Tuesday, March 17, 2020

गोविन्द मिश्र के कथा साहित्य में नारी का स्वरूप



शोधार्थिनी
सुदेश  कान्त (नेट)
(हिन्दी विभाग)
बी0एस0एम0पी0जी0 रुड़की (हरिद्वार)

प्रस्तावना
नारी प्रकृति की अनुपम एवं रहस्यमयी कृति है जिसके आन्तरिक मन की पर्तों को जितना अधिक खोलते हैं, उसके आगे एक नवीन अध्याय दृष्टिगत होता है। अपने अनेक आकर्षणों के कारण नारी साहित्य का केन्द्र बिन्दु रही है। प्राचीन समय में स्त्री शिक्षा को  भले ही महत्वहीन समझा जाता रहा हो, परन्तु वर्तमान समय में इसे विशेष महत्व दिया जाने लगा है। शिक्षा के बल पर आज की स्त्री आवश्यकता पड़ने पर घर की चाहरदीवारी की कैद से निकलकर स्वतंत्र हो सकी है, उत्पीड़ित होने पर प्रतिशोध कर सकती है। उचित निर्णय लेकर उचित कदम उठाकर आत्मरक्षा कर सकती है। 
गोविन्द मिश्र जी का कथा साहित्य अधिकांश नारी केन्द्रित है। मिश्र जी का क्षेत्र शिक्षा जगत होने के कारण उनके अधिकांश नारीपात्र-बुद्धिजीवी हैं। मिश्र जी के नारी पात्र अन्तद्र्वन्द्व से घिरे कुण्ठित एवं असहाय तथा कहीं पर परम्परागत रूप दृष्टिगत हुआ है किन्तु अधिकांश नारी-पात्र किसी भी स्थिति में पुरुष की दासता सहने को तैयार नहीं हैं, भले ही उसे उसका कितना भी बड़़ा मूल्य क्यों न चुकाना पड़े। मिश्र जी ने नारी के विविध रूपों को जीवन की सच्चाई के साथ रूपांकित किया है।
नारी का परम्परागत रूप:- 
 गोविन्द मिश्र जी के कथा साहित्य में अन्य कथाकारों की अपेक्षा अधिकांशतः नारी मूल विषयक के केन्द्र में रहती है। नारी के जिस जीवन संघर्ष को उन्होंने समाज में देखा और अनुभव किया, उसे कथापात्रों के माध्यम से साहित्य में व्यक्त किया है। उनके उपन्यासों एवं कहानियों में नारी पारिवारिक मूल्यों को जोड़ने के लिए प्रयासरत है तो कहीं माता-पिता के विस्मृत होते अस्तित्व को सम्भालने के प्रयास में स्वयं टूटती तथा स्वयं को सम्बल देती दृष्टव्य होती है। यह परम्परागत नारी अपने पूर्ण सहयोग तथा सामथ्र्य से समाज को टूटने से बचा रही है। कभी ममतामयी माँ के रूप में, कभी आदर्श पत्नी के रूप में विवाह-संस्था को बनाये हुए हैं, जहाँ व्यक्ति को आर्थिक दंश तोड़ने का प्रयास करते हैं। वहाँ मिश्र जी की नारी बहुत कुछ झेलते हुए भी परिवार  को बिखरने नहीं देती। ‘‘पाँच आँगनों वाला घर’’ की जोगेश्वरी पति द्वारा प्रताड़ित एवं अपमानित होने पर भी अपने पत्नीत्व की सार्थकता परिवार व पति के समर्पण में पाती है। ‘‘माँ ने कैसे पग-पग पर पिता द्वारा दी गई यातनाएँ झेली, उनकी कमियों के एवज में अपने भीतर नई-नई खूबियाँ उभारीं। पिता उस समय के थे जब औरत को पीटना मामूली बात थी। माँ बडे़ घर की थीं........ इसलिए होशोहवास में तो पिता हिचककर रह जाते, पर नशे में हुए तो भीतर से कमरा बन्द कर पूरी कसर निकाल लेते...... जिस तरह माँ सांसारिक जीवन में उन्हें दबाकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं। माँ के सामने एक ही जोरदार इच्छा थी-उनका घर बड़ा होना है-पैसे से, परिवार से।.............. उन्होंने अपने उद्देश्य के लिए जब जरूरत हुई, अपने पति को भी एक किनारे सरका दिया।’’1
 पति के आकस्मिक दिवंगत हो जाने पर शोक व्यक्त करने का समय जोगेश्वरी के पास नहीं था। वह तटस्थ होकर उचित निर्णय लेना जानती थी। उसने बड़े बेटे राधे लाल को पिता की जगह गृहस्थी के लिए तैयार कर लिया था। जोगेश्वरी परिवार के प्रति समर्पित रहती है, ‘‘माँ को इतनी फुर्सत नहीं थी, वे पिता के असमय निधन के दुःख में घुलतीं। उन्होंने पिता की जगह तैयार करना शुरू किया राधेलाल को। जब तक राधेलाल को कुछ पता चलता ......... वे एक बड़ी गृहस्थी के स्वामी वाले साँचे में फिट किए जा चुके थे।’’2
 वर्तमान में जहाँ पारिवारिक रिश्ते क्षीण होते जा रहे हैं, वहाँ सामाजिक सम्बन्धों को बनाये रखने के लिए प्रयासरत ‘लहर’ कहानी की रश्मि तब अपने आत्मविश्वास को डिगा देती है, जब उसे पता चलता है कि उसे इस गृहस्थी को सम्भालना है। वह आत्मनिर्भर होते हुए भी पुरुष प्रधान समाज की दृष्टि में एक गृहणी है, ‘‘पुरुष प्रधान समाज उसे अपनी सोच के लायक रखता ही कहाँ है। कैसी सभ्य-सम्य मार पड़ती है उस पर। हमारी ये बड़ी-बड़ी बातें कैसी गुलामी में जकड़कर रख देती हैं उसे। एक बार विवाह हो गया तो लड़की लाख पढ़ी-लिखी हो, कमाऊ हो, आत्म निर्भर हो, सबसे पहले वह गृहस्थिन है, जिसे पति, घर और बच्चों के लिए होम होना ही है। उसकी अपनी जिन्दगी कुछ नहीं।’’3 अशिक्षा, अज्ञानता और अधीनता के अंधकार युग से शिक्षा, जागृति और समानता के प्रकाश पंुंज में आने के पश्चात् भी नारी स्वयं को शोषित तथा अस्तित्वहीन समझने के लिए विवश होती है। रश्मि वैवाहिक जीवन में सामंजस्य करती हुई चलती है। कभी-कभी वह अपने स्त्री होने पर भी दुःख व्यक्त करती है ‘‘अपना स्त्री होना खराब लगता है..... मैंने खुद को क्या बना डाला है। कभी-कभी लगता है जैसे मैं हूँ ही नहीं....... लता हूँ, हवा का कोई गड्ढा हूँ।’’4 यहाँ नारी पात्र भारतीय संस्कारों से युक्त एवं सामाजिक मान्यताओं को स्वीकार करते चलते हैं, परन्तु आधुनिक एवं पाश्चात्य प्रभावों को अलग नहीं कर सकते।
विद्रोहिणी नारी:-
 आधुनिक भारतीय नारी पुरुष के साथ अर्थोपार्जन के लिए कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। वह दोहरी भूमिका निभाते हुए अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। वह स्वयं क्यों पुरुष का उत्पीड़न, शोषण, अत्याचार तथा बन्धन सहे? नारी अपने बढ़ते कदमों में आने वाली बेड़ियों के रूप में संस्कार एवं परम्पराओं को तोड़ने में कतई संकोच नहीं करती और न ही किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए विवश होती है। मिश्र जी ने नारी का विद्रोही पक्ष अपने साहित्य में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने आज की नारी के विविध रूपों को उसकी अच्छाईयों, बुराइयों एवं कमजोरियों के साथ चित्रित करने का प्रयास किया है। ‘‘धूल पौधों पर’’ उपन्यास की नायिका में अपने पति के साथ हर कदम पर सामंजस्य करना चाहती है, परन्तु उसके ससुराल वाले उसे एक समान की तरह समझते हैं। जिस तरह वह प्रोफेसर प्रेमप्रकाश से कहती है कि ‘‘मैं कोई चीज हूँ, जानवर हूँ या पत्नी हूँ तो इसलिए मनुष्य भी नहीं हूँ? मेरी इच्छा-अनिच्छा कुछ नहीं....... रात भर उसने मुझे एक जबर कुत्ते की तरह चींधा.... मेरे शरीर का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा..... यहाँ तक कि मेरे बाल खींचे, जबरदस्ती मेरे कपड़े उतार फेंके, छाती पर नाखूनों से लकीरें खींच दीं, इधर-उधर कहीं भी दाँत गड़ाये। रात भर मुझे रौंदता रहा......।।’’5 ‘मैं’ के मन में विद्रोह चलता रहता है, विद्रोह की ज्वाला में वह प्रतिदिन जलती रहती है। उसको समझ नहीं आता कि वह क्या करे? समाज के बन्धनों में वह इस तरह बंधी हुई है कि कितना भी विद्रोह करे मगर निकलने में असफल रहती है।
 नारी की स्वतंत्रता और समानता के बाधित होन का एक पक्ष यह भी है कि नारी ही नारी की समता में सबसे बड़ा अवरोध है। घर में जब बेटी का जन्म होता है तो उसके लिए अलग संस्कार और नियम होते हैं तथा बेटे के जन्मोत्सव पर संस्कार और विधान अलग होते हैं। समाज में नारी असमानता की शिकार होती है जिसे पुरुष वर्ग अपने विधान की जंजीरों में जकड़ना चाहता है। मगर आज के समाज में स्त्री ही स्त्री की स्वतंत्रता में बाधक बनी हुई है। नारी जब नारी की प्रतिद्वन्द्वी होती है तो इसमें नारी का भी दोष नहीं है कि वह क्यों इस तरह नारी स्वतंत्रता को बाधित कर रही है। ‘खिलाफत’ उपन्यास एक इस्लामिक स्टेट की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें आयशा अन्द्राबी कैम्पेन चलाते समय स्त्रियों पर धर्म तथा संस्कारों का आरोपण करते हुए उनकी स्वतंत्रता पर रोक लगाने का प्रयास करती है ‘‘कोई मुल्क या तो मुस्लिम है या गैर मुस्लिम, तीसरी कोई चीज नहीं। उसने दुख्तरान-ए-मिल्लत चला रखी है। वह कश्मीर यूनिवर्सिटी से अरबी में पोस्ट ग्रेजुएट है, कश्मीर में बुर्का पहनने के लिए कैम्पेन चला रही है-जो औरत बिना बुर्का नजर आयी, उसके मुँह पर कालिख पोत देती हैं। काम पर जाने वाली औरतों के पीछे पड़ जाती हैं कि वे काम पर न जायें, औरतों का काम है घर पर रहना। औरतों में आजाद-ख्याली के एकदम खिलाफ हैं।’’6
 वर्तमान की नारी के पास दूसरों के विषय में सोचने का समय नहीं है। वह स्वयं के सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए इतनी दूर आ गयी है कि अपने लिए भी अपरिचित सी हो गई है। इस अपरिचय बोध की इतनी अधिकता बढ़ गयी है कि मानवीय सम्बन्धों की मिठास अब दृष्टिगत नहीं होती। 
कुण्ठित नारी:- 
 नारी की भावुकता, कोमलता, ममता और सहनता मूलभूत प्रकृति है। आधुनिक परिवेश में नारी के यहीं गुण समाज के मूलाधार हैं जिस पर वह टिका है। मिश्र जी ने नारी के भावुक रूप को अभिव्यक्त किया है। ‘तुम हो’ कहानी की सुषमा को जब उसके पिता उसके ससुराल वालों पर दहेज का झूठा आरोप लगाकर अपने घर ले आते हैं। तब सुषमा के पिता के दबाव में आकर भावनाओं को मन में समेटने के लिए विवश होती है। फिर भी न जाने क्यों उसका मन ससुराल पक्ष की ओर जाता है। वह अपने पिता के चंगुल में फंस गई थी, वहाँ से निकलने में वह असफल हो जाती है और भावुकता की ओट में निरन्तर कुण्ठित होती जाती है। वह सोचती है, ‘‘उसके बारे में क्या सोचती होगी सास या ननद! जिसके लिए उन्होंने क्या-क्या किया, वह यह कह रही हैं। ऐसा झूठ! क्या छवि बनी होगी सुषमा की वहाँ! यहाँ किसी से यह कहो तो कहेंगे अब कौन सी छवि! वहाँ किसी के सोचने-ओचने का क्या, पागल हो क्या? तुम अब तो वहाँ जाने से रहीं। रहने की बात तो और दूर की ......... तो तुम्हें क्या मतलब?’’7 सुषमा मानसिक दबावों से मुक्ति और अपने स्वतंत्र अस्तित्व की स्थापना का पूरा प्रयास करती है। वह पहले मूक-सी बनी रहती है। उसे लगता है कि वह असहनीय है। वह स्वयं निर्णय करने में अक्षम-सा महसूस करती है तथा स्वयं पिता और पति के निर्देशों का अनुसरण करती है। मगर जब वह यथार्थ की दृष्टि से दोनों के पक्षों का मूल्यांकन करती है क्योंकि पिता उसके पति पर दहेज का आरोप लगाते हैं। जिसका समर्थन सुषमा नहीं करती और कुण्ठा की ज्वाला से निकलकर वह पिता के समक्ष अपना पक्ष रखती है, ‘‘मेरे ब्याह में जो खर्चा हुआ, वह निकल आया, उससे ज्यादा ही। आगे हम उनसे कुछ नहीं लेंगे। रघु को छोड़कर बाकी सबने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया। रघु ने एक बड़ी कृपा की कि मुझे छुआ तक नहीं। जिस झूठ को लेकर हम लड़ रहे हैं, उसे मैं और नहीं खींच सकूँगी। अब यह लड़ाई बन्द करिए। मैं पुलिस में कोई शिकायत नहीं करूँगी। आप और रघु के पिता हट जाइए। रघु और मैं आपसी रजामंदी से तलाक ले लेंगे-साधारण तलाक।’’8 सुषमा अनेक विरोध तथा कुण्ठाओं के बावजूद अपने पिता का विरोध करती है। साधिकार स्वतंत्र रूप से रहना चाहती है। वह अवरोध सहन नहीं कर सकती। अपने निर्णयों पर दूसरों का हस्तक्षेप उसे अस्वीकार-सा प्रतीत होता है, ‘‘पहली बार उसने पिता से साधिकार कुछ कहा। अधिकार अपना, अपने होने का। खामोशी की अदृश्य डोर अपने पिता के चेहरे को किसी तरफ खींच रही थी। सुषमा उनके क्रोध झेलने को तैयार थी।’’9
 आधुनिक नारी पुरुष के साथ प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में उतर पड़ी है। वह पुरुष के साथ  केवल भावनात्मक रूप से जुड़ी है अपितु प्रतिस्पर्धा ने उसे पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने पर विवश किया है। पुरुष सत्ता समाज से मिलने वाले शोषण, उत्पीड़न और बन्धन के विरुद्ध लड़ने का वह साहस करती है। आज पुरुष की भोग्या बनकर जीने वाली स्त्रियों की संख्या कम होती जा रही है। ‘तुम्हारी रोशनी में’ उपन्यास में सुवर्णा नामक विवाहित स्त्री की कहानी है। वह अपने पति रमेश की युवा सोच और सहयोग के कारण पूर्ण स्वतंत्र ढंग से रहती है। वह नौकरी करने के बावजूद घर और बच्चों के प्रति न सिर्फ यह कि वह उदासीन नहीं है, इस मोर्चे पर भी वह अपनी सफलता के प्रति सजग रहती है। वह प्रतिस्पर्धा में कहती भी है, ‘‘गृहस्थिन होना गर्व की बात है मेरे लिए.....। यहाँ भी अपना काम मुझे उतना ही अच्छा लगता है जितना दफ्तार का काम। जैसे मैं दफ्तर में सफल होना चाहती हूँ वैसे ही घर में भी। वहाँ मैं किसी आदमी से पिछड़ी नहीं रहना चाहती, यहाँ किसी औरत से नहीं।’’10 सुवर्णा जब मोहन के साथ पिकनिक पर जाती है तब रमेश उसके साथ अनैतिक व्यवहार करता है, साथ ही उस पर पति के अधिकार का आरोपण लाद देता है कि वह उससे बिना पूछे किसी से नहीं मिलेगी। वह उस पर भावनात्मक हमला ही नहीं, अपितु शारीरिक यातना भी देता है। गाली-गलौज और मारपीट के साथ वह उसके संवेदनात्मक अंग रूपी बच्चों और उसके बीच दीवार खड़ी करने का प्रयास करता है। वह इस नीति को अपनाकर उसे झुकाना चाहता है, मगर वह तटस्थ होकर उत्तर देती है, ‘‘मैं यह नहीं मानती कि सिर्फ इसलिए कि तुम मेरे पति हो, तुम यह तय करो कि मैं इससे मिलूँ, उससे न मिलूँ। बात तीन चार आदमियांे की नहीं है, उस स्वतंत्रता की है जो ईश्वर ने मुझे दी है और जिसे तुम हड़प लेना चाहते हो...... पर बहस की क्या जरूरत....... तुम इन लोगों से मिलने की बात मान भी लो तब भी मेरा फैसला वही रहेगा।’’11
 सामाजिक, आर्थिक परिवेश ने जब भी पुरुष को कमजोर किया है तब उसने नारी के प्रेमपूर्ण आँचल में ही आश्रय लिया है। मिश्र जी के साहित्य में नारी जहाँ दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करती है, वहाँ वह पति की सहयोगिनी बनकर हर कदम पर उसके साथ खड़ी रहती है। ‘पाँच आँगनों वाला घर’’ की ओमी पति का अनुसरण करती हुई चलती है। पति ठीक करता है या गलत, सभी कार्यों में उसके कदम से कदम मिलाकर चलती है। ‘‘जब-जब वे ओमी को देखते हैं। यह स्त्री जिसको उन्होंने अपने प्रभावी व्यक्तित्व के सहारे अपने सिद्धान्तों पर चलने को मजबूर किया..... उसकी कितनी इच्छाएँ, आकांक्षाएँ दबी रह गई... क्या यह करने का अधिकार मोहन को था? मोहन की तरह वह भी पीछे मुड़कर देखती होगी...... जीवन में उसके प्राप्ति? बस पति का अनुसरण किया, पति ठीक था या गलत पता नहीं....... अनुसरण ही जीवन।’’12
 विविध आयामों की ओर बढ़ती हुई नारी के संघर्षों से आकर्षित होकर मिश्र जी ने उसके अनेक रूपों को चित्रित किया है। नारी के ये रूप यदि मन के परम्परागत मूल्यों तथा संस्कारों को सहलाते हैं तो कहीं पर गहरे आघात करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। परिवर्तित परिवेश एवं मूल्यों से प्रभावित नारी विभिन्न स्थानों पर नये रूप में द्रष्टव्य होती है।
उपसंहार:-
 नारी के बिना पुरुष अस्तित्व शून्य है। पुरुष जब निसहाय हुआ है, तभी उसे नारी ने सम्बल दिया है। मिश्र जी के साहित्य में नारी के विविध रूप अनेक कोणों से रूपायित होते हैं। विविध आयामों की ओर अग्रसर होती नारी से प्रभावित होकर मिश्र जी ने उसके विविध रूपों का अति सूक्ष्मांकन किया है। नारी के ये रूप एक ओर हृदय के परम्परागत संस्कारों को सहलाते हैं तो दूसरी ओर तटस्थ होकर परिवर्तन की चाह में उन्हें तोड़ने को विवश भी होते हैं। परिवर्तित परिवेश एवं मूल्यों से प्रभावित नारी अनेक स्थानों पर नवीन रूपों में दृष्टिगत होती है। 

सन्दर्भ सूची:- 
1  पाँचों आँगनों वाला घर, गोविन्द मिश्र, पृ0 28
2  पाँचों आँगनों वाला घर, गोविन्द मिश्र, पृ0 28-29
3  ‘लहर’ कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 148
4  ‘लहर’ कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 149
5  ‘धूल पौधों पर’, गोविन्द मिश्र, पृ0 23
6  ‘खिलाफत’ गोविन्द मिश्र, पृ0 141
7  ‘तुम हो! कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 253-254
8  ‘तुम हो! कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 256
9  ‘तुम हो! कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 256
10  ‘तुम्हारी रोशनी में’ गोविन्द मिश्र, पृ0 20
11. ‘तुम्हारी रोशनी में’ गोविन्द मिश्र, पृ0 149
12. पाँचों आँगनों वाला घर, गोविन्द मिश्र, पृ0 158


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