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Showing posts from December 10, 2019

तफ़ाउत

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अख़्तर-उल-ईमान   हम कितना रोए थे जब इक दिन सोचा था हम मर जाएँगे और हम से हर नेमत की लज़्ज़त का एहसास जुदा हो जाएगा छोटी छोटी चीज़ें जैसे शहद की मक्खी की भिन भिन चिड़ियों की चूँ चूँ कव्वों का एक इक तिनका चुनना नीम की सब से ऊँची शाख़ पे जा कर रख देना और घोंसला बुनना सड़कें कूटने वाले इंजन की छुक छुक बच्चों का धूल उड़ाना आधे नंगे मज़दूरों को प्याज़ से रोटी खाते देखे जाना ये सब ला-यानी बेकार मशाग़िल बैठे बैठे एक दम छिन जाएँगे हम कितना रोए थे जब पहली बार ये ख़तरा अंदर जागा था इस गर्दिश करने वाली धरती से रिश्ता टूटेगा हम जामिद हो जाएँगे लेकिन कब से लब साकित हैं दिल की हंगामा-आराई की बरसों से आवाज़ नहीं आई और इस मर्ग-ए-मुसलसल पर इन कम-माया आँखों से इक क़तरा आँसू भी तो नहीं टपका

आख़िरी मुलाक़ात

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अख़्तर-उल-ईमान आओ कि जश्ने-मर्गे-मुहब्बत मनाएँ हम आती नहीं कहीं से दिले-जिंदा की सदा सूने पड़े हैं कूच'ओ-बाज़ार इश्क के है शमए-अंजुमन का नया हुस्ने-जां-गुदाज़ शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले ताज़ा न रख सकेगी रिवायाते-दश्तो-दार वो फ़ितनासर गये जिन्हें कांटे अज़ीज़ थे अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलाएं हम आओ कि जश्ने-मर्गे-मुहब्बत मनाएँ हम सोचा न था कि आएगा ये दिन भी फिर कभी इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें क्या जाने अब न उल्फ़ते-देरीना याद आए इस हुस्ने-इख्तियार पे आँखें झुका तो लें बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़ संभले हुए तो हैं पे ज़रा डगमगा तो लें आओ कि जश्ने-मर्गे-मुहब्बत मनाएँ हम

नगरों में मरती मानवीय संवेदना

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डाॅ. बेगराज यादव विभागाध्यक्ष (बीएड) मौलाना मौहम्मद अली जौहर हायर  एजुकेशन इंस्टीट्यूट, किरतपुर, बिजनौर   मानवीय संवेेदना से अभिप्राय उस प्रत्येक चिंता है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है, और निसके फलस्वरूप मनुष्य अपने व्यक्तिगत वृत को लाँघकर अपने पास-पड़ोस, समुदाय समाज, क्षेत्र तथा राष्ट्र का हित-चिंतन करता है और जो इस प्रक्रिया के उच्चतम स्तर पर पूर्ण विश्व में होने वाली घटनाओं में भी आन्दोलित होती है। संवेदना हृदय की अतल गहराई से आवाज देती प्रतीत होती है। संवेदना को किसी नियम अथवा उपनियम में बांधकर नहीं देखा जा सकता है। संवेदना की न तो कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। संवेदना मानवीय व्यवहार की सर्वोत्कृष्ट अनुभूति है। किसी को कष्ट हो और दूसरा आनंद ले, ऐसा संवेदनहीन व्यक्ति ही कर सकता है। खुद खाए और उसके सामने वाला व्यक्ति भूखा बैठा टुकर टुकर देखता रहे, यह कोई संवेदनशील व्यक्ति नहीं सह सकता। स्वयं भूखा रहकर दूसरों को खिलाने की हमारी परंपरा संवेदनशीलता की पराकाष्ठा है। संवेदना दिखावे की वस्तु नहीं बल्कि अंतर्मन में उपजी एक टीस है, जो आह के साथ बाहर आती है। संवेदना मस्तिष्क नहीं बल्

तन्हाई में

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अख़्तर-उल-ईमान मेरे शानों पे तिरा सर था निगाहें नमनाक अब तो इक याद सी बाक़ी है सो वो भी क्या है? घिर गया ज़ेहन ग़म-ए-ज़ीस्त के अंदाज़ों में सर हथेली पे धरे सोच रहा हूँ बैठा काश इस वक़्त कोई पीर-ए-ख़मीदा आ कर किसी आज़ुर्दा तबीअत का फ़साना कहता! इक धुँदलका सा है दम तोड़ चुका है सूरज दिन के दामन पे हैं धब्बे से रिया-कारी के और मग़रिब की फ़ना-गाह में फैला हुआ ख़ूँ दबता जाता है सियाही की तहों के नीचे दूर तालाब के नज़दीक वो सूखी सी बबूल चंद टूटे हुए वीरान मकानों से परे हाथ फैलाए बरहना सी खड़ी है ख़ामोश जैसे ग़ुर्बत में मुसाफ़िर को सहारा न मिले उस के पीछे से झिजकता हुआ इक गोल सा चाँद उभरा बे-नूर शुआओं के सफ़ीने को लिए मैं अभी सोच रहा हूँ कि अगर तू मिल जाए ज़िंदगी गो है गिराँ-बार प इतनी न रहे चंद आँसू ग़म-ए-गीती के लिए, चंद नफ़स एक घाव है जिसे यूँ ही सिए जाते हैं मैं अगर जी भी रहा हूँ तो तअज्जुब क्या है मुझ से लाखों हैं जो ब-सूद जिए जाते हैं कोई मरकज़ ही नहीं मेरे तख़य्युल के लिए इस से क्या फ़ाएदा जीते रहे और जी न सके अब इरादा है कि पत्थर के सनम पूजूँगा ताकि घबराऊँ तो टकरा भी सकूँ मर भी सकूँ

सिलसिले

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अख़्तर-उल-ईमान   शहर-दर-शहर, क़र्या-दर-क़र्या साल-हा-साल से भटकता हूँ बार-हा यूँ हुआ कि ये दुनिया मुझ को ऐसी दिखाई दी जैसे सुब्ह की ज़ौ से फूल खिलता हो बार-हा यूँ हुआ कि रौशन चाँद यूँ लगा जैसे एक अंधा कुआँ या कोई गहरा ज़ख़्म रिसता हुआ मैं बहर-ए-कैफ़ फिर भी ज़िंदा हूँ और कल सोचता रहा पहरों मुझ को ऐसी कभी लगन तो न थी हर जगह तेरी याद क्यूँ आई

शीशे का आदमी

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अख़्तर-उल-ईमान   उठाओ हाथ कि दस्त-ए-दुआ बुलंद करें हमारी उम्र का इक और दिन तमाम हुआ ख़ुदा का शुक्र बजा लाएँ आज के दिन भी न कोई वाक़िआ गुज़रा न ऐसा काम हुआ ज़बाँ से कलमा-ए-हक़-रास्त कुछ कहा जाता ज़मीर जागता और अपना इम्तिहाँ होता ख़ुदा का शुक्र बजा लाएँ आज का दिन भी उसी तरह से कटा मुँह-अँधेरे उठ बैठे प्याली चाय की पी ख़बरें देखीं नाश्ता पर सुबूत बैठे बसीरत का अपनी देते रहे ब-ख़ैर ओ ख़ूबी पलट आए जैसे शाम हुई और अगले रोज़ का मौहूम ख़ौफ़ दिल में लिए डरे डरे से ज़रा बाल पड़ न जाए कहीं लिए दिए यूँही बिस्तर में जा के लेट गए

राह-ए-फ़रार

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अख़्तर-उल-ईमान   इधर से न जाओ इधर राह में एक बूढ़ा खड़ा है जो पेशानियों और चेहरों पे ऐसी भभूत एक मल देगा सब झुर्रियाँ फट पड़ेंगी सियह, मार जैसे, चमकते हुए काले बालों पे ऐसी सपीदी उमँड आएगी कुछ तदारुक नहीं जिस का कोई कोई रास्ता और ढूँडो कि इस पीर-ए-फ़र्तूत की तेज़ नज़रों से बच कर निकल जाएँ और इस की ज़द में न आएँ कभी हम इधर से न जाओ इधर मैं ने इक शख़्स को जाते देखा है अक्सर जवानों को जो राह में रोक लेता है उन से वहीं बातें करता है मिल कर जो सुक़रात करता था यूनान के मनचलों से यक़ीनन उसे एक दिन ज़हर पीना पड़ेगा इधर से न जाओ इधर रौशनी है कहीं आओ छुप जाएँ जाकर तमाम आफ़तों से मुझे एक तह-ख़ाना मालूम है ख़ुशनुमा सा जो शाहान-ए-देहली ने बनवाया था इस ग़रज़ से कि अबदालियों, नादिरी फ़ौज की दस्तरस से बचें और बैठे रहें सारे हंगामों की ज़द से हट कर ये दर-अस्ल मीरास है आप की मेरी सब की सलातीन-ए-देहली से पहले किसी और ने इस की बुनियाद रक्खी थी लेकिन वो अब क़ब्ल-ए-तारीख़ की बात है कौन जाने इधर से न जाओ इधर शाह-नादिर नहीं आज कोई भी लेकिन वही क़त्ल-ए-आम आज भी हो रहा है ये मीरास है आप की मेरी सब की ये सौग़

हम मतवाले

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डा. वीरेंद्र पुष्पक   हम मतवाले टोली लेकर, निकले स्वच्छ बनाने को। सुंदर वतन रहे अपना, सन्देश यही पहुँचाने को। बच्चे दिल के होते सच्चे, सन्देश लिए मन से अच्छे, माना होते हैं ये कच्चे, निर्मल इन्हें बनाने को। तन स्वच्छ रहे मन स्वच्छ रहे, भारत को स्वच्छ बनाने को। हम मतवाले टोली लेकर निकले स्वच्छ बनाने को। सुंदर वतन रहे अपना सन्देश यही पहुंचाने को।। देश को जागरूक करने खातिर, स्वच्छ भारत अभियान चला है, शौच खुले में कहां भला है, बीमारी का खुला निमन्त्रण, टाले भला ये कहीं टला है।  बस यही बात समझाने को। हम मतवाले टोली लेकर निकले स्वच्छ बनाने को। सुंदर वतन रहे अपना सन्देश यही पहुंचाने को।। गांव गांव खुशहाली होगी,  खेतों में हरियाली होगी,  खिल उठेगा चमन हमारा, प्रफुल्लित हर डाली होगी,  घर, पड़ौस, गलियां महकेंगी, निकले चमन बनाने को।। हम मतवाले टोली लेकर निकले स्वच्छ बनाने को। सुंदर वतन रहे अपना सन्देश यही पहुंचाने को।।

तब्दीली

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अख़्तर-उल-ईमान   इस भरे शहर में कोई ऐसा नहीं जो मुझे राह चलते को पहचान ले और आवाज़ दे ओ बे ओ सर-फिरे दोनों इक दूसरे से लिपट कर वहीं गिर्द-ओ-पेश और माहौल को भूल कर गालियाँ दें हँसें हाथा-पाई करें पास के पेड़ की छाँव में बैठ कर घंटों इक दूसरे की सुनें और कहें और इस नेक रूहों के बाज़ार में मेरी ये क़ीमती बे-बहा ज़िंदगी एक दिन के लिए अपना रुख़ मोड़ ले

एक लड़का

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अख़्तर-उल-ईमान   दयार-ए-शर्क़ की आबादियों के ऊँचे टीलों पर कभी आमों के बाग़ों में कभी खेतों की मेंडों पर कभी झीलों के पानी में कभी बस्ती की गलियों में कभी कुछ नीम उर्यां कमसिनों की रंगरलियों में सहर-दम झुटपुटे के वक़्त रातों के अँधेरे में कभी मेलों में नाटक-टोलियों में उन के डेरे में तआक़ुब में कभी गुम तितलियों के सूनी राहों में कभी नन्हे परिंदों की नहुफ़्ता ख़्वाब-गाहों में बरहना पाँव जलती रेत यख़-बस्ता हवाओं में गुरेज़ाँ बस्तियों से मदरसों से ख़ानक़ाहों में कभी हम-सिन हसीनों में बहुत ख़ुश-काम ओ दिल-रफ़्ता कभी पेचाँ बगूला साँ कभी ज्यूँ चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता हवा में तैरता ख़्वाबों में बादल की तरह उड़ता परिंदों की तरह शाख़ों में छुप कर झूलता मुड़ता मुझे इक लड़का आवारा-मनुश आज़ाद सैलानी मुझे इक लड़का जैसे तुंद चश्मों का रवाँ पानी नज़र आता है यूँ लगता है जैसे ये बला-ए-जाँ मिरा हम-ज़ाद है हर गाम पर हर मोड़ पर जौलाँ इसे हम-राह पाता हूँ ये साए की तरह मेरा तआक़ुब कर रहा है जैसे मैं मफ़रूर मुल्ज़िम हूँ ये मुझ से पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही हो ख़ुदा-ए-इज़्ज़-ओ-जल की