Tuesday, June 23, 2020

एक ग़ज़लिया


इन्द्रदेव भारती



खुशियाँ  दे  तो   पूरी दे ।
बिल्कुल  नहीं अधूरी दे ।


कुनबा  पाल सकूँ  दाता,
बस  इतनी  मजदूरी  दे ।


बेशक आधी  प्यास बुझे,
लेकिन   रोटी   पूरी   दे ।


बिटिया  बढ़ती  जावे  है,
इसको  मांग  सिंदूरी  दे ।


पैर  दिये   हैं  जब   लंबे,
तो  चादर  भी   पूरी  दे ।


आँगन   में   दीवार  उठे,
ऐसी   मत  मजबूरी  दे ।


'देव'  कपूतों  से  अच्छा,
हमको  पेड़  खजूरी  दे । 


No comments:

Post a Comment

मजदूरी और प्रेम

- सरदार पूर्ण सिंह हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन ...