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शोध विशेषांक के संभावित विषय/प्रोफेसर गोपाल शर्मा जी ने दी अतिथि संपादन की स्‍वीकृति

शोधादर्श दिसंबर, 2019 - फरवरी,2020 खुशखबरी यह है कि 'शोधादर्श' पत्रिका के गामी अंक 'शोध विशेषांक' के अतिथि संपादन का भार ग्रहण करने के लिए अरबा मींच विश्वविद्यालय, अरबा मींच, इथियोपिया के प्रोफेसर गोपाल शर्मा जी ने स्‍वीकृृ‍िृृति प्रदान कर दी है.  लेखकों से निवेदन है कि वह निम्‍न विषयों पर अपने लेख भेज सकते हैं- - शोध प्रारूप का अर्थ, परिभाषा, प्रकार एवं महत्व - शोध प्रारूप की परिभाषा  - शोध प्रारुप के उद्देश्य - शोध प्रारूप के घटक अंग  - सूचना के स्रोत  - अध्ययन की प्रकृति - शोध अध्ययन का उद्देश्य  – सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थिति  - सामाजिक-कालिक सन्दर्भ  - अध्ययन के आयाम और निदर्शन कार्यविधि  - तथ्य संकलन के लिए प्रयुक्त तकनीक   - शोध प्रारूप का महत्व - शोध प्रारूप बनाम तथ्य संकलन की पद्धति  - शोध प्रारुप के प्रकार - विवरणात्मक या वर्णनात्मक शोध प्रारूप  - व्याख्यात्मक शोध प्रारूप  - अन्वेषणात्मक शोध प्रारूप  - प्रयोगात्मक शोध प्रारुप  - अनुसंधान प्रक्रिया - अनुसंधान और जीवन  - अनुसंधान के सौपान - अनुसंधान के नैतिक पक्ष  - अनुसंधान समस्या का चयन - अनुसंधान प्रस्त

नाखून क्यों बढ़ते हैं?

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हजारी प्रसाद द्विवेदी   बच्‍चे कभी-कभी चक्‍कर में डाल देनेवाले प्रश्‍न कर बैठते हैं। अल्‍पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछ दिया कि आदमी के नाखून क्‍यों बढ़ते हैं, तो मैं कुछ सोच ही नहीं सका। हर तीसरे दिन नाखून बढ़ जाते हैं, बच्‍चे कुछ दिन तक अगर उन्‍हें बढ़ने दें, तो माँ-बाप अक्‍सर उन्‍हें डॉटा करते है। पर कोई नहीं जानता कि ये अभागे नाखून क्‍यों इस प्रकार बढ़ा करते है। काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्‍वीकार कर लेंगे, पर निर्लज्‍ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर। आखिर ये इतने बेहया क्‍यों हैं? कुछ लाख ही वर्षों की बात है, जब मनुष्‍य जंगली था, वनमानुष जैसा। उसे नाखून की जरूरत थी। उसकी जीवन रक्षा के लिए नाखून बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्‍त्र थे। दाँत भी थे, पर नाखून के बाद ही उनका स्‍थान था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था, प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ना पड़ता था। नाखून उसके लिए आवश्‍यक अंग था। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्‍तुओं का सहारा लेने लगा। पत्‍थर के ढेले और पेड़ की डालें काम में लाने लगा (रामचंद्रजी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अ

अनुपमा का प्रेम

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शरतचंद्र चट्टोपाध्याय   ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया है। संसार में उसके लिए सीखने योग्य वस्तु और कोई नही है, सबकुछ जान चुकी है, सब कुछ सीख चुकी है। सतीत्व की ज्योति को वह जिस प्रकार देख सकती है, प्रणय की महिमा को वह जिस प्रकार समझ सकती है,संसार में और भी कोई उस जैसा समझदार नहीं है, अनुपमा इस बात पर किसी तरह भी विश्वाश नही कर पाती। अनु ने सोचा- वह एक माधवीलता है, जिसमें मंजरियां आ रही हैं, इस अवस्था में किसी शाखा की सहायता लिये बिना उसकी मंजरियां किसी भी तरह प्रफ्फुलित होकर विकसित नही हो सकतीं। इसलिए ढूँढ-खोजकर एक नवीन व्यक्ति को सहयोगी की तरह उसने मनोनीत कर लिया एवं दो-चार दिन में ही उसे मन प्राण, जीवन, यौवन सब कुछ दे डाला। मन-ही-मन देने अथवा लेने का सबको समान अधिकार है, परन्तु ग्रहण करने से पूर्व सहयोगी को भी (बताने

अँधेरे में शब्द

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ओमप्रकाश वाल्मीकि   रात गहरी और काली है अकालग्रस्त त्रासदी जैसी जहां हजारों शब्द दफन हैं इतने गहरे कि उनकी सिसकियाँ भी सुनाई नहीं देतीं समय के चक्रवात से भयभीत होकर मृत शब्द को पुनर्जीवित करने की तमाम कोशिशें हो जाएँगी नाकाम जिसे नहीं पहचान पाएगी समय की आवाज भी ऊँची आवाज में मुनादी करने वाले भी अब चुप हो गए हैं 'गोद में बच्चा गाँव में ढिंढोरा' मुहावरा भी अब अर्थ खो चुका है पुरानी पड़ गई है ढोल की धमक भी पर्वत कन्दराओं की भीत पर उकेरे शब्द भी अब सिर्फ रेखाएँ भर हैं जिन्हें चिह्नित करना तुम्हारे लिए वैसा ही है जैसा 'काला अक्षर भैंस बराबर' भयभीत शब्द ने मरने से पहले किया था आर्तनाद जिसे न तुम सुन सके न तुम्हारा व्याकरण ही कविता में अब कोई ऐसा छन्द नहीं है जो बयान कर सके दहकते शब्द की तपिश बस, कुछ उच्छवास हैं जो शब्दों के अंधेरों से निकल कर आए हैं शून्यता पाटने के लिए ! बिटिया का बस्ता घर से निकल रहा था दफ्तर के लिए सीढ़ियां उतरते हुए लगा जैसे पीछे से किसी ने पुकारा आवाज परिचित आत्मीयता से भरी हुई जैसे बरसों बाद सुनी ऐसी आवाज कंधे पर स्पर्श का आभास मुड़ कर देखा

धुआँ

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गुलजार   बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में 'धुआँ' भर गया। चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई थी। सात बजे तक चौधराइन ने रो-धो कर होश सम्भाले और सबसे पहले मुल्ला खैरूद्दीन को बुलाया और नौकर को सख़्त ताकीद की कि कोई ज़िक्र न करे। नौकर जब मुल्ला को आँगन में छोड़ कर चला गया तो चौधराइन मुल्ला को ऊपर ख़्वाबगाह में ले गई, जहाँ चौधरी की लाश बिस्तर से उतार कर ज़मीन पर बिछा दी गई थी। दो सफेद चादरों के बीच लेटा एक ज़रदी माइल सफ़ेद चेहरा, सफेद भौंवें, दाढ़ी और लम्बे सफेद बाल। चौधरी का चेहरा बड़ा नूरानी लग रहा था। मुल्ला ने देखते ही 'एन्नल्लाहे व इना अलेहे राजेउन' पढ़ा, कुछ रसमी से जुमले कहे। अभी ठीक से बैठा भी ना था कि चौधराइन अलमारी से वसीयतनामा निकाल लाई, मुल्ला को दिखाया और पढ़ाया भी। चौधरी की आख़िरी खुवाहिश थी कि उन्हें दफ़न के बजाय चिता पर रख के जलाया जाए और उनकी राख को गाँव की नदी में बहा दिया जाए, जो उनकी ज़मीन सींचती है। मुल्ला पढ़ के चुप रहा। चौधरी ने दीन मज़हब के लिए बड़े काम किए थे गाँव में। हिन्दु-मुसलमान को एकसा दान देते थे। गाँव में कच्ची

ओ हरामजादे

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भीष्म साहनी   घुमक्कड़ी के दिनों में मुझे खुद मालूम न होता कि कब किस घाट जा लगूँगा। कभी भूमध्य सागर के तट पर भूली बिसरी किसी सभ्यता के खंडहर देख रहा होता, तो कभी यूरोप के किसी नगर की जनाकीर्ण सड़कों पर घूम रह होता। दुनिया बड़ी विचित्र पर साथ ही अबोध और अगम्य लगती, जान पड़ता जैसे मेरी ही तरह वह भी बिना किसी धुरे के निरुद्देश्य घूम रही है। ऐसे ही एक बार मैं यूरोप के एक दूरवर्ती इलाके में जा पहुँचा था। एक दिन दोपहर के वक्त होटल के कमरे में से निकल कर मैं खाड़ी के किनारे बैंच पर बैठा आती जाती नावों को देख रहा था, जब मेरे पास से गुजरते हुए अधेड़ उम्र की एक महिला ठिठक कर खड़ी हो गई। मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया, मैंने समझा उसे किसी दूसरे चेहरे का मुगालता हुआ होगा। पर वह और निकट आ गई। 'भारत से आए हो?' उसने धीरे से बड़ी शिष्ट मुस्कान के साथ पूछा। मैंने भी मुस्कुरा कर सिर हिला दिया। 'मैं देखते ही समझ गई थी कि तुम हिंदुस्तानी होगे।' और वह अपना बड़ा सा थैला बैंच पर रख कर मेरे पास बैठ गई। नाटे कद की बोझिल से शरीर की महिला बाजार से सौदा खरीद कर लौट रही थी। खाड़ी के नीले जल जैस

उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी शोषण का यथार्थ:  ग़ायब होता देश

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बृजेश चन्द्र कौशल (शोध-छात्र) (बीएड, एमफिल, जेआरएफ) डॅा. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास, विश्वविद्यालय लखनऊ उजड़ते हुए मुंडा आदिवासी समाज का सच रणेन्द्र कृत 'ग़ायब होता देश' आदिवासी समाज के उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी शोषण का महाकाव्यात्मक उपन्यास है। मुख्यधारा से कटा हुआ यह समाज अशिक्षित और पिछड़ा होने से आधुनिक जनसंचार माध्यमों तक अपनी पीड़ा कथा व्यथा पहुंचाने में असमर्थ है। इस कमी का भरपूर लाभ शोषक शक्तियां आदिवासी लोगों को अपराधी और नक्सली घोषित करके भरपूर लाभ ले रही हैं। इनके इलाकों में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपने उद्योग धंधे लगाकर चिमनियों से निकला हुआ विष उनके उपर जबरदस्ती छोड़ा जाता है और कोयला निकाल कर गहरे गड्ढे उनको तथा उनके खेलते हुए बच्चों को बारिश के दिनों में डूब कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। सभी गड्ढ़ों में मच्छर के एकत्रित होने के कारण आदिवासी समाज को जीवन यापन करने के लिए बड़ी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आदिवासी समाज को सबसे ज्यादा डर बाघ, बारिश और पुलिस से होता है पुलिस के लोग शासन के आदेश पर अपनी बंदूक के बल पर जब चाहे जितनी चाहे उनकी जमीन खाली करा ले