीं मानता कि जो कुछ हमारा पुराना है, जो कुछ हमारा विशेष है, उससे हम चिपटे ही रहें। पुराने का 'मोह' सब समय वांछनीय ही नहीं होता। मरे बच्‍चे को गोद में दबाए रहनेवाली 'बँदरिया' मनुष्‍य का आदर्श नहीं बन सकती। परंतु मैं ऐसा भी नहीं सोच सकता कि हम नई अनुसंधित्‍सा के नशे में चूर होकर अपना सरबस खो दें। कालिदास ने कहा था कि सब पुराने अच्‍छे नहीं होते, सब नए खराब ही नहीं होते। भले लोग दोनों की जाँच कर लेते हैं, जो हितकर होता है उसे ग्रहण करते हैं, और मूढ़ लोग दूसरों के इशारे पर भटकते रहते हैं। सो, हमें, परीक्षा करके हिकर बात सोच-लेनी होगी और अगर हमारे पूर्वसंचित भंडार में वह हितकर वस्‍तु निकल आए, तो इससे बढ़कर और क्‍या हो सकता है?


जातियाँ इस देश में अनेक आई हैं। लड़ती-झगड़ती भी रही हैं, फिर प्रेम पूर्वक बस भी गई हैं। सभ्‍यता की नाना सीढ़ियों पर खड़ी और नाना और मुख करके चलनेवाली इन जातियों के लिए एक सामान्‍य धर्म खोज निकालना कोई सहज बात नहीं थी। भारतवर्ष के ऋषियों ने अनेक प्रकार से इस समस्‍या को सुलझाने की कोशिश की थी। पर एक बात उन्‍होंने लक्ष्‍य की थी। समस्‍त वर्णों और समस्‍त जातियों का एक सामान्‍य आदर्श भी है। वह है अपने ही बंधनों से अपने को बाँधना। मनुष्‍य पशु से किस बात में भिन्‍न है। आहार-निद्रा आदि पशु सुलभ स्‍वभाव उसके ठीक वैसे ही है, जैसे अन्‍य प्राणियों के। लेकिन वह फिर भी पशु से भिन्‍न है। उसमें संयम है, दूसरे के सुख-दुख के प्रति समवेदना है, श्रद्धा है, तप है, त्‍याग है। यह मनुष्‍य के स्‍वयं के उद्भावित बंधन हैं। इसीलिए मनुष्‍य झगड़े-टंटे को अपना आदर्श नहीं मानता, गुस्‍से में आकर चढ़ दौड़नेवाले अविवेकी को बुरा समझता है और वचन, मन और शरीर से किए गए असत्‍याचरण को गलत आचरण मानता है। यह किसी भी जाति या वर्ण या समुदाय का धर्म नहीं है। यह मनुष्‍यमात्र का धर्म है। महाभारत में इसीलिए निर्वेर भाव, सत्‍य और अक्रोध को सब वर्णों का सामान्‍य धर्म कहा है :


एतद्धि त्रितयं श्रेष्‍ठं सर्वभूतेषु भारत।
निर्वैरता महाराज सत्‍यमक्रोध एव च।।


अन्‍यत्र इसमें निरंतर दानशीलता को भी गिनाया गया है (अनुशासन प., 120. 10)। गौतम ने ठीक ही कहा था कि मनुष्‍य की मनुष्‍यता यही है कि वह सबके दुख सुख को सहानुभूति के साथ देखता है। यह आत्‍म निर्मित बंधन ही मनुष्‍य को मनुष्‍य बनाता है। अहिंसा, सत्‍य और अक्रोधमूलक धर्म का मूल उत्‍स यही है। मुझे आश्‍चर्य होता है कि अनजान में भी हमारी भाषा में यह भाव कैसे रह गया है। लेकिन मुझे नाखून के बढ़ने पर आश्‍चर्य हुआ था। अज्ञान सर्वत्र आदमी को पछाड़ता है। और आदमी है कि सदा उससे लोहा लेने को कमर कसे है।


मनुष्‍य को सुख कैसे मिलेगा? बड़े-बड़े नेता कहते हैं, वस्‍तुओं की कमी है, और मशीन बैठाओ, और उत्‍पादन बढ़ाओ, और धन की वृद्धि करो और बाह्य उपकरणों की ताकत बढ़ाओ। एक बूढ़ा कहता था - बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो। हिंसा को मन से दूर करो, मिथ्‍या को हटाओ, क्रोध और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्‍ट सहो, आराम की बात मत सोचो, प्रेम की बात सोचो, आत्‍म तोषण की बात सोचो, काम करने की बात सोचो। उसने कहा - प्रेम ही बड़ी चीज है, क्‍योंकि वह हमारे भीतर है। उच्‍छृंखलता पशु की प्रवृत्ति है, 'स्‍व' का बंधन मनुष्‍य का स्‍वभाव है। बूढ़े की बात अच्‍छी लगी या नहीं, पता नहीं। उसे गोली मार दी गई, आदमी के नाखून बढ़ने की प्रवृत्ति ही हावी हुई। मैं हैरान होकर सोचता हूँ - बूढ़े ने कितनी गहराई में पैठकर मनुष्‍य की वास्‍तविक चरितार्थता का पता लगाया था।


ऐसा कोई दिन आ सकता है, जबकि मनुष्‍य के नाखूनों का बढ़ना बंद हो जाएगा। प्राणिशास्त्रियों का ऐसा अनुमान है कि मनुष्‍य का अनावश्‍यक अंग उसी प्रकार झड़ जाएगा, जिस प्रकार उसी पूँछ झड़ गई है। उस दिन मनुष्‍य की पशुता भी लुप्‍त हो जाएगी। शायद उस दिन वह मारणास्‍त्रों का प्रयोग भी बंद कर देगा। तब तक इस बात से छोटे बच्‍चों को परिचित करा देना वांछनीय जान पड़ता है कि नाखून का बढ़ना मनुष्‍य के भीतर की पशुता की निशानी है और उसे नहीं बढ़ने देना मनुष्‍य की अपनी इच्‍छा है, अपना आदर्श है। बृहत्तर जीवन में रोकना मनुष्‍यत्‍व का तकाजा है। मनुष्‍य में जो घृणा है, जो अनायास - बिना सिखाए - आ जाती है, वह पशुत्‍व का द्योतक है और अपने को संयत रखना, दूसरे के मनोभावों का आदर करना मनुष्‍य का स्‍वधर्म है। बच्‍चे यह जानें तो अच्‍छा हो कि अभ्‍यास और तप से प्राप्‍त वस्‍तुएँ मनुष्‍य की महिमा को सूचित करती हैं।


सफलता और चरितार्थता में अंतर है। मनुष्‍य मारणास्‍त्रों के संचयन से, बाह्य उपकरणों के बाहुल्‍य से उस वस्‍तु को पा भी सकता है, जिसे उसने बड़े आडंबर के साथ सफलता का नाम दे रखा है। परंतु मनुष्‍य की चरितार्थता प्रेम में है, मैत्री में है, त्‍याग में है, अपने को सबके मंगल के लिए निःशेष भाव से दे देने में है। नाखूनों का बढ़ना मनुष्‍य की उस अंध सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता ले आना चाहती है, उसको काट देना उस स्‍व-निर्धारित, आत्‍म-बंधन का फल है, जो उसे चरितार्थता की ओर ले जाती है।


नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्‍य उन्‍हें बढ़ने नहीं देगा।


अनुपमा का प्रेम


शरतचंद्र चट्टोपाध्याय


 


ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया है। संसार में उसके लिए सीखने योग्य वस्तु और कोई नही है, सबकुछ जान चुकी है, सब कुछ सीख चुकी है। सतीत्व की ज्योति को वह जिस प्रकार देख सकती है, प्रणय की महिमा को वह जिस प्रकार समझ सकती है,संसार में और भी कोई उस जैसा समझदार नहीं है, अनुपमा इस बात पर किसी तरह भी विश्वाश नही कर पाती। अनु ने सोचा- वह एक माधवीलता है, जिसमें मंजरियां आ रही हैं, इस अवस्था में किसी शाखा की सहायता लिये बिना उसकी मंजरियां किसी भी तरह प्रफ्फुलित होकर विकसित नही हो सकतीं। इसलिए ढूँढ-खोजकर एक नवीन व्यक्ति को सहयोगी की तरह उसने मनोनीत कर लिया एवं दो-चार दिन में ही उसे मन प्राण, जीवन, यौवन सब कुछ दे डाला। मन-ही-मन देने अथवा लेने का सबको समान अधिकार है, परन्तु ग्रहण करने से पूर्व सहयोगी को भी (बताने की) आवश्यकता होती है। यहीं आकर माधवीलता कुछ विपत्ति में पड़ गई। नवीन नीरोदकान्त को वह किस तरह जताए कि वह उसकी माधवीलता है, विकसित होने के लिए खड़ी हुई है, उसे आश्रय न देने पर इसी समय मंजरियों के पुष्पों के साथ वह पृथ्वी पर लोटती-पोटती प्राण त्याग देगी।


परन्तु सहयोगी उसे न जान सका। न जानने पर भी अनुमान का प्रेम उत्तरोत्तर वृद्धि पाने लगा। अमृत में विष, सुख में दु:ख, प्रणय में विच्छेद चिर प्रसिद्ध हैं। दो-चार दिन में ही अनुपमा विरह-व्यथा से जर्जर शरीर होकर मन-ही-मन बोली- स्वामी, तुम मुझे ग्रहण करो या न करो, बदले में प्यार दो या न दो, मैं तुम्हारी चिर दासी हूँ। प्राण चले जाएँ यह स्वीकार है, परन्तु तुम्हे किसी भी प्रकार नही छोड़ूंगी। इस जन्म में न पा सकूँ तो अगले जन्म में अवश्य पाऊंगी, तब देखोगे सती-साध्वी की क्षूब्द भुजाओं में कितना बल है। अनुपमा बड़े आदमी की लड़की है, घर से संलग्न बगीचा भी है, मनोरम सरोवर भी है, वहाँ चाँद भी उठता है, कमल भी खिलते है, कोयल भी गीत गाती है, भौंरे भी गुंजारते हैं, यहाँ पर वह घूमती फिरती विरह व्यथा का अनुभव करने लगी। सिर के बाल खोलकर, अलंकार उतार फेंके, शरीर में धूलि मलकर प्रेम-योगिनी बन, कभी सरोवर के जल में अपना मुँह देखने लगी, कभी आँखों से पानी बहाती हुई गुलाब के फूल को चूमने लगी, कभी आँचल बिछाकर वृक्ष के नीचे सोती हुई हाय की हुताशन और दीर्घ श्वास छोड़ने लगी, भोजन में रुचि नही रही, शयन की इच्छा नहीं, साज-सज्जा से बड़ा वैराग्य हो गया, कहानी किस्सों की भाँति विरक्ति हो आई, अनुपमा दिन-प्रतिदिन सूखने लगी, देख सुनकर अनु की माता को मन-ही-मन चिन्ता होने लगी, एक ही तो लड़की है, उसे भी यह क्या हो गया ? पूछने पर वह जो कहती, उसे कोई भी समझ नही पाता, ओठों की बात ओठों पे रह जाती। अनु की माता फिर एक दिन जगबन्धु बाबू से बोली- अजी, एक बार क्या ध्यान से नही देखोगे? तुम्हारी एक ही लड़की है, यह जैसे बिना इलाज के मरी जा रही है।


जगबन्धु बाबू चकित होकर बोले- क्या हुआ उसे?


- सो कुछ नही जानती। डॉक्टर आया था, देख-सुनकर बोला- बीमारी-वीमारी कुछ नही है।


- तब ऐसी क्यों हुई जा रही है? - जगबन्धु बाबू विरक्त होते हुए बोले- फिर हम किस तरह जानें?


- तो मेरी लड़की मर ही जाए?


- यह तो बड़ी कठिन बात है। ज्वर नहीं, खाँसी नहीं, बिना बात के ही यदि मर जाए, तो मैं किस तरह से बचाए रहूंगा? - गृहिणी सूखे मुँह से बड़ी बहू के पास लौटकर बोली- बहू, मेरी अनु इस तरह से क्यों घूमती रहती है?


- किस तरह जानूँ, माँ?


- तुमसे क्या कुछ भी नही कहती?


- कुछ नहीं।


गृहिणी प्राय: रो पड़ी- तब क्या होगा? बिना खाए, बिना सोए, इस तरह सारे दिन बगीचे में कितने दिन घूमती-फिरती रहेगी, और कितने दिन बचेगी? तुम लोग उसे किसी भी तरह समझाओ, नहीं तो मैं बगीचे के तालाब में किसी दिन डूब मरूँगी।


बड़ी बहू कुछ देर सोचकर चिन्तित होती हुई बोली- देख-सुनकर कहीं विवाह कर दो; गृहस्थी का बोझ पड़ने पर अपने आप सब ठीक हो जाएगा।


- ठीक बात है, तो आज ही यह बात मैं पति को बताऊंगी।


पति यह बात सुनकर थोड़ा हँसते हुए बोले- कलिकाल है! कर दो, ब्याह करके ही देखो, यदि ठीक हो जाए।


दूसरे दिन घटक आया। अनुपमा बड़े आदमियों की लड़की है, उस पर सुन्दरी भी है; वर के लिए चिन्ता नही करनी पड़ी। एक सप्ताह के भीतर ही घटक महाराज ने वर निश्चित करके जगबन्धु बाबू को समाचार दिया। पति ने यह बात पत्नी को बताई। पत्नी ने बड़ी बहू को बताई, क्रमश: अनुपमा ने भी सुनी। दो-एक दिन बाद, एक दिन सब दोपहर के समय सब मिलकर अनुपमा के विवाह की बातें कर रहे थे। इसी समय वह खुले बाल, अस्त-व्यस्त वस्त्र किए, एक सूखे गुलाब के फूल को हाथ में लिये चित्र की भाँति आ खड़ी हुई। अनु की माता कन्या को देखकर तनिक हँसती हुई बोली- ब्याह हो जाने पर यह सब कहीं अन्यत्र चला जाएगा। दो एक लड़का-लड़की होने पर तो कोई बात ही नही ! अनुपमा चित्र-लिखित की भाँति सब बातें सुनने लगी। बहू ने फिर कहा- माँ, ननदानी के विवाह का दिन कब निश्चित हुआ है?


- दिन अभी कोई निश्चित नही हुआ।


- ननदोई जी क्या पढ़ रहे हैं?


- इस बार बी.ए. की परीक्षा देंगे।


- तब तो बहुत अच्छा वर है। - इसके बाद थोड़ा हँसकर मज़ाक करती हुई बोली- परन्तु देखने में ख़ूब अच्छा न हुआ, तो हमारी ननद जी को पसंद नही आएगा।


- क्यों पसंद नही आएगा? मेरा जमाई तो देखने में ख़ूब अच्छा है।


इस बार अनुपमा ने कुछ गर्दन घुमाई, थोड़ा सा हिलकर पाँव के नख से मिट्टी खोदने की भाँति लंगड़ाती-लंगड़ाती बोली- विवाह मैं नही करूंगी। - माँ ने अच्छी तरह न सुन पाने के कारण पूछा- क्या है बेटी? - बड़ी बहू ने अनुपमा की बात सुन ली थी। खूब जोर से हँसते हए बोली- ननद जी कहती हैं, वे कभी विवाह नही करेंगी।


- विवाह नही करेगी?


- नही।


- न करे? - अनु की माता मुँह बनाकर कुछ हँसती हुई चली गई। गृहिणी के चले जाने पर बड़ी बहू बोली- तुम विवाह नही करोगी?


अनुपमा पूर्ववत गम्भीर मुँह किए बोली- किसी प्रकार भी नहीं।


- क्यों?


- चाहे जिसे हाथ पकड़ा देने का नाम ही विवाह नहीं है। मन का मिलन न होने पर विवाह करना भूल है! बड़ी बहू चकित होकर अनुपमा के मुँह की ओर देखती हुई बोली- हाथ पकड़ा देना क्या बात होती है? पकड़ा नहीं देंगे तो क्या ल़ड़कियां स्वयं ही देख-सुनकर पसंद करने के बाद विवाह करेंगी?


- अवश्य!


- तब तो तुम्हारे मत के अनुसार, मेरा विवाह भी एक तरह की भूल हो गया? विवाह के पहले तो तुम्हारे भाई का नाम तक मैने नही सुना था।


- सभी क्या तुम्हारी ही भाँति हैं?


बहू एक बार फिर हँसकर बोली- तब क्या तुम्हारे मन का कोई आदमी मिल गया है? अनुपमा बड़ी बहू के हास्य-विद्रूप से चिढ़कर अपने मुँह को चौगुना गम्भीर करती हुई बोली- भाभी मज़ाक क्यों कर रही हो, यह क्या मज़ाक का समय है?


- क्यों क्या हो गया?


- क्या हो गया? तो सुनो... अनुपमा को लगा, उसके सामने ही उसके पति का वध किया जा रहा है, अचानक कतलू खाँ के किले में, वध के मंच के सामने खड़े हुए विमला और वीरेन्द्र सिंह का दृश्य उसके मन में जग उठा; अनुपमा ने सोचा, वे लोग जैसा कर सकते हैं, वैसा क्या वह नही कर सकती? सती-स्त्री संसार में किसका भय करती है? देखते-देखते उसकी आँखें अनैसर्गिक प्रभा से धक्-धक् करके जल उठीं, देखते-देखते उसने आँचल को कमर में लपेटकर कमरबन्द बाँध लिया। यह दृश्य देखकर बहू तीन हाथ पीछे हट गई। क्षण भर में अनुपमा बगल वाले पलंग के पाये को जकड़कर, आँखें ऊपर उठाकर, चीत्कार करती हुई कहने लगी- प्रभु, स्वामी, प्राणनाथ! संसार के सामने आज मैं मुक्त-कण्ठ से चीत्कार करती हूँ, तुम्ही मेरे प्राणनाथ हो! प्रभु तुम मेरे हो, मैं तुम्हारी हूँ। यह खाट के पाए नहीं, ये तुम्हारे दोनों चरण हैं, मैने धर्म को साक्षी करके तुम्हे पति-रूप में वरण किया है, इस समय भी तुम्हारे चरणों को स्पर्श करती हुई कह रही हूँ, इस संसार में तुम्हें छोड़कर अन्य कोई भी पुरुष मुझे स्पर्श नहीं कर सकता। किसमें शक्ति है कि प्राण रहते हमें अलग कर सके। अरी माँ, जगत जननी...!


बड़ी बहू चीत्कार करती हुई दौड़ती बाहर आ पड़ी- अरे, देखते हो, ननदरानी कैसा ढंग अपना रही हैं। देखते-देखते गृहिणी भी दौड़ी आई। बहूरानी का चीत्कार बाहर तक जा पहुँचा था- क्या हुआ, क्या हुआ, क्या हो गया? कहते गृहस्वामी और उनके पुत्र चन्द्रबाबू भी दौड़े आए। कर्ता-गृहिणी, पुत्र, पुत्रवधू और दास-दासियों से क्षण भर में घर में भीड़ हो गई। अनुपमा मूर्छित होकर खाट के समीप पड़ी हुई थी। गृहिणी रो उठी- मेरी अनु को क्या हो गया? डॉक्टर को बुलाओ, पानी लाओ, हवा करो इत्यादि। इस चीत्कार से आधे पड़ोसी घर में जमा हो गए।


बहुत देर बाद आँखें खोलकर अनुपमा धीरे-धीरे बोली- मैं कहाँ हूँ? उसकी माँ उसके पास मुँह लाती हुई स्नेहपूर्वक बोली- कैसी हो बेटी? तुम मेरी गोदी में लेटी हो।


अनुपमा दीर्घ नि:श्वास छोड़ती हुई धीरे-धीरे बोली- ओह तुम्हारी गोदी में? मैं समझ रही थी, कहीं अन्यत्र स्वप्न- नाट्य में उनके साथ बही जा रही थी? पीड़ा-विगलित अश्रु उसके कपोलों पर बहने लगे।


माता उन्हें पोंछती हुई कातर-स्वर में बोली- क्यों रो रही हो, बेटी?


अनुपमा दीर्घ नि:श्वास छोड़कर चुप रह गई। बड़ी बहू चन्द्रबाबू को एक ओर बुलाकर बोली- सबको जाने को कह दो, ननदरानी ठीक हो गई हैं। क्रमश: सब लोग चले गए।


रात को बहू अनुपमा के पास बैठकर बोली- ननदरानी, किसके साथ विवाह होने पर तुम सुखी होओगी? अनुपमा आँखें बन्द करके बोली- सुख-दुख मुझे कुछ नही है, वही मेरे स्वामी हैं...


- सो तो मैं समझती हूँ, परन्तु वे कौन हैं?


- सुरेश! मेरे सुरेश...


- सुरेश! राखाल मजमूदार के लड़के?


- हाँ, वे ही।


रात में ही गृहिणी ने यह बात सुनी। दूसरे दिन सवेरे ही मजमूदार के घर जा उपस्थित हुई। बहुत-सी बातों के बाद सुरेश की माता से बोली- अपने लड़के के साथ मेरी लड़की का विवाह कर लो। सुरेश की माता हँसती हुई बोलीं- बुरा क्या है?


- बुरे-भले की बात नहीं, विवाह करना ही होगा!


- तो सुरेश से एक बार पूछ आऊँ। वह घर में ही है, उसकी सम्मति होने पर पति को असहमति नही होगी। सुरेश उस समय घर में रहकर बी.ए.की परीक्षा की तैयारी कर रहा था, एक क्षण उसके लिए एक वर्ष के समान था। उसकी माँ ने विवाह की बात कही, मगर उसके कान में नही पड़ी। गृहिणी ने फिर कहा- सुरो, तुझे विवाह करना होगा। सुरेश मुँह उठाकर बोला- वह तो होगा ही! परन्तु अभी क्यों? पढ़ने के समय यह बातें अच्छी नहीं लगतीं। गृहिणी अप्रतिभ होकर बोली- नहीं, नहीं, पढ़ने के समय क्यों? परीक्षा समाप्त हो जाने पर विवाह होगा।


- कहाँ?


- इसी गाँव में जगबन्धु बाबू की लड़की के साथ।


- क्या? चन्द्र की बहन के साथ ? जिसे मैं बच्ची कहकर पुकारता हूँ?


- बच्ची कहकर क्यों पुकारेगा, उसका नाम अनुपमा है।


सुरेश थोड़ा हँसकर बोला- हाँ, अनुपमा! दुर वह?, दुर, वह तो बड़ी कुत्सित है!


- कुत्सित कैसे हो जाएगी? वह तो देखने में अच्छी है!


- भले ही देखने में अच्छी! एक ही जगह ससुराल और पिता का घर होना, मुझे अच्छा नही लगता।


- क्यों? उसमें और क्या दोष है?


- दोष की बात का कोई मतलब नहीं! तुम इस समय जाओ माँ, मैं थोड़ा पढ़ लूँ, इस समय कुछ भी नहीं होगा!


सुरेश की माता लौट आकर बोलीं- सुरो तो एक ही गाँव में किसी प्रकार भी विवाह नही करना चाहता।


- क्यों?


- सो तो नही जानती!


अनु की माता, मजमूदार की गृहिणी का हाथ पकड़कर कातर भाव से बोलीं- यह नही होगा, बहन! यह विवाह तुम्हे करना ही पड़ेगा।


- लड़का तैयार नहीं है; मैं क्या करूँ, बताओ?


- न होने पर भी मैं किसी तरह नहीं छोड़ूंगी।


- तो आज ठहरो, कल फिर एक बार समझा देखूंगी, यदि सहमत कर सकी।


अनु की माता घर लौटकर जगबन्धु बाबू से बोलीं- उनके सुरेश के साथ हमारी अनुपमा का जिस तरह विवाह हो सके, वह करो!


- पर क्यों, बताओ तो? राम गाँव में तो एक तरह से सब निश्चिन्त हो चुका है! उस सम्बन्ध को तोड़ दें क्या?


- कारण है।


- क्या कारण है?


- कारण कुछ नहीं, परन्तु सुरेश जैसा रूप-गुण-सम्पन्न लड़का हमें कहाँ मिल सकता है? फिर, मेरी एक ही तो लड़की है, उसे दूर नहीं ब्याहूँगी। सुरेश के साथ ब्याह होने पर, जब चाहूँगी, तब उसे देख सकूंगी।


- अच्छा प्रयत्न करूंगा।


- प्रयत्न नहीं, निश्चित रूप से करना होगा। पति नथ का हिलना-डुलना देखकर हँस पड़े। बोले- यही होगा जी।


संध्या के समय पति मजमूदार के घर से लौट आकर गृहिणी से बोले- वहाँ विवाह नही होगा।...मैं क्या करूँ, बताओ उनके तैयार न होने पर मैं जबर्दस्ती तो उन लोगों के घर में लड़की को नहीं फेंक आऊंगा!


- करेंगे क्यों नहीं?


- एक ही गाँव में विवाह करने का उनका विचार नहीं है।


गृहिणी अपने मष्तिष्क पर हाथ मारती हुई बोली- मेरे ही भाग्य का दोष है।


दूसरे दिन वह फिर सुरेश की माँ के पास जाकर बोली- दीदी, विवाह कर लो।


- मेरी भी इच्छा है; परन्तु लड़का किस तरह तैयार हो?


- मैं छिपाकर सुरेश को और भी पाँच हज़ार रुपए दूंगी।


रुपयों का लोभ बड़ा प्रबल होता है। सुरेश की माँ ने यह बात सुरेश के पिता को जताई। पति ने सुरेश को बुलाकर कहा - सुरेश, तुम्हे यह विवाह करना ही होगा।


- क्यों?


- क्यों, फिर क्यों? इस विवाह में तुम्हारी माँ का मत ही मेरा भी मत है, साथ-ही-साथ एक कारण भी हो गया है।


सुरेश सिर नीचा किए बोला- यह पढ़ने-लिखने का समय है, परीक्षा की हानि होगी।


- उसे मैं जानता हूँ, बेटा! पढ़ाई-लिखाई की हानि करने के लिए तुमसे नहीं कह रहा हूँ। परीक्षा समाप्त हो जाने पर विवाह करो।


- जो आज्ञा!


अनुपमा की माता की आनन्द की सीमा न रही। फौरन यह बात उन्होंने पति से कही। मन के आनन्द के कारण दास- दासी सभी को यह बात बताई। बड़ी बहू ने अनुपमा को बुलाकर कहा- यह लो! तुम्हारे मन चाहे वर को पकड़ लिया है।


अनुपमा लज्जापूर्वक थोड़ा हँसती हुई बोली- यह तो मैं जानती थी!


- किस तरह जाना? चिट्ठी-पत्री चलती थी क्या?


- प्रेम अन्तर्यामी है! हमारी चिठ्ठी-पत्री हृदय में चला करती है।


- धन्य हो, तुम जैसी लड़की!


अनुपमा के चले जाने पर बड़ी बहू ने धीरे-धीरे मानो अपने आप से कहा,


- देख-सुनकर शरीर जलने लगता है। मैं तीन बच्चों की माँ हूँ और यह आज मुझे प्रेम सिखाने आई है।


अँधेरे में शब्द


ओमप्रकाश वाल्मीकि


 


रात गहरी और काली है
अकालग्रस्त त्रासदी जैसी


जहां हजारों शब्द दफन हैं
इतने गहरे
कि उनकी सिसकियाँ भी
सुनाई नहीं देतीं


समय के चक्रवात से भयभीत होकर
मृत शब्द को पुनर्जीवित करने की
तमाम कोशिशें
हो जाएँगी नाकाम
जिसे नहीं पहचान पाएगी
समय की आवाज भी


ऊँची आवाज में मुनादी करने वाले भी
अब चुप हो गए हैं
'गोद में बच्चा
गाँव में ढिंढोरा'
मुहावरा भी अब
अर्थ खो चुका है


पुरानी पड़ गई है
ढोल की धमक भी


पर्वत कन्दराओं की भीत पर
उकेरे शब्द भी
अब सिर्फ
रेखाएँ भर हैं


जिन्हें चिह्नित करना
तुम्हारे लिए वैसा ही है
जैसा 'काला अक्षर भैंस बराबर'
भयभीत शब्द ने मरने से पहले
किया था आर्तनाद
जिसे न तुम सुन सके
न तुम्हारा व्याकरण ही


कविता में अब कोई
ऐसा छन्द नहीं है
जो बयान कर सके
दहकते शब्द की तपिश


बस, कुछ उच्छवास हैं
जो शब्दों के अंधेरों से
निकल कर आए हैं
शून्यता पाटने के लिए !


बिटिया का बस्ता घर से निकल रहा था
दफ्तर के लिए
सीढ़ियां उतरते हुए लगा
जैसे पीछे से किसी ने पुकारा
आवाज परिचित आत्मीयता से भरी हुई
जैसे बरसों बाद सुनी ऐसी आवाज
कंधे पर स्पर्श का आभास


मुड़ कर देखा
कोई नहीं
एक स्मृति भर थी


सुबह-सुबह दफ्तर जाने से पहले
जैसे कोई स्वप्न रह गया अधूरा
आगे बढ़ा
स्कूटर स्टार्ट करने के लिए
कान में जैसे फिर से कोई फुसफुसाया


अधूरी किताब का आखिरी पन्ना लिखने पर
पूर्णता का अहसास
जैसे पिता की हिलती मूँछें
जैसे एक नए काम की शुरुआत
नया दिन पा जाने की विकलता


रात की खौफनाक, डरावनी प्रतिध्वनियों
और खिड़की से छन कर आती पीली रोशनी से
मुक्ति की थरथराहट
भीतर कराहते
कुछ शब्द
बचे-खुचे हौसले
कुछ होने या न होने के बीच
दरकता विश्वास


कितना फर्क है होने
या न होने में


सब कुछ अविश्वसनीय-सा
जोड़-तोड़ के बीच
उछल-कूद की आतुरता
तेज, तीखी प्रतिध्वनि में
चीखती हताशा


भाषा अपनी
फिर भी लगती है पराई-सी
विस्मृत सदियों-सी कातरता
अवसादों में लिपटी हुई


लगा जैसे एक भीड़ है
आस-पास, बेदखल होती बदहवास
चारों ओर जलते घरों से उठता धुआँ
जलते दरवाजे, खिड़कियाँ
फर्ज, अलमारी
बिटिया का बस्ता
जिसे सहेजकर रखती थी करीने से
एक-एक चीज
पेंसिल, कटर, और रबर
कॉपी, किताब
हेयर-पिन, फ्रेंडिशप बैंड


बस्ता नहीं एक दुनिया थी उसकी
जिसमें झांकने या खंगालने का हक
नहीं था किसी को


जल रहा है सब कुछ धुआँ-धुआँ
बिटिया सो नहीं रही है
अजनबी घर में
जहाँ नहीं है उसका बस्ता
गोहाना की चिरायंध
फैली है हवा में
जहाँ आततायी भाँज रहे हैं
लाठी, सरिये, गंड़ासे,
पटाखों की लड़ियाँ
दियासलाई की तिल्ली
और जलती आग में झुलसता भविष्य


गर्व भरे अट्टहास में
पंचायती फरमान
बारूदी विस्फोट की तरह
फटते गैस सिलेंडर
लूटपाट और बरजोरी


तमाशबीन
शहर
पुलिस
संसद
खामोश
कानून
किताब
और
धर्म


कान में कोई फुसफुसाया -
सावधान, जले मकानों की राख में
चिनगारी अभी जिन्दा है !


धुआँ


गुलजार


 


बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में 'धुआँ' भर गया। चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई थी। सात बजे तक चौधराइन ने रो-धो कर होश सम्भाले और सबसे पहले मुल्ला खैरूद्दीन को बुलाया और नौकर को सख़्त ताकीद की कि कोई ज़िक्र न करे। नौकर जब मुल्ला को आँगन में छोड़ कर चला गया तो चौधराइन मुल्ला को ऊपर ख़्वाबगाह में ले गई, जहाँ चौधरी की लाश बिस्तर से उतार कर ज़मीन पर बिछा दी गई थी। दो सफेद चादरों के बीच लेटा एक ज़रदी माइल सफ़ेद चेहरा, सफेद भौंवें, दाढ़ी और लम्बे सफेद बाल। चौधरी का चेहरा बड़ा नूरानी लग रहा था।


मुल्ला ने देखते ही 'एन्नल्लाहे व इना अलेहे राजेउन' पढ़ा, कुछ रसमी से जुमले कहे। अभी ठीक से बैठा भी ना था कि चौधराइन अलमारी से वसीयतनामा निकाल लाई, मुल्ला को दिखाया और पढ़ाया भी। चौधरी की आख़िरी खुवाहिश थी कि उन्हें दफ़न के बजाय चिता पर रख के जलाया जाए और उनकी राख को गाँव की नदी में बहा दिया जाए, जो उनकी ज़मीन सींचती है।


मुल्ला पढ़ के चुप रहा। चौधरी ने दीन मज़हब के लिए बड़े काम किए थे गाँव में। हिन्दु-मुसलमान को एकसा दान देते थे। गाँव में कच्ची मस्जिद पक्की करवा दी थी। और तो और हिन्दुओं के शमशान की इमारत भी पक्की करवाई थी। अब कई वर्षों से बीमार पड़े थे, लेकिन इस बीमारी के दौरान भी हर रमज़ान में गरीब गुरबा की अफ़गरी (अफ़तारी) का इन्तज़ाम मस्जिद में उन्हीं की तरफ़ से हुआ करता था। इलाके के मुसलमान बड़े भक्त थे उनके, बड़ा अकीदा था उन पर और अब वसीयत पढ़ के बड़ी हैरत हुई मुल्ला को कहीं झमेला ना खड़ा हो जाए। आज कल वैसे ही मुल्क की फिज़ा खराब हो रही थी, हिन्दू कुछ ज़्यादा ही हिन्दू हो गए थे, मुसलमान कुछ ज़्यादा मुसलमान!!


चौधराइन ने कहा, 'मैं कोई पाठ पूजा नहीं करवाना चाहती। बस इतना चाहती हूँ कि शमशान में उन्हें जलाने का इन्तज़ाम कर दीजिए। मैं रामचन्द्र पंडित को भी बता सकती थी,लेकिन इस लिए नहीं बुलाया कि बात कहीं बिगड़ न जाए।'


बात बताने ही से बिगड़ गई जब मुल्ला खैरूद्दीन ने मसलेहतन पंडित रामचंन्द्र को बुला कर समझाया कि --
'तुम चौधरी को अपने शमशान में जलाने की इज़ाज़त ना देना वरना हो सकता है, इलाके के मुसलमान बावेला खड़ा कर दें। आखिर चौधरी आम आदमी तो था नहीं, बहुत से लोग बहुत तरह से उन से जुड़े हुए हैं।'
पंडित रामचंद्र ने भी यकीन दिलाया कि वह किसी तरह की शर अंगेज़ी अपने इलाके में नहीं चाहते। इस से पहले बात फैले, वह भी अपनी तरफ़ के मखसूस लोगों को समझा देंगे।


बात जो सुलग गई थी धीरे-धीरे आग पकड़ने लगी। सवाल चौधरी और चौधराइन का नहीं हैं, सवाल अकीदों का है। सारी कौम, सारी कम्युनिटि और मज़हब का है। चौधराइन की हिम्मत कैसे हुई कि वह अपने शौहर को दफ़न करने की बजाय जलाने पर तैयार हो गई। वह क्या इसलाम के आईन नहीं जानती?'


कुछ लोगों ने चौधराइन से मिलने की भी ज़िद की। चौधराइन ने बड़े धीरज से कहा,
'भाइयों! ऐसी उनकी आख़री ख्व़ाहिश थी। मिट्टी ही तो है, अब जला दो या दफन कर दो, जलाने से उनकी रूह को तसकीन मिले तो आपको एतराज़ हो सकता है?'
एक साहब कुछ ज़्यादा तैश में आ गए।
बोले, 'उन्हें जलाकर क्या आप को तसकीन होगी?'
'जी हाँ।' चौधराइन का जवाब बहुत मुख्तसर था।
'उनकी आख़री ख़्वाहिश पूरी करने से ही मुझे तसकीन होगी।'


दिन चढ़ते-चढ़ते चौधराइन की बेचैनी बढ़ने लगी। जिस बात को वह सुलह सफाई से निपटना चाहती थी वह तूल पकड़ने लगी। चौधरी साहब की इस ख़्वाहिश के पीछे कोई पेचीदा प्लाट, कहानी या राज़ की बात नहीं थी। ना ही कोई ऐसा फलसफ़ा था जो किसी दीन मज़हब या अकीदे से ज़ुड़ता हो। एक सीधी-सादी इन्सानी ख्व़ाहिश थी कि मरने के बाद मेरा कोई नाम व निशान ना रहे।
'जब हूँ तो हूँ, जब नहीं हूँ तो कहीं नहीं हूँ।'


बरसों पहले यह बात बीवी से हुई थी, पर जीते जी कहाँ कोई ऐसी तफ़सील में झाँक कर देखता है। और यह बात उस ख़्वाहिश को पूरा करना चौधराइन की मुहब्बत और भरोसे का सुबूत था। यह क्या कि आदमी आँख से ओझल हुआ और आप तमाम ओहदो पैमान भूल गए।


चौधराइन ने एक बार बीरू को भेजकर रामचंद्र पंडित को बुलाने की कोशिश भी की थी लेकिन पंडित मिला ही नहीं। उसके चौकीदार ने कहा --
'देखो भई, हम जलाने से पहले मंत्र पढ़के चौधरी को तिलक जरूर लगाएँगे।'
'अरे भई जो मर चुका उसका धर्म अब कैसे बदलेगा?'
'तुम ज़्यादा बहस तो करो नहीं। यह हो नहीं सकता कि गीता के श्लोक पढ़े बगैर हम किसी को मुख अग्नि दें। ऐसा ना करें तो आत्मा हम सब को सताएगी, तुम्हें भी, हमें भी। चौधरी साहब के हम पर बहुत एहसान हैं। हम उनकी आत्मा के साथ ऐसा नहीं कर सकते।'
बीरू लौट गया।
बीरू जब पंडित के घर से निकल रहा था तो पन्ना ने देख लिया। पन्ना ने जाकर मस्जिद में ख़बर कर दी।


आग जो घुट-घुट कर ठंडी होने लगी थी, फिर से भड़क उठी। चार-पाँच मुअतबिर मुसलमानों ने तो अपना कतई फैसला भी सुना दिया। उन पर चौधरी के बहुत एहसान थे वह उनकी रूह को भटकने नहीं देंगे। मस्जिद के पिछवाड़े वाले कब्रिस्तान में, कब्र खोदने का हुक्म भी दे दिया।


शाम होते-होते कुछ लोग फिर हवेली पर आ धमके। उन्होंने फ़ैसला कर लिया था कि चौधराइन को डरा धमका कर, चौधरी का वसीयतनामा उससे हासिल कर लिया जाए और जला दिया जाए फिर वसीयतनामा ही नहीं रहेगा तो बुढ़िया क्या कर लेगी।


चौधराइन ने शायद यह बात सूँध ली थी। वसीयतनामा तो उसने कहीं छुपा दिया था और जब लोगों ने डराने धमकाने की कोशिश की तो उसने कह दिया,
'मुल्ला खैरूद्दीन से पूछ लो, उसने वसीयत देखी है और पूरी पढ़ी है।'
'और अगर वह इन्कार कर दे तो?'
'कुरआन शरीफ़ पर हाथ रख के इन्कार कर दे तो दिखा दूँगी, वरना...'
'वरना क्या?'
'वरना कचहरी में देखना।'


बात कचहरी तक जा सकती है, यह भी वाज़े हो गया। हो सकता है चौधराइन शहर से अपने वकील को और पुलिस को बुला ले। पुलिस को बुला कर उनकी हाज़री में अपने इरादे पर अमल कर ले। और क्या पता वह अब तक उन्हें बुला भी चुकीं हों। वरना शौहर की लाश बर्फ़ की सिलों पर रखकर कोई कैसे इतनी खुद एतमादी से बात कर सकता है।


रात के वक्त ख़बरे अफ़वाहों की रफ्तार से उड़ती है।
किसी ने कहा, 'एक घोडा सवार अभी-अभी शहर की तरफ़ जाते हुए देखा गया है। घुड़सवार ने सर और मुँह साफे से ढांप रखा था, और वह चौधरी की हवेली से ही आ रहा था।'
एक ने तो उसे चौधरी के अस्तबल से निकलते हुए भी देखा था।
ख़ादू का कहना था कि उसने हवेली के पिछले अहाते में सिर्फ़ लकड़ियाँ काटने की आवाज़ ही नहीं सुनी, बल्कि पेड़ गिरते हुए भी देखा है।
चौधराइन यकीनन पिछले अहाते में, चिता लगवाने का इन्तज़ाम कर रही हैं। कल्लू का खून खौल उठा।
'बुजदिलों - आज रात एक मुसलमान को चिता पर जलाया जाएगा और तुम सब यहाँ बैठे आग की लपटें देखोगे।'
कल्लू अपने अड्डे से बाहर निकला। खून खराबा उसका पेशा है तो क्या हुआ? ईमान भी तो कोई चीज़ है।
'ईमान से अज़ीज तो माँ भी नहीं होती यारों।'


चार पाँच साथियों को लेकर कल्लू पिछली दीवार से हवेली पर चढ़ गया। बुढ़िया अकेली बैठी थी, लाश के पास। चौंकने से पहले ही कल्लू की कुल्हाड़ी सर से गुज़र गई।
चौधरी की लाश को उठवाया और मस्जिद के पिछवाड़े ले गए, जहाँ उसकी कब्र तैयार थी। जाते-जाते रमजे ने पूछा,
'सुबह चौधराइन की लाश मिलेगी तो क्या होगा?'
'बुढ़िया मर गई क्या?'
'सर तो फट गया था, सुबह तक क्या बचेगी?'
कल्लू रुका और देखा चौधराइन की ख़्वाबगाह की तरफ़। पन्ना कल्लू के 'जिगरे' की बात समझ गया।
'तू चल उस्ताद, तेरा जिगरा क्या सोच रहा है मैं जानता हूँ। सब इन्तज़ाम हो जाएगा।'


कल्लू निकल गया, कब्रिस्तान की तरफ़।
रात जब चौधरी की ख्व़ाबगाह से आसमान छुती लपटें निकल रही थी तो सारा कस्बा धुएँ से भरा हुआ था।
ज़िन्दा जला दिए गए थे,
और मुर्दे दफ़न हो चुके थे।


ओ हरामजादे


भीष्म साहनी


 


घुमक्कड़ी के दिनों में मुझे खुद मालूम न होता कि कब किस घाट जा लगूँगा। कभी भूमध्य सागर के तट पर भूली बिसरी किसी सभ्यता के खंडहर देख रहा होता, तो कभी यूरोप के किसी नगर की जनाकीर्ण सड़कों पर घूम रह होता। दुनिया बड़ी विचित्र पर साथ ही अबोध और अगम्य लगती, जान पड़ता जैसे मेरी ही तरह वह भी बिना किसी धुरे के निरुद्देश्य घूम रही है।


ऐसे ही एक बार मैं यूरोप के एक दूरवर्ती इलाके में जा पहुँचा था। एक दिन दोपहर के वक्त होटल के कमरे में से निकल कर मैं खाड़ी के किनारे बैंच पर बैठा आती जाती नावों को देख रहा था, जब मेरे पास से गुजरते हुए अधेड़ उम्र की एक महिला ठिठक कर खड़ी हो गई। मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया, मैंने समझा उसे किसी दूसरे चेहरे का मुगालता हुआ होगा। पर वह और निकट आ गई।


'भारत से आए हो?' उसने धीरे से बड़ी शिष्ट मुस्कान के साथ पूछा।


मैंने भी मुस्कुरा कर सिर हिला दिया।


'मैं देखते ही समझ गई थी कि तुम हिंदुस्तानी होगे।' और वह अपना बड़ा सा थैला बैंच पर रख कर मेरे पास बैठ गई।


नाटे कद की बोझिल से शरीर की महिला बाजार से सौदा खरीद कर लौट रही थी। खाड़ी के नीले जल जैसी ही उसकी आँखें थी। इतनी साफ नीली आँखें किवल छोटे बच्चों की ही होती हैं। इस पर साफ गौरी त्वचा। पर बाल खिचड़ी हो रहे थे और चेहरे पर हल्की हल्की रेखाएँ उतर आई थीं, जिनके जाल से, खाड़ी हो या रेगिस्तान, कभी कोई बच नहीं सकता। अपना खरीदारी का थैला बैंच पर रख कर वह मेरे पास तनिक सुस्ताने के लिए बैठ गई। वह अंग्रेज नहीं थी पर टूटी फूटी अंग्रेजी में अपना मतलब अच्छी तरह से समझा लेती थी।


'मेरा पति भी भारत का रहने वला है, इस वक्त घर पर है, तुम से मिल कर बहुत खुश होगा।'


मैं थोड़ा हैरान हुआ, इंग्लैंड और फ्रांस आदि देशों में तो हिंदुस्तानी लोग बहुत मिल जाते हैं। वहीं पर सैंकड़ों बस भी गए हैं, लेकिन यूरोप के इस दूर दराज के इलाके में कोई हिंदुस्तानी क्यों आ कर रहने लगा होगा। कुछ कुतूहलवश, कुछ वक्त काटने की इच्छा से मैं तैयार हो गया।


'चलिए, जरूर मिलना चाहूँगा।' और हम दोनों उठ खड़े हुए।


सड़क पर चलते हुए मेरी नजर बार बार उस महिला के गोल मटोल शरीर पर जाती रही। उस हिंदुस्तानी ने इस औरत में क्या देखा होगा जो घर बार छोड़ कर यहाँ इसके साथ बस गया है। संभव है, जवानी में चुलबुली और नटखट रही होगी। इसकी नीली आँखों ने कहर ढाए होंगे। हिंदुस्तानी मरता ही नीली आँखों और गोरी चमड़ी पर है। पर अब तो समय उस पर कहर ढाने लगा था। पचास पचपन की रही होगी। थैला उठाए हुए साँस बार बार फूल रहा था। कभी उसे एक हाथ में उठाती और कभी दूसरे हाथ में। मैने थैला उसके हाथ से ले लिया और हम बतियाते हुए उसके घर की ओर जाने लगे।


'आप भी कभी भारत गई हैं?' मैंने पूछा।


'एक बार गई थी, लाल ले गया था, पर इसे तो अब लगता है बीसियों बरस बीत चुके हैं।'


'लाल साहब तो जाते रहते होंगे?'


महिला ने खिचड़ी बालों वाला अपना सिर झटक कर कहा 'नहीं, वह भी नहीं गया। इसलिए वह तुम से मिल कर बहुत खुश होगा, यहाँ हिंदुस्तानी बहुत कम आते हैं।'


तंग सीढ़ियाँ चढ़ कर हम एक फ्लैट में पहुँचे, अंदर रोशनी थी और एक खुला सा कमरा जिसकी चारों दीवारों के साथ किताबों से ठसाठस भरी अलमारियाँ रखीं थीं। दीवार पर जहाँ कहीं कोई टुकड़ा खाली मिला था, वहाँ तरह तरह के नक्शे और मानचित्र टाँग दिए गए थे। उसी कमरे में दूर, खिड़की के पास वाले कमरे में काले रंग का सूट पहने, साँवले रंग और उड़ते सफेद बालों वाला एक हिंदुस्तानी बैठा कोई पत्रिका बाँच रह था।


'लाल, देखो तो कौन आया है? इनसे मिलो। तुम्हारे एक देशवासी को जबर्दस्ती खींच लाई हूँ।' महिला ने हँस कर कहा।


वह उठ खड़ा हुआ और जिज्ञासा और कुतूहल से मेरी और देखता हुआ आगे बढ़ आया।


'आइए-आइए! बड़ी खुशी हुई। मुझे लाल कहते हैं, मैं यहाँ इंजीनियर हूँ। मेरी पत्नी ने मुझ पर बड़ा एहसान किया है जो आपको ले आई हैं।'


ऊँचे, लंबे कद का आदमी निकला। यह कहना कठिन था कि भारत के किस हिस्से से आया है। शरीर का बोझिल और ढीला ढाला था। दोनों कनपटियों के पास सफेद बालों के गुच्छे से उग आए थे जबकि सिर के ऊपर गिने चुने सफेद बाल उड़ से रहे थे।


दुआ-सलाम के बाद हम बैठे ही थे कि उसने सवालों की झड़ी लगा दी। 'दिल्ली शहर तो अब बहुत कुछ बदल गया होगा?' उसने बच्चों के से आग्रह के साथ पूछा।


'हाँ। बदल गया है। आप कब थे दिल्ली में?'


'मैं दिल्ली का रहने वाला नहीं हूँ। यों लड़कपन में बहुत बार दिल्ली गया हूँ। रहने वाला तो मैं पंजाब का हूँ, जालंधर का। जालंधर तो आपने कहाँ देखा होगा।'


'ऐसा तो नहीं, मैं स्वयं पंजाब का रहने वाला हूँ। किसी जमाने में जालंधर में रह चुका हूँ।'


मेरे कहने की देर थी कि वह आदमी उठ खड़ा हुआ और लपक कर मुझे बाँहों में भर लिया।


'ओ जालम! तू बोलना नहीं एँ जे जलंधर दा रहणवाले?'


मैं सकुचा गया। ढीले ढाले बुजुर्ग को यों उत्तेजित होता देख मुझे अटपटा सा लगा। पर वह सिर से पाँव तक पुलक उठा था। इसी उत्तेजना में वह आदमी मुझे छोड़ कर तेज तेज चलता हुआ पिछले कमरे की और चला गया और थोड़ी देर बाद अपनी पत्नी को साथ लिए अंदर दाखिल हुआ जो इसी बीच थैला उठाए अंदर चली गई थी।


'हेलेन, यह आदमी जलंधर से आया है, मेरे शहर से, तुमने बताया ही नहीं।'


उत्तेजना के कारण उसका चेहरा दमकने लगा था और बड़ी बड़ी आँखों के नीचे गुमड़ों में नमी आ गई थी।


'मैंने ठीक ही किया ना', महिला कमरे में आते हुए बोली। उसने इस बीच एप्रन पहन लिया था और रसोई घर में काम करने लग गई थी। बड़ी शालीन, स्निग्ध नजर से उसने मेरी और देखा। उसके चेहरे पर वैसी ही शालीनता झलक रही थी जो दसियों वर्ष तक शिष्टाचार निभाने के बाद स्वभाव का अंग बन जती है। वह मुस्कुरती हुई मेरे पास आ कर बैठ गई।


'लाल, मुझे भारत में जगह जगह घुमाने ले गया था। आगरा, बनारस, कलकत्ता, हम बहुत घूमे थे...'


वह बुजुर्ग इस बीच टकटकी बाँधे मेरी ओर देखे जा रहा था। उसकी आँखों में वही रूमानी किस्म का देशप्रेम झलकने लगा था जो देश के बाहर रहनेवाले हिंदुस्तानी की आँखों में, अपने किसी देशवासी से मिलने पर चमकने लगता है। हिंदुस्तानी पहले तो अपने देश से भागता है और बाद से उसी हिंदुस्तानी के लिए तरसने लगता है।


'भारत छोड़ने के बाद आप बहुत दिन से भारत नहीं गए, आपकी श्रीमती बता रही थी। भारत के साथ आपका संपर्क तो रहता ही होगा?'


और मेरी नजर किताबों से ठसाठस भरी आल्मारियों पर पड़ी। दीवारों पर टँगे अनेक मानचित्र भारत के ही मानचित्र थे।


उसकी पत्नी अपनी भारत यात्रा को याद करके कुछ अनमनी सी हो गई थी, एक छाया सी मानो उसके चेहरे पर डोलने लगी हो।


'लाल के कुछ मित्र संबंधी अभी भी जालंधर में रहते हैं। कभी-कभी उनका खत आ जाता है।' फिर हँस कर बोली, 'उनके खत मुझे पढ़ने के लिए नहीं देता। कमरा अंदर से बंद करके उन्हें पढ़ता है।'


'तुम क्या जानो कि उन खतों से मुझे क्या मिलता है!' लाल ने भावुक होते हुए कहा।


इस पर उसकी पत्नी उठ खड़ी हुई।


'तुम लोग जालंधर की गलियों में घूमो, मैं चाय का प्रबंध करती हूँ।' उसने हँस कर कहा और उन्हीं कदमों रसोई घर की और घूम गई।


भारत के प्रति उस आदमी की अत्यधिक भावुकता को देख कर मुझे अचंभा भी हो रहा था। देश के बाहर दशाब्दियों तक रह चुकने के बाद भी कोई आदमी बच्चों की तरह भावुक हो सकता है, मुझे अटपटा लग रहा था।


'मेरे एक मित्र को भी आप ही की तरह भारत से बड़ा लगाव था', मैंने आवाज को हल्का करते हुए मजाक के से लहजे में कहा, 'वह भी बरसों तक देश के बाहर रहता रहा था। उसके मन में ललक उठने लगी कि कब मैं फिर से अपने देश की धरती पर पाँव रख पाऊँगा।'


कहते हुए मैं क्षण भर के लिए ठिठका। मैं जो कहने जा रहा हूँ, शायद मुझे नहीं कहना चाहिए। लेकिन फिर भी धृष्टता से बोलता चल गया, ' चुनाँचे वर्षों बाद सचमुच वह एक दिन टिकट कटवा कर हवाई जहाज द्वारा दिल्ली जा पहुँचा। उसने खुद यह किस्सा बाद में मुझे सुनाया था। हवाई जहाज से उतर कर वो बाहर आया, हवाई अड्डे की भीड़ में खड़े खड़े ही वह नीचे की और झुका और बड़े श्रद्धा भाव से भारत की धरती को स्पर्श करने के बाद खड़ा हुआ तो देखा, बटुआ गायब था...'


बुजुर्ग अभी भी मेरी ओर देखे जा रहा था। उसकी आँखों के भाव में एक तरह की दूरी आ गई थी, जैसे अतीत की अँधियारी खोह में से दो आँखें मुझ पर लगी हों।


'उसने झुक कर स्पर्श तो किया यही बड़ी बात है,' उसने धीरे से कहा, 'दिल की साध तो पूरी कर ली।'


मैं सकुचा गया। मुझे अपना व्यवहार भौंड़ा-सा लगा, लेकिन उसकी सनक के प्रति मेरे दिल में गहरी सहानुभूति रही हो, ऐसा भी नहीं था।


वह अभी भी मेरी और बड़े स्नेह से देखे जा रहा था। फिर वह सहसा उठ खड़ा हुआ - ऐसे मौके तो रोज रोज नहीं आते। इसे तो हम सेलिब्रेट करेंगे।' और पीछे जा कर एक आलमारी में से कोन्याक शराब की बोतल और दो शीशे के जाम उठा लाया।


जाम में कोन्याक उँड़ेली गई। वह मेरे साथ बगलगीर हुआ, और हमने इस अनमोल घड़ी के नाम जाम टकराए।


'आपको चाहिए कि आप हर तीसरे चौथे साल भारत की यात्रा पर जाया करें। इससे मन भरा रहता है।' मैंने कहा।


इसने सिर हिलाया 'एक बार गया था, लेकिन तभी निश्चय कर लिया था कि अब कभी भारत नहीं आऊँगा।' शराब के दो एक जामों के बाद ही वह खुलने लगा था, और उसकी भावुकता में एक प्रकार की अत्मीयता का पुट भी आने लगा था। मेरे घुटने पर हाथ रख कर बोला, 'मैं घर से भाग कर आया था। तब मैं बहुत छोटा था। इस बात को अब लगभग चालीस साल होने को आए हैं', वह थोड़ी देर के लिए पुरानी यादों में खो गया, पर फिर, अपने को झटका सा दे कर वर्तमान में लौटा लाया। 'जिंदगी में कभी कोई बड़ी घटना जिंदगी का रुख नहीं बदलती, हमेशा छोटी तुच्छ सी घटनाएँ ही जिंदगी का रुख बदलती हैं। मेरे भाई ने केवल मुझे डाँटा था कि तुम पढ़ते लिखते नहीं हो, आवारा घूमते रहते हो, पिताजी का पैसा बरबाद करते हो... और मैं उसी रात घर से भाग गया था।'


कहते हुए उसने फिर से मेरे घुटने पर हाथ रखा और बड़ी आत्मीयता से बोला 'अब सोचता हूँ, वह एक बार नहीं, दस बार भी मुझे डाँटता तो मैं इसे अपना सौभाग्य समझता। कम से कम कोई डाँटने वाला तो था।'


कहते कहते उसकी आवाज लड़खड़ा गई, 'बाद में मुझे पता चला कि मेरी माँ जिंदगी के आखिरी दिनों तक मेरा इंतजार करती रही थी। और मेरा बाप, हर रोज सुबह ग्यारह बजे, जब डाकिए के आने का वक्त होता तो वह घर के बाहर चबूतरे पर आ कर खड़ा हो जाता था। और इधर मैंने यह दृढ़ निश्चय कर रखा था कि जब तक मैं कुछ बन ना जाऊँ, घरवालों को खत नहीं लिखूँगा।'


एक क्षीण सी मुस्कान उसके होंठों पर आई और बुझ गई', फिर मैं भारत गया। यह लगभग पंद्रह साल बाद की बात रही होगी। मैं बड़े मंसूबे बाँध कर गया था...'


उसने फिर जाम भरे और अपना किस्सा सुनाने को मुँह खोला ही था कि चाय आ गई। नाटे कद की उसकी गोलमटोल पत्नी चाय की ट्रे उठाए, मुस्कराती हुई चली आ रही थी। उसे देख कर मन में फिर से सवाल उठा, क्या यह महिला जिंदगी का रुख बदलने का कारण बन सकती है?


चाय आ जाने पर वार्तालाप में औपचारिकता आ गई।


'जालंधर में हम माई हीराँ के दरवाजे के पास रहते थे। तब तो जालंधर बड़ा टूटा फूटा सा शहर था। क्यों, हनी? तुम्हे याद है, जालंधर में हम कहाँ पर रहे थे?'


'मुझे गलियों के नाम तो मालूम नहीं, लाल, लेकिन इतना याद है कि सड़कों पर कुत्ते बहुत घूमते थे, और नालियाँ बड़ी गंदी थीं, मेरी बड़ी बेटी - तब वह डेढ़ साल की थी - मक्खी देख कर डर गई थी। पहले कभी मक्खी नहीं देखी थी। वहीं पर हमने पहली बार गिलहरी को भी देखा था। गिलहरी उसके सामने से लपक कर एक पेड़ पर चड़ गई तो वह भागती हुई मेरे पास दौड़ आई थी। ...और क्या था वहाँ?'


'...हम लाल के पुश्तैनी घर में रहे थे...'


चाय पीते समय हम इधर उधर कि बातें करते रहे। भारत की अर्थव्यवस्था की, नए नए उद्योग धंधों की, और मुझे लगा कि देश से दूर रहते हुए भी यह आदमी देश की गति-विधि से बहुत कुछ परिचित है।


'मैं भारत में रहते हुए भी भारत के बारे में बहुत कम जानता हूँ, आप भारत से दूर हैं, पर भारत के बारे में बहुत कुछ जानते हैं।'


उसने मेरी और देखा और हौले से मुस्करा कर बोला, 'तुम भारत में रहते हो, यही बड़ी बात है।'


मुझे लगा जैसे सब कुछ रहते हुए भी, एक अभाव सा, इस आदमी के दिल को अंदर ही अंदर चाटता रहता है - एक खला जिसे जीवन की उपलब्धियाँ और आराम आसायश, कुछ भी नहीं पाट सकता, जैसे रह रह कर कोई जख्म सा रिसने लगता हो।


सहसा उसकी पत्नी बोली, 'लाल ने अभी तक अपने को इस बात के लिए माफ नहीं किया कि उसने मेरे साथ शादी क्यों की।'


'हेलेन...'


मैं अटपटा महसूस करने लगा। मुझे लगा जैसे भारत को ले कर पति पत्नी के बीच अक्सर झगड़ा उठ खड़ा होता होगा, और जैसे इस विषय पर झगड़ते हुए ही ये लोग बुढ़ापे की दहलीज तक आ पहुँचे थे। मन में आया कि मैं फिर से भारत की बुराई करूँ ताकि यह सज्जन आपनी भावुक परिकल्पनाओं से छुटकारा पाएँ लेकिन यह कोशिश बेसूद थी।


'सच कहती हूँ', उसकी पत्नी कहे जा रही थी, 'इसे भारत में शादी करनी चाहिए थी। तब यह खुश रहता। मैं अब भी कहती हूँ कि यह भारत चला जाए, और मैं अलग यहाँ रहती रहूँगी। हमारी दोनो बेटियाँ बड़ी हो गई हैं। मैं अपना ध्यान रख लूँगी...'


वह बड़ी संतुलित, निर्लिप्त आवाज में कहे जा रही थी। उसकी आवाज में न शिकायत का स्वर था, न क्षोभ का। मानो अपने पति के ही हित की बात बड़े तर्कसंगत और सुचिंतित ढंग से कह रही हो।


'पर मैं जानती हूँ, यह वहाँ पर भी सुख से नहीं रह पाएगा। अब तो वहाँ की गर्मी भी बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। और वहाँ पर अब इसका कौन बैठा है? माँ रही, न बाप। भाई ने मरने से पहले पुराना पुश्तैनी घर भी बेच दिया था।'


'हेलेन, प्लीज...' बुजुर्ग ने वास्ता डालने के से लहजे में कहा।


अबकी बार मैंने स्वयं इधर उधर की बातें छेड़ दीं। पता चला कि उनकी दो बेटियाँ हैं, जो इस समय घर पर नहीं थीं, बड़ी बेटी बाप की ही तरह इंजीनियर बनी थी, जबकी छोटी बेटी अभी युनिवर्सिटी में पढ़ रही थी, कि दोनो बड़ी समझदार और प्रतिभासंपन्न हैं। युवतियाँ हैं।


क्षण भर के लिए मुझे लगा कि मुझे इस भावुकता की ओर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए, इसे सनक से ज्यादा नहीं समझना चाहिए, जो इस आदमी को कभी कभी परेशान करने लगती है जब अपने वतन का कोई आदमी इससे मिलता है। मेरे चले जाने के बाद भावुकता का यह ज्वार उतर जाएगा और यह फिर से अपने दैनिक जीवन की पटरी पर आ जाएगा।


आखिर चाय का दौर खतम हुआ. और हमने सिगरेट सुलगाया। कोन्याक का दौर अभी भी थोड़े थोड़े वक्त के बाद चल रहा था। कुछ देर सिगरेटों सिगारों की चर्चा चली, इसी बीच उसकी पत्नी चाय के बर्तन उठा कर किचन की ओर बढ़ गई।


'हाँ, आप कुछ बता रहे थे कि कोई छोटी सी घटना घटी थी...'


वह क्षण भर के लिए ठिठका, फिर सिर टेढ़ा करके मुस्कुराने लगा, 'तुम अपने देश से ज्यादा देर बाहर नहीं रहे इस लिए नहीं जानते कि परदेश में दिल की कैफियत क्या होती है। पहले कुछ साल तो मैं सब कुछ भूले रहा पर भारत से निकले दस-बारह साल बाद भारत की याद रह रह कर मुझे सताने लगी। मुझ पर इक जुनून सा तारी होने लगा। मेरे व्यवहार में भी इक बचपना सा आने लगा। कभी कभी मैं कुर्ता-पायजामा पहन कर सड़कों पर घूमने लगता था, ताकि लोगों को पता चले कि मैं हिंदुस्तानी हूँ, भारत का रहने वाला हूँ। कभी जोधपुरी चप्पल पहन लेता, जो मैंने लंदन से मँगवाई थी, लोग सचमुच बड़े कुतूहल से मेरी चप्पल की ओर देखते, और मुझे बड़ा सुख मिलता। मेरा मन चाहता कि सड़कों पर पान चबाता हुआ निकलूँ, धोती पहन कर चलूँ। मैं सचमुच दिखाना चाहता था कि मैं भीड़ में खोया अजनबी नहीं हूँ, मेरा भी कोई देश है, मैं भी कहीं का रहने वाला हूँ। परदेस में रहने वाले हिंदुस्तानी के दिल को जो बात सबसे ज्यादा सालती है, वह यह कि वह परदेश में एक के बाद एक सड़क लाँघता चला जाए और उसे कोई जानता नहीं, कोई पहचानता नहीं, जबकि अपने वतन में हर तीसरा आदमी वाकिफ होता है। दिवाली के दिन मैं घर में मोमबत्तियाँ ला कर जला देता, हेलेन के माथे पर बिंदी लगाता, उसकी माँग में लाल रंग भरता। मैं इस बात के लिए तरस तरस जाता कि रक्षा बंधन का दिन हो और मेरी बहिन अपने हाथों से मुझे राखी बाँधे, और कहे 'मेरा वीर जुग जुग जिए!' मैं 'वीर' शब्द सुन पाने के लिए तरस तरस जाता। आखिर मैंने भारत जाने का फैसला कर लिया। मैंने सोचा, मैं हेलेन को भी साथ ले चलूँगा और अपनी डेढ़ बरस की बच्ची को भी। हेलेन को भारत की सैर कराऊँगा और यदि उसे भारत पसंद आया तो वहीं छोटी मोटी नौकरी करके रह जाऊँगा।'


'पहले तो हम भारत में घूमते-घामते रहे। दिल्ली, आगरा, बनारस... मैं एक एक जगह बड़े चाव से इसे दिखाता और इसकी आँखों में इसकी प्रतिक्रिया देखता रहता। इसे कोई जगह पसंद होती तो मेरा दिल गर्व से भर उठता।'


'फिर हम जलंधर गए।' कहते ही वह आदमी फिर से अनमना सा हो कर नीचे की और देखने लगा और चुपचाप सा हो गया, मुझे लगा जैसे वह मन ही मन दूर अतीत में खो गया है और खोता चला जा रहा है। पर सहसा उसने कंधे झटक दिए और फर्श की ओर आँखे लगाए ही बोला, 'जालंधर में पहुँचते ही मुझे घोर निराशा हुई। फटीचर सा शहर, लोग जरूरत से ज्यादा काले और दुबले। सड़कें टूटी हुई। सभी कुछ जाना पहचाना था लेकिन बड़ा छोटा छोटा और टूटा फूटा। क्या यही मेरा शहर है जिसे मैं हेलेन को दिखाने लाया हूँ? हमारा पुश्तैनी घर जो बचपन में मुझे इतना बड़ा बड़ा और शानदार लगा करता था, पुराना और सिकुड़ा हुआ। माँ बाप बरसों पहले मर चुके थे। भाई प्यार से मिला लेकिन उसे लगा जैसे मैं जायदाद बाँटने आया हूँ और वह पहले दिन से ही खिंचा खिंचा रहने लगा। छोटी बहन की दस बरस पहले शादी हो चुकी थी और वह मुरादाबाद में जा कर रहने लगी थी। क्या मैं विदेशों में बैठा इसी नगर के स्वप्न देखा करता था? क्या मैं इसी शहर को देख पाने के लिए बरसों से तरसता रहा हूँ? जान पहचान के लोग बूढ़े हो चुके थे। गली के सिरे पर कुबड़ा हलवाई बैठा करता था। अब वह पहले से भी ज्यादा पिचक गया था, और दुकान में चौकी पर बैठने के बजाय, दुकान के बाहर खाट पर उकड़ूँ बैठा था। गलियाँ बोसीदा, सोई हुई। मैं हेलेन को क्या दिखाने लाया हूँ? दो तीन दिन इसी तरह बीत गए। कभी मैं शहर से बाहर खेतों में चला जाता, कभी गली बाजार में घूमता। पर दिल में कोई स्फूर्ति नहीं थी, कोई उत्साह नहीं था। मुझे लगा जैसे मैं फिर किसी पराए नगर में पहुँच गया हूँ।


तभी एक दिन बाजार में जाते हुए मुझे अचानक ऊँची सी आवाज सुनायी दी - 'ओ हरामजादे!' मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया। यह हमारे शहर की परंपरागत गाली थी जो चौबिसों घंटे हर शहरी की जबान पर रहती थी। केवल इतना भर विचार मन में उठा कि शहर तो बूढ़ा हो गया है लेकिन उसकी तहजीब ज्यों की त्यों कायम है।


'ओ हराम जादे! अपने बाप की तरफ देखता भी नहीं?'


मुझे लगा जैसे कोई आदमी मुझे ही संबोधन कर रहा है। मैंने घूम कर देखा। सड़क के उस पार, साइकिलों की एक दुकान के चबूतरे पर खड़ा एक आदमी मुझे ही बुला रहा था।


मैंने ध्यान से देखा। काली काली फनियर मूँछों, सपाट गंजे सिर और आँखों पर लगे मोटे चश्मे के बीच से एक आकृति सी उभरने लगी। फिर मैंने झट से उसे पहचान लिया। वह तिलकराज था, मेरा पुराना सहपाठी।


'हरामजादे! अब बाप को पहचानता भी नहीं है!' दूसरे क्षण हम दोनों एक दूसरे की बाँहों में थे।


'ओ हराम दे! बाहर की गया, साहब बन गया तूँ?' तेरी साहबी विच मैं...' और उसने मुझे जमीन पर से उठा लिया। मुझे डर था कि वह सचमुच ही जमीन पर मुझे पटक न दे। दूसरे क्षण हम एक दूसरे को गालियाँ निकाल रहे थे।


मुझे लड़कपन का मेरा दोस्त मिल गया था। तभी सहसा मुझे लगा जैसे जालंधर मिल गया है, मुझे मेरा वतन मिल गया है। अभी तक मैं अपने शहर में अजनबी सा घूम रहा था। तिलकराज से मिलने की देर थी कि मेरा सारा परायापन जाता रहा। मुझे लगा जैसे मैं यहीं का रहने वाला हूँ। मैं सड़क पर चलते किसी भी आदमी से बात कर सकता हूँ, झगड़ सकता हूँ। हर इनसान कहीं का बन कर रहना चाहता है। अभी तक मैं अपने शहर में लौट कर भी परदेसी था, मुझे किसी ने पहचाना नहीं था। अपनाया नहीं था। यह गाली मेरे लिए वह तंतु थी, सोने की वह कड़ी थी जिसने मुझे मेरे वतन से, मेरे लोगों से, मेरे बचपन और लड़कपन से, फिर से जोड़ दिया था।


तिलकराज की और मेरी हरकतों में बचपना था, बेवकूफी थी। पर उस वक्त वही सत्य था, और उसकी सत्यता से आज भी मैं इनकार नहीं कर सकता। दिल दुनिया के सच बड़े भौंड़े पर बड़े गहरे और सच्चे होते हैं।


'चल, कहीं बैठ कर चाय पीते हैं', तिलकराज ने फिर गाली दे कर कहा। 'वह पंजाबी दोस्त क्या जो गाली दे कर, पक्कड़ तोल कर बगलगीर न हो जाए।'


हम दोनों, एक दूसरे की कमर में हाथ डाले, खरामा खरामा माई हीराँ के दरवाजे की ओर जाने लगे। मेरी चाल में पुराना अलसाव आ गया। मैं जालंधर की गलियों में यूँ घूमने लगा जैसे कोई जागीरदार अपनी जागीर में घूमता है। मैं पुलक पुलक रहा था। किसी किसी वक्त मन में से आवाज उठती, तुम यहाँ के नहीं हो, पराए हो, परदेसी हो, पर मैं अपने पैर और भी जोर से पटक पटक कर चलने लगता।


'चुच्चा हलवाई अभी भी वहीं पर बैठता है?'


'और क्या, तू हमें धोखा दे गया है, और लोगों ने तो धोखा नहीं दिया।'


इसी अल्हड़पन से, एक दूसरे की कमर में हाथ डाले, हम किसी जमाने में इन्हीं सड़कों पर घूमा करते थे। तिलकराज के साथ मैं लड़कपन में पहुँच गया था, उन दिनों का अलबेलापन महसूस करने लग था।


हम एक मैले कुचैले ढाबे में जा बैठे। वही मक्खियों और मैल से अटा गंदा मेज, पर मुझे परवाह नहीं थी, यह मेरे जालंधर के ढाबे का मेज था। उस वक्त मेरा दिल करता कि हेलेन मुझे इस स्थिति में आ कर देखे, तब वह मुझे जान लेगी कि मैं कौन हूँ, कहाँ का रहने वाला हूँ, कि दुनिया में एक कोना ऐसा भी है जिसे मैं अपना कह सकता हूँ, यह गंदा ढाबा, यह धुआं भरी फटीचर खोह।


ढाबे से निकल कर हम देर तक सड़कों पर मटरगश्ती करते रहे यहाँ तक कि थक कर चूर हो गए। वह उसी तरह मुझे अपने घर के सामने तक ले गया। जैसे लड़कपन में मैं उसके साथ चलता हुआ, उसे उसके घर तक छोड़ने जाता था, फिर वह मुझे मेरे घर तक छोड़ने आता था।


तभी उसने कहा, 'कल रात खाना तुम मेरे घर पर खाओगे। अगर इनकार किया तो साले, यहीं तुझे गले से पकड़ कर नाली में घुसेड़ दूँगा।'


'आऊँगा,' मैंने झट से कहा।


'अपनी मेम को भी लाना। आठ बजे मैं तेरी राह देखूँगा। अगर नहीं आया तो साले हराम दे...'


और पुराने दिनों की ही तरह उसने पहले हाथ मिलाया और फिर घुटना उठा कर मेरी जाँघ पर दे मारा। यही हमारा विदा होने का ढंग हुआ करता था। जो पहले ऐसा कर जाए कर जाए। मैंने भी उसे गले से पकड़ लिया और नीचे गिराने का अभिनय करने लगा।


यह स्वाँग था। मेरी जालंधर की सारी यात्रा ही छलावा थी। कोई भावना मुझे हाँके चले जा रही थी और मैं इस छलावे में ही खोया रहना चाहता था।


दूसरे रोज, आठ बजते न बजते, हेलेन और मैं उसके घर जा पहुँचे। बच्ची को हमने पहले ही खिला कर सुला दिया था। हेलेन ने अपनी सबसे बढ़िया पोशाक पहनी, काले रंग का फ्राक, जिसपर सुनहरी कसीदाकारी हो रही थी, कंधों पर नारंगी रंग का स्टोल डाला, और बार बार कहे जाती : 'तुम्हारा पुराना दोस्त है तो मुझे बन सँवर कर ही जाना चाहिए ना।'


मैं हाँ कह देता पर उसके एक एक प्रसाधन पर वह और भी ज्यादा दूर होती जा रही थी। न तो काला फ्राक और बनाव सिंगार और न स्टोल और इत्र फुलेल ही जालंधर में सही बैठते थे। सच पूछो तो मैं चाहता भी नहीं था कि हेलेन मेरे साथ जाए। मैंने एकाध बार उसे टालने की कोशिश भी की, जिस पर वह बिगड़ कर बोली, 'वाह जी, तुम्हारा दोस्त हो और मैं उससे न मिलूँ? फिर तुम मुझे यहाँ लाए ही क्यों हो?'


हम लोग तो ठीक आठ बजे उसके घर पहुँच गए लेकिन उल्लू के पट्ठे ने मेरे साथ धोखा किया। मैं समझे बैठा था कि मैं और मेरी पत्नी ही उसके परिवार के साथ खाना खाएँगे। पर जब हम उसके घर पहुँचे तो उसने सारा जालंधर इकट्ठा कर रखा था, सारा घर मेहमानों से भरा था। तरह तरह के लोग बुलाए गए थे। मुझे झेंप हुई। अपनी ओर से वह मेरा शानदार स्वागत करना चाहता था। वह भी पंजाबी स्वभाव के अनुरूप ही। दोस्त बाहर से आए और वह उसकी खातिरदारी न करे। अपनी जमीन जायदाद बेच कर भी वह मेरी खातिरदारी करता। अगर उसका बस चलता तो वह बैंड बाजा भी बुला लेता। पर मुझे बड़ी कोफ्त हुई। जब हम पहुँचे तो बैठक वाला कमरा मेहमानों से भरा था, उनमें से अनेक मेरे परिचित भी निकल आए और मेरे मन में फिर हिलोर सी उठने लगी।


पत्नी से मेरा परिचय कराने के लिए मुझे बैठक में से रसोईघर की ओर ले गया। वह चूल्हे के पास बैठी कुछ तल रही थी। वह झट से उठ खड़ी हुई दुपट्टे के कोने से हाथ पोंछते हुए आगे बढ़ आई। उसका चेहरा लाल हो रहा था और बालों की लट माथे पर झूल आई थी। ठेठ पंजाबिन, अपनत्व से भरी, मिलनसार, हँसमुख। उसे यों उठते देख कर मेरा सारा शरीर झनझना उठा। मेरी भावज भी चूल्हे से ऐसे ही उठ आया करती थी, दुपट्टे के कोने से हाथ पोंछती हुई, मेरी बड़ी बहनें भी, मेरी माँ भी। पंजाबी महिला का सारा बाँकापन, सारी आत्मीयता उसमें जैसे निखर निखर आई थी। किसी पंजाबिन से मिलना हो तो रसोईघर की दहलीज पर ही मिलो। मैं सराबोर हो उठा। वह सिर पर पल्ला ठीक करती हुई, लजाती हुई सी मेरे सामने आ खड़ी हुई।


'भाभी, यह तेरा घरवाला तो पल्ले दर्जे का बेवकूफ है, तुम इसकी बातों में क्यों आ गईं?'


'इतना आडंबर करने की क्या जरूरत थी? हम लोग तो तुमसे मिलने आए हैं...'


फिर मैंने तिलकराज की और मुखातिब हो कर कह, 'उल्लू के पट्ठे, तुझे मेहमाननवाजी करने को किसने कहा था? हरामी, क्या मैं तेरा मेहमान हूँ? ... मैं तुझसे निबट लूँगा।'


उसकी पत्नी कभी मेरी ओर देखती, कभी अपने पति की ओर फिर धीरे से बोली, 'आप आएँ और हम खाना भी न करें? आपके पैरों से तो हमारा घर पवित्र हुआ है।'


वही वाक्य जो शताब्दियों से हमारी गृहणियाँ मेहमानों से कहती आ रही हैं।


फिर वह हमें छोड़ कर सीधा मेरी पत्नी से मिलने चली गई और जाते ही उसका हाथ पकड़ लिया और बड़ी आत्मीयता से उसे खींचती हुई एक कुर्सी की ओर ले गई। वह यों व्यवहार कर रही थी जैसे उसका भाग्य जागा हो। हेलेन को कुर्सी पर बैठाने के बाद वह स्वयं नीचे फर्श पर बैठ गई। वह टूटी फूटी अंग्रेजी बोल लेती थी और बेधड़क बोले जा रही थी। हर बार उनकी आँखें मिलतीं तो वह हँस देती। उसके लिए हेलेन तक अपने विचार पहुँचाना कठिन था लेकिन अपनी आत्मीयता और स्नेह भाव उस तक पहुँचाने में उसे कोई कठिनाई नहीं हुई।


उस शाम तिलकराज की पत्नी हेलेन के आगे पीछे घूमती रही। कभी अंदर से कढ़ाई के कपड़े उठा लाती और एक-एक करके हेलेन को दिखाने लगती। कभी उसका हाथ पकड़ कर उसे रसोईघर में ले जाती, और उसे एक एक व्यंजन दिखाती कि उसने क्या क्या बनाया है और कैसे कैसे बनाया है। फिर वह अपनी कुल्लू की शाल उठा लाई और जब उसने देखा कि हेलेन को पसंद आई है, तो उसने उसके कंधों पर डाल दी।


इस सारी आवभगत के बावजूद हेलेन थक गई। भाषा की कठिनाई के बावजूद वह बड़ी शालीनता के साथ सभी से पेश आई। पर अजनबी लोगों के साथ आखिर कोई कितनी देर तक शिष्टाचार निभाता रहे? अभी ड्रिंक्स ही चल रहे थे जब वह एक कुर्सी पर थक कर बैठ गई। जब कभी मेरी नजर हेलेन की ओर उठती तो वह नजर नीची कर लेती, जिसक मतलब था कि मैं चुपचाप इस इंतजार में बैठी हूँ कि कब तुम मुझे यहाँ से ले चलो।


रात के बारह बजे के करीब पार्टी खत्म हुई और तिलकराज के यार दोस्त नशे में झूमते हुए अपने-अपने घर जाने लगे। उस वक्त तक काफी शोर गुल होने लगा था, कुछ लोग बहकने भी लगे थे। एक आदमी के हाथ से शराब का गिलास गिर कर टूट गया था।


जब हम लोग भी जाने को हुए और हेलेन भी उठ खड़ी हुई तो तिलकराज ने पंजाबी दस्तूर के मुताबिक कहा - बैठ जा, बैठ जा, कोई जाना वाना नहीं है।


'नहीं यार, अब चलें। देर हो गई है।'


उसने फिर मुझे धक्का दे कर कुर्सी पर फेंक दिया।


कुछ हल्का हल्का सरूर, कुछ पुरानी याद, तिलकराज का प्यार और स्नेह उसकी पत्नी का आत्मीयता से भरा व्यवहार, मुझे भला लग रहा था। सलवार कमीज पहने बालों का जूड़ा बनाए, चूड़ियाँ खनकाती एक कमरे से दूसरे कमरे में जाती हुई तिलकराज की पत्नी मेरे लिए मेरे वतन का मुजस्समा बन गई थी, मेरे देश की समुची संस्कृति उसमें सिमट आई थी। मेरे दिल में, कहीं गहरे में, एक टीस सी उठी कि मेरे घर में भी कोई मेरे ही देश की महिला एक कमरे से दूसरे कमरे में घूमा करती, उसी की हँसी गूँजती, मेरे ही देश के गीत गुनगुनाती। वर्षों से मैं उन बोलों के लिए तरस गया था जो बचपन में अपने घर में सुना करता था।


हेलेन से मुझे कोई शिकायत नहीं थी। मेरे लिए उसने क्या नहीं किया था। उसने चपाती बनाना सीख लिया था। दाल छौंकना सीख लिया था। शादी के कुछ समय बाद ही वह मेरे मुँह से सुने गीत-टप्पे भी गुनगुनाने लगी थी। कभी कभी सलवार कमीज पहन कर मेरे साथ घूमने निकल पड़ती। रसोईघर की दीवार पर उसने भारत का एक मानचित्र टाँग दिया था जिस पर अनेक स्थानों पर लाल पेंसिल से निशान लगा रखे थे कि जालंधर कहाँ है और दिल्ली कहाँ है और अमृतसर कहाँ है जहाँ मेरी बड़ी बहन रहती थी। भारत संबंधी जो किताब मिलती, उठा लाती, जब कभी कोई हिंदुस्तानी मिल जाता उसे आग्रह अनुरोध करके घर ले आती। पर उस समय मेरी नजर में यह सब बनावट था, नकल थी, मुलम्मा था - इनसान क्यों नहीं विवेक और समझदारी के बल पर अपना जीवन व्यतीत कर सकता? क्यों सारा वक्त तरह तरह के अरमान उसके दिल को मथते रहते हैं?


'फिर?' मैंने आग्रह से पूछा।


उसने मेरी ओर देखा और उसके चेहरे की मांसपेशियों में हल्का सा कंपन हुआ। वह मुस्करा कर कहने लगा, 'तुम्हे क्या बताऊँ।' तभी मैं एक भूल कर बैठा। हर इनसान कहीं न कहीं पागल होता है और पागल बना रहना चाहता है... जब मैं विदा लेने लगा और तिलकराज कभी मुझे गलबहियाँ दे कर और कभी धक्का दे कर बिठा रहा था और हेलेन भी पहले से दरवाजे पर जा खड़ी हुई थी, तभी तिलकराज की पत्नी लपक कर रसोईघर की ओर से आई और बोली, 'हाय, आप लोग जा रहे हैं? यह कैसे हो सकता है? मैंने तो खास आपके लिए सरसों का साग और मक्के की रोटियाँ बनाई हैं।'


मैं ठिठक गया। सरसों का साग और मक्की की रोटियाँ पंजाबियों का चहेता भोजन है।


'भाभी, तुम भी अब कह रही हो? पहले अंटसंट खिलाती रही हो और अब घर जाने लगे हैं तो...'


'मैं इतने लोगों के लिए कैसे मक्की की रोटियाँ बना सकती थी? अकेली बनाने वाली जो थी। मैंने आपके लिए थोड़ी सी बना दी। यह कहते थे कि आपको सरसों का साग और मक्की की रोटी बहुत पसंद है...'


सरसों का साग और मक्की की रोटी। मैं चहक उठा, और तिलकराज को संबोधन करके कहा, 'ओ हरामी, मुझे बताया क्यों नहीं?' और उसी हिलोरे में हेलेन से कहा, 'आओ हेलेन, भाभी ने सरसों का साग बनाया है। यह तो तुम्हे चखना ही होगा।'


हेलेन खीज उठी। पर अपने को संयत कर मुस्कुराती हुई बोली, 'मुझे नहीं, तुम्हे चखना होगा।' फिर धीरे से कहने लगी, 'मैं बहुत थक गई हूँ। क्या यह साग कल नहीं खाया जा सकता?'


सरसों का साग, नाम से ही मैं बावला हो उठा था। उधर शराब का हल्का हल्का नशा भी तो था।


'भाभी ने खास हमारे लिए बनाया है। तुम्हे जरूर अच्छा लगेगा।'


फिर बिना हेलेन के उत्तर का इंतजार किए, साग है तो मैं तो रसोईघर के अंदर बैठ कर खाऊँगा। मैंने बच्चों की तरह लाड़ से कहा, 'चल बे, उल्लू के पट्ठे, उतार जूते, धो हाथ और बैठ जा थाली के पास! एक ही थाली में खाएँगे।'


छोटा सा रसोईघर था। हमारे अपने घर में भी ऐसा ही रसोईघर हुआ करता था जहाँ माँ अंगीठी के पास रोटियाँ सेंका करती थी और हम घर के बच्चे, साझी थालियों में झुके लुकमे तोड़ा करते थे।


फिर एक बार चिरपरिचित दृश्य मानों अतीत में से उभर कर मेरी आँखों के सामने घूमने लगा था और मैं आत्मविभोर हो कर उसे देखे जा रहा था। चूल्हे की आग की लौ में तिलकराज की पत्नी के कान का झूमर चमक चमक जाता था। सोने के काँटे में लाल नगीना पंजाबियों को बहुत फबता है। इस पर हर बार तवे पर रोटी सेंकने पर उसकी चूड़ियाँ खनक उठतीं और वह दोनो हाथों से गरम गरम रोटी तवे पर से उतार कर हँसते हुए हमारी थाली में डाल देती।


यह दृश्य मैं बरसों के बाद देख रहा था और यह मेरे लिए किसी स्वप्न से भी अधिक सुंदर और हृदयग्राही था। मुझे हेलेन की सुध भी नहीं रही। मैं बिल्कुल भूले हुए था कि बैठक में हेलेन अकेली बैठी मेरा इंतजार कर रही है। मुझे डर था कि अगर मैं रसोईघर में से उठ गया तो स्वप्न भंग हो जाएगा। यह सुंदरतम चित्र टुकड़े टुकड़े हो जाएगा। लेकिन तिलकराज की पत्नी उसे नहीं भूली थी। वह सबसे पहले एक तशतरी में मक्की की रोटी और थोड़ा सा साग और उस पर थोड़ा सा मक्खन रख कर हेलेन के लिए ले गई थी। बाद में भी, दो एक बार बीच बीच में उठ कर उसके पास कुछ न कुछ ले जाती रही थी।


खाना खा चुकने पर, जब हम लोग रसोईघर में से निकल कर बैठक में आए तो हेलेन कुर्सीं में बैठे बैठे सो गई थी और तिपाई पर मक्की की रोटी अछूती रखी थी। हमारे कदमों की आहट पा कर उसने आँखें खोलीं और उसी शालीन शिष्ट मुस्कान के साथ उठ खड़ी हुई।


विदा ले कर जब हम लोग बाहर निकले तो चारों ओर सन्नाटा छाया था। नुक्क्ड़ पर हमें एक ताँगा मिल गया। ताँगे में घूमे बरसों बीत चुके थे, मैंने सोचा हेलेन को भी इसकी सवारी अच्छी लगेगी। पर जब हम लोग ताँगे में बैठ कर घर की ओर जाने लगे तो रास्ते में हेलेन बोली, 'कितने दिन और तुम्हारा विचार जालंधर में रहने का है?'


'क्यों अभी से ऊब गईं क्या?' आज तुम्हे बहुत परेशान किया ना, आई ऐम सारी।'


हेलेन चुप रही, न हूँ, न हाँ।


'हम पंजाबी लोग सरसों के साग के लिए पागल हुए रहते हैं। आज मिला तो मैंने सोचा जी भर के खाओ। तुम्हे कैसे लगा?'


'सुनो, मैं सोचती हूँ मैं यहाँ से लौट जाऊँ, तुम्हारा जब मन आए, चले आना।'


'यह क्या कह रही हो हेलेन, क्या तुम्हे मेरे लोग पसंद नहीं हैं?'


भारत में आने पर मुझे मन ही मन कई बार यह खयाल आया था कि अगर हेलेन और बच्ची साथ में नहीं आतीं तो मैं खुल कर घूम फिर सकता था। छुट्टी मना सकता था। पर मैं स्वयं ही बड़े आग्रह से उसे अपने साथ लाया था। मैं चाहता था कि हेलेन मेरा देश देखे, मेरे लोगों से मिले, हमारी नन्ही बच्ची के संस्कारों में भारत के संस्कार भी जुड़ें और यदि हो सके तो मैं भारत में ही छोटी मोटी नौकरी कर लूँ।


हेलेन की शिष्ट, संतुलित आवाज में मुझे रुलाई का भास हुआ। मैंने दुलार से उसे आलिंगन में भरने की कोशिश की। उसमे धीरे से मेरी बाँह को परे हटा दिया। मुझे दूसरी बार उसके इर्द-गिर्द अपनी बाँह डाल देनी चाहिए थी, लेकिन मैं स्वयं तुनक उठा।


'तुम तो बड़ी डींग मारा करतीं हो कि तुम्हे कुछ भी बुरा नहीं लगता और अभी एक घंटे में ही कलई खुल गई।'


ताँगे में हिचकोले आ रहे थे। पुराना फटीचर सा ताँगा था, जिसके सब चूल ढीले थे। हेलेन को ताँगे के हिचकोले परेशान कर रहे थे। ऊबड़-खाबड़, गड्ढों से भरी सड़क पर हेलेन बार बार सँभल कर बैठने की कोशिश कर रही थी।


'मैं सोचती हूँ, मैं बच्ची को ले कर लौट जाऊँगी। मेरे यहाँ रहते तुम लोगों से खुल कर नहीं मिल सकते।' उसकी आवाज में औपचारिकता का वैसा ही पुट था जैसा सरसों के साग की तारीफ करते समय रहा होगा, झूठी तारीफ और यहाँ झूठी सद्भावना।


'तुम खुद सारा वक्त गुमसुम बैठी रही हो। मैं इतने चाव से तुम्हे अपना देश दिखाने लाया हूँ।'


'तुम अपने दिल की भूख मिटाने आए हो, मुझे अपना देश दिखाने नहीं लाए', उसने स्थिर, समतल, ठंडी आवाज में कहा, और अब मैंने तुम्हारा देश देख लिया है।'


मुझे चाबुक सी लगी।


'इतना बुरा क्या है मेरे देश में जो तुम इतनी नफरत से उसके बारे में बोल रही हो? हमारा देश गरीब है तो क्या, है तो हमारा अपना।'


'मैंने तुम्हारे देश के बारे में कुछ नहीं कहा।'


'तुम्हारी चुप्पी ही बहुत कुछ कह देती है। जितनी ज्यादा चुप रहती हो उतना ही ज्यादा विष घोलती हो।'


वह चुप हो गई। अंदर ही अंदर मेरा हीनभाव जिससे उन दिनों हम सब हिंदुस्तानी ग्रस्त हुआ करते थे, छटपटाने लगा था। आक्रोश और तिलमिलाहट के उन क्षणों में भी मुझे अंदर ही अंदर कोई रोकने की कोशिश कर रहा था। अब बात और आगे नहीं बढ़ाओ, बाद में तुम्हे अफसोस होगा, लेकिन मैं बेकाबू हुआ जा रहा था। अँधेरे में यह भी नहीं देख पाया कि हेलेन की आँखें भर आई हैं और वह उन्हें बार बार पोंछ रही है। ताँगा हिचकोले खाता बढ़ा जा रहा था और साथ साथ मेरी बौखलाहट भी बढ़ रही थी। आखिर ताँगा हमारे घर के आगे जा खड़ा हुआ। हमारे घर की बत्ती जलती छोड़ कर घर के लोग अपने अपने कमरों में आराम से सो रहे थे। कमरे मे पहुँच कर हेलेन ने फिर एक बार कहा, 'तुम्हे किसी हिंदुस्तानी लड़की से शादी करनी चाहिए थी। उसके साथ तुम खुश रहते। मेरे साथ तुम बँधे बँधे महसूस करते हो।'


हेलेन ने आँख उठा कर मेरी ओर देखा। उसकी नीली आँखें मुझे काँच कि बनी लगी, ठंडी, कठोर, भावनाहीन, 'तुम सीधा क्यों नही कहती हो कि तुम्हे एक हिंदुस्तानी के साथ ब्याह नहीं करना चाहिए था। मुझ पर इस बात का दोष क्यों लगाती हो?'


'मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा', बह बोली और पार्टीशन के पीछे कपड़े बदलने चली गई।


दीवार के साथ एक ओर हमारी बच्ची पालने में सो रही थी। मेरी आवाज सुन कर वह कुनकुनाई, इस पर हेलेन झट से पार्टीशन के पीछे से लौट आई और बच्ची को थपथपा कर सुलाने लगी। बच्ची फिर से गहरी नींद में सो गई। और हेलेन पार्टीशन की ओर बढ़ गई। तभी मैंने पार्टीशन की ओर जा कर गुस्से से कहा, 'जब से भारत आए हैं, आज पहले दिन कुछ दोस्तों से मिलने का मौका मिला है, तुम्हे वह भी बुरा लगा है। लानत है ऐसी शादी पर!'


मैं जानता था पार्टीशन के पीछे से कोई उत्तर नहीं आएगा। बच्ची सो रही हो तो हेलेन कमरे में चलती भी दबे पाँव थी। बोलने का तो सवाल ही नहीं उठता।


पर वह उसी समतल आवाज में धीरे से बोली, तुम्हे मेरी क्या परवाह। तुम तो मजे से अपने दोस्त की बीवी के साथ फ्लर्ट कर रहे थे।'


'हेलेन!' मुझे आग लग गई, 'क्या बक रही हो।'


मुझे लगा जैसे उसने एक अत्यंत पवित्र, अत्यंत कोमल और सुंदर चीज को एक झटके में तोड़ दिया हो।


'तुम समझती हो मैं अपने मित्र की बीवी के साथ फ्लर्ट कर रहा था?'


'मैं क्या जानूँ तुम क्या कर रहे थे। जिस ढंग से तुम सारा वक्त उसकी ओर देख रहे थे...'


दूसरे क्षण मैं लपक कर पार्टीशन के पीछे जा पहुँचा और हेलेन के मुँह पर सीधा थप्पड़ दे मारा।


उसने दोनो हाथों से अपना मुँह ढाँप लिया। एक बार उसकी आँखें टेढ़ी हो कर मेरी ओर उठीं। पर वह चिल्लाई नहीं। थप्पड़ पड़ने पर उसका सिर पार्टीशन से टकराया था। जिससे उसकी कनपटी पर चोट आई थी।


'मार लो, अपने देश में ला कर तुम मेरे साथ ऐसा व्यवहार करोगे, मैं नहीं जानती थी।'


उसके मुँह से यह वाक्य निकलने की देर थी कि मेरी टाँगें लरज गईं और सारा शरीर ठंडा पड़ गया। हेलेन ने चेहरे पर से हाथ हटा लिए थे। उसके गाल पर थप्पड़ का गहरा निशान पड़ गया था। पार्टीशन के पीछे वह केवल शमीज पहने सिर झुकाए खड़ी थी क्योंकि उसने फ्राक उतार दिया था। उसके सुनहरे बाल छितरा कर उसके माथे पर फैले हुए थे।


यह मैं क्या कर बैठा था? यह मुझे क्या हो गया था? मैं आँखें फाड़े उसकी ओर देखे जा रहा था और मेरा सारा शरीर निरुद्ध हुआ जा रहा था। मेरे मुँह से फटी फटी सी एक हुंकार निकली, मानो दिल का सार क्षोभ और दर्द अनुकूल शब्द न पा कर मात्र क्रंदन में ही छटपटा कर व्यक्त हो पाया हो। मैं पार्टीशन के पीछे से निकल कर बाहर आँगन में चला गया। यह मुझसे क्या हो गया है? यही एक वाक्य मेरे मन में बार बार चक्कर काट रहा था...


इस घटना के तीन दिन बाद हमने भारत छोड़ दिया। मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि अब लौट कर नहीं आऊँगा। उस दिन जो जालंधर छोड़ा तो फिर लौट कर नहीं गया...


सीढ़ियों पर कदमों की आवाज आई। उसी वक्त रसोईघर से हेलेन भी एप्रेन पहने चली आई। सीढ़ियों की ओर से हँसने चहकने और तेज तेज सीढ़ियाँ चढ़ने की आवाज आई। जोर से दरवाजा खुला और हाँफती हाँफती दो युवतियाँ - लाल साहब की बेटियाँ - अंदर दाखिल हुईं। बड़ी बेटी ऊँची लंबी थी, उसके बाल काले थे और आँखें किरमिची रंग की थीं। छोटी के हाथ में किताबें थीं, उसका रंग कुछ कुछ साँवला था, और आँखों में नीली नीली झाइयाँ थीं। दोनो ने बारी बारी से माँ और बाप के गाल चूमे, फिर झट से चाय की तिपाई पर से केक के टुकड़े उठा उठा कर हड़पने लगीं। उनकी माँ भी कुर्सी पर बैठ गई और दोनो बेटियाँ दिन भर की छोटी छोटी घटनाएँ अपनी भाषा में सुनाने लगीं। सारा घर उनकी चहकती आवाजों से गूँजने लगा। मैंने लाल की ओर देखा। उसकी आँखों में भावुकता के स्थान पर स्नेह उतर आया था।


'यह सज्जन भारत से आए हैं। यह भी जालंधर के रहने वाले हैं।'


बड़ी बेटी ने मुस्करा कर मेरा अभिवादन किया। फिर चहक कर बोली, 'जालंधर तो अब बहुत कुछ बदल गया होगा। जब मैं वहाँ गई थी, तब तो वह बहुत पुराना पुराना सा शहर था। क्यों माँ?' और खिलखिला कर हँसने लगी।


लाल का अतीत भले ही कैसा रहा हो, उसका वर्तमान बड़ा समृद्ध और सुंदर था।


वह मुझे मेरे होटल तक छोड़ने आया। खाड़ी के किनारे ढलती शाम के सायों में देर तक हम टहलते बतियाते रहे। वह मुझे अपने नगर के बारे में बताता रहा, अपने व्यवसाय के बारे में, इस नगर में अपनी उपलब्धियों के बारे में। वह बड़ा समझदार और प्रतिभासंपन्न व्यक्ति निकला। आते जाते अनेक लोगों के साथ उसकी दुआ सलाम हुई। मुझे लगा शहर में उसकी इज्जत है। और मैं फिर उसी उधेड़बुन में खो गया कि इस आदमी का वास्तविक रूप कौन सा है? जब वह यादों में खोया अपने देश के लिए छटपटाता है, या एक लब्धप्रतिष्ठ और सफल इंजीनियर जो कहाँ से आया और कहाँ आ कर बस गया और अपनी मेहनत से अनेक उपलब्धियाँ हासिल कीं?


विदा होते समय उसने मुझे फिर बाँहों में भींच लिया और देर तक भींचे रहा, और मैंने महसूस किया कि भावनाओं का ज्वार उसके अंदर फिर से उठने लगा है, और उसका शरीर फिर से पुलकने लगा है।


'यह मत समझना कि मुझे कोई शिकायत है। जिंदगी मुझ पर बड़ी मेहरबान रही है। मुझे कोई शिकायत नहीं है, अगर शिकायत है तो अपने आप से...' फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह हँस कर बोला, 'हाँ एक बात की चाह मन में अभी तक मरी नहीं है, इस बुढ़ापे में भी नहीं मरी है कि सड़क पर चलते हुए कभी अचानक कहीं से आवाज आए 'ओ हरामजादे!' और मैं लपक कर उस आदमी को छाती से लगा लूँ', कहते हुए उसकी आवाज फिर से लड़खड़ा गई।


उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी शोषण का यथार्थ:  ग़ायब होता देश


बृजेश चन्द्र कौशल
(शोध-छात्र)
(बीएड, एमफिल, जेआरएफ)
डॅा. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास,
विश्वविद्यालय लखनऊ


उजड़ते हुए मुंडा आदिवासी समाज का सच रणेन्द्र कृत 'ग़ायब होता देश' आदिवासी समाज के उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी शोषण का महाकाव्यात्मक उपन्यास है। मुख्यधारा से कटा हुआ यह समाज अशिक्षित और पिछड़ा होने से आधुनिक जनसंचार माध्यमों तक अपनी पीड़ा कथा व्यथा पहुंचाने में असमर्थ है। इस कमी का भरपूर लाभ शोषक शक्तियां आदिवासी लोगों को अपराधी और नक्सली घोषित करके भरपूर लाभ ले रही हैं। इनके इलाकों में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपने उद्योग धंधे लगाकर चिमनियों से निकला हुआ विष उनके उपर जबरदस्ती छोड़ा जाता है और कोयला निकाल कर गहरे गड्ढे उनको तथा उनके खेलते हुए बच्चों को बारिश के दिनों में डूब कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। सभी गड्ढ़ों में मच्छर के एकत्रित होने के कारण आदिवासी समाज को जीवन यापन करने के लिए बड़ी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आदिवासी समाज को सबसे ज्यादा डर बाघ, बारिश और पुलिस से होता है पुलिस के लोग शासन के आदेश पर अपनी बंदूक के बल पर जब चाहे जितनी चाहे उनकी जमीन खाली करा लेते हैं और उनको बेघर होने पर मजबूर कर देते हैं। शिक्षा के नाम पर कोई भी स्कूल नहीं, पीने के लिए पानी नहीं, बारिश में रहने के लिए घर नहीं और ना ही कोई डाक्टरी सुविधा दी जाती है।
उपनिवेशवाद के इस दौर में 'ग़ायब होता देश' नवसाम्राज्यवादी शोषण का सच जिस प्रकार से लेखक कहता है ''वह मुंडा आदिवासी समाज के संकट, शोषण, लूट पीड़ा और प्रवंचना का इतिवृत्त है। किस तरह सोना लेकिन दिसुम विकास के नाम पर रियल एस्टेट द्वारा ग्लोबल भूमंडलीकृत पतन का शिकार है।''1 साम्राज्यवादी ताकतें जिस तरह जल जंगल जमीन-पहचान को और ट्रेफिकिंग द्वारा बेटियों को हजम कर रही हैं, उसके विरूद्ध ग़ायब होता देश ने अपनी आवाज रखने में बहुत बड़ी सफलता हासिल की  है। सोना लेकिन दिसुम-सोना जैसा देश! मुंडाओं को कोकराह ऐसा ही लगा था। ''हेनसांग ने सोने के कणों से चमकती नदी का नाम स्वर्ण किरण रखा, जो बाद में स्वर्ण रेखा कहलाई।... सोने के कणों से जगमगाती स्वर्ण किरण-स्वर्ण रेखा, हीरो की कौंध से चैंधियाती शंख नदी, सफेद हाथी श्यामचंद्र और सबसे बढ़कर हरे सोने, शाल सखुआ के वन। यही था मुंडाओं का सोना लेकिन दिसुम।''2
विकास का ढोल पीटती बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आदिवासी क्षेत्रों में अपना उद्योग स्थापित करके मालिकाना हक जताती हैं क्योंकि पूंजीवादी विकास के रास्ते यहीं से होकर जाते हैं जिसमें तथाकथित लोकतंत्र आदिवासियों के इस शोषण का मूक दर्शक बनकर बराबर सहयोग दे रहा है। जो कि किशन विद्रोही नामक पात्र की हत्या कर दी जाती है जब वह अपनी आवाज़ इन लोगों के ख़िलाफ़ उठाता है। परंतु इस आदिवासी पत्रकार की हत्या का कोई भी अख़बार, टीवी, चैनल, सच कहने को तैयार नहीं होता कि किशन विद्रोही की हत्या की गयी।
'ग़ायब होता देश' उपन्यास में वसुंधरा बाॅक्साइड प्रोडक्ट प्रा. लिमिटेड, वसुंधरा आइस एंड स्टील, रियल स्टेट परियोजना, विपासा काॅरपोरेशन लि. और इसी ऐजेंसी के क्लाइंट बड़े-बड़े काॅरपोरेट्स आदि की खनन परियोजनाओं ने आदिवासी समाज के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। लेकिन लोकतंत्र इस सच से जो भाग रहा है उसके पीछे नोटों से भरी बोरियाँ और ताकतों के बल पर आदिवासी टोले ग़ायब किए जा रहे हैं। जिसका कारण रियल स्टेट, खनन और बाँध परियोजनाएँ आदि के निर्माण से संबंध ये कंपनियाँ न केवल आदिवासियांे को उनकी जमीन से उजाड़कर उनका वर्तमान बर्बाद कर रही हैं बल्कि प्रतिरोध और आंदोलन को भी कमज़ोर कर रही हैं। किशन विद्रोही की हत्या के बाद अख़बारों की उदासीनता यह बतलाती है कि किस प्रकार मीडिया इस पूँजीतंत्र की गिरफ्त में आ गया है ''किशनपुर एक्सप्रेस अख़बार तक किशन विद्रोही उर्फ के.के.की. विद्रोही चेतना बनी हुई थी, पर पूँजीपतियों द्वारा उसे टाॅर्चर करने की शुरूआत वहीं से हो गई। अंततः उसे 'किशनपुर एक्सप्रेस' छोड़ने पर बाध्य होना पड़ा पूँजी बाजार, बिल्डर माफिया और सत्ता तंत्र की किस प्रकार लोकतंत्र के चैथे खंभे का इस्तेमाल करते हैं, उसे उंगलियों पर नचाते हैं, इन्ही तिकड़मों के ब्यौरों से कथा आगे बढ़ती है। किशन विद्रोही टूट जाता है पूँजी बाजार एवं माफिया तथा राजनीतिक सत्ता के कुचक्र का शिकार हो जाती है।''3
इसके साथ ही विकास के भूमंडलीय दावे की असलियत भी खुलने लगती है कि किस प्रकार से आदिवासी आबादी के विनाश करके विकास का समाजशास्त्र रचा जा रहा है। समाज में उपनिवेशीकरण की जो प्रक्रिया आज से कुछ साल पहले शुरू हुई थी उसी का विकसित रूप आज भी विकास के नाम पर एक बड़ी आबादी को अपनी जमीन, अपने पर्यावरण और हक तथा कानूनों से वंचित होना पड़ता है। इसके विरोध में विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास 'समर शेष है' में बहुत ही आक्रामक रूप देखने को मिलता है। जब गुरू जी पूरे मामले को समझकर ललकारते हुए कहते हैं ''क्या तुम लोग इसी तरह हाथ धरे बैठे रहोगे? क्या हो गया है तुम्हें? कैसी है यह कायरता? अब उनमें से कोई इन गाँवों में आए तो तीर से बींध डालो, हाथ-पैर तोड़ दो कैसा डर? किसका डर यह ज़मीन तुम्हारी, यह आसमान तुम्हारा। यह जंगल-झाड़ सब तुम्हारे हैं। भूल जाओ कि तुमने इन्हें महाजनों के पास रेहन रखा है। किसी का कोई कर्ज़ नहीं है, तुम पर। कोई दावा करे तो सर तोड़ दो उसका।''4
आदिवासियों के विकास को कुंद करके आर्थिक विकास की गति के जो तत्व मुख्य रूप से हैं, वह डाॅ. सोमेश्वर सिंह, मुंडा, विरेन, सोनामनी दीदी, नीरज पाहन, अनुजा दी, एतवा दादा आदि आदिवासियों के संघर्षों और प्रतिरोधों के महान अतीत को विकृत करने से भी बाज नहीं आते। जागरूक आदिवासी नेतृत्व को बदनाम करने, उन्हें विकास विरोधी और नक्सली बता अवांक्षित सिद्ध करने के साथ रियल एस्टेट और खनन माफियाओं के पक्ष में माहौल बनाने के लिए पूंजीवादी कंपनियाँ अपने स्वयं के अख़बारांे, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर टी.वी. चैनल्स तक खोलने लगी है। शोषक वर्ग द्वारा किस प्रकार से किशन विद्रोही पत्रकार को डराकर अपनी क्रूरता का परिचय देता है। ''अब वे दिन दूर नहीं कि उद्योगपतियों-उद्यमियों की सफलता की कहानियाँ अख़बारों की हेडलाइंस बनेंगी। व्यूरोक्रेसी, लेजिस्लेशन की विफलता, गाँव-ग़रीबी-बदहाली के किस्से बहुत हो गए। लोकनायक का स्वर्गवास हेतु दशकों बीत गए। आप जैसे लोग वहीं खड़े कदमताल कर रहे हैं और आपको अपनी मेहनत का भ्रम भी है कि आपकी ही क्रांतिकारी लेखनी से समाज बदलेगा। ख़ुमारी से निकलिए नहीं तो दुनिया आगे निकल जाएगी, आप वहीं कदमताल करते रह जाएंगे।''5
आदिवासी समाज का सच कहीं भी अपनी जगह ठीक से तय नहीं कर पाया है, जिसकी वजह आदिवासियों का इतिहास, इतिहास की पुस्तकों में जगह ही नहीं बना पाया है और अगर कहीं हाशिए के किसी कोने से आदिवासी झाँकता मिल भी जाए, तो उसके इतिहास को इतना तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया कि सच्चाई से कोई नाता है ही नहीं ''सच्चाई से रहो, ईमानदारी से जियो, नफ़रत त्याग दो यह सब किताबों में लिखा है। एक दम झूठ। यह सब हमारे लिए नहीं है। लोग हमें डराते हैं। हम डर के मारे झूठ बोलते हैं, बेईमानी पर चलते हैं। नफ़रत करते हैं।''6 आदिवासियों के हक़ की लड़ाई का एक मात्र सहारा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही किंवदंतियों और मिथकों को अपना विषय बनाएं और यही काम जादुई यथार्थवाद करता है जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण 'ग़ायब होता देश'। उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी का यथार्थ देखा जाय तो मैत्रैयी पुष्पा कृत 'अल्मा कबूतरी' में राणा द्वारा कहे गए वाक्य कबूतरा समाज का सच है। कबूतरा समाज के लोग भी जीवन जीना चाहते हैं लेकिन उन्हें यह नसीब नहीं होता जिसके कारण उनको संघर्ष के लिए मजबूर होना पड़ता है।
आदिवासी समाज के संघर्ष का जीता जागता उदाहरण रणेंद्र का पहला उपन्यास 'ग्लोबल गाँव का देवता' में जब असुर जनजाति के क्रमिक विघटन के लिए उत्तरोत्तर हावी होती बाज़ार शक्तियों के बीच व्यावसायिक संघर्ष का वर्णन बहुत ही अच्छी तरह से किया गया है, जो आदिवासी संघर्ष का एक प्रत्यक्ष उदाहरण बनकर सामने आता है ''इस बार कथा कहानी वाले सिंग-बोंगा नेे नहीं, टाटा जैसी कंपनियों ने हमारा नाश किया। उनकी फैक्टरियों में बना लोहा, कुदाल, खुरपी, गैती, खंती, सुदूर हाटों तक पहुँच गए। हमारे गलाए लोहे के औज़ारों की एक पूछ खत्म हो गई। लोहा डालने का हज़ारों-हज़ार साल का हमारा हुनर धीरे-धीरे ख़त्म हो गया।''7
पूँजीवादी विकास की दौड़ में शामिल लोग कैसे घास की तरह एक मानव समुदाय को चरते जा रहे हैं। यह उपन्यास इसी की मार्मिक कथा है। घास को चरने में आज का हर वह मनुष्य शामिल है, इसमें हम भी हैं आप भी हैं। हम वैचारिक धरातल पर बहस करते हैं लेकिन विडंबना यह है कि उसी के दाना-पानी से जीवित हैं, इस दौर में कोई दाना-पानी से बचा है तो आदिवासी समाज। इसलिए आज आदिवासी समाज को सबसे ज्यादा प्रलोभन देने की कोशिश की जा रही है कि वह जाल में फंस जाय और उसके पास मौजूद जल, जंगल, जमीन को उन्हें विकास के नाम पर सौंप दें। यह विकास मछली को फंसाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले चारे की तरह है जो चारे में नहीं फंसना चाहता वह विद्रोही मान लिया जाता है। जो इस प्रकार से देखा जा सकता है। ''वे अपनी प्रथाओं और मान्यताओं के अनुसार निश्चिंत होकर स्वच्छंद भाव से जीवन जीना चाहते हैं। जंगलों में प्रवेश से रोक लगने के कारण उनके रोजगार नष्ट होने लगे। इसलिए आदिवासी समाज को अपने स्थान से पलायन होने पर मजबूर होना पड़ा। यदि उनके ऊपर किसी भी प्रकार का बाहरी हस्तक्षेप किया जाता है तो उसको वो अपना शत्रु समझ लेते हैं और फिर वे आंदोलन के लिए तत्पर हो उठते हैं।''8 आदिवासियों को विकास की दृष्टि से देखा जाय तो विकास के नाम पर मची लूट के कारण सदियों से अपनी जर, जमीन और जंगल पहाड़ के बीच रह रहे लोगों के अस्तित्व की रक्षा के लिए किए जाने वाले संघर्ष की ही यह कथा है। 
गाँव के लोगों के बीच जेम्स मिल जो उपकार करता है। उसके पीछे उसकी सदाशयता नहीं, बल्कि विनाशकारी योजनाएं हैं, बड़े बांध, खनिजों की बेतहाशा लूट जंगलों को उजाड़ कर इमारतें बनवाना और अकूत पैसा बनाने की अंधाधुंध होड़ ने जंगल पर आश्रित आदिवासियों के जीवन को संकट में डाल दिया है। सरकारों का काम रह गया है बिल्डर, माफिया, ठेकेदार और पूूँजीपतियों, मल्टीनेशनल कंपनियांे के हितों की रक्षा करना। बाजार के वैश्वीकरण ने दुनिया की एक बड़ी आबादी को विकास के नाम पर निराशा की ओर धकेल दिया है। ''उधर सोनामनी दी-नीरज पाहन 'हत्यारे को फाँसी' और पाहन बाबा हत्याकंड जाँच के लिए जुलूस, धरना प्रदर्शन करते तो दूसरी ओर दुरगंदह बचाओं संघर्ष समिति नदी को अतिक्रमण मुक्त, क्लीन किशनपुर-ग्रीन किशनपुर, गंदी बस्तियों का स्थानांतरण आदि मांगों को लेकर ज्यादा बड़ा जुलूस, प्रदर्शन सेमीनार, कांफ्रेन्स की झड़ी लगा रखी थी। नतीजतन सारे शोरगुल बाबा की हत्या के सवाल खोकर रह गए।कृउसके बाद आज न किशन दा हैं और न अनुजा सोमा दी का कोई पता... आदिवासी गाँवों, बस्तियों का उजड़ना पहले से भी तेज़ी से हो रहा है।''9 आदिवासी विरोधी तथाकथित नागरिक आंदोलनों का और स्वयंसेवी संगठनों की गतिविधियों का जादू तो स्थिति को और भी उलझाने वाला है। प्रभावशाली साहब लोगों के नागरिक संगठन अपने संपर्कों और ताकत का इस्तेमाल करके आदिवासी यथार्थ को धूमिल कर रहे हैं। अशोक पोद्दार के साथ-साथ चैदह-पंद्रह साल की लड़की की लाशें मिली थीं। दोनों की गरदन पर तेज़ धारदार हथियार से काटने के निशान मौजूद थे। ''वह बच्ची ग़रीब और आदिवासी दिख रही थी। इसीलिए 'एतवा पाहन गुट के आत्मघाती दस्ते की मेंबर' वाला समाचार गढ़ा गया, क्योंकि एफआईआर के शब्द भी वही हैं। अब उस बच्ची की देह पर कपड़ा क्यों नहीं था? तेज धार वाला वह हथियार कहाँ विला गया? उसकी जांघ खून से लथपथ क्यों थी? और छातियों पर जख्म किसने लगाए थे?''10 भौतिक जगत की सीमाओं से मुक्त होने की सनातन मानवीय इच्छा। इसी इच्छा की परिणति किसी मनुष्य या प्राणी या वस्तु के ग़ायब होने जाने की फैंटेसी या मिथकीय कथा के शृजन के रूप में प्रायः देखी जा सकती है 'ग़ायब होता देश' उपन्यास में तो आदिवासियों का जीता-जागता देश ही भूमाफियाओं और खनन माफियाओं के षड़यंत्रों और छीना-झपटी में देश के मूल बाशिंदे आदिवासियों की आँखों के सामने ही ग़ायब होता जा रहा है। इस प्रकार 'ग़ायब होता देश' '' वैश्विक काॅरपोरेट कंपनियाँ आदिवासियों के देशज ज्ञान को चुरा अपने नाम पर पेटेंट कराकर उपभोक्तावादी बाजार में पूंजी के महल खड़ा कर रही है। भोला-भाला अनपढ़, ग़रीब आदिवासी अपने ज्ञान की इस पूँजीवादी लूट से अनभिज्ञ इन काॅरपोरेटों की चालों का शिकार बनता जा रहा है।''11 
आदिवासियों की जमीन पर कल-कारखाने और बड़े उद्योग बन रहे हैं, बड़े-बड़े चमकदार माॅल बन रहे हैं लेकिन उस ज़मीन के असली हक़दार उसी की चमक में दफ़न हो रहे हैं और इस आधुनिकता में नवसाम्राज्यवाद का यह यथार्थ है कि इस पर राष्ट्रीय जश्न मनाया जाता है। इस उपन्यास में राजनीतिक और प्रशासनिक मिली भगत से किस तरह झारखंड में भूमाफियाओं ने आदिवासियों की ज़मीन को कब्जाया और किस तरह से ज़मीन हाथ से निकलते ही आदिवासियों की पहचान मिट जाती है। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण 'ग़ायब होता देश' में देखने को मिलता है।
संदर्भ
1. रणेंद्र, 'ग़ायब होता देश', पेंगुइन बुक्स इण्डिया, प्रथम संस्करण-2014 की भूमिका से।
2. वही पृष्ठ-1
3. संजय सहाय, हंस, मानवीय संकट की कथा, अजय वर्मा ;समी.द्ध, जनवरी-2016, पृष्ठ-87
4. विनोद कुमार शुक्ल, 'समर शेष है', नई दिल्लीः प्रकाशन संस्थान, संस्करण-1999, पृष्ठ-87
5. ग़ायब होता देश, पृष्ठ-120-121
6. मैत्रैयी पुष्पा, 'अल्मा कबूतरी', नई दिल्लीः राजकमल प्रकाशन, तीसरी आवृत्ति-2011 पृष्ठ-99
7. रणेंद्र 'ग्लोबल गाँव का देवता' नई दिल्ली भारतीय ज्ञानपीठ, प्रथम संस्करण-2009, पृष्ठ-83
8. शैलेंद्र सागर, 'कथा क्रम', विशेषांक आदिवासी समाज और साहित्य, प्रो. वीर भारत तलवार ;साक्षा.द्ध, सभी सत्ताधारी आदिवासियों के आदिवासीपन से डरते हैं, केदार प्रसाद मीणा द्वारा, वर्ष-14, अंक-50 अक्टूबर-दिसंबर- 2011, पृष्ठ-8
9. ग़ायब होता देश, पृष्ठ-164
10. वही, पृष्ठ-291
11. डाॅ. एम. फिरोज़ अहमद, 'वाङ्मय', आदिवासी विशेषांक-3, ग़ायब होते जीते जागते आदिवासी ;शोधद्ध, प्रमोद मीणा, जुलाई-2013, पृष्ठ-24


परिंदों की आवाज़


अमन कुमार 


परिंदों के कूकने, कूलने
या चहचहाने की आवाज़
मुझे सोचने पर कर देती है मजबूर
उनके फड़फड़ाने, 
दिवार से टकराने की आवाज़
दिवारें, 
दो वस्तुओं के बीच की नहीं
बुलन्द इमारतों की खंडहर दिवारें
शान्ति मिलती है इन भूतहा दिवारों में
जैसे  कोइ आत्मा,
अस्तित्व तलाशती है दिवारों में
आह!
हवा का तेज़ और ठंडा झौंका
भारी पत्थरों से टकराता हुआ
धूल से जैसे कोई लिखता इबारत  
अपढ और रहस्यमयी इबारत
पढ लेती है बस खंडहर इमारत
घटनाओं - दुर्घटनाओं की कहानी
पाप और पुण्य की अंतर कहानी
इन दिवारों को लाॅघती हुई
फैल जाती है दावानल की भाँति
काल जिसे रोक नहीं पाता 
और इन कहानियों का,
छोटी-बड़ी कहानियों का
खंडहर हुई दिवारों का 
विशाल इतिहास बन जाता।


प्रेमचंदजी के साथ दो दिन


बनारसीदास चतुर्वेदी


 


प्रेमचंदजी की सेवा में उपस्थित होने की इच्छा बहुत दिनों से थी। यद्यपि आठ वर्ष पहले लखनऊ में एक बार उनके दर्शन किए थे, पर उस समय अधिक बातचीत करने का मौका नहीं मिला था। इन आठ वर्षों में कई बार काशी जाना हुआ, पर प्रेमचंदजी उन दिनों काशी में नहीं थे। इसलिए ऊपर की चिट्ठी मिलते ही मैंने बनारस कैंट का टिकट कटाया और इक्का लेकर बेनिया पार्क पहुँच ही गया। प्रेमचंद जी का मकान खुली जगह में सुंदर स्थान पर है और कलकत्ते का कोई भी हिंदी पत्रकार इस विषय में उनसे ईर्ष्या किए बिना नहीं रह सकता। लखनऊ के आठ वर्ष पुराने प्रेमचंदजी और काशी के प्रेमचंदजी की रूपरेखा में विशेष अंतर नहीं पड़ा। हाँ मूँछों के बाल जरूर 53 फीसदी सफेद हो गए हैं। उम्र भी करीब-करीब इतनी ही है। परमात्मा उन्हें शतायु करे, क्योंकि हिंदी वाले उन्हीं की बदौलत आज दूसरी भाषा वालों के सामने मूँछों पर ताव दे सकते हैं। यद्यपि इस बात में संदेह है कि प्रेमचंदजी हिंदी भाषा-भाषी जनता में कभी उतने लोकप्रिय बन सकेंगे, जितने कवीवर मैथिलीशरण जी हैं, पर प्रेमचंदजी के सिवा भारत की सीमा उल्लंघन करने की क्षमता रखने वाला कोई दूसरा हिंदी कलाकार इस समय हिंदी जगत में विद्यमान नहीं। लोग उनको उपन्यास सम्राट कहते हैं, पर कोई भी समझदार आदमी उनसे दो ही मिनट बातचीत करने के बाद समझ सकता है कि प्रेमचंदजी में साम्राज्यवादिता का नामोनिशान नहीं। कद के छोटे हैं, शरीर निर्बल-सा है। चेहरा भी कोई प्रभावशाली नहीं और श्रीमती शिवरानी देवी जी हमें क्षमा करें,यदि हम कहें कि जिस समय ईश्वर के यहाँ शारीरिक सौंदर्य बँट रहा था, प्रेमचंदजी जरा देर से पहुँचे थे। पर उनकी उन्मुक्त हँसी की ज्योति पर, जो एक सीधे-सादे, सच्चे स्नेहमय हृदय से ही निकल सकती है,कोई भी सहृदया सुकुमारी पतंगवत् अपना जीवन निछावर कर सकती है। प्रेमचंदजी ने बहुत से कष्ट पाए हैं, अनेक मुसीबतों का सामना किया है, पर उन्होंने अपने हृदय में कटुता को नहीं आने दिया। वे शुष्क बनियापन से कोसों दूर हैं और बेनिया पार्क का तालाब भले ही सूख जाए, उनके हृदय सरोवर से सरसता कदापि नहीं जा सकती। प्रेमचंदजी में सबसे बड़ा गुण यही है कि उन्हें धोखा दिया जा सकता है। जब इस चालाक साहित्य-संसार में बीसियों आदमी ऐसे पाए जाते हैं, जो दिन-दहाड़े दूसरों को धोखा दिया करते हैं, प्रेमचंदजी की तरह के कुछ आदमियों का होना गनीमत है। उनमें दिखावट नहीं, अभिमान उन्हें छू भी नहीं गया और भारत व्यापी कीर्ति उनकी सहज विनम्रता को उनसे छीन नहीं पाई।


प्रेमचंदजी से अबकी बार घंटों बातचीत हुई। एक दिन तो प्रातःकाल 11 बजे से रात के 10 बजे तक और दूसरे दिन सबेरे से शाम तक। प्रेमचंदजी गल्प लेखक हैं, इसलिए गप लड़ाने में आनंद आना उनके लिए स्वाभाविक ही है। (भाषा तत्त्वविद बतलावें कि गप शब्द की व्युत्पत्ति गल्प से हुई है या नहीं?)


यदि प्रेमचंदजी को अपनी डिक्टेटरी श्रीमती शिवरानी देवी का डर न रहे, तो वे चौबीस घंटे यही निष्काम कर्म कर सकते हैं। एक दिन बात करते-करते काफी देर हो गई। घड़ी देखी तो पता लगा कि पौन दो बजे हैं। रोटी का वक्त निकल चुका था। प्रेमचंदजी ने कहा - 'खैरियत यह है कि घर में ऊपर घड़ी नहीं है, नहीं तो अभी अच्छी खासी डाँट सुननी पड़ती!' घर में एक घड़ी रखना, और सो भी अपने पास,बात सिद्ध करती है कि पुरुष यदि चाहे तो स्त्री से कहीं अधिक चालाक बन सकता है, और प्रेमचंदजी में इस प्रकार का चातुर्य बीजरूप में तो विद्यमान है ही।


प्रेमचंदजी स्वर्गीय कविवर शंकरजी की तरह प्रवास भीरु हैं। जब पिछली बार आप दिल्ली गए थे,तो हमारे एक मित्र ने लिखा था - ''पचास वर्ष की उम्र में प्रेमचंदजी पहली बार दिल्ली आए हैं !'' इससे हमें आश्चर्य नहीं हुआ। आखिर सम्राट पंचम जॉर्ज भी जीवन में एक बार ही दिल्ली पधारे हैं और प्रेमचंदजी भी तो उपन्यास सम्राट ठहरे! इसके सिवा यदि प्रेमचंदजी इतने दिन बाद दिल्ली गए तो इसमें दिल्ली का कसूर है, उनका नहीं।


प्रेमचंदजी में गुण ही गुण विद्यमान हों, सो बात नहीं। दोष हैं और संभवतः अनेक दोष हैं। एक बार महात्माजी से किसी ने पूछा था - ''यह सवाल आप बा (श्रीमती कस्तूरबा गांधी) से पूछिए।'' श्रीमती शिवरानी देवी से हम प्रार्थना करेंगे कि वे उनके दोषों पर प्रकाश डालें। एक बात तो उन्होंने हमें बतला भी दी कि ''उनमें प्रबंध शक्ति का बिल्कुल अभाव है। हमीं-सी हैं जो इनके घर का इंतजाम कर सकी हैं।'' पर इस विषय में श्रीमती सुदर्शन उनसे कहीं आगे बढ़ी हुई हैं। वे सुदर्शनजी के घर का ही प्रबंध नहीं करतीं,स्वयं सुदर्शनजी का भी प्रबंध करती हैं और कुछ लोगों का तो जिनमें सम्मिलति होने की इच्छा इन पंक्तियों के लेखक की भी है - यह दृढ़ विश्वास है कि श्रीमती सुदर्शन गल्प लिखती हैं और नाम श्रीमान सुदर्शनजी का होता है।


प्रेमचंदजी में मानसिक स्फूर्ति चाहे कितनी ही अधिक मात्रा में क्यों न हो, शारीरिक फुर्ती का प्रायः अभाव ही है। यदि कोई भला आदमी प्रेमचंदजी तथा सुदर्शनजी को एक मकान में बंद कर दे, तो सुदर्शनजी तिकड़म भिड़ाकर छत से नीचे कूद पड़ेंगे और प्रेमचंदजी वहीं बैठे रहेंगे। यह दूसरी बात है कि प्रेमचंदजी वहाँ बैठै-बैठै कोई गल्प लिख डालें।


जम के बैठ जाने में ही प्रेमचंदजी की शक्ति और निर्बलता का मूल स्रोत छिपा हुआ है। प्रेमचंदजी ग्रामों में जमकर बैठ गए और उन्होंने अपने मस्तिष्क के सुपरफाइन कैमरे से वहाँ के चित्र-विचित्र जीवन का फिल्म ले लिया। सुना है इटली की एक लेखिका श्रीमती ग्रेजिया दलिद्दा ने अपने देश के एक प्रांत-विशेष के निवासियों की मनोवृत्ति का ऐसा बढ़िया अध्ययन किया और उसे अपनी पुस्तक में इतनी खूबी के साथ चित्रित कर दिया कि उन्हें 'नोबेल प्राइज' मिल गया। प्रेमचंदजी का युक्त प्रांतीय ग्राम्य-जीवन का अध्ययन अत्यंत गंभीर है, और ग्रामवासियों के मनोभावों का विश्लेषण इतने उँचे दर्जे का है कि इस विषय में अन्य भाषाओं के अच्छे से अच्छे लेखक उनसे ईर्ष्या कर सकते हैं।


कहानी लेखकों तथा कहानी लेखन कला के विषय में प्रेमचंदजी से बहुत देर तक बातचीत हुई। उनसे पूछने के लिए मैं कुछ सवाल लिखकर ले गया था। पहला सवाल यह था, ''कहानी लेखन कला के विषय में क्या बतलाऊँ? हम कहानी लिखते हैं, दूसरे लोग पढ़ते। दूसरे लिखते हैं, हम पढ़ते हैं और क्या कहूँ?'' इतना कहकर खिलखिलाकर हँस पड़े और मेरा प्रश्न धारा-प्रवाह अट्टहास में विलीन हो गया। दरअसल बात यह थी कि प्रेमचंदजी की सम्मति में वे सवाल ऐसे थे, जिन पर अलग-अलग निबंध लिखे जा सकते हैं।


प्रश्न - हिंदी कहानी लेखन की वर्तमान प्रगति कैसी है? क्या वह स्वस्थ तथा उन्नतिशील मार्ग पर है?


उत्तर - प्रगति बहुत अच्छी है। यह सवाल ऐसा नहीं कि इसका जवाब आफहैंड दिया जा सके।


प्रश्न - नवयुवक कहानी लेखकों में सबसे अधिक होनहार कौन है?


उत्तर - जैनेंद्र तो हैं ही और उनके विषय में पूछना ही क्या है? इधर श्री वीरेश्वर सिंह ने कई अच्छी कहानियाँ लिखी हैं। बहुत उँचे दर्जे की कला तो उनमें अभी विकसित नहीं हो पाई, पर तब भी अच्छा लिख लेते हैं। बाज-बाज कहानियाँ तो बहुत अच्छी हैं। हिंदू विश्वविद्यालय के ललित किशोर सिंह भी अच्छा लिखते हैं। श्री जनार्दन झा द्विज में भी प्रतिभा है।


प्रश्न - विदेशी कहानियों का हमारे लेखकों पर कहाँ तक प्रभाव पड़ा है?


उत्तर - हम लोगों ने जितनी कहानियाँ पढ़ी हैं, उनमें रसियन कहानियों का ही सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है। अभी तक हमारे यहाँ 'एडवेंचर' (साहसिकता) की कहानियाँ हैं ही नहीं और जासूसी कहानियाँ भी बहुत कम हैं। जो हैं भी, वे मौलिक नहीं हैं, कैनन डायल की अथवा अन्य कहानी लेखकों की छायामत्र है। क्राइम डिटैक्शन की साइंस का हमारे यहाँ विकास ही नहीं हुआ है।


प्रश्न - संसार का सर्वश्रेष्ठ कहानी लेखक कौन है?


उत्तर - चेखव।


प्रश्न - आपको सर्वोत्तम कहानी कौन जँची?


उत्तर - यह बतलाना बहुत मुश्किल है। मुझे याद नहीं रहता। मैं भूल जाता हूँ। टाल्सटॉय की वह कहानी, जिसमें दो यात्री तीर्थयात्रा पर जा रहे हैं, मुझे बहुत पसंद आई। नाम उसका याद नहीं रहा। चेखव की वह कहानी भी जिसमें एक स्त्री बड़े मनोयोगपूर्वक अपनी लड़की के लिए जिसका विवाह होने वाला है कपड़े सी रही है, मुझे बहुत अच्छी जँची। वह स्त्री आगे चलकर उतने ही मनोयोग पूर्वक अपनी मृत पुत्री के कफन के लिए कपड़ा सीती हुई दिखलाई गई है। कवींद्र रवींद्रनाथ की 'दृष्टिदान' नामक कहानी भी इतनी अच्छी है कि वह संसार की अच्छी से अच्छी कहानियों से टक्कर ले सकती है।


इस पर मैंने पूछा कि 'काबुलीवाला' के विषय में आपकी क्या राय है?


प्रेमचंदजी ने कहा कि ''निस्संदेह वह अत्युत्तम कहानी है। उसकी अपील यूनिवर्सल है, पर भारतीय स्त्री का भाव जैसे उत्तम ढंग से 'दृष्टिदान' में दिखलाया गया है, वैसा अन्यत्र शायद ही कहीं मिले। मपासां की कोई-कोई कहानी बहुत अच्छी है, पर मुश्किल यह है कि वह 'सैक्स' से ग्रस्त है।''


प्रेमचंदजी टाल्सटॉय के उतने ही बड़े भक्त हैं जितना मैं तुर्गनेव का। उन्होंने सिफारिश की कि टाल्सटॉय के अन्ना कैरेनिना और 'वार एंड पीस' शीर्षक पढ़ो। पर प्रेमचंदजी की एक बात से मेरे हृय को एक बड़ा धक्का लगा। जब उन्होंने कहा - टाल्सटॉय के मुकाबले में तुर्गनेव अत्यंत क्षुद्र हैं तो मेरे मन में यह भावना उत्पन्न हुए बिना न रही कि प्रेमचंदजी उच्चकोटि के आलोचक नहीं। संसार के श्रेष्ठ आलोचकों की सम्मति में कला की दृष्टि से तुर्गनेव उन्नीसवीं शताब्दी का सर्वोत्तम कलाकार था। मैंने प्रेमचंदजी से यही निवेदन किया कि तुर्गनेव को एक बार फिर पढ़िए।


प्रेमचंदजी के सत्संग में एक अजीब आकर्षण है। उनका घर एक निष्कपट आडंबर शून्य, सद्-गृहस्थ का घर है। और यद्यपि प्रेमचंदजी काफी प्रगतिशील हैं - समय के साथ बराबर चल रहे हैं - फिर भी उनकी सरलता तथा विवेकशीलता ने उनके गृह-जीवन के सौंदर्य को अक्षुण्ण तथा अविचलित बनाए रखा है। उनके साथ व्यतीत हुए दो दिन जीवन के चिरस्मरणीय दिनों में रहेंगे।


राजभाषा विभाग

https://rajbhasha.gov.in/


भाषा शिक्षा

https://mhrd.gov.in/hi/language-education-3-hi


केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली

http://www.chdpublication.mhrd.gov.in/


केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा

http://khsindia.org/india/hi/


भारत सरकार

https://www.india.gov.in/hi


सरकारी रिजल्‍ट

https://www.sarkariresult.com/


ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं


कृष्ण बिहारी नूर


 


ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं


इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं


सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं


जड़ दो चांदी में चाहे सोने में
आईना झूठ बोलता ही नहीं


 


किसानों की ईद


काज़ी नज़रुल इस्लाम


अनुवाद - सुलोचना


 


बिलाल ! बिलाल ! हिलाल निकला है पश्चिम के आसमान में,
छुपे हुए हो लज्जा से किस मरुस्थल के कब्रिस्तान में।
देखो ईदगाह जा रहे हैं किसान, जैसे हों प्रेत-कंकाल
कसाईखाने जाते देखा है दुर्बल गायों का दल ?
रोजा इफ्तार किया है किसानों ने आँसुओं के शर्बत से, हाय,
बिलाल ! तुम्हारे कंठ में शायद अटक जा रही है अजान।
थाली, लोटा, कटोरी रखकर बंधक देखो जा रहे हैं ईदगाह में,
सीने में चुभा तीर, ऋण से बँधा सिर, लुटाने को खुदा की राह में।


जीवन में जिन्हें हर रोज रोजा भूख से नहीं आती है नींद
मुर्मुष उन किसानों के घर आज आई है क्या ईद ?
मर गया जिसका बच्चा नहीं पाकर दूध का महज एक बूँद भी
क्या निकली है बन ईद का चाँद उस बच्चे के पसली की हड्डी ?
काश आसमान में छाए काले कफन का आवरण टूट जाए
एक टुकड़ा चाँद खिला हुआ है, मृत शिशु के अधर-पुट में।
किसानों की ईद ! जाते हैं वह ईदगाह पढ़ने बच्चे का नमाज-ए-जनाजा,
सुनते हैं जितनी तकबीर, सीने में उनके उतना ही मचता है हाहाकार।
मर गया बेटा, मर गई बेटी, आती है मौत की बाढ़
यजीद की सेना कर रही है गश्त मक्का मस्जिद के आसपास।


कहाँ हैं इमाम? कौन सा खुत्बा पढ़ेंगे वह आज ईद में ?
चारों ओर है मुर्दों की लाश, उन्हीं के बीच जो चुभता है आँखों में
जरी वाले पोशाकों से ढक कर शरीर धनी लोग आए हैं वहाँ
इस ईदगाह में आप इमाम, क्या आप हैं इन्हीं लोगों के नेता ?
निचोड़ते हैं कुरआन, हदीस और फिकह, इन मृतकों के मुँह में
क्या अमृत कभी दिया आपने? सीने पर रखकर हाथ कहिये।
पढ़ा है नमाज, पढ़ा है कुरआन, रोजे भी रखे हैं जानता हूँ
हाय रट्टू तोता ! क्या शक्ति दे पाए जरा सी भी?
ढोया है फल आपने, नहीं चखा रस, हाय री फल की टोकरी,
लाखों बरस झरने के नीचे डूबकर भी रस नहीं पाता है बजरी।


अल्लाह-तत्व जान पाए क्या, जो हैं सर्वशक्तिमान?
शक्ति जो नहीं पा सके जीवन में, वो नहीं हैं मुसलमान।
ईमान ! ईमान ! कहते हैं रात दिन, ईमान क्या है इतना आसान?
ईमानदार होकर क्या कोई ढोता है शैतानी का बोझ ?


सुनो मिथ्यावादी ! इस दुनिया में है पूर्ण जिसका ईमान,
शक्तिधर है वह, बदल सकता है इशारों में आसमान।
अल्लाह का नाम लिया है सिर्फ, नहीं समझ पाए अल्लाह को।
जो खुद ही अंधा हो, वह क्या दूसरों को ला सकता है प्रकाश की ओर?
जो खुद ही न हो पाया हो स्वाधीन, वह स्वाधीनता देगा किसे?
वह मनुष्य शहद क्या देगा, शहद नहीं है जिसके मधुमक्खियों के छत्ते में ?


कहाँ हैं वो शक्ति-सिद्ध इमाम, जिनके प्रति पदाघात से
आबे जमजम बहता है बन शक्ति-स्रोत लगातार ?
जिन्होंने प्राप्त नहीं की अपनी शक्ति, हाय वह शक्ति-हीन
बने हैं इमाम, उन्हीं का खुत्बा सुन रहा हूँ निशिदिन।
दीन दरिद्र के घर-घर में आज करेंगे जो नई तागिद
कहाँ हैं वह महा-साधक लाएँगे जो फिर से ईद ?
छीन कर ले आएँगे जो आसमान से ईद के चाँद की हँसी,
हँसी जो नहीं होगी खत्म आजीवन, कभी नहीं होगी बासी।
आएँगे वह कब, कब्र में गिन रहा हूँ दिन ?
रोजा इफ्तार करेंगे सभी, ईद होगी उस दिन।


hindisamay.com से


दूसरा बनवास


क़ैफ़ी आज़मी


 


राम बनवास से जब लौट के घर में आए
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए


रक़्से दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को श्रीराम ने सोचा होगा


इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आए
जगमगाते थे जहां राम के क़दमों के निशां


प्‍यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहां
मोड़ नफरत के उसी राह गुज़र से आए


धर्म क्‍या उनका है क्‍या ज़ात है यह जानता कौन
घर न जलता तो उन्‍हें रात में पहचानता कौन


घर जलाने को मेरा लोग जो घर में आए
शाकाहारी है मेरे दोस्‍त तुम्‍हारा ख़ंजर


तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्‍थर
है मेरे सर की ख़ता जख़्म जो सर में आए


पांव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहां खून के गहरे धब्‍बे


पांव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राजधानी की फ़िजां आई नहीं रास मुझे


छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे


आराम से भाई जिंदगी


भवानीप्रसाद मिश्र


 


आराम से भाई जिंदगी
जरा आराम से


तेजी तुम्हारे प्यार की बर्दाशत नहीं होती अब
इतना कसकर किया आलिंगन
जरा ज्यादा है जर्जर इस शरीर को


आराम से भाई जिंदगी
जरा आराम से
तुम्हारे साथ-साथ दौड़ता नहीं फिर सकता अब मैं
ऊँची-नीची घाटियों पहाड़ियों तो क्या
महल-अटारियों पर भी


न रात-भर नौका विहार न खुलकर बात-भर हँसना
बतिया सकता हूँ हौले-हल्के बिल्कुल ही पास बैठकर


और तुम चाहो तो बहला सकती हो मुझे
जब तक अँधेरा है तब तक सब्ज बाग दिखलाकर


जो हो जाएँगे राख
छूकर सवेरे की किरन


सुबह हुए जाना है मुझे
आराम से भाई जिंदगी
जरा आराम से !


प्रेम शिशु


अर्चना राज


 


अँधियारे एकांत मे कभी बाहें पसारे अपलक निहारा है चाँद को 
बूँद-बूँद बरसता है प्रेम रगों मे जज़्ब होने के लिए 
लहू स्पंदित होता है -धमनियाँ तड़कने लगती हैं 
तभी कोई सितारा टूटता है एक झटके से  
पूरे वेग से दौड़ता है पृथ्वी की तरफ़ 
समस्त वायुमंडल को धता बताते हुए,


बिजलियाँ ख़ुद में महसूस होती हैं 
तुरंत बाद एक ठहराव भी हल्के चक्कर के साथ, 


स्याहियाँ अचानक ही रंग बदलने लगती हैं 
लकीरों मे जुगनू उग आते हैं और नदी नग़मे में बदल जाती है 
ठीक इसी पल जन्म होता है बेहद ख़ामोशी से एक प्रेम शिशु का ख़ुद में,


तमाम उदासियाँ -तनहाइयाँ कोख की नमी हो जाती हैं 
महसूस होता है स्वयं का स्वयं के लिए प्रेम हो जाना,


अब और किसी की दरकार नहीं,
बहुत सुखद है प्रेम होकर आईना देखना 
अकेले ही ...... !!!


 


क़तरा-क़तरा दर्द से


मजदूरी और प्रेम

- सरदार पूर्ण सिंह हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन ...