Saturday, February 15, 2020

एक बेबाक शख्सियत : इस्मत चुगताई


आरती कुमारी


पीएच. डी. हिंदी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, त्रिपुरा, अगरतला


 


         साहित्य के क्षेत्र में अनेक विद्वानों का योगदान रहा हैं, वर्तमान  में विभिन्न विषयों से जुड़े, एक नई दृष्टि लिए रचनाकार हमारे समक्ष आ चुके हैं ।  भारतीय साहित्य में इस्मत चुगताई का भी एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, जिनका जन्म 21 अगस्त 1915 ई .  को बदायूं उत्तरप्रदेश में हुआ था। जिनका पूरा जीवन संघर्षशील तथा समस्याओं से घिरा रहा परंतु कभी  भी जिंदगी से हार नहीं मानती,जितना अनुभव जीवन में मिल पाया उसे जीवन के अंत समय तक कभी भूल नहीं पाई ।  इस्मत चुगताई उर्दू की प्रमुख व प्रसिद्ध लेखिका के रूप में जानी जाती रही हैं , उनकी प्रत्येक रचना विभिन्न भाषाओं में अनुवादित हो चुकी हैं ।  वह एक स्वतंत्र विचारक , निडर , बेखौफ, जिद्दी , जवाबदेही, तार्किक तथा विरोधी स्वभाव की थी जिन्होंने अपने जीवन में उन सभी बातों का विरोध किया जिससे जिंदगी एक जगह थम सी जा रही हो ।  इस्मत चुगताई का परिवार एक पितृसत्तात्मक विचारों वाला था उसके बावजूद वह अपने परिवार के प्रत्येक सदस्यों से विपरीत रही । स्त्रियों की समस्याओं को लेकर आजादी से पहले व बाद में अनेक चर्चा -परिचर्चा होती रही है परंतु ध्यान देने वाली बात यह है कि महिलाओं की समस्याएं दिन -प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । साहित्य समाज का दर्पण है, वह समाज की प्रत्येक समस्या उजागर करने का पूरा प्रयास करता है उसका उद्देशय यह रहता है कि  समाज का प्रत्येक वर्ग उससे प्रभावित होकर उसके समाधान के लिए अग्रसर हो सके ।


      इस्मत चुगताई के लेखन की शुरुआत हमारे देश भारत की स्वतंत्रता के पूर्व से हो चुकी थी, जिन्होंने समाज की प्रत्येक समस्या पर अपनी नज़र रखते हुए उसका अनुभव प्राप्त करती है । उनकी रचनाओं में अनेक विषय सभी पाठकों को चकित कर देते है तथा उसके साथ – साथ उनके बेबाकी व्यक्तित्व को  प्रस्तुत भी करते है । उनकी अनेक कहानी संग्रह जिसमें – चोटें, छुई -मुई, एक बात, कलियां, एक रात, शैतान, आधी औरत आधा ख्वाब आदि है , जिसमें स्त्रियों की सभी समस्याओं को आधार बनाकर लिखा गया है ।  इस्मत चुगताई की कहानियाँ स्त्री जीवन, उनका संघर्ष , पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री -पुरुष मतभेद, मुस्लिम समाज में तीन तलाक की समस्या, नारी अस्मिता, स्त्री मन का द्वन्द, दहेज प्रथा, आदि समस्याओं को प्रस्तुत करती है । वह अपने लेखन के विषय में पूरे आत्मविश्वास से कहती थी कि-


        “मेरी कहानियों को किसी सफाई की आवश्यकता हैं ऐसा मैंने कभी महसूस नहीं किया”


इस्मत अपने लेखन के प्रति सचेत थी उनके मन में कभी भी किसी तरह का भय नहीं आया तथा ऐसा कभी उन्हें नहीं लगा की जो कुछ लिखा हैं वह गलत हैं।  जीवन के प्रत्येक पक्ष को उकेरते हुए समाज की सच्चाई को अपनी रचनाओं के माध्यम से रु-ब -रु कराती हुई दिखाई पड़ती है ।


           


     इस्मत चुगताई वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसमें समाज की पूरी पृष्टभूमि नज़र आती हैं । स्त्रियों को पितृसत्तात्मक समाज ने अनेक रूढ़ियों व परंपराओं में इस प्रकार जकड़ा हुआ है जिसके  बाहर आज भी वह नहीं निकल पाई । इस्मत अपना लेखन इस बेबाकी से करती थी कि किसी भी आने वाली समस्या का भय मन में नहीं रहता था। ‘लिहाफ़’  उनकी एक ऐसी कहानी है जिसके लिए उन्हें जेल के चक्कर भी लगाने पड़ते हैं ।  इस्मत को उस वक्त भी किसी तरह का भय नहीं होता जब पुलिस उनको जेल ले जाने के लिए आती है तब वह कहती हैं –


              “जेल में ? अरे मुझे जेल देखने का बहुत शौक हैं कितनी दफा यूसुफ से कह चुकी हूँ जेल ले चलो मगर हँसता है कमबख्त और टाल जाता हैं । इंस्पेक्टर साहब मुझे जेल ले चलिए, आप हथकड़ियाँ लाए हैं”


यह वाक्य इस्मत चुगताई के व्यक्तित्व को दर्शाता है क्योंकि वह जानती थी कि समाज सच्चाई को जानकर भयभीत हो सकता हैं परंतु उनकी कहानी समाज की वास्तविक घटनाओं पर आधारित है वो गलत नहीं हैं ।


          इस्मत चुगताई के अनेक उपन्यास है जो निम्नलिखित है - जिद्दी, टेढ़ी लकीर, दिल की दुनिया, सौदाई, जंगली कबूतर, मासूम, एक कतरा-ए-खून, अजीब आदमी, बाँदी बहरूप नगर । इसके साथ -साथ उनकी आत्मकथा- कागजी है पैरहन भी काफी चर्चित हो चुकी है ।  इस्मत चुगताई मुस्लिम समाज से संबंध रखती थी जहां कई बंदिशे स्त्रियों पर थे, जिसका सामना इस्मत को भी करना पड़ा लेकिन वह उसका हमेशा विरोध करती रही । पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री अपनी अस्मिता के लिए सदियों से संघर्ष करती रही हैं , आज स्त्रियां अपनी एक पहचान बना चुकी हैं ।  परंतु इतने संघर्षों के बावजूद भी वर्तमान में अनेक समस्याओं से स्त्रियाँ जूझ रही हैं । इस्मत को पहली बार बुर्का ओढ़ना पड़ा तब वह अधिक क्रोधित होती है उसके विषय में कहती हैं कि :-


            “मुझे पहली बार जब बुर्का ओढ़ना पड़ा और बता नहीं सकती कि अपमान की भावना ने कई बार मुझे पटरी पर कट जाने की सलाह दी”


 यह  सच है जब किसी की अस्मिता खतरे में हो तब उसे बेहद निराशाजनक स्थिति से गुजरना पड़ता है ।  एक स्त्री पुरुष के समान ही समाज में अपना योगदान देती है लेकिन जब उसे समाज में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है तब  अधिक कष्ट का अनुभव करती है।


      इस्मत चुगताई बचपन से ही पढ़ने में रुचि रखती थी उनमें एक जिज्ञासा का भाव हमेशा बना रहा।  उनके मन में हमेशा अपने पितृसत्तात्मक समाज के प्रति एक क्रोध का भाव बना रहता था क्योंकि वह समाज में स्त्री की प्रत्येक कार्यों पर नज़र रखती।  उनके मन में इस बात का दुख व निराशा बनी रहती कि स्त्रियाँ घर-परिवार में शोषित, अत्याचारों का सामाना  करती हैं उसका विरोध क्यों नहीं करती ? जीवन में उदासी लिए जिंदगी गुजारने को मजबूर है । “चौथी का जोड़ा” इस्मत की एक ऐसी कहानी जिसमें स्त्री मन व निम्न मध्यवर्गीय समाज की दशा का चित्रण बहुत ही स्पष्टता से देखा जा सकता हैं । इस कहानी में इस्मत स्पष्ट रूप से दिखाती है कि जब पुरुष वर्ग स्त्री की भावनाओं का सम्मान न करें उस पर अत्याचार करें तो उसे अस्वीकार करना ही एक स्त्री का धर्म होना चाहिए –


          “क्या मेरी आपा मर्द की भूखी है ? नहीं वह भूख के एहसास से पहले ही सहम चुकी है, मर्द का तसव्वुर उनके जेहन में एक उमंग बनकर नहीं उभरा बल्कि रोटी कपड़े का सवाल बनकर उभरा है”


       इस्मत चुगताई का लेखन बेहद प्रभावित करता है, उन समस्याओं से रु-ब-रु कराता है जो समाज का प्रत्येक वर्ग झेलता हुआ नज़र आता हैं ।  यदि कोई स्त्री समाज के नियमों के विरुद्ध सवाल खड़ी करती है तब समाज उसे अच्छे -बुरे के कठघरे में लाकर खड़ा कर देता हैं । इस्मत समाज की कमियों को पूरे साहस, स्पष्टता व सहनशीलता से प्रकाशित करती थी उनके मन में किसी भी तरह का भय नहीं था । उन्हें स्वयं पर पूरा आत्मविश्वास था की जो कुछ भी वो लिख रही हैं वह एकदम सही हैं वे इस बात को मानती थी कि उनका लेखन ही जीवन जीने का आधार है इसकी मौजूदगी में वे खुद को अकेलापन महसूस नहीं करती ।  समाज में स्त्री को शृंगार तथा आभूषण से सजने -सवरने के बीच घेर कर रखा जाता रहा है जो स्त्री सज -सवरकर रहती है उसे विशेष महत्व दिया जाता रहा, परंतु इसकी आलोचना करते हुए इस्मत ने अपनी कहानी ‘निवाला’ में  कहा है कि –


              “क्या औरत होना काफी नहीं एक निवाले में आचार, चटनी, मुरब्बा क्यों”


      इस्मत का लेखन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्थितियों को बहुत ही सहजता से उल्लेखित करता है। उसके बीच एक स्त्री किन -किन समस्याओं से गुजरती है, समाज में स्त्री पुरुष मतभेद स्त्रियों के लिए अनेक समस्या उत्पन्न करता हैं ।  इस्मत ने अपने जीवन में प्रत्येक मोड़ पर पूरे साहस के साथ अपनी जिम्मेदारी को पूरा करती रही चाहे वह अपना परिवार हो या समाज ।  इस्मत अपने पति  शाहिद के विषय में कहती हैं कि –


           “मर्द औरत को पूज कर देवी बना सकता हैं, वो उसे मोहब्बत दे सकता हैं इज्जत दे सकता है सिर्फ बराबरी का दर्जा नहीं दे सकता ।  शाहिद ने बराबरी का दर्जा दिया इसीलिए हम दोनों ने एक अच्छी घरेलू जिंदगी गुजारी”


इस्मत चुगताई के पास जीवन का अनुभव था, समाज स्त्री को पुरुष की अपेक्षा कमजोर समझता रहा है।  प्रत्येक कार्यों में स्त्री-पुरुष का विभाजन दिखाई पड़ता है, स्त्री को अबला, देवी, त्यागी का रूप माना जाता परंतु उसे समानता का अधिकार नहीं दिया जाता है ।  वर्तमान समय में संविधान में स्त्री -पुरुष को समानता का अधिकार दिया गया है लेकिन भेदभाव का अनुभव महिलाएं आज भी अनेक क्षेत्रों में  करती हैं।    


           अत: इस्मत चुगताई समाज की जमीनी हकीकत को अपने समय में पहचान चुकी थी उनका लेखन आज भी प्रासंगिक है।  इस्मत के लेखन पर चेखव, बर्नाड शॉ, रशीदजहाँ, डिक्सन, प्रेमचंद तथा महात्मा गांधी आदि का प्रभाव दिखाई पड़ता हैं ।  इस्मत के समय में मंटो एक ऐसे लेखक थे जो उनके सबसे निकट रहे वह इस्मत के विचारों से पूरी तरह वाकिफ थे ।  मंटो कहते थे कि  इस्मत का कलम व जबान दोनों बहुत तेज रफ्तार में चलते है उस समय वह कुछ भी नहीं सोचती थी कि इसका प्रभाव क्या होगा ।  स्वतंत्र विचारों से जुड़ी इस्मत चुगताई समाज की परवाह किए बिना जीवन में प्रत्येक मुकाम हासिल करती हैं  जिसकी वह हकदार थी ।  उनके रास्ते में आने वाली परेशानियों को पूरे हौसले के साथ सामना करती हैं ।  उनकी रचनाओं में भी स्त्री, पितृसत्तात्मक समाज में जिस घुटनभरी जिंदगी का सामना करती है उस पर दृष्टि डाला गया हैं । भाषा लेखक की एक शक्ति होती है जिसके माध्यम से वह अपनी अलग पहचान बनाता हैं, इस्मत ने जिस भाषा का प्रयोग किया वह समाज को चकित व अत्यंत प्रभावित करने वाला हैं । इस्मत की भाषा में विरोध, बौद्धिकता, शोर, चंचलता, तेज रफ़्तार, निर्भय और साहस का भाव सब कुछ स्पष्ट रूप से दिखाई देता हैं । एक स्त्री का दर्द, मौलिकता, समाज की सच्चाई, अनुभव को व्यक्त करने की सहज अभिव्यक्ति, तार्किक भाव तथा प्रभावित करने वाली भाषा सम्पूर्ण घटनाओं को इस्मत ने व्यक्त किया हैं ।  समाज की एक अच्छी परख इस्मत के पास थी  और सच में जो व्यक्ति सच्चाई को जानता है वह किसी भी कष्ट से घबराता नहीं है बल्कि अपनी बात बहुत ही सहनशीलता व सहजता से प्रस्तुत करता है । वह किसी भी प्रश्न से भयभीत नहीं होता, जबकि वह धैर्य के साथ सभी प्रश्नों का जवाब देने में ही विश्वास करता है । इस्मत चुगताई का व्यक्तिव भी ऐसा ही था, लेखन के कारण समाज के बेरूखे स्वभाव, आलोचना का सामना करना पड़ा ।  परंतु इस्मत ने  कभी भी अपने हौसले को कम नहीं होने दिया ।  इस्मत चुगताई ने लेखन के साथ -साथ फिल्मों के लिए पटकथा लिखते हुए ‘जुनून’ फिल्म में पात्र की भूमिका भी अदा करती हैं ।  वह अपनी रचनाओं के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, इकबाल सम्मान , नेहरू अवार्ड, आदि पुरस्कार हासिल कर चुकी थी ।  इस्मत ने अपने जीवन में लेखिका की भूमिका अत्यंत जिम्मेदारी, कर्तव्यनिष्टता के भाव को समझते हुए अपनी भूमिका अदा करती हैं ।   


        आज भारत की आजादी के इतने वर्षों बाद भी स्त्रियों की समस्याएं अधिक बढ़ती जा रही है जिस पर ध्यान देना अनिवार्य है । इस्मत चुगताई पहली नारीवादी लेखिका मानी जाती हैं जो स्त्री के मुद्दों को बेहद अच्छे ढंग से प्रस्तुत करती थी । वह समाज की हर एक समस्या को हु-ब-हु प्रकाशित करती थी, समाज जिन रूढ़ियों , अंधविश्वासों से ग्रस्त होकर महिलाओं पर अत्याचार करता था उसका विरोध करते हुए अपने स्वभाव अनुसार उस पर सीधा चोट करती थी जिस कारण उनका लेखन अधिक महत्वपूर्ण लगता हैं ।  इस्मत का निधन 24 अक्टूबर 1991 ई .  को हुआ, आज भी उनका लेखन उनके  अनुभव को जीवित रखता हैं।   


 


संदर्भ ग्रंथ सूची –



  1. पॉल सुकृता संपा- कुमार अमितेश. (2016 ). इस्मत आपा . नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन .

  2. लिप्यंतरण - रिजवी शबनम. (2016 ). छुई -मुई . नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन .

  3. लिप्यंतरण - सुरजीत. (2016 ). लिहाफ . नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन .

  4. लिप्यंतरण- इफ़तीखार अंजुम. (2014 ). कागजी है पैरहन . नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन .


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