जल की अशुद्धता पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

-अरविंद जयतिलक 

यह उचित है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने नदियों में बढ़ते प्रदूषण और उससे लोगों की सेहत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर कड़ा रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा है कि साफ पर्यावरण और प्रदूषण रहित जल व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसे उपलब्ध कराना कल्याणकारी राज्य का संवैधानिक उत्तरदायित्व है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि संविधान का अनुच्छेद-21 जीवन का अधिकार देता है और इस अधिकार में गरिमा के साथ जीवन जीने और प्रदूषण रहित जल का अधिकार शामिल है। सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 47 और 48 में जन स्वास्थ्य ठीक करना और पर्यावरण संरक्षित करना राज्यों का दायित्व है। साथ ही प्रत्येक नागरिक का भी कर्तव्य है कि प्रकृति जैसे वन, नदी, झील और जंगली जानवरों का संरक्षण व रक्षा करे। गौर करें तो अदालत ने नदियों की सफाई से लेकर प्रकृति व पर्यावरण की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकारों के साथ-नागरिकों के लिए भी आवश्यक कहा है। उल्लेखनीय है कि चीफ जस्टिस एसए बोबडे, एएस बोपन्ना और वी रामासुब्रमणियम की बेंच ने यह टिप्पणी दिल्ली जल बोर्ड की हरियाणा से आ रहे पानी में प्रदूषण की शिकायत करने वाली अर्जी पर सुनवाई के दौरान की है। मौजूदा अर्जी यमुना में अमोनिया बढ़ने की शिकायत से जुड़ी है। कोर्ट ने इस मसले पर हरियाणा समेत उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दिल्ली को नोटिस जारी कर सबसे पहले यमुना के प्रदूषण पर सुनवाई शुरु कर दी है। यह सुनवाई इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि गंगा और यमुना दोनों ही भारतीय जन की आराध्य व संस्कृति तथा सभ्यता की पर्याय हैं। इन्हीं नदी घाटियों में ही आर्य सभ्यता पल्लवित और पुष्पित हुई। व्यापारिक एवं यातायात की सुविधा के कारण देश के अधिकांश नगर नदियों के किनारे विकसित हुए। आज देश के लगभग सभी धार्मिक स्थल किसी न किसी नदी से ही संबंद्ध हैं। गंगा और यमुना की महत्ता इस अर्थ में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि अभी गत वर्ष पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इन दोनों नदियों को जीवित व्यक्ति सरीखा दर्जा दिया। बावजूद इन नदियों के अस्तित्व पर संकट बना हुआ है। गंगा और यमुना नदियों की बात करें तो इनके जल से देश की एक बड़ी आबादी प्राणवान है और इनका आर्थिक सरोकार है। यमुना नदी गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह यमुनोत्री से निकलती है और प्रयागराज में गंगा से मिलती है। यमुना के तटवर्ती नगरों में दिल्ली और आगरा के अतिरिक्त कई मुख्य शहर है जो इसके जल से संतृप्त होते हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि यमुना देश की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है। हालात यह है कि वह दिल्ली में नाला के रुप में बह रही है। इसमें आॅक्सीजन की मात्रा इतनी कम हो गयी है कि इसमें रहन वाले जीव-जंतु मर रहे हैं। गंगा की बात करें ता इसके बेसिन में देश की 43 फीसद आबादी निवास करती है। प्रत्यक्ष-परोक्ष रुप से इनकी जीविका गंगा पर ही निर्भर है। यमुना की तरह गंगा की दुगर्ति के लिए भी मुख्य रुप से सीवर और औद्योगिक कचरा जिम्मेदार है जो बिना शोधित किए इसमें बहा दिया जाता है। इसमें सीवर का गंदा पानी और औद्योगिक कचरे को बहाने से क्रोमियम एवं मरकरी जैसे घातक रसायनों की मात्रा बढ़ी है। प्रदूषण की वजह से गंगा में जैविक आक्सीजन का स्तर 5 हो गया है। जबकि नहाने लायक पानी में कम से कम यह स्तर 3 से अधिक नहीं होना चाहिए। वैज्ञानिकों का कहना है कि बैक्टीरिया की मुख्य वजह गंगा में मानव और जानवरों का मल-मूत्र बहाया जाना है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ई-काईल बैक्टीरिया की वजह से सालाना लाखों लोग गंभीर बीमरियों की चपेट में आते हैं। प्रदूषण के कारण गंगा के जल में कैंसर के कीटाणुओं की संभावना प्रबल हो गयी है। जांच में पाया गया है कि पानी में क्रोमियम, जिंक, लेड, आसेर्निक, मरकरी की मात्रा बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञों की मानें तो गंगा नदी के तट पर प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग और गंगा जल के अंधाधुंध दोहन से नदी के अस्तित्व पर खतरा उत्पन हो गया है। गंगा की सफाई हिमालय क्षेत्र से इसके उद्गम से शुरु करके मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी एवं अन्य सहायक नदियों में होनी चाहिए। उचित होगा कि नदियों के तट पर बसे औद्योगिक शहरों के कल-कारखानों के कचरे को इसमें गिरने से रोका जाए। यहां ध्यान देना होगा कि आस्था के नाम पर नदियों के घाटों पर हर वर्ष करोड़ों शव जलाए जाते हैं। दूर स्थानों से जलाकर लायी गयी अस्थियां विशेष रुप से गंगा और यमुना में बहा दी जाती है। समझना कठिन है कि ऐसी आस्थाएं गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों को किस तरह निर्मल करती हैं? हद तो यह है कि नदी सफाई अभियान से जुड़ी एजेंसियां और स्वयंसेवी संस्थाएं भी इन नदियों से निकाली गयी अधजली हड्डियां और राखों को पुनः इसमें उड़ेल देती हैं। क्या इस तरह के सफाई अभियान से नदियों को प्रदूषण से मुक्त किया जा सकता है? उल्लेखनीय तथ्य यह भी कि नदियों का जल दूषित होने से भूजल लगातार प्रदूषित हो रहा है। याद होगा गत वर्ष भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने जारी अपनी रिपोर्ट में  खुलासा किया कि दिल्ली के पेयजल की गुणवत्ता कम हुई है जिससे जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के पेयजल के नमूने 19 मानदंडों में से किसी पर खरे नहीं पाए गए थे। गौर करें तो देश के अधिकांश राज्यों की स्थिति कमोवेश ऐसी ही है। अभी गत वर्ष ही विज्ञान पत्रिका नेचर जियोसाइंस द्वारा खुलासा किया गया कि सिंधु और गंगा नदी के मैदानी क्षेत्र का तकरीबन 60 फीसद जल दूषित हो चुका है। हालत यह है कि कहीं जल सीमा से अधिक खारा हो चुका है तो कहीं उसमें आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच गयी है। आंकड़ों में कहा गया है कि 200 मीटर की गहराई पर मौजूद भूजल का बड़ा हिस्सा दूषित हो चुका है वहीं 23 फीसद जल अत्यधिक खारा हो चुका है। 37 फीसद जल में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गयी है। गौर करें तो जिस तेज गति से नदियों का जल दूषित हो रहा है और अमोनिया तथा आर्सेनिक की मात्रा बढ़ रही है वह आने वाली आपदा का ही सूचक है। अमोनिया और आर्सेनिक एक जहरीला तत्व होता है जो प्राकृतिक रुप से जल में पाया जाता है। लेकिन मौजुदा समय में अत्यधिक खनन और फर्टिलाइजर के इस्तेमाल के कारण जल में इनकी मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके उपयोग से डायरिया, उल्टी, खून वाली उल्टियां, पेशाब में खून आना, बाल गिरना और पेट दर्द जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही इससे फेफड़े, त्वचा, किडनी और लिवर प्रभावित होते हैं। दूषित जल में खतरनाक रोग उत्पन करने वाले जीव पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। दूषित जल में पाए जाने वाले विषाणु पीलिया, पोलियो, गैस्ट्रो इंटराइटिस और चेचक जैसे रोगों को जन्म देते हैं वहीं जीवाणुओं द्वारा अतिसार, पेचिस, मियादी बुखार, हैजा, सूजाक व क्षय रोग उत्पन होते हैं। अमोनिया और आर्सेनिक के अलावा दूषित जल में कैडमियम, लेड, मरकरी, निकल तथा सिल्वर की मात्रा भी बढ़ जाती है जो सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है। दूषित जल में लोहा, मैंगनीज, कैल्सीयम, बेरियम, बोरान एवं अन्य लवणों जैसे नाइट्रेट, सल्फेट, बोरेट और कार्बोनेट इत्यादि की अधिकता भी मानव स्वास्थय पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। एक आंकड़े के मुताबिक हर आठ सेकेंड में एक बच्चा दूषित जल के सेवन से काल का ग्रास बन रहा है। हर साल पचास लाख से अधिक लोग दूषित जल के सेवन से मौत के मुंह में जा रहे हैं। ऐसे में अगर सर्वोच्च न्यायालय जल की शुद्धता को लेकर कड़ा रुख अख्तियार करता है तो यह स्वागत योग्य ही है।