Thursday, June 4, 2020

पर्यावरण अपना


 ज्योत्सना भारती


 



यह.... धरती !
रहे....सजती !
सजे पर्यावरण अपना ।
यही   विनती !
कलम करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।
            ( 1 )
ये  जीवनदायनी  वायु,
ये जीवनदायी पानी है ।
ये माटी  उर्वरा  माँ  है,
ये ऊर्जा भी बचानी है ।
वो वापिस लो !
गया   है   जो !
हरा पर्यावरण अपना ।।
यही   विनती !
कलम करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।
             ( 2 )
कहीं पे  रात हैं  दहकी,
कहीं पे दिन हैं बर्फानी ।
कहीं भूकंप,कहीं सूखे,
कहीं वर्षा की मनमानी ।
न कर दूषित !
करो  पोषित !
बचा पर्यावरण अपना ।।
यही   विनती !
कलम करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।
              ( 3 )
है कटना वृक्ष जरूर एक,
तो पौधें दस वहाँ  लगनी ।
नहीं कंक्रीट  की  फसलें,
किसी भी खेतअब उगनी ।
न  शोषित   हो !
औ शोभित हो !
सदा  पर्यावरण अपना ।।
यही    विनती !
कलम  करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।
              ( 4 )
न भाषण हों,न वादे हों,
न  बातें हों,  कहानी हों ।
यही शुभ कर्म,मानें धर्म,
यदि  स्वांसें  बचानी  हों ।
ये  घोषित हो !
प्रदूषित    हो !
नहीं  पर्यावरण अपना ।।
यही   विनती !
कलम करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।



ए/3-आदर्शनगर
नजीबाबाद-246763
(बिजनौर) उत्तर प्रदेश


ऐ ज़िंदगी!


निधी


 


ऐ ज़िंदगी!
ज़रा ठहर
वक्त लिख
रहा है
सदियों की
दास्तां।
बन न जाए ये हकीक़त 
कहीं किस्से कहानी दुनिया के लिए
तूने तो दिखाया आईना 
हम ही नादान बने गर
तो तेरी क्या खता
ए ज़िन्दगी 
क्या अहम, क्या घमण्ड
क्या मैं, क्या तू
सब हैं एक दायरे में अब
समझ जाएं
तो बात बने।।।


खुशियाँ  दे  तो   पूरी दे


इन्द्रदेव भारती



खुशियाँ  दे  तो   पूरी दे ।
बिल्कुल  नहीं अधूरी दे ।


कुनबा  पाल सकूँ  दाता,
बस  इतनी  मजदूरी  दे ।


बेशक आधी  प्यास बुझे,
लेकिन   रोटी   पूरी   दे ।


बिटिया  बढ़ती  जावे  है,
इसको  मांग  सिंदूरी  दे ।


पैर  दिये   हैं  जब   लंबे,
तो  चादर  भी   पूरी  दे ।


आँगन   में   दीवार  उठे,
ऐसी   मत  मजबूरी  दे ।


'देव'  कपूतों  से  अच्छा,
हमको  पेड़  खजूरी  दे । 



नजीबाबाद(बिजनौर)उ.प्र


हारे थके मुसाफिर


रामावतार त्यागी


 


हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से
मैंने अक्सर यह देखा है मेरी थकन उतर जाती है ।

कोई ठोकर लगी अचानक जब-जब चला सावधानी से
पर बेहोशी में मंजिल तक जा पहुँचा हूँ आसानी से
रोने वाले के अधरों पर अपनी मुरली धर देने से
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है ॥

प्यासे अधरों के बिन परसे, पुण्य नहीं मिलता पानी को
याचक का आशीष लिये बिन स्वर्ग नहीं मिलता दानी को
खाली पात्र किसी का अपनी प्यास बुझा कर भर देने से
मैंने अक्सर यह देखा है मेरी गागर भर जाती है ॥

लालच दिया मुक्ति का जिसने वह ईश्वर पूजना नहीं है
बन कर वेदमंत्र-सा मुझको मंदिर में गूँजना नहीं है
संकटग्रस्त किसी नाविक को निज पतवार थमा देने से
मैंने अक्सर यह देखा है मेरी नौका तर जाती है ॥


ज़िंदगी एक रस किस क़दर हो गई


रामावतार त्यागी


ज़िंदगी एक रस किस क़दर हो गई
एक बस्ती थी वो भी शहर हो गई

घर की दीवार पोती गई इस तरह
लोग समझें कि लो अब सहर हो गई

हाय इतने अभी बच गए आदमी
गिनते-गिनते जिन्हें दोपहर हो गई

कोई खुद्दार दीपक जले किसलिए
जब सियासत अंधेरों का घर हो गई

कल के आज के मुझ में यह फ़र्क है
जो नदी थी कभी वो लहर हो गई

एक ग़म था जो अब देवता बन गया
एक ख़ुशी है कि वह जानवर हो गई

जब मशालें लगातार बढ़ती गईं
रौशनी हारकर मुख्तसर हो गई


आधी रख,या सारी रख


इन्द्रदेव भारती


 



आधी रख,या सारी रख ।
लेकिन  रिश्तेदारी  रख ।।


छोड़ के  तोड़  नहीं प्यारे,
मोड़ के अपनी यारी रख ।


शब्दों  में  हो  शहद  घुला,
नहीं  ज़बाँ पर आरी रख ।


भले  तेरी   दस्तार   गयी,
तू  सबकी  सरदारी  रख ।


"देव''  नहीं   दुनिया  तेरी,  
पर  तू   दुनियादारी  रख ।



नजीबाबाद(बिजनौर)उ.प्र


Wednesday, June 3, 2020

डिजिटल संप्रेषण और साहित्य पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार संपन्न


हैदराबाद, 1 जून 2020 


हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच, हैदराबाद के तत्वावधान में 1 जून, 2020 को मध्याह्न 3 बजे से 5 बजे तक "तकनीकी व डिजिटल संप्रेषण की दुनिया में हिंदी साहित्य के बढ़ते क़दम" विषय पर एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबिनार सफलतापूर्वक आयोजित किया गया।


मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध कवि-समीक्षक प्रो. ऋषभदेव शर्मा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा उपस्थित थे। 


हैदराबाद केंद्र से संचालित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दोनों विद्वानों ने महत्वपूर्ण विचार रखे। प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अंतरराष्ट्रीय  स्तर पर हिंदी साहित्य के क्षेत्र में हैदराबाद नगर को एक विशेष स्थान दिलाया है। उन्होंने तकनीकी संप्रेषण के माध्यम से हिंदी साहित्य की बढ़ोतरी के बारे में अपने विचर अभिव्यक्त किए। प्रो. ऋषभ ने कहा कि वर्तमान समाज सही अर्थ में 'सूचना समाज' है। अब साहित्य पुस्तकों की दहलीज लाँघ कर डिजिटल मल्टीमीडिया के सहारे अधिक लोकतांत्रिक बनने की ओर अग्रसर है। उन्होंने मुक्त वितरण के लिए तकनीकी के उपयोग की जानकारी देने के साथ ही विभिन्न आधुनिक संचार माध्यमों में स्टोरी-टेलिंग की तुलना करते हुए 'डिगिंग' और 'स्प्रेडिंग' की अवधारणाओं का खुलासा किया।


वरिष्ठ साहित्यकार तथा विदेशों में हिंदी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में अपना परचम लहराने वाले श्री तेजेंद्र शर्मा जी ने अपने विचारों में डिजिटल रूप से हिंदी के विकास के बारे में अपनी राय रखी। डिजिटल एवं ऑनलाइन संचार ऐसी क्रांति है, जो नि:संदेह देश को प्रगति के पथ पर त्वरित गति से ले जा सकती है। इसी का लाभ आज हिंदी साहित्य उठा रहा है। आज इतनी सारी वेबसाइटें, ब्लाग हैं कि वे हिंदी की कथा, कहानी, कविताएँ, निबंध, जीवनी, आत्मकथा, रिपोर्ताज, संस्मरण, एकांकी, नाटक तथा अन्य विधाओं को सुंदर मंच प्रदान कर रहे हैं। डिजिटल एवं ऑनलाइन संचार में भाषा का संयम, शब्दों का चयन उपयुक्त होना चाहिए। भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ दूसरों की भावनाओं का सम्मान भी अवश्य होना चाहिए। ऐसा करने पर ही हिंदी साहित्य का विकास तकनीकी तथा डिजिटल रूप में हो सकता है। आज रचनाकार, हिंदी कुंज, कविताकोश, गद्यकोश, प्रतिलिपि जैसे कई साइट इन बातों का ध्यान रखते हिंदी साहित्य की सेवा में निरंतर लगे हुए हैं। पढ़ने को तो कई किताबें हैं, लेकिन गुलजार के शब्दों में कहना हो तो सारी किताबें अलमारी में पड़े-पड़े अपनी बेबसी पर रो रही हैं। हम यह सोच रहे हैं कि किताबें अलमारी में बंद हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हम कहीं न कहीं अपनी मजबूरियों में बंद हैं।  


मंच के महासचिव डॉ. डी. विद्याधर ने अपने स्वागत भाषण में हिंदी के विकास को लेकर अपनी कटिबद्धता व्यक्त की। साथ ही कोरोना महामारी के काल में भी हिंदी का अलख जगाने की पुरजोर अभिव्यक्ति की। अध्यक्ष डॉ. मो. रियाजुल अंसारी ने मंच के हिंदी के प्रचार-प्रसार कार्यक्रमों की जानकारी दी। इसके अतिरिक्त वेबिनार में मंच की ओर से उपाध्यक्ष डॉ. राजेश अग्रवाल, डॉ. राकेश शर्मा, डॉ. सुषमा देवी, डॉ. डी. जयप्रदा तथा डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उपस्थित थे। गौरतलब है कि इस वेबिनार में प्रत्यक्ष रूप से 500 प्रतिभागियों ने तो यूट्यूब के सीधे प्रसारण पर 2500 प्रतिभागियों ने ज्ञानवर्धन किया। सभी तीन हजार प्रतिभागियों को ई-प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।  


प्रस्तुति-


डॉ. विद्याधर,महासचिव, हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच,हैदराबाद।  


वैशाली

  अर्चना राज़ तुम अर्चना ही हो न ? ये सवाल कोई मुझसे पूछ रहा था जब मै अपने ही शहर में कपडो की एक दूकान में कपडे ले रही थी , मै चौंक उठी थी   ...