ग़ज़लिया


इन्द्रदेव भारती



आधी रख,या सारी रख ।
लेकिन  रिश्तेदारी  रख ।।


छोड़ के  तोड़  नहीं प्यारे,
मोड़ के अपनी यारी रख ।


शब्दों  में  हो  शहद  घुला,
नहीं  ज़बाँ पर आरी रख ।


भले  तेरी   दस्तार   गयी,
तू  सबकी  सरदारी  रख ।


"देव''  नहीं   दुनिया  तेरी,  
पर  तू   दुनियादारी  रख ।