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Showing posts from December 3, 2019

नाखून क्यों बढ़ते हैं?

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हजारी प्रसाद द्विवेदी   बच्‍चे कभी-कभी चक्‍कर में डाल देनेवाले प्रश्‍न कर बैठते हैं। अल्‍पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछ दिया कि आदमी के नाखून क्‍यों बढ़ते हैं, तो मैं कुछ सोच ही नहीं सका। हर तीसरे दिन नाखून बढ़ जाते हैं, बच्‍चे कुछ दिन तक अगर उन्‍हें बढ़ने दें, तो माँ-बाप अक्‍सर उन्‍हें डॉटा करते है। पर कोई नहीं जानता कि ये अभागे नाखून क्‍यों इस प्रकार बढ़ा करते है। काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्‍वीकार कर लेंगे, पर निर्लज्‍ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर। आखिर ये इतने बेहया क्‍यों हैं? कुछ लाख ही वर्षों की बात है, जब मनुष्‍य जंगली था, वनमानुष जैसा। उसे नाखून की जरूरत थी। उसकी जीवन रक्षा के लिए नाखून बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्‍त्र थे। दाँत भी थे, पर नाखून के बाद ही उनका स्‍थान था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था, प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ना पड़ता था। नाखून उसके लिए आवश्‍यक अंग था। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्‍तुओं का सहारा लेने लगा। पत्‍थर के ढेले और पेड़ की डालें काम में लाने लगा (रामचंद्रजी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अ

अनुपमा का प्रेम

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शरतचंद्र चट्टोपाध्याय   ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया है। संसार में उसके लिए सीखने योग्य वस्तु और कोई नही है, सबकुछ जान चुकी है, सब कुछ सीख चुकी है। सतीत्व की ज्योति को वह जिस प्रकार देख सकती है, प्रणय की महिमा को वह जिस प्रकार समझ सकती है,संसार में और भी कोई उस जैसा समझदार नहीं है, अनुपमा इस बात पर किसी तरह भी विश्वाश नही कर पाती। अनु ने सोचा- वह एक माधवीलता है, जिसमें मंजरियां आ रही हैं, इस अवस्था में किसी शाखा की सहायता लिये बिना उसकी मंजरियां किसी भी तरह प्रफ्फुलित होकर विकसित नही हो सकतीं। इसलिए ढूँढ-खोजकर एक नवीन व्यक्ति को सहयोगी की तरह उसने मनोनीत कर लिया एवं दो-चार दिन में ही उसे मन प्राण, जीवन, यौवन सब कुछ दे डाला। मन-ही-मन देने अथवा लेने का सबको समान अधिकार है, परन्तु ग्रहण करने से पूर्व सहयोगी को भी (बताने

अँधेरे में शब्द

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ओमप्रकाश वाल्मीकि   रात गहरी और काली है अकालग्रस्त त्रासदी जैसी जहां हजारों शब्द दफन हैं इतने गहरे कि उनकी सिसकियाँ भी सुनाई नहीं देतीं समय के चक्रवात से भयभीत होकर मृत शब्द को पुनर्जीवित करने की तमाम कोशिशें हो जाएँगी नाकाम जिसे नहीं पहचान पाएगी समय की आवाज भी ऊँची आवाज में मुनादी करने वाले भी अब चुप हो गए हैं 'गोद में बच्चा गाँव में ढिंढोरा' मुहावरा भी अब अर्थ खो चुका है पुरानी पड़ गई है ढोल की धमक भी पर्वत कन्दराओं की भीत पर उकेरे शब्द भी अब सिर्फ रेखाएँ भर हैं जिन्हें चिह्नित करना तुम्हारे लिए वैसा ही है जैसा 'काला अक्षर भैंस बराबर' भयभीत शब्द ने मरने से पहले किया था आर्तनाद जिसे न तुम सुन सके न तुम्हारा व्याकरण ही कविता में अब कोई ऐसा छन्द नहीं है जो बयान कर सके दहकते शब्द की तपिश बस, कुछ उच्छवास हैं जो शब्दों के अंधेरों से निकल कर आए हैं शून्यता पाटने के लिए ! बिटिया का बस्ता घर से निकल रहा था दफ्तर के लिए सीढ़ियां उतरते हुए लगा जैसे पीछे से किसी ने पुकारा आवाज परिचित आत्मीयता से भरी हुई जैसे बरसों बाद सुनी ऐसी आवाज कंधे पर स्पर्श का आभास मुड़ कर देखा

धुआँ

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गुलजार   बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में 'धुआँ' भर गया। चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई थी। सात बजे तक चौधराइन ने रो-धो कर होश सम्भाले और सबसे पहले मुल्ला खैरूद्दीन को बुलाया और नौकर को सख़्त ताकीद की कि कोई ज़िक्र न करे। नौकर जब मुल्ला को आँगन में छोड़ कर चला गया तो चौधराइन मुल्ला को ऊपर ख़्वाबगाह में ले गई, जहाँ चौधरी की लाश बिस्तर से उतार कर ज़मीन पर बिछा दी गई थी। दो सफेद चादरों के बीच लेटा एक ज़रदी माइल सफ़ेद चेहरा, सफेद भौंवें, दाढ़ी और लम्बे सफेद बाल। चौधरी का चेहरा बड़ा नूरानी लग रहा था। मुल्ला ने देखते ही 'एन्नल्लाहे व इना अलेहे राजेउन' पढ़ा, कुछ रसमी से जुमले कहे। अभी ठीक से बैठा भी ना था कि चौधराइन अलमारी से वसीयतनामा निकाल लाई, मुल्ला को दिखाया और पढ़ाया भी। चौधरी की आख़िरी खुवाहिश थी कि उन्हें दफ़न के बजाय चिता पर रख के जलाया जाए और उनकी राख को गाँव की नदी में बहा दिया जाए, जो उनकी ज़मीन सींचती है। मुल्ला पढ़ के चुप रहा। चौधरी ने दीन मज़हब के लिए बड़े काम किए थे गाँव में। हिन्दु-मुसलमान को एकसा दान देते थे। गाँव में कच्ची

ओ हरामजादे

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भीष्म साहनी   घुमक्कड़ी के दिनों में मुझे खुद मालूम न होता कि कब किस घाट जा लगूँगा। कभी भूमध्य सागर के तट पर भूली बिसरी किसी सभ्यता के खंडहर देख रहा होता, तो कभी यूरोप के किसी नगर की जनाकीर्ण सड़कों पर घूम रह होता। दुनिया बड़ी विचित्र पर साथ ही अबोध और अगम्य लगती, जान पड़ता जैसे मेरी ही तरह वह भी बिना किसी धुरे के निरुद्देश्य घूम रही है। ऐसे ही एक बार मैं यूरोप के एक दूरवर्ती इलाके में जा पहुँचा था। एक दिन दोपहर के वक्त होटल के कमरे में से निकल कर मैं खाड़ी के किनारे बैंच पर बैठा आती जाती नावों को देख रहा था, जब मेरे पास से गुजरते हुए अधेड़ उम्र की एक महिला ठिठक कर खड़ी हो गई। मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया, मैंने समझा उसे किसी दूसरे चेहरे का मुगालता हुआ होगा। पर वह और निकट आ गई। 'भारत से आए हो?' उसने धीरे से बड़ी शिष्ट मुस्कान के साथ पूछा। मैंने भी मुस्कुरा कर सिर हिला दिया। 'मैं देखते ही समझ गई थी कि तुम हिंदुस्तानी होगे।' और वह अपना बड़ा सा थैला बैंच पर रख कर मेरे पास बैठ गई। नाटे कद की बोझिल से शरीर की महिला बाजार से सौदा खरीद कर लौट रही थी। खाड़ी के नीले जल जैस

उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी शोषण का यथार्थ:  ग़ायब होता देश

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बृजेश चन्द्र कौशल (शोध-छात्र) (बीएड, एमफिल, जेआरएफ) डॅा. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास, विश्वविद्यालय लखनऊ उजड़ते हुए मुंडा आदिवासी समाज का सच रणेन्द्र कृत 'ग़ायब होता देश' आदिवासी समाज के उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी शोषण का महाकाव्यात्मक उपन्यास है। मुख्यधारा से कटा हुआ यह समाज अशिक्षित और पिछड़ा होने से आधुनिक जनसंचार माध्यमों तक अपनी पीड़ा कथा व्यथा पहुंचाने में असमर्थ है। इस कमी का भरपूर लाभ शोषक शक्तियां आदिवासी लोगों को अपराधी और नक्सली घोषित करके भरपूर लाभ ले रही हैं। इनके इलाकों में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपने उद्योग धंधे लगाकर चिमनियों से निकला हुआ विष उनके उपर जबरदस्ती छोड़ा जाता है और कोयला निकाल कर गहरे गड्ढे उनको तथा उनके खेलते हुए बच्चों को बारिश के दिनों में डूब कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। सभी गड्ढ़ों में मच्छर के एकत्रित होने के कारण आदिवासी समाज को जीवन यापन करने के लिए बड़ी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आदिवासी समाज को सबसे ज्यादा डर बाघ, बारिश और पुलिस से होता है पुलिस के लोग शासन के आदेश पर अपनी बंदूक के बल पर जब चाहे जितनी चाहे उनकी जमीन खाली करा ले

परिंदों की आवाज़

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अमन कुमार  परिंदों के कूकने, कूलने या चहचहाने की आवाज़ मुझे सोचने पर कर देती है मजबूर उनके फड़फड़ाने,  दिवार से टकराने की आवाज़ दिवारें,  दो वस्तुओं के बीच की नहीं बुलन्द इमारतों की खंडहर दिवारें शान्ति मिलती है इन भूतहा दिवारों में जैसे  कोइ आत्मा, अस्तित्व तलाशती है दिवारों में आह! हवा का तेज़ और ठंडा झौंका भारी पत्थरों से टकराता हुआ धूल से जैसे कोई लिखता इबारत   अपढ और रहस्यमयी इबारत पढ लेती है बस खंडहर इमारत घटनाओं - दुर्घटनाओं की कहानी पाप और पुण्य की अंतर कहानी इन दिवारों को लाॅघती हुई फैल जाती है दावानल की भाँति काल जिसे रोक नहीं पाता  और इन कहानियों का, छोटी-बड़ी कहानियों का खंडहर हुई दिवारों का  विशाल इतिहास बन जाता।

प्रेमचंदजी के साथ दो दिन

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बनारसीदास चतुर्वेदी   प्रेमचंदजी की सेवा में उपस्थित होने की इच्छा बहुत दिनों से थी। यद्यपि आठ वर्ष पहले लखनऊ में एक बार उनके दर्शन किए थे, पर उस समय अधिक बातचीत करने का मौका नहीं मिला था। इन आठ वर्षों में कई बार काशी जाना हुआ, पर प्रेमचंदजी उन दिनों काशी में नहीं थे। इसलिए ऊपर की चिट्ठी मिलते ही मैंने बनारस कैंट का टिकट कटाया और इक्का लेकर बेनिया पार्क पहुँच ही गया। प्रेमचंद जी का मकान खुली जगह में सुंदर स्थान पर है और कलकत्ते का कोई भी हिंदी पत्रकार इस विषय में उनसे ईर्ष्या किए बिना नहीं रह सकता। लखनऊ के आठ वर्ष पुराने प्रेमचंदजी और काशी के प्रेमचंदजी की रूपरेखा में विशेष अंतर नहीं पड़ा। हाँ मूँछों के बाल जरूर 53 फीसदी सफेद हो गए हैं। उम्र भी करीब-करीब इतनी ही है। परमात्मा उन्हें शतायु करे, क्योंकि हिंदी वाले उन्हीं की बदौलत आज दूसरी भाषा वालों के सामने मूँछों पर ताव दे सकते हैं। यद्यपि इस बात में संदेह है कि प्रेमचंदजी हिंदी भाषा-भाषी जनता में कभी उतने लोकप्रिय बन सकेंगे, जितने कवीवर मैथिलीशरण जी हैं, पर प्रेमचंदजी के सिवा भारत की सीमा उल्लंघन करने की क्षमता रखने वाला कोई दूसरा हि

राजभाषा विभाग

https://rajbhasha.gov.in/

भाषा शिक्षा

https://mhrd.gov.in/hi/language-education-3-hi

केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली

http://www.chdpublication.mhrd.gov.in/

केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा

http://khsindia.org/india/hi/

भारत सरकार

https://www.india.gov.in/hi

सरकारी रिजल्‍ट

https://www.sarkariresult.com/

ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं

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कृष्ण बिहारी नूर   ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं और क्या जुर्म है पता ही नहीं इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं सच घटे या बढ़े तो सच न रहे झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं जड़ दो चांदी में चाहे सोने में आईना झूठ बोलता ही नहीं  

किसानों की ईद

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काज़ी नज़रुल इस्लाम अनुवाद - सुलोचना   बिलाल ! बिलाल ! हिलाल निकला है पश्चिम के आसमान में, छुपे हुए हो लज्जा से किस मरुस्थल के कब्रिस्तान में। देखो ईदगाह जा रहे हैं किसान, जैसे हों प्रेत-कंकाल कसाईखाने जाते देखा है दुर्बल गायों का दल ? रोजा इफ्तार किया है किसानों ने आँसुओं के शर्बत से, हाय, बिलाल ! तुम्हारे कंठ में शायद अटक जा रही है अजान। थाली, लोटा, कटोरी रखकर बंधक देखो जा रहे हैं ईदगाह में, सीने में चुभा तीर, ऋण से बँधा सिर, लुटाने को खुदा की राह में। जीवन में जिन्हें हर रोज रोजा भूख से नहीं आती है नींद मुर्मुष उन किसानों के घर आज आई है क्या ईद ? मर गया जिसका बच्चा नहीं पाकर दूध का महज एक बूँद भी क्या निकली है बन ईद का चाँद उस बच्चे के पसली की हड्डी ? काश आसमान में छाए काले कफन का आवरण टूट जाए एक टुकड़ा चाँद खिला हुआ है, मृत शिशु के अधर-पुट में। किसानों की ईद ! जाते हैं वह ईदगाह पढ़ने बच्चे का नमाज-ए-जनाजा, सुनते हैं जितनी तकबीर, सीने में उनके उतना ही मचता है हाहाकार। मर गया बेटा, मर गई बेटी, आती है मौत की बाढ़ यजीद की सेना कर रही है गश्त मक्का मस्जिद के आसपास। कहाँ हैं इमाम? कौन

दूसरा बनवास

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क़ैफ़ी आज़मी   राम बनवास से जब लौट के घर में आए याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए रक़्से दीवानगी आंगन में जो देखा होगा छह दिसंबर को श्रीराम ने सोचा होगा इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आए जगमगाते थे जहां राम के क़दमों के निशां प्‍यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहां मोड़ नफरत के उसी राह गुज़र से आए धर्म क्‍या उनका है क्‍या ज़ात है यह जानता कौन घर न जलता तो उन्‍हें रात में पहचानता कौन घर जलाने को मेरा लोग जो घर में आए शाकाहारी है मेरे दोस्‍त तुम्‍हारा ख़ंजर तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्‍थर है मेरे सर की ख़ता जख़्म जो सर में आए पांव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे कि नज़र आए वहां खून के गहरे धब्‍बे पांव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे राजधानी की फ़िजां आई नहीं रास मुझे छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे

आराम से भाई जिंदगी

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भवानीप्रसाद मिश्र   आराम से भाई जिंदगी जरा आराम से तेजी तुम्हारे प्यार की बर्दाशत नहीं होती अब इतना कसकर किया आलिंगन जरा ज्यादा है जर्जर इस शरीर को आराम से भाई जिंदगी जरा आराम से तुम्हारे साथ-साथ दौड़ता नहीं फिर सकता अब मैं ऊँची-नीची घाटियों पहाड़ियों तो क्या महल-अटारियों पर भी न रात-भर नौका विहार न खुलकर बात-भर हँसना बतिया सकता हूँ हौले-हल्के बिल्कुल ही पास बैठकर और तुम चाहो तो बहला सकती हो मुझे जब तक अँधेरा है तब तक सब्ज बाग दिखलाकर जो हो जाएँगे राख छूकर सवेरे की किरन सुबह हुए जाना है मुझे आराम से भाई जिंदगी जरा आराम से !

प्रेम शिशु

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अर्चना राज   अँधियारे एकांत मे कभी बाहें पसारे अपलक निहारा है चाँद को  बूँद-बूँद बरसता है प्रेम रगों मे जज़्ब होने के लिए  लहू स्पंदित होता है -धमनियाँ तड़कने लगती हैं  तभी कोई सितारा टूटता है एक झटके से   पूरे वेग से दौड़ता है पृथ्वी की तरफ़  समस्त वायुमंडल को धता बताते हुए, बिजलियाँ ख़ुद में महसूस होती हैं  तुरंत बाद एक ठहराव भी हल्के चक्कर के साथ,  स्याहियाँ अचानक ही रंग बदलने लगती हैं  लकीरों मे जुगनू उग आते हैं और नदी नग़मे में बदल जाती है  ठीक इसी पल जन्म होता है बेहद ख़ामोशी से एक प्रेम शिशु का ख़ुद में, तमाम उदासियाँ -तनहाइयाँ कोख की नमी हो जाती हैं  महसूस होता है स्वयं का स्वयं के लिए प्रेम हो जाना, अब और किसी की दरकार नहीं, बहुत सुखद है प्रेम होकर आईना देखना  अकेले ही ...... !!!   क़तरा-क़तरा दर्द से