Wednesday, May 25, 2022

रोहिल्ला गुलाम कादिर का आतंक, अमानुषिकता और अंत !





-राजगोपाल सिंह वर्मा  


रोहिल्लाओं के सिरमौर नजीबुदौला का रूहेलखण्ड के इतिहास में एक अलग ही स्थान है। वह वीर, पराक्रमी और कूटनीतज्ञ था, पर उसके बेटे जाबिता खान और फिर पौत्र के संबंध में यह धारणा नहीं बनाई जा सकती। विशेष रूप से उसका महत्त्वाकांक्षी पौत्र गुलाम कादिर इतिहास में एक बदनुमा धब्बे की तरह जाना जाता है। उसने धन-दौलत की हवस में तत्कालीन मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की आँखें नुचवा ली थीं और तमाम अमानुषिक अत्याचार किये थे।  मेरी पुस्तक ‘बेगम समरू का सच’ में इस प्रकरण पर विस्तार से चर्चा है। पूरे संदर्भों के लिए पुस्तक पद्धनी होगी। भाई अमन कुमार त्यागी जी के निर्देश पर किताब के वेअंश प्रस्तुत हैं-




सन १७८७ के आखिरी दिनों में एक और तूफान आने की राह देख रहा था. सहारनपुर का शासक रुहेला  बागी सरदार जाबिता खां का बेटा गुलाम कादिर हुआ करता था. उसने इस अफरा-तफरी के माहौल का फायदा उठा कर दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा करने के अपने ख्वाब को अमली जामा पहनाना शुरू किया. 

जुलाई १७८७ में लालसोट में महादजी की पराजय के बाद से गुलाम कादिर मराठों के विनाश की पटकथा के तथाकथित निर्णायक अध्याय लिखने में व्यस्त था. वह लम्बे समय से पहले अपने पितामह नजीबुदौल्ला के इलाके दोआब और बाद में दिल्ली के क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत बनाने की रणनीति पर काम कर रहा था. २१ अगस्त १७८७ को गुलाम कादिर अपनी सेना के साथ बागपत पहुंचा. यह उसकी हिम्मत और आत्मविश्वास की अति थी कि उसने मुगल सम्राट को अपने आने की सूचना भिजवा कर निमन्त्रण प्राप्त करने की भी अपेक्षा की थी. 

यह वही गुलाम कादिर था, जिसके पिता जाबिता खान को समरू साहब ने शिकस्त दी थी. पर अब जबकि मुगल सत्ता दुर्बल हो गई थी, उसके अच्छे दिन आ गये लगते थे. अपनी योजनानुसार एक दिन वह अपनी सेना को लेकर किले के उस पार यमुना नदी के मुहाने तक पहुँच गया था. गुलाम कादिर खां को अपनी जीत का भरोसा इसलिए भी बन गया था, कि उसके साथ मुगलों का एक बड़ा दरबारी, उनका नाजिर, मंजूर अली इस षड्यंत्र में पूरी वफादारी के साथ आ मिला था. 

मुगल सेना ने रुहेला सरदार की सेना की ताकत को आंकने में थोड़ा लापरवाही कर दी. शाहदरा में शाह निजामुद्दीन ने  एक छोटी सैन्य टुकड़ी को यमुना पार उनके अड्डे पर भेजकर ललकारा. लेकिन उसका असर उल्टा हुआ. रुहेला सेना ने मुगलों की इस छोटी सेना को तहस-नहस कर दिया. कहा जाता है कि कादिर की प्रशिक्षित सेना के विरुद्ध यह अकौशलपूर्ण आक्रमण था, इसलिए मुगल सेना का परास्त होना अवश्यंभावी था. न जाने कितने लोग हताहत हुए, और बंदी बनाये गये. तब तक मुगल सेनापति निजामुद्दीन भी नाजिर अली की बेवफाई और गद्दारी को समझ गया था. उसने समझदारी से काम लेते हुए, दिल्ली से २२ मील दूर दक्षिण में स्थित बल्लभगढ़ किले में शरण लेकर वहीं से रुहेलों के विरुद्ध मोर्चा लेने की रणनीति बनाई.

दिल्ली की मुगल सल्तनत के गौरवशाली इतिहास में यह बड़ा खराब समय था. शिंदे ग्वालियर में फंसे थे, निजामउद्दीन को बल्लभगढ़ में शरण लेनी पड़ी थी. उधर रुहेलों के पास नाजिर अली जैसा जानकार भेदिया आ मिला था. यूँ कहिये मुगल दरबार रुहेलों की दया पर निर्भर हो गया था, और सल्तनत उसकी गोद में आ गिरी, बिना किसी प्रतिरोध या बचाव की कोशिशों के. 

इस प्रकार एक सुबह रुहेला नवाब आराम से अपने सैनिकों के साथ यमुना नदी के मुहाने से पार कर एक वीरान और असहाय मुगल दरबार की ओर बिना किसी रुकावट के कूच कर गया. मुगल सल्तनत का इतना बेबस शहंशाह शायद ही इस तवारीख में कभी कोई रहा होगा. पराजित सम्राट ने विद्रोहियों से मैत्री की बातचीत आरंभ कर दी थी. 

१८ जुलाई १७८८ की तारीख दिल्ली के मुगल दरबार के एक तवारीखी तारीख के रूप में जानी जाती है. लाल किले का लाहौरी दरवाजा अपनी मजबूती के कारण फौलादी दरवाजा भी कहलाता था. इस दिन जब तक कोई समझ पाता, या उन्हें रोकने की सोचता भी, इसी दरवाजे से गुलाम कादिर और इस्माइल बेग ने अपने लगभग दो हजार सैनिकों के साथ प्रवेश कर लिया. उन में से कुछ सैनिक दीवान-ए-खास के संगमरमरी हाल में छा गये, बाकी लाल किले के अन्य भागों में. वरांडों, बाग-बगीचों , छत और आरामगाहों तक में बड़ी दाढ़ी वाले अफगानी रोहिल्ला सैनिक दिखते थे. अपनी म्यान में और खुली तेज धारदार तलवार लहराते हुये, ढाल-वस्त्र धारण कर अपने हथियारों से लैस उन आततायी योद्धाओं ने इस राजप्रासाद का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा था, जहाँ उनकी मौजूदगी न हो. जैसे-जैसे गुलाम कादिर की सेना आगे बढ़ती गई, वैसे-वैसे ही मुगल सैनिक इधर-उधर छिपते गये. रुहेलों को ज्यादा कोशिश भी नहीं करनी पडी. यूँ कहें कि किला ऐसे वीरान हुआ कि जैसे उसमें शाह आलम के अलावा कोई और हो ही न. जब वह शाह आलम के दरबार में पहुंचा, तो मुगल वारिस चुपचाप अपने तख्त-ओ-ताज पर बैठा किस्मत के इस रूप पर खुद ही तरस खा रहा था.

कहते हैं कि शाह आलम के उन्नीस बेटे उस समय लाल किले के परिसर में ही मौजूद थे, जिन्हें धकेल कर मोती मस्जिद में इकट्ठा किया गया. यह वही मोती मस्जिद थी, जिसमें केवल राजपरिवार को ही नमाज अता करने की सहूलियत थी. उस समय लाल किले में १८०० के आसपास नौकर-चाकर और अन्य कारिंदे मौजूद थे, जो मीना बाजार और किले की गलियों से होते ऐसे गुम हुए, जैसे यहाँ कभी रहते ही न हों. जो बचे थे, उनको समझा दिया गया कि जैसा कहा गया है वैसा करो, या फिर भुगतने को तैयार रहो. 

आज बदमिजाज रुहेला शासक अपने स्वप्न को साकार करता शाह आलम के सामने उसी के किले में, उस दरबार में आ खड़ा था, जहाँ आम मौकों पर उसकी आवाजाही भी नहीं हो सकती थी.  यह वही सम्राट शाह आलम था जिसके पुरखे बाबर, हिमांयू,अकबर महान, शाहजहाँ और औरंगजेब हुआ करते थे. ये वो लोग थे, जिन्होंने एक समय में पूरे हिन्दुस्तान को अपना बना कर इतिहास में जो जगह दर्ज की थी, वह अन्य किसी भी राजवंश के लिए ईर्ष्या का कारण  हो सकती थी. पर, आज उसी साम्राज्य के इस वंशज की दशा दयनीय हो गई थी. बात यह भी थी कि  यह वही रुहेला था जिसका बाप मुगलों से बगावत कर हार बैठा था, और दादा नजीबुदौल्ला मुगल सल्तनत के लिए सलाम बजा लाता रहा था. 

नाजिर ने गुलाम कादिर को सम्राट से मिलवाया जरूर, पर स्थिति फिलहाल सम्राट के नहीं, इस रुहेले आततायी की ओर अधिक दिखती थी. रुहेला सरदार कम ही सही, पर चतुर था. उसने सलाम किया शहंशाह को, पर इज्जत के भाव नहीं, उपहास के भाव दिखते थे उसकी भूरी आँखों में. उसने तख्त-ए-ताज पर बैठे शहंशाह को धकेल कर एक ओर किया, और नजदीक आ बैठा. हुक्के में तम्बाकू भरा था, और आग भी सुलग रही थी. एक कश लेकर उसने शाह आलम के मुंह पर धुवें का गुबार छोड़ा और मुस्कुराते हुए कहा,

“देखा, तुम्हारी क्या हैसियत कर दी है मैंने. और सुनो, आज से मैं अमीर-उल-उमरा हूँ.”

शाह आलम के पास कोई विकल्प नहीं था. उसने उस रुहेला पठान की आँखों में झाँक कर देखा जहाँ  धूर्तता ही धूर्तता दिख रही थी. पर, उस धूर्त का माकूल जवाब देने की कूवत भी नहीं शेष बची थी फिलहाल शाह आलम में.

“अब तुम आ ही गये हो तो जो मर्जी हो करो”, 

उदास शाह आलम ने हिकारत के भाव से कहा.

“अब शिंदे का क्या भरोसा कि वह लौट कर ना ही आये... वहीं तबाह हो चुका हो शायद!”,

बोल कर और कडुवाहट दिखाई उसने.

शाह आलम दिल का साफ था. वह उसके प्रति भी व्यक्तिगत बैर भाव नहीं रखता था, तथा अपनी रियाया के लिए माकूल चिंता भी करता था. फिर, शिंदे तो उसका सबसे विश्वसनीय व्यक्ति था, जो उसी की सहमति से सैनिक अभियान में बागियों को कुचलने गया था. ऐसे वफादार सलाहकार को गुमनामी के अंधेरों में सौंप कर इस आतंकी को अपना प्रमुख दरबारी बनाने का खयाल भी उसके लिए एक नापाक इरादे-सा था. पर, रुहेला सरदार की बेचैनी को भी शहंशाह महसूस कर सकता था.

“आखिर तुम निकले वही... जिस से तुम्हारे वंश को पहचाना जाता है कादिर...! इस गुलामियत की पेशकश से तुमने अपनी हैसियत तो आंक ली, पर क्या यह भी सोचा कि जिस शहंशाह के पास शिंदे जैसा हीरा हो, वह गुलाम भला मुगल सल्तनत को क्या सलाह देगा?”,

कहकर सम्राट ने गुलाम कादिर को बेहद हिकारत की निगाह से देखा.

“जनाब... हमें गुलाम कहलाने पर कोई आपत्ति नहीं. पर आप भी अब इस नाचीज के गुलाम बन चुके हैं, यह भी दिमाग में रखिये३ वक्त का भरोसा नहीं होता! अब हमारा वक्त है”, 

बेशर्म कादिर ने अहंकार भरे शब्दों में शहंशाह की खिल्ली उड़ाने के अंदाज में कहा.

शाह आलम उठ खड़े हुए. आँखों में खून उतर आया था, पर वक्त का तकाजा कुछ और था. लेकिन इस धूर्त इंसान की महत्वाकांक्षाएं पूरी होने का भी वक्त नहीं आया था. उसे किसी अकूत खजाने की तलाश थी. 

उधर, जैसे ही बेगम समरू को खबर पहुंची कि गुलाम कादिर की सेना ने जमुना के पार पड़ाव डाला है, और कुछ बड़ी गड़बड़ का अंदेशा है, ऐसे ही बेगम ने दिल्ली चलने के लिए फौज को तैयार करने का हुक्म दिया. बेगम की सारी सेना इस समय पानीपत में प्रताप सिंह के विरुद्ध पड़ाव डाले थी. पर, शाह आलम को उनकी खोयी हुई प्रतिष्ठा वापिस दिलाना और गुलाम कादिर को सबक सिखाना बनिस्पत ज्यादा जरूरी था.

हालांकि उन दिनों खबरों के लिए तेज साधन उपलब्ध नहीं थे, जितनी खबरें उडती थी, उस से कई गुनी अफवाहों का बाजार गर्म रहता था. लेकिन दो बातें साफ थी-- एक, गुलाम कादिर ने दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा कर लिया है, और दिल्ली दरबार के शहंशाह शाह आलम को कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. दूसरे, यह कि इस सब के विरोध के लिए न सिंधिया, और न उनका नायब वहां मौजूद हैं.

कहते हैं कि तब बेगम ने जानकारी मिलते ही बिना वक्त गँवाए ‘चलो दिल्ली’ का नारा दिया. खुद चूड़ीदार पायजामे, कसी पोशाक व जैकेट पहन कर, घोड़े पर तलवार सम्भाले अपनी सेना के साथ बेगम ने दिल्ली की तरफ कूच कर दिया. पर वास्तव में वह उस समय टप्पल में थी. इसलिए उसे सरधना के रास्ते दिल्ली पहुँचने में वक्त लगा. वह यह भी जानती थी कि गुलाम कादिर जरूर पूरी तैयारी और चालबाजी से दिल्ली पर धावा बोलने की हिम्मत कर पाया होगा, और यह कि उसके मुकाबले में बेगम की सेना परास्त भी हो सकती थी. पर, अब बात जज्बात की आ पहुंची थी. बेगम यूँ भी शाह आलम की बहुत इज्जत करती थी, और यह अभियान सिर्फ जमीर की आवाज पर ‘मरो या मार दोश् की तर्ज पर उठाया गया था. 

गुलाम कादिर दिल्ली दरबार में बेगम की इज्जत और रुतबे से तो वाकिफ था ही, उसे बेगम की फौज की तैयारियों की भी जानकारी थी. जैसे ही उसे बेगम के दिल्ली कूच की खबर मिली, कादिर की हालत पतली हो गई. उसने अपने सिपहसालारों से मशवरा किया, जो खुद बेगम की फौज के आने से खौफजदा हो गये थे. आखिरकार तय किया गया कि बेगम से मिलकर ऐसी पेशकश की जाए जो दोनों लोगों के फायदे में हो.

रुहेला  सरदार गुलाम कादिर अपने दो साथियों के साथ लाल किले के उस पार बेगम की फौज के पड़ाव के स्थान पर पहुंचा. 

“बेगम साहिबा से अर्ज करो कि दिल्ली दरबार का बड़ा वजीर, और उनका छोटा भाई गुलाम कादिर बेगम की खिदमत में इज्जत नवाजने आया है”, 

रुहेला  रियासतदार ने पहरेदारों से कहलवाया.

उसे बगल के तंबू में इतजार करने को कहा गया. लगभग आधे घंटे की बेचैनी के लम्हों के बाद बुलावा आया. तब तक न जाने कितने तरह के ख्याल उसके मन में घुमड़ते रहे. 

बेगम अपने अस्थायी डेरे में एक ऊंची और बड़ी कुर्सी पर मसनदों के सहारे विराजमान थी. वह फौजी पोशाक में थी. सर पर साफा भी बंधा था. चार फौजी अंगरक्षक और एक वजीर उनके इर्द गिर्द मुस्तैद खड़े थे. 

गुलाम कादिर ने झुक कर सलाम किया. वह एक निगाह बेगम को देखता ही रह गया. उसने नाम तो अकसर सुना था, पर देखने का मौका यूँ मिलेगा, इसका गुमान भी न था. बेगम ने उसे इशारे से दूर रखी एक साधारण कुर्सी पर बैठने को कहा.

“कहो..गुलाम?”, 

थोड़ा तल्खी और बेरुखी से बेगम ने कहा. 

बेगम इस रुहेला  रियासतदार की हरकत से बेहद नाराज थी. वह शहंशाह शाह आलम की दिल से इज्जत करती थी, और उसके दरबार पर कब्जा कर जबरन उनसे वजीर-ए-खास की पदवी हथियाने का गुलाम कादिर का तरीका बेग को बिल्कुल पसंद नहीं आया था. वह सुनना चाहती थी कि क्या अर्ज करने आया था यह शातिर गुलाम कादिर.

“बेगम हुजूर... कुछ पेशकश करनी है आपके दरबार में, गर बुरा न मानें तो”, 

अपनी कंजी आँखों में थोड़े गहरे भाव लिए गुलाम कादिर ने बेगम से कहा. 

बेगम के मन में कादिर के लिए हिकारत के भाव हावी थे, पर दूरी बहुत थी, उन दोनों के बीच की. या तो कादिर पढ़ नहीं पाया, या बेगम ने वह भाव उभरने ही नहीं दिए, मन के मन में रखे. इतना तो उन्हें आता था.

“कहो३ क्या है तुम्हारे मन में?”, 

बेगम ने सपाट भाव से पूछा. 

“हुजूर कहें तो...बुरा न मानें तो... हम लोग साथ-साथ काम करें. आप इस सल्तनत की मलिका बनें ...आधा-आधा बांट लेंगे पूरा हिंदुस्तान हम. आपको तो पता है कि शाह आलम इतने कमजोर हैं अब कि न वो, और न उनकी फौज हम लोगों का विरोध कर पाएगी.”

मारे गुस्से के बेगम समरू की मुट्ठियाँ तन गई. धमनियों में रुधिर का प्रवाह तेज हो चला, धडकनें असंयत हुई, पर उन्होंने स्वयं को नियंत्रित रखा. चेहरे के भाव प्रभावित न हो पायें, इतना तो नियंत्रण था उनका अपने ऊपर. बोली,

“कैसे संभव है यह नामुमकिन काम ?”

“कुछ भी नामुमकिन नहीं हुजूर... बस मेरे ऊपर छोड़ दें. सब पलक झपकते होगा...! समरू साहब इस मुल्क के आका न बन पाए तो क्या... आपको यह ताज मिलेगा, तभी तो उनकी रूह को सुकूं मिलेगा बेगम साहिबा!”,

ऐसे कहा गुलाम कादिर ने, जैसे बेगम इसी मौके की तलाश में हों. कहते हैं न कि धोखेबाज आदमी हमेशा प्रपंच की ही बात करता है. न जाने कब किसकी पीठ में छुरा घोंप दे. ऐसे चालबाजों के लिए न रिश्ता कोई मायने रखता है, न किसी से मुहब्बत, या मुल्क से वफादारी. बस षड्यंत्र, धोखा, और निजी स्वार्थ३! ऐसे लोगों से संबंध रखना बेगम का उसूल नहीं था. फिर भी, जब यह इंसान हिम्मत कर डेरे तक आया था, यह जानते हुए भी कि बेगम अपनी फौज के साथ उसको पछाड़ने के इरादे से आई हैं, तो उसके आने का असली मकसद यानी उसके मन में पनप रहे जहर को जानने में कोई हर्ज भी नहीं था. धूर्त इंसान को धूर्तता से परास्त करना भी बेहतर कूटनीति ही तो है. 

“यह होगा कैसे ?”, 

बेगम ने थोड़ा अविश्वास और थोड़ी लापरवाही से पूछा.

“वो सब आप मुझ पर छोडिये. बस साथ चाहिए मुझे... आपका और आपकी फौज का. बहन कहा है तो हक अदा करूँगा इस रिश्ते का. उस परवरदिगार का वास्ता”, 

उसने अपने दोनों कानों को हाथों से छू कर, फिर खुदा की इबादत में दोनों हाथ ऊपर की ओर उठा दिए. 

बेगम को प्रभावित न होना था, सो नहीं हुई. पर ऊपरी तौर पर उनमें उत्सुकता बनी रही. वह गुलाम कादिर की आँखों में नीचता, बगावत और कपटीपन की चमक महसूस कर सकती थी. बोली, 

“तफसील में समझाओ!”,

इसी बीच दो बांदियां आकर कुछ सूखे मेवों की तश्तरियां और तरह-तरह के फल तथा गुलाब का शरबत लेकर हाजिर हुई. बेगम ने इशारा किया तो बांदियों ने सब सामान मेहमान की मेज पर सजा दिया. खुद सिर्फ शर्बत का एक गिलास उन्होंने लिया.

“हुजूर... अर्ज है...”, 

कहा ही था गुलाम ने, कि बेगम ने कहा, 

“तखलिया”,

और अगले ही पल उनकी देखभाल में खड़े फौजी, और तमाम बांदियां, तंबू से बाहर हो चले.

“हां, अब बोलो. तुम्हारा राज भी तो राज ही रहना चाहिए गुलाम कादिर...”, 

थोड़ा आश्वस्त किया बेगम ने अपने इस बिन बुलाये मेहमान को.

रुहेला  सरदार बेगम की जर्रानवाजी और मेहमाननवाजी से पहले ही खुश था, अब वह और भी भरोसेमंद हो चला था. उसको दिल्ली की डगर बहुत आसान दिखने लगी थी, यह उसके चेहरे के भावों से भी दिख रहा था.

“जी साहिबा. होना यह है कि आप अपनी फौज के साथ किले पर धावा बोलेंगी और मैं शाह आलम हुजूर की तरफ से आपसे समझौते की बात करूंगा३ बाकी तो आप को पता ही है”,

गुलाम कादिर ने अपना तीर छोड़ दिया था.  

३ और रणनीति तय हो गई. 

भोर तडके गुलाम कादिर को अपनी फौज के साथ बेगम और उनकी फौज का जमुना के उस पार खैरमकदम करना था. ८५ सिपाहियों और गोला बारूद तथा युद्ध के नये तरीकों से ट्रेनिंग शुदा कादिर की यह पलटन तय समय पर निकल पडी. अब यह कोई नहीं जानता था कि उनकी किस्मत में क्या बदा था. ३यूँ कहिये कि शिकारी बहुत आराम से खुद जाल में फंस गया था. 

उसकी सैनिक टुकड़ी के अंतिम सैनिक के आते ही बेगम ने अपनी एक पलटन के कुछ अदद गिने-चुने सिपाहियों और असलहों के जोर पर गुलाम कादिर और उसकी पलटन के वापिसी के सब रास्तों को बंद करा दिया. उसके सपने टूट गये. वह ऐसी शिकस्त के लिए तैयार नहीं था.

शाह आलम को पता चला तो खुशी से उसकी आँखों में आंसू छलक गये. उसे बेगम से जिस दिलेरी की उम्मीद थी, वह उन्होंने कर दिखाया था. नाजुक वक्त पर उन्होंने सल्तनत के लिए वफादारी का सबूत दिया था. दिल्ली के तख्ते-ताज के आका यह भी जानते थे कि यदि बेगम समरू दिल की जगह दिमाग से काम लेती तो शायद अकूत संपत्ति की मालकिन तो होती ही, लाल किले के तख्त पर बैठ कर अपना हुक्म भी चला रही होती.

ऐसे नाजुक समय पर बेगम का वफादार बने रहना उसके चरित्र की उच्चता और शुद्धता को दर्शाता था. शहंशाह शाह आलम ने बेगम समरू को उनके इस कृत्य के लिए ‘जेब-उन-निसा”, यानी ‘मेरी प्रिय बेटी’ के खिताब से नवाजा. बेगम ने घोषणा भी की कि उसकी बाकी जिंदगी भी अगर दिल्ली दरबार के किसी काम आ सके, तो इससे बड़े सुकूं की बात उसके लिए कुछ और नहीं हो सकती. बेगम ने अपनी फौज को सम्राट और किले की सुरक्षा में लगा दिया था .

उधर रुहेला  सरदार गुलाम कादिर अपने उस वक्त को कोस रहा था, जब वह बेगम की बातों में आ गया था. उसने यमुना के पार अपने डेरे से दिल्ली की सल्तनत के सरताज शाह आलम को एक हरकारे के हाथों सन्देश भेजा. संदेश में लिखा था कि शहंशाह तत्काल बेगम समरू और उसकी फौज को वहां से बेदखल करे. ऐसा न करने के एवज में युद्ध के लिये तैयार रहने की भी चेतावनी दी गई थी. शाह आलम ने उसके इस संदेशे को उसी हिकारत की निगाह से रद्दी की टोकरी में फेंक दिया, जहाँ उसकी सही जगह थी. 

गुलाम कादिर में अभी भी हिम्मत बची थी. उसने अपनी सेना को फिर से तैयार किया और लाल किले की ओर बढ़ चला. यहाँ पहुँच कर उसने अपनी तोपों का मुंह किले की ओर कर गोले दागने के हुक्म भी दिए, पर उससे पहले ही बेगम की सेनाओं और उनकी तोपों की हलचल से कादिर की फौजों के हौसले पस्त हो गये. 

उधर इसी बीच खबर मिली कि शहजादा मिर्जा जवां बख्त एक बड़ी फौज लेकर राजधानी की तरफ बढे आ रहे हैं. इस खबर को जब उसके नाजिर ने गुलाम कादिर को बताया तो वह गहरी चिंता में पड़ गया. सोचने का समय नहीं था. अगर शहजादे की फौज आ गई, और उधर से मुगलों की बची फौज के साथ बेगम समरू की मजबूत फौज और गोला-बारूद का मतलब... क्या परिणाम बनता, यह वह अच्छे से महसूस कर सकता था. अंततः  उसने अपने नाजिर की सलाह मानते हुए एक चाल चली. 

इस सलाह के अनुसार, गुलाम कादिर ने अपनी ‘नासमझी’ और ‘गलतियों’ के लिए शहंशाह से माफी माँगी. उसने एक पेशकश के जरिये भारी मात्रा में खजाना भी वापिस किया, और छल से हथियाए गये दोआब के उन हिस्सों को भी दिल्ली की सल्तनत को वापिस कर दिया जो उसके लिए आमदनी का एक बेहतर जरिया थे. नाजिर के बार-बार इल्तिजा और खुशामद करने पर शहंशाह ने आखिरकार उसकी पेशकश स्वीकार कर ली. गुलाम कादिर के जमुना पार के डेरे पर उसके लिए शाही पोशाक भेजकर शर्तें मंजूर करने की सहमति दी गई. रुहेला  सरदार ने भी तुरंत दिल्ली छोड़ कर अपनी रियासत सहारनपुर के लिए कूच करने में ही भलाई समझी.

बेगम समरू यह सोच कर अपनी जागीर में लौट गई थी कि अब शायद दिल्ली की हुकूमत के बेहतर दिन आ जायेंगे. पर कुछ और ही लिखा था इस वंश के इतिहास में. बेगम समरू सम्राट को बुरा-भला समझाने के लिए दिल्ली में नहीं थी, और सम्राट के वारिस को नाजिर ने उनसे दूर करा दिया था. ऐसे में इस दरबार का खुदा ही मालिक था. न फौज मजबूत थी, और न राजा. ऐसे में दुश्मनों का सर उठाना लाजिमी था. 

इस समय सभी पठानों ने गुलाम कादिर के नेतृत्व में राजपूतों के सहयोग से पानीपत से पहले का अपना पूरा खेल पुनः आरम्भ कर दिया था. उन्होंने उत्तर भारत से मराठों को खदेड़ने के लिए काबुल के शाह को निमंत्रित किया था. इस प्रयास में दिल्ली के बादशाह की गुजरे जमाने की प्रिय बेगम वृद्धा मलिका जमानी भी उनके साथ आ गई थी. ऐसे में महाद जी ने अफगानों के शत्रु सिख रियासतों से मैत्री को बढ़ावा दिया, और उन्हें काफी समय तक सिंधु पार करने से रोके रखा था. मराठा योद्धा महाद जी शाह आलम की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे. इसी क्रम में उसने सम्राट को रेवाड़ी के अपने स्थान पर सुरक्षित लाने की भी व्यवस्था की. परन्तु शाह आलम को अब महाद जी की क्षमता पर संशय हो गया था, सो वह उसे साथ चलने के लिए राजी नहीं कर पाया. तब महाद जी अभागे सम्राट को भाग्याधीन छोड़ कर दिल्ली के समस्त इलाकों का त्याग करने के लिए विवश हो गया. दिसम्बर १७८७ में वह स्वयं चंबल के दक्षिण में वापिस चला गया, ताकि वह स्वयं को सुरक्षित रख सके. इस समय वैसे भी इस इलाके में केवल आगरा तथा अलीगढ़ की रक्षा करने वाली दुर्गस्थ मराठा सेनाएं ही रह गई थी. 

सन १७८८ के प्रथम तीन मासों में शिंदे को एक क्षण का भी विश्राम नसीब नहीं हुआ. अपनी सेनाओं को चंबल तक वापिस हटाकर उसने नये सिरे से व्यापक आक्रमण की धुआंधार तैयारियां शुरू कर दी थी. उसे अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को प्राप्त करना था. नाना फडनवीस द्वारा भेजी गई सेनाओं के अतिरिक्त उसने अपनी जन्मभूमि जामगांव से एक नवीन सेना की टुकड़ी पहुँचाने की पूर्व में ही इजाजत दे दी थी. नाना की सेनायें १६ मार्च १७८८ को पहुँची तथा रणनीति के अंतर्गत अप्रैल के प्रथम सप्ताह में उसने अपना आक्रमण आरम्भ कर दिया. रणजीत सिंह जाट, राना खां, और मछेरी के राव राजा की मदद से इस्माइल को परास्त किया गया देवजी गाऊली, डी बॉन  तथा रायजी पाटिल ने मिलकर मथुरा जिले पर पुनः अधिकार कर लिया गया. अब यमुना को पार कर गुलाम कादिर का पीछा करते हुए दोआब में प्रवेश कर लिया गया. पठानों ने आगरा के समीप डटकर सामना किया परन्तु जीवबा बख्शी तथा खाण्डेराव हरि ने संयुक्त सैन्य अभियान में उनका सफलतापूर्वक दमन कर दिया.

बाईस अप्रैल को चकसन के निकट भयानक युद्ध हुआ, परन्तु वह अनिर्णीत रहा. गुलाम कादिर को भाग कर अपनी जान बचानी पड़ी. इस्माइल बेग अकेला रह गया था और १८ जून को आगरा के उपनगर बाग देहरा में यमुना के तट पर  बुरी तरह हार गया. 

एक जुलाई १७८८ को मुगम साम्राज्य का महत्त्वपूर्ण कर्ता-धर्ता इस्माइल बेग अपने नेतृत्व वाली मुगल सेना के साथ दिल्ली के सम्मुख यमुना के दूसरे तट पर गुलाम कादिर के दरबार में उपस्थित हो गया. दोनों में समझौता हुआ जिसके अनुसार राजकोष तथा सम्राट की भूमियों पर अधिकार करने में गुलाम कादिर के लिए दो भाग तथा बेग के लिए एक भाग के अनुपात में परस्पर विभाजन करना नियत पाया गया. 

गुलाम कादिर मराठों को दिल्ली से भगा देने की प्रतिज्ञा कर दिल्ली में यमुना नदी के पार अपने शिविर में चला गया था. बाद में वह  दो हजार सैनिकों को लेकर वह पुनः उपस्थित हुआ और सम्राट को मीर बख्शी के पद के साथ ही प्रथानुसार वस्त्र सहित अमीरुलउमरा तथा रुक्नुदौला बहादुर की उपाधियाँ भी देने पर विवश कर दिया. १७ फरवरी १७८८ को उसने अलीगढ़ पर अधिकार कर लिया. शिंदे की १८ जून को बाग देहरा में हुई विजय पर गुलाम कादिर अत्यंत क्रोधित था. किस्मत से इस्माइल बेग उसी समय इस रोहिल्ले बागी के पास पहुंचा वह भी तब महाद जी शिंदे के कारण ही बहुत दुखी और दुरावस्था में था. 

रुहेला जागीरदार  गुलाम कादिर इस फिराक में था कि सल्तनत कमजोर हो, और वह अपने मंसूबे पूरे करने के लिए चोट पहुंचाए. हुकुमत के नाजिर मंजूर अली से यूँ भी उसका दोस्ताना था. ऐसे ही एक दिन उसने गुलाम की सेना को आराम से किले के भीतर आने की राह आसान कर दी. इन दोनों बागियों ने अपने रंग दिखाए और शहंशाह से खजाने की चाभियाँ माँगी. शाह आलम ने गुलाम कादिर को यकीन दिलाने की कोशिश की कि उसका खजाना बिल्कुल खाली है, लेकिन कादिर ने उसकी एक न सुनी, उल्टे और गुस्से में भर गया. उनको धकिया कर कारागार में बंद कर दिया गया.

गुलाम कादिर के सपने में दिल्ली का लाल किला वह जगह थी जहाँ सोने की अनगिनत छड़ें खजाने में दमक रही होंगी, मोतियों के संदूक भरे होंगे, हीरे-जवाहरात और अशर्फियों का अनगिनत खजाना मौजूद होगा, माणिक और पन्ने के बड़े-बड़े बक्सों की निगरानी की जाती होगी-- और यह सब खजाना उसका होना था. जब उसे इस खजाने का कोई रास्ता नहीं मिला तो क्रोध से पागल हुए इस लालची जागीरदार ने लाल किले के गुप्त कमरों के फर्शों की भी गहरी खुदाई कराई. पर जो नहीं था, वह मिलता कैसे! 

कमजोर, पीड़ित और सहमे हुए शहंशाह शाह आलम को कारागार से निकाल कर बुलाया गया. उसे फर्श पर बिठा कर फिर पूछताछ की गई. ठीक इसी समय बादलों से गरजती तेज आवाजों और गडगडाहटों के बीच मूसलाधार बारिश ने अपना तांडव दिखाया. लगता था कि यह खुदा ने गुलाम कादिर के अत्याचारों की नापसंदगी को दिखाने का अपना तरीका प्रदर्शित किया था. पर, गुलाम कादिर निहायत ही जल्लाद किस्म का इंसान था. उसे इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता था. उसने चीख कर कहा,

“बाखुदा, अगर तुमने अभी भी खजाने का पता नहीं बताया तो तुम्हें अपने इन्हें हाथों से मार डालूँगा..!”

इस पर इस्माइल बेग ने कादिर खां के गुस्से को सम्भाला. बूढ़े शहंशाह पर दया कर उनके ही इस  पुराने वफादार मुलाजिम ने, जो बागियों से जा मिला था, गुलाम कादिर को इस बात के लिए तय करा लिया कि उसे बंधक बनाये गये बेटों के पास मोती मस्जिद में ही कैद कर दिया जाए. 

रोहिल्लों की कार्ययोजनाओं का मुख्य समर्थक सम्राट का विश्वस्त सेवक, अंतःपुर का अध्यक्ष तथा शिंदे का घोर शत्रु मंसूर अली था. अगली सुबह फिर कहर बन कर आई थी. आज फिर शहंशाह को दीवान-ए-खास में तलब किया गया. फिर गुलाम कादिर ने छिपे खजाने की तहकीकात की. फिर वही चीख-पुकार, क्रोध और बदतमीजी के दौर. और फिर मुगल सम्राट की वही कसमें, कि उसके पास कुछ भी नहीं है. 

इसी बीच कादिर खां ने अपने एक सिपहसलाहकार को सलीमगढ़ जाने का हुक्म दिया. जमुना के उस पार एक टापू में स्थित सलीमगढ़ के इस किले को जेल की भांति इस्तेमाल किया जा रहा था. उस जेल से पूर्व शहंशाह अहमद शाह के वारिस बड़े बेटे बिदार बख्त को लाया गया. यह मुगल वंशज अपने जीवन का अधिकांश समय जेल की कोठरी में बिता कर ही बूढा हुआ जा रहा था. उसने फटी आँखों से खुद को अचानक ‘जहाँ शाह-- हिंदुस्तान का बादशाह’ के रूप में तख्त-ए-ताज पर बैठा पाया. जिसका अभी तक इस तख्त पर वाकई हक था, उसे अपदस्थ किया जा चुका था.  

एक प्रताड़ना और दमन के रूप में हाल ही में अपदस्थ किये गये मुगल शहंशाह और उसके बेटे सलीमगढ़ जेल में बंदी बना कर सींखचों के पीछे डाल दिए गये थे. वे तीन दिन से वहां भूखे-प्यासे बंद थे. इसी बीच नये शहंशाह ने अपने को नई भूमिका के खांचे में ढाल लिया था. वह किले में घूम-घूम कर कारिंदों पर हुक्म चलाने लगा. पर उसके हुक्म को मानने वाले लोग वहां नहीं थे, बल्कि हिकारत की निगाह से देखने वाले लोग बहुतायत में थे. 

लाहौरी गेट को थोड़ी अवधि के लिए खुला रखा गया. इस गेट से आक्रमणकर्ता की फौज के वे सिपाही भीतर लिए गये, जो किन्हीं कारणों से बाहर ही रह गये थे. हालांकि बादशाह जहाँ शाह था, पर सिक्का गुलाम कादिर का चल रहा था. उसने आतंक, बर्बरता और क्रूरता का ऐसा माहौल बनाया हुआ था, कि लोग थरथरा उठे. यह ऐसी बर्बरता थी जिसका दुनिया के इतिहास में कम ही विवरण दर्ज होगा. हर कमरे, तहखाने, सन्दूकों और उन जगहों को खाली किया गया जहाँ खजाना छिपा होने की उम्मीद थी. शाही महल, उनमें बने दरबारियों और अधिकारियों के आवास, नौकरों के रहने के कमरे और यहाँ तक कि शाही बावर्चीखाने को भी नहीं बख्शा गया.  

इसके बाद जनानखाने को तहस-नहस करने की बारी थी. अभी तक लोग नादिर शाह और अहमद शाह दुर्रानी को आततायी और जालिम मानते थे, पर गुलाम कादिर ने वह हदें भी पार कर दी थी जिनका उन लुटेरों ने सम्मान किया था. उसने वहां रह रही शाही खानदान की दो मलिकाओं और खूबसूरत स्त्रियों के साथ हर वो नापाक हरकत की जो कोई भला आदमी सोच भी नहीं सकता था. पर पहली बार की लूट में कुछ हाथ न लगा. 

तब गुलाम कादिर ने दोबारा जनाना महल की तलाशी का हुक्म दिया. वहां की औरतों की जामा तलाशी और दीवारों तथा फर्श को भी खोद कर छिपा खजाना निकालने का हुक्म हुआ. इस बार तलाशी के लिए जिन बर्बर लुटेरों को लगाया गया था, उन्हें थोड़ी सफलता मिली. दरअसल यह सफलता उनकी कम, और धूर्तता तथा चालाकी का परिणाम अधिक थी. अपदस्थ शहंशाह की दो बूढी बेगमों ने इस तलाशी का जिम्मा लिया, बशर्ते कि लूट के इस माल में उन्हें भी थोड़ा हिस्सा मिले. 

जिस शहंशाह के पास खाने के लाले हों, और वह वाकई में बहुत गरीबी में गुजर-बसर कर रहा हो, उसके जनानखाने में खजाने का मिलना एक बड़ी बात था. पर सच्चाई यही थी, कि शहंशाह का उस तथाकथित खजाने से कुछ लेना-देना नहीं था. 

यह वह खजाना था जिसे हर औरत अपने शौहर की जानकारी या बिना जानकारी के जोड़ा करती है. पर मामला चूँकि शाही खानदान की स्त्रियों से जुडा था, तो यह माल इतना भी कम नहीं था. विलाप करती औरतों की आँखों के सामने से उनके चुनींदा गहनों, अशर्फियों, जवाहरातों आदि को एक जगह पर इकठ्ठा किया गया. अभी तक न तो नादिर शाह और न ही अहमद शाह अब्दाली जैसे लुटेरों ने इस तरह सोचा था. पर गुलाम कादिर इन सब से आगे बढ़ चुका था. इसलिए उसके लिए कोई हदें शेष नहीं बची थी.

शाह आलम ने अगली बार फिर भी जब किसी छिपे खजाने होने की बात से इन्कार किया तो उसने उन शहजादियों को पेश करने को कहा. पहले उन्हें बेनकाब किया गया, फिर एक-एक कर कपडे उतरवाने को मजबूर किया. रोहिल्लाओं को खुश करने के लिए उनसे अपने पिता की आँखों के सामने उनसे नग्न नृत्य कराया गया. कुछ शहजादियाँ इतनी ग्लान हुई कि उन्होंने पास ही बह रही यमुना नदी में छलांग लगा दी. शाह आलम दुःख और क्रोध मिश्रित भावनाओं में डूबे सर झुकाए बैठे रहे. पर खजाने को लेकर, अभी भी उनका उत्तर वही था. चूँकि उनको वाकई किसी खजाने का इल्म नहीं था.

हालांकि इस्माइल बेग इस शाही लूट में गुलाम कादिर के साथ था, पर इस तरह की बर्बरता के नंगे नाच से वह भी आहत हो चला था. शाही खानदान की बेटियों के साथ किये गये इस अमानवीय बर्ताव का उसने विरोध तो किया ही, अपना आक्रोश भी दर्ज कराया. जब उसकी नहीं सुनी गई तो उसने अपनी सैन्य टुकड़ी को लाल किले से हटा लिया, खुद उसके साथ निजामुद्दीन की दरगाह के पास डेरा डाल  दिया. कुछ रोहिल्ला लड़ाका भी इस कृत्य के विरोध में थे, पर किसी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह अपना विरोध दर्ज करा पाते. 

कहते हैं कि इस्माइल बेग सम्राट के विरुद्ध गुलाम कादिर के कठोर कृत्यों तथा विवश सम्राट और उसके परिवार के अपमान का कभी भी हृदय से समर्थन नहीं करता था. परन्तु यह भी उतना ही सही है कि यदि बेग गुलाम कादिर का साथ न देता तो उसे पठानों के नाम पर सदा-सर्वदा के लिए कलंक का टीका लगाने वाले अमानुषी अत्याचार करने का साहस नहीं हो सकता था.  

पर गुलाम कादिर के जुल्म की इन्तहा अभी होनी बाकी थी. 

यह समय गुलाम कादिर के आतंक का मुंहतोड़ जवाब देने का था. पर दुर्भाग्य था कि महादजी शिंदे और बेगम समरू दोनों ही आसपास नहीं थे. महाद जी शिंदे मथुरा में डेरा डाले थे, जबकि बेगम जॉर्ज  थॉमस के साथ टप्पल को सुलझाने में उलझी थी. एक से अधिक कारणों से शिंदे तत्काल मथुरा छोड़कर अपनी सेना को लेकर लाल किले तक पहुँचने की स्थिति में नहीं था. पर उसको एक उपाय सूझा. शिंदे ने बेगम समरू के पास अपना सन्देश भिजवाया. उसने अनुरोध किया कि संकट की इस घड़ी में चूँकि वह दूर है, अतः बेगम उसकी जगह शहंशाह को स्थिति से उबारने में मदद करे. 

फरजाना उर्फ बेगम समरू टप्पल की नई जागीर को संभालने में व्यस्त थी. टप्पल उन दिनों एक उजड्ड इलाका था, जो व्यवहारिक तौर पर डाकुओं और लुटेरों के कब्जे में था. उसको संभालना आसान नहीं था. उधर बेगम को नहीं पता था कि गुलाम कादिर ने लाल किले में जाकर क्या-क्या गुल खिलाये हैं. जॉर्ज थॉमस के साथ वह टप्पल की स्थिति, उसके किले, भूगोल और लोगों से वाकिफ हो रही थी. टप्पल के किले को रहने लायक बनाने में बहुत खर्चा आना था, उसका आकलन किया जा रहा था. कहाँ से कितना महसूल वसूला जा सकता था, इस पर भी विचार किया जा रहा था. और यह सब इतना आसान भी नहीं था, क्योंकि टप्पल की स्थिति सरधना से काफी भिन्न थी. 

जॉर्ज थॉमस की बात अलग थी. वह ऐसे जंगली और रेतीली इलाकों से मुहब्बत करता था. साथ ही इलाके में डकैतों की भरमार से उसे कुछ दुस्साहसी लोगों से मुकाबले का रोमांच भी आकर्षक लग रहा था. बेगम का सोचना अलग था. वह इस जागीर को लेकर दुविधा में थी. यह वह जगह थी जिसका कोई मालिक नहीं था. ऐसा इसलिए था कि यह न इलाका न जाने कितनी भुखमरियों और लूटों का गवाह रह चुका था. यहाँ का वातावरण लम्बे समय तक रुक कर, और सख्ती से ही सही किया जा सकता था. काफी पैसा झोंक कर स्थानीय दुर्ग को रहने लायक बनाया जाना था. इलाके में इतनी निर्धनता और कम जनसंख्या थी कि खेतों में न कोई फसल थी, और न ही नहरों में पानी. गाँवों के लोग हमेशा डकैतों के डर के साए में रहते थे. 

जॉर्ज पारखी था. इस जागीर में वह अपना भविष्य देख रहा था. उसने बेगम से अनुरोध किया. पर बेगम को अभी भी हिचकिचाहट थी. टप्पल सरधना से कोई नजदीक न था. अभी जिस यात्रा को कर वह यहाँ आई थी, उसकी थकान अब तक भी उसके शरीर में मौजूद थी. वह समझ सकती थी कि सरधना के साथ इसको संभालना कितनी बड़ी चुनौती हो सकती थी. थॉमस के अनुरोध पर अनमने ढंग से ही सही, बेगम उसे टप्पल की इस जागीर का गवर्नर बनाने के लिए राजी हो गई. शाह आलम ने पहले ही इस जागीर को स्वीकृति दे दी थी. बीच में महाद जी शिंदे का दिल्ली पहुँचने का सन्देश भी बेगम को मिला था, परन्तु कुछ भी स्पष्ट नहीं था. इसलिए टप्पल की जागीर पर कोई अंतिम निर्णय किये बिना वहां से आने की बेगम की कोई तात्कालिक योजना नहीं दिखती थी. 

उधर लाल किले में गुलाम कादिर का आतंक जारी था. उसने शाह आलम से फिर कहा,

“मुझे स्वर्ण भंडार, हीरे-जवाहरात और मुद्राएँ चाहियें३ वरना यकीन मानो कि तुम यहाँ से मुर्दा ही ले जाए जाओगे!”

शाह आलम तन और मन से कमजोर हो चला था, पर उसका स्वाभिमान अभी भी जिंदा था.  उसकी आँखों में अंगार बरस रहा था, उसी अंगार को भाव में बदलते हुए उस दिन अपमानित शाह आलम ने दहाड़ते हुए कहा,

“मेरी जिंदगी तुम्हारे हाथ में है गुलाम. चलाओ तलवार और कर दो मेरी गर्दन धड से अलग. वैसे भी तुम्हारे अधीन जिंदगी गुजारने से ज्यादा तौहीन की बात और कुछ हो भी नहीं सकती मेरे लिए!”

नजीबुदौल्ला का पौत्र मूलतः अफगानी रोहिल्ला वंश का प्रमुख गुलाम कादिर पठान वंश का मुखिया था, इसलिए उसमें एक पठान के नैसर्गिक गुण होने स्वाभाविक थे. दया, लज्जा, अथवा सत्यप्रियता का उसमें अभाव था.अपने पितामह और पानीपत के युद्ध के चर्चित योद्धा नजीबुदौल्ला की षड्यंत्रकारी प्रतिभा तो उसे उत्तराधिकार में मिली थी, परन्तु निश्चित रूप से उस जैसी बुद्धि या पूर्वदृष्टि उसके इस पोते के पास नहीं थी. अपने पिता की रियासत पर अधिकार प्राप्त करते ही उसने अपने वृहद परिवार के उन अनेक व्यक्तियों को प्राण दंड दे दिया था जो उसके सामने किसी न किसी रूप में चुनौती बन कर सामने आ सकते थे. अवगुणों में से एक मदिरा का अभ्यासी होना भी उसकी महत्त्वाकांक्षाओं का निषेध करने में सहायक था. वह पिता जाबिता खान से अधिक पितामह नजीबुदौल्ला का अनुकरण करना चाहता था. उसको यह गलतफहमी अहंकार की सीमा तक हो चली थी कि ईश्वर ने उसको अपने वीर अफगान-जाति भाइयों की सहायता द्वारा मुगल राजवंश से समस्त हिन्दू प्रभाव निकालकर उनको शुद्ध करने के लिए ही जन्म दिया है. जब तक वह साम्राज्यवादियों द्वारा अपने घर तथा राजधानी से अपहृत प्रत्येक वस्तु प्राप्त न कर ले, उसकी अफगानी प्रतिशोध-भावना शांत होने वाली नहीं थी. यही कारण है कि मुगल सम्राट के राजपरिवार की महिलाओं के साथ की गई बर्बरताओं, अकथनीय यातनाओं और अपमानों की समता करने वाली ऐसी घटनाएँ इस्लाम के रक्तरंजित इतिहास में भी ढूंढे से नहीं मिलेंगी. 

बेबस और घायल शहंशाह के मुंह से ऐसे शब्द सुनकर गुलाम कादिर का गुस्सा वैसे ही सातवें आसमान पर पहुँच गया. वह छलांग मारकर उसके सीने पर चढ़ बैठा. उसके दो सिपहसलारों ने शाह आलम के हाथ और पैर कस कर पकड़ लिए. गुलाम कादिर के कहने पर उनमे से एक-- कंधारी खां ने राजा की एक आँख नोच ली. असह्य दर्द की पीड़ा से छटपटाते शहंशाह पर किसी को दया नहीं आई. अब बिलबिलाते शाह आलम की दूसरी आँख भी नोच ली गई. बेबस शहंशाह दर्द से चिंघाड़ उठा. उसकी बर्बरता यहीं नहीं रुकी. गुलाम कादिर ने तत्काल एक चित्रकार को बुलाये जाने का हुक्म दिया. आदेश दिया गया कि वह सम्राट के सीने पर चढ़े कादिर खां की उसकी आँखों को नोचने की मुद्रा की एक अच्छी पेंटिंग बनाए. 

गुलाम कादिर की इन वहशियाना हरकतों से आजिज पश्चाताप की आग में जल रहे इस्माइल बेग की दुविधाएं दोतरफा थीं.  पर अब उसने  आततायी का साथ छोड़ने का मन बना लिया था. बेग ने अब सीधे महाद जी शिंदे को संदेशा भिजवाया, जिसमें गुलाम कादिर की बर्बरता का हवाला दिया गया. अपनी गलतियों और भूमिका की क्षमा याचना भी की और यकीन दिलाया कि इस आततायी के विरुद्ध किसी भी अभियान में वह मराठा सैनिकों के साथ होगा. अब उसने लाल किले  में हो रहे तांडव की गतिविधियों से अनभिज्ञ दिल्ली की जनता को इस अभियान के लिए एकजुट करना भी शुरू किया. 

संदेशा मिलते ही शिंदे ने दिल्ली कूच की तैयारी की. हालांकि बरसात के मौसम में सेना का आवागमन सबसे दुरूह काम था. उसके सिपाही अपनी बकाया तनख्वाह मिले बिना मथुरा छोड़ने को तैयार नहीं थे. शिंदे खुद बीमार था, और बाद में दिल्ली पहुंचना चाहता था. फिर भी उसने अपने विश्वस्त सैन्य अधिकारी डी बॉन के नेतृत्व में एक तेज तर्रार बटालियन को तत्काल दिल्ली रवाना कर दिया. 

बेगम समरू और जॉर्ज थॉमस ने लाल किले के घटनाक्रम से वाकिफ होते ही टप्पल छोड़ दिया. पर वह भी बारिश, कीचड़ और बरसाती पानी की बाधाओं से परेशान थे. बस एक अच्छी बात यह थी कि टप्पल और आसपास के इलाकों के रेतीले होने के कारण वहां पानी का बहाव कम था. इसके अलावा रेन्हार्ट समरू और फिर उनकी बेगम ने स्वयं समय-समय पर इलाके में सरधना की तरह बाँध बनवाये थे, तथा पानी निकासी की व्यवस्थायें सुनिश्चित कराई थी. वे सभी बाधाओं को पार करते हुए तेजी से सरधना पहुंचे जहाँ उन्हें सेना की तीन बटालियनें तैयार करनी थी. सरधना के सिपाही जमुना के पश्चिम तट के रास्ते दिल्ली में सेंध लगा चुके थे. इस प्रकार गहरे कत्थई रंग की वर्दी में बेगम समरू की फौज के सिपाही भी दिल्ली की सीमा पर आ पहुंचे थे.

लाल किले के शाही महल में गुलाम कादिर का कब्जा था. उसने अपने ऐशो आराम के सब साधन जुटा लिए थे. शाही खानदान की स्त्रियों के साथ जो भी बेहूदा हरकतें हो सकती थी, की जा रही थीं. दुर्भाग्य यह भी था कि यह सब अंधे, बीमार, व्यथित और बेबस मुगल सम्राट शाह आलम की आँखों के सामने किया जा रहा था. बिदार बख्त को भी बेइज्जत कर बेदखल कर दिया गया था.  शाही परिवार की कुछ औरतें और पुरुष सदमे से, कुछ चोटों से, कुछ भूख से और कुछ आत्महत्या कर जान गँवा चुके थे. 

चैबीस जुलाई को ही शाह आलम को इस रुहेले आक्रांता की तमाम गैर-जरूरी मांगों को स्वीकार कर लिया था. अनमने ढंग से ही सही. सम्राट ने वचन पालन करने के लिए अपने प्रिय पुत्र सुलेमान शिकोह को शरीर-बंधक रूप में गुलाम कादिर को सौंप दिया था. गुलाम कादिर तथा इस्माइल बेग ने दुर्ग तथा शाही महल पर अधिकार करके शाह आलम को एक छोटी-सी मस्जिद में बंद कर दिया था. राजकोष से हर उस वस्तु को लूटा जा रहा था, जो किसी मूल्य की रही थी. कुल ६८ दिनों तक यह तांडव होता रहा. भारत के एक समय सत्ता का केंद्र रहे लाल किले और मुगल परिवार के मुखिया शहंशाह शाह आलम और उसकी सल्तनत सीधे ऐसे निशाने पर थी जिससे आम जनता नावाकिफ-सी थी. 

दस अगस्त को शाह आलम की आँखें नोंचने के बाद नन्हे-नन्हे बच्चों और असहाय स्त्रियों को कई-कई दिनों तक अन्न-जल नहीं दिया गया. शहजादों को सरेआम बेंत लगाए जाते, शहजादियों के साथ बलात्कार किये गये और कारिंदों को तब तक पीटा जाता रहा, जब तक कि वह मर न गये. गुप्त धन का पता लगाने के लिए राजभवन का सारा क्षेत्र तथा नगर में धनिकों के सब घर गहरे खोद डाले गए. इस सुंदर लालकिले, राजभवन और शहर में इन नौ सप्ताह तक नरकीय दृश्य दिखने आम थे. रुहेलों की कामपिपासा को शांत करने के लिए अल्पव्यस्क सुन्दरियों का बलिदान कर दिया गया. दासियों को यातनाएं दी गई, और हिजड़ों को मार डाला गया, क्योंकि उन्होंने गुप्त धन नहीं बताया था. जो मर गये, उनके अंतिम संस्कार तक नहीं हुए. मलिका जमानी और साहिबा महल के प्रासाद भी खोद दिए गये. सम्राट की उन प्रिय बेगमों का सर्वसाधारण के समक्ष नग्न प्रदर्शन किया गया. इस तांडव में कुल इक्कीस व्यक्तियों की मृत्यु दर्ज की गई. 

अब काफी समय हो चुका था. धीरे-धीरे राजधानी में इन खबरों की हलचलें होने लगी थी. उधर महाद जी शिंदे को भी घटनाक्रम की स्पष्ट जानकारी प्राप्त हो चुकी थी. यह २८ सितम्बर की तारीख थी. इस्माइल बेग, महाद जी शिंदे और बेगम समरू की सेनाओं ने शाहजहांनाबाद के सारे दरवाजों को घेर लिया. यह वही जगह थी जिसे आज हम पुरानी दिल्ली के इलाके के नाम से जानते हैं. यह पूरा अभियान मराठा जनरल राणा खां के नेतृत्व में चलाया गया. उसे ऐसे अवसरों का बेहतर अनुभव था. अगले दिन उसने अपनी सेनाओं को शहर में सारे महत्त्वपूर्ण ठिकानों पर तैनात भी कर दिया था. 

तब तक सितम्बर का अंतिम सप्ताह आ चुका था. हालांकि बारिश का पानी कम हो रहा था, पर यमुना नदी अभी भी उफान पर थी. फिलहाल यमुना पार कर लाल किले तक पहुंचना असंभव था. बेगम ने जुगत भिड़ाई. उसको वहां जाना था, इसलिए रास्ता निकालना ही था. अंततः दिल्ली से बमुश्किल २५ मील उत्तर दिशा में पुराने बागपत शहर में एक कटान से उस पार जाने का बेहतर मार्ग दिखाई दिया. जितनी नावें मिल सकती थी, मंगाई गई, और सिपाहियों, अधिकारियों तथा घोड़ों की जान जोखिम में डाल कर नदी पार करा दी गई. 

शिंदे ने भी अपनी मजबूत सेना के साथ दोआब के इलाके में प्रवेश कर लिया था. जब उसे इन दर्दनाक घटनाओं की जानकारी मिली तो शिंदे ने बिना वक्त जाया किये अपनी फौज के जनरल राणा खां को सम्राट को बागियों के चंगुल से छुडाने के लिए रवाना किया. उधर बेगम समरू की फौज ने भी कमर कस रखी थी. कादिर के आतंक की हुकूमत अब अधिक देर नहीं ठहरनी थी. गुलाम कादिर को समझ आ गया था कि अब उसका वक्त खत्म होने को है. किले में लगातार रहने का अर्थ होता युद्ध-- और किसी बड़े युद्ध के लिए वह तैयार नहीं था. सो, उसने जो भी बहुमूल्य सामान हाथ लगा, उसके साथ हडबडाहट में मेरठ के रास्ते लौटने की तैयारी की. उसका कठपुतली सम्राट और कुख्यात नाजिर भी साथ ही था. 

वह गुलाम कादिर की खुशनसीबी ही थी कि वह आनन-फानन में दिल्ली का लाल किला खाली कर भाग निकला था. गुलाम कादिर द्वारा किये हुए अत्याचारों का समय २९ जुलाई से लालकिले के बारूदखाने में आग लगने वाले दिन, अर्थात १० अक्टूबर १७८८ तक बताया जता है. मराठा फौज के जनरल राणे खां ने जितना जल्दी हो सकता था, लाल किले पहुंचकर शहंशाह शाह आलम को बेड़ियों से मुक्त कराया. उनको फिर से सम्राट घोषित किया. महाराजा के शानो-शौकत के सभी पुख्ता इंतजाम फिर से बहाल किये और उनकी आँखों के इलाज की भी व्यवस्था की. फिर उसने बागियों की घेराबंदी की योजना को अंजाम दिया. शिंदे के निर्देश थे कि गुलाम कादिर को जिंदा पकड़ कर उसके पापों की मुकम्मिल सजा दी जाएगी.

कुछ लोग महाद जी शिंदे और बेगम समरू द्वारा दिल्ली पहुँचने में हुए विलंब के इस प्रकरण को संदेह की दृष्टि से देखते हैं. कहते हैं कि शिंदे ने दिल्ली पहुँचने में जान-बूझ कर विलंब किया. उसके कई कारण बताये गये. खास तौर से यह आज तक कोई नहीं जान पाया कि क्या वह वाकई ही बीमार था. पर कोई इस निष्कर्ष पर भी नहीं पहुंचा कि मुगल सम्राट को दिल से मान देने वाला यह योद्धा क्यों संकट के समय उसकी मदद नहीं करना चाहता था. बेगम समरू तो वाकई उस समय टप्पल में थी, पर क्या टप्पल को उस हाल में छोड़कर सम्राट को संकट से उबारने नहीं आया जा सकता था? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है.

दस अक्टूबर को रुहेले सिपाहियों की लापरवाही से किले के बारूदखाने में विस्फोट हुआ था. इसे अशुभ संकेत मानकर गुलाम कादिर ने लूट के माल को लेकर किला खाली कर दिया. अगले ही दिन, यानि ग्यारह अक्टूबर को राणा खां, हिम्मत बहादुर गोसाईं, तथा रानाजी शिंदे ने लाल किला में प्रवेश किया. उन्होंने भूखे निवासियों को भोजन दिया तथा महल में रहने वालों के लिए यथाशक्ति सभी आवश्यक सुविधाएँ मुहैय्या कराई. सोलह अक्टूबर को राणा खां अंधे सम्राट के सम्मुख उपस्थित हुआ. उसने सम्राट को राजगद्दी पर बिठाया और उसके नाम से पुनः खुतबा पढ़ाया गया. 

भागते हुए रुहेले आततायियों का पीछा किया गया. पर वह लोग इधर-उधर हो गये थे. मराठों ने २० अक्टूबर को अलीगढ़ के दुर्ग पर अधिकार कर लिया. राणा खां दो सप्ताह तक लाल किले की व्यवस्थाएं सुचारू करने और पीड़ितों को सहायता पहुंचाने में व्यस्त रहा. वह फिर से भगोड़े रुहेलों का पीछा करने के लिए तीन नवम्बर को दिल्ली से रवाना हुआ. २७ नवम्बर को अली बहादुर भी इस अभियान में राणा खां के साथ हो लिया. वह महाद जी शिंदे की ओर से संदेश लाया था कि ‘दिल्ली के लुटेरे’ को पकड़ने का श्रेय यथासंभव अली बहादुर को दिया जाए. 

दोआब से भागता हुआ गुलाम कादिर चार नवम्बर को मेरठ पहुंचा. वह वहां के गढ़ में शरण लेकर अत्यंत साहस से अपनी रक्षा करता रहा. मेरठ के समस्त मार्ग रोक दिए गये. लगभग छह सप्ताह तक उसने मराठा आक्रमणों का भरपूर प्रतिरोध किया. अंत में असुरक्षित तथा असमर्थ जान गुलाम कादिर  १७ दिसम्बर को चुपचाप गढ़ से भाग निकला तथा शामली के तीन मील दक्षिण-पश्चिम गाँव बामनौली में एक ब्राह्मण के घर अपने कुछ अनुचरों के साथ छिप गया. गुलाम कादिर के दो साथी-- मंसूर अली खां नाजिर तथा उसकी अंगरक्षक सेना का कमांडर मनियार सिंह मेरठ में पकड लिए गये. ब्राह्मण ने गुलाम कादिर के गुप्त स्थान का पता अली बहादुर को पहुंचा दिया. 

१९ दिसम्बर को गुलाम कादिर तथा उसके सहोगियों को पकड़ लिया गया. अन्य बंदियों के साथ उसे ३१ दिसम्बर को पहले मथुरा स्थित महाद जी के शिविर में पहुंचाया गया. दो महीने तक महाद जी ने प्रयत्न किया कि वह बंदियों से बलपूर्वक यथासंभव धन तथा अन्य जानकारी प्राप्त करें. महाद जी ने इस बीच गुलाम कादिर को दिए जाने वाले दंड पर भी विचार किया. हालांकि महाद जी उसे मृत्यु दंड नहीं देना चाहता था, परन्तु बाद की परिस्थितियाँ ऐसी हुई कि उसे भयानक दंड देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.

उसे लोहे के आदमकद पिंजरे में डाल दिया गया. उसको लाने की सवारी बैलगाड़ी को बनाया गया. उसमें लाद कर गुलाम को दिल्ली लाया गया. उसके पैरों, हाथों और गर्दन में लोहे की भारी-भारी सांकलें मजबूती से डाली गई थीं. एक हजार घुड़सवार और दो फौजी बटालियनों की सुरक्षा में लाये गये गुलाम कादिर की पेशी अंधे सम्राट के सामने उसी लाल किले में हुई जहाँ उसने बर्बरता का तांडव किया था.  

गुलाम कादिर की जुबान जैसे हलक में अटक गई हो. वह थर-थर काँप रहा था. महाद जी शिंदे भी वहीँ थे. उन्होंने कहा,

“तुम जैसे अहसान फरामोश आदमी की सूरत मुझे बार-बार देखनी पड़ रही है, इस बात का भी अफसोस है मुझे..! बोल, क्या सुलूक किया जाए तेरे साथ?”

पर, गुलाम कादिर की हिम्मत के साथ-साथ उसकी जुबान भी साथ नहीं दे पा रही थी. उसने एक झलक कातर निगाहों से देखा, फिर नजरें जमीन की ओर गड़ा ली. आखिरकार शिंदे को ही कहना पडा, 

“मुंह काला करो इस नामुराद का!”

और देखते ही देखते उसके मुंह को काला कर दिया गया. 

भुतहा बने गुलाम कादिर की शक्ल किसी जानवर-सी हो गई थी. 

“तुमको अपने लिए अच्छी बातें सुनने का बहुत शौक है न...? सिपाहियों... काट दो इसके दोनों कान!”,

शिंदे ने सिपाहियों को हुक्म दिया. 

३ और उसके दोनों कानों को चेहरे से अलग कर दिया गया. एक भयानक चिंघाड़ के साथ, गुलाम कादिर दर्द से बिलबिलाता रहा, लेकिन किसी की भी हमदर्दी उसके साथ न थी.

अब उसको शिंदे के डेरे के इर्द-गिर्द घुमाया गया. इतने पर भी शिंदे का मन नहीं भरा. उसने गुलाम कादिर को पूरे शहर में घुमाने का हुक्म दिया ताकि लोग देखें कि बगावत, बर्बरता, बे-अमनी  और लालच का क्या हश्र होता है!

शहर भर के लोगों ने गुलाम कादिर को इस रूप में भी देखा. 

अगले दिन फिर गुलाम कादिर को पेश किया गया. 

आज उसकी नाक और ऊपरी होंठ को उखाड़ कर अलग किया गया. शहर भर में फिर से उसकी परेड कराई गई. 

तीसरे दिन उसको जमीन पर फेंक दिया गया तथा वही सुलूक किया गया जो उसने शहंशाह शाह आलम के साथ किया था. उसकी दोनों आँखें नोच ली गई. फिर डुगडुगी बजा कर उसे पूरे शहर में घुमाया गया. 

बाद में उसके हाथ काटे गये, फिर दोनों पैरों को शरीर से अलग किया गया. उसकी चिंघाड़ दूर-दूर तक सुनी जा सकती थी. 

आखिरकार गुलाम कादिर का धड़ शरीर से अलग कर दिया गया. उसकी रूह आजाद हो गई थी. बाद में शिंदे ने अपने मालिक शहंशाह शाह आलम को गुलाम कादिर के नाक-कान और कटे हुए सर की सौगात पेश की. 

धूर्त नाजिर जो गुलाम कादिर का भेदिया और साथी था, को भी हाथी के पैरों तले कुचलने की सजा सुनाई गई. सम्राट ने बिदार बख्त का भी कत्ल करने का हुक्म दिया, जिसे गुलाम कादिर ने दिल्ली के तख्त पर बिठा दिया था. शाह आलम ने महाद जी को हार्दिक धन्यवाद दिया. मथुरा तथा वृन्दावन के तीर्थस्थलों का शासन महाद जी शिंदे को दिए जाने की घोषणा से उनको पुरुस्कृत भी किया गया. सम्राट को इस बात का अफसोस रहा कि उसके नियन्त्रण में न होने के कारण प्रयाग, बनारस तथा गया के तीर्थस्थान महाद जी के नाम नहीं किये जा सके. 

उधर गुलाम कादिर की माता तथा उसके भाई लूट का माल लेकर सिखों की शरण प्राप्त करने की इच्छा से कुंजपुरा की ओर भाग निकले थे. रायजी पाटिल तथा अली बहादुर ने उनका पीछा किया तथा वह सब बहुमूल्य सामान बरामद करने में सफलता प्राप्त कर ली, जो कादिर ने लाल किले के शाही परिवार से धोखे और बल से प्राप्त किया था. इसी प्रकार घौसगढ़, अलीगढ़ तथा सहारनपुर के रुहेला अधिकृत प्रदेशों पर अधिकार करके वहां मराठा सेनायें रख दी गई. गुलाम कादिर के विभिन्न सहयोगी सरदारों का पता लगाकर उन्हें दण्डित किया गया.  

गुलाम कादिर का मामला धीरे-धीरे शांत हो गया था, लाल किले में बहुत कुछ घटित हुआ था. पर अब वहां भी शांति थी. इस पूरे समय में बेगम समरू ने मुगल सम्राट शाह आलम को समर्पण भाव से साथ दिया. 


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रामावतार त्यागी

- डाॅ. सुरेश गौतम

- डाॅ वीणा गौतम


प्रयोगवादी धारा के पश्चात् हिंदी गीतिधारा मे गीतकारों का जो वर्ग साहित्यिक मंच पर उभर कर सामने आया उनमें रामावतार त्यागी का स्वर अन्य कवियों से सर्वथा भिन्न सुनाई पड़ता है। गीति-क्षेत्र की जिस परंपरा से आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर त्यागी जी चले उसमें वे निस्संदेह सफल हुए हैं। ये नई अनुभूति के समृद्ध गीत-कवि हैं। उन्होंने जीवन मे सौंदर्य और विकृति दोनों को महत्त्व दिया है। उनके गीतों में चित्रात्मकता है। उन्होंने समाज की पीड़ा, तिरस्कार और घृणा को संवेदना की भूमि में अनुभूत किया है। उन्हें अपने अहं पर आस्था है। उनके कतिपय गीत गाए जाने के लिए हैं और कुछ पढ़े जाने के लिए। जीवन का भोगा हुआ संदर्भ त्यागी की रचनाओं में निर्लिप्त रूप से प्रकट है। त्यागी का व्यक्ति और त्यागी का कवि एक-दूसरे के साथ इस प्रकार घुले-मिले हैं कि उनमें किसी की भी अपेक्षा कर दूसरे को जाना ही नहीं जा सकता चूंकि त्यागी ने जो कुछ देखा, जिया, सहा, झेला और भोगा है, मान उसी को वाणी दी है। ‘न उसकी अनुभूति ‘उधार’ की है न अभिव्यक्ति, न उसने अपने आपको आधुनिक सिद्ध करने के लिए झूठी भाषा का प्रयोग किया है न स्वयं को ‘बड़ा’ कवि मनवाने के लिए ऐसी कविताएं लिखी हैं जो पाठक तो दूर स्वयं कवि की भी समझ में नहीं आती। इन्होंने नारों और प्रचार के बल पर स्वयं को प्रतिस्थापित करने का प्रयास भी नहीं किया। उनके गीत किसी व्यक्ति विशेष का रुदन-ह्रास न होकर पूरे मध्यवित्त समाज की स्थिति को बिंबित कर अपनी अलग दृष्टि रेखांकित करते हैं। उसकी चेतना स्वाभिमान की आंच में तपकर कुंदन बन निखरी है इसीलिए वह व्यक्ति तो क्या, समूचे राष्ट्र की भत्र्सना निर्भीक होकर करता है। जब उसकी आंखें देश में काम के स्थान पर प्रदर्शन, जुलूस, और नारी से प्रभावित अपग आस्था को देखती हैं, उसकी विश्वस्त चेतना कराह उठती है।

स्वाभिमान

त्यागी जी के गीतों में उनकी प्राण-चेतना समाई हुई है, उनका व्यक्तित्व गीतों की पंक्तियों में इस प्रकार रच-बस गया है कि उनके गीत उनके व्यक्तित्व को उभार कर उनकी प्राणवानता सिद्ध करते हैं। उनके व्यक्तित्व के मूल गुण स्वाभिमान तथा स्वच्छंदता अनेकाधिक गीतों में प्रमुख स्वर के रूप में तीव्रता से व्यंजित हुई है। कलाकार के गौरवमय अहं की स्पष्ट अभिव्यक्ति त्यागी के गीतों की अतिरिक्त विशेषता है।

कवि में स्वाभिमान की गति अदम्य है। इस अनुपम शक्ति के बल पर वह किसी के आगे अपने अधिकारों की भिक्षा नहीं मांगता, उसे अपनी आत्मिक शक्ति पर सुदृढ आस्था है। आपदाओं और कष्टों के अथाह समुद्र में अपनी जीवन-नौका के डूब जाने अथवा डावाडोल होने की उसे लेशमात्र भी चिंता नहीं है, चाहे कितने ही प्रभंजन परीक्षा कर देख लें, वह तो अपने आत्मविश्वास से दीपित स्वाभिमान की डोर थामे है। इसलिए उसे किसी की दान-दक्षिणा अथवा अनुकंपा की किसी भी स्थिति में आवश्यकता नहीं है।

यदि माझी में तूफ़ानों से टकराने का आत्मविश्वास से परिपूरित साहस है तब सहस्त्रों प्रभंजन भी उसका कुछ नहीं कर सकते। स्वाभिमान की विपुलता के कारण कदाचित् कवि के स्वभाव में अक्खड़पन उत्पन्न हो गया है। यह किसी भी स्थिति के अनुकूल अपने स्वाभिमान को न तो झुकाना जानता है और न ही किसी प्रकार के समझौते का पक्षधर है। जबकि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था उसे ऐसा करने को बाध्य करती है, परिणामस्वरूप कवि जो मान-सम्मान पाने की आकांक्षा मन में संजोता है वह उसे प्राप्त नहीं होता। मान-सम्मान न प्राप्त कर पाने के कारण कवि-मन विद्रोह करता है और उसके गीत शिक़ायत के स्वर में परिवर्तित होकर परिवार, समाज यहां तक कि शासन-तंत्र के प्रति भी मुखर और प्रखर हो उठते हैं।

स्वाभिमान तथा शिक़ायत में टकराव की स्थिति उत्पन्न होने पर नया संघर्ष प्रारंभ होता है जो कवि हृदय भूमि पर क्रांति के बीज रोपित कर उसके चिंतन को परिवर्तन की ओर उन्मुख करता है, परिणाम होता है जड़ शासनतंत्र के विरुद्ध विद्रोह। कवि इस तथ्य का निभ्र्रांत शब्दों में उदघोष करता है। जड़ और अनुपयोगी व्यवस्था में परिवर्तन जीवन अनिवार्य-धर्म होने के कारण अवश्यंभावी है।

बलिदान

क्रांति-समर्थकों को सिद्धि सरलता से नहीं प्राप्त होती, उसे प्राप्त करने के लिए न जाने आपदाओं, कष्टों के कितने दुर्गम पर्वत लांघ अनेक उत्सर्ग करने पड़ते हैं, कवि ऐसे ही लोगों का चारण है जो काटों से भरे हुए पथ पर चल अपने चरणों को रक्त से लथ-पथ कर बलिदान करना जानते हैं। विवश स्थितियों के वात्यचक्र में उलझकर उत्सर्ग करना बलिदान नहीं है, समर्पण में तो एक तीव्र ललक हर्ष की निराली चमक है। वंदना, अर्चना भी ऐसे ही मुस्करा कर अस्तित्व निर्मूल करने वालों की होती है जिनका अर्थ और इति ख़ुशी-ख़ुशी बलिदान होने की भावना में समाहित है जिन्हें त्याग कर किसी फल प्राप्ति की अपेक्षा नहीं होती।

स्वातंत्र्य एवं जिजीविषा

अंततः बलिदान की परिणति स्वातंत्र्य एवं जिजीविषा में त्राण पाती है। जिस व्यक्ति में हसते मुस्कराते हुए अधिकार त्यागने की सामथ्र्य है, अपने अधिकारों को रक्षित करने के लिए संघर्ष के वज्र-वक्ष मे छिद्र करने का साहस भी वही रखता है। स्वातंत्र्य मनुष्य का जन्मसिद्ध सर्वप्रथम अधिकार है, त्यागी जी इससे एक क्षण के लिए भी विमुख नहीं हैं चूंकि उनके लिए स्वतंत्रता आध्यात्मिक महत्त्व की वस्तु है।

जीवन का अदम्य वेग, जोखिमों, विपत्तियों से टकराने की अद्भुत क्षमता कवि में विद्यमान है। जीवन के प्रति उसका जीवन-दर्शन स्वस्थ है, इसीलिए वह संपूर्ण आस्था से दुःखों एवं सुखों का समान रूप से आलिंगन करता है। जिजीविषा के इसी रूप ने जीवन-भर विकट संघर्षों के समक्ष कवि को कहीं झुकने अथवा समझौता करने नहीं दिया। इसीलिए उसे अपनी जिजीविषा पर दृढ़ विश्वास है, जिस उद्देश्य प्राप्ति के लिए यह जीवन-संग्राम में निहत्था होकर भी अपने पौरुष का परिचय दे रहा है, उसका श्रेय उसे लक्षित उपलब्धि, सिद्धि तक स्वयं ही ले जाएगा। जीवन-संग्राम में विकट संघर्षों से जूझते कवि के दृग-युगल में कभी-कभी अश्रुकण झिलमिलाने लगते हैं लेकिन हर अश्रुकण कायरता की खोझ नहीं होता वरन् यहां तो कवि के आत्म-विश्वास को सवारती मुस्कान दृदृष्टिगत है। इसका कारण है यह तड़प, जलन से उद्दीप्त तपन, व्यथा जो कवि ने इच्छानुसार स्वयं अंगीकार की है। अनिल का पुत्र कवि तापसी अंगारे का तन बनने की इच्छा से उसे सार्थक की सायास चेष्टा में निरंतर संलग्न रहता है।

इन प्रवृत्तियों ने कवि में एक स्वस्थ प्रवृत्ति मार्गी आस्थापूर्ण प्रबल दृष्टिकोण को जन्म दिया है जो भावात्मक अवधारणाओं पर अवलंबित होने के कारण ऋणात्मक मनःस्थिति का घोर विरोध करता है।

वेदना का गायक

त्यागी के गीतों में वेदना का स्वर सर्वाधिक तीव्र है। वैयक्तिक अथवा सामाजिक दोनों ही स्तरों पर उनके गीतों के मूल में वेदना का साम्राज्य है। वैयक्तिक-वेदना में यदि प्रेम से उत्पन्न नैराश्य का स्वर मुखर है तो सामाजिक वेदना में आर्थिक एवं राजनीतिक कटुताओं से उत्पन्न वैषम्य की अनुभवजन्य तपन विद्यमान है। इन सबकी अनुभूति का मुख्य कारण उनका प्रखर स्वाभिमान तथा स्वातंत्रय-भावना से उत्पन्न वह आत्मिक गौरवपूर्ण शक्ति रही है जिसके बल पर वे कभी किसी शक्ति के समक्ष नहीं टूटे, नहीं बिके।

कवि की वेदना अन्य गीतकारों की वेदना से पृथक् है, उनकी पीड़ा में रुदन का लेश नहीं। न ही उनकी तड़प में नैराश्यांधकार तथा अनास्था का भारी बोझ है जिसे उठाने में कवि असमर्थ हो-कारण, पीड़ा उसकी विवशता नहीं है, उसने वेदना का सहर्ष स्वयं आलिंगन किया है। उसकी आस्था की दृढ़ सीमाओं का संकुचन यही नहीं होता बल्कि कालिमा के गहनतम जलधि में भी वह उसके अस्तित्व को निमज्जित न होने तथा पराजित न होने के आस्थामय स्वर की ध्वनियों को संगीतबद्ध करते हुए कवि-व्यक्तित्व की दृढ़ता को प्रकट करती है।

बुद्धि की अपेक्षा कवि सच्ची भावनाओं को अधिक महत्त्व देता है। प्यार की सच्ची भावना ही मानवता का जयघोष है। ज्ञान के आलोकमय क्षेत्र में भावना का स्थान नहीं होता। ज्ञान चाहे भावना को पराजित करने के लिए लाखों-करोड़ों बोलियां लगा लें लेकिन अर्चा के सच्चे भाव-सुमन कभी नहीं बिकते। त्यागी जी बुद्धि-चकोरि पर विश्वास न करने की चेतना व्यक्ति को देना चाहते हैं जहां सौ-सौ जन्म मुस्करा कर भी मानव फूल सी निश्छल मादकता से खिलखिलाकर नहीं हंस पाया। इसीलिए कवि भावनाओं का कट्टर समर्थक है। बुद्धि तो जीवन में व्यथा-पीड़ा के समुद्र से त्राण प्राप्त करने का सतु है जिसका जब चाहे व्यक्ति निर्माण कर अपनी आत्मा तथा सम्मान-रत्न को विक्रय कर जीवन की संपूर्ण वैभव-निधि का क्रय कर  सकता है। स्वाभिमान को सुरक्षित कर त्यागी ने हर स्थान पर हर क्षण भावनाओं को रक्षित किया है जिसके साथ वेदना का घनिष्ठ संबंध है और कवि इसे ही अनमोल पारस-मणि स्वीकारता है। इस पारस-मणि के मूल्य पर वे अपना सब कुछ बलिदान कर देने के पक्ष में हैं। इसीलिए वे गंगाजल से भरे कंचन कलश को दूर कर आंखों से अश्रु पीने में ही अपनी सार्थकता अनुभव करते हैं। उनके अनुसार दर्द ऐसी संपदा है जो मानव-मानव के मध्य सद्भावों का निर्माण कर उसे मानवता से जोड़ती है। एक पागल भी उसे खोने को तैयार नहीं होता फिर कवि ने तो सहर्ष उसे अपने गले का हार बनाया है। अश्रुओं की इस अमूल्य पारस-मणि को प्राप्त कर कवि सिंहासन और मंदिर के आसन को भी तुच्छ बताकर उसी के चरणों में मरने की विकट अभिलाषा प्रकट करता है जिसने उसे अश्रुकणों का मीठा यह उपहार दिया है। इसीलिए वे उस दाता के प्रति भी अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

मानवीय गंध की प्यास

त्यागी के गीतों में मानवीय गंध की प्यास तीव्र है। असंयम, दुर्बलता तथा चांचल्य को मानव-स्वभाव के अंग मानकर कवि उनसे उत्पन्न पापों को क्षम्य समझता है। यौवन तो वह स्वर्णिम अवस्था है जब भावनाओं का उत्ताल-ज्वार संयम की रज्जुओं के टुकड़े-टुकड़े बिखेर देता है। ऐसे आवेशजनित यौवन को क्या दोष दिया जाए, ऐसे क्षणों में कवि प्रायश्चितस्वरूप भूलों पर यवनिका गिराने के प्रयास में क्षमा की झालरें संवारता है। जीवन-यौवन के ऐसे ही दुर्लभ क्षणों में प्रेम की सुुषुप्त मादक अनुभूति अंकुर बनकर फूट पड़ती है और कवि को दे जाती है एक मधुर टीस-युक्त वेदना जिसका अभिलाषी कवि सदा से रहा है। प्रेम के इस विषम एकांगी रूप में कवि भावनाएं व्यथा, पीड़ा से तड़पी है, यहां तक कि वह प्रेम को वेदना का पर्याय मानकर स्वीकार कर लेता है। लेकिन प्रेम को वेदना का पर्याय मान लेने से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि कवि ने इस प्रेम को पूर्ण एकनिष्ठता के साथ अंगीकार किया है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि कवि अपनी किसी पुरानी आदत के कारण स्वयं ही पीड़ा को अंगीकृत करते हुए बारंबार दुहराने का आदी है, अन्यथा ‘प्रेम’ एवं ‘मन-बहलाना’ भी कवि के लिए सौ-सौ सौगंध उठाने के समान पर्याप्त है?

आर्थिक एवं सामाजिक स्थितियों से उत्पन्न वेदना भी कवि को अभीष्ट है। समाज में आर्थिक व्यवस्था की दारुण चक्की कुछ इस तरह चलती है कि कलाकार की संपूर्ण महत्वाकांक्षाएं ही नहीं कोमल भावनाएं भी निर्ममता से दो पाटों के मध्य कुचली जाती है। जीवन की रंगीनियों में छुपी विद्रूपताओं को त्यागी ने अपने सद्य प्रकाशित गीत संग्रह ‘गाता हुआ दर्द’ में बड़ी ख़ूबसूरती से पेश किया है। रूढ़िवादी मानसिकता की सीवन उधेड़ते हुए त्यागी वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक मठाधीशों को बख्शते नहीं हैं अपितु बड़ेे नफीस तरीके से उन पर व्यंग्य करते हैं। समाज की यथार्थवादी तस्वीर खींचते हुए त्यागी यंत्रचालित व्यवस्था के अनुचित कृत्यों का विरोध करते हैं। भावना-जल निरंतर मृगतृष्णा की भांति कवि-दृग-युगल के सामने आकर भी उद्विग्न प्यासा रहता है। समाज की सबसे बड़ी त्रासदी तो यही है कि ऐश्वर्य के लोभ लालच में अनेक अकरणीय कृत्य भी स्वच्छंदता से होते हैं। इस यंत्रचालित व्यवस्था के अनौचित्यपूर्ण कृत्य का कवि प्रबल विरोधी है इसीलिए दुनिया के मंदिर में उसकी अर्चना व्यर्थ है। चूंकि तथाकथित मठाधीशों के हाथों कवि ने अपनी आत्मा का सौदा करने से इंकार कर दिया। आर्थिक जर्जरता से ग्रसित कवि-कला उसे पूर्ण शरीर ढकने के लिए कफ़न दिलाने में भी असमर्थ है। जीवन और जीवन-स्वातंत्र्य लिए निर्धनता सबसे घोर अभिशाप है और प्रतिभा इसी अभिशप्त निर्धनता की बेटी हो गई है। इसके पश्चात् भी कवि ने अपनी प्रबल आस्था तथा आत्मिक विश्वास के बल पर उसका वरण किया है क्योंकि कठिनाइयों से जूझने, तूफ़ानों से क्रीड़ा करने में कवि को मज़ा आता है। तूफ़ानी, संघर्षों के वज्र पांवों में कवि बेड़ियां पहनाने का अटल संकल्प लेकर जीवन-संग्राम में अपने कवि-धर्म को निर्भीक होकर निभ्र्रांत शब्दों में अभिव्यक्त करता है। चाहे उसे संपूर्ण उमर सूनी काल-कोठरी में व्यतीत करनी पडे़ किंतु वह जीवन-भर कारावास की कठोर यातना भोगते हुए भी स्वर्ण के हाथों अपनी लेखनी और गीतों को विक्रय करने को उद्धृत नहीं हैं।

शिल्प दृष्टि

प्रभावशाली और सक्षम अभिव्यक्ति के कारण आधुनिक गीतकारों में त्यागी का स्थान महत्वपूर्ण है। अन्य गीतकारों की भांति ही प्रणय की विभिन्न स्थितियों का चित्रण कवि ने किया है लेकिन इनकी प्रणयाभिव्यक्ति में मार्मिकता और विदग्धता के साथ-साथ इतनी जीवनता है कि वे सहज ही वाचक के हृदय पर सीधा और तीव्र प्रभाव कर मन की तंत्रियों को होले-से झंकृत कर देती है। अपनी बात को नए ढंग से व्यंजित कर उक्ति को अधिक आकर्षक और व्यापक अर्थवत्ता प्रदान करने का गुण उनके गीतों की निजी विशेषता है।

त्यागी जी को एकदम दोषमुक्त ठहराना उचित नहीं है। ‘छंद गीतों की व्यवस्था मात्र है, बंधन नहीं है, मानने वाले त्यागी का सबसे बड़ा दोष यही है कि यह आज भी छंद को उसी प्रकार अपने सीने से चिपकाए हुए हैं जिस प्रकार एक बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को। यही स्थिति उनके उपमानों की भी है। हालांकि वह दूसरों को संबोधित करता हुआ उनके उपमानों पर अविश्वास की खुली घोषणा करता है और इधर स्वयं कवि गिनती के कुछ उपमानों का आश्रय लेकर आज की बात कहने का प्रयास करता है जो कभी-कभी घिसे-पिटे उपमानों के प्रयोग के कारण फुसफुसा कर रह जाती है। ऐसे उपमानों का चयन और प्रयोग पाठक के मन पर किसी प्रकार के नवीन प्रभाव को न डाल कर उनके गीतों को सामान्य प्रवृत्ति की ओर इंगित करता है। ठीक इसी के समानांतर उनके गीत की स्थिति है जो आग्रह को छोड़ कर कभी-कभी दुराग्रह की सीमा को लांघ जाती है और उसकी गति-क्षमता पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए गीतों के प्रति अरुचि-भाव उत्पन्न करने में सहायक बन जाती है।

गीतों के दर्पण को छोटा स्वीकार कर जीवन के आकार को बड़ा मानने वाले त्यागी जब नई कविता की मृत्यु की उद्घोषणा कर गीत को विद्यापति का पुत्र कहकर उसकी दुंदुभि बजाते हैं तब उनकी यह उद्घोषणा भी उतनी ही बेमानी लगती है। जितनी कि गीत की मृत्यु की उद्घोषणा करने वाले छिछली राजनीति से प्रेरित तथाकथित बुद्धिजीवियों का कथन। लेकिन संतोष इसी बात का है कि कवि को इस स्थिति का आभास है। हमारा यह विश्वास है कि यह अहसास त्यागी जी को एक दिन गीत की रूढ़ियां तोड़ने के लिए विवश करेगा।

अप्रस्तुत विधान

त्यागी जी के गीतों का अप्रस्तुत विधान भी पर्याप्त सक्षम एवं आकर्षक है। परंपरागत उपमानों को स्वीकार करते हुए भी उन्होंने स्वनिर्मित नवीन उपमानों का सफल प्रयोग किया है। नूतन उपमानों से सज्जित अनेक मौलिक प्रयोग उनके गीतों में सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। उनके उपमानों का विभाजन हम चार वर्गों में कर सकते हैं- परंपरागत उपमान, नवीन उपमान, ऐतिहासिक-पौराणिक उपमान तथा वीभत्स उपमान।

परंपरागत उपमानों में प्रायः रूढ़िगत काव्यात्मक उपमानों चंदा, चकोरी, पपीहे आदि को ही कवि ने मान्यता दी है। नवीन उपमानों के सुंदर चयन के लिए कहीं कवि प्रकृति-खोजी हुआ है तो कहीं जीवन के क्षेत्र को अपनाया गया है। वैज्ञानिक सुखोपलब्धियों से ग्रसित बौद्धिकता-प्रधान युग की नागर सभ्यता के प्रभाव-स्वरूप कवि ने मेघों में भी पूंजीपतियों की-सी कृपणता को देखा है। अन्य आधुनिक गीतकारों की भांति पौराणिक- ऐतिहासिक उपमानों का बाहुल्य भी त्यागी जी के गीतों में देखा जा सकता है। अनेक वीभत्स उपमानों का प्रयोग कवि ने उर्दू अभिव्यंजना के प्रभाववश स्वीकार किया है।

भाषा

त्यागी जी के गीतों की सफलता और लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनकी सहज-सरल भाषा है। उत्तर-छायावादी काल में अभिव्यक्ति की सफाई को भाषा का सर्वमान्य गुण स्वीकार किया गया है, त्यागी जी के गीत इसके साक्षात् प्रमाण हैं। भाषा में बोल चाल के शब्दों का आधिक्य, परिष्कृत खड़ी-बोली का चलता हुआ मृदुल एवं संगीतमय रूप उनके गीतों की सहज उपलब्धि है। कथन की वक्रता उनके गीतों के प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर उन्हें नई भाव-क्षमता प्रदान करती है। भाषा में कहीं कहीं उर्दू प्रभाव के साथ-साथ सामान्य जीवन में प्रचलित लोकोक्तियों का प्रयोग भी कवि-भाषा की अन्य विशेषता है। अन्य समकालीन गीतकारों की भांति कवि भी व्याकरण-संबंधी अशुद्धियों से बच निकलने में असफल रहा है।

गीतों का रूपाकार-संगीतात्मकता 

भावाभिव्यक्ति के लिए गीत-विधा चुन कर त्यागी ने उसे पर्याप्त समृद्ध किया है। संक्षिप्तता और गेयता उनके प्रायः सभी गीतों का विशेष अर्जित गुण है। उनके गीत की प्रथम दो पंक्तियों में उनकी मुख्य भावाभिव्यंजना निहित रहती है फिर उसके पश्चात् चार पंक्तियों का एक पद और फिर वैसी ही दो पंक्तियां उनकी भावाभिव्यक्ति के अनुकूल वातावरण निर्मित करती है। इस प्रकार के विधान के कारण उनके गोतों में टेरी आवृत्ति न होकर भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा मुख्य भाव की आवृत्ति ही होती है। उनके श्रेष्ठ गीत-संकलन ‘आठवां-स्वर’ के अनेक गीत ‘मन को तो मैं समझा लूंगा,’ ‘सागर से यह बात करूंगा,’ ‘मन की उजली किरणों में बांध मुझे’, ‘सबसे अधिक तुम्हीं रोओगे’ आदि गीत-शैली के प्रमाणस्वरुप उद्धृत किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त सूत्रात्मक्ता भी इनके गीतों की निजी विशेषता है जो एक निराली रंग-छटा बिखेरते हुए कवि की भावाभिव्यक्ति को समर्थ फल का आधार प्रदान करती है।

मूल्यांकन

रामावतार त्यागी प्रमुखतः संघर्ष और शक्ति के कवि हैं। प्रणय-रोमांस उनके कृतित्व का गौण स्वर है। उन्होंने हर नए चिंतन और भाव को गीतिमय माध्यम से अभिव्यक्त कर गीत-क्षमता के साथ-साथ अपनी प्रातिभ शक्ति-चेतना को स्पष्ट रूप में घोषित किया है। भाव धरातल पर उनकी सक्षम लेखनी ने वेदना एवं प्रणय के विभिन्न स्वरों को वाणी दी है। अभिव्यक्ति के सहज सौंदर्य ने उनके गीतों को पर्याप्त आकर्षण प्रदान किया है। अपने संघर्षमय जीवन तथा स्वस्थ जीवन-दर्शन पर आधारित जिजीविषा के बल पर उन्होंने नवगीतकारों मे अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। उनकी रचनाएं पीड़ा, टीस और प्रेम की भंगिमा के साथ आक्रोश की तीव्र शक्ति को आत्मसात किए है।

‘गुलाब और बबूल वन’ (सन् 1973) और ‘गाता हुआ दर्द’ (सन् 1984) में आकर त्यागी के तेवर का बांकपन पहले की तरह ही क़ायम है। वक़्त गुज़रने के साथ ज़िंदगी ने उसे तराशा ज़रूर है मगर इतना ही नहीं कि उसका सारा खुरदरापन घिस गया हो। समझौतों की दुनिया में रहने के बावजूद आज भी उसमें चुनौती उसी तरह जीवित है जिस तरह एक मुद्दत से शहर में रहने के बावजूद आज भी उसमें ‘गांव’ जीवित है। शहरी वातावरण और सुविधाएं उसे इतना ‘सभ्य’ कभी नहीं बना पाईं कि भीड़ में उसकी सूरत अलग से पहचानी ही न जा सके। आज भी उसके चेहरे पर विद्रोह और अस्वीकार की चमक ज्यों की त्यों बनी हुई है। आज भी वह यह कहने का साहस रखता है-‘गीत नहीं आग लिखूंगा’।

त्यागी की बदनसीबी यह है कि दर्द उसके साथ लगा रहा है, उसकी ख़ुशनसीबी यह है कि दर्द को गीत बनाने की कला में वह माहिर है। गीत को जितनी निष्ठा से उसने लिया है, वह स्वयं में एक मिसाल है। आधुनिक गीत-साहित्य का इतिहास उसके गीतों की विस्तारपूर्वक चर्चा किए बिना लिखा ही नहीं जा सकता। गीत के प्रति समर्पित व्यक्तित्व रामावतार त्यागी का अब यही स्वप्न है कि उसके द्वारा किसी बड़ी और महत्वपूर्ण रचना का सृजन हो। महल का कंगूरा तो हर व्यक्ति बनना चाहता है लेकिन त्यागी को संतोष है कि देहाती नीव पर गीत की ईंट उन्होंने रखी थी और अब उस पर सुंदर ताजमहल खड़ा हो चुका है।

संदर्भ- ‘नवगीत: इतिहास और उपलब्धि’, डाॅ. सुरेश गौतम, डाॅ. (श्रीमती) वीणा गौतम, शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली (संस्करण 1985), पृ.-108 से 116

कविवर रामावतार त्यागी

 

शेरजंग गर्ग



समकालीन हिंदी कविता अपने विविध रंगों और शैलियों में पूरे निखार एवं यौवन पर है, तथापि कविता का प्रत्येक प्रबुद्ध पाठक अथवा श्रोता यह महसूस करने लगा है कि कविता जन-जीवन से दूर जा पड़ी है। यह एक असंगति ही है कि समकालीन कविता आम आदमी के इतना नज़दीक होने के बावजूद जन-जीवन का अभिन्न अंग बनने में उतनी सफल नहीं हो पाई है, जितनी कि उससे अपेक्षा की जाती है। चलताऊ भाषा में जिसे लोकप्रिय कविता कहा जाता है, वह कवि सम्मेलनों के फूहड़पन से जुड़ी हुई है। उसमें हास्य है, लतीफें-चुुटकुले हैं और वाहियात किस्म गलेबाज़ी है। दूसरी ओर साहित्यिक कविता प्रयोगों और दुष्प्रयोगों के चक्कर में इस क़दर फंसी हुई है कि वह जन समान्य से संपर्क का दावा करने के बावजूद सामान्य-जन की रुचि का विषय नहीं बन पा रही है। ऐसी दुविधाग्रस्त स्थिति में वे कवि वाक़ई स्वागत योग्य हैं, जिन्होंने समय के रुख़ के विपरीत खड़े होकर कविता को न तो अपने व्यक्तित्व से विच्छिन्न किया, न जनता से, साथ ही साहित्यिक शिखरों को भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया। इस धारा के अग्रणी कवियों में श्री रामावतार त्यागी विशेष महत्व रखते हैं।

त्यागी का जीवन भयंकर चुनौतियों का सामना करने वाला रहा है। पारिवारिक चुनौती, सांसारिक चुनौती-सभी तरह की चुनौतियों को साहस से झेलते हुए उन्होंने स्वयं को जीवित रखा है। आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के एक कस्बेनुमा शहर से दिल्ली में अपने ढंग से आकर बस जाने वाला अलमस्त कवि फिर हमेशा के लिए दिल्ली का होकर रह गया। यहां आकर उसने अपनी अधूरी पढ़ाई को पूरा किया, जीवन के नए-नए रूपों को देखा, महानगर की जद्दोजहद में हिस्सा लिया, कई तरह की नौकरियां कीं और छोड़ीं, मगर जिसे अभी तक स्थापित हो जाने का तथाकथित गौरव नहीं मिला है।

त्यागी ही क्या, किसी भी अच्छे कवि की रचनाओं की राह से गुज़रने से पूर्व उसके जीवन की उन घटनाओं का, उसकी तुनुक़मिज़ाजियों और अल्हड़पन का परिचय प्राप्त कर लेना ज़रूरी होता है, जो कवि के व्यक्तित्व को शक्ति देती है, उसे किन्हीं विशिष्टताओं का स्वामी बनाती है। त्यागी का वैशिष्ट्य, जिसे ‘त्यागिगाना ठाट’ भी कहा जा सकता है, आज के जीवन की आपाधापी, कोमल संबंधों के अभाव, सफेदपोशी, कृत्रिम शालीनता और अभिजात्य की देन है, जिनके विरुद्ध खड़े होकर बोलना त्यागी का स्वभाव है और यही त्यागी स्वयं को ज़माने की स्वाभाविकता और दुनियादारी के दाव-पेंचों से अलग कर लेते हैं। त्यागी के संपूर्ण काव्य में एक सहज रागात्मकता से सराबोर अल्हड़ता, आदमीयत के प्रति सहानुभूति, बेबाक-स्वाभिमान और एक जैसे छंदों में लिखने के बावजूद बेपनाह ताज़गी मिलती है। यद्यपि त्यागी एक स्थान पर यह कबूल कर बैठे हैं ‘‘गीतों का दर्पण छोटा है जीवन का आकार बड़ा है’’ मगर उन्होंने जीवन के बड़े आकार को गीतों के छोटे दर्पण में समोने का ‘दुस्साहस’ किया है। वह कोशिश कुछ-कुछ वैसी ही है जैसे कि गागर में सागर भर देने का दुस्साहसपूर्ण काव्य-कौशल।

कविता में त्यागी गीत को चाहे कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न मानते हों, गद्य में उन्होंने उपन्यास से लेकर पत्र-विधा एवं व्यंग्य-लेखन को भी भरपूर अपनाया है। उनका उपन्यास ‘समाधान’ एवं ‘चरित्रहीन के पत्र’ प्रभृति रचनाएं हमारे इस कथन का पुष्ट प्रमाण है। बच्चों के लिए ‘मैं दिल्ली हूं’ जैसी रचना त्यागी जी ने लिखी। व्यंग्य-लेखन के क्षेत्र में उनके स्तंभ ‘दिल्ली जो एक शहर है’ तथा ‘राम-झरोखा’ को नवभारत टाइम्स के पाठक आसानी से नहीं भूल सकते। काव्य संकलनों के रूप में अब तक उनकी चार महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाश में आ चुकी हैं, यथा ‘नया ख़ून’, ‘आठवां स्वर’, ‘सपने महक उठे’ एवं ‘गुलाब और बबूल वन’। आज के लोकप्रिय हिंदी कवि पुस्तकमाला में स्थान पाने वाले कवियों में त्यागी सबसे युवा थे।

त्यागी के कवि-व्यक्तित्व के विकास में उनके सफल-असफल प्रेम के विभिन्न रूपों का भी हाथ है। प्रेम के इन्हीं रूपों ने इनके व्यक्तित्व को निखारने का काम किया है। यही कारण है कि हम उनके प्रारंभिक ही नहीं अद्यतन काव्य में भी प्रेम और विद्रोह के स्वरों की अनुगूंजे पाते हैं। एक ओर मध्यवर्गीय युवा मन की छटपटाहट, भावुकता, संवेदनशीलता और इरादे तथा दूसरी ओर आवश्यकता विषमता, वर्जना, वैयक्तिक कुंठा के आवरण में लिपटी व्यवस्था और उसके सुविधाजीवी ठेकेदार, ‘इन सबने मिलकर त्यागी को काव्यलेखन की ओर उन्मुख किया। कभी उनका प्रेमी-मन विद्रोही बनकर इस व्यवस्था को ललकारता है, तो कभी विद्रोही-मन ही प्रेमी का बाना पहन कर उससे सूरज का तिरस्कार करता हुआ बुझते हुए दीपक के सिरहाने जा बैठता है।’ उन्हें ज़माने की चोटें, घटियापन, व्यावहारिकता और कड़वी परिस्थितियां सपनों तक से निम्नांकित निवेदन करने को विवश करती हैं -

सपनों कुछ धीमे-धीमे पांव धरो

चीलों की तरह उड़ाने नहीं भरो

आकाश नहीं, ये मेरी आंखें हैं

वास्तव में, त्यागी के काव्य में ऐसा संसार मूर्तिमान हो उठता है, जिसके प्रति हर कोमल और संवेदनशील मन में मोह है, मगर यथार्थ के टूटने के कारण लोग जिससे दो-चार होने में कतराते हैं। छायावादियों के समान त्यागी ने आंखों को आकाश न मानकर आंख ही माना है, इसलिए वह सपनों को उनकी सीमाओं में बंधकर काम करने की ही इज़ाज़त दे पाते हैं।

त्यागी के कवि का यह भी अपना रंग ही है कि उन्होंने प्रयोगवादी काव्य को बहुत ऊंचे दर्ज़े का काव्य कभी नहीं माना है। यहां यह बहस नहीं कि उन्होंने ऐसा करके सही किया या ग़लत, मगर वह यह मानते रहे हैं कि प्रयोगवादी कविता में दुरूहता, बौद्धिकता एवं अतिशय प्रयोग की ललक उसे आम आदमी के मतलब की चीज नहीं रहने देते। स्वयं त्यागी ने छंदों तक के बहुत कम प्रयोग किए हैं, मगर हर बार हर गीत एक ऐसी चैंक लेकर उपस्थित होता है, मानो वैसा पहली बार ही हुआ हो। उनके गीत कहीं-कहीं संत कवियों की सूक्तियों से टक्कर लेते हुए लगते हैं। सुनते ही याद हो जाने वाली, अक्सर दिमाग़ को कुरेदने वाली सैकड़ों पंक्तियां उर्दू के उस्ताद कवियों की शायरी का स्मरण करा देती है। उदाहरणार्थ यहां कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं -

सुख तो कोई दुर्लंभ सी वस्तु नहीं

जब चाहो आदर के बदले ले लो

दुनिया को अपनी पावनता दे दो

फिर चाहे जिस सिंहासन से खेलो।

अर्थ-गांभीर्य और संवेदना के स्तर पर मन को छूने वाली अनेक पंक्तियों का रस ग्रहण करने के लिए त्यागी के संपूर्ण काव्य का अध्ययन किया जाना बेहद ज़रूरी है। इस कवि ने दर्द को इस सीमा तक बरदाश्त किया है कि यदि उसका जन्म न हुआ होता तो विपदाएं कुंआरी रह जातीं, प्रेम में स्वयं को इतना समर्पित कर दिया कि प्रिय के दरवाज़े तक भी वह प्रिय के चरणों से ही पहुंच सका, क्योंकि उसके पास अपने पैर थे ही कहां? त्यागी ने गीतों को गंगाजल-सा पवित्र माना है। यही वजह है कि दर्द, प्रिय और गीत उनकी थाती है। इसके बग़ैर त्यागी के व्यक्तित्व और कृतित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

एक बार बातचीत के दौरान त्यागी से प्रश्न किया कि साहित्य में नए-नए आंदोलनों की दिशा में युवा पीढ़ी आकर्षित हो रही है, आप क्या सोचते हैं इस संबंध में? इस पर त्यागी का उत्तर यह था-‘‘युवा पीढ़ी को अपनी आस्थाओं के बल पर ही आगे बढ़ना होगा। मेरे ख़याल से इस तरह हर तेज़़ रौ के साथ बढ़ जाना और रहबर को न पहचानना कोई स्वस्थ लक्षण नहीं होता। श्रेष्ठ साहित्य आस्था की देन होता है, अनास्था की नहीं।’’

आज जबकि मूल्यों के क्षेत्र में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई है, साहित्य को भी अपनी आस्थाओं की रक्षा करते हुए जनजीवन का अंग बनना है। त्यागी ने जैसा जिया है, वैसा ही लिखा है। यह किसी कलाकार के लिए कम बड़ी बात नहीं है। कविता में प्रचलित धारणाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाना और जीवन में हर तोपनुमा व्यवधान और ओछेपन से टकरा जाना त्यागी जैसे जीवंत कवि के ही बस की बात है। पत्रकारिता में भी उन्होंने अपने इसी धर्म को निभाया है। कोई पुरस्कार, कोई प्रलोभन त्यागी को सत्य और तथ्य लिखने से विमुख नहीं कर पाता है।

त्यागी के कृतित्व के संबंध में लिखते समय मुझे प्रसन्नता है कि मेरे पास अनावश्यक रूप से लिखने के लिए कुछ भी नहीं है। न तो उसकी भाषा में ही ऐसा कुछ अजीबो-ग़रीब है जिसे भाषाशास्त्र के संदर्भों की दरकार हो, न उसकी शैली ही ऐसी है कि काव्य शास्त्र अथवा अलंकार शास्त्र की बारीकियों में उलझना पड़े, न वह इतना आधुनिक है कि किसी विदेशी महाकवि के साथ उसकी तुलना ज़रूरी हो और न ही वह इतना पुरातन कि उसे किसी आदि कवि के समकक्ष रखा जा सके। वह इतना आसान और अपना है कि उस पर कोई तुलना और विशेषण फिट नहीं बैठ पाता। सच बात तो यह है कि इस कवि के काव्य को सुनने-पढ़ने का अपना अलग ही सुख है और स्वयं उन्हीं के शब्दों में मात्र इतना कहा जा सकता है -

विचारक हैं, न पंडित हैं, न हम धर्मात्मा कोई

बड़ा कमज़ोर जो होता वही बस आदमी हैं हम,

हमें इतिहास में कोई जगह मिलती नहीं माना

मगर इस ज़िंदगी के वास्ते कुछ लाज़िमी हैं हम।

(‘गीत बोलते हैं’ से)

आठवां स्वर की भूमिका

 राममधारी सिंह ‘‘दिनकर’’


त्यागी ने एक जगह गीत की परिभाषा देते हुए कहा है-

गीत क्या है? सिर्फ़ छंदों में सजाई,

आदमी की शब्दमय तस्वीर ही तो।

लेकिन, आदमी की शब्दमय तस्वीर तो साहित्य मात्र है। इसलिए, गीतों का महत्व मैं एक दूसरी तरह से आंकता हूं। साहित्य का सर्वश्रेष्ठ अंश कवित्व है और कवित्व उपन्यासों से अधिक कविता में और कविताओं में भी सबसे अधिक गीतों में रहता है। गीतों में सिमट कर बैठने वाला कवित्व साहित्य की चरम शक्ति का पर्याय होता है। उपन्यास कुछ सफल और कुछ असफल हो सकते हैं, खंड काव्य और महाकाव्य भी अंशतः सफल और अंशतः असफल हो सकते हैं, किंतु, गीतों में आधी सफलता और आधी असफलता की कल्पना नहीं की जा सकती-गीत या तो पूर्ण रूप से सफल होते हैं अथवा ये होते ही नहीं।

गीतों से जिसे स्वयं आनंद नहीं मिलता, उसे उनका अर्थ समझाकर आनंदित करना बड़ा ही कठिन काम है। कई बार यह कार्य मुझसे नहीं हो पाता। गीतों में ऐसे संकेत होेते हैं जो बहुत दूर तक जाते हैं, उनके भीतर मनोदशाएं होेती हैं, जिनके पीछे अनुभूतियों का विशाल इतिहास पड़ा होता है, और सबसे बढ़कर तो यह कि उनके शब्दों की अदाएं ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ देखते बनती हैं, जिनके विषय में बहुत कुछ बोलकर भी कुछ कहा नहीं जा सकता। फूूल पर शबनम चमकती है तो देखने वाली आंखें निहाल हो जाती हैं। मगर, उंगली से छूूकर शबनम को परखनेे की कोशिश मर्कटों का काम है। त्यागी ने ठीक ही कहा है-

‘मन का एक झरोखा खोलो,/ मेरी बात सुनाई देगी।’

अभी हाल में ही, मैंने कहीं लिखा है कि कविता का स्वाद बदलने वाला है, ग़ज़ल, दादरे और ठुमरी का ज़माना बदलने लगा है। ग़ज़ल, दादरे और ठुमरी की विदाई यानी संगीत अलग और कवित्व अलग। मगर ग़ज़ल, दादरे और ठुमरी का ज़माना भले ही लद जाय, गीतों का ज़माना हमेशा बरक़रार रहेगा, क्योंकि भावाविष्ट अवस्था में कवि महाकाव्य नहीं लिखता, वह छोेटा-सा गीत लिख देता है।

और कितने अच्छे होते हैं ये गीत। दर्द की छोटी-सी टीस, मगर पता नहीं, वह कहां से उठती और कहां जाकर विलीन हो जाती है। उमंग का एक मतवाला झोंका जो आता तो बड़ी ही गर्मी से है, मगर सारी वाटिका के भीतर एक सिहरन-सी दौड़ जाती है! किसी नन्हीं उंगली की एक हल्की-सी चोट पड़ती तो एक तार पर है, किंतु जीवन-वीणा के सारे तार एक साथ झनझना उठते हैं।

‘मृत्यु की भाषा कठिन होती बहुत ही,

ज़िंदगी उसका सरलतम व्याकरण है।’

त्यागी की कविताओं पर विचार करते हुए कई बातें ध्यान में आती हैं।

महादेवी और बच्चन ने जो परंपरा चलाई वह जनता की अब भी पसंद है। वही परंपरा नीरज, त्यागी, वीरेन्द्र, राही आदि कवियों के भीतर से अपना प्रसार कर रही है।

बच्चन तक हिंदी गीतों के छंद केवल हिंदी के छंद से लगते थे, अब वेे उर्दूू के पास पहुंच रहे हैं। भाषा भी इन गीतों की हिंदुस्तानी रूप ले रही है। कहां है हिंदी में रिवाइवलिज़्म? यह तो रिवाइवलिज़्म के ठीक विपरीत चलने वाली धारा है।

तीसरी बात यह है कि जिस ज़ोर से प्र्रयोगवादी कवि अपना नूतन प्रयोग कर रहेे हैं, उसी ज़ोर से इस पीढ़ी के अनेक नव कवि गीतों में अपना अंतर उड़ेल रहे हैं। यह ठीक है कि नए आलोेचकों ने अपनी आशा प्रयोगवाद से बांध रखी है, किंतु जनता का प्रेेम आज भी इन गीतों पर ही बरस रहा है।

और त्यागी के गीतों में भी यह प्रमाण मौजूद है कि हिंदी के नए गीत अपने साथ नई भाषा, नए मुुहावरे, नई भंगिमा और नई विच्छित्ति ला रहे हैं। प्रयोगवाद सर्वथा नवीन वृक्ष उगाने के प्रयास में है। हिंदी के नए गीतकार परंपरा की डालों में से नई टहनियों की तरह फूट निकले हैं।

त्यागी के गीत मुझे बहुत पसंद आते हैं। उसके रोने, उसके हंसने, उसके बिदकने और चिढ़ने, यहां तक कि उसके गर्व में भी एक अदा है जो मन को मोेेह लेती है।

लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी

 क्षेमचंद्र ‘सुमन’



‘‘मेरी हस्ती को तोल रहे हो तुम,

है कौन तराज़ू जिस पर तोलोगे?

मैं दर्द-भरे गीतों का गायक हूं,

मेरी बोली कितने में बोलोगे ?’’


त्यागी की ये पंक्तियां हालांकि मेरे लिए चुनौती हैं, फिर भी मैं उसकी हस्ती को तोलने और उसके दर्द-भरे गीतों की बोली बोलने की हिम्मत कर रहा हूं। इसका कारण साफ़ है कि त्यागी से आंख मिलाए बग़ैर आधुनिक गीत-काव्य से परिचय प्राप्त करना संभव नहीं है। वह स्वभाव से अक्खड़, आदतों से आवारा, तबियत से जिद्दी और आचरण से बेहद तुनुक-मिज़ाज है। अगर यों कहूं तो आप इसे और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे कि यह वह ख़ुद भी नहीं जानता कि वह क्या है! उसके बहुत-से साथी उसके व्यक्तित्व को असंगतियों और विरोधाभासों का ‘एलबम’ कहते है, तो मैं भी उनके स्वर-में-स्वर मिलाकर इतना कहने की स्वतंत्रता और चाहूंगा कि केवल उसका व्यक्तित्व ही नहीं, पूरा जीवन ही असंगतियों से रंगा हुआ हैऋ और शायद उसकी कविता में भी उसके स्वभाव की ये असंगतियां स्पष्ट रूप से उतरी हैं।

त्यागी के व्यक्तित्व की असंगतियों को और भी साफ़़ तौर से आपके सामने रखने के लिए मैं एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा। 1957 की एक शाम। दरियागंज के ‘रंगमहल होटल’ का अस्त-व्यस्त कमरा। सिगरेट का धुआं और उनके पिये-अधपिये बे-शुमार टुकड़े ! इधर-उधर बेतरतीब फैली किताबें और पत्र-पत्रिकाएं। कमरे में उस समय मैं और वह दो ही प्राणी हैं। इन दिनों वह अपनी बदनाम किताब ‘चरित्रहीन के पत्र’ लिख रहा है। उसमें से एक पत्र वह मुझे पढ़कर सुनाता है। पत्र नहीं है वह, असल में एक निहायत तल्ख़-सी चीज है कुछऋ जिसमें उसके अनुभवों की पूरी कड़वाहट उतर आई है। वह एक प्रणय-पत्र है, जो है तो कल्पित, किंतु लिखा गया है एक ऐसी औरत के नाम, जो कल्पित नहीं है। उस पत्र में जितना सोज़ है, उससे कहीं ज़्यादा कड़वाहट छिपी हैऋ जितनी मुहब्बत है, उससे कहीं अधिक नफ़रत। उसके आखिर में एक ऐसी पंक्ति आती है कि जिसका भाव यह है-‘‘मुझे घृणा हो गई है सारे नारीत्व से, संपूर्ण नारी-जाति से।’’ जिस समय पत्र के इस वाक्य को उसने पढ़ा उसके होठ घृणा से सिकुड़ गए। और तभी मैंने देखा कि अचानक उसकी आंख से आंसू का एक गरम क़तरा निकलकर उस पत्र पर जा गिरा और तभी उसने सहसा दोनों हाथों से अपना मुंह ढांप लिया।

यह है त्यागी का सही चित्र। इसके अतिरिक्त जो कुछ वह अपने को समझता है, या और लोग उसे समझते हैं, वह झूठ है या प्रचार है। वैसे ये दोनों शब्द पर्यायवाची हैं। जब वह यह कहता है कि मैं हर औरत से नफ़रत करता हूं, तब उसका अर्थ यह होता है कि वह किसी एक औरत बेइंतहा मुहब्बत करता है। जब वह दोस्ती के नाम पर नफ़रत से थूक रहा होता है, तभी वह किसी दोस्त के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी कुर्बान कर देने की योजना बना रहा होता है। सारे दिन हर आस्तिक मूल्य की पूरी वंश-परंपरा को कोस लेने के बाद भी शाम को उसका मस्तक किसी मंदिर की देहरी पर झुका होता है।

बात ज़रा अजीब-सी है, किंतु है बेहद साफ़। क्या कभी आपने किसी हद दरज़े के ग़मगीन आदमी की शक्ल ग़ौर से देखी है? यदि नहीं देखी तो त्यागी के चेहरे को देखिए। उसके चेहरे पर कुछ ऐसी आड़ी-तिरछी रेखाएं आपको दिखाई देंगी, जिनका प्रभाव आप पर सौम्य नहीं पड़ेगा। उसकी आंखों के गिर्द फैली रेखाएं आपको पसंद नहीं आएंगी। उसके होठों की नीली शिकनें आपको बदनुमा मालूम होंगी। लेकिन जब कभी परेशानी के वक़्त वह आहिस्ता से आपके कंधे पर हाथ रखकर कहेगा-‘‘मैं जानता हूं आपको क्या चाहिए? मेरे पास एक ही है, पर आपकी ज़रूरत मुझसे ज़्यादा है, इसलिए आप इसे ले लें।’’ तो उसके चेहरे की वह बदसूरती किसी जादुई प्रभाव से अचानक ग़ायब हो जाएगी और वह आपको संसार का सबसे सुंदर इंसान दिखाई देने लगेगा।

त्यागी की ज़िंदगी उसके जीवन में समाए हुए दर्द ने बिगाड़ दी है। ऐसी अवस्था में अगर वह सौंदर्य-चेताओं, नाज़ुक-मिज़ाजों को कहीं खटकती है, बदसूरत लगती है, तो वह दुरुस्त है, उचित है। मुझे उसके पक्ष में कुछ नहीं कहना है। मुझे तो आपसे उस अंधियारे के संबंध में कुछ बात कहनी हैं, जो हर सूरज का जनक है, पिता है। मुझे तो उस कीचड़ के संबंध में कुछ कहना है, जो कमल का सृष्टा है। यदि त्यागी का जीवन समतल और बेदाग़ होता तो मुझे संदेह है कि वह सौंदर्य को इतने निकट से प्यार कर पाता। मझधार में से होकर आने वाली लहर किनारे का हाथ ज़रा मज़बूती से थामती है। यह सही है कि पगडंडी पर चलने वालों के चेहरों पर ज़रा गर्द ज़्यादा जमती है, लेकिन वे राजपथ पर चलने वालों से पहले ही मंज़िल पर पहुंच जाते हैं।

पिछली पंक्तियों में मैंने यह ठीक ही लिखा है कि त्यागी बड़ा अक्खड़ है। जी हां, यदि वह अक्खड़ न होता तो अक्सर लोग, यहां तक कि उसके बहुत नज़दीकी दोस्त भी उससे असंतुष्ट क्यों रहते? मैं स्वयं भी उनमें  से हूं, जो त्यागी के इसी स्वभाव के कारण काफ़ी दिन तक उससे बेहद नाराज़ रहा था। एक समय था जबकि दिल्ली की गलियों में त्यागी के अक्खड़पन की बड़ी चर्चा रहती थी। शायद ही कोई ऐसा सौभाग्यशाली दिन बीतता होगा जिस दिन उसका कोई-न-कोई कारनामा सुनाई न दिया हो। ऐसे अवसर तो उसके जीवन में अनेक बार आए हैं, जब मित्र मंडली में बातें करते हुए उसका हाथ अपनी पैंट की जेब में न रहकर दूसरे के गरेबान पर पहुंच जाता था। मुझे यह अच्छी तरह याद है कि उसकी इन बेतुकी और ग़ैर-शायराना आदतों को देखकर एक दिन उर्दू के किसी शायर ने कहा था-‘‘त्यागी में मंटो जैसी ख़राबियां पाई जाती हैं।’ पर मैं यहां लिखने की आज़ादी चाहता हूं कि मंटो और त्यागी में एक बड़ा फ़र्क है। मंटों लोगों को अपनी और रुजू करने के लिए यह सब करता था, पर त्यागी ऐसा करता है अपने और उन लोगों के बीच खाई बनाने के लिए-जिन्हें वह पसंद नहीं करता। त्यागी ने जीवन में समझौता करना कभी पसंद नहीं किया। इसीलिए वह ज़िंदगी के हर मैदान में (कविता में छोड़कर) बे-तरह नाकामयाब रहा है। उसे केवल एक ही क्षेत्र में कामयाबी मिली है-बदनामी कमाने और लड़ाई मोल लेने में। और उसे अपनी इस नाकामयाबी, इस बदनामी पर बड़ा अभिमान है। उसका कहना है कि यह मैंने बड़ी मेहनत से कमाई है। गांव में पैदा होने के कारण शहरी ज़िंदगी की नफ़ासत को वह अपने में पूरी तरह उतार न सका, अपने को उसके अनुकूल ढाल न सका। आज भी वह बिना सोचे-समझे सादगी से ईमानदारी की बात कर जाता है। तो यह है रामावतार त्यागी का ऊपरी चित्र और चरित्र, जिसने ज़िंदगी में अनेक कठिनाइयों का भीषण हलाहल पीकर अपनी कविताओं के द्वारा मुहब्बत की शराब बड़ी उदारता से बांटी है।

त्यागी का जन्म 8 जुलाई 1925 को मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) की तहसील सम्भल के ‘कुरकावली’ नामक गांव में एक त्यागी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पुरानी वंश-परंपरा के अनुसार उसका परिवार अच्छा-खासा ज़मींदार घराना था, जो निरंतर मुकदमेबाज़ी में लगा रहने के कारण धीरे-धीरे मामूली किसान परिवार में बदल गया। घर की आर्थिक दशा अच्छी न होने के कारण वह सदा प्रभावों और संघर्षों से जूझता रहा। परिवार में चार भाई और एक बहन। उनमें सबसे बड़ा रामावतार। यद्यपि परिवार की अवस्था उन दिनों कुछ अच्छी नहीं थी, किंतु उसके रीति-रिवाज-व्यवहार सब-के-सब ज़मींदारों-जैसे ही थे। इसी कारण उसे छोटी जाति के बच्चों के साथ खेलने तक की मनाही थी। लेकिन घरेलू परंपराओं के प्रति मन में शुरू से ही विद्रोह होने के कारण वह खेलता था उन्हीं के साथ। परिणामस्वरूप खूब पिटाई होती थी। त्यागी का मन पढ़ने की ओर इसलिए घूमा कि उसे पढ़ने से रोका गया, वैसे शिक्षा के प्रति कोई विशेष मोह उसके मन में नहीं था। स्वांग, गाने, भजन, रामायण और आल्हा आदि में उसका मन शुरू से ही रमता था। लाख बार रोके-टोके जाने के बावजूद अपने परिवार के विरोधी परिवारों में वह नित्य आता-जाता था। त्यागी को अपनी दादी का प्यार और दुलार बहुत अधिक मिला। हर वक़्त होने वाली पिटाई से उसकी रक्षा वे ही करती थीं। स्थिति यह थी कि शत्रुओं के परिवार त्यागी को उसके अपने परिवार से अधिक प्यार करते थे। आख़िर रोज़-रोज़ की मारपीट और विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि परिवारों की शत्रुता मित्रता में बदल गई। वह अभी दस ही वर्ष का था, कि उसे पढ़ने के लिए शहर भेज दिया गया। स्कूल गांव से 5 मील दूरऋ और पैदल ही रोज़ वहां आना-जाना। कभी मौज आई तो रास्ते में ही बैठकर कहीं तुकें जोड़ने लग जाता था। इस तरह कविता किसी-न-किसी रूप में बचपन से ही उसके साथ थी।

इस दौरान सन् 1941 में, जब वह सातवीं कक्षा में ही था, उसका विवाह भी कर दिया गया। जिस परिवार में उसका विवाह हुआ, वह भी पढ़ने का घोर विरोधी था। पत्नी अपढ़ होने के साथ-साथ बदज़ुबान थी। जीवन में यदि थोड़ा-बहुत आगे बढ़ने का संबल किसी ने दिया तो वह थी उसकी मां। दादी के अतिरिक्त मां से ही उसे आंतरिक ममता मिली। परिवार में केवल दो ही व्यक्ति ऐसे थे, जिन पर घर के बड़ों की कोपदृष्टि रहती थी, एक उसकी मां और दूसरा वह स्वयं। मां की पीड़ा का त्यागी के मन पर बड़ा असर पड़ाऋ और यही एक बात थी जिसने उसे शिक्षा की प्रेरणा भी दी। उसने मन-ही-मन यह निश्चय कर लिया था कि मां को सुखी करने के लिए उसका पढ़ना ज़रूरी है।

सन् 1944 में सम्भल के किंग जार्ज यूनियन हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा देने के बाद उसने जब काॅलिज में पढ़ने की इच्छा प्रकट की तो घर-भर ने इंकार कर दिया। दूर-दूर से नाते-रिश्तेदारों को बुलाकर सिफ़ारिशें कराई गईं, किंतु सब बेकार। एक तो उन दिनों निरंतर मुकदमेबाज़ी में फंसे रहने के कारण घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी, दूसरे पिता उसे आगे पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन जन्म के विद्रोही को रोक भी कौन सकता था? दूर के रिश्ते के एक ताऊ से सौ रुपए उधार लिए और सिर पर सामान लादकर वह काॅलिज में दाख़िला लेने के लिए चंदौसी पहुंच गया। चंदौसी के श्यामसुंदर मैमोरियल काॅलिज के एक लोकप्रिय छात्र के रूप में उसने सन् 1948 में बी.ए. किया। इसी बीच पत्नी के परिवार वालों से उसका गहरा मन-मुटाव हो गया। वह इस सीमा तक पहुंचा कि उन्होंने उसका बहुत अपमान किया। बात यहां तक बढ़ी कि पत्नी नाता तोड़कर अपने मायके चली गई। यहीं से त्यागी के जीवन का मोड़ आता है। वह नौकरी करने की नीयत में दादी से कुछ रुपए ले कर चुपचाप बे-सरो-सामान दिल्ली के लिए चल दिया। पर रास्ते में ही उसकी तबियत बेईमान हो गई और मन-ही-मन पढ़ाई जारी रखने का निश्चय भी हो गया।

दिल्ली एक अजनबी जगह, और एक मामूली-सी संदूकची उसके पास। उसमें पांच रुपए और कुछ आने। कई दिन तक दिल्ली-जंक्शन के मुसाफ़िरख़ाने में ही आवारगी। दिल्ली में रहने वाले एक दूर के रिश्तेदार से उसने कभी श्री वियोगी हरि का नाम सुना था। उनसे मिलने का मन-ही-मन निश्चय करके वह उनका पता निकालता-निकालता वहां पहुंच गया। हरिजी ने उसकी दुःख-गाथा सुनी और ‘हरिजन उद्योगशाला’ में उसे ठहरने का स्थान मिल गया। शर्त थी कि हरिजन बच्चों को उसे कुछ समय पढ़ाना होगा। त्यागी का स्वप्न धीरे-धीरे साकार होने लगा था।

एक दिन वह समय निकालकर एम.ए. (हिंदी) की कक्षा में प्रवेश पाने की इच्छा से हिंदू काॅलिज में जा पहुंचा। उन दिनों वहां हिंदी-विभाग के अध्यक्ष डाॅक्टर सुरेंद्रनाथ शास्त्री थे। इस समय तक त्यागी की कुछ कविताएं स्थानीय ‘वीर अर्जुन’ में प्रकाशित हो चुकी थीं, अतः जब त्यागी ने श्री शास्त्री जी से उनके काॅलिज में प्रवेश पाने की इच्छा व्यक्त की और अपना नाम बताया तो उन्होंने नाम सुन कर उसे प्यार से अपने पास बिठाया। लेकिन त्यागी का सीधा सवाल था, ‘दाख़िले के भी पैसे पास नहीं हैं, और पढ़ने की हार्दिक इच्छा है, कहीं से कर्ज़ की व्यवस्था हो जाए तो भी काम पूरा हो सकता है।’

अब वह उस दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था, जहां फैशन का कोई ठिकाना नहीं। उसके पास पहनने और फैशन करने के लिए उन दिनों केवल एक हरी कमीज़़ और सफेद लट्ठे का एक पाजामा ही था। लेकिन थोड़े ही दिनों में अपनी कविता और अध्ययन में रुचि होने के कारण वह अपने साथियों और गुरुजनों की निगाह में जम गया।

सन् 1950 में उसकी भेंट ख्याति और श्री महावीर अधिकारी से एक साथ हुई। उन दिनों अधिकारी जी ‘नवभारत’ के रविवासरीय संस्करण का संपादन करते थे और ‘नवयुग’ पर सहायक संपादक के रूप में उनका नाम प्रकाशित होता था। अधिकारी जी ने त्यागी की साहित्यिक प्रतिभा को परखा और इस जगमगाते हीरे को हिंदी-साहित्य-जगत के सामने लाकर अपने जीवन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य का संपादन किया। ‘सिकंदर’ नामक खंडकाव्य के कुछ अंश भी उन दिनों ‘नवयुग’ में प्रकाशित हुए थे, जिन्हें पढ़कर हिंदी कविता के पारखियों को इस नए नक्षत्र के उदय का आभास हो गया था। धीरे-धीरे त्यागी की प्रतिभा तथा योग्यता से दिल्ली का साहित्यिक वातावरण महक उठा। यहीं से उसके विद्रोह और दर्दभरे गीतों की दास्तान शुरू होती है।

मैंने उसे किस प्रकार जाना, इसकी भी एक रोचक कहानी है। सन् 1950 का 16 अगस्त। सब्जी मंडी की रामरूप धर्मशाला में स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में कवि-सम्मेलन का आयोजन। सम्मेलन की अध्यक्षता मैं कर रहा हूं। कार्यवाही प्रारंभ करते हुए एक तरुण का नाम मैं सूची में से घोषित करता हूं। कवि है रामावतार त्यागी। देखता हूं कि औसत कद का सांवले रंग का एक तरुण काला चश्मा लगाए मंच की ओर आ रहा है। इससे पूर्व मैंने उसे नहीं सुना था। लेकिन उस दिन मैंने जो कुछ सुना, वह आज भी नहीं भूला हूं -

पुरातन व्यवस्था बदलता नया युग,

नया ख़ून लेकर चला आ रहा है।

नई नाव जर्जर पुराने पुलिन पर,

मिलन को उतरना नहीं चाहती है।

नई वायु सूखे हुए उपवनों में,

ठहरकर गुज़रना नहीं चाहती है।।

यह था विद्रोह और क्रांति का संदेश, जो उस दिन स्वतंत्रता के शुभागमन पर मुझे त्यागी से सुनने को मिला था। मैंने तभी जान लिया था कि त्यागी का कवि समाज के नव निर्माण के लिए अत्यंत आतुर और आकुल है। वह चाहता है समाज में विषमता का जो जाल फैला हुआ है, उसका शीघ्र ही अंत हो और देश का नव निर्माण करने के लिए तरुणों में त्याग और बलिदान की पावन गंगा प्रवाहित हो उठे।

त्यागी के काव्य में अपने पारिवारिक जनों से निरंतर मिलने वाली प्रताड़नाएं और लांछनाएं समय की हवा पाकर असंतोष और विद्रोह के रूप में बदल गई। धीरे-धीरे उसका वही असंतोष परिवार के प्रति न रहकर समाज की विषमताओं के प्रति हो गया और एक स्थिति ऐसी आई कि उसकी रचनाओं में समाज की समग्र व्यवस्था के प्रति असंतोष दिखाई देने लगा। उसे जीवन के प्रारंभ से ही किसी का प्यार और दुलार नहीं मिला था। शायद इसीलिए समाज के प्रत्येक प्राणी में उसे शोषक और हिंसक का रूप ही दिखाई देने लगा। यहां तक कि समाज की व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने के लिए उसका कवि व्यग्र हो उठा। उसने युग के इतिहास को बदलने के लिए देश के तरुणों को चुनौती दी और लिखा -

तुम समझोगे, मैं बाग़ी हूं, विद्रोही हूं,

तुम कहकर मुझको ‘पागल’ एक पुकारोगे।

तुम ‘महा नास्तिक’ कहकर ग़ाली भी दोगे,

हो सका अगर तो मुझ पर पत्थर मारोगे।

पर मैं तो बंधन तोड़ ज़माने-भर के ही,

इस एक बग़ावत को सुलगाने आया हूं।

मैं चमचम करते फाड़ समाजी परदे को,

अंदर सड़ती तसवीर दिखाने आया हूं।

तथा

सौगंध हिमालय की तुमको,

युग का इतिहास बदल दो!

ये भूखे कंगाल सिकुड़ते सड़कों पर रातों में,

दिया गया नूतन विधान का ध्वज जिनके हाथों में,

इससे तो पतझर अच्छा,

ऐसा मधुमास बदल दो!

सौगन्ध हिमालय की तुमको

युग का इतिहास बदल दो!

निरंतर अभावों और संघर्षों से जूझते रहने के कारण कवि त्यागी का यह विद्रोही रूप अपने छात्र-जीवन में ही पनप चुका था। सन् 1950 में दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. करने से पूर्व ही दिल्ली के साहित्यिक तथा सामाजिक जीवन में उसका अच्छा स्थान बन चुका था। कुछ समय बेकार रहने के बाद उसे यहां की ‘रामरूप विद्या मंदिर’ नामक शिक्षण संस्था में अध्यापन-कार्य मिल गया और उसके जीवन में कुछ स्थायित्व भी आ गया। इसी दौरान उसने परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को यहां तक निबाहा कि यह संघर्ष करते हुए भी अपने दो छोटे भाइयों को पढ़ाने में भरपूर मदद की। लेकिन स्वाभिमानी और लड़ाकू स्वभाव होने के कारण वह रामरूप विद्यामंदिर में अधिक दिन नहीं टिक सका और फिर उसके जीवन में एक नई आंधी आ गई।

यहीं से उसकी अनगिन असफल प्रेम-कथाओं का आरंभ होता है। पत्नी से सदा-सर्वदा के लिए रिश्ता टूट चुका था। ख्याति उसके चारों और घूमने लगी थी। फिर क्या था, रूप की तितलियां आती रहीं, और एक के बाद एक, कभी अनेक भी उसके जीवन को डसकर जाती रहीं। उसका जीवन पूरी तरह विषाक्त हो उठा। कभी मूचर््िछत, और कभी अर्ध-मूचर््िछत मैंने उन दिनों उसे देखा। जब-जब ग़ौर से देखा, दर्द के सिवा उसके पास कुछ भी नहीं दिखाई दिया।

अब उसकी कविता में विद्रोह की आग नहीं थी। केवल प्रेम और शृंगार के अनूठे गीतों की रचना ही इस बीच हुई। यह बात ज़रूर है कि उसकी ऐसी रचनाओं में भी सौंदर्य और प्रेम की विषमता के प्रति विद्रोह परिलक्षित होता है। इस दौर की उसकी रचनाओं की गंध दिल्ली की गली-गली में बिखरकर सारे हिंदुस्तान में फैल गई।

‘ज़िंदगी’ नामक कविता ने तो उन दिनों देश की तरुणाई के मानस में अचेतन रूप से सुप्त वियोग के ज्वार को बुरी तरह जागृत कर दिया था। त्यागी के साथ-साथ बे-शुमार कंठ गुनगुना उठे -

आंख दो टकरा गई हों, जब किसी के लोचनों से

हो गया हो मुग्ध जो भी रूप के कुछ कंपनों से,

मौन जीवन-वाटिका में प्यार के तरुवर तले,

मिल गए हों प्राण जिसको राह में गाते वनों से

उन मिलन के दो क्षणों का नाम केवल ज़िंदगी,

रात को इन तड़पनों का नाम केवल ज़िंदगी।


बंधनों से चाहता है मुक्त होना सब ज़माना

चाहता हूं मैं किसी के लोचनों में घर बसाना

बंध गया जो दो भुजों के बंधनों में एक पल भी

चाहता है मौन कारावास में जीवन बिताना।

प्यार के इन बंधनों का नाम केवल ज़िंदगी,

रात की इन तड़पनों का नाम केवल ज़िंदगी।


मुझको भी प्यार मिला दो दिन

कोमल भुज-हार मिला दो दिन

उन आंखों में रहने का भी

मुझको अधिकार मिला दो दिन

जिन आंखों की गहराई में, तुम डूब रहे, मैं उबर चुका,

पथ एक वही अंतर इतना, तुम गुज़र रहे, मैं गुज़र चुका।

विश्वास किया सौगंधों पर

मैंने उस दिन तुमसे बढ़कर

कल मुझे लिखा जो आज तुम्हें

मज़मून वही, तिथि का अंतर।

त्यागी ने अपने थोड़े-से जीवन में स्वप्न की भूमि पर कल्पना के अनेक महल बनाए और मिटाए हैं और उसने उनमें आकंठ डूबकर ‘सृजन’ और ‘पतन’ की गहराई को क़रीब से देखा है। इसकी घोषणा उसने ख़ुद यों की है -

मैं चला हूं जहां भी मरुस्थल वहीं, घोर संवेदनों को चला झूमता, 

जीवनाकाश में चंद दुर्दैव का, रात में और दिन में रहा घूमता। 

प्यार मुझको सुलाता रहा दर्द की लोरियां ज़िंदगी में सुनाकर सदा, 

दोपहर दुर्दिनों का निराशा लिए, पैर मेरे जलाकर रहा चूमता। 

परिच्छेद मैंने बहुत ज़िंदगी के लिखे, पर सभी की कथा एक-सी

दीप पहले जला औ शलभ बाद में राख दोनों हुए, थी ख़ता एक-सी 

दर्द की एक मदिरा दवाई किसी ने बताई इसीसे बहुत पी गया, 

पी गया हूं गरल, पी गया अश्रु भी, पी गया हूं सुधा,

पर व्यथा एक-सी।

ज़िंदगी से मरा, मौत से जी गया, आंधियों में पला, 

सांस से बुझ गया, मैं जनम को मरण को बहुत जानता हूं।

त्यागी सरल था, सहज था। इसलिए छला भी उसे जी भरकर गया। लालची निगाहें आती रहीं और उसके स्वप्न तोड़कर जाती रहीं। कलियों ने, फूलों ने, भंवरों ने, उपवन ने, यहां तक कि मालियों ने भी उसे नोचा। उसके जीवन में कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां कोई-न-कोई खरोंच न हो। अब वह टूटा हुआ, बिखरा हुआ इंसान था। एक नाकामयाब सपने की तरह मैंने उसे भटकते देखा है। लेकिन भटका सिर्फ़ उसका व्यक्ति ही, गीत उसका कभी नहीं भटका। उसने जहां भी थोड़ा-सा स्नेह मिलता देखा, उधर ही निकल गया। किंतु सब मृग-मरीचिका ही सिद्ध हुआ और उसने अपने अरमानों की होली जलानी शुरू कर दी - 

कल्पना के पुष्प चुन-चुन स्वप्न थे मैंने सजाए

भावना को साधना कह, गीत कितने गुनगुनाए

जो हुआ अपराध मुझसे, सब हृदय की भावना थी,

उन मधुर आकर्षणों में मैं रहा सुध-बुध भुलाए।


याद मत मुझको दिलाओ भूत की भूली कहानी,

आज मैं अरमान की होली जलाकर जा रहा हूं

गीत जो मैंने बनाए थे, मिटाकर आ रहा हूं।

सन् 1953-55 के बीच एक संगीन घटना उसके जीवन में घट चुकी थी, इस कविता को लिखने के बाद से उसके गीतों में पीड़ा का जो सागर लहराया उसकी कल्पना करके भी रोमांच हो आता है। ये वे दिन थे जब त्यागी अपनी वाणी और लेखनी दोनों के द्वारा असंतोष से भरी पीड़ा की उपासना में रत था। उन्हीं दिनों त्यागी ने लिखा था -

मेरी आंख कुछ नम ही रहने दो,

मुझको थोड़ा-सा ग़म ही सहने दो,

जीवन की आंखें पोंछ सके कोई-

ऐसा आंचल हो तो मुझको ला दो।

......

जो समुंदर की सतह पर, तैरती हो बाल खोले,

अब उसी बाग़ी लहर के हाथ का कंगन बनूंगा।

मैं रहूं प्यासा, यही काफी नहीं है,

होठ भी मेरे किरन से छील डालो।

फिर उदासी की गुफा में बंद कर दो

माफ़ कर दूंगा तुम्हें संसार वालो !

लाज को बे-बात जिसकी, दे गया ग़ाली स्वयंवर,

मैं उसी घायल दुल्हन की, बेज़ुबां तड़पन बनूंगा।

आज मैं सुख के लिए चिंतित नहीं हूं,

दर्द तो यह है कि दुःख घटने लगा है।

चल रहा था जिस उदासी के सहारे,

हाथ उसका हाथ से छुटने लगा है।

तोड़कर सारे नियम जो कल्पना को पूजती है,

मैं उसी चंचल जवानी का सरल बचपन बनूंगा।

.......

तुम कृपण ऐसे कि मेरे मांगने पर,

और क्या आशीष भी तो दे न पाए,

दर्द इतना दे दिया देने लगे यदि,-

उम्र-भर भी नींद जो मुझको न आए,

त्यागी ने अपने लिए जिस मार्ग का वरण किया, ज़ाहिर है कि वह साधारण मार्ग नहीं हैऋ बड़ा अनगढ़ और पथरीला मार्ग है वह। इसी कारण उसे अपने अभीष्ट की प्राप्ति में भारी संघर्ष करना पड़ा है। उसके जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप यही है कि उसे समझौता करना नहीं आता। किसी के सामने झुकना नहीं आता। यही कारण है कि उसका विरोध भी काफी हुआ है, और हो भी रहा है। इसकी सफ़ाई में त्यागी ने एक जगह पर लिखा है -

मेरे पीछे इसीलिए तो धोकर हाथ पड़ी है दुनिया,

मैंने किसी नुमाइशघर में सजने से इंकार कर दिया।

मन का घाव हरा रखने को

अनचाहे हंसना पड़ता है,

दीपक की ख़ातिर अंगारा,

अधरों में कसना पड़ता है।

आंखों को रोते रहने का ख़ुद मैंने अधिकार दिया है,

सच को मैंने सुख की ख़ातिर तजने से इंकार कर दिया।

.....

मेरा मोल लगाने का वे दम भरते हैं,

जिनका मन सौ-सौ हाथों नीलाम हुआ है

मैं उनकी ड्यौढ़ी का गायक हूं, याचक हूं

विष को छोड़ जिन्होंने अमृत नहीं छुआ है,

हिंदी में नई पीढ़ी के जितने भी कवि पिछले दस वर्षों में उभरे हैं उनमें त्यागी ही मात्र ऐसा कवि है, जिसने सरल शब्दावली में गहरी-से गहरी अनुभूति गीतों के माध्यम से प्रस्तुत की है। त्यागी के गीत उसके शब्दों के जादू और अर्थ-बोध दोनों ही दृष्टि से हिंदी-कविता में अपना विशिष्ट स्थान बना चुके हैं। त्यागी का मत है कि ‘भाव का उद्भव-मात्र ही गीत को जन्म देने के लिए पर्याप्त नहीं है, वरन् जो भाव मन में जीते-जीते जीवन का दुःख-सुख बन जाता है, वही गीत को जन्म देने में समर्थ होता है।’ गीत की परिभाषा में उसने ख़ुद यों लिखा है -

गीत क्या है, सिर्फ़ छंदों में सजाई,

आदमी की शब्दमय तसवीर ही तो,

ज्ञान है अज्ञान का उपनाम केवल,

अश्रु ममता की विकल तक़रीर ही तो।

.....

ये मन की गहराई से निकले हैं,

जीवन की अमराई से निकले हैं,

ये यौवन की रामायण-जैसे हैं,

ये स्वर की शहनाई से निकले हैंऋ

गीत की महिमा का वर्णन त्यागी ने अपनी कविताओं में अनेक स्थानों पर सूक्ति के रूप में किया है। दो उदाहरण इस प्रकार हैं-

डगमगाई नाव जब-जब भी किसी की

गीत ने हंसकर किनारा दे दिया,

उस दिए का मोल बोलो कौन देगा,

आंधियों के रोष को जिसने पिया?

लाख चांदी को पसारो,

किंतु तन के साहुकारों,

प्यार के निर्धन वचन बिकते नहीं है।

.....

गीत की डोर को ही पकड़कर बढ़ो,

फूल हो तो किसी देवता पर चढ़ो,

घंटियों की तरह तुम जहां बज उठो,

मैं वहीं प्रार्थना की तरह गा उठूं,

त्यागी ने इन गीतों के निर्माण में अपने जीवन का सर्वस्व तक होम दिया है। जीवन का सारा हास-उल्लास तक उसने अपने गीतों में समोकर मानव-जगत् के कल्याण के लिए रख दिया है। इन गीतों के निर्माण में उसे कितना त्याग करना पड़ा है, इसका अनुमान आप उसकी इन पंक्तियों से लगा सकते हैं। उसका कहना है -

जितने गीत रचे हैं मैंने,

इस लंबी बीमार उमर में,

उन सबको बेचूं तो शायद

आधा कफ़न मुझे मिल जाए।

मैं न जनम लेता तो शायद

रह जाती विपदाएं क्वांरी

मुझको याद नहीं है मैंने

सोकर कोई रात गुज़ारी

मुझको अपनी निष्ठाओं का

कुछ तो फल मिलना है आख़िर

मेरे बाद बहुत संभव है

सारी धरन मुझे मिल जाए।

त्यागी के जीवन में जितनी पीड़ा, वेदना और कसक है, यदि उतनी पीड़ा किसी और व्यक्ति ने जीवन में सही होती तो कदाचित् वह पागल हो जाता। उसने अपनी पीड़ा को अपने इन गीतों में उड़ेलकर वास्तव में एक प्रशंसनीय कार्य किया है। कदाचित् उसका कोई भी ऐसा गीत नहीं, जिसको पढ़कर या सुनकर हिंदी का कोई भी सहृदय पाठक या प्रेमी झूम न उठे, छलछला न उठे। आज हिंदी के कवि-सम्मेलन जो इतने लोकप्रिय हो रहे हैं, उनकी लोकप्रियता में यदि किसी कवि ने साहित्यिकता को उल्लेखनीय रूप में जोड़ा है, तो वह रामावतार त्यागी है। उसकी रचनाओं और उसके गीतों की सफलता का एक कारण यह भी है कि वह उनके द्वारा हिंदी में नई भाषा, नए मुहावरे, नई उपमाएं और नए छंद लाया है। हिंदी के मूर्धंय कवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने उसके कवित्व की प्रशंसा करते हुए उसकी नई काव्य-कृति ‘आठवां स्वर’ की भूमिका में लिखा है- ‘‘त्यागी के गीत मुझे बहुत पसंद आते हैं। उसके रोने, उसके हंसने, उसके बिदकने और चिढ़ने, यहां तक कि उसके गर्व में भी एक अदा है, जो मन को मोह लेती है।’’  इसी प्रकार डाॅ. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ ने त्यागी के संबंध में कहा है-‘‘त्यागी प्रणय की विभिन्न परिस्थितियों का जिस मार्मिकता से चित्रण करते हैं वह अद्वितीय है। सहज भाषा लिखने में वह हिंदी के आधुनिक गीतकारों में सबसे आगे हैं। अछूती उपमाएं, ताज़ी सूक्तियां और मौलिक प्रयोग त्यागी जी की कविता के ऐसे गुण हैं, जो गीतकारों के लिए ही नहीं, प्रयोगवादियों के लिए भी आदर्श हो सकते हैं।’’

ये दो उदाहरण तो हिंदी की दो पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन उसके पाठकों का उसकी रचनाओं के संबंध में जो अभिमत है। वह अधिक वास्तविक है। एक पाठक ने उसको अपने एक पत्र में महोबा से लिखा है-‘‘आपके गीतों में कुछ इतनी पीड़ा और कसक मिलती है कि अकेला मैं ही नहीं, मेरे-जैसे कितने अनेक पाठक उसमें अलग-अलग अपनी-अपनी तस्वीर देखते हैं।’’

त्यागी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यह है कि उसने संसार के पीड़िता, तिरस्कृत और लांछित वर्ग की पीड़ा को अपनी ही पीड़ा समझ कर उस भाषा में चित्रित किया है, जो जन साधारण की है, और जिसे स्वाभाविक बनाने में उसके छंदों ने पर्याप्त सहायता दी है। कभी-कभी त्यागी ने अपने इन गीतों में प्राणों की वह संजीवनी पाठकों को प्रदान की है कि बहुत से लोगों ने उनसे पर्याप्त प्रेरणा ग्रहण की है। किसी कवि की कविता पढ़कर कोई व्यक्ति अगर आत्म-हत्या करने का अपना इरादा बदल दे तो इसे आप क्या कहेंगे? रामपुर के एक ऐसे ही व्यक्ति ने त्यागी को पत्र लिखा, जो जीवन से निराश होकर आत्म-हत्या करने तक का निश्चय कर चुका था। उसने अपना निश्चय त्यागी की कविता पढ़कर बदल डाला और अपने पत्र में लिखा-‘‘मैंने आपकी रचना पढ़कर ही अपना विचार बदला। उसने मुझे जीने की प्रेरणा दी। धन्यवाद।’’

त्यागी जीवन में सौंदर्य और अनुभूति का चित्रण करने वाला कवि है। उसके गीतों में जहां संध्या के डूबते हुए सूर्य की सुनहली छाया है वहां उसने संसार की वेदना को अपने गीतों के गंगा-जल के समान पवित्र आंसुओं से पखारा है! धूल और आंसुओं से लिपटे त्यागी के गीत हृदय की उष्णता में तपकर बाहर निकले हैं, और ये कंचन के समान खरे लगते हैं। नपे-तुले शब्दों में लिखे गए त्यागी के गीत स्नेह-शिखर से झरते हुए झरने के समान मानव-मन की अतल गहराइयों में बैठकर उसे इस प्रकार आप्लावित कर देते हैं कि ऐसा लगने लगता है, जैसे जीवन के सफेद-सफेद फूलों पर गीतों की रंग-बिरंगी तितलियां छोटे-छोटे पंख पसारकर उड़ रही हों। उसके गीतों की सादगी ने त्यागी को अपने पाठकों के मन में जो स्थान दिलाया है, वह आज की पीढ़ी के कवियों के लिए ईष्र्या की वस्तु है। उसके गीतों में बातचीत का ऐसा लहज़ा होता है कि वह साधारण पाठक के मन को अपील कर जाता है, छू जाता है। कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं -

मंदिर में सौगंध दिला लो

मुझसे गंगा-जल उठवा लो

.....

मैं चला आया निमंत्रण पर तुम्हारे

द्वार तक भी क्या न पहुंचाने चलोगे?

.....

मेरे पीछे धोकर हाथ पड़ी है दुनिया

.....

एक कोई है कि जिसका ध्यान करके

गांठ आंचल में लगाकर जोड़ लेते।

.....

मृत्यु की भाषा कठिन होती बहुत ही

ज़िंदगी उसका सरलतम व्याकरण है।

.....

त्यागी ने गीतों के क्षेत्र में जो सफलता प्राप्त की है, वह उसकी पीढ़ी के बहुत कम कवियों को मिली है। इतनी छोटी सी उम्र में उसने जहां हिंदी के साधारण-से-साधारण पाठक का प्यार और दुलार प्राप्त किया, वहां प्राचीन पीढ़ी के लिए भी वह एक कौतूहल का सृष्टा रहा। यह त्यागी की सफलता नहीं तो क्या है कि दिल्ली की एक गोष्ठी में हिंदी के शीर्षस्थ कवि डाॅ. हरिवंशराय बच्चन ने यह कहा था-‘‘रामावतार त्यागी आज की पीढ़ी के कवियों में भारत-भर में अकेला है। वह गीतों का बादशाह है।’ किसी ने उसे मजाज़ बताया, और किसी ने जिगरऋ लेकिन वह सिर्फ़ त्यागी है ! जो बिलकुल मौलिक है, बिल्कुल ताज़ा है।

त्यागी ने अपनी पीड़ा, वेदना और व्याकुलता को जहां अपने काव्य का माध्यम बनाया है, वहां उसने अपने गीतों में ऐसी अनेक विचार सूक्तियां भी लिखी हैं, जो हिंदी के प्रत्येक वर्ग के पाठक के लिए पठनीय ही नहीं, मननीय भी हैं। कुछ उदाहरण लीजिए -

कालियों को बेदाग़ ताज़गी,

पूजा के कुछ काम न आई,

बासी फूल चढ़े मंदिर में,

अनुभव की दी गई दुहाई,

.....

पाप बचपन ने न जाने क्या किया है,

शाप यौवन का किसी ने दे दिया है,

इसलिए बेचैन से मिलते सभी है,

अनमने-से राह पर चलते सभी हैं।

.....

माना मिट्टी का एफ खिलौना हूं

लेकिन कुछ का मन तो बहलाया है

आख़िर इतना बेकार नहीं हूं मैं,

जो कोई जग के काम न आया है।

.....

सुधि का दीप जला लेने से

दुःख आपस में बंट जाता है।

रोशनदान खुले रखने से

कुछ सूनापन घट जाता है।

.....

मेरे जीवन के सूने आंगन में

जिसने दुःख का मेहमान बसाया है

वह मेरे लिए न ईश्वर से कम है

जिसने मेरा सुनसान घटाया है।

.....

समय का महाजन बड़ा ही कृपण है

निवेदन किया, किंतु देता न ऋण है।

त्यागी ने कविता के क्षेत्र में तो यश प्राप्त किया ही, सांसारिक क्षेत्र में भी उसने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

सन् 1955 में उसके जीवन में एक संगीन घटना घट गई। यों इस बदनाम कहानी का प्रारंभ सन् 1954 में ही हो चुका था। उसके स्नेहसिक्त और विषादमय जीवन में अचानक एक सुबह ऐसी किरण उतरी कि जिसने उसकी अंधेरी दुनिया को जगमगा दिया। ग़रज़ कि जब त्यागी मायूस होकर दिल्ली की अंधेरी और तंग गलियों में रोशनी की खोज में भटक रहा था, तभी उसके झुलसते मस्तक पर एक कोमल हथेली ने शीतलता बिखेर दी। यह हथेली किसकी थी, इसकी चर्चा मैं जानबूझकर नहीं करूंगा। अक्सर मैंने, औरों ने, और शायद सभी ने त्यागी को उन दिनों अकेला कभी नहीं देखा था। जब देखा, तभी उस परिचित और सौम्य चेहरे के साथ। असली नाम जाने उसका क्या था, लेकिन त्यागी की ‘चरित्रहीन के पत्र’ नामक पुस्तक के मुताबिक़ उसका कल्पित नाम ‘सोमी’ है। त्यागी की ज़िंदगी का शायद सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि उसकी छोटी-से-छोटी ख़ुशी से लगा हुआ कोई इतना बड़ा ग़म उसके साथ ज़रूर आया है कि मुसकुराने के लिए उसे एक पल भी नहीं मिला। जिस दिन यह रूप-किरण त्यागी के आंगन में उतरी उसी शाम ‘रामरूप विद्या मंदिर’ से उसकी नौकरी छूट गई। फिर भी उन दिनों वह ख़ुश नज़र आता था। हालांकि मैं अचरज से उसके तंग हाल को देखता था और सोचता था कि न जाने कैसा यह आदमी है जिसे रोटी से ज़्यादा भूख प्यार की है। त्यागी की ज़िंदगी को वह रंगीन (या जैसी भी हो) कहानी चली, और चलती गई। इसके बारे में त्यागी ने अपनी पुस्तक ‘चरित्रहीन के पत्र’ में ख़ुद लिखा है- ‘दिवाली आई और चांद के तारे-जैसा एक चांदी का चिराग़ लेकर तुम मेरे घर आई थीं, क्योंकि तुम्हें मालूम था कि तुम न आईं तो मेरे घर रोशनी को जन्म नहीं मिलेगा।’’

‘‘उन दिनों तुम्हें मेरे स्वप्न आते थे, नींद में अक्सर तुम मेरी आहटों से चैंक उठती थीं। ढेर-सा दर्द न जाने कहां से तुम्हारे मन में समा गया था। और एक भी दिन ऐसा नहीं होता था जब तुम अपने आंसुओं से मेरी छाती को पानी-पानी न कर देती हो।’’

‘‘मुझे याद है, रात को जब मैं तुम्हारे घर से विदा होता था तो द्वार तक तुम मुझे प्रकाश दिखाने आती थीं। कई बार तुम कह चुकी थीं कि जब मैं तुम्हें विदा करके लौटती हूं तो लौटकर तब तक उस मोमबत्ती को नहीं बुझाती जब तक मुझे यह यक़ीन न हो जाए कि तुमने अपने कमरे की रोशनी जला ली होगी। कभी-कभी तो मैं तुम्हारे जाने के बाद इतनी ज़ोर से सिसक उठती हूं कि कई दिन तक मां के सवालों के जवाब सोच-सोचकर देने होते हैं।’’

आख़िर दो वर्ष तक बेकार रहने के बाद उसे ‘समाज’ के संपादन का काम मिल गया। रोटी घर आई, तो प्यार जा चुका था। क्यों चला गया, कुछ मालूम नहीं। शायद इसीलिए कि हमेशा ख़ुशी के साथ ग़म उसकी ज़िंदगी में आता ही रहा है। अब त्यागी वह त्यागी नहीं था, बल्कि लगता था कि दर्द आदमी की देह धारण किए भटक रहा है। बदनाम गलियों में, शराबख़ानों में, खंडहरों में, बियाबान जगहों पर, जब भी देखो, उदासी में डूबा, चुपचाप पागलों की तरह वह घूमता रहता था। परिणाम-स्वरूप लंबी बीमारी ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी मनःस्थिति उसके इन वाक्यों में अंकित है- ‘‘रात का यह वक़्त, शायद काफी बजे होंगे, मैं लेटा हूं, गुर्दे में फिर हल्का-हल्का दर्द हो रहा है। डाॅक्टर तक जाने की हिम्मत नहीं, दर्द को सहने का बल नहीं। चारों तरफ़ मौत मंडरा रही है, लेकिन पास नहीं आती। इस सुनसान में मुझे एक ही स्वर सुनाई देता है। एक झनझनाहट जो बार-बार मुझसे कहती है कि जब तुम्हारा स्वर मेरी तरह गूंजने लगे तब तुम इस बेक़रारी से मुक्त हो जाओगे।’’ ये वे दिन थे, जब त्यागी ‘समाज’ का संपादन करता था। लेकिन बड़ी लाचारी, मायूसी के दिन थे। किसी भी काम में उसका मन नहीं लगता था। आख़िर महावीर अधिकारी ‘समाज’ को छुड़ाकर उसे अपने साथ ‘समाज कल्याण’ में ले गए। जगह बदल जाने पर भी दर्द नहीं बदला। स्वभाव इतना अधिक चिड़चिड़ा हो गया था कि त्यागी एक दिन ख़ुद अधिकारी जी से भी झगड़ बैठा और नौकरी छोड़कर फिर बेकारी-बेरोज़गारी के आलम में आ पहुंचा।

यहां यह उलल्ेखनीय है कि ‘समाज’ में 6 महीने तथा ‘समाज कल्याण’ में लगभग 1 वर्ष कार्य करने के अतिरिक्त त्यागी ने कुछ दिन ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में भी काम किया है। उसकी इस आदत से कि वह कहीं भी जमकर काम नहीं करता, उसके सभी हितैषी नाराज़ हैं। लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि अब उसके जीवन में कुछ स्थायित्व आ गया है। पिछले लगभग सवा साल से, जब से वह ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादकीय विभाग में कार्य करने लगा है उसमें कुछ दुनियादारी आ गई है, उसे नौकरी करनी आ गई है। कदाचित् इसका कारण उसकी दूसरी शादी है, जो उसने पिछले वर्ष (1960) 26 जनवरी को नागपुर के एक पंजाबी परिवार की एक महिला सुश्री सुयश एम.ए.बी.टी. से की है। अब तो पहली पत्नी से प्राप्त उसकी एक-मात्र 11 वर्षीया कन्या राजबाला भी त्यागी के पास ही दिल्ली में रहकर पढ़ रही है और त्यागी अपने परिवार के लोगों के निर्वाह के लिए भी तीस रुपए मासिक बराबर भेजता जा रहा है। सन् 1955 से 1958 तक की त्यागी की जो भी रचनाएं हैं, वे ऐसी हैं कि जिनके आधार पर उसे ‘पीड़ा का गायक’ कहा जा सकता है। शायद पीड़ा की इतनी सजीव अभिव्यक्ति भक्तिकालीन कुछ कवियों को छोड़कर हिंदी के किसी कवि की रचनाओं में नहीं मिलती। उसकी इसी दौर की चुनी हुई रचनाओं का संकलन ‘आठवां स्वर’ है, जिसमें त्यागी के कवि की अमरता निवास करती है। त्यागी का पहला काव्य-संग्रह ‘नया ख़ून’ 1953 में प्रकाशित हुआ था। उसमें उसकी असंतोष, विद्रोह और क्रांति से परिपूर्ण वे रचनाएं संकलित हैं, जिसके कारण त्यागी ने कविता की विशाल अट्टालिका में अपने लिए उल्लेखनीय स्थान बनाया है। त्यागी ने एक उपन्यास भी लिखा है, जिसका नाम ‘समाधान’ है। इसके अतिरिक्त ‘मैं दिल्ली हूं’ नामक एक छोटा-सा बालोपयोगी काव्य भी उसने लिखा है, जिस पर भारत सरकार के शिक्षा-सचिवालय ने इस वर्ष पुरस्कार भी प्रदान किया है। त्यागी के ‘आठवां स्वर’ को पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने भी पुरस्कृत किया था। ‘राजधानी के कवि’ के अतिरिक्त त्यागी की साहित्यिक प्रतिभा और उसकी सूझ-बूझ का परिचय ‘प्रगीति’ नामक उस त्रैमासिक पत्र के पहले अंक को देखने से मिलता है, जो उसने श्री बालस्वरूप ‘राही’ के सहयोग से संपादित किया था, और जो केवल अपने जन्म की घोषणा करके साधनों के अभाव में असमय ही मौत की नींद सो गया।

त्यागी अब कवि होने के साथ-साथ एक अच्छे गृहस्थ-जैसा जीवन जी रहा है, यह कम आश्चर्य की बात नहीं। कारण कि जिसने पुराने त्यागी को देखा है उसे यह स्वप्न में भी गुमान नहीं हो सकता कि त्यागी इतना बदल चुका है। किंतु इसका आशय यह कदापि नहीं कि कविता से उसका दामन छूट गया है। बात असल यह है कि अब तो उसने जमकर लिखना शुरू किया है। उसके जीवन में जो अतृप्ति, असंतोष, विद्रोह और वितृष्णा थी, वह सब दूर होकर अब उसकी प्रतिभा हिंदी-गीत-काव्य को नई शब्दावली, नई अभिव्यक्ति, सूक्तियां, भाव-भूमि और छंद-विधान देने लगी है। हिंदी-कविता में विदेशी संस्कृति को लाने को उत्सुक प्रयोगवादी कवि-आलोचकों ने जब हिंदी-गीति-काव्य पर पुनरावृत्ति, पुरानेपन और अक्षमता-जैसे आरोप लगाए तो जिनके हाथों में हिंदी के गीत-काव्य की पताका थी वे अलमबरदार भी बहक गए। तब हर नए विचार और भाव को नई शब्दावली से परिपूर्ण सरस अभिव्यक्ति देने की गीत की क्षमता को जिन कवियों ने घोषित किया उनमें त्यागी का नाम पहली पंक्ति में आता है। आज की पीढ़ी में हिंदी में ऐसे कवि कम ही होंगे, जिन्होंने इतनी अधिक संख्या में इतनी श्रेष्ठ रचनाएं हिंदी को दी हों, जितनी कि त्यागी ने। किसी भी कवि के व्यक्तित्व एवं कृकृतित्व को आंकने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि उसके संबंध में उससे बड़े, उसके समकालीन और उसके पाठक क्या विचार रखते हैं। पिछली पंक्तियों में हम त्यागी के संबंध में हिंदी के कुछ मूर्धंय साहित्यकारों के अभिमत दे चुके हैं। अब आप देखें कि त्यागी के बिल्कुल समकालीन कवि और उसके अनन्य स्नेही श्री बालस्वरूप ‘‘राही’’ उसकी ‘आदतों को छोड़िए भी आदमी वैसे गुणी हूं’ नामक पंक्ति को ही त्यागी का परिचय मानकर उसके संबंध में क्या लिखते हैं- ‘उसका जीवन उत्तरदायित्वहीनता, घुटन, संघर्ष ओर फ़ाक़ामस्ती की एक अनंत शृंखला, उसका व्यक्तित्व परस्पर-विरोधी असंगतियों का एक विलक्षण संगठन। प्यार करे तो ज़िंदगी निसार कर दे, नाराज़ हो जाए तो औपचारिकता भी नहीं बरत सकता। विद्रोह और मोह, अहं और समर्पण का ऐसा अद्भुत संयोग मैंने कहीं नहीं देखा। अविनम्रता की सीमा को छूता हुआ स्वाभिमान, असहिष्णुता तक पहुंचने वाली संवेदनशीलता, तुनुकमिज़ाजी, ये उसके व्यक्तित्व के दो ख़ास पहलू हैं। सोचता हूं, इतने निर्मम व्यक्ति ने इतनी सहृदयता कहां से पाई। पर यह भी सच है कि निर्झर चट्टान का वक्ष तोड़कर ही प्रवहमान होते हैं।’’

त्यागी के एक पाठक के पत्र का उल्लेख करके मैं इस वक्तव्य को समाप्त करूंगा। यह त्यागी की लोकप्रियता नहीं तो और क्या है कि उसकी रचनाओं को पढ़ने के लिए आतुर एक पाठक ने उसको अपने 10 दिसंबर, 1960 के पत्र में लिखा - ‘‘दो रुपए के डाक-टिकट पत्र के साथ भेज रहा हूं, ‘आठवां स्वर’ के लिए। संभव हो तो भिजवा दीजियेगा। शेष क़ीमत अगले मास भेज दूंगा। चाहूंगा कि साथ में अपनी एक अन्य पुस्तक भी रखवा दें। विश्वास करें सुविधानुसार क़ीमत भेज दूंगा।’’

यह साधारण पत्र नहीं है। त्यागी ने अपने पाठकों का एक वर्ग बना छोड़ा है, जो उसके पीछे भी उसकी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक होगा। उक्त पाठक ने अपने इसी पत्र में त्यागी की प्रशस्ति में कुछ ‘रूबाइयां’ भी लिखी थीं। उनमें से एक यों है -

‘‘छलकता हुआ इक जाम है त्यागी

दिल की दुनिया में सरनाम है त्यागी

वास्तविक नाम तो कुछ और है शायद,

यह तो उसका उपनाम है त्यागी।’’


मजदूरी और प्रेम

- सरदार पूर्ण सिंह हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन ...