अंतिम दशक की हिंदी कविता और स्त्री


स्वाति


किसी भी काल का साहित्‍य अपने समाज और परिवेश से कटकर नहीं रह सकता। साहित्य की प्रत्‍येक काल विशेष की रचनाओं में हम उस काल विशेष की सामाजिक स्थिति, परिवेश एवं उस परिवेश में रहने वाले लोगों की इच्‍छाओं एवं आकांक्षाओं को अभिव्‍यक्ति होते पाते हैं। कविता मनुष्य की अनुभूतियों को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करने का माध्यम है। कविता के माध्यम से कवि समाज में निहित सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं व विडंबनाओं पर प्रहार करने में सक्षम होता है। बात अगर स्त्री की कि जाए तो आदिकाल से वर्तमान युग तक की कविताओं में स्त्री अपनी उपस्थिती दर्ज कराती आयी है। फर्क सिर्फ यह है की पहले स्त्रियाँ पुरुषों की कविताओं मे दिखाई देती थी,अब खुद अपनी कविताएँ रचती हैं इतना ही नहीं अपने आत्मसम्मान एवं अस्मिता को पाने में निरंतर प्रयासरत हैं।
प्रत्येक काल में स्त्रियों को देखने की दृष्टियाँ अलग-अलग रही हैं जैसे-भक्तिकाल में स्त्री को माया, ठगिनी के रूप में प्रस्तुत किया जाता था या मोक्ष के मार्ग में बाधा के रूप में वहीं आदिकाल में स्त्रियों को पाने के लिए किस प्रकार युद्ध होते थे उनका वर्णन हमें देखने को मिलता है व रीतिकाल में स्त्री देह के मांसल सौंदर्य के अलग-अलग दृश्य दिखने को मिलते हैं। आधुनिक काल और उसमें भी नई कविता में सबसे अधिक स्त्री के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव दिखाई दिया जिसके चलते “अस्मिता की खोज” पर अधिक बल दिया गया। वहीं 1990 के बाद की कविता इन सभी परम्परागत परिपाटी को तोड़ती हुई स्त्री पराधीनता, यौन शोषण, उत्पीड़न तथा अन्य स्त्री संबंधी मुद्दों पर सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से तर्क करती दिखाई देती है। जैसे कात्यायनी की कविता ‘रात के संतरी की कविता’ में देखा जा सकता है-
“रात को/ठीक ग्यारह बजकर तैंतालिस मिनट पर
दिल्ली में जी.बी.रोड पर/एक स्त्री/ग्राहक पटा रही है
पलामू के एक कस्बे में/नीम उजाले में एक नीम-हकीम
एक स्त्री पर गर्भपात की/हर तरकीब आज़मा रहा है।
बंबई के एक रेस्त्रां में/नीली-गुलाबी रोशनी में थिरकती स्त्री ने
अपना आखरी कपड़ा उतार दिया है/और किसी घर में
ऐसा करने से पहले/एक स्त्री/लगन से रसोईघर में
काम समेट रही है/महाराजगंज के ईंट भट्टे में
झोंकी जा रही है एक रेज़ा मज़दूरिन /जरूरी इस्तेमाल के बाद...
नेल्सन मंडेला के देश में विश्वसुंदरी प्रतियोगिता के लिए
मंच सज रहा है”1


इस सम्पूर्ण कविता में आदि से अंत तक संवेदना को मूर्त करने के लिए जितने भी बिम्ब हैं,वे सभी स्त्री की भूमिकाओं से जुड़े हैं। स्त्री के इन सभी रूपों में हमें कहीं न कहीं स्त्री की विवशता दिखाई देती है, जहां एक ओर वह अपनी आजीविका के लिए जी. बी. रोड पे ग्राहक बुलाने के हर प्रयास कर रही है वहीं दूसरी ओर ग्रामीण जीवन से भी यह कविता हमें रु-ब-रु कराती है जहां एक स्त्री के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है लाज़मी है यह गर्भपात इसीलिए किया जा रहा है क्योंकि गर्भ में कन्या पल रही है। लेकिन चाह कर भी वह इसका विरोध नहीं कर पा रही । बंबई के रेस्त्रां में एक स्त्री आजीविका के लिए नाच गा कर अपने तन के कपड़े उतार रही है यह स्थिति अंतिम दशक में जन्मे भूमंडलीकरण की देन है जिसके चलते आज अलग-अलग तरीकों से स्त्री शोषण की शिकार बनाई जा रही है। भूमंडलीकरण के चलते स्त्री शोषण के तरीके बदल गए हैं। आज स्त्री स्वेच्छा से वो सब काम कर रही है जो पुरुषवादी समाज उससे कराना चाहता है जैसे – रेस्त्रां में कपड़े उतारकर नाचना, अश्लील विज्ञापन बनाना, वस्तु की तरह खुद को प्रॉडक्ट बनाने की होड में जुटे रहना इत्यादि । कवयित्री की दृष्टि से यू. पी. के एक जिले महाराजगंज में ईंट भट्टो में काम करने वाली बेबस मज़दूरिन की विवशता भी छिप नहीं सकी कवयित्री नें इस कविता के माध्यम से ग्रामीण ओर शहरी स्त्रियों के जीवन की हर विवशता को कम शब्दों में रेखांकित कर अधिक कहा है। यहाँ महानगरीय बोध, सत्ता, कला और स्त्री जीवन के विभिन्न रूपों को कात्यायनी ने एक साथ प्रकट करने का प्रयास किया है। इसी संदर्भ में मैनेजर पाण्डेय का मत दृष्टव्य है- “नई पीढ़ी की कविता में स्त्री कवियों की विशिष्ट रचना-दृष्टि के कारण उनकी अलग पहचान बनी है। उनमें कात्यायनी की दृष्टि की व्यापकता और तेजस्विता विशेष महत्वपूर्ण है। उनकी कविताओं में प्रखर राजनीतिक चेतना है और व्यापक सामाजिक चिंता भी।”2 इसी प्रकार अंतिम दशक की कविताओं में स्त्री की सामाजिक आत्मगाथा से लेकर आधुनिक बोध की नियति तक के यांत्रिक संकेत मिलते हैं। जब हम समाज की बात करते हैं तो सर्वप्रथम हमारी नज़र परिवार पर जाती है। परिवार समाज की इकाई के रूप में कार्य करता है। अंतिम दशक के कवि और कवयित्रियों ने अपनी कविताओं में पारिवारिक संरचना से लेकर आजादी के बाद हुए मोहभंग के कारण टूटते बिखरते परिवार में स्त्री के चित्र को बखूबी अपनी कविताओं में अंकित किया है। इतना ही नहीं समाज में व्याप्त रूढ़ियों, विडंबनाओं एवं त्रासदियों को भी अभिव्यक्त किया है। उदाहरण के रूप में चन्द्रकान्त देवताले की कविता ‘बेटी के घर से लौटना’ की पंक्तियाँ दृष्टव्य है-
“पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहते कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज”3


इन पंक्तियों के द्वारा हम भारतीय समाज में विद्यमान एक स्त्री की त्रासदी को अभिव्यक्त होते पाते हैं जहां वह अक्षम है अपने पिता को ससुराल में एक और दिन रोक पाने में। दरअसल हमने पूरी सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी बना दी है,जो उसके समक्ष ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर रहा है कि वह अपनी मानव सुलभ इच्छाओं को व्यक्त नहीं कर पा रही है। अपनी इच्छा को दबाने के लिए वह विवश हो रही है।
प्राचीन काल से लेकर अद्यतन हिंदी काव्य में स्त्री की स्थितियाँ निरंतर परिवर्तित होती रही है। 1990के बाद यह परिवर्तन अधिक प्रभावी रूप में सामने आता है। जिसका मुख्य कारण भूमंडलीकरण और इससे जन्मा बाज़ारवाद रहा है। बाज़ारवाद के कारण स्त्री जीवन के प्रत्येक पक्ष जैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, वैवाहिक जीवन आदि प्रभावित हुए हैं। आज सब कुछ बिकाऊ है, बाजारवाद के चलते सब बेचा जा सकता है। आज विज्ञापन से लेकर सिनेमा तक में स्त्री के अंग-प्रदर्शन का सहारा धड़ल्ले से लिया जा रहा है। कात्यायनी की कविता का उदाहरण देखिये-
“अब इतनी सकत नहीं रही
कि दिन भर मुस्कुरा सकूँ, अदाएँ दिखा सकूँ,
निर्माता निर्देशकों को रिझा सकूँ
या दूरदर्शन पर सौंदर्य-प्रसाधनों का विज्ञापन कर सकूँ।
होंगे दुर्ग के बाहर घेरा डाले हुए तुम्हारे शत्रु
मैं तो उनके लिए भी वैसे ही एक स्त्री-शरीर हूँ,
जैसे तुम्हारे नगर-जनों के लिए।”4


समाज में विविध स्तरों पर नारी यौन शोषण के ऐसे दृश्य अक्सर हमें देखने को मिलते हैं जहाँ एक स्त्री मात्र ‘देह’ समझी जाती है। निर्माता निर्देशक उसकी मजबूरीयों का फायदा उठा अपना स्वार्थ साधते हैं। कात्यायनी जी ने यहाँ समाज की वो कड़वी सच्चाई दिखाने का प्रयास किया है जिसके बारे में अक्सर तथाकथित पुरुषवर्चस्ववादी समाज का व्यक्ति बात करने से कतराता है लेकिन अवसर मिलने पे स्वयं भी पीछे नहीं हटता। इसी संदर्भ में अनामिका का मत दृष्टव्य है- “स्त्री-आंदोलन पितृसत्तात्मक समाज में पल रहे स्त्री-संबंधी पूर्वाग्रहों से पुरुषों की क्रमिक मुक्ति असंभव नहीं मानता। दोषी पुरुष नहीं,वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था है जो  जन्म से लेकर मृत्यु तक पुरुषों को लगातार एक ही पाठ पढ़ाती है कि स्त्रियाँ उनसे हीनतर हैं, उनके भोग का साधनमात्र ।”5  आज बाजारवाद ने स्त्रियों कि अनेक छवियाँ गढ़ी है, जहाँ स्त्रियों को विक्रेता भी बनाया गया है और उपभोग कि वस्तु भी। उपभोक्ताववाद के लिए स्त्री ‘देह’ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। मंगलेश डबराल अपने संग्रह ‘हम जो देखते हैं’(1995) में  लिखते हैं- 
“अमेरिका में रोना माना है
उदास होना मना है
एक बहुत बड़ी आँख सबको देख रही है
पीछे मुड़कर जीवन को देखना माना है
वह किस्सा किसे नहीं मालूम
कि आलीशान दुकान में सामान बेचती
एक दुबली-सी लड़की
जो कुछ सोचती हुई-सी बैठी थी
एक दिन एक ग्राहक के सामने मुस्कराना भूल गई
शाम को उसे नौकरी से अलग कर दिया गया।”6


यहाँ लड़की का मुसकुराना उसके काम का एक हिस्सा है प्रसन्नता नहीं ताकि उसकी मुस्कुराहट से ग्राहक आकर्षित किए जा सके। अगर वह उपभोक्तावादी संस्कृति के खिलाफ जा ऐसा नहीं करती है तो वह बाजार के काम कि भी नहीं है। कहीं न कहीं बाजार के कारण स्त्रियाँ आर्थिक रूप से सक्षम बनी लेकिन सिर्फ बाज़ार कि शर्तों पे। उसे न कुछ सोचने का अधिकार है न ही कुछ कहने का। इस संदर्भ में प्रसिद्ध नारीवादी चिंतक एवं लेखिका प्रभा खेतान का मानना है कि “भूमंडलीकरण जीवन के हर कोने में अस्तित्व के हर रूप का वस्तुकरण करता है।”7  आज बाज़ार कि नज़र स्त्री के प्रत्येक रूप पे है चाहे वो गाँव के खेत खलियान मे कार्य करती स्त्री हो, घरमे रहने वाली या घर संभालती स्त्री हो या जंगल और पहाड़ों पे जीवन जीती स्त्री हो। बाज़ार हर हालत में स्त्री को अपने चंगुल में फंसा कर अपना स्वार्थ साधना चाहता है। इसी क्रम मे आदिवासी स्त्रियों को बाज़ार कि नीतियों के प्रति आगाह करती हुई निर्मला पुतुल अपनी कविता ‘बिटिया मुर्मु के लिए’ में लिखती है कि-
“वे दबे-पाँव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में
वे तुम्हारे नृत्य कि बड़ाई करते हैं
वे तुम्हारी आँखों कि प्रशंसा में कसीदे
पढ़ते हैं
सौदागर हैं वे... समझो...
पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू.... पहचानो!”8


बाजारवाद के कारण आज एक स्त्री स्वतंत्र होकर भी गुलामी का जीवन जी रही है। उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते भोली भाली स्त्रियों को फंसाया जा रहा है ताकि चकाचौंध कि दुनिया से आकर्षित हो वे स्वयं उपभोग को तैयार हो जाए। और जब स्त्री बाज़ार के काम कि नहीं रहती उसको दूध में से मक्खी कि तरह उठाकर फेंक दिया जाता है। इसी संदर्भ में विनय विश्वास का मत दृष्टव्य है-“उपयोग कि जाने वाली वस्तु बार-बार काम आ सकती है। उपभोग जिसका किया जाए, वह एक बार इस्तेमाल के बाद नष्ट हो जाती है। मकान का उपयोग किया जाता है और अनाज का उपभोग। उपभोकतावाद में ज़ोर उपभोग पर ज़्यादा है। इसलिए कि उपभोग्य वस्तुओं कि खपत ज्यादा होती है। उनकी मांग भी अपेक्षाकृत अधिक होती  है।”9
जहां एक ओर नब्बे के बाद बाज़ार ने स्त्री का वस्तुकरण किया, स्त्री की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक स्थितियों में बदलाव आया वहीं दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने अस्तित्व और आत्मसम्मान के लिए भी सचेत दिखाई पड़ती हैं। आज की कविता स्त्री आत्माभिव्यक्ति का दस्तावेज़ है। वह अपने सुख, दुख, ममता, प्रेम और विद्रोह को कविता के माध्यम से रचती है। शोषण, दमन, उत्पीड़न, उपेक्षा जैसे स्त्री-जीवन के समस्त पहलुओं की चर्चा करते हुए आज कि कविता स्त्री-अस्मिता कि लड़ाई में सक्रिय सहयोग दे रही है। उदाहरण के लिए सविता सिंह की कविताओं को अगर हम देखें तो पाएंगे की सविता सिंह की काव्य संवेदना में उग्रता नहीं है लेकिन उनके यहाँ स्त्री अस्मिता से जुड़े अनुभवों की संश्लिष्टता है। सविता सिंह अपने औरत होने पर नहीं, बल्कि किसी की औरत होने पर प्रश्न चिन्ह लगाती है और कहती है –
“मैं किसकी औरत हूँ/कौन है मेरा परमेश्वर
किसके पाँव दबाती हूँ/किसका दिया खाती हूँ
किसकी मार सहती हूँ../ऐसे ही थे सवाल उसके
बैठी थी जो मेरे सामने वाली सीट पर रेलगाड़ी में
मेरे साथ सफर करती”


इस पर कवयित्री का जवाब देखते ही बनता है। जो भारतीय समाज कि उस स्त्री का रोल अदा कर रहा है जो आज अपने पैरों पे खड़ी है, स्वावलंबी है, अपने फैसले खुद ले सकने मे समर्थ है-
“सोचकर बहुत मैंने कहा उससे
मैं किसी की औरत नहीं हूँ/मैं अपनी औरत हूँ
अपना खाती हूँ/जब जी चाहता है तब खाती हूँ
मैं किसी की मार नहीं सहती/और मेरा परमेश्वर कोई नहीं”10  


अतःअंतिम दशक की हिंदी कविता में हम स्त्री जीवन से जुड़े हर पहलू को उद्घाटित होते पाते हैं। जहां एक ओर उदारीकरण के बाद स्त्री वस्तु के रूप में प्रस्तुत की जाती है वहीं दूसरी ओर औद्योगिक विकास ने उसे आर्थिक रूप से सबल भी बनाया है। स्त्रियाँ अब अपने आत्मसम्मान और अस्मिता के प्रति सचेत भी हो रहीं हैं और कविता के माध्यम से इन्हें मुखर रूप से अभिव्यक्त भी कर रही हैं।


संदर्भ सूची-
1. http://kavitakosh.org/kk
2. पाण्डेय, मैनेजर. आलोचना की सामाजिकता. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन
3. संपा. त्रिपाठी, प्रभात. (2013). चन्द्रकान्त देवताले प्रतिनिधि कविताएँ. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-41
4. कात्यायनी. (1999). इस पौरुषपूर्ण समय में. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन. पृष्ठ-64
5. अनामिका. (2004). कविता में औरत. दिल्ली. साहित्य उपक्रम. पृष्ठ- 9
6. डबराल, मंगलेश. (2015). हम जो देखते हैं. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-75-76
7. खेतान, प्रभा. (2004). बाज़ार के बीच बाज़ार के खिलाफ. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन. पृष्ठ-32
8. संपा. विश्वरंजन. (2011). कविता के पक्ष में. दिल्ली. शिल्पायन. पृष्ठ-222
9. विश्वास, विनय. (2009). आज की कविता. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-160
10. http://kavitakosh.org/kk


-स्वाति 
शोधार्थी- पीएच.डी. हिन्दी साहित्य
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा,महाराष्ट्र
Email- swatitasud@gmail.com