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कविवर रामावतार त्यागी

 

शेरजंग गर्ग



समकालीन हिंदी कविता अपने विविध रंगों और शैलियों में पूरे निखार एवं यौवन पर है, तथापि कविता का प्रत्येक प्रबुद्ध पाठक अथवा श्रोता यह महसूस करने लगा है कि कविता जन-जीवन से दूर जा पड़ी है। यह एक असंगति ही है कि समकालीन कविता आम आदमी के इतना नज़दीक होने के बावजूद जन-जीवन का अभिन्न अंग बनने में उतनी सफल नहीं हो पाई है, जितनी कि उससे अपेक्षा की जाती है। चलताऊ भाषा में जिसे लोकप्रिय कविता कहा जाता है, वह कवि सम्मेलनों के फूहड़पन से जुड़ी हुई है। उसमें हास्य है, लतीफें-चुुटकुले हैं और वाहियात किस्म गलेबाज़ी है। दूसरी ओर साहित्यिक कविता प्रयोगों और दुष्प्रयोगों के चक्कर में इस क़दर फंसी हुई है कि वह जन समान्य से संपर्क का दावा करने के बावजूद सामान्य-जन की रुचि का विषय नहीं बन पा रही है। ऐसी दुविधाग्रस्त स्थिति में वे कवि वाक़ई स्वागत योग्य हैं, जिन्होंने समय के रुख़ के विपरीत खड़े होकर कविता को न तो अपने व्यक्तित्व से विच्छिन्न किया, न जनता से, साथ ही साहित्यिक शिखरों को भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया। इस धारा के अग्रणी कवियों में श्री रामावतार त्यागी विशेष महत्व रखते हैं।

त्यागी का जीवन भयंकर चुनौतियों का सामना करने वाला रहा है। पारिवारिक चुनौती, सांसारिक चुनौती-सभी तरह की चुनौतियों को साहस से झेलते हुए उन्होंने स्वयं को जीवित रखा है। आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के एक कस्बेनुमा शहर से दिल्ली में अपने ढंग से आकर बस जाने वाला अलमस्त कवि फिर हमेशा के लिए दिल्ली का होकर रह गया। यहां आकर उसने अपनी अधूरी पढ़ाई को पूरा किया, जीवन के नए-नए रूपों को देखा, महानगर की जद्दोजहद में हिस्सा लिया, कई तरह की नौकरियां कीं और छोड़ीं, मगर जिसे अभी तक स्थापित हो जाने का तथाकथित गौरव नहीं मिला है।

त्यागी ही क्या, किसी भी अच्छे कवि की रचनाओं की राह से गुज़रने से पूर्व उसके जीवन की उन घटनाओं का, उसकी तुनुक़मिज़ाजियों और अल्हड़पन का परिचय प्राप्त कर लेना ज़रूरी होता है, जो कवि के व्यक्तित्व को शक्ति देती है, उसे किन्हीं विशिष्टताओं का स्वामी बनाती है। त्यागी का वैशिष्ट्य, जिसे ‘त्यागिगाना ठाट’ भी कहा जा सकता है, आज के जीवन की आपाधापी, कोमल संबंधों के अभाव, सफेदपोशी, कृत्रिम शालीनता और अभिजात्य की देन है, जिनके विरुद्ध खड़े होकर बोलना त्यागी का स्वभाव है और यही त्यागी स्वयं को ज़माने की स्वाभाविकता और दुनियादारी के दाव-पेंचों से अलग कर लेते हैं। त्यागी के संपूर्ण काव्य में एक सहज रागात्मकता से सराबोर अल्हड़ता, आदमीयत के प्रति सहानुभूति, बेबाक-स्वाभिमान और एक जैसे छंदों में लिखने के बावजूद बेपनाह ताज़गी मिलती है। यद्यपि त्यागी एक स्थान पर यह कबूल कर बैठे हैं ‘‘गीतों का दर्पण छोटा है जीवन का आकार बड़ा है’’ मगर उन्होंने जीवन के बड़े आकार को गीतों के छोटे दर्पण में समोने का ‘दुस्साहस’ किया है। वह कोशिश कुछ-कुछ वैसी ही है जैसे कि गागर में सागर भर देने का दुस्साहसपूर्ण काव्य-कौशल।

कविता में त्यागी गीत को चाहे कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न मानते हों, गद्य में उन्होंने उपन्यास से लेकर पत्र-विधा एवं व्यंग्य-लेखन को भी भरपूर अपनाया है। उनका उपन्यास ‘समाधान’ एवं ‘चरित्रहीन के पत्र’ प्रभृति रचनाएं हमारे इस कथन का पुष्ट प्रमाण है। बच्चों के लिए ‘मैं दिल्ली हूं’ जैसी रचना त्यागी जी ने लिखी। व्यंग्य-लेखन के क्षेत्र में उनके स्तंभ ‘दिल्ली जो एक शहर है’ तथा ‘राम-झरोखा’ को नवभारत टाइम्स के पाठक आसानी से नहीं भूल सकते। काव्य संकलनों के रूप में अब तक उनकी चार महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाश में आ चुकी हैं, यथा ‘नया ख़ून’, ‘आठवां स्वर’, ‘सपने महक उठे’ एवं ‘गुलाब और बबूल वन’। आज के लोकप्रिय हिंदी कवि पुस्तकमाला में स्थान पाने वाले कवियों में त्यागी सबसे युवा थे।

त्यागी के कवि-व्यक्तित्व के विकास में उनके सफल-असफल प्रेम के विभिन्न रूपों का भी हाथ है। प्रेम के इन्हीं रूपों ने इनके व्यक्तित्व को निखारने का काम किया है। यही कारण है कि हम उनके प्रारंभिक ही नहीं अद्यतन काव्य में भी प्रेम और विद्रोह के स्वरों की अनुगूंजे पाते हैं। एक ओर मध्यवर्गीय युवा मन की छटपटाहट, भावुकता, संवेदनशीलता और इरादे तथा दूसरी ओर आवश्यकता विषमता, वर्जना, वैयक्तिक कुंठा के आवरण में लिपटी व्यवस्था और उसके सुविधाजीवी ठेकेदार, ‘इन सबने मिलकर त्यागी को काव्यलेखन की ओर उन्मुख किया। कभी उनका प्रेमी-मन विद्रोही बनकर इस व्यवस्था को ललकारता है, तो कभी विद्रोही-मन ही प्रेमी का बाना पहन कर उससे सूरज का तिरस्कार करता हुआ बुझते हुए दीपक के सिरहाने जा बैठता है।’ उन्हें ज़माने की चोटें, घटियापन, व्यावहारिकता और कड़वी परिस्थितियां सपनों तक से निम्नांकित निवेदन करने को विवश करती हैं -

सपनों कुछ धीमे-धीमे पांव धरो

चीलों की तरह उड़ाने नहीं भरो

आकाश नहीं, ये मेरी आंखें हैं

वास्तव में, त्यागी के काव्य में ऐसा संसार मूर्तिमान हो उठता है, जिसके प्रति हर कोमल और संवेदनशील मन में मोह है, मगर यथार्थ के टूटने के कारण लोग जिससे दो-चार होने में कतराते हैं। छायावादियों के समान त्यागी ने आंखों को आकाश न मानकर आंख ही माना है, इसलिए वह सपनों को उनकी सीमाओं में बंधकर काम करने की ही इज़ाज़त दे पाते हैं।

त्यागी के कवि का यह भी अपना रंग ही है कि उन्होंने प्रयोगवादी काव्य को बहुत ऊंचे दर्ज़े का काव्य कभी नहीं माना है। यहां यह बहस नहीं कि उन्होंने ऐसा करके सही किया या ग़लत, मगर वह यह मानते रहे हैं कि प्रयोगवादी कविता में दुरूहता, बौद्धिकता एवं अतिशय प्रयोग की ललक उसे आम आदमी के मतलब की चीज नहीं रहने देते। स्वयं त्यागी ने छंदों तक के बहुत कम प्रयोग किए हैं, मगर हर बार हर गीत एक ऐसी चैंक लेकर उपस्थित होता है, मानो वैसा पहली बार ही हुआ हो। उनके गीत कहीं-कहीं संत कवियों की सूक्तियों से टक्कर लेते हुए लगते हैं। सुनते ही याद हो जाने वाली, अक्सर दिमाग़ को कुरेदने वाली सैकड़ों पंक्तियां उर्दू के उस्ताद कवियों की शायरी का स्मरण करा देती है। उदाहरणार्थ यहां कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं -

सुख तो कोई दुर्लंभ सी वस्तु नहीं

जब चाहो आदर के बदले ले लो

दुनिया को अपनी पावनता दे दो

फिर चाहे जिस सिंहासन से खेलो।

अर्थ-गांभीर्य और संवेदना के स्तर पर मन को छूने वाली अनेक पंक्तियों का रस ग्रहण करने के लिए त्यागी के संपूर्ण काव्य का अध्ययन किया जाना बेहद ज़रूरी है। इस कवि ने दर्द को इस सीमा तक बरदाश्त किया है कि यदि उसका जन्म न हुआ होता तो विपदाएं कुंआरी रह जातीं, प्रेम में स्वयं को इतना समर्पित कर दिया कि प्रिय के दरवाज़े तक भी वह प्रिय के चरणों से ही पहुंच सका, क्योंकि उसके पास अपने पैर थे ही कहां? त्यागी ने गीतों को गंगाजल-सा पवित्र माना है। यही वजह है कि दर्द, प्रिय और गीत उनकी थाती है। इसके बग़ैर त्यागी के व्यक्तित्व और कृतित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

एक बार बातचीत के दौरान त्यागी से प्रश्न किया कि साहित्य में नए-नए आंदोलनों की दिशा में युवा पीढ़ी आकर्षित हो रही है, आप क्या सोचते हैं इस संबंध में? इस पर त्यागी का उत्तर यह था-‘‘युवा पीढ़ी को अपनी आस्थाओं के बल पर ही आगे बढ़ना होगा। मेरे ख़याल से इस तरह हर तेज़़ रौ के साथ बढ़ जाना और रहबर को न पहचानना कोई स्वस्थ लक्षण नहीं होता। श्रेष्ठ साहित्य आस्था की देन होता है, अनास्था की नहीं।’’

आज जबकि मूल्यों के क्षेत्र में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई है, साहित्य को भी अपनी आस्थाओं की रक्षा करते हुए जनजीवन का अंग बनना है। त्यागी ने जैसा जिया है, वैसा ही लिखा है। यह किसी कलाकार के लिए कम बड़ी बात नहीं है। कविता में प्रचलित धारणाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाना और जीवन में हर तोपनुमा व्यवधान और ओछेपन से टकरा जाना त्यागी जैसे जीवंत कवि के ही बस की बात है। पत्रकारिता में भी उन्होंने अपने इसी धर्म को निभाया है। कोई पुरस्कार, कोई प्रलोभन त्यागी को सत्य और तथ्य लिखने से विमुख नहीं कर पाता है।

त्यागी के कृतित्व के संबंध में लिखते समय मुझे प्रसन्नता है कि मेरे पास अनावश्यक रूप से लिखने के लिए कुछ भी नहीं है। न तो उसकी भाषा में ही ऐसा कुछ अजीबो-ग़रीब है जिसे भाषाशास्त्र के संदर्भों की दरकार हो, न उसकी शैली ही ऐसी है कि काव्य शास्त्र अथवा अलंकार शास्त्र की बारीकियों में उलझना पड़े, न वह इतना आधुनिक है कि किसी विदेशी महाकवि के साथ उसकी तुलना ज़रूरी हो और न ही वह इतना पुरातन कि उसे किसी आदि कवि के समकक्ष रखा जा सके। वह इतना आसान और अपना है कि उस पर कोई तुलना और विशेषण फिट नहीं बैठ पाता। सच बात तो यह है कि इस कवि के काव्य को सुनने-पढ़ने का अपना अलग ही सुख है और स्वयं उन्हीं के शब्दों में मात्र इतना कहा जा सकता है -

विचारक हैं, न पंडित हैं, न हम धर्मात्मा कोई

बड़ा कमज़ोर जो होता वही बस आदमी हैं हम,

हमें इतिहास में कोई जगह मिलती नहीं माना

मगर इस ज़िंदगी के वास्ते कुछ लाज़िमी हैं हम।

(‘गीत बोलते हैं’ से)

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