Friday, March 13, 2020

भाषा और संस्कृति पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन


"आज का समय पूरी दुनिया में मानवीय मूल्यों के संकट, आसुरी शक्तियों के आतंक और आदर्शों के अभाव का समय है। ऐसे में पूरी दुनिया भारत की ओर उम्मीद की नज़रों से देख रही है। भारत के पास राम और कृष्ण जैसे आदर्श चरित्र उपलब्ध हैं, जो विश्व कल्याण की प्रेरणा दे सकते हैं। इनके माध्यम से दुनिया भर में मानवमूलक संस्कृति की पुनः स्थापना की जा सकती है। तरह तरह के खंड खंड विमर्शों के स्थान पर परिवार विमर्श आज की आवश्यकता है और इसी के साथ रामत्व और कृष्णतव की प्रतिष्ठा जुड़ी है।"


ये विचार प्रख्यात साहित्यकार, लोक संस्कृति विशेषज्ञ और गोवा की पूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने नई दिल्ली महानगर निगम  के विशाल कन्वेंशन हॉल में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रकट किए।


सम्मेलन का आयोजन साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (अमरकंटक) तथा विश्व हिंदी परिषद (दिल्ली) ने संयुक्त रूप से किया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता अमरकंटक से पधारे कुलपति डॉ. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने की और बीज वक्तव्य प्रो. दिलीप सिंह ने दिया। डॉ. ऋषभदेव शर्मा के संचालन में हुए इस समारोह में देश भर से आए विद्वानों और साहित्यकारों के अलावा रूस की डॉ. लीना सरीन तथा हिंदी प्रचारिणी सभा, मॉरीशस के अध्यक्ष डॉ. यंतुदेव बुधु, महात्मा गांधी संस्थान, मॉरीशस की निदेशक डॉ. विद्योत्तमा कुंजल तथा प्रो.अलका धनपत और लिथुआनिया की कत्थक नृत्यांगना कैटरीना ने विभिन्न विचार सत्रों को संबोधित किया। समारोह के विचारणीय विषय 'आधुनिक समय में रामकथा और कृष्णकथा का वैश्विक संदर्भ' तथा 'नई शिक्षा नीति और हिंदी भाषा' रहे।



समापन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि पधारे पूर्व सांसद सुनील शास्त्री ने राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में राम और कृष्ण की लोक कल्याणकारी संघर्षगाथाओं के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा की शिक्षा और संस्कृति का सीधा संबंध हमारी भाषाओं के साथ है तथा हमारी भाषाओं में ही जीवन मूल्यों की जड़ें होती हैं, इसलिए यह जरूरी है कि हम भारतीय लोग अपनी भाषाओं का सम्मान करें। उन्होंने हिंदी के साथ साथ अन्य भारतीय भाषाओं को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाने पर ज़ोर दिया।


अवसर पर कई हिंदीसेवियों,साहित्यकारों और शिक्षाविदों को अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत किया गया, जिनमें प्रो.दिलीप सिंह, प्रो. टी वी कट्टीमनी, प्रो ऋषभदेव शर्मा, ज्ञान चन्द्र मर्मज्ञ, डॉ. श्रीराम परिहार, डॉ. कैलाश नाथ पांडे, डॉ. मधुकर पाड़वी, और डॉ. भावेश जाधव आदि सम्मिलित हैं। समारोह का समापन  डॉ.प्रदीप कुमार सिंह के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।



 


 


 


 


 


Thursday, March 5, 2020

स्वतन्त्र होने की लड़ाई है-स्त्री विमर्श


प्रतिमा रानी
प्रवक्ता-हिन्दी
कृष्णा काॅलेज, बिजनौर


'नारीवाद’ शब्द की सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन कार्य हैं यह एक कठिन प्रश्न है राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के सोचने के तरीकों तथा उन विचारों की अभिव्यक्ति का है। स्त्री-विमर्श रूढ़ हो चुकी परम्पराओं, मान्यताओं के प्रति असंतोष तथा उससे मुक्ति पाने का स्वर है। स्त्री-विमर्श के द्वारा पितृक प्रतिमानों व सोचने की दृष्टि पर अनेक प्रश्नों द्वारा कुठाराघात करते हुए विश्व चिंतन में नई बहस को जन्म देता है।
 प्राचीन भारतीय समाज में स्त्री को देवी स्वरूप माना गया है। वैदिक काल में कहा भी गया है-
 ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते, तत्र रम्यते देवता’’ (वैदिक काल)
 परन्तु आम बोलचाल की भाषा में नारी को अबला ही कहा गया है। महान् साहित्यकारों ने भी नारी के अबला रूप को साहित्य में कुछ इस तरह वर्णित किया है।
  ‘‘हाय अबला तुम्हारी यही कहानी।’’
  आँचल में है दूध आँखों में पानी।। (मैथिलीशरण गुप्त)
 महादेवी वर्मा ने नारी को कुछ इस प्रकार दर्शाया है।
   ‘‘मैं नीर भरी दुःख की बदरी।’’
 ‘‘नारी-विमर्श को लेकर सदैव अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई पड़ता है। इंग्लैंड और अमेरिका में 19वीं शताब्दी में फेमिनिस्ट मूवमेंट के साथ नारी-विमर्श संघर्ष प्रारम्भ हुआ था। यह आन्दोलन लैंगिक समानता के साथ-साथ समाज में नारी को बराबर का दर्जा दिलाने के लिए किया गया था, जो राजनीति से होते हुए कला, साहित्य एवं संस्कृति तक जा पहुँचा था। तत्पश्चात् यह आन्दोलन विश्वव्यापी स्तर पर होते हुए भारत आ पहुँचा था।’’
 ‘‘नारी-विमर्श क्या है? पुरुष की दृष्टि में कहा जाए तो विमर्श का सम्बन्ध नारी-सौंदर्य, पहनावा, नारी उत्पीड़न, नारी का दुःख एवं कमजोरियों से होता है और नारी की नज़र में नारी-विमर्श का सम्बन्ध उसकी अपनी शक्तियों से परिचित करवाने से है।’’
  ‘‘गुंजन झाझरिया गुँज’’ (नारी-विमर्श के अर्थ निहितार्थ-2)
 इस प्रकार नारी विमर्श को लेकर पुरुषों ने भी अपने हृदय की अनुभूति को साहित्य में समय-समय पर उकेरा है।
स्त्री-विमर्श का भारतीय इतिहास
 वैदिक काल में नारी को पुरुषों के समाज में शिक्षा, धर्म, राजनीति, सम्पत्ति के अधिकार एवं अनेकों संस्कारों तथा अनुष्ठानों में शामिल होने की स्वतन्त्रता प्राप्त थी। परन्तु वैदिक काल के अन्तिम चरण में स्त्रियों की दशा बिगड़नी प्रारम्भ हो गयी। तत्पश्चात् बौ( काल में स्त्रियों की दशा में उतार-चढ़ाव काफी हुए, परन्तु मुस्लिम काल में भारत में मुगलों का आगमन होने के साथ-साथ स्त्रियों की दशा और खराब हो गयी। अंग्रेजी शासन काल के अन्तिम चरण में जब भारतीय अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ हो गए थे। भारत में अनेकों संघर्षों का प्रारम्भ हुआ। रमाबाई जैसी स्त्रियों को धर्म परिवर्तन भी करना पड़ा।
 1908 में लेडिज कांग्रेस का गठन हुआ तथा 1917 में विमेंस इण्डिया एसोसिएशन का गठन हुआ। सरला देवी ने विधवाओं की शिक्षा तथा उनके अधिकारों के लिए लड़ाईयाँ लड़ीं। पुरुषों में राजाराम मोहन राय ने समाज में विधवा महिलाओं की दशाओं को सुधारने का अथक प्रयास करते हुए सती-प्रथा पर रोक लगवाई। वहीं दयानन्द सरस्वती जी ने भी स्त्रियों की शिक्षा पर जोर देते हुए विधवा-विवाह पर बल दिया।
 इस समय स्त्रियों ने दोहरी लड़ाईयाँ लड़ीं। एक ओर उपनिवेशवादी ताकतों के साथ दूसरी अपने घर में नियति निर्धारित करने वाली पुरुषवादी सोच के साथ। स्त्री का संदेश स्त्रियों के हक में न्याय तथा तमाम मांगों से जुड़ा था, जिसके लिए काशीबाई कानितकर, आनंदीबाई, गोदावरी समस्कर, पार्वतीबाई, सरलाबाई जैसे अनेकों नारियों ने संघर्ष किया।
 भारतीय महिलाओं को शरीर ढकने तक के लिए लड़ाईयाँ लड़नी पड़ी हैं। दक्षिण भारत के कुछ हिस्से  ऐसे थे, जहाँ स्त्रियों को ऊपरी शरीर के भाग को ढकने की आजादी नहीं थी। इस भारतीय बहुस्तरीय समाज में स्त्री संघर्ष कैसे एक हो सकता है तथा स्त्री-विमर्श का पहलू भी एक कैसे हो सकता है।
 निर्विवाद रूप से भारतीय समाज में स्त्री की स्ाििति अन्तर्विरोधों से भरी पड़ी है। इसका विरोधाभास ऋग्वेद की ऋचाओं से ही प्रारम्भ हो जाता है। जहाँ कहीं पर स्त्रियों को अत्यन्त श्रेष्ठ तथा पूजनीय माना गया है तथा कहीं पर कामवासना का रूप मानते हुए मुक्ति में बाधक, त्यज्य तथा भोग्या वस्तु माना गया है।
साहित्य में स्त्री-विमर्श
 मध्यकालीन कवियों ने भी कवियों ने भी स्त्रियों को लेकर अन्तर्विरोधी उकित्याँ कही हैं। एक ओर तो कबीर, दादू, तुलसी, जायसी, सूर आदि ने मानुश जन्म को सर्वोपरि बताया है। परन्तु तुलसीदास जी ने स्त्री को प्रताड़ना/ताड़ना का अधिकारी भी कहा है।
   ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी।
   सकल ताड़ना के अधिकारी।।
 शेक्सपियर ने नारी के विषय में कहा है-
   ‘‘दुर्बलता तुम्हारा नाम ही नारी है।’’ 
 आदि कहकर नारी अस्तित्व को संकीर्ण बना दिया है।
 महादेवी वर्मा की कविताओं में वेदना का रूप अलग-अलग दिखाई दिया है-
 इसके अतिरिक्त जयशंकर प्रसाद ने नारी को श्रद्धा का पात्र बताते हुए कहा है-
    ‘‘नारी तुम श्रद्धा हो।
 नारी-विमर्श को साहित्य/कहानी/उपन्यास आदि के द्वारा पुरुषों ने भी अपनी कलम द्वारा कुछ इस प्रकार स्पष्ट किया है-
 कविवर सहाय जी के अनुसार-
   ‘‘नारी बेचारी है
   पुरुष की मारी
   तन से क्षुदित है
   लपककर झपककर
   अंत में चित्त है।’’ 
आधुनिक साहित्य में नारी-विमर्श
 आधुनिक साहित्य का चर्चित विषय नारी-विमर्श ही रहा है। सुशीला टांक भौरे के काव्य संग्रह स्वाति बूँद और खोर मोती तथा यह तुम जानों काफी चर्चित रहे हैं। इनका विद्रोही मन अपने भावों को कुछ इस प्रकार व्यक्त करता है। 
   माँ-बाप ने पैदा किया था गूँगा
   परिवेश ने लंगड़ा बना दिया
   चलती रही परिपाटी पर
   बैसाखियाँ चरमराती हैं
   अधिक बोझ से अकुलाकर
   विस्कारित मन हुँकारता है
   बैसाखियों को तोड़ दूँ।
 हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श मात्र पूर्वाग्रह या व्यक्तिगत या व्यक्तिगत विश्वासों तक ही सीमित नहीं है। उसके पीछे बहुत से आयाम हैं। कला साहित्य के हर विचारधारात्मक संघर्ष के पीछे समय परिस्थितियों तथा सामाजिक परिवर्तनों को ध्यान में रखकर लक्ष्य प्राप्त करना आवश्यक है।
 डाॅ. ज्योति किरण के अनुसार- इस समाज में जब स्त्रियाँ अपनी समझ तथा काबिलियत जाहिर करती है। वह कुलच्छनी मानी जाती है। खुद विवेक से काम करने पर र्मादाहीन कहलाती है। अपनी इच्छाओं, अरमानों को आत्मविश्वास से पूरा करते हुए जब लड़ती है तो परिवार व समाज के लिए चुनौती बन जाती है।
 आधुनिक साहित्य में सीमोन द बोउवार की ‘द सेकण्ड सेवन्स’ का हिन्दी अनुवाद कर प्रभा खेतान ने स्त्री-विमर्श की नींव तैयार की है। इन्हीं से प्रेरित होकर आधुनिक लेखिकाएँ स्त्री के प्रति समाज की मानसिकताओं व रूढ़ियों पर आधारित पारिवारिक बन्धनों से मुक्ति पाने की आकांक्षा में प्रयासरत दिखाई देती है।
 वर्तमान समय में स्त्री-शिक्षित तथा आत्म-निर्भर है तथा प्रत्येक क्षेत्र में अपना वर्चस्व दिखाकर लोहा मनवा रही है, परन्तु आज भी वह अनेकों प्रयास से संघर्ष कर रही है। निर्भया हत्याकाण्ड की घटना के बाद वर्मा कमेटी की रिपोर्ट ऐसे परिवर्तनों का परिणाम है। इन घटना के बाद होने वाले आन्दोलनों से सांस्कृतिक वर्चस्व के खिलाफ हुए संघर्षों का एक नया अध्याय है, जिसके परिणाम ने फरवरी 2020 को आना लगभग तय हुआ है। इसी तरह के अन्य मथुरा रेप केस माया त्यागी रेप केस, मनोरमा देवी रेप केस या 27 नवम्बर 2019 को हैदराबाद रेप केस पुरुषवादी सोच के विरोध में उठने वाला देशव्यापी छोटे से छोटा स्वर भी सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रतिरोध स्वरूप माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
 नारी-विमर्श की इस कड़ी को देखा जाए तो नारी आदिकाल से ही द्वन्दात्मक परिवेश से होकर गुजरी है, जहाँ एक ओर नारी को देवी माना है तथा दूसरी ओर योग्य वस्तु। पुरुष प्रधान समाज में मर्यादा की आड़ में कभी देवी बनाकर, कभी चाहरदीवार में बाँधकर, कभी सीमा रेखा बनाकर अपना आधिपत्य बनाना चाहता है।
 आज के परिदृश्य में स्त्री समस्त क्षेत्रों में पूर्ण रूप से अपना स्वतन्त्र स्थान बना चुकी है। 
 वर्तमान समय में स्त्री, पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर अपना योगदान दे रही है। अंतरिक्ष में कल्पना चावला एवं सुमीता विलियम्स, राजनीति में सुषमा स्वराज, इन्दिरा गाँधी, प्रतिभा देवी पाटिल आदि। लेखिका के रूप में अंरुधति राय, तस्लीमा नसरीन आदि आई.पी.एस. किरण बेदी, मुक्केबाजी में मेरीकाॅम, पीटी उषा मैडम, चन्दा कोचर उद्योग तथा बैंकिंग, सुनीता नारायण पर्यावरणविद, मेघा पाटकर (नर्मदा घाटी की आवाज), सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, सिने जगत माधुरी दीक्षित, एकता कपूर आदि अनेक सहस्रों नारियाँ हैं जो आज भी देशों में ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपना तथा अपने देश को गौरवान्वित कराने के लिए प्रयासरत हैं।
 भारतीय समाज पितृसत्तात्मक तथा स्तरीय समाज हैं। जहाँ स्त्रियों की स्थिति में सदैव परिवर्तन होता रहता है। इसी पितृसत्तात्मक समाज में बन्धनों रूपी बेड़ियों से स्वतन्त्र होने की लड़ाई है-स्त्री विमर्श।


सन्दर्भ ग्रन्थ
आजकल- मार्च 2013-पृष्ठ 20
पंचशील-शोधसमीक्षा-पृष्ठ 82
आजकल-मार्च 2013-पृष्ठ 20
आजकल-मार्च 2011-पृष्ठ 25
पंचशील-शोध समीक्षा-पृष्ठ 61,87
भारत में स्त्रीधन और स्त्री संधर्ष इतिहास के झरोखे से 02 फरवरी 2017 से
स्त्री-विमर्श का भारतीय आइना- जनसत्ता 08 मार्च 2016
Www.hindi kunj.com तथा स्त्री विमर्श का भारतीय
आइना- डा.धर्मेन्द्र कुमार ‘‘ भारत में शिक्षा व्यवस्था का विकास, आर.लाल पब्लिकेशन
https://www.Jansatta.com
https://Vishwahindijan.blogspot.com
https://Stervimassh.biog.spst.com
स्त्री विमर्श और हिन्दी स्त्री लेखन
सरोकार की मीडिया-10फरवरी 2012


वाह रे किसान


अमन कुमार


भूकंप के आने से गज सिंह को बड़ा नुकसान हुआ था। पिछले दिन ही तो उसने अपने मकान का लिंटर डलवाया था। लिंटर अभी सैट भी नहीं हुआ था कि करीब पाँच घंटे बाद ही भूकंप आ गया था। भूकंप की तीव्रता इतनी तेज थी कि लिंटर में जगह-जगह दरार आ गई थी। सुबह होते-होते गाँव के लोग इकट्ठा होने लगे थे। सबकी अपनी-अपनी राय थी। मजमा लग चुका था। गज सिंह परेशान हो उठे। उन्होंने सूरज निकलने से पहले ही राज मिस्त्री को बुलवा लिया।
 -‘मिस्त्री साहब, जो भी हो नुकसान होने से बचा लो, मेरे पास अब इतना पैसा नहीं है कि मैं पूरा लिंटर डलवा सकूँ।’ गज सिंह ने मिस्त्री को अपनी स्थिति बता दी।
 -‘वो तो ठीक है मालिक, मगर अब तक तो सिमेंट सैट हो चुका है, सब तुड़वाना ही पड़ेगा, दरारों को भर देने से भी कोई लाभ नहीं होने वाला है, बारिश में टपकेगा।’ मिस्त्री ने असमर्थता व्यक्त की।
 -‘अब क्या होगा?’
 -‘होना क्या है? दो कट्टे सीमेंट मँगा लो, प्रयास करता हूँ, दो-चार साल तो काम चल ही जाएगा।’ मिस्त्री ने हिम्मत बधाई तो गज सिंह की जान में जान आई।
 -‘ठीक कर दो भैया, बाकी दो-चार साल बाद देखा जाएगा।’ गज सिंह ने कहते हुए एक बार फिर ढुल्ले और दीवार पर टंगे लिंटर की ओर देखा।
 -‘शुक्र समझो कि दीवारें नहीं फटी हैं, नहीं तो परेशानी और ज्यादा होती, अब तो हम सीमेंट का गाढ़ा घोल बनाकर दरारों में भर देंगे। ऊपर से ग्रोडिंग करने के बाद चांस है कि पानी नहीं टपकेगा।’ 
 -‘मतलब ग्रोडिंग साथ के साथ करनी पड़ेगी?’ 
 -‘हाँ, उससे फायदा होगा, ग्रोडिंग का सीमेंट लिंटर के सीमेंट से मिल जाएगा तो मजबूती आ जाएगी।’
 -‘पर पैसे तो बचे ही नहीं।’
 -‘घबराओ नहीं, रेत-बजरी अभी काफी पड़ी ही है, सीमेंट मैं उधार दिला दूँगा, रही बात मेरी मजदूरी की तो एक साल बाद दे देना।’ राज मिस्त्री ने पुनः हिम्मत बँधाई।
 -‘ठीक है भैया, बहुत एहसान होगा। पता नहीं कैसे तो यह मकान बना है, ये भी गिर गया तो कहीं के नहीं रहेंगे।’ गज सिंह ने राज मिस्त्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा।
 गज सिंह के पास खेती की जमीन अधिक नहीं थी। कुल जमा पाँच बीघे जमीन में आज की महँगाई को देखते हुए होता ही क्या है? घर का खर्च और जमीन की जुताई-बुवाई का खर्च किसी तरह से निकल जाता है। साल भर में कोई नोत-खोत हो गई तो भारी पड़ता है। वह कंजूस नहीं है, देखभाल कर खर्चा चलाता है लेकिन लोग उसे कंजूस मानते हैं और उसका मजाक भी उड़ाते हैं। उसे याद आ रहा था एक बार जब वह बाजार गया था तब उसके पड़ोसी नेतराम ने उसकी बड़ी मजाक बनाई थी।
 -‘थोड़ी सी चाट खा लेने से कुछ नहीं बिगड़ने वाला है गजे! इतनी कंजूसी ठीक नहीं है?’
 -‘बात कंजूसी की नहीं है भैया! बालकों के लिए कपड़ा खरीदना है, पैसे कम पड़ गए तो किससे लूँगा?’ उसने समझाया।
 -‘चल जितने कम पड़ेंगे मैं दे दूँगा।’ नेतराम ने उकसाया। मगर गज सिंह भी उकसावे में आने वाला नहीं था। वह जानता था कि जो आदमी मेरे पैसे से चांट खाना चाहता है वह मेरा हमदर्द कैसे हो सकता है? जरूर यह उसकी चालाकी है। उसने सोचते हुए कहा-‘अच्छा भैया ऐसा करते हैं, पहले कपड़ा खरीद लेते हैं जो पैसे बचेंगे उनसे चांट भी खाएंगे और पकोड़ी भी।’ 
 गज सिंह का प्रस्ताव नेतराम की समझ में आ गया था। उसने बाईक आगे बढ़ा दी। पीछे बैठे गज सिंह ने भी राहत की सांस ली। गज सिंह यह बात भी अच्छी तरह जानता था कि नेतराम उससे बाईक का किराया चांट के रूप में वसूलना चाहता है।
 कपड़े खरीद लेने के बाद गज सिंह पर पचास रुपए बचे थे। ये सौ रुपए भी नहीं बचते वो तो नेतराम ने बड़ी ही चालाकी दिखाई थी और अंगोछा बाद में खरीदने की सलाह देने में कामयाब हो गया था। गज सिंह इस चालाकी को जान गया था। तभी तो गज सिंह ने पचास रुपए नेतराम को थमाते हुए कहा-‘भैया इनमें से तुम्हारी बाईक का किराया भी हुआ और चांट-पकोड़ी जो भी खाना चाहो।’
 -‘बड़े चालाक हो।’ पचास रुपए हाथ में लेते हुए नेतराम ने कहा।
 -‘चालाक क्या, भाई बाईक में भी तो तेल खर्च होता है, और फिर कभी भी जरूरत पड़ सकती है। मैं अकेला आता तो भी दस-बीस रुपए किराए में खर्च हो ही जाते। तीस रुपए से ऊपर की चांट भी नहीं खाई जाएगी। बाकी पचास रुपए बालक की फीस जमा करने के लिए रोके हैं।’ गज सिंह ने हिसाब बता दिया था।    
 -‘तीस रुपए में तो एक ही के लिए चांट मिलेगी।’ नेतराम ने मुंह बनाते हुए कहा।
 -‘मैं नहीं खाऊँगा।’
 -‘क्यों?’
 -‘बस मन नहीं है।’ गज सिंह ने कहा तो नेतराम की आंखों में चमक आ गई। उसने एक इेले के पास बाईक रोकी और एक दोना चांट लेकर स्वाद के साथ खाने लगा। जबकि गज सिंह खड़ा हुआ अपने आपको लुटता हुआ देख रहा था।
 वह सोच रहा था। क्या चालाकी है? तेल के पैसे लेकर जेब में डाल लिए और चांट भी खा ली। हद हो गई बेशर्मी की। मेरे पैसे से चांट खा रहा है और मुझे ही कंजूस बता रहा है। कंजूस कहीं का।
 गज सिंह अपनी यादों से बाहर आया और पास ही खड़े नेतराम से बोला- ‘दो हजार रुपए दे दो भैया। गन्ने का पैसा आते ही वापिस कर दूंगा।’
 -‘दे तो देता गजे, मगर अभी कल ही खर्च हो गए हैं, सौ-पचास की बात होती तो दे भी देता।’ नेतराम ने पल्ला झाड़ते हुए कहा।
 -‘अभी तो बैंक से मैसेज आया है, पेमेंट का।’ गज सिंह बातों बातों में मैसेज देख चुका था। तभी तो उसे आजमाने की बात सूझ गई थी। 
 गज सिंह जानता था कि जब तक गाँव के लोग यहाँ खड़े रहेंगे तब तक अपनी अपनी बहुमूल्य राय देते रहेंगे और उसके दिमाग में तनाव होता रहेगा। सो उसने नेतराम से पैसे इसलिए नहीं माँगे थे कि वह दे ही देगा। वह जानता था कि नेतराम किसी को धेला दिवाल नहीं है मगर दूसरे जो धन्नासेठ उसके पास खड़े हैं वह भी यहां से खिसक लेंगे।
 हुआ भी यही। एक एक कर सबको काम याद आता चला गया और सभी खिसकते गए। उनके जाने के बाद गज सिंह ने चैन की सांस ली। और सीमेंट के पैसे लेकर मिस्त्री के साथ सीमेंट स्टोर की तरफ चल दिया।
 जब तक वह सीमेंट लेकर आया तब तक वहाँ सन्नाटा छा चुका था। यही तो वह चाहता भी था। क्योंकि लिंटर पर काम करते समय सभी वहाँ चढ़-चढ़ कर देखते जिससे ढुल्ले पर भी वजन बढ़ता और राजमिस्त्री की परेशानी भी बढ़ जाती। मौसम वैसे भी ख़राब होने के आसार नजर आ रहे थे। बस भगवान किसी तरह दस घंटे सीमेंट सैट होने के दे दे तो उसका लिंटर सुधर सकता है।
 दिन भर राजमिस्त्री काम करता रहा और गज सिंह भगवान से प्रार्थना। शाम तक काम समाप्त हुआ तो मौसम को देखते हुए राजमिस्त्री ने लिंटर पर खाली कट्टे और पन्नी डाल कर ढक दिया था ताकि बारिश की बूंदे सीधे सीमेंट से न टकरा सकें।
 दिन भर के थके हारे गज सिंह ने रात को पेट भरकर रोटी खाई और आराम की नींद सो गया। अब उसे उम्मीद थी कि उसका लिंटर मजबूत हो जाएगा। 
 किंतु होनी को कौन टाल सका है? जब बुरे दिन आते हैं तो चारों तरफ से आते हैं। भोर में गज सिंह की आँख खुली तो सांय-सांय हवा चल रही थी। उसने घड़ी में समय देखा तो अभी चार बजे थे। वह उठा और अपने नए बन रहे मकान की ओर चल पड़ा। देखकर उसे तसल्ली हुई कि चलो पन्नी और कट्टे हवा से उड़ नहीं रहे हैं। मिस्त्री भी तो समझदार था उसने पन्नी और कट्टों को ईंट से दबा दिया था। वह वापिस आकर अपनी चारपाई पर लेट जाना चाहता था कि बारिश शुरू हो गई। हवा इतनी तेज थी कि वह आश्वस्त था बारिश को उड़ा कर ले जाएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ।
 कुछ ही देर के बाद हवा रुक गई और ओले के साथ बारिश पड़ने लगी। ओले देखकर गज सिंह की बेचैनी बढ़ गई। वह भगवान से ओलावृष्टि को रोकने के लिए प्रार्थना करने लगा। अब तक राजमिस्त्री किसी तरह उसके घर पहुँच चुका था। दरवाज़ा खुला देखा तो बिना आवाज़ लगाए ही घर में प्रवेश कर गया। उसे देखकर गज सिंह चैक उठा।
 -‘मिस्त्री साहब आप?’
 -‘हाँ, मैंने सोचा कि हवा और बारिश को देखकर आप घबरा न जाएं, बस इसिलिए चला आया।’
 -‘किंतु ये तो ओले पड़ रहे हैं? सब चैपट हो गया।’ गज सिंह घबराते हुए बोला।
 -‘ऐसी बात नहीं है। सब ठीक होगा, अब तक तो सीमेंट सैट भी हो चुका होगा, आप चिंता न करें कुछ नहीं बिगड़ेगा।’ राज मिस्त्री ने समझाते हुए कहा।
 -‘बात सीमेंट की नहीं है।’
 -‘फिर क्या बात है?’ राज मिस्त्री ने चैंकते हुए पूछा।
 -‘अभी तो गेहूँ निकलने ही शुरू हुए हैं, ओलो ने सब सत्यानाश कर दिया। सब फसल चैपट हो गई होगी।’ गज सिंह बेचैनी के साथ बता रहे थे।
 -‘सब भगवान मालिक है, घबराओ नहीं जो होगा वह भी देखा जाएगा।’ राजमिस्त्री ने समझाते हुए कहा।
 -‘बात यह नहीं है कि नुकसान हो गया, हो जाए कोई बात नहीं मगर अब अगर दोबारा गेहूँ बोने पड़े तो बड़ी परेशानी खड़ी हो जाएगी। दोबारा जुताई बुवाई और बीज की लागत जान ही निकाल देगी। लगता है मकान बनाने का फैसला ही गलत लिया गया है, शायद भगवान को यह मंजूर ही नहीं था, नहीं तो सो व्याधाएं खड़ी हनीं होतीं।’ 
 -‘लेकिन आपने तो फसल का बीमा करा लिया था, फिर कैसी घबराहट?’
 -‘बीमा! जानते नहीं हो, पिछली बार गन्ना गिर गया था जानते हो पांच बीघे गन्ने का बीमा लेते-लेते चप्पल चटक गई और जब मिला तो बस चप्पल के पैसे में ही सब्र करना पड़ा था।’ गज सिंह ने खीझते हुए बताया। 
 -‘सरकार मुआवजा भी तो देती है?’
 -‘मुआवजा! बस मुआवजे की मत पूछो भैया, रहने दो बताते हुए भी शरम आती है।’ गज सिंह ने लंबी सांस लेते हुए कहा।
 -‘सरकार अब तो बहुत ध्यान रख रही है किसानों का।’
 -‘खाक ध्यान रख रही है, जब मुआवजा मिला था तो तीन बार जिले में बुलाया गया, पांच सौ तो किराए में ही लग गए और जब चैक हाथ में आया तो ......क्या मजाक बनी.....कुल जमा उन्नीस रुपए पचास पैसे का मुआवजा था। न हंसते हुए बन रहा था न रोते हुए।’ गज सिंह पहले तो हंसे फिर आक्रोष के साथ बोले-‘इससे तो अच्छा होता कि यहां भी सुनामी आ जाती, सबकुछ बर्बाद हो जाता।’
 -‘तो कोई जरूरी है गन्ना और गेहूँ बोना, कोई और फसल भी तो पैदा की जा सकती है।’ राजमिस्त्री सुझाव देता है।
 -‘पार साल बोए तो थे उड़द। कितनी देखभाल करी थी मगर हुआ क्या? सब कीट-पतंगे खा गए। एक आफत है, दवाई डालो तो जहर है न डालो तो कहर है। दो बीघे खेत में निकले तो थे दस किलो उड़द, क्या खा लें और क्या बांट दे? रात-रात भर जानवरों से बचाने की मजूरी भी नहीं मिली, खेत और बुवाई की तो मिलती क्या?’ गज सिंह की बेचैनी स्पष्ट नजर आ रही थी।
 -‘ऐसे तो मालिक! खेती छूट ही जाएगी?’ राज मिस्त्री ने चिंता व्यक्त की।
 -‘और नहीं तो क्या? देख नहीं रहे शहर के पास वाले खेत जिनमें सब्जी पैदा होती थी आज महल खड़े हैं, ऐसा लगता है कि जैसे खेतों में कंकरीट की फसल उग आई हो रंगबिरंगी। सब खेत बिक गए हैं, खेती कितनी तेजी से घट रही है कोई सोच भी नहीं सकता है। ऊपर से सरकार फसल की कीमत दिलाने को तैयार नहीं है।’ गज सिंह ने कहा तो राजमिस्त्री ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए जवाब दिया-‘सही कह रहे हो मालिक! कितने मकानों के बनाने में मैंने भी काम किया है, सब्जी के खेत तो खत्म ही हो गए हैं। अब तो लगता है ईंट-पत्थर खाकर ही गुजारा करना पड़ेगा।’
 -‘हाँ, मिस्त्री साहब! अगर सरकार की ऐसी ही नीति-रीति रही तो वो दिन दूर नहीं है, जब इस धरती से किसान गायब ही हो जाएगा।’  
 -‘लेकिन किसान भी तो हद करते हैं, जब फसल का समय होता है तो किसान आंदोलन करता है, कितनी परेशानी होती है दूसरे लोगों को, गन्ने के पीछे पड़ना भी तो ठीक नहीं है।’ राज मिस्त्री ने भी उल्हाना सा दिया।
 -‘आज दूसरे लोगों को लग रहा है किसान फसल के पैसे मांगने के नाम पर प्रदर्शन कर रहा है। जैसे खाली हो गए हैं सब, ऐसी बात नहीं है मिस्त्री साहब! अपनी ही फसल के पैसे किसी भीख की तरह मांगने पड़ रहे हैं, अभी तो किसानों में आक्रोष है, अपनी फसल के पैसे जबरिया वसूलने पर उतारू हैं मगर एक दिन ऐसा भी आएगा कि न तो किसान होगा, न फसल होगी और न ही फसल का कोई पैसा मांगा जाएगा।’
 -‘ऐसा कैसे हो सकता है?’
 -‘होगा, जरूर होगा। आज किसान भी अपनी औलाद को पढ़ाकर खेती के बजाए इस चकचक से बचने के लिए नौकरी पर भेज रहा है। जब गाँव में किसान ही नहीं बचेगा तो किसानी क्या खाक बचेगी?’
 -‘फिर दुनिया खाएगी क्या?’
 -‘खाएगी क्या? ...अरे पूरी दुनिया सप्लीमेंट पर जीवित रहेगी और योग-आसन करेगी। शवासन लगाएगी एक दिन देख लेना। आज लोग किसानों को कोसते हैं कल यही लोग अपने आपको कोसेंगे।’ 
 अब तक बारिश रुक चुकी थी। राजमिस्त्री ने छाता उठाया और अपने घर की ओर चल दिया जबकि गज सिंह एक हाथ में लाठी थामे अपने खेत की ओर बढ़ रहे थे। उनके मुँह से अनायास ही निकला था-‘वाह रे किसान!’


 


Friday, February 28, 2020

अंतिम दशक की हिंदी कविता और स्त्री


स्वाति


किसी भी काल का साहित्‍य अपने समाज और परिवेश से कटकर नहीं रह सकता। साहित्य की प्रत्‍येक काल विशेष की रचनाओं में हम उस काल विशेष की सामाजिक स्थिति, परिवेश एवं उस परिवेश में रहने वाले लोगों की इच्‍छाओं एवं आकांक्षाओं को अभिव्‍यक्ति होते पाते हैं। कविता मनुष्य की अनुभूतियों को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करने का माध्यम है। कविता के माध्यम से कवि समाज में निहित सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं व विडंबनाओं पर प्रहार करने में सक्षम होता है। बात अगर स्त्री की कि जाए तो आदिकाल से वर्तमान युग तक की कविताओं में स्त्री अपनी उपस्थिती दर्ज कराती आयी है। फर्क सिर्फ यह है की पहले स्त्रियाँ पुरुषों की कविताओं मे दिखाई देती थी,अब खुद अपनी कविताएँ रचती हैं इतना ही नहीं अपने आत्मसम्मान एवं अस्मिता को पाने में निरंतर प्रयासरत हैं।
प्रत्येक काल में स्त्रियों को देखने की दृष्टियाँ अलग-अलग रही हैं जैसे-भक्तिकाल में स्त्री को माया, ठगिनी के रूप में प्रस्तुत किया जाता था या मोक्ष के मार्ग में बाधा के रूप में वहीं आदिकाल में स्त्रियों को पाने के लिए किस प्रकार युद्ध होते थे उनका वर्णन हमें देखने को मिलता है व रीतिकाल में स्त्री देह के मांसल सौंदर्य के अलग-अलग दृश्य दिखने को मिलते हैं। आधुनिक काल और उसमें भी नई कविता में सबसे अधिक स्त्री के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव दिखाई दिया जिसके चलते “अस्मिता की खोज” पर अधिक बल दिया गया। वहीं 1990 के बाद की कविता इन सभी परम्परागत परिपाटी को तोड़ती हुई स्त्री पराधीनता, यौन शोषण, उत्पीड़न तथा अन्य स्त्री संबंधी मुद्दों पर सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से तर्क करती दिखाई देती है। जैसे कात्यायनी की कविता ‘रात के संतरी की कविता’ में देखा जा सकता है-
“रात को/ठीक ग्यारह बजकर तैंतालिस मिनट पर
दिल्ली में जी.बी.रोड पर/एक स्त्री/ग्राहक पटा रही है
पलामू के एक कस्बे में/नीम उजाले में एक नीम-हकीम
एक स्त्री पर गर्भपात की/हर तरकीब आज़मा रहा है।
बंबई के एक रेस्त्रां में/नीली-गुलाबी रोशनी में थिरकती स्त्री ने
अपना आखरी कपड़ा उतार दिया है/और किसी घर में
ऐसा करने से पहले/एक स्त्री/लगन से रसोईघर में
काम समेट रही है/महाराजगंज के ईंट भट्टे में
झोंकी जा रही है एक रेज़ा मज़दूरिन /जरूरी इस्तेमाल के बाद...
नेल्सन मंडेला के देश में विश्वसुंदरी प्रतियोगिता के लिए
मंच सज रहा है”1


इस सम्पूर्ण कविता में आदि से अंत तक संवेदना को मूर्त करने के लिए जितने भी बिम्ब हैं,वे सभी स्त्री की भूमिकाओं से जुड़े हैं। स्त्री के इन सभी रूपों में हमें कहीं न कहीं स्त्री की विवशता दिखाई देती है, जहां एक ओर वह अपनी आजीविका के लिए जी. बी. रोड पे ग्राहक बुलाने के हर प्रयास कर रही है वहीं दूसरी ओर ग्रामीण जीवन से भी यह कविता हमें रु-ब-रु कराती है जहां एक स्त्री के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है लाज़मी है यह गर्भपात इसीलिए किया जा रहा है क्योंकि गर्भ में कन्या पल रही है। लेकिन चाह कर भी वह इसका विरोध नहीं कर पा रही । बंबई के रेस्त्रां में एक स्त्री आजीविका के लिए नाच गा कर अपने तन के कपड़े उतार रही है यह स्थिति अंतिम दशक में जन्मे भूमंडलीकरण की देन है जिसके चलते आज अलग-अलग तरीकों से स्त्री शोषण की शिकार बनाई जा रही है। भूमंडलीकरण के चलते स्त्री शोषण के तरीके बदल गए हैं। आज स्त्री स्वेच्छा से वो सब काम कर रही है जो पुरुषवादी समाज उससे कराना चाहता है जैसे – रेस्त्रां में कपड़े उतारकर नाचना, अश्लील विज्ञापन बनाना, वस्तु की तरह खुद को प्रॉडक्ट बनाने की होड में जुटे रहना इत्यादि । कवयित्री की दृष्टि से यू. पी. के एक जिले महाराजगंज में ईंट भट्टो में काम करने वाली बेबस मज़दूरिन की विवशता भी छिप नहीं सकी कवयित्री नें इस कविता के माध्यम से ग्रामीण ओर शहरी स्त्रियों के जीवन की हर विवशता को कम शब्दों में रेखांकित कर अधिक कहा है। यहाँ महानगरीय बोध, सत्ता, कला और स्त्री जीवन के विभिन्न रूपों को कात्यायनी ने एक साथ प्रकट करने का प्रयास किया है। इसी संदर्भ में मैनेजर पाण्डेय का मत दृष्टव्य है- “नई पीढ़ी की कविता में स्त्री कवियों की विशिष्ट रचना-दृष्टि के कारण उनकी अलग पहचान बनी है। उनमें कात्यायनी की दृष्टि की व्यापकता और तेजस्विता विशेष महत्वपूर्ण है। उनकी कविताओं में प्रखर राजनीतिक चेतना है और व्यापक सामाजिक चिंता भी।”2 इसी प्रकार अंतिम दशक की कविताओं में स्त्री की सामाजिक आत्मगाथा से लेकर आधुनिक बोध की नियति तक के यांत्रिक संकेत मिलते हैं। जब हम समाज की बात करते हैं तो सर्वप्रथम हमारी नज़र परिवार पर जाती है। परिवार समाज की इकाई के रूप में कार्य करता है। अंतिम दशक के कवि और कवयित्रियों ने अपनी कविताओं में पारिवारिक संरचना से लेकर आजादी के बाद हुए मोहभंग के कारण टूटते बिखरते परिवार में स्त्री के चित्र को बखूबी अपनी कविताओं में अंकित किया है। इतना ही नहीं समाज में व्याप्त रूढ़ियों, विडंबनाओं एवं त्रासदियों को भी अभिव्यक्त किया है। उदाहरण के रूप में चन्द्रकान्त देवताले की कविता ‘बेटी के घर से लौटना’ की पंक्तियाँ दृष्टव्य है-
“पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहते कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज”3


इन पंक्तियों के द्वारा हम भारतीय समाज में विद्यमान एक स्त्री की त्रासदी को अभिव्यक्त होते पाते हैं जहां वह अक्षम है अपने पिता को ससुराल में एक और दिन रोक पाने में। दरअसल हमने पूरी सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी बना दी है,जो उसके समक्ष ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर रहा है कि वह अपनी मानव सुलभ इच्छाओं को व्यक्त नहीं कर पा रही है। अपनी इच्छा को दबाने के लिए वह विवश हो रही है।
प्राचीन काल से लेकर अद्यतन हिंदी काव्य में स्त्री की स्थितियाँ निरंतर परिवर्तित होती रही है। 1990के बाद यह परिवर्तन अधिक प्रभावी रूप में सामने आता है। जिसका मुख्य कारण भूमंडलीकरण और इससे जन्मा बाज़ारवाद रहा है। बाज़ारवाद के कारण स्त्री जीवन के प्रत्येक पक्ष जैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, वैवाहिक जीवन आदि प्रभावित हुए हैं। आज सब कुछ बिकाऊ है, बाजारवाद के चलते सब बेचा जा सकता है। आज विज्ञापन से लेकर सिनेमा तक में स्त्री के अंग-प्रदर्शन का सहारा धड़ल्ले से लिया जा रहा है। कात्यायनी की कविता का उदाहरण देखिये-
“अब इतनी सकत नहीं रही
कि दिन भर मुस्कुरा सकूँ, अदाएँ दिखा सकूँ,
निर्माता निर्देशकों को रिझा सकूँ
या दूरदर्शन पर सौंदर्य-प्रसाधनों का विज्ञापन कर सकूँ।
होंगे दुर्ग के बाहर घेरा डाले हुए तुम्हारे शत्रु
मैं तो उनके लिए भी वैसे ही एक स्त्री-शरीर हूँ,
जैसे तुम्हारे नगर-जनों के लिए।”4


समाज में विविध स्तरों पर नारी यौन शोषण के ऐसे दृश्य अक्सर हमें देखने को मिलते हैं जहाँ एक स्त्री मात्र ‘देह’ समझी जाती है। निर्माता निर्देशक उसकी मजबूरीयों का फायदा उठा अपना स्वार्थ साधते हैं। कात्यायनी जी ने यहाँ समाज की वो कड़वी सच्चाई दिखाने का प्रयास किया है जिसके बारे में अक्सर तथाकथित पुरुषवर्चस्ववादी समाज का व्यक्ति बात करने से कतराता है लेकिन अवसर मिलने पे स्वयं भी पीछे नहीं हटता। इसी संदर्भ में अनामिका का मत दृष्टव्य है- “स्त्री-आंदोलन पितृसत्तात्मक समाज में पल रहे स्त्री-संबंधी पूर्वाग्रहों से पुरुषों की क्रमिक मुक्ति असंभव नहीं मानता। दोषी पुरुष नहीं,वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था है जो  जन्म से लेकर मृत्यु तक पुरुषों को लगातार एक ही पाठ पढ़ाती है कि स्त्रियाँ उनसे हीनतर हैं, उनके भोग का साधनमात्र ।”5  आज बाजारवाद ने स्त्रियों कि अनेक छवियाँ गढ़ी है, जहाँ स्त्रियों को विक्रेता भी बनाया गया है और उपभोग कि वस्तु भी। उपभोक्ताववाद के लिए स्त्री ‘देह’ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। मंगलेश डबराल अपने संग्रह ‘हम जो देखते हैं’(1995) में  लिखते हैं- 
“अमेरिका में रोना माना है
उदास होना मना है
एक बहुत बड़ी आँख सबको देख रही है
पीछे मुड़कर जीवन को देखना माना है
वह किस्सा किसे नहीं मालूम
कि आलीशान दुकान में सामान बेचती
एक दुबली-सी लड़की
जो कुछ सोचती हुई-सी बैठी थी
एक दिन एक ग्राहक के सामने मुस्कराना भूल गई
शाम को उसे नौकरी से अलग कर दिया गया।”6


यहाँ लड़की का मुसकुराना उसके काम का एक हिस्सा है प्रसन्नता नहीं ताकि उसकी मुस्कुराहट से ग्राहक आकर्षित किए जा सके। अगर वह उपभोक्तावादी संस्कृति के खिलाफ जा ऐसा नहीं करती है तो वह बाजार के काम कि भी नहीं है। कहीं न कहीं बाजार के कारण स्त्रियाँ आर्थिक रूप से सक्षम बनी लेकिन सिर्फ बाज़ार कि शर्तों पे। उसे न कुछ सोचने का अधिकार है न ही कुछ कहने का। इस संदर्भ में प्रसिद्ध नारीवादी चिंतक एवं लेखिका प्रभा खेतान का मानना है कि “भूमंडलीकरण जीवन के हर कोने में अस्तित्व के हर रूप का वस्तुकरण करता है।”7  आज बाज़ार कि नज़र स्त्री के प्रत्येक रूप पे है चाहे वो गाँव के खेत खलियान मे कार्य करती स्त्री हो, घरमे रहने वाली या घर संभालती स्त्री हो या जंगल और पहाड़ों पे जीवन जीती स्त्री हो। बाज़ार हर हालत में स्त्री को अपने चंगुल में फंसा कर अपना स्वार्थ साधना चाहता है। इसी क्रम मे आदिवासी स्त्रियों को बाज़ार कि नीतियों के प्रति आगाह करती हुई निर्मला पुतुल अपनी कविता ‘बिटिया मुर्मु के लिए’ में लिखती है कि-
“वे दबे-पाँव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में
वे तुम्हारे नृत्य कि बड़ाई करते हैं
वे तुम्हारी आँखों कि प्रशंसा में कसीदे
पढ़ते हैं
सौदागर हैं वे... समझो...
पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू.... पहचानो!”8


बाजारवाद के कारण आज एक स्त्री स्वतंत्र होकर भी गुलामी का जीवन जी रही है। उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते भोली भाली स्त्रियों को फंसाया जा रहा है ताकि चकाचौंध कि दुनिया से आकर्षित हो वे स्वयं उपभोग को तैयार हो जाए। और जब स्त्री बाज़ार के काम कि नहीं रहती उसको दूध में से मक्खी कि तरह उठाकर फेंक दिया जाता है। इसी संदर्भ में विनय विश्वास का मत दृष्टव्य है-“उपयोग कि जाने वाली वस्तु बार-बार काम आ सकती है। उपभोग जिसका किया जाए, वह एक बार इस्तेमाल के बाद नष्ट हो जाती है। मकान का उपयोग किया जाता है और अनाज का उपभोग। उपभोकतावाद में ज़ोर उपभोग पर ज़्यादा है। इसलिए कि उपभोग्य वस्तुओं कि खपत ज्यादा होती है। उनकी मांग भी अपेक्षाकृत अधिक होती  है।”9
जहां एक ओर नब्बे के बाद बाज़ार ने स्त्री का वस्तुकरण किया, स्त्री की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक स्थितियों में बदलाव आया वहीं दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने अस्तित्व और आत्मसम्मान के लिए भी सचेत दिखाई पड़ती हैं। आज की कविता स्त्री आत्माभिव्यक्ति का दस्तावेज़ है। वह अपने सुख, दुख, ममता, प्रेम और विद्रोह को कविता के माध्यम से रचती है। शोषण, दमन, उत्पीड़न, उपेक्षा जैसे स्त्री-जीवन के समस्त पहलुओं की चर्चा करते हुए आज कि कविता स्त्री-अस्मिता कि लड़ाई में सक्रिय सहयोग दे रही है। उदाहरण के लिए सविता सिंह की कविताओं को अगर हम देखें तो पाएंगे की सविता सिंह की काव्य संवेदना में उग्रता नहीं है लेकिन उनके यहाँ स्त्री अस्मिता से जुड़े अनुभवों की संश्लिष्टता है। सविता सिंह अपने औरत होने पर नहीं, बल्कि किसी की औरत होने पर प्रश्न चिन्ह लगाती है और कहती है –
“मैं किसकी औरत हूँ/कौन है मेरा परमेश्वर
किसके पाँव दबाती हूँ/किसका दिया खाती हूँ
किसकी मार सहती हूँ../ऐसे ही थे सवाल उसके
बैठी थी जो मेरे सामने वाली सीट पर रेलगाड़ी में
मेरे साथ सफर करती”


इस पर कवयित्री का जवाब देखते ही बनता है। जो भारतीय समाज कि उस स्त्री का रोल अदा कर रहा है जो आज अपने पैरों पे खड़ी है, स्वावलंबी है, अपने फैसले खुद ले सकने मे समर्थ है-
“सोचकर बहुत मैंने कहा उससे
मैं किसी की औरत नहीं हूँ/मैं अपनी औरत हूँ
अपना खाती हूँ/जब जी चाहता है तब खाती हूँ
मैं किसी की मार नहीं सहती/और मेरा परमेश्वर कोई नहीं”10  


अतःअंतिम दशक की हिंदी कविता में हम स्त्री जीवन से जुड़े हर पहलू को उद्घाटित होते पाते हैं। जहां एक ओर उदारीकरण के बाद स्त्री वस्तु के रूप में प्रस्तुत की जाती है वहीं दूसरी ओर औद्योगिक विकास ने उसे आर्थिक रूप से सबल भी बनाया है। स्त्रियाँ अब अपने आत्मसम्मान और अस्मिता के प्रति सचेत भी हो रहीं हैं और कविता के माध्यम से इन्हें मुखर रूप से अभिव्यक्त भी कर रही हैं।


संदर्भ सूची-
1. http://kavitakosh.org/kk
2. पाण्डेय, मैनेजर. आलोचना की सामाजिकता. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन
3. संपा. त्रिपाठी, प्रभात. (2013). चन्द्रकान्त देवताले प्रतिनिधि कविताएँ. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-41
4. कात्यायनी. (1999). इस पौरुषपूर्ण समय में. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन. पृष्ठ-64
5. अनामिका. (2004). कविता में औरत. दिल्ली. साहित्य उपक्रम. पृष्ठ- 9
6. डबराल, मंगलेश. (2015). हम जो देखते हैं. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-75-76
7. खेतान, प्रभा. (2004). बाज़ार के बीच बाज़ार के खिलाफ. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन. पृष्ठ-32
8. संपा. विश्वरंजन. (2011). कविता के पक्ष में. दिल्ली. शिल्पायन. पृष्ठ-222
9. विश्वास, विनय. (2009). आज की कविता. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-160
10. http://kavitakosh.org/kk


-स्वाति 
शोधार्थी- पीएच.डी. हिन्दी साहित्य
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा,महाराष्ट्र
Email- swatitasud@gmail.com  


राजनीति को वोट की जरूरत होती है


अमन  कुमार त्‍यागी


 


अंधे को आंख की
लंगड़े को टांग की
लूले को हाथ की
गूंगे को जीभ की
बहरे को कान की
जैसे जरूरत होती है
वैसे ही राजनीति को
वोट की जरूरत होती है


भूखे को ब्रेड की
प्रिय को प्रेम की
नंगे को वस्त्र की
योद्धा को अस्त्र की
बच्चे को मां की
जैसे जरूरत होती है
वैसे ही राजनीति को
वोट की जरूरत होती है


वोट की जरूरत
दिखाई देती है
बटन दबाने तक
या मोहर लगाने तक
उसके बाद होता है खेल
रेलमपेल धकमधकेल
धकमधकेल रेलमपेल


Thursday, February 27, 2020

बोलो हिन्दुस्तान


- इन्द्रदेव भारती

 

बोलो हिन्दुस्तान

"""""""""""""""""""""""""""""""

बोलो  हिन्दुस्तान  कहाँ तक,

कितनी  हिंसा  और  सहोगे । 

आज अगर चुप बैठे तो कल,

कहने   लायक  नहीं  रहोगे ।  

 

बारूदी   शब्दों   की  भाषा,

किसनेआखिर क्यूँ बोली है ।

अंबर   ने   बरसाये   पत्थर,

धरती  ने  उगली  गोली  है । 

 

प्यार के  गंगाजल में   कैसे,

नफरत का  तेज़ाब घुला है ।

गौतम, गाँधी का  ये आंगन,

सुबह लहू से धुला मिला है ।

 

किस  षड्यंत्री  ने  फेंकी  है, 

षड्यंत्रों   की   ये  चिंगारी ।

गलियों, सड़कों, चौराहों  पे,

मौत   नाचती  है   हत्यारी ।

 

यहीं जन्म लेकर के आखिर,

कहो अकारण क्यूँ मर जाएं ।

क्यूँ अपना घर,गली,ये बस्ती,

छोड़ वतन हम कहाँपे जायें ।

 

कहाँपे जायें ?  कहाँपे जायें ?

कहाँपे जायें ?  कहाँपे जायें ?

                - इन्द्रदेव भारती

Wednesday, February 26, 2020

हम आये तुम आये चले जायेंगे इक रोज


 


 


हम आये तुम आये चले जायेंगे इक रोज
समय के शिलापट्ट पर कालजयी कुछ होता नहीं ।


एक दो रोज पढ़े जाओगे
एक दो रोज सब गुनगुनायेंगे।
दोहरायेंगे कुछ दिन वेद ऋचा सा
फिर सब तुम्हें भूल जायेंगे।
दो चार दिन आँसू बहाते हैं सब
कोई हम पर जनम भर रोता नहीं



ये खजुराहो के मंदिर ये
अजंता एलोरा की गुफायें।
कुछ प्रतिबिंब अधूरी तपस्याओं के
कुछ में चित्रित हैं कुंठित वासनाये।
देह पर ही लिखे गए हैं नेह के इतिहास सारे
जग में मन जैसा कुछ भी होता नहीं ।


क्यूँ नाचती है मीरा दीवानी
सूफी किसके लिये गीत गाते।
प्रीत की चादर बुनते किसके लिए कबीरा
सूर किसको रहे अंत तक बुलाते।
वाचन मात्र मानस का होता यहाँ
राम चरित में कोई भी खोता नहीं ।
समय के शिलापट्ट पर कालजयी कुछ होता नहीं ।


 



वैशाली

  अर्चना राज़ तुम अर्चना ही हो न ? ये सवाल कोई मुझसे पूछ रहा था जब मै अपने ही शहर में कपडो की एक दूकान में कपडे ले रही थी , मै चौंक उठी थी   ...