Tuesday, December 10, 2019

तफ़ाउत


अख़्तर-उल-ईमान


 


हम कितना रोए थे जब इक दिन सोचा था हम मर जाएँगे
और हम से हर नेमत की लज़्ज़त का एहसास जुदा हो जाएगा
छोटी छोटी चीज़ें जैसे शहद की मक्खी की भिन भिन
चिड़ियों की चूँ चूँ कव्वों का एक इक तिनका चुनना
नीम की सब से ऊँची शाख़ पे जा कर रख देना और घोंसला बुनना
सड़कें कूटने वाले इंजन की छुक छुक बच्चों का धूल उड़ाना
आधे नंगे मज़दूरों को प्याज़ से रोटी खाते देखे जाना
ये सब ला-यानी बेकार मशाग़िल बैठे बैठे एक दम छिन जाएँगे
हम कितना रोए थे जब पहली बार ये ख़तरा अंदर जागा था
इस गर्दिश करने वाली धरती से रिश्ता टूटेगा हम जामिद हो जाएँगे
लेकिन कब से लब साकित हैं दिल की हंगामा-आराई की
बरसों से आवाज़ नहीं आई और इस मर्ग-ए-मुसलसल पर
इन कम-माया आँखों से इक क़तरा आँसू भी तो नहीं टपका


आख़िरी मुलाक़ात


अख़्तर-उल-ईमान



आओ कि जश्ने-मर्गे-मुहब्बत मनाएँ हम


आती नहीं कहीं से दिले-जिंदा की सदा
सूने पड़े हैं कूच'ओ-बाज़ार इश्क के
है शमए-अंजुमन का नया हुस्ने-जां-गुदाज़
शायद नहीं रहे वो पतंगों के वलवले
ताज़ा न रख सकेगी रिवायाते-दश्तो-दार
वो फ़ितनासर गये जिन्हें कांटे अज़ीज़ थे
अब कुछ नहीं तो नींद से आँखें जलाएं हम
आओ कि जश्ने-मर्गे-मुहब्बत मनाएँ हम


सोचा न था कि आएगा ये दिन भी फिर कभी
इक बार हम मिले हैं ज़रा मुस्कुरा तो लें
क्या जाने अब न उल्फ़ते-देरीना याद आए
इस हुस्ने-इख्तियार पे आँखें झुका तो लें
बरसा लबों से फूल तेरी उम्र हो दराज़
संभले हुए तो हैं पे ज़रा डगमगा तो लें
आओ कि जश्ने-मर्गे-मुहब्बत मनाएँ हम


नगरों में मरती मानवीय संवेदना


डाॅ. बेगराज यादव
विभागाध्यक्ष (बीएड)
मौलाना मौहम्मद अली जौहर हायर 
एजुकेशन इंस्टीट्यूट, किरतपुर, बिजनौर


 


मानवीय संवेेदना से अभिप्राय उस प्रत्येक चिंता है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है, और निसके फलस्वरूप मनुष्य अपने व्यक्तिगत वृत को लाँघकर अपने पास-पड़ोस, समुदाय समाज, क्षेत्र तथा राष्ट्र का हित-चिंतन करता है और जो इस प्रक्रिया के उच्चतम स्तर पर पूर्ण विश्व में होने वाली घटनाओं में भी आन्दोलित होती है। संवेदना हृदय की अतल गहराई से आवाज देती प्रतीत होती है। संवेदना को किसी नियम अथवा उपनियम में बांधकर नहीं देखा जा सकता है। संवेदना की न तो कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। संवेदना मानवीय व्यवहार की सर्वोत्कृष्ट अनुभूति है। किसी को कष्ट हो और दूसरा आनंद ले, ऐसा संवेदनहीन व्यक्ति ही कर सकता है। खुद खाए और उसके सामने वाला व्यक्ति भूखा बैठा टुकर टुकर देखता रहे, यह कोई संवेदनशील व्यक्ति नहीं सह सकता। स्वयं भूखा रहकर दूसरों को खिलाने की हमारी परंपरा संवेदनशीलता की पराकाष्ठा है। संवेदना दिखावे की वस्तु नहीं बल्कि अंतर्मन में उपजी एक टीस है, जो आह के साथ बाहर आती है। संवेदना मस्तिष्क नहीं बल्कि दिल में उत्पन्न होती है। यही संवेदना मनुष्य को महान और अमर बना देती है। सरलाॅक होम्ज ने कहा है - संसार के महान व्यक्ति अक्सर बड़े विद्वान नहीं रहते, और न ही बड़े विद्वान महान व्यक्ति हुए हैं।



विद्वान होना अलग बात है और संवेदनशील होना अलग बात है। विद्वान के पास पुस्तकों और शास्त्रोक्त ज्ञान का भंडार बहुत हो सकता है परंतु उसके पास संवेदना हो यह आवश्यक नहीं है। उसी तरह धनाढ्य व्यक्ति के पास धन की अधिकता हो सकती है परंतु उसके पास संवेदना हो यह कतई आवश्यक नहीं है। यदि ऐसा होता तो उड़ीसा में एक व्यक्ति जो न तो धनाढ्य था न ही विद्वान था और न ही महान था परंतु संवेदनशील था। वह अपनी पत्नी के शव को अस्पताल में ही कंधे पर रखता है और अपने गाँव की ओर चल देता है। उस समय न तो कोई धनाढ्य उसकी मदद करता है और न ही कोई विद्वान। जिससे स्पष्ट होता है कि वहाँ मौजूद सभी व्यक्तियों की संवेदना मर चुकी थी। संवेदना क्या होती है? इसका एक उदाहरण प्रस्तुत है, अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने एक बार मार्ग से गुजरते हुए एक बीमार सूअर को कीचड़ में फँसे हुए देखा तो वह परेशान हो उठे, उन्होंने अपने मन की आवाज को सुना और उस सूअर को बचाने के लिए कीचड़ में कूद पड़े, सूअर को बाहर निकालकर उनहोंने चैन की सांस ली। वहाँ मौजूद लोगों ने हैरानी से पूछा तो वे बोले - मैंने सूअर को बचा कर अपने हृदय की वेदना का बोझ दूर किया है। 



परिस्थिति के बदलने के साथ ही व्यक्ति की संवेदनशीलता के पहलू भी बदलते है, एक समय में जो बात या घटना, मन पर गहरी छाप छोड़ जाती है, जरूरी नहीं दूसरी बार भी अपनी ओर ध्यान देने को बाध्य कर सकें।



अटल बिहारी वाजपेयी के अनुसार- सुनने वाले और सुनाने वाले के बीच तुम और मैं की दीवार टूट जाती है, जहाँ एकाकार हो जाता है। वहीं संवेदना की अवधारणा होती है।



वर्तमान की बात करें तो संवेदना या तो अपने लिए रह गई है अथवा अपनों के लिए। आज दुनिया में आतंकवाद लगातार बढ़ रहा है। संवेदना के नाम पर धर्म का बहाना लिया जाता है और लगातार खून बहाया जाता है। जबकि कोई धर्म नहीं कहता कि एकदूसरे का खून बहाओ। आइएसआइएस आतंकवादी इराक में हज़ारों लड़कियों, औरतों को जनवरों की तरह मंडी लगाकर बेचते हैं, रातों रात हज़ारों लोगों को गाजर मूली की तरह काट दिया जाता है। हमारे ही देश में जन्नत का ख्वाब देखने वाले स्वयं भी मरते हैं और दूसरों को भी मार डालते हैं। कहने का तात्पर्य है कि धर्म के नाम पर भी मानवीय संवेदनाएं मारी जा रही हैं। ऐसे में एक का धर्म दूसरे के लिए अधर्म बनता जा रहा है। यही काम राजनीति भी कर रही है। सीमा पर तैनात जवान हमले में शहीद होते हैं तो तब राजनीति के धुरंधर यहाँ तक कह देते हैं कि जवान तो मरने के लिए ही होते हैं। शहीद जवान से राजनीति को कोई हमदर्दी नहीं है। किसी ग़रीब के घर अपना सामान ले जाकर रोटी खाने का नाटक किया जाता है मगर यही राजनीति किसी शहीद के घर नहीं जाती है। 



आज प्रतिस्पर्धा के दौर में मानवीय संवेदना पूरी तरह से मृत हो गई है। आमजन के सामने हत्या लूट-पाट हो जाती है और वो सिर्फ तमाशबीन बन देखता रह जाता है, किसी के साथ कोई सड़क दुर्घटना हो जाए तो तमाशबीनों की कमी नहीं होती। अक्सर किसी व्यक्ति के सामने कुछ ग़लत हो रहा होता है तो उस समय वह संवेदनशील होने के बजाय यह सोचकर चल देता है कि समय ख़राब करने और कानून के पचड़े में फंसने से क्या लाभ? वह नहीं जानता कि उसकी यह लापरवाही किसी की जान तक ले लेती है। और फिर एक समय वह भी आता है जब वही व्यक्ति दिखावे के लिए सड़क पर मोमबत्ती लेकर पैदल मार्च कर संवेदना प्रकट करता है और अगले दिन जल्दी उठकर अख़बार में अपना नाम या फोटो देखता है। यदि उसका नाम या फोटो छपा होता है तो पूरे दिन उसका जिक्र करता है और नहीं छप पाता तो पूरे दिन अख़बार वालों को गरियाता फिरता है। क्या है ये सब? हमें कुछ तो विचार करना ही पड़ेगा। अगर हम मुंबई, संसद, पठानकोट, उड़ी पर चुप हो जाते हैं तो पुलवामा का नतीजा सामने आता है। यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जिन लोगों की संवेदनाएं मर चुकी हैं उन लोगों का भी जल्दी ही मर जाना अच्छा है। जो लोग दूसरों को मारकर जश्न मनाते हैं वह किसी भी रूप में मानवीय समुदाय में रहने योग्य नहीं होते। ऐसे लोग धर्म और समाज दोनों के नाम पर कलंक होते हैं। 



संवेदनशीलता के मर जाने का एक बड़ा कारण बढ़ती जनसंख्या और उसमें रोटी के लिए संघर्ष भी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार बीस-पच्चीस सालों में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या साठ से अधिक हो जाएगी। चैंकाने वाली बात यह है कि शहरों में ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञ आशंकित हैं कि कहीं भारत की बड़ी आबादी शहरी मलिन बस्तियों में न तब्दील हो जाए। 



देश में सौ नए शहर बसाने की तैयारी हो रही है। नए शहर का मतलब होगा कुछ हज़ार-लाख एकड़ उपजाऊ खेतों का कंक्रीट में बदल जाना, पानी के परंपरागत स्रोतों की बलि, हरियाली और नैसर्गिकता का विनाश। और नए संकट होंगे बिजली और पानी की किल्लत, सड़कों पर जाम और चारों तरफ कचरा। रीयल इस्टेट, सीमेंट लोहे का कारोबार बढ़ने से भले ही कुछ लोगों को रोजगार मिलेगा। इसे विकास भी कहा जाएगा। विकास में व्यक्ति, समुदाय और प्रकृति वगैरह सबका कल्याण शामिल होता है। लेकिन यहाँ विकास के रूप में धीमा ज़हर हमारी सांसों में घुलता जाएगा और फिर परिणाम सभी जानते हैं, कहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में यह भी विचारना उचित ही है कि क्या गाँव में मूलभूत सुविधाएं, परिवहन और संचार, कुटीर उद्योग को सशक्त कर देश के जीडीपी में इजाफा नहीं किया जा सकता? भारत में संस्कृति, मानवता और बस्तियों का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीवन फलता-फूलता रहा है। लेकिन आज नदियों की धार अवरूद्ध हो गई है। आबादी और औद्योगिक इकाइयों का गंदा पानी नदियों को समाप्त कर रहा है। 
नगरों में मरती माननवीय संवेदना के कारण



1- तीव्र गति से बढ़ती नगरीय जनसंख्या
2- तीव्र गति से बढ़ती शिक्षित बेरोजगारी
3- नैतिक मूल्क प्रेरक शिक्षा का अभाव
4- प्रतिस्पर्धा का दौर
5- संयुक्त परिवार का विघटन, एकाकी परिवार में वृद्धि
6- बच्चों के सामुहिक खेलों का अभाव
7- मोबाइल का अत्यधिक बढ़ता उपयोग।
8- दूरदर्शन पर भ्रमित करते धारावाहिक।
9- मिडिया द्वारा छोटे-छोटे घटनाओं की अधिक बढ़ाकर बताना।
10- घट रहा आपसी भाईचारा।
11- स्वयं की अधिक से अधिक घर की चार दीवारी में समेटना।
12- व्यक्तिगत वाहनों की संख्या में वृद्धि
13- लूटपाट की वारदातों में वृद्धि
14- भावुकता का नजायज लाभ उठाना
15- दूषित पर्यावरण
16- बच्चे का घर में अकेले रहना
17- बच्चों को संवेदनाओं वाली कहानी व दुनाना।
18- गाँव में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध न कराना। 


भारत में संस्कृति, मानवता और बस्तियों का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीवन फलता-फूलता रहा है। बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहाँ जगह मिली वह वहीं बहने लगी। यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर। असल में, पर्यावरण को हो रहे नुकसान का मूल कारण अनियोजित शहरीकरण है। बीते दो दशक में यह प्रवृत्ति पूर देश में बढ़ी है कि शहरों या कस्बों की सीमा से सटे खेतों में अवैध कालोनियां उग आई हैं। बाद में वहाँ कच्ची-पक्की सड़क बना कर आसपास के खेत, जंगल तालाब को वैध या अवैध तरीके से कंक्रीट के जंगलों में बदल दिया गया। 



देश के अधिकांश शहर बेतरतीब बढ़ते जा रहे हैं। न तो वहाँ सार्वजनिक परिवहन है, न ही सुरक्षा, न बिजली-पानी। देश में बढ़े काले धन को जब बैंक या घर में रखना जटिल होने लगा तो जमीन में निवेश का सहारा लिया जाने लगा। इससे खेत यानी जमीन की कीमतें बढ़ीं। पारंपरिक शिल्प और रोजगार से पेट न भरने की वजह से लोग शहरों की ओर भागने लगे। 



केवल पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं, शहर सामाजिक और सांस्कृतिक प्रदूषण से भी ग्रस्त हो रहे हैं। लोग मानवीय संवेदनाओं से, अपनी लोक परंपराओं और मान्यताओं से कट रहे हैं। तो क्या लोग गाँव में ही रहें? क्या विकास की उम्मीद न करें? ऐसे कई सवाल शहरीकरण में अपनी पूंजी को हर दिन कई गुणा होते देखने वाले कर सकते हैं। 



इंसान की क्षमता, ज़रूरत और योग्यता के अनुरूप उसे अपने मूल स्थान पर अपने सामाजिक सरोकारों के साथ जीवनयापन करने की सुविधाएं मिलनी चाहिए। अगर विकास के प्रतिमान ऐसे होंगे तो शहर की ओर लोगों का पलायन रुकेगा। इससे धरती को कुछ राहत मिलेगी। 



किसान या तो शहरों में मजदूरी करने लगता है या फिर जमीन की अच्छी कीमत हाथ आने पर कुछ दिन तक उसी में डूबा रहता है। दो दशक पहले दिल्ली नगर निगम के एक सर्वेक्षण में पता चला था कि राजधानी में अपराध में ताबड़तोड़ बढ़ोतरी के सात मुख्य कारण हैं। 



अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा और ग़रीबी, खुला आवास, बड़ा परिवार, नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के विचारों में टकराव और नैतिक मूल्यों में गिरावट। वास्तव में, यह रिपोर्ट केवल दिल्ली ही नहीं, दूसरे महानगरों और शहरों में भी बढ़ते अपराधों का भी खुलासा करती है। ये सभी कारक शहरीकरण की त्रासदी की सौगात हैं। 



आर्थिक विषमता, अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और पारंपरिक जीवकोपार्जन में बदलाव की वजह से शहरों की ओर पलायन ज्यादा बढ़ा है। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को साझा कोशिश करनी होगी। वर्ना, कुछ ही सालों में देश के सामने शहरीकरण की कठिनाइयां इतनी विकराल होंगी कि महानगर बेगार, लाचार और बीमार लोगों से ठसाठस भरे होंगे, और गाँव उजाड़ हो जाएंगे। प्रकृति विनाश गाँवों में उच्च या तकनीकी संस्थान खोलना, स्थानीय उत्पादों के मद्देनजर ग्रामीण अंचलों में छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, खेती के पारंपरिक बीज, खाद और दवाओं को प्रोत्साहित करना- ये कुछ ऐसे उपाय हैं, जो पलायन रोक सकते हैं। 



हम गाँव से शहर की ओर तो बढ़ रहे है, और पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण कर रहे है, लेकिन हम अपनी विंब प्रसिद्ध संस्कृति कोे खो रहे है। हम अपनी उस संस्कृति से अपने बच्चों अंजान रख रहे है, जिसके बल पर हम विश्व में पूजे जाते थे। हम विकास कर रहे है, हमारा समााज, देश भी विकास कर रहा है, लेकिन यह विकास तकनीकी रूप से हो रहा है, वास्तव में देखे तो हमारी संस्कृति का छात्र हो रहा है। भविष्यवादिता का में पक्षधर नहीं हैं, लेकिन अपनी संस्कृति की रीढ़ संवेदनाओं को होड़ में विकास के सपने देश ऐसा कदापि नहीं हो सकता है। मेरी सफलता की खुशी मैं अकेले नहीं मना सकता उसके लिए मुझे अपने लोग समाज में चाहिए साथ ही मुझे दुख से उभारने के लिए अपने लोगों की संवेदनाओें की अत्यधिक आवष्यकता होगी। संवेदनाओं के द्वारा हम आपस में जुड़े हुपे हे, इसके अभाव में हम सभी बिखर जाएंगे।



गाँव की अपेक्षा शहरों के लोगों की संवेदनाओं में अधिक छाप हुआ है। लेकिन प्राचीन काल से तुलना करें तो हाथ दोनों जगह हुआ है। हमें वास्तव में दुख के उभरना हो या खुशी मनानी ही दोनों में ही लोगों संवेदनाओं की अपेक्षा रहती है।
शहरों में मरती संवेदनाओं को रोेकने के लिए कुछ सार्थक प्रयास करने आवश्यक है।
1- बढ़ती नगरीय जनसंख्या पर अंकुश लगाना
2- योग्यतानुसार उचित रोजगार के अवसर उपपलब्ध कराना
3- पर्यावरण को स्वच्छ हरा-भरा बनाना
4- नैतिक शिक्षा का उचित प्रबंध
5- स्वच्छ प्र्रतिस्पर्धा एक दूसरे के सहयोग के साथ
6- संयुक्त परिवार को बढ़ावा देना
7- सामुहिक खेली को अधिक बढ़ावा देेना
8- संवेदनाओं में वृद्धि करने वाले धारावाहिकों का अधिक प्रसारण
9- बच्चों को संवेदना प्रेरक कहानी सुनाना
10- समाज में आपसी भाई-चारा बढ़ाना
11- आस-पास ;पड़ोसियोंद्ध के सुख-दुुख में शरीक होना
12- एक दूसरे के साथ खुशी बांटना
13- सभी त्यौहार मिल-झुलकर मनाना



आज हम विकासशील से विकसित भारत का सपना लेकर तो चल रहे है, उच्च तकनीकी से हम अन्य संस्कृतियों के करीब आए हैं और उनको अपना भी रहे है, हम भविष्यवादी समाज से भी निकल रहे है। लेकिन यह भी सच है कि हम अपनी विश्व धरोहर संस्कृति को भूलते जा रहे है या उसे नजर अंदाज़ कर रहे है। आज हम घर, बाहर, दफ्तर में अपने एंडराॅयड फोन में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हमें अपने घर पर बच्ची बुजुर्गों पर भी ध्यान नहीं दे पाते है। हम अपना अधिकांश समय मोबाइल पर खर्च कर रहे है। ऐसे में हम अपने बच्चचों से कैसे संवेदनाओं की अपेक्षा कर सकते है। दूूसरी तरफ शायद हम सफर में भी मोबाइल में दूरी व्यप्त हो जाते है कि हमें पता ही नहीं रहता कि हमारे पाद कब कहां कौन बैठा और कौन गया। प्रतिदिन कई घटनाएं ऐसी मिल जाती है जब व्यक्ति मोबाइल में व्यस्त ही कर मानवीय संवेदनाओं का गला घोट देता है। ऐसे में हम मरती मानवीय संवेदनाओं को नहीं रोक पाएंगे।


तन्हाई में


अख़्तर-उल-ईमान


मेरे शानों पे तिरा सर था निगाहें नमनाक
अब तो इक याद सी बाक़ी है सो वो भी क्या है?
घिर गया ज़ेहन ग़म-ए-ज़ीस्त के अंदाज़ों में
सर हथेली पे धरे सोच रहा हूँ बैठा
काश इस वक़्त कोई पीर-ए-ख़मीदा आ कर
किसी आज़ुर्दा तबीअत का फ़साना कहता!
इक धुँदलका सा है दम तोड़ चुका है सूरज
दिन के दामन पे हैं धब्बे से रिया-कारी के
और मग़रिब की फ़ना-गाह में फैला हुआ ख़ूँ
दबता जाता है सियाही की तहों के नीचे
दूर तालाब के नज़दीक वो सूखी सी बबूल
चंद टूटे हुए वीरान मकानों से परे
हाथ फैलाए बरहना सी खड़ी है ख़ामोश
जैसे ग़ुर्बत में मुसाफ़िर को सहारा न मिले
उस के पीछे से झिजकता हुआ इक गोल सा चाँद
उभरा बे-नूर शुआओं के सफ़ीने को लिए
मैं अभी सोच रहा हूँ कि अगर तू मिल जाए
ज़िंदगी गो है गिराँ-बार प इतनी न रहे
चंद आँसू ग़म-ए-गीती के लिए, चंद नफ़स
एक घाव है जिसे यूँ ही सिए जाते हैं
मैं अगर जी भी रहा हूँ तो तअज्जुब क्या है
मुझ से लाखों हैं जो ब-सूद जिए जाते हैं
कोई मरकज़ ही नहीं मेरे तख़य्युल के लिए
इस से क्या फ़ाएदा जीते रहे और जी न सके
अब इरादा है कि पत्थर के सनम पूजूँगा
ताकि घबराऊँ तो टकरा भी सकूँ मर भी सकूँ
ऐसे इंसानों से पत्थर के सनम अच्छे हैं
उन के क़दमों पे मचलता हो दमकता हुआ ख़ूँ
और वो मेरी मोहब्बत पे कभी हँस न सकीं
मैं भी बे-रंग निगाहों की शिकायत न करूँ
या कहीं गोशा-ए-अहराम के सन्नाटे में
जा के ख़्वाबीदा फ़राईन से इतना पूछूँ
हर ज़माने में कई थे कि ख़ुदा एक ही था
अब तो इतने हैं कि हैरान हूँ किस को पूजूँ?
अब तो मग़रिब की फ़ना-गाह में वो सोग नहीं
अक्स-ए-तहरीर है इक रात का हल्का हल्का
और पुर-सोज़ धुँदलके से वही गोल सा चाँद
अपनी बे-नूर शुआओं का सफ़ीना खेता
उभरा नमनाक निगाहों से मुझे तकता हुआ
जैसे खुल कर मिरे आँसू में बदल जाएगा
हाथ फैलाए इधर देख रही है वो बबूल
सोचती होगी कोई मुझ सा है ये भी तन्हा
आईना बन के शब ओ रोज़ तका करता है
कैसा तालाब है जो इस को हरा कर न सका?
यूँ गुज़ारे से गुज़र जाएँगे दिन अपने भी
पर ये हसरत ही रहेगी कि गुज़ारे न गए
ख़ून पी पी के पला करती है अँगूर की बेल
गर यही रंग-ए-तमन्ना था चलो यूँही सही
ख़ून पीती रही बढ़ती रही कोंपल कोंपल
छाँव तारों की शगूफ़ों को नुमू देती रही
नर्म शाख़ों को थपकते रहे अय्याम के हाथ
यूँही दिन बीत गए सुब्ह हुई शाम हुई
अब मगर याद नहीं क्या था मआल-ए-उम्मीद
एक तहरीर है हल्की सी लहू की बाक़ी
बेल फलती है तो काँटों को छुपा लेती है
ज़िंदगी अपनी परेशाँ थी परेशाँ ही रही
चाहता ये था मिरे ज़ख़्म के अँगूर बंधें
ये न चाहा था मिरा जाम तही रह जाए!
हाथ फैलाए इधर देख रही है वो बबूल
सोचती होगी कोई मुझ सा है ये भी तन्हा
घिर गया ज़ेहन ग़म-ए-ज़ीस्त के अंदाज़ों में
कैसा तालाब है जो इस को हरा कर न सका
काश इस वक़्त कोई पीर-ए-ख़मीदा आकर
मेरे शानों को थपकता ग़म-ए-तन्हाई में


सिलसिले


अख़्तर-उल-ईमान


 


शहर-दर-शहर, क़र्या-दर-क़र्या
साल-हा-साल से भटकता हूँ
बार-हा यूँ हुआ कि ये दुनिया
मुझ को ऐसी दिखाई दी जैसे
सुब्ह की ज़ौ से फूल खिलता हो
बार-हा यूँ हुआ कि रौशन चाँद
यूँ लगा जैसे एक अंधा कुआँ
या कोई गहरा ज़ख़्म रिसता हुआ
मैं बहर-ए-कैफ़ फिर भी ज़िंदा हूँ
और कल सोचता रहा पहरों
मुझ को ऐसी कभी लगन तो न थी
हर जगह तेरी याद क्यूँ आई


शीशे का आदमी


अख़्तर-उल-ईमान


 


उठाओ हाथ कि दस्त-ए-दुआ बुलंद करें
हमारी उम्र का इक और दिन तमाम हुआ
ख़ुदा का शुक्र बजा लाएँ आज के दिन भी
न कोई वाक़िआ गुज़रा न ऐसा काम हुआ
ज़बाँ से कलमा-ए-हक़-रास्त कुछ कहा जाता
ज़मीर जागता और अपना इम्तिहाँ होता
ख़ुदा का शुक्र बजा लाएँ आज का दिन भी
उसी तरह से कटा मुँह-अँधेरे उठ बैठे
प्याली चाय की पी ख़बरें देखीं नाश्ता पर
सुबूत बैठे बसीरत का अपनी देते रहे
ब-ख़ैर ओ ख़ूबी पलट आए जैसे शाम हुई
और अगले रोज़ का मौहूम ख़ौफ़ दिल में लिए
डरे डरे से ज़रा बाल पड़ न जाए कहीं
लिए दिए यूँही बिस्तर में जा के लेट गए


राह-ए-फ़रार


अख़्तर-उल-ईमान


 


इधर से न जाओ
इधर राह में एक बूढ़ा खड़ा है
जो पेशानियों और चेहरों
पे ऐसी भभूत एक मल देगा सब झुर्रियाँ फट पड़ेंगी
सियह, मार जैसे, चमकते हुए काले बालों
पे ऐसी सपीदी उमँड आएगी कुछ तदारुक नहीं जिस का कोई
कोई रास्ता और ढूँडो
कि इस पीर-ए-फ़र्तूत की तेज़ नज़रों से बच कर
निकल जाएँ और इस की ज़द में न आएँ कभी हम
इधर से न जाओ
इधर मैं ने इक शख़्स को जाते देखा है अक्सर
जवानों को जो राह में रोक लेता है उन से
वहीं बातें करता है मिल कर
जो सुक़रात करता था यूनान के मनचलों से
यक़ीनन उसे एक दिन ज़हर पीना पड़ेगा
इधर से न जाओ
इधर रौशनी है
कहीं आओ छुप जाएँ जाकर तमाम आफ़तों से
मुझे एक तह-ख़ाना मालूम है ख़ुशनुमा सा
जो शाहान-ए-देहली ने बनवाया था इस ग़रज़ से
कि अबदालियों, नादिरी फ़ौज की दस्तरस से
बचें और बैठे रहें सारे हंगामों की ज़द से हट कर
ये दर-अस्ल मीरास है आप की मेरी सब की
सलातीन-ए-देहली से पहले किसी और ने इस की बुनियाद रक्खी थी लेकिन
वो अब क़ब्ल-ए-तारीख़ की बात है कौन जाने
इधर से न जाओ
इधर शाह-नादिर नहीं आज कोई भी लेकिन
वही क़त्ल-ए-आम आज भी हो रहा है
ये मीरास है आप की मेरी सब की
ये सौग़ात बैरूनी हाकिम हमें दे गए हैं
चलो सामने के अंधेरे में घुस कर
उतर जाएँ तह-ख़ाने की ख़ामुशी में
ये सब खिड़कियाँ बंद कर दें
कोई चीख़ने बैन करने की आवाज़ हम तक न आए
कोई ख़ून की छींट दामन पे आकर न बैठे
कभी तुम ने गाँजा पिया है?
कोई भंग का शौक़, कोई जड़ी-बूटी खाई
न कोकेन अफ़यून कुछ भी
कभी कोई नश्शा नहीं तुम ने चक्खा
न अग़लाम-ए-अमर्द-परस्ती से रिश्ता रहा है
कोई तजरबा भी नहीं ज़िंदगी का?
फ़सादात देखे थे तक़्सीम के वक़्त तुम ने
हवा में उछलते हुए डंठलों की तरह शीर-ख़्वारों को देखा था कटते
और पिस्ताँ-बुरीदा जवाँ लड़कियाँ तुम ने देखी थीं क्या बैन करते?
नहीं ये तो नश्शा नहीं तजरबा भी नहीं ऐसा कोई
ये इक सानेहा है
फ़रामोश-गारी का एहसान मानो
ये सब कल की बातें हैं, बोसीदा बातें
जिन्हें भूल जाना बेहतर
फ़रामोश-गारी भी
इक नेमत-ए-बे-बहा है
इधर से न जाओ
कोई राह में रोक लेगा
नया कोई ख़तरा नया मसअला कोई जिस को
न सोचा न समझा न एहसास है जिस का अब तक
कोई ऐसी सूरत निकालो
ये सब आफ़तें अपना दामन न पकड़ें
कोई और राह-ए-फ़रार ऐसी ढूँडो
कि हम ज़िंदगी के जहन्नम को जन्नत समझ लें!


हम मतवाले


डा. वीरेंद्र पुष्पक

 

हम मतवाले टोली लेकर, निकले स्वच्छ बनाने को।

सुंदर वतन रहे अपना, सन्देश यही पहुँचाने को।

बच्चे दिल के होते सच्चे,

सन्देश लिए मन से अच्छे,

माना होते हैं ये कच्चे,

निर्मल इन्हें बनाने को।

तन स्वच्छ रहे मन स्वच्छ रहे,

भारत को स्वच्छ बनाने को।

हम मतवाले टोली लेकर निकले स्वच्छ बनाने को।

सुंदर वतन रहे अपना सन्देश यही पहुंचाने को।।

देश को जागरूक करने खातिर,

स्वच्छ भारत अभियान चला है,

शौच खुले में कहां भला है,

बीमारी का खुला निमन्त्रण,

टाले भला ये कहीं टला है। 

बस यही बात समझाने को।

हम मतवाले टोली लेकर निकले स्वच्छ बनाने को।

सुंदर वतन रहे अपना सन्देश यही पहुंचाने को।।

गांव गांव खुशहाली होगी, 

खेतों में हरियाली होगी, 

खिल उठेगा चमन हमारा,

प्रफुल्लित हर डाली होगी, 

घर, पड़ौस, गलियां महकेंगी,

निकले चमन बनाने को।।

हम मतवाले टोली लेकर निकले स्वच्छ बनाने को।

सुंदर वतन रहे अपना सन्देश यही पहुंचाने को।।

तब्दीली


अख़्तर-उल-ईमान


 


इस भरे शहर में कोई ऐसा नहीं


जो मुझे राह चलते को पहचान ले


और आवाज़ दे बे सर-फिरे


दोनों इक दूसरे से लिपट कर वहीं


गिर्द-ओ-पेश और माहौल को भूल कर


गालियाँ दें हँसें हाथा-पाई करें


पास के पेड़ की छाँव में बैठ कर


घंटों इक दूसरे की सुनें और कहें


और इस नेक रूहों के बाज़ार में


मेरी ये क़ीमती बे-बहा ज़िंदगी


एक दिन के लिए अपना रुख़ मोड़ ले


एक लड़का




अख़्तर-उल-ईमान


 


दयार-ए-शर्क़ की आबादियों के ऊँचे टीलों पर


कभी आमों के बाग़ों में कभी खेतों की मेंडों पर


कभी झीलों के पानी में कभी बस्ती की गलियों में


कभी कुछ नीम उर्यां कमसिनों की रंगरलियों में


सहर-दम झुटपुटे के वक़्त रातों के अँधेरे में


कभी मेलों में नाटक-टोलियों में उन के डेरे में


तआक़ुब में कभी गुम तितलियों के सूनी राहों में


कभी नन्हे परिंदों की नहुफ़्ता ख़्वाब-गाहों में


बरहना पाँव जलती रेत यख़-बस्ता हवाओं में


गुरेज़ाँ बस्तियों से मदरसों से ख़ानक़ाहों में


कभी हम-सिन हसीनों में बहुत ख़ुश-काम दिल-रफ़्ता


कभी पेचाँ बगूला साँ कभी ज्यूँ चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता


हवा में तैरता ख़्वाबों में बादल की तरह उड़ता


परिंदों की तरह शाख़ों में छुप कर झूलता मुड़ता


मुझे इक लड़का आवारा-मनुश आज़ाद सैलानी


मुझे इक लड़का जैसे तुंद चश्मों का रवाँ पानी


नज़र आता है यूँ लगता है जैसे ये बला-ए-जाँ


मिरा हम-ज़ाद है हर गाम पर हर मोड़ पर जौलाँ


इसे हम-राह पाता हूँ ये साए की तरह मेरा


तआक़ुब कर रहा है जैसे मैं मफ़रूर मुल्ज़िम हूँ


ये मुझ से पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही हो






ख़ुदा-ए-इज़्ज़-ओ-जल की नेमतों का मो'तरिफ़ हूँ मैं


मुझे इक़रार है उस ने ज़मीं को ऐसे फैलाया


कि जैसे बिस्तर-ए-कम-ख़्वाब हो दीबा-ओ-मख़मल हो


मुझे इक़रार है ये ख़ेमा-ए-अफ़्लाक का साया


उसी की बख़्शिशें हैं उस ने सूरज चाँद तारों को


फ़ज़ाओं में सँवारा इक हद-ए-फ़ासिल मुक़र्रर की


चटानें चीर कर दरिया निकाले ख़ाक-ए-असफ़ल से


मिरी तख़्लीक़ की मुझ को जहाँ की पासबानी दी


समुंदर मोतियों मूँगों से कानें लाल-ओ-गौहर से


हवाएँ मस्त-कुन ख़ुशबुओं से मामूर कर दी हैं


वो हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ है यकता और दाना है


अँधेरे को उजाले से जुदा करता है ख़ुद को मैं


अगर पहचानता हूँ उस की रहमत और सख़ावत है


उसी ने ख़ुसरवी दी है लईमों को मुझे नक्बत


उसी ने यावा-गोयों को मिरा ख़ाज़िन बनाया है


तवंगर हिर्ज़ा-कारों को किया दरयूज़ा-गर मुझ को


मगर जब जब किसी के सामने दामन पसारा है


ये लड़का पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही हो






मईशत दूसरों के हाथ में है मेरे क़ब्ज़े में


जुज़ इक ज़ेहन-ए-रसा कुछ भी नहीं फिर भी मगर मुझ को


ख़रोश-ए-उम्र के इत्माम तक इक बार उठाना है


अनासिर मुंतशिर हो जाने नब्ज़ें डूब जाने तक


नवा-ए-सुब्ह हो या नाला-ए-शब कुछ भी गाना है


ज़फ़र-मंदों के आगे रिज़्क़ की तहसील की ख़ातिर


कभी अपना ही नग़्मा उन का कह कर मुस्कुराना है


वो ख़ामा-सोज़ी शब-बेदारियों का जो नतीजा हो


उसे इक खोटे सिक्के की तरह सब को दिखाना है


कभी जब सोचता हूँ अपने बारे में तो कहता हूँ


कि तू इक आबला है जिस को आख़िर फूट जाना है


ग़रज़ गर्दां हूँ बाद-ए-सुब्ह-गाही की तरह लेकिन


सहर की आरज़ू में शब का दामन थामता हूँ जब


ये लड़का पूछता है अख़्तर-उल-ईमान तुम ही हो


ये लड़का पूछता है जब तो मैं झल्ला के कहता हूँ


वो आशुफ़्ता-मिज़ाज अंदोह-परवर इज़्तिराब-आसा


जिसे तुम पूछते रहते हो कब का मर चुका ज़ालिम


उसे ख़ुद अपने हाथों से कफ़न दे कर फ़रेबों का


इसी की आरज़ूओं की लहद में फेंक आया हूँ


मैं उस लड़के से कहता हूँ वो शोला मर चुका जिस ने


कभी चाहा था इक ख़ाशाक-ए-आलम फूँक डालेगा


ये लड़का मुस्कुराता है ये आहिस्ता से कहता है


ये किज़्ब-ओ-इफ़्तिरा है झूट है देखो मैं ज़िंदा हूँ




मजदूरी और प्रेम

- सरदार पूर्ण सिंह हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन ...