Wednesday, May 25, 2022

लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी

 क्षेमचंद्र ‘सुमन’



‘‘मेरी हस्ती को तोल रहे हो तुम,

है कौन तराज़ू जिस पर तोलोगे?

मैं दर्द-भरे गीतों का गायक हूं,

मेरी बोली कितने में बोलोगे ?’’


त्यागी की ये पंक्तियां हालांकि मेरे लिए चुनौती हैं, फिर भी मैं उसकी हस्ती को तोलने और उसके दर्द-भरे गीतों की बोली बोलने की हिम्मत कर रहा हूं। इसका कारण साफ़ है कि त्यागी से आंख मिलाए बग़ैर आधुनिक गीत-काव्य से परिचय प्राप्त करना संभव नहीं है। वह स्वभाव से अक्खड़, आदतों से आवारा, तबियत से जिद्दी और आचरण से बेहद तुनुक-मिज़ाज है। अगर यों कहूं तो आप इसे और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे कि यह वह ख़ुद भी नहीं जानता कि वह क्या है! उसके बहुत-से साथी उसके व्यक्तित्व को असंगतियों और विरोधाभासों का ‘एलबम’ कहते है, तो मैं भी उनके स्वर-में-स्वर मिलाकर इतना कहने की स्वतंत्रता और चाहूंगा कि केवल उसका व्यक्तित्व ही नहीं, पूरा जीवन ही असंगतियों से रंगा हुआ हैऋ और शायद उसकी कविता में भी उसके स्वभाव की ये असंगतियां स्पष्ट रूप से उतरी हैं।

त्यागी के व्यक्तित्व की असंगतियों को और भी साफ़़ तौर से आपके सामने रखने के लिए मैं एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा। 1957 की एक शाम। दरियागंज के ‘रंगमहल होटल’ का अस्त-व्यस्त कमरा। सिगरेट का धुआं और उनके पिये-अधपिये बे-शुमार टुकड़े ! इधर-उधर बेतरतीब फैली किताबें और पत्र-पत्रिकाएं। कमरे में उस समय मैं और वह दो ही प्राणी हैं। इन दिनों वह अपनी बदनाम किताब ‘चरित्रहीन के पत्र’ लिख रहा है। उसमें से एक पत्र वह मुझे पढ़कर सुनाता है। पत्र नहीं है वह, असल में एक निहायत तल्ख़-सी चीज है कुछऋ जिसमें उसके अनुभवों की पूरी कड़वाहट उतर आई है। वह एक प्रणय-पत्र है, जो है तो कल्पित, किंतु लिखा गया है एक ऐसी औरत के नाम, जो कल्पित नहीं है। उस पत्र में जितना सोज़ है, उससे कहीं ज़्यादा कड़वाहट छिपी हैऋ जितनी मुहब्बत है, उससे कहीं अधिक नफ़रत। उसके आखिर में एक ऐसी पंक्ति आती है कि जिसका भाव यह है-‘‘मुझे घृणा हो गई है सारे नारीत्व से, संपूर्ण नारी-जाति से।’’ जिस समय पत्र के इस वाक्य को उसने पढ़ा उसके होठ घृणा से सिकुड़ गए। और तभी मैंने देखा कि अचानक उसकी आंख से आंसू का एक गरम क़तरा निकलकर उस पत्र पर जा गिरा और तभी उसने सहसा दोनों हाथों से अपना मुंह ढांप लिया।

यह है त्यागी का सही चित्र। इसके अतिरिक्त जो कुछ वह अपने को समझता है, या और लोग उसे समझते हैं, वह झूठ है या प्रचार है। वैसे ये दोनों शब्द पर्यायवाची हैं। जब वह यह कहता है कि मैं हर औरत से नफ़रत करता हूं, तब उसका अर्थ यह होता है कि वह किसी एक औरत बेइंतहा मुहब्बत करता है। जब वह दोस्ती के नाम पर नफ़रत से थूक रहा होता है, तभी वह किसी दोस्त के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी कुर्बान कर देने की योजना बना रहा होता है। सारे दिन हर आस्तिक मूल्य की पूरी वंश-परंपरा को कोस लेने के बाद भी शाम को उसका मस्तक किसी मंदिर की देहरी पर झुका होता है।

बात ज़रा अजीब-सी है, किंतु है बेहद साफ़। क्या कभी आपने किसी हद दरज़े के ग़मगीन आदमी की शक्ल ग़ौर से देखी है? यदि नहीं देखी तो त्यागी के चेहरे को देखिए। उसके चेहरे पर कुछ ऐसी आड़ी-तिरछी रेखाएं आपको दिखाई देंगी, जिनका प्रभाव आप पर सौम्य नहीं पड़ेगा। उसकी आंखों के गिर्द फैली रेखाएं आपको पसंद नहीं आएंगी। उसके होठों की नीली शिकनें आपको बदनुमा मालूम होंगी। लेकिन जब कभी परेशानी के वक़्त वह आहिस्ता से आपके कंधे पर हाथ रखकर कहेगा-‘‘मैं जानता हूं आपको क्या चाहिए? मेरे पास एक ही है, पर आपकी ज़रूरत मुझसे ज़्यादा है, इसलिए आप इसे ले लें।’’ तो उसके चेहरे की वह बदसूरती किसी जादुई प्रभाव से अचानक ग़ायब हो जाएगी और वह आपको संसार का सबसे सुंदर इंसान दिखाई देने लगेगा।

त्यागी की ज़िंदगी उसके जीवन में समाए हुए दर्द ने बिगाड़ दी है। ऐसी अवस्था में अगर वह सौंदर्य-चेताओं, नाज़ुक-मिज़ाजों को कहीं खटकती है, बदसूरत लगती है, तो वह दुरुस्त है, उचित है। मुझे उसके पक्ष में कुछ नहीं कहना है। मुझे तो आपसे उस अंधियारे के संबंध में कुछ बात कहनी हैं, जो हर सूरज का जनक है, पिता है। मुझे तो उस कीचड़ के संबंध में कुछ कहना है, जो कमल का सृष्टा है। यदि त्यागी का जीवन समतल और बेदाग़ होता तो मुझे संदेह है कि वह सौंदर्य को इतने निकट से प्यार कर पाता। मझधार में से होकर आने वाली लहर किनारे का हाथ ज़रा मज़बूती से थामती है। यह सही है कि पगडंडी पर चलने वालों के चेहरों पर ज़रा गर्द ज़्यादा जमती है, लेकिन वे राजपथ पर चलने वालों से पहले ही मंज़िल पर पहुंच जाते हैं।

पिछली पंक्तियों में मैंने यह ठीक ही लिखा है कि त्यागी बड़ा अक्खड़ है। जी हां, यदि वह अक्खड़ न होता तो अक्सर लोग, यहां तक कि उसके बहुत नज़दीकी दोस्त भी उससे असंतुष्ट क्यों रहते? मैं स्वयं भी उनमें  से हूं, जो त्यागी के इसी स्वभाव के कारण काफ़ी दिन तक उससे बेहद नाराज़ रहा था। एक समय था जबकि दिल्ली की गलियों में त्यागी के अक्खड़पन की बड़ी चर्चा रहती थी। शायद ही कोई ऐसा सौभाग्यशाली दिन बीतता होगा जिस दिन उसका कोई-न-कोई कारनामा सुनाई न दिया हो। ऐसे अवसर तो उसके जीवन में अनेक बार आए हैं, जब मित्र मंडली में बातें करते हुए उसका हाथ अपनी पैंट की जेब में न रहकर दूसरे के गरेबान पर पहुंच जाता था। मुझे यह अच्छी तरह याद है कि उसकी इन बेतुकी और ग़ैर-शायराना आदतों को देखकर एक दिन उर्दू के किसी शायर ने कहा था-‘‘त्यागी में मंटो जैसी ख़राबियां पाई जाती हैं।’ पर मैं यहां लिखने की आज़ादी चाहता हूं कि मंटो और त्यागी में एक बड़ा फ़र्क है। मंटों लोगों को अपनी और रुजू करने के लिए यह सब करता था, पर त्यागी ऐसा करता है अपने और उन लोगों के बीच खाई बनाने के लिए-जिन्हें वह पसंद नहीं करता। त्यागी ने जीवन में समझौता करना कभी पसंद नहीं किया। इसीलिए वह ज़िंदगी के हर मैदान में (कविता में छोड़कर) बे-तरह नाकामयाब रहा है। उसे केवल एक ही क्षेत्र में कामयाबी मिली है-बदनामी कमाने और लड़ाई मोल लेने में। और उसे अपनी इस नाकामयाबी, इस बदनामी पर बड़ा अभिमान है। उसका कहना है कि यह मैंने बड़ी मेहनत से कमाई है। गांव में पैदा होने के कारण शहरी ज़िंदगी की नफ़ासत को वह अपने में पूरी तरह उतार न सका, अपने को उसके अनुकूल ढाल न सका। आज भी वह बिना सोचे-समझे सादगी से ईमानदारी की बात कर जाता है। तो यह है रामावतार त्यागी का ऊपरी चित्र और चरित्र, जिसने ज़िंदगी में अनेक कठिनाइयों का भीषण हलाहल पीकर अपनी कविताओं के द्वारा मुहब्बत की शराब बड़ी उदारता से बांटी है।

त्यागी का जन्म 8 जुलाई 1925 को मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) की तहसील सम्भल के ‘कुरकावली’ नामक गांव में एक त्यागी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पुरानी वंश-परंपरा के अनुसार उसका परिवार अच्छा-खासा ज़मींदार घराना था, जो निरंतर मुकदमेबाज़ी में लगा रहने के कारण धीरे-धीरे मामूली किसान परिवार में बदल गया। घर की आर्थिक दशा अच्छी न होने के कारण वह सदा प्रभावों और संघर्षों से जूझता रहा। परिवार में चार भाई और एक बहन। उनमें सबसे बड़ा रामावतार। यद्यपि परिवार की अवस्था उन दिनों कुछ अच्छी नहीं थी, किंतु उसके रीति-रिवाज-व्यवहार सब-के-सब ज़मींदारों-जैसे ही थे। इसी कारण उसे छोटी जाति के बच्चों के साथ खेलने तक की मनाही थी। लेकिन घरेलू परंपराओं के प्रति मन में शुरू से ही विद्रोह होने के कारण वह खेलता था उन्हीं के साथ। परिणामस्वरूप खूब पिटाई होती थी। त्यागी का मन पढ़ने की ओर इसलिए घूमा कि उसे पढ़ने से रोका गया, वैसे शिक्षा के प्रति कोई विशेष मोह उसके मन में नहीं था। स्वांग, गाने, भजन, रामायण और आल्हा आदि में उसका मन शुरू से ही रमता था। लाख बार रोके-टोके जाने के बावजूद अपने परिवार के विरोधी परिवारों में वह नित्य आता-जाता था। त्यागी को अपनी दादी का प्यार और दुलार बहुत अधिक मिला। हर वक़्त होने वाली पिटाई से उसकी रक्षा वे ही करती थीं। स्थिति यह थी कि शत्रुओं के परिवार त्यागी को उसके अपने परिवार से अधिक प्यार करते थे। आख़िर रोज़-रोज़ की मारपीट और विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि परिवारों की शत्रुता मित्रता में बदल गई। वह अभी दस ही वर्ष का था, कि उसे पढ़ने के लिए शहर भेज दिया गया। स्कूल गांव से 5 मील दूरऋ और पैदल ही रोज़ वहां आना-जाना। कभी मौज आई तो रास्ते में ही बैठकर कहीं तुकें जोड़ने लग जाता था। इस तरह कविता किसी-न-किसी रूप में बचपन से ही उसके साथ थी।

इस दौरान सन् 1941 में, जब वह सातवीं कक्षा में ही था, उसका विवाह भी कर दिया गया। जिस परिवार में उसका विवाह हुआ, वह भी पढ़ने का घोर विरोधी था। पत्नी अपढ़ होने के साथ-साथ बदज़ुबान थी। जीवन में यदि थोड़ा-बहुत आगे बढ़ने का संबल किसी ने दिया तो वह थी उसकी मां। दादी के अतिरिक्त मां से ही उसे आंतरिक ममता मिली। परिवार में केवल दो ही व्यक्ति ऐसे थे, जिन पर घर के बड़ों की कोपदृष्टि रहती थी, एक उसकी मां और दूसरा वह स्वयं। मां की पीड़ा का त्यागी के मन पर बड़ा असर पड़ाऋ और यही एक बात थी जिसने उसे शिक्षा की प्रेरणा भी दी। उसने मन-ही-मन यह निश्चय कर लिया था कि मां को सुखी करने के लिए उसका पढ़ना ज़रूरी है।

सन् 1944 में सम्भल के किंग जार्ज यूनियन हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा देने के बाद उसने जब काॅलिज में पढ़ने की इच्छा प्रकट की तो घर-भर ने इंकार कर दिया। दूर-दूर से नाते-रिश्तेदारों को बुलाकर सिफ़ारिशें कराई गईं, किंतु सब बेकार। एक तो उन दिनों निरंतर मुकदमेबाज़ी में फंसे रहने के कारण घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी, दूसरे पिता उसे आगे पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन जन्म के विद्रोही को रोक भी कौन सकता था? दूर के रिश्ते के एक ताऊ से सौ रुपए उधार लिए और सिर पर सामान लादकर वह काॅलिज में दाख़िला लेने के लिए चंदौसी पहुंच गया। चंदौसी के श्यामसुंदर मैमोरियल काॅलिज के एक लोकप्रिय छात्र के रूप में उसने सन् 1948 में बी.ए. किया। इसी बीच पत्नी के परिवार वालों से उसका गहरा मन-मुटाव हो गया। वह इस सीमा तक पहुंचा कि उन्होंने उसका बहुत अपमान किया। बात यहां तक बढ़ी कि पत्नी नाता तोड़कर अपने मायके चली गई। यहीं से त्यागी के जीवन का मोड़ आता है। वह नौकरी करने की नीयत में दादी से कुछ रुपए ले कर चुपचाप बे-सरो-सामान दिल्ली के लिए चल दिया। पर रास्ते में ही उसकी तबियत बेईमान हो गई और मन-ही-मन पढ़ाई जारी रखने का निश्चय भी हो गया।

दिल्ली एक अजनबी जगह, और एक मामूली-सी संदूकची उसके पास। उसमें पांच रुपए और कुछ आने। कई दिन तक दिल्ली-जंक्शन के मुसाफ़िरख़ाने में ही आवारगी। दिल्ली में रहने वाले एक दूर के रिश्तेदार से उसने कभी श्री वियोगी हरि का नाम सुना था। उनसे मिलने का मन-ही-मन निश्चय करके वह उनका पता निकालता-निकालता वहां पहुंच गया। हरिजी ने उसकी दुःख-गाथा सुनी और ‘हरिजन उद्योगशाला’ में उसे ठहरने का स्थान मिल गया। शर्त थी कि हरिजन बच्चों को उसे कुछ समय पढ़ाना होगा। त्यागी का स्वप्न धीरे-धीरे साकार होने लगा था।

एक दिन वह समय निकालकर एम.ए. (हिंदी) की कक्षा में प्रवेश पाने की इच्छा से हिंदू काॅलिज में जा पहुंचा। उन दिनों वहां हिंदी-विभाग के अध्यक्ष डाॅक्टर सुरेंद्रनाथ शास्त्री थे। इस समय तक त्यागी की कुछ कविताएं स्थानीय ‘वीर अर्जुन’ में प्रकाशित हो चुकी थीं, अतः जब त्यागी ने श्री शास्त्री जी से उनके काॅलिज में प्रवेश पाने की इच्छा व्यक्त की और अपना नाम बताया तो उन्होंने नाम सुन कर उसे प्यार से अपने पास बिठाया। लेकिन त्यागी का सीधा सवाल था, ‘दाख़िले के भी पैसे पास नहीं हैं, और पढ़ने की हार्दिक इच्छा है, कहीं से कर्ज़ की व्यवस्था हो जाए तो भी काम पूरा हो सकता है।’

अब वह उस दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था, जहां फैशन का कोई ठिकाना नहीं। उसके पास पहनने और फैशन करने के लिए उन दिनों केवल एक हरी कमीज़़ और सफेद लट्ठे का एक पाजामा ही था। लेकिन थोड़े ही दिनों में अपनी कविता और अध्ययन में रुचि होने के कारण वह अपने साथियों और गुरुजनों की निगाह में जम गया।

सन् 1950 में उसकी भेंट ख्याति और श्री महावीर अधिकारी से एक साथ हुई। उन दिनों अधिकारी जी ‘नवभारत’ के रविवासरीय संस्करण का संपादन करते थे और ‘नवयुग’ पर सहायक संपादक के रूप में उनका नाम प्रकाशित होता था। अधिकारी जी ने त्यागी की साहित्यिक प्रतिभा को परखा और इस जगमगाते हीरे को हिंदी-साहित्य-जगत के सामने लाकर अपने जीवन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य का संपादन किया। ‘सिकंदर’ नामक खंडकाव्य के कुछ अंश भी उन दिनों ‘नवयुग’ में प्रकाशित हुए थे, जिन्हें पढ़कर हिंदी कविता के पारखियों को इस नए नक्षत्र के उदय का आभास हो गया था। धीरे-धीरे त्यागी की प्रतिभा तथा योग्यता से दिल्ली का साहित्यिक वातावरण महक उठा। यहीं से उसके विद्रोह और दर्दभरे गीतों की दास्तान शुरू होती है।

मैंने उसे किस प्रकार जाना, इसकी भी एक रोचक कहानी है। सन् 1950 का 16 अगस्त। सब्जी मंडी की रामरूप धर्मशाला में स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में कवि-सम्मेलन का आयोजन। सम्मेलन की अध्यक्षता मैं कर रहा हूं। कार्यवाही प्रारंभ करते हुए एक तरुण का नाम मैं सूची में से घोषित करता हूं। कवि है रामावतार त्यागी। देखता हूं कि औसत कद का सांवले रंग का एक तरुण काला चश्मा लगाए मंच की ओर आ रहा है। इससे पूर्व मैंने उसे नहीं सुना था। लेकिन उस दिन मैंने जो कुछ सुना, वह आज भी नहीं भूला हूं -

पुरातन व्यवस्था बदलता नया युग,

नया ख़ून लेकर चला आ रहा है।

नई नाव जर्जर पुराने पुलिन पर,

मिलन को उतरना नहीं चाहती है।

नई वायु सूखे हुए उपवनों में,

ठहरकर गुज़रना नहीं चाहती है।।

यह था विद्रोह और क्रांति का संदेश, जो उस दिन स्वतंत्रता के शुभागमन पर मुझे त्यागी से सुनने को मिला था। मैंने तभी जान लिया था कि त्यागी का कवि समाज के नव निर्माण के लिए अत्यंत आतुर और आकुल है। वह चाहता है समाज में विषमता का जो जाल फैला हुआ है, उसका शीघ्र ही अंत हो और देश का नव निर्माण करने के लिए तरुणों में त्याग और बलिदान की पावन गंगा प्रवाहित हो उठे।

त्यागी के काव्य में अपने पारिवारिक जनों से निरंतर मिलने वाली प्रताड़नाएं और लांछनाएं समय की हवा पाकर असंतोष और विद्रोह के रूप में बदल गई। धीरे-धीरे उसका वही असंतोष परिवार के प्रति न रहकर समाज की विषमताओं के प्रति हो गया और एक स्थिति ऐसी आई कि उसकी रचनाओं में समाज की समग्र व्यवस्था के प्रति असंतोष दिखाई देने लगा। उसे जीवन के प्रारंभ से ही किसी का प्यार और दुलार नहीं मिला था। शायद इसीलिए समाज के प्रत्येक प्राणी में उसे शोषक और हिंसक का रूप ही दिखाई देने लगा। यहां तक कि समाज की व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने के लिए उसका कवि व्यग्र हो उठा। उसने युग के इतिहास को बदलने के लिए देश के तरुणों को चुनौती दी और लिखा -

तुम समझोगे, मैं बाग़ी हूं, विद्रोही हूं,

तुम कहकर मुझको ‘पागल’ एक पुकारोगे।

तुम ‘महा नास्तिक’ कहकर ग़ाली भी दोगे,

हो सका अगर तो मुझ पर पत्थर मारोगे।

पर मैं तो बंधन तोड़ ज़माने-भर के ही,

इस एक बग़ावत को सुलगाने आया हूं।

मैं चमचम करते फाड़ समाजी परदे को,

अंदर सड़ती तसवीर दिखाने आया हूं।

तथा

सौगंध हिमालय की तुमको,

युग का इतिहास बदल दो!

ये भूखे कंगाल सिकुड़ते सड़कों पर रातों में,

दिया गया नूतन विधान का ध्वज जिनके हाथों में,

इससे तो पतझर अच्छा,

ऐसा मधुमास बदल दो!

सौगन्ध हिमालय की तुमको

युग का इतिहास बदल दो!

निरंतर अभावों और संघर्षों से जूझते रहने के कारण कवि त्यागी का यह विद्रोही रूप अपने छात्र-जीवन में ही पनप चुका था। सन् 1950 में दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. करने से पूर्व ही दिल्ली के साहित्यिक तथा सामाजिक जीवन में उसका अच्छा स्थान बन चुका था। कुछ समय बेकार रहने के बाद उसे यहां की ‘रामरूप विद्या मंदिर’ नामक शिक्षण संस्था में अध्यापन-कार्य मिल गया और उसके जीवन में कुछ स्थायित्व भी आ गया। इसी दौरान उसने परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को यहां तक निबाहा कि यह संघर्ष करते हुए भी अपने दो छोटे भाइयों को पढ़ाने में भरपूर मदद की। लेकिन स्वाभिमानी और लड़ाकू स्वभाव होने के कारण वह रामरूप विद्यामंदिर में अधिक दिन नहीं टिक सका और फिर उसके जीवन में एक नई आंधी आ गई।

यहीं से उसकी अनगिन असफल प्रेम-कथाओं का आरंभ होता है। पत्नी से सदा-सर्वदा के लिए रिश्ता टूट चुका था। ख्याति उसके चारों और घूमने लगी थी। फिर क्या था, रूप की तितलियां आती रहीं, और एक के बाद एक, कभी अनेक भी उसके जीवन को डसकर जाती रहीं। उसका जीवन पूरी तरह विषाक्त हो उठा। कभी मूचर््िछत, और कभी अर्ध-मूचर््िछत मैंने उन दिनों उसे देखा। जब-जब ग़ौर से देखा, दर्द के सिवा उसके पास कुछ भी नहीं दिखाई दिया।

अब उसकी कविता में विद्रोह की आग नहीं थी। केवल प्रेम और शृंगार के अनूठे गीतों की रचना ही इस बीच हुई। यह बात ज़रूर है कि उसकी ऐसी रचनाओं में भी सौंदर्य और प्रेम की विषमता के प्रति विद्रोह परिलक्षित होता है। इस दौर की उसकी रचनाओं की गंध दिल्ली की गली-गली में बिखरकर सारे हिंदुस्तान में फैल गई।

‘ज़िंदगी’ नामक कविता ने तो उन दिनों देश की तरुणाई के मानस में अचेतन रूप से सुप्त वियोग के ज्वार को बुरी तरह जागृत कर दिया था। त्यागी के साथ-साथ बे-शुमार कंठ गुनगुना उठे -

आंख दो टकरा गई हों, जब किसी के लोचनों से

हो गया हो मुग्ध जो भी रूप के कुछ कंपनों से,

मौन जीवन-वाटिका में प्यार के तरुवर तले,

मिल गए हों प्राण जिसको राह में गाते वनों से

उन मिलन के दो क्षणों का नाम केवल ज़िंदगी,

रात को इन तड़पनों का नाम केवल ज़िंदगी।


बंधनों से चाहता है मुक्त होना सब ज़माना

चाहता हूं मैं किसी के लोचनों में घर बसाना

बंध गया जो दो भुजों के बंधनों में एक पल भी

चाहता है मौन कारावास में जीवन बिताना।

प्यार के इन बंधनों का नाम केवल ज़िंदगी,

रात की इन तड़पनों का नाम केवल ज़िंदगी।


मुझको भी प्यार मिला दो दिन

कोमल भुज-हार मिला दो दिन

उन आंखों में रहने का भी

मुझको अधिकार मिला दो दिन

जिन आंखों की गहराई में, तुम डूब रहे, मैं उबर चुका,

पथ एक वही अंतर इतना, तुम गुज़र रहे, मैं गुज़र चुका।

विश्वास किया सौगंधों पर

मैंने उस दिन तुमसे बढ़कर

कल मुझे लिखा जो आज तुम्हें

मज़मून वही, तिथि का अंतर।

त्यागी ने अपने थोड़े-से जीवन में स्वप्न की भूमि पर कल्पना के अनेक महल बनाए और मिटाए हैं और उसने उनमें आकंठ डूबकर ‘सृजन’ और ‘पतन’ की गहराई को क़रीब से देखा है। इसकी घोषणा उसने ख़ुद यों की है -

मैं चला हूं जहां भी मरुस्थल वहीं, घोर संवेदनों को चला झूमता, 

जीवनाकाश में चंद दुर्दैव का, रात में और दिन में रहा घूमता। 

प्यार मुझको सुलाता रहा दर्द की लोरियां ज़िंदगी में सुनाकर सदा, 

दोपहर दुर्दिनों का निराशा लिए, पैर मेरे जलाकर रहा चूमता। 

परिच्छेद मैंने बहुत ज़िंदगी के लिखे, पर सभी की कथा एक-सी

दीप पहले जला औ शलभ बाद में राख दोनों हुए, थी ख़ता एक-सी 

दर्द की एक मदिरा दवाई किसी ने बताई इसीसे बहुत पी गया, 

पी गया हूं गरल, पी गया अश्रु भी, पी गया हूं सुधा,

पर व्यथा एक-सी।

ज़िंदगी से मरा, मौत से जी गया, आंधियों में पला, 

सांस से बुझ गया, मैं जनम को मरण को बहुत जानता हूं।

त्यागी सरल था, सहज था। इसलिए छला भी उसे जी भरकर गया। लालची निगाहें आती रहीं और उसके स्वप्न तोड़कर जाती रहीं। कलियों ने, फूलों ने, भंवरों ने, उपवन ने, यहां तक कि मालियों ने भी उसे नोचा। उसके जीवन में कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां कोई-न-कोई खरोंच न हो। अब वह टूटा हुआ, बिखरा हुआ इंसान था। एक नाकामयाब सपने की तरह मैंने उसे भटकते देखा है। लेकिन भटका सिर्फ़ उसका व्यक्ति ही, गीत उसका कभी नहीं भटका। उसने जहां भी थोड़ा-सा स्नेह मिलता देखा, उधर ही निकल गया। किंतु सब मृग-मरीचिका ही सिद्ध हुआ और उसने अपने अरमानों की होली जलानी शुरू कर दी - 

कल्पना के पुष्प चुन-चुन स्वप्न थे मैंने सजाए

भावना को साधना कह, गीत कितने गुनगुनाए

जो हुआ अपराध मुझसे, सब हृदय की भावना थी,

उन मधुर आकर्षणों में मैं रहा सुध-बुध भुलाए।


याद मत मुझको दिलाओ भूत की भूली कहानी,

आज मैं अरमान की होली जलाकर जा रहा हूं

गीत जो मैंने बनाए थे, मिटाकर आ रहा हूं।

सन् 1953-55 के बीच एक संगीन घटना उसके जीवन में घट चुकी थी, इस कविता को लिखने के बाद से उसके गीतों में पीड़ा का जो सागर लहराया उसकी कल्पना करके भी रोमांच हो आता है। ये वे दिन थे जब त्यागी अपनी वाणी और लेखनी दोनों के द्वारा असंतोष से भरी पीड़ा की उपासना में रत था। उन्हीं दिनों त्यागी ने लिखा था -

मेरी आंख कुछ नम ही रहने दो,

मुझको थोड़ा-सा ग़म ही सहने दो,

जीवन की आंखें पोंछ सके कोई-

ऐसा आंचल हो तो मुझको ला दो।

......

जो समुंदर की सतह पर, तैरती हो बाल खोले,

अब उसी बाग़ी लहर के हाथ का कंगन बनूंगा।

मैं रहूं प्यासा, यही काफी नहीं है,

होठ भी मेरे किरन से छील डालो।

फिर उदासी की गुफा में बंद कर दो

माफ़ कर दूंगा तुम्हें संसार वालो !

लाज को बे-बात जिसकी, दे गया ग़ाली स्वयंवर,

मैं उसी घायल दुल्हन की, बेज़ुबां तड़पन बनूंगा।

आज मैं सुख के लिए चिंतित नहीं हूं,

दर्द तो यह है कि दुःख घटने लगा है।

चल रहा था जिस उदासी के सहारे,

हाथ उसका हाथ से छुटने लगा है।

तोड़कर सारे नियम जो कल्पना को पूजती है,

मैं उसी चंचल जवानी का सरल बचपन बनूंगा।

.......

तुम कृपण ऐसे कि मेरे मांगने पर,

और क्या आशीष भी तो दे न पाए,

दर्द इतना दे दिया देने लगे यदि,-

उम्र-भर भी नींद जो मुझको न आए,

त्यागी ने अपने लिए जिस मार्ग का वरण किया, ज़ाहिर है कि वह साधारण मार्ग नहीं हैऋ बड़ा अनगढ़ और पथरीला मार्ग है वह। इसी कारण उसे अपने अभीष्ट की प्राप्ति में भारी संघर्ष करना पड़ा है। उसके जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप यही है कि उसे समझौता करना नहीं आता। किसी के सामने झुकना नहीं आता। यही कारण है कि उसका विरोध भी काफी हुआ है, और हो भी रहा है। इसकी सफ़ाई में त्यागी ने एक जगह पर लिखा है -

मेरे पीछे इसीलिए तो धोकर हाथ पड़ी है दुनिया,

मैंने किसी नुमाइशघर में सजने से इंकार कर दिया।

मन का घाव हरा रखने को

अनचाहे हंसना पड़ता है,

दीपक की ख़ातिर अंगारा,

अधरों में कसना पड़ता है।

आंखों को रोते रहने का ख़ुद मैंने अधिकार दिया है,

सच को मैंने सुख की ख़ातिर तजने से इंकार कर दिया।

.....

मेरा मोल लगाने का वे दम भरते हैं,

जिनका मन सौ-सौ हाथों नीलाम हुआ है

मैं उनकी ड्यौढ़ी का गायक हूं, याचक हूं

विष को छोड़ जिन्होंने अमृत नहीं छुआ है,

हिंदी में नई पीढ़ी के जितने भी कवि पिछले दस वर्षों में उभरे हैं उनमें त्यागी ही मात्र ऐसा कवि है, जिसने सरल शब्दावली में गहरी-से गहरी अनुभूति गीतों के माध्यम से प्रस्तुत की है। त्यागी के गीत उसके शब्दों के जादू और अर्थ-बोध दोनों ही दृष्टि से हिंदी-कविता में अपना विशिष्ट स्थान बना चुके हैं। त्यागी का मत है कि ‘भाव का उद्भव-मात्र ही गीत को जन्म देने के लिए पर्याप्त नहीं है, वरन् जो भाव मन में जीते-जीते जीवन का दुःख-सुख बन जाता है, वही गीत को जन्म देने में समर्थ होता है।’ गीत की परिभाषा में उसने ख़ुद यों लिखा है -

गीत क्या है, सिर्फ़ छंदों में सजाई,

आदमी की शब्दमय तसवीर ही तो,

ज्ञान है अज्ञान का उपनाम केवल,

अश्रु ममता की विकल तक़रीर ही तो।

.....

ये मन की गहराई से निकले हैं,

जीवन की अमराई से निकले हैं,

ये यौवन की रामायण-जैसे हैं,

ये स्वर की शहनाई से निकले हैंऋ

गीत की महिमा का वर्णन त्यागी ने अपनी कविताओं में अनेक स्थानों पर सूक्ति के रूप में किया है। दो उदाहरण इस प्रकार हैं-

डगमगाई नाव जब-जब भी किसी की

गीत ने हंसकर किनारा दे दिया,

उस दिए का मोल बोलो कौन देगा,

आंधियों के रोष को जिसने पिया?

लाख चांदी को पसारो,

किंतु तन के साहुकारों,

प्यार के निर्धन वचन बिकते नहीं है।

.....

गीत की डोर को ही पकड़कर बढ़ो,

फूल हो तो किसी देवता पर चढ़ो,

घंटियों की तरह तुम जहां बज उठो,

मैं वहीं प्रार्थना की तरह गा उठूं,

त्यागी ने इन गीतों के निर्माण में अपने जीवन का सर्वस्व तक होम दिया है। जीवन का सारा हास-उल्लास तक उसने अपने गीतों में समोकर मानव-जगत् के कल्याण के लिए रख दिया है। इन गीतों के निर्माण में उसे कितना त्याग करना पड़ा है, इसका अनुमान आप उसकी इन पंक्तियों से लगा सकते हैं। उसका कहना है -

जितने गीत रचे हैं मैंने,

इस लंबी बीमार उमर में,

उन सबको बेचूं तो शायद

आधा कफ़न मुझे मिल जाए।

मैं न जनम लेता तो शायद

रह जाती विपदाएं क्वांरी

मुझको याद नहीं है मैंने

सोकर कोई रात गुज़ारी

मुझको अपनी निष्ठाओं का

कुछ तो फल मिलना है आख़िर

मेरे बाद बहुत संभव है

सारी धरन मुझे मिल जाए।

त्यागी के जीवन में जितनी पीड़ा, वेदना और कसक है, यदि उतनी पीड़ा किसी और व्यक्ति ने जीवन में सही होती तो कदाचित् वह पागल हो जाता। उसने अपनी पीड़ा को अपने इन गीतों में उड़ेलकर वास्तव में एक प्रशंसनीय कार्य किया है। कदाचित् उसका कोई भी ऐसा गीत नहीं, जिसको पढ़कर या सुनकर हिंदी का कोई भी सहृदय पाठक या प्रेमी झूम न उठे, छलछला न उठे। आज हिंदी के कवि-सम्मेलन जो इतने लोकप्रिय हो रहे हैं, उनकी लोकप्रियता में यदि किसी कवि ने साहित्यिकता को उल्लेखनीय रूप में जोड़ा है, तो वह रामावतार त्यागी है। उसकी रचनाओं और उसके गीतों की सफलता का एक कारण यह भी है कि वह उनके द्वारा हिंदी में नई भाषा, नए मुहावरे, नई उपमाएं और नए छंद लाया है। हिंदी के मूर्धंय कवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने उसके कवित्व की प्रशंसा करते हुए उसकी नई काव्य-कृति ‘आठवां स्वर’ की भूमिका में लिखा है- ‘‘त्यागी के गीत मुझे बहुत पसंद आते हैं। उसके रोने, उसके हंसने, उसके बिदकने और चिढ़ने, यहां तक कि उसके गर्व में भी एक अदा है, जो मन को मोह लेती है।’’  इसी प्रकार डाॅ. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ ने त्यागी के संबंध में कहा है-‘‘त्यागी प्रणय की विभिन्न परिस्थितियों का जिस मार्मिकता से चित्रण करते हैं वह अद्वितीय है। सहज भाषा लिखने में वह हिंदी के आधुनिक गीतकारों में सबसे आगे हैं। अछूती उपमाएं, ताज़ी सूक्तियां और मौलिक प्रयोग त्यागी जी की कविता के ऐसे गुण हैं, जो गीतकारों के लिए ही नहीं, प्रयोगवादियों के लिए भी आदर्श हो सकते हैं।’’

ये दो उदाहरण तो हिंदी की दो पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन उसके पाठकों का उसकी रचनाओं के संबंध में जो अभिमत है। वह अधिक वास्तविक है। एक पाठक ने उसको अपने एक पत्र में महोबा से लिखा है-‘‘आपके गीतों में कुछ इतनी पीड़ा और कसक मिलती है कि अकेला मैं ही नहीं, मेरे-जैसे कितने अनेक पाठक उसमें अलग-अलग अपनी-अपनी तस्वीर देखते हैं।’’

त्यागी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यह है कि उसने संसार के पीड़िता, तिरस्कृत और लांछित वर्ग की पीड़ा को अपनी ही पीड़ा समझ कर उस भाषा में चित्रित किया है, जो जन साधारण की है, और जिसे स्वाभाविक बनाने में उसके छंदों ने पर्याप्त सहायता दी है। कभी-कभी त्यागी ने अपने इन गीतों में प्राणों की वह संजीवनी पाठकों को प्रदान की है कि बहुत से लोगों ने उनसे पर्याप्त प्रेरणा ग्रहण की है। किसी कवि की कविता पढ़कर कोई व्यक्ति अगर आत्म-हत्या करने का अपना इरादा बदल दे तो इसे आप क्या कहेंगे? रामपुर के एक ऐसे ही व्यक्ति ने त्यागी को पत्र लिखा, जो जीवन से निराश होकर आत्म-हत्या करने तक का निश्चय कर चुका था। उसने अपना निश्चय त्यागी की कविता पढ़कर बदल डाला और अपने पत्र में लिखा-‘‘मैंने आपकी रचना पढ़कर ही अपना विचार बदला। उसने मुझे जीने की प्रेरणा दी। धन्यवाद।’’

त्यागी जीवन में सौंदर्य और अनुभूति का चित्रण करने वाला कवि है। उसके गीतों में जहां संध्या के डूबते हुए सूर्य की सुनहली छाया है वहां उसने संसार की वेदना को अपने गीतों के गंगा-जल के समान पवित्र आंसुओं से पखारा है! धूल और आंसुओं से लिपटे त्यागी के गीत हृदय की उष्णता में तपकर बाहर निकले हैं, और ये कंचन के समान खरे लगते हैं। नपे-तुले शब्दों में लिखे गए त्यागी के गीत स्नेह-शिखर से झरते हुए झरने के समान मानव-मन की अतल गहराइयों में बैठकर उसे इस प्रकार आप्लावित कर देते हैं कि ऐसा लगने लगता है, जैसे जीवन के सफेद-सफेद फूलों पर गीतों की रंग-बिरंगी तितलियां छोटे-छोटे पंख पसारकर उड़ रही हों। उसके गीतों की सादगी ने त्यागी को अपने पाठकों के मन में जो स्थान दिलाया है, वह आज की पीढ़ी के कवियों के लिए ईष्र्या की वस्तु है। उसके गीतों में बातचीत का ऐसा लहज़ा होता है कि वह साधारण पाठक के मन को अपील कर जाता है, छू जाता है। कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं -

मंदिर में सौगंध दिला लो

मुझसे गंगा-जल उठवा लो

.....

मैं चला आया निमंत्रण पर तुम्हारे

द्वार तक भी क्या न पहुंचाने चलोगे?

.....

मेरे पीछे धोकर हाथ पड़ी है दुनिया

.....

एक कोई है कि जिसका ध्यान करके

गांठ आंचल में लगाकर जोड़ लेते।

.....

मृत्यु की भाषा कठिन होती बहुत ही

ज़िंदगी उसका सरलतम व्याकरण है।

.....

त्यागी ने गीतों के क्षेत्र में जो सफलता प्राप्त की है, वह उसकी पीढ़ी के बहुत कम कवियों को मिली है। इतनी छोटी सी उम्र में उसने जहां हिंदी के साधारण-से-साधारण पाठक का प्यार और दुलार प्राप्त किया, वहां प्राचीन पीढ़ी के लिए भी वह एक कौतूहल का सृष्टा रहा। यह त्यागी की सफलता नहीं तो क्या है कि दिल्ली की एक गोष्ठी में हिंदी के शीर्षस्थ कवि डाॅ. हरिवंशराय बच्चन ने यह कहा था-‘‘रामावतार त्यागी आज की पीढ़ी के कवियों में भारत-भर में अकेला है। वह गीतों का बादशाह है।’ किसी ने उसे मजाज़ बताया, और किसी ने जिगरऋ लेकिन वह सिर्फ़ त्यागी है ! जो बिलकुल मौलिक है, बिल्कुल ताज़ा है।

त्यागी ने अपनी पीड़ा, वेदना और व्याकुलता को जहां अपने काव्य का माध्यम बनाया है, वहां उसने अपने गीतों में ऐसी अनेक विचार सूक्तियां भी लिखी हैं, जो हिंदी के प्रत्येक वर्ग के पाठक के लिए पठनीय ही नहीं, मननीय भी हैं। कुछ उदाहरण लीजिए -

कालियों को बेदाग़ ताज़गी,

पूजा के कुछ काम न आई,

बासी फूल चढ़े मंदिर में,

अनुभव की दी गई दुहाई,

.....

पाप बचपन ने न जाने क्या किया है,

शाप यौवन का किसी ने दे दिया है,

इसलिए बेचैन से मिलते सभी है,

अनमने-से राह पर चलते सभी हैं।

.....

माना मिट्टी का एफ खिलौना हूं

लेकिन कुछ का मन तो बहलाया है

आख़िर इतना बेकार नहीं हूं मैं,

जो कोई जग के काम न आया है।

.....

सुधि का दीप जला लेने से

दुःख आपस में बंट जाता है।

रोशनदान खुले रखने से

कुछ सूनापन घट जाता है।

.....

मेरे जीवन के सूने आंगन में

जिसने दुःख का मेहमान बसाया है

वह मेरे लिए न ईश्वर से कम है

जिसने मेरा सुनसान घटाया है।

.....

समय का महाजन बड़ा ही कृपण है

निवेदन किया, किंतु देता न ऋण है।

त्यागी ने कविता के क्षेत्र में तो यश प्राप्त किया ही, सांसारिक क्षेत्र में भी उसने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

सन् 1955 में उसके जीवन में एक संगीन घटना घट गई। यों इस बदनाम कहानी का प्रारंभ सन् 1954 में ही हो चुका था। उसके स्नेहसिक्त और विषादमय जीवन में अचानक एक सुबह ऐसी किरण उतरी कि जिसने उसकी अंधेरी दुनिया को जगमगा दिया। ग़रज़ कि जब त्यागी मायूस होकर दिल्ली की अंधेरी और तंग गलियों में रोशनी की खोज में भटक रहा था, तभी उसके झुलसते मस्तक पर एक कोमल हथेली ने शीतलता बिखेर दी। यह हथेली किसकी थी, इसकी चर्चा मैं जानबूझकर नहीं करूंगा। अक्सर मैंने, औरों ने, और शायद सभी ने त्यागी को उन दिनों अकेला कभी नहीं देखा था। जब देखा, तभी उस परिचित और सौम्य चेहरे के साथ। असली नाम जाने उसका क्या था, लेकिन त्यागी की ‘चरित्रहीन के पत्र’ नामक पुस्तक के मुताबिक़ उसका कल्पित नाम ‘सोमी’ है। त्यागी की ज़िंदगी का शायद सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि उसकी छोटी-से-छोटी ख़ुशी से लगा हुआ कोई इतना बड़ा ग़म उसके साथ ज़रूर आया है कि मुसकुराने के लिए उसे एक पल भी नहीं मिला। जिस दिन यह रूप-किरण त्यागी के आंगन में उतरी उसी शाम ‘रामरूप विद्या मंदिर’ से उसकी नौकरी छूट गई। फिर भी उन दिनों वह ख़ुश नज़र आता था। हालांकि मैं अचरज से उसके तंग हाल को देखता था और सोचता था कि न जाने कैसा यह आदमी है जिसे रोटी से ज़्यादा भूख प्यार की है। त्यागी की ज़िंदगी को वह रंगीन (या जैसी भी हो) कहानी चली, और चलती गई। इसके बारे में त्यागी ने अपनी पुस्तक ‘चरित्रहीन के पत्र’ में ख़ुद लिखा है- ‘दिवाली आई और चांद के तारे-जैसा एक चांदी का चिराग़ लेकर तुम मेरे घर आई थीं, क्योंकि तुम्हें मालूम था कि तुम न आईं तो मेरे घर रोशनी को जन्म नहीं मिलेगा।’’

‘‘उन दिनों तुम्हें मेरे स्वप्न आते थे, नींद में अक्सर तुम मेरी आहटों से चैंक उठती थीं। ढेर-सा दर्द न जाने कहां से तुम्हारे मन में समा गया था। और एक भी दिन ऐसा नहीं होता था जब तुम अपने आंसुओं से मेरी छाती को पानी-पानी न कर देती हो।’’

‘‘मुझे याद है, रात को जब मैं तुम्हारे घर से विदा होता था तो द्वार तक तुम मुझे प्रकाश दिखाने आती थीं। कई बार तुम कह चुकी थीं कि जब मैं तुम्हें विदा करके लौटती हूं तो लौटकर तब तक उस मोमबत्ती को नहीं बुझाती जब तक मुझे यह यक़ीन न हो जाए कि तुमने अपने कमरे की रोशनी जला ली होगी। कभी-कभी तो मैं तुम्हारे जाने के बाद इतनी ज़ोर से सिसक उठती हूं कि कई दिन तक मां के सवालों के जवाब सोच-सोचकर देने होते हैं।’’

आख़िर दो वर्ष तक बेकार रहने के बाद उसे ‘समाज’ के संपादन का काम मिल गया। रोटी घर आई, तो प्यार जा चुका था। क्यों चला गया, कुछ मालूम नहीं। शायद इसीलिए कि हमेशा ख़ुशी के साथ ग़म उसकी ज़िंदगी में आता ही रहा है। अब त्यागी वह त्यागी नहीं था, बल्कि लगता था कि दर्द आदमी की देह धारण किए भटक रहा है। बदनाम गलियों में, शराबख़ानों में, खंडहरों में, बियाबान जगहों पर, जब भी देखो, उदासी में डूबा, चुपचाप पागलों की तरह वह घूमता रहता था। परिणाम-स्वरूप लंबी बीमारी ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी मनःस्थिति उसके इन वाक्यों में अंकित है- ‘‘रात का यह वक़्त, शायद काफी बजे होंगे, मैं लेटा हूं, गुर्दे में फिर हल्का-हल्का दर्द हो रहा है। डाॅक्टर तक जाने की हिम्मत नहीं, दर्द को सहने का बल नहीं। चारों तरफ़ मौत मंडरा रही है, लेकिन पास नहीं आती। इस सुनसान में मुझे एक ही स्वर सुनाई देता है। एक झनझनाहट जो बार-बार मुझसे कहती है कि जब तुम्हारा स्वर मेरी तरह गूंजने लगे तब तुम इस बेक़रारी से मुक्त हो जाओगे।’’ ये वे दिन थे, जब त्यागी ‘समाज’ का संपादन करता था। लेकिन बड़ी लाचारी, मायूसी के दिन थे। किसी भी काम में उसका मन नहीं लगता था। आख़िर महावीर अधिकारी ‘समाज’ को छुड़ाकर उसे अपने साथ ‘समाज कल्याण’ में ले गए। जगह बदल जाने पर भी दर्द नहीं बदला। स्वभाव इतना अधिक चिड़चिड़ा हो गया था कि त्यागी एक दिन ख़ुद अधिकारी जी से भी झगड़ बैठा और नौकरी छोड़कर फिर बेकारी-बेरोज़गारी के आलम में आ पहुंचा।

यहां यह उलल्ेखनीय है कि ‘समाज’ में 6 महीने तथा ‘समाज कल्याण’ में लगभग 1 वर्ष कार्य करने के अतिरिक्त त्यागी ने कुछ दिन ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में भी काम किया है। उसकी इस आदत से कि वह कहीं भी जमकर काम नहीं करता, उसके सभी हितैषी नाराज़ हैं। लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि अब उसके जीवन में कुछ स्थायित्व आ गया है। पिछले लगभग सवा साल से, जब से वह ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादकीय विभाग में कार्य करने लगा है उसमें कुछ दुनियादारी आ गई है, उसे नौकरी करनी आ गई है। कदाचित् इसका कारण उसकी दूसरी शादी है, जो उसने पिछले वर्ष (1960) 26 जनवरी को नागपुर के एक पंजाबी परिवार की एक महिला सुश्री सुयश एम.ए.बी.टी. से की है। अब तो पहली पत्नी से प्राप्त उसकी एक-मात्र 11 वर्षीया कन्या राजबाला भी त्यागी के पास ही दिल्ली में रहकर पढ़ रही है और त्यागी अपने परिवार के लोगों के निर्वाह के लिए भी तीस रुपए मासिक बराबर भेजता जा रहा है। सन् 1955 से 1958 तक की त्यागी की जो भी रचनाएं हैं, वे ऐसी हैं कि जिनके आधार पर उसे ‘पीड़ा का गायक’ कहा जा सकता है। शायद पीड़ा की इतनी सजीव अभिव्यक्ति भक्तिकालीन कुछ कवियों को छोड़कर हिंदी के किसी कवि की रचनाओं में नहीं मिलती। उसकी इसी दौर की चुनी हुई रचनाओं का संकलन ‘आठवां स्वर’ है, जिसमें त्यागी के कवि की अमरता निवास करती है। त्यागी का पहला काव्य-संग्रह ‘नया ख़ून’ 1953 में प्रकाशित हुआ था। उसमें उसकी असंतोष, विद्रोह और क्रांति से परिपूर्ण वे रचनाएं संकलित हैं, जिसके कारण त्यागी ने कविता की विशाल अट्टालिका में अपने लिए उल्लेखनीय स्थान बनाया है। त्यागी ने एक उपन्यास भी लिखा है, जिसका नाम ‘समाधान’ है। इसके अतिरिक्त ‘मैं दिल्ली हूं’ नामक एक छोटा-सा बालोपयोगी काव्य भी उसने लिखा है, जिस पर भारत सरकार के शिक्षा-सचिवालय ने इस वर्ष पुरस्कार भी प्रदान किया है। त्यागी के ‘आठवां स्वर’ को पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने भी पुरस्कृत किया था। ‘राजधानी के कवि’ के अतिरिक्त त्यागी की साहित्यिक प्रतिभा और उसकी सूझ-बूझ का परिचय ‘प्रगीति’ नामक उस त्रैमासिक पत्र के पहले अंक को देखने से मिलता है, जो उसने श्री बालस्वरूप ‘राही’ के सहयोग से संपादित किया था, और जो केवल अपने जन्म की घोषणा करके साधनों के अभाव में असमय ही मौत की नींद सो गया।

त्यागी अब कवि होने के साथ-साथ एक अच्छे गृहस्थ-जैसा जीवन जी रहा है, यह कम आश्चर्य की बात नहीं। कारण कि जिसने पुराने त्यागी को देखा है उसे यह स्वप्न में भी गुमान नहीं हो सकता कि त्यागी इतना बदल चुका है। किंतु इसका आशय यह कदापि नहीं कि कविता से उसका दामन छूट गया है। बात असल यह है कि अब तो उसने जमकर लिखना शुरू किया है। उसके जीवन में जो अतृप्ति, असंतोष, विद्रोह और वितृष्णा थी, वह सब दूर होकर अब उसकी प्रतिभा हिंदी-गीत-काव्य को नई शब्दावली, नई अभिव्यक्ति, सूक्तियां, भाव-भूमि और छंद-विधान देने लगी है। हिंदी-कविता में विदेशी संस्कृति को लाने को उत्सुक प्रयोगवादी कवि-आलोचकों ने जब हिंदी-गीति-काव्य पर पुनरावृत्ति, पुरानेपन और अक्षमता-जैसे आरोप लगाए तो जिनके हाथों में हिंदी के गीत-काव्य की पताका थी वे अलमबरदार भी बहक गए। तब हर नए विचार और भाव को नई शब्दावली से परिपूर्ण सरस अभिव्यक्ति देने की गीत की क्षमता को जिन कवियों ने घोषित किया उनमें त्यागी का नाम पहली पंक्ति में आता है। आज की पीढ़ी में हिंदी में ऐसे कवि कम ही होंगे, जिन्होंने इतनी अधिक संख्या में इतनी श्रेष्ठ रचनाएं हिंदी को दी हों, जितनी कि त्यागी ने। किसी भी कवि के व्यक्तित्व एवं कृकृतित्व को आंकने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि उसके संबंध में उससे बड़े, उसके समकालीन और उसके पाठक क्या विचार रखते हैं। पिछली पंक्तियों में हम त्यागी के संबंध में हिंदी के कुछ मूर्धंय साहित्यकारों के अभिमत दे चुके हैं। अब आप देखें कि त्यागी के बिल्कुल समकालीन कवि और उसके अनन्य स्नेही श्री बालस्वरूप ‘‘राही’’ उसकी ‘आदतों को छोड़िए भी आदमी वैसे गुणी हूं’ नामक पंक्ति को ही त्यागी का परिचय मानकर उसके संबंध में क्या लिखते हैं- ‘उसका जीवन उत्तरदायित्वहीनता, घुटन, संघर्ष ओर फ़ाक़ामस्ती की एक अनंत शृंखला, उसका व्यक्तित्व परस्पर-विरोधी असंगतियों का एक विलक्षण संगठन। प्यार करे तो ज़िंदगी निसार कर दे, नाराज़ हो जाए तो औपचारिकता भी नहीं बरत सकता। विद्रोह और मोह, अहं और समर्पण का ऐसा अद्भुत संयोग मैंने कहीं नहीं देखा। अविनम्रता की सीमा को छूता हुआ स्वाभिमान, असहिष्णुता तक पहुंचने वाली संवेदनशीलता, तुनुकमिज़ाजी, ये उसके व्यक्तित्व के दो ख़ास पहलू हैं। सोचता हूं, इतने निर्मम व्यक्ति ने इतनी सहृदयता कहां से पाई। पर यह भी सच है कि निर्झर चट्टान का वक्ष तोड़कर ही प्रवहमान होते हैं।’’

त्यागी के एक पाठक के पत्र का उल्लेख करके मैं इस वक्तव्य को समाप्त करूंगा। यह त्यागी की लोकप्रियता नहीं तो और क्या है कि उसकी रचनाओं को पढ़ने के लिए आतुर एक पाठक ने उसको अपने 10 दिसंबर, 1960 के पत्र में लिखा - ‘‘दो रुपए के डाक-टिकट पत्र के साथ भेज रहा हूं, ‘आठवां स्वर’ के लिए। संभव हो तो भिजवा दीजियेगा। शेष क़ीमत अगले मास भेज दूंगा। चाहूंगा कि साथ में अपनी एक अन्य पुस्तक भी रखवा दें। विश्वास करें सुविधानुसार क़ीमत भेज दूंगा।’’

यह साधारण पत्र नहीं है। त्यागी ने अपने पाठकों का एक वर्ग बना छोड़ा है, जो उसके पीछे भी उसकी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक होगा। उक्त पाठक ने अपने इसी पत्र में त्यागी की प्रशस्ति में कुछ ‘रूबाइयां’ भी लिखी थीं। उनमें से एक यों है -

‘‘छलकता हुआ इक जाम है त्यागी

दिल की दुनिया में सरनाम है त्यागी

वास्तविक नाम तो कुछ और है शायद,

यह तो उसका उपनाम है त्यागी।’’


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