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Showing posts from May 25, 2022

रोहिल्ला गुलाम कादिर का आतंक, अमानुषिकता और अंत !

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-राजगोपाल सिंह वर्मा   रोहिल्लाओं के सिरमौर नजीबुदौला का रूहेलखण्ड के इतिहास में एक अलग ही स्थान है। वह वीर, पराक्रमी और कूटनीतज्ञ था, पर उसके बेटे जाबिता खान और फिर पौत्र के संबंध में यह धारणा नहीं बनाई जा सकती। विशेष रूप से उसका महत्त्वाकांक्षी पौत्र गुलाम कादिर इतिहास में एक बदनुमा धब्बे की तरह जाना जाता है। उसने धन-दौलत की हवस में तत्कालीन मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की आँखें नुचवा ली थीं और तमाम अमानुषिक अत्याचार किये थे।   मेरी पुस्तक ‘बेगम समरू का सच’ में इस प्रकरण पर विस्तार से चर्चा है। पूरे संदर्भों के लिए पुस्तक पद्धनी होगी। भाई अमन कुमार त्यागी जी के निर्देश पर किताब के वेअंश प्रस्तुत हैं- सन १७८७ के आखिरी दिनों में एक और तूफान आने की राह देख रहा था. सहारनपुर का शासक रुहेला  बागी सरदार जाबिता खां का बेटा गुलाम कादिर हुआ करता था. उसने इस अफरा-तफरी के माहौल का फायदा उठा कर दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा करने के अपने ख्वाब को अमली जामा पहनाना शुरू किया.  जुलाई १७८७ में लालसोट में महादजी की पराजय के बाद से गुलाम कादिर मराठों के विनाश की पटकथा के तथाकथित निर्णायक अध्याय लिखने में व्य

रामावतार त्यागी

- डाॅ. सुरेश गौतम - डाॅ वीणा गौतम प्रयोगवादी धारा के पश्चात् हिंदी गीतिधारा मे गीतकारों का जो वर्ग साहित्यिक मंच पर उभर कर सामने आया उनमें रामावतार त्यागी का स्वर अन्य कवियों से सर्वथा भिन्न सुनाई पड़ता है। गीति-क्षेत्र की जिस परंपरा से आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर त्यागी जी चले उसमें वे निस्संदेह सफल हुए हैं। ये नई अनुभूति के समृद्ध गीत-कवि हैं। उन्होंने जीवन मे सौंदर्य और विकृति दोनों को महत्त्व दिया है। उनके गीतों में चित्रात्मकता है। उन्होंने समाज की पीड़ा, तिरस्कार और घृणा को संवेदना की भूमि में अनुभूत किया है। उन्हें अपने अहं पर आस्था है। उनके कतिपय गीत गाए जाने के लिए हैं और कुछ पढ़े जाने के लिए। जीवन का भोगा हुआ संदर्भ त्यागी की रचनाओं में निर्लिप्त रूप से प्रकट है। त्यागी का व्यक्ति और त्यागी का कवि एक-दूसरे के साथ इस प्रकार घुले-मिले हैं कि उनमें किसी की भी अपेक्षा कर दूसरे को जाना ही नहीं जा सकता चूंकि त्यागी ने जो कुछ देखा, जिया, सहा, झेला और भोगा है, मान उसी को वाणी दी है। ‘न उसकी अनुभूति ‘उधार’ की है न अभिव्यक्ति, न उसने अपने आपको आधुनिक सिद्ध करने के लिए झूठी भाषा का प्रयोग क

कविवर रामावतार त्यागी

  शेरजंग गर्ग समकालीन हिंदी कविता अपने विविध रंगों और शैलियों में पूरे निखार एवं यौवन पर है, तथापि कविता का प्रत्येक प्रबुद्ध पाठक अथवा श्रोता यह महसूस करने लगा है कि कविता जन-जीवन से दूर जा पड़ी है। यह एक असंगति ही है कि समकालीन कविता आम आदमी के इतना नज़दीक होने के बावजूद जन-जीवन का अभिन्न अंग बनने में उतनी सफल नहीं हो पाई है, जितनी कि उससे अपेक्षा की जाती है। चलताऊ भाषा में जिसे लोकप्रिय कविता कहा जाता है, वह कवि सम्मेलनों के फूहड़पन से जुड़ी हुई है। उसमें हास्य है, लतीफें-चुुटकुले हैं और वाहियात किस्म गलेबाज़ी है। दूसरी ओर साहित्यिक कविता प्रयोगों और दुष्प्रयोगों के चक्कर में इस क़दर फंसी हुई है कि वह जन समान्य से संपर्क का दावा करने के बावजूद सामान्य-जन की रुचि का विषय नहीं बन पा रही है। ऐसी दुविधाग्रस्त स्थिति में वे कवि वाक़ई स्वागत योग्य हैं, जिन्होंने समय के रुख़ के विपरीत खड़े होकर कविता को न तो अपने व्यक्तित्व से विच्छिन्न किया, न जनता से, साथ ही साहित्यिक शिखरों को भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया। इस धारा के अग्रणी कवियों में श्री रामावतार त्यागी विशेष महत्व रखते हैं। त्यागी

आठवां स्वर की भूमिका

 राममधारी सिंह ‘‘दिनकर’’ त्यागी ने एक जगह गीत की परिभाषा देते हुए कहा है- गीत क्या है? सिर्फ़ छंदों में सजाई, आदमी की शब्दमय तस्वीर ही तो। लेकिन, आदमी की शब्दमय तस्वीर तो साहित्य मात्र है। इसलिए, गीतों का महत्व मैं एक दूसरी तरह से आंकता हूं। साहित्य का सर्वश्रेष्ठ अंश कवित्व है और कवित्व उपन्यासों से अधिक कविता में और कविताओं में भी सबसे अधिक गीतों में रहता है। गीतों में सिमट कर बैठने वाला कवित्व साहित्य की चरम शक्ति का पर्याय होता है। उपन्यास कुछ सफल और कुछ असफल हो सकते हैं, खंड काव्य और महाकाव्य भी अंशतः सफल और अंशतः असफल हो सकते हैं, किंतु, गीतों में आधी सफलता और आधी असफलता की कल्पना नहीं की जा सकती-गीत या तो पूर्ण रूप से सफल होते हैं अथवा ये होते ही नहीं। गीतों से जिसे स्वयं आनंद नहीं मिलता, उसे उनका अर्थ समझाकर आनंदित करना बड़ा ही कठिन काम है। कई बार यह कार्य मुझसे नहीं हो पाता। गीतों में ऐसे संकेत होेते हैं जो बहुत दूर तक जाते हैं, उनके भीतर मनोदशाएं होेती हैं, जिनके पीछे अनुभूतियों का विशाल इतिहास पड़ा होता है, और सबसे बढ़कर तो यह कि उनके शब्दों की अदाएं ऐसी होती हैं जो

लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी

 क्षेमचंद्र ‘सुमन’ ‘‘मेरी हस्ती को तोल रहे हो तुम, है कौन तराज़ू जिस पर तोलोगे? मैं दर्द-भरे गीतों का गायक हूं, मेरी बोली कितने में बोलोगे ?’’ त्यागी की ये पंक्तियां हालांकि मेरे लिए चुनौती हैं, फिर भी मैं उसकी हस्ती को तोलने और उसके दर्द-भरे गीतों की बोली बोलने की हिम्मत कर रहा हूं। इसका कारण साफ़ है कि त्यागी से आंख मिलाए बग़ैर आधुनिक गीत-काव्य से परिचय प्राप्त करना संभव नहीं है। वह स्वभाव से अक्खड़, आदतों से आवारा, तबियत से जिद्दी और आचरण से बेहद तुनुक-मिज़ाज है। अगर यों कहूं तो आप इसे और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे कि यह वह ख़ुद भी नहीं जानता कि वह क्या है! उसके बहुत-से साथी उसके व्यक्तित्व को असंगतियों और विरोधाभासों का ‘एलबम’ कहते है, तो मैं भी उनके स्वर-में-स्वर मिलाकर इतना कहने की स्वतंत्रता और चाहूंगा कि केवल उसका व्यक्तित्व ही नहीं, पूरा जीवन ही असंगतियों से रंगा हुआ हैऋ और शायद उसकी कविता में भी उसके स्वभाव की ये असंगतियां स्पष्ट रूप से उतरी हैं। त्यागी के व्यक्तित्व की असंगतियों को और भी साफ़़ तौर से आपके सामने रखने के लिए मैं एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा। 1957 की एक शाम