Wednesday, May 25, 2022

रामावतार त्यागी

- डाॅ. सुरेश गौतम

- डाॅ वीणा गौतम


प्रयोगवादी धारा के पश्चात् हिंदी गीतिधारा मे गीतकारों का जो वर्ग साहित्यिक मंच पर उभर कर सामने आया उनमें रामावतार त्यागी का स्वर अन्य कवियों से सर्वथा भिन्न सुनाई पड़ता है। गीति-क्षेत्र की जिस परंपरा से आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर त्यागी जी चले उसमें वे निस्संदेह सफल हुए हैं। ये नई अनुभूति के समृद्ध गीत-कवि हैं। उन्होंने जीवन मे सौंदर्य और विकृति दोनों को महत्त्व दिया है। उनके गीतों में चित्रात्मकता है। उन्होंने समाज की पीड़ा, तिरस्कार और घृणा को संवेदना की भूमि में अनुभूत किया है। उन्हें अपने अहं पर आस्था है। उनके कतिपय गीत गाए जाने के लिए हैं और कुछ पढ़े जाने के लिए। जीवन का भोगा हुआ संदर्भ त्यागी की रचनाओं में निर्लिप्त रूप से प्रकट है। त्यागी का व्यक्ति और त्यागी का कवि एक-दूसरे के साथ इस प्रकार घुले-मिले हैं कि उनमें किसी की भी अपेक्षा कर दूसरे को जाना ही नहीं जा सकता चूंकि त्यागी ने जो कुछ देखा, जिया, सहा, झेला और भोगा है, मान उसी को वाणी दी है। ‘न उसकी अनुभूति ‘उधार’ की है न अभिव्यक्ति, न उसने अपने आपको आधुनिक सिद्ध करने के लिए झूठी भाषा का प्रयोग किया है न स्वयं को ‘बड़ा’ कवि मनवाने के लिए ऐसी कविताएं लिखी हैं जो पाठक तो दूर स्वयं कवि की भी समझ में नहीं आती। इन्होंने नारों और प्रचार के बल पर स्वयं को प्रतिस्थापित करने का प्रयास भी नहीं किया। उनके गीत किसी व्यक्ति विशेष का रुदन-ह्रास न होकर पूरे मध्यवित्त समाज की स्थिति को बिंबित कर अपनी अलग दृष्टि रेखांकित करते हैं। उसकी चेतना स्वाभिमान की आंच में तपकर कुंदन बन निखरी है इसीलिए वह व्यक्ति तो क्या, समूचे राष्ट्र की भत्र्सना निर्भीक होकर करता है। जब उसकी आंखें देश में काम के स्थान पर प्रदर्शन, जुलूस, और नारी से प्रभावित अपग आस्था को देखती हैं, उसकी विश्वस्त चेतना कराह उठती है।

स्वाभिमान

त्यागी जी के गीतों में उनकी प्राण-चेतना समाई हुई है, उनका व्यक्तित्व गीतों की पंक्तियों में इस प्रकार रच-बस गया है कि उनके गीत उनके व्यक्तित्व को उभार कर उनकी प्राणवानता सिद्ध करते हैं। उनके व्यक्तित्व के मूल गुण स्वाभिमान तथा स्वच्छंदता अनेकाधिक गीतों में प्रमुख स्वर के रूप में तीव्रता से व्यंजित हुई है। कलाकार के गौरवमय अहं की स्पष्ट अभिव्यक्ति त्यागी के गीतों की अतिरिक्त विशेषता है।

कवि में स्वाभिमान की गति अदम्य है। इस अनुपम शक्ति के बल पर वह किसी के आगे अपने अधिकारों की भिक्षा नहीं मांगता, उसे अपनी आत्मिक शक्ति पर सुदृढ आस्था है। आपदाओं और कष्टों के अथाह समुद्र में अपनी जीवन-नौका के डूब जाने अथवा डावाडोल होने की उसे लेशमात्र भी चिंता नहीं है, चाहे कितने ही प्रभंजन परीक्षा कर देख लें, वह तो अपने आत्मविश्वास से दीपित स्वाभिमान की डोर थामे है। इसलिए उसे किसी की दान-दक्षिणा अथवा अनुकंपा की किसी भी स्थिति में आवश्यकता नहीं है।

यदि माझी में तूफ़ानों से टकराने का आत्मविश्वास से परिपूरित साहस है तब सहस्त्रों प्रभंजन भी उसका कुछ नहीं कर सकते। स्वाभिमान की विपुलता के कारण कदाचित् कवि के स्वभाव में अक्खड़पन उत्पन्न हो गया है। यह किसी भी स्थिति के अनुकूल अपने स्वाभिमान को न तो झुकाना जानता है और न ही किसी प्रकार के समझौते का पक्षधर है। जबकि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था उसे ऐसा करने को बाध्य करती है, परिणामस्वरूप कवि जो मान-सम्मान पाने की आकांक्षा मन में संजोता है वह उसे प्राप्त नहीं होता। मान-सम्मान न प्राप्त कर पाने के कारण कवि-मन विद्रोह करता है और उसके गीत शिक़ायत के स्वर में परिवर्तित होकर परिवार, समाज यहां तक कि शासन-तंत्र के प्रति भी मुखर और प्रखर हो उठते हैं।

स्वाभिमान तथा शिक़ायत में टकराव की स्थिति उत्पन्न होने पर नया संघर्ष प्रारंभ होता है जो कवि हृदय भूमि पर क्रांति के बीज रोपित कर उसके चिंतन को परिवर्तन की ओर उन्मुख करता है, परिणाम होता है जड़ शासनतंत्र के विरुद्ध विद्रोह। कवि इस तथ्य का निभ्र्रांत शब्दों में उदघोष करता है। जड़ और अनुपयोगी व्यवस्था में परिवर्तन जीवन अनिवार्य-धर्म होने के कारण अवश्यंभावी है।

बलिदान

क्रांति-समर्थकों को सिद्धि सरलता से नहीं प्राप्त होती, उसे प्राप्त करने के लिए न जाने आपदाओं, कष्टों के कितने दुर्गम पर्वत लांघ अनेक उत्सर्ग करने पड़ते हैं, कवि ऐसे ही लोगों का चारण है जो काटों से भरे हुए पथ पर चल अपने चरणों को रक्त से लथ-पथ कर बलिदान करना जानते हैं। विवश स्थितियों के वात्यचक्र में उलझकर उत्सर्ग करना बलिदान नहीं है, समर्पण में तो एक तीव्र ललक हर्ष की निराली चमक है। वंदना, अर्चना भी ऐसे ही मुस्करा कर अस्तित्व निर्मूल करने वालों की होती है जिनका अर्थ और इति ख़ुशी-ख़ुशी बलिदान होने की भावना में समाहित है जिन्हें त्याग कर किसी फल प्राप्ति की अपेक्षा नहीं होती।

स्वातंत्र्य एवं जिजीविषा

अंततः बलिदान की परिणति स्वातंत्र्य एवं जिजीविषा में त्राण पाती है। जिस व्यक्ति में हसते मुस्कराते हुए अधिकार त्यागने की सामथ्र्य है, अपने अधिकारों को रक्षित करने के लिए संघर्ष के वज्र-वक्ष मे छिद्र करने का साहस भी वही रखता है। स्वातंत्र्य मनुष्य का जन्मसिद्ध सर्वप्रथम अधिकार है, त्यागी जी इससे एक क्षण के लिए भी विमुख नहीं हैं चूंकि उनके लिए स्वतंत्रता आध्यात्मिक महत्त्व की वस्तु है।

जीवन का अदम्य वेग, जोखिमों, विपत्तियों से टकराने की अद्भुत क्षमता कवि में विद्यमान है। जीवन के प्रति उसका जीवन-दर्शन स्वस्थ है, इसीलिए वह संपूर्ण आस्था से दुःखों एवं सुखों का समान रूप से आलिंगन करता है। जिजीविषा के इसी रूप ने जीवन-भर विकट संघर्षों के समक्ष कवि को कहीं झुकने अथवा समझौता करने नहीं दिया। इसीलिए उसे अपनी जिजीविषा पर दृढ़ विश्वास है, जिस उद्देश्य प्राप्ति के लिए यह जीवन-संग्राम में निहत्था होकर भी अपने पौरुष का परिचय दे रहा है, उसका श्रेय उसे लक्षित उपलब्धि, सिद्धि तक स्वयं ही ले जाएगा। जीवन-संग्राम में विकट संघर्षों से जूझते कवि के दृग-युगल में कभी-कभी अश्रुकण झिलमिलाने लगते हैं लेकिन हर अश्रुकण कायरता की खोझ नहीं होता वरन् यहां तो कवि के आत्म-विश्वास को सवारती मुस्कान दृदृष्टिगत है। इसका कारण है यह तड़प, जलन से उद्दीप्त तपन, व्यथा जो कवि ने इच्छानुसार स्वयं अंगीकार की है। अनिल का पुत्र कवि तापसी अंगारे का तन बनने की इच्छा से उसे सार्थक की सायास चेष्टा में निरंतर संलग्न रहता है।

इन प्रवृत्तियों ने कवि में एक स्वस्थ प्रवृत्ति मार्गी आस्थापूर्ण प्रबल दृष्टिकोण को जन्म दिया है जो भावात्मक अवधारणाओं पर अवलंबित होने के कारण ऋणात्मक मनःस्थिति का घोर विरोध करता है।

वेदना का गायक

त्यागी के गीतों में वेदना का स्वर सर्वाधिक तीव्र है। वैयक्तिक अथवा सामाजिक दोनों ही स्तरों पर उनके गीतों के मूल में वेदना का साम्राज्य है। वैयक्तिक-वेदना में यदि प्रेम से उत्पन्न नैराश्य का स्वर मुखर है तो सामाजिक वेदना में आर्थिक एवं राजनीतिक कटुताओं से उत्पन्न वैषम्य की अनुभवजन्य तपन विद्यमान है। इन सबकी अनुभूति का मुख्य कारण उनका प्रखर स्वाभिमान तथा स्वातंत्रय-भावना से उत्पन्न वह आत्मिक गौरवपूर्ण शक्ति रही है जिसके बल पर वे कभी किसी शक्ति के समक्ष नहीं टूटे, नहीं बिके।

कवि की वेदना अन्य गीतकारों की वेदना से पृथक् है, उनकी पीड़ा में रुदन का लेश नहीं। न ही उनकी तड़प में नैराश्यांधकार तथा अनास्था का भारी बोझ है जिसे उठाने में कवि असमर्थ हो-कारण, पीड़ा उसकी विवशता नहीं है, उसने वेदना का सहर्ष स्वयं आलिंगन किया है। उसकी आस्था की दृढ़ सीमाओं का संकुचन यही नहीं होता बल्कि कालिमा के गहनतम जलधि में भी वह उसके अस्तित्व को निमज्जित न होने तथा पराजित न होने के आस्थामय स्वर की ध्वनियों को संगीतबद्ध करते हुए कवि-व्यक्तित्व की दृढ़ता को प्रकट करती है।

बुद्धि की अपेक्षा कवि सच्ची भावनाओं को अधिक महत्त्व देता है। प्यार की सच्ची भावना ही मानवता का जयघोष है। ज्ञान के आलोकमय क्षेत्र में भावना का स्थान नहीं होता। ज्ञान चाहे भावना को पराजित करने के लिए लाखों-करोड़ों बोलियां लगा लें लेकिन अर्चा के सच्चे भाव-सुमन कभी नहीं बिकते। त्यागी जी बुद्धि-चकोरि पर विश्वास न करने की चेतना व्यक्ति को देना चाहते हैं जहां सौ-सौ जन्म मुस्करा कर भी मानव फूल सी निश्छल मादकता से खिलखिलाकर नहीं हंस पाया। इसीलिए कवि भावनाओं का कट्टर समर्थक है। बुद्धि तो जीवन में व्यथा-पीड़ा के समुद्र से त्राण प्राप्त करने का सतु है जिसका जब चाहे व्यक्ति निर्माण कर अपनी आत्मा तथा सम्मान-रत्न को विक्रय कर जीवन की संपूर्ण वैभव-निधि का क्रय कर  सकता है। स्वाभिमान को सुरक्षित कर त्यागी ने हर स्थान पर हर क्षण भावनाओं को रक्षित किया है जिसके साथ वेदना का घनिष्ठ संबंध है और कवि इसे ही अनमोल पारस-मणि स्वीकारता है। इस पारस-मणि के मूल्य पर वे अपना सब कुछ बलिदान कर देने के पक्ष में हैं। इसीलिए वे गंगाजल से भरे कंचन कलश को दूर कर आंखों से अश्रु पीने में ही अपनी सार्थकता अनुभव करते हैं। उनके अनुसार दर्द ऐसी संपदा है जो मानव-मानव के मध्य सद्भावों का निर्माण कर उसे मानवता से जोड़ती है। एक पागल भी उसे खोने को तैयार नहीं होता फिर कवि ने तो सहर्ष उसे अपने गले का हार बनाया है। अश्रुओं की इस अमूल्य पारस-मणि को प्राप्त कर कवि सिंहासन और मंदिर के आसन को भी तुच्छ बताकर उसी के चरणों में मरने की विकट अभिलाषा प्रकट करता है जिसने उसे अश्रुकणों का मीठा यह उपहार दिया है। इसीलिए वे उस दाता के प्रति भी अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

मानवीय गंध की प्यास

त्यागी के गीतों में मानवीय गंध की प्यास तीव्र है। असंयम, दुर्बलता तथा चांचल्य को मानव-स्वभाव के अंग मानकर कवि उनसे उत्पन्न पापों को क्षम्य समझता है। यौवन तो वह स्वर्णिम अवस्था है जब भावनाओं का उत्ताल-ज्वार संयम की रज्जुओं के टुकड़े-टुकड़े बिखेर देता है। ऐसे आवेशजनित यौवन को क्या दोष दिया जाए, ऐसे क्षणों में कवि प्रायश्चितस्वरूप भूलों पर यवनिका गिराने के प्रयास में क्षमा की झालरें संवारता है। जीवन-यौवन के ऐसे ही दुर्लभ क्षणों में प्रेम की सुुषुप्त मादक अनुभूति अंकुर बनकर फूट पड़ती है और कवि को दे जाती है एक मधुर टीस-युक्त वेदना जिसका अभिलाषी कवि सदा से रहा है। प्रेम के इस विषम एकांगी रूप में कवि भावनाएं व्यथा, पीड़ा से तड़पी है, यहां तक कि वह प्रेम को वेदना का पर्याय मानकर स्वीकार कर लेता है। लेकिन प्रेम को वेदना का पर्याय मान लेने से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि कवि ने इस प्रेम को पूर्ण एकनिष्ठता के साथ अंगीकार किया है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि कवि अपनी किसी पुरानी आदत के कारण स्वयं ही पीड़ा को अंगीकृत करते हुए बारंबार दुहराने का आदी है, अन्यथा ‘प्रेम’ एवं ‘मन-बहलाना’ भी कवि के लिए सौ-सौ सौगंध उठाने के समान पर्याप्त है?

आर्थिक एवं सामाजिक स्थितियों से उत्पन्न वेदना भी कवि को अभीष्ट है। समाज में आर्थिक व्यवस्था की दारुण चक्की कुछ इस तरह चलती है कि कलाकार की संपूर्ण महत्वाकांक्षाएं ही नहीं कोमल भावनाएं भी निर्ममता से दो पाटों के मध्य कुचली जाती है। जीवन की रंगीनियों में छुपी विद्रूपताओं को त्यागी ने अपने सद्य प्रकाशित गीत संग्रह ‘गाता हुआ दर्द’ में बड़ी ख़ूबसूरती से पेश किया है। रूढ़िवादी मानसिकता की सीवन उधेड़ते हुए त्यागी वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक मठाधीशों को बख्शते नहीं हैं अपितु बड़ेे नफीस तरीके से उन पर व्यंग्य करते हैं। समाज की यथार्थवादी तस्वीर खींचते हुए त्यागी यंत्रचालित व्यवस्था के अनुचित कृत्यों का विरोध करते हैं। भावना-जल निरंतर मृगतृष्णा की भांति कवि-दृग-युगल के सामने आकर भी उद्विग्न प्यासा रहता है। समाज की सबसे बड़ी त्रासदी तो यही है कि ऐश्वर्य के लोभ लालच में अनेक अकरणीय कृत्य भी स्वच्छंदता से होते हैं। इस यंत्रचालित व्यवस्था के अनौचित्यपूर्ण कृत्य का कवि प्रबल विरोधी है इसीलिए दुनिया के मंदिर में उसकी अर्चना व्यर्थ है। चूंकि तथाकथित मठाधीशों के हाथों कवि ने अपनी आत्मा का सौदा करने से इंकार कर दिया। आर्थिक जर्जरता से ग्रसित कवि-कला उसे पूर्ण शरीर ढकने के लिए कफ़न दिलाने में भी असमर्थ है। जीवन और जीवन-स्वातंत्र्य लिए निर्धनता सबसे घोर अभिशाप है और प्रतिभा इसी अभिशप्त निर्धनता की बेटी हो गई है। इसके पश्चात् भी कवि ने अपनी प्रबल आस्था तथा आत्मिक विश्वास के बल पर उसका वरण किया है क्योंकि कठिनाइयों से जूझने, तूफ़ानों से क्रीड़ा करने में कवि को मज़ा आता है। तूफ़ानी, संघर्षों के वज्र पांवों में कवि बेड़ियां पहनाने का अटल संकल्प लेकर जीवन-संग्राम में अपने कवि-धर्म को निर्भीक होकर निभ्र्रांत शब्दों में अभिव्यक्त करता है। चाहे उसे संपूर्ण उमर सूनी काल-कोठरी में व्यतीत करनी पडे़ किंतु वह जीवन-भर कारावास की कठोर यातना भोगते हुए भी स्वर्ण के हाथों अपनी लेखनी और गीतों को विक्रय करने को उद्धृत नहीं हैं।

शिल्प दृष्टि

प्रभावशाली और सक्षम अभिव्यक्ति के कारण आधुनिक गीतकारों में त्यागी का स्थान महत्वपूर्ण है। अन्य गीतकारों की भांति ही प्रणय की विभिन्न स्थितियों का चित्रण कवि ने किया है लेकिन इनकी प्रणयाभिव्यक्ति में मार्मिकता और विदग्धता के साथ-साथ इतनी जीवनता है कि वे सहज ही वाचक के हृदय पर सीधा और तीव्र प्रभाव कर मन की तंत्रियों को होले-से झंकृत कर देती है। अपनी बात को नए ढंग से व्यंजित कर उक्ति को अधिक आकर्षक और व्यापक अर्थवत्ता प्रदान करने का गुण उनके गीतों की निजी विशेषता है।

त्यागी जी को एकदम दोषमुक्त ठहराना उचित नहीं है। ‘छंद गीतों की व्यवस्था मात्र है, बंधन नहीं है, मानने वाले त्यागी का सबसे बड़ा दोष यही है कि यह आज भी छंद को उसी प्रकार अपने सीने से चिपकाए हुए हैं जिस प्रकार एक बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को। यही स्थिति उनके उपमानों की भी है। हालांकि वह दूसरों को संबोधित करता हुआ उनके उपमानों पर अविश्वास की खुली घोषणा करता है और इधर स्वयं कवि गिनती के कुछ उपमानों का आश्रय लेकर आज की बात कहने का प्रयास करता है जो कभी-कभी घिसे-पिटे उपमानों के प्रयोग के कारण फुसफुसा कर रह जाती है। ऐसे उपमानों का चयन और प्रयोग पाठक के मन पर किसी प्रकार के नवीन प्रभाव को न डाल कर उनके गीतों को सामान्य प्रवृत्ति की ओर इंगित करता है। ठीक इसी के समानांतर उनके गीत की स्थिति है जो आग्रह को छोड़ कर कभी-कभी दुराग्रह की सीमा को लांघ जाती है और उसकी गति-क्षमता पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए गीतों के प्रति अरुचि-भाव उत्पन्न करने में सहायक बन जाती है।

गीतों के दर्पण को छोटा स्वीकार कर जीवन के आकार को बड़ा मानने वाले त्यागी जब नई कविता की मृत्यु की उद्घोषणा कर गीत को विद्यापति का पुत्र कहकर उसकी दुंदुभि बजाते हैं तब उनकी यह उद्घोषणा भी उतनी ही बेमानी लगती है। जितनी कि गीत की मृत्यु की उद्घोषणा करने वाले छिछली राजनीति से प्रेरित तथाकथित बुद्धिजीवियों का कथन। लेकिन संतोष इसी बात का है कि कवि को इस स्थिति का आभास है। हमारा यह विश्वास है कि यह अहसास त्यागी जी को एक दिन गीत की रूढ़ियां तोड़ने के लिए विवश करेगा।

अप्रस्तुत विधान

त्यागी जी के गीतों का अप्रस्तुत विधान भी पर्याप्त सक्षम एवं आकर्षक है। परंपरागत उपमानों को स्वीकार करते हुए भी उन्होंने स्वनिर्मित नवीन उपमानों का सफल प्रयोग किया है। नूतन उपमानों से सज्जित अनेक मौलिक प्रयोग उनके गीतों में सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। उनके उपमानों का विभाजन हम चार वर्गों में कर सकते हैं- परंपरागत उपमान, नवीन उपमान, ऐतिहासिक-पौराणिक उपमान तथा वीभत्स उपमान।

परंपरागत उपमानों में प्रायः रूढ़िगत काव्यात्मक उपमानों चंदा, चकोरी, पपीहे आदि को ही कवि ने मान्यता दी है। नवीन उपमानों के सुंदर चयन के लिए कहीं कवि प्रकृति-खोजी हुआ है तो कहीं जीवन के क्षेत्र को अपनाया गया है। वैज्ञानिक सुखोपलब्धियों से ग्रसित बौद्धिकता-प्रधान युग की नागर सभ्यता के प्रभाव-स्वरूप कवि ने मेघों में भी पूंजीपतियों की-सी कृपणता को देखा है। अन्य आधुनिक गीतकारों की भांति पौराणिक- ऐतिहासिक उपमानों का बाहुल्य भी त्यागी जी के गीतों में देखा जा सकता है। अनेक वीभत्स उपमानों का प्रयोग कवि ने उर्दू अभिव्यंजना के प्रभाववश स्वीकार किया है।

भाषा

त्यागी जी के गीतों की सफलता और लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनकी सहज-सरल भाषा है। उत्तर-छायावादी काल में अभिव्यक्ति की सफाई को भाषा का सर्वमान्य गुण स्वीकार किया गया है, त्यागी जी के गीत इसके साक्षात् प्रमाण हैं। भाषा में बोल चाल के शब्दों का आधिक्य, परिष्कृत खड़ी-बोली का चलता हुआ मृदुल एवं संगीतमय रूप उनके गीतों की सहज उपलब्धि है। कथन की वक्रता उनके गीतों के प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर उन्हें नई भाव-क्षमता प्रदान करती है। भाषा में कहीं कहीं उर्दू प्रभाव के साथ-साथ सामान्य जीवन में प्रचलित लोकोक्तियों का प्रयोग भी कवि-भाषा की अन्य विशेषता है। अन्य समकालीन गीतकारों की भांति कवि भी व्याकरण-संबंधी अशुद्धियों से बच निकलने में असफल रहा है।

गीतों का रूपाकार-संगीतात्मकता 

भावाभिव्यक्ति के लिए गीत-विधा चुन कर त्यागी ने उसे पर्याप्त समृद्ध किया है। संक्षिप्तता और गेयता उनके प्रायः सभी गीतों का विशेष अर्जित गुण है। उनके गीत की प्रथम दो पंक्तियों में उनकी मुख्य भावाभिव्यंजना निहित रहती है फिर उसके पश्चात् चार पंक्तियों का एक पद और फिर वैसी ही दो पंक्तियां उनकी भावाभिव्यक्ति के अनुकूल वातावरण निर्मित करती है। इस प्रकार के विधान के कारण उनके गोतों में टेरी आवृत्ति न होकर भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा मुख्य भाव की आवृत्ति ही होती है। उनके श्रेष्ठ गीत-संकलन ‘आठवां-स्वर’ के अनेक गीत ‘मन को तो मैं समझा लूंगा,’ ‘सागर से यह बात करूंगा,’ ‘मन की उजली किरणों में बांध मुझे’, ‘सबसे अधिक तुम्हीं रोओगे’ आदि गीत-शैली के प्रमाणस्वरुप उद्धृत किए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त सूत्रात्मक्ता भी इनके गीतों की निजी विशेषता है जो एक निराली रंग-छटा बिखेरते हुए कवि की भावाभिव्यक्ति को समर्थ फल का आधार प्रदान करती है।

मूल्यांकन

रामावतार त्यागी प्रमुखतः संघर्ष और शक्ति के कवि हैं। प्रणय-रोमांस उनके कृतित्व का गौण स्वर है। उन्होंने हर नए चिंतन और भाव को गीतिमय माध्यम से अभिव्यक्त कर गीत-क्षमता के साथ-साथ अपनी प्रातिभ शक्ति-चेतना को स्पष्ट रूप में घोषित किया है। भाव धरातल पर उनकी सक्षम लेखनी ने वेदना एवं प्रणय के विभिन्न स्वरों को वाणी दी है। अभिव्यक्ति के सहज सौंदर्य ने उनके गीतों को पर्याप्त आकर्षण प्रदान किया है। अपने संघर्षमय जीवन तथा स्वस्थ जीवन-दर्शन पर आधारित जिजीविषा के बल पर उन्होंने नवगीतकारों मे अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। उनकी रचनाएं पीड़ा, टीस और प्रेम की भंगिमा के साथ आक्रोश की तीव्र शक्ति को आत्मसात किए है।

‘गुलाब और बबूल वन’ (सन् 1973) और ‘गाता हुआ दर्द’ (सन् 1984) में आकर त्यागी के तेवर का बांकपन पहले की तरह ही क़ायम है। वक़्त गुज़रने के साथ ज़िंदगी ने उसे तराशा ज़रूर है मगर इतना ही नहीं कि उसका सारा खुरदरापन घिस गया हो। समझौतों की दुनिया में रहने के बावजूद आज भी उसमें चुनौती उसी तरह जीवित है जिस तरह एक मुद्दत से शहर में रहने के बावजूद आज भी उसमें ‘गांव’ जीवित है। शहरी वातावरण और सुविधाएं उसे इतना ‘सभ्य’ कभी नहीं बना पाईं कि भीड़ में उसकी सूरत अलग से पहचानी ही न जा सके। आज भी उसके चेहरे पर विद्रोह और अस्वीकार की चमक ज्यों की त्यों बनी हुई है। आज भी वह यह कहने का साहस रखता है-‘गीत नहीं आग लिखूंगा’।

त्यागी की बदनसीबी यह है कि दर्द उसके साथ लगा रहा है, उसकी ख़ुशनसीबी यह है कि दर्द को गीत बनाने की कला में वह माहिर है। गीत को जितनी निष्ठा से उसने लिया है, वह स्वयं में एक मिसाल है। आधुनिक गीत-साहित्य का इतिहास उसके गीतों की विस्तारपूर्वक चर्चा किए बिना लिखा ही नहीं जा सकता। गीत के प्रति समर्पित व्यक्तित्व रामावतार त्यागी का अब यही स्वप्न है कि उसके द्वारा किसी बड़ी और महत्वपूर्ण रचना का सृजन हो। महल का कंगूरा तो हर व्यक्ति बनना चाहता है लेकिन त्यागी को संतोष है कि देहाती नीव पर गीत की ईंट उन्होंने रखी थी और अब उस पर सुंदर ताजमहल खड़ा हो चुका है।

संदर्भ- ‘नवगीत: इतिहास और उपलब्धि’, डाॅ. सुरेश गौतम, डाॅ. (श्रीमती) वीणा गौतम, शारदा प्रकाशन, नई दिल्ली (संस्करण 1985), पृ.-108 से 116

कविवर रामावतार त्यागी

 

शेरजंग गर्ग



समकालीन हिंदी कविता अपने विविध रंगों और शैलियों में पूरे निखार एवं यौवन पर है, तथापि कविता का प्रत्येक प्रबुद्ध पाठक अथवा श्रोता यह महसूस करने लगा है कि कविता जन-जीवन से दूर जा पड़ी है। यह एक असंगति ही है कि समकालीन कविता आम आदमी के इतना नज़दीक होने के बावजूद जन-जीवन का अभिन्न अंग बनने में उतनी सफल नहीं हो पाई है, जितनी कि उससे अपेक्षा की जाती है। चलताऊ भाषा में जिसे लोकप्रिय कविता कहा जाता है, वह कवि सम्मेलनों के फूहड़पन से जुड़ी हुई है। उसमें हास्य है, लतीफें-चुुटकुले हैं और वाहियात किस्म गलेबाज़ी है। दूसरी ओर साहित्यिक कविता प्रयोगों और दुष्प्रयोगों के चक्कर में इस क़दर फंसी हुई है कि वह जन समान्य से संपर्क का दावा करने के बावजूद सामान्य-जन की रुचि का विषय नहीं बन पा रही है। ऐसी दुविधाग्रस्त स्थिति में वे कवि वाक़ई स्वागत योग्य हैं, जिन्होंने समय के रुख़ के विपरीत खड़े होकर कविता को न तो अपने व्यक्तित्व से विच्छिन्न किया, न जनता से, साथ ही साहित्यिक शिखरों को भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया। इस धारा के अग्रणी कवियों में श्री रामावतार त्यागी विशेष महत्व रखते हैं।

त्यागी का जीवन भयंकर चुनौतियों का सामना करने वाला रहा है। पारिवारिक चुनौती, सांसारिक चुनौती-सभी तरह की चुनौतियों को साहस से झेलते हुए उन्होंने स्वयं को जीवित रखा है। आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के एक कस्बेनुमा शहर से दिल्ली में अपने ढंग से आकर बस जाने वाला अलमस्त कवि फिर हमेशा के लिए दिल्ली का होकर रह गया। यहां आकर उसने अपनी अधूरी पढ़ाई को पूरा किया, जीवन के नए-नए रूपों को देखा, महानगर की जद्दोजहद में हिस्सा लिया, कई तरह की नौकरियां कीं और छोड़ीं, मगर जिसे अभी तक स्थापित हो जाने का तथाकथित गौरव नहीं मिला है।

त्यागी ही क्या, किसी भी अच्छे कवि की रचनाओं की राह से गुज़रने से पूर्व उसके जीवन की उन घटनाओं का, उसकी तुनुक़मिज़ाजियों और अल्हड़पन का परिचय प्राप्त कर लेना ज़रूरी होता है, जो कवि के व्यक्तित्व को शक्ति देती है, उसे किन्हीं विशिष्टताओं का स्वामी बनाती है। त्यागी का वैशिष्ट्य, जिसे ‘त्यागिगाना ठाट’ भी कहा जा सकता है, आज के जीवन की आपाधापी, कोमल संबंधों के अभाव, सफेदपोशी, कृत्रिम शालीनता और अभिजात्य की देन है, जिनके विरुद्ध खड़े होकर बोलना त्यागी का स्वभाव है और यही त्यागी स्वयं को ज़माने की स्वाभाविकता और दुनियादारी के दाव-पेंचों से अलग कर लेते हैं। त्यागी के संपूर्ण काव्य में एक सहज रागात्मकता से सराबोर अल्हड़ता, आदमीयत के प्रति सहानुभूति, बेबाक-स्वाभिमान और एक जैसे छंदों में लिखने के बावजूद बेपनाह ताज़गी मिलती है। यद्यपि त्यागी एक स्थान पर यह कबूल कर बैठे हैं ‘‘गीतों का दर्पण छोटा है जीवन का आकार बड़ा है’’ मगर उन्होंने जीवन के बड़े आकार को गीतों के छोटे दर्पण में समोने का ‘दुस्साहस’ किया है। वह कोशिश कुछ-कुछ वैसी ही है जैसे कि गागर में सागर भर देने का दुस्साहसपूर्ण काव्य-कौशल।

कविता में त्यागी गीत को चाहे कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न मानते हों, गद्य में उन्होंने उपन्यास से लेकर पत्र-विधा एवं व्यंग्य-लेखन को भी भरपूर अपनाया है। उनका उपन्यास ‘समाधान’ एवं ‘चरित्रहीन के पत्र’ प्रभृति रचनाएं हमारे इस कथन का पुष्ट प्रमाण है। बच्चों के लिए ‘मैं दिल्ली हूं’ जैसी रचना त्यागी जी ने लिखी। व्यंग्य-लेखन के क्षेत्र में उनके स्तंभ ‘दिल्ली जो एक शहर है’ तथा ‘राम-झरोखा’ को नवभारत टाइम्स के पाठक आसानी से नहीं भूल सकते। काव्य संकलनों के रूप में अब तक उनकी चार महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाश में आ चुकी हैं, यथा ‘नया ख़ून’, ‘आठवां स्वर’, ‘सपने महक उठे’ एवं ‘गुलाब और बबूल वन’। आज के लोकप्रिय हिंदी कवि पुस्तकमाला में स्थान पाने वाले कवियों में त्यागी सबसे युवा थे।

त्यागी के कवि-व्यक्तित्व के विकास में उनके सफल-असफल प्रेम के विभिन्न रूपों का भी हाथ है। प्रेम के इन्हीं रूपों ने इनके व्यक्तित्व को निखारने का काम किया है। यही कारण है कि हम उनके प्रारंभिक ही नहीं अद्यतन काव्य में भी प्रेम और विद्रोह के स्वरों की अनुगूंजे पाते हैं। एक ओर मध्यवर्गीय युवा मन की छटपटाहट, भावुकता, संवेदनशीलता और इरादे तथा दूसरी ओर आवश्यकता विषमता, वर्जना, वैयक्तिक कुंठा के आवरण में लिपटी व्यवस्था और उसके सुविधाजीवी ठेकेदार, ‘इन सबने मिलकर त्यागी को काव्यलेखन की ओर उन्मुख किया। कभी उनका प्रेमी-मन विद्रोही बनकर इस व्यवस्था को ललकारता है, तो कभी विद्रोही-मन ही प्रेमी का बाना पहन कर उससे सूरज का तिरस्कार करता हुआ बुझते हुए दीपक के सिरहाने जा बैठता है।’ उन्हें ज़माने की चोटें, घटियापन, व्यावहारिकता और कड़वी परिस्थितियां सपनों तक से निम्नांकित निवेदन करने को विवश करती हैं -

सपनों कुछ धीमे-धीमे पांव धरो

चीलों की तरह उड़ाने नहीं भरो

आकाश नहीं, ये मेरी आंखें हैं

वास्तव में, त्यागी के काव्य में ऐसा संसार मूर्तिमान हो उठता है, जिसके प्रति हर कोमल और संवेदनशील मन में मोह है, मगर यथार्थ के टूटने के कारण लोग जिससे दो-चार होने में कतराते हैं। छायावादियों के समान त्यागी ने आंखों को आकाश न मानकर आंख ही माना है, इसलिए वह सपनों को उनकी सीमाओं में बंधकर काम करने की ही इज़ाज़त दे पाते हैं।

त्यागी के कवि का यह भी अपना रंग ही है कि उन्होंने प्रयोगवादी काव्य को बहुत ऊंचे दर्ज़े का काव्य कभी नहीं माना है। यहां यह बहस नहीं कि उन्होंने ऐसा करके सही किया या ग़लत, मगर वह यह मानते रहे हैं कि प्रयोगवादी कविता में दुरूहता, बौद्धिकता एवं अतिशय प्रयोग की ललक उसे आम आदमी के मतलब की चीज नहीं रहने देते। स्वयं त्यागी ने छंदों तक के बहुत कम प्रयोग किए हैं, मगर हर बार हर गीत एक ऐसी चैंक लेकर उपस्थित होता है, मानो वैसा पहली बार ही हुआ हो। उनके गीत कहीं-कहीं संत कवियों की सूक्तियों से टक्कर लेते हुए लगते हैं। सुनते ही याद हो जाने वाली, अक्सर दिमाग़ को कुरेदने वाली सैकड़ों पंक्तियां उर्दू के उस्ताद कवियों की शायरी का स्मरण करा देती है। उदाहरणार्थ यहां कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं -

सुख तो कोई दुर्लंभ सी वस्तु नहीं

जब चाहो आदर के बदले ले लो

दुनिया को अपनी पावनता दे दो

फिर चाहे जिस सिंहासन से खेलो।

अर्थ-गांभीर्य और संवेदना के स्तर पर मन को छूने वाली अनेक पंक्तियों का रस ग्रहण करने के लिए त्यागी के संपूर्ण काव्य का अध्ययन किया जाना बेहद ज़रूरी है। इस कवि ने दर्द को इस सीमा तक बरदाश्त किया है कि यदि उसका जन्म न हुआ होता तो विपदाएं कुंआरी रह जातीं, प्रेम में स्वयं को इतना समर्पित कर दिया कि प्रिय के दरवाज़े तक भी वह प्रिय के चरणों से ही पहुंच सका, क्योंकि उसके पास अपने पैर थे ही कहां? त्यागी ने गीतों को गंगाजल-सा पवित्र माना है। यही वजह है कि दर्द, प्रिय और गीत उनकी थाती है। इसके बग़ैर त्यागी के व्यक्तित्व और कृतित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

एक बार बातचीत के दौरान त्यागी से प्रश्न किया कि साहित्य में नए-नए आंदोलनों की दिशा में युवा पीढ़ी आकर्षित हो रही है, आप क्या सोचते हैं इस संबंध में? इस पर त्यागी का उत्तर यह था-‘‘युवा पीढ़ी को अपनी आस्थाओं के बल पर ही आगे बढ़ना होगा। मेरे ख़याल से इस तरह हर तेज़़ रौ के साथ बढ़ जाना और रहबर को न पहचानना कोई स्वस्थ लक्षण नहीं होता। श्रेष्ठ साहित्य आस्था की देन होता है, अनास्था की नहीं।’’

आज जबकि मूल्यों के क्षेत्र में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई है, साहित्य को भी अपनी आस्थाओं की रक्षा करते हुए जनजीवन का अंग बनना है। त्यागी ने जैसा जिया है, वैसा ही लिखा है। यह किसी कलाकार के लिए कम बड़ी बात नहीं है। कविता में प्रचलित धारणाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाना और जीवन में हर तोपनुमा व्यवधान और ओछेपन से टकरा जाना त्यागी जैसे जीवंत कवि के ही बस की बात है। पत्रकारिता में भी उन्होंने अपने इसी धर्म को निभाया है। कोई पुरस्कार, कोई प्रलोभन त्यागी को सत्य और तथ्य लिखने से विमुख नहीं कर पाता है।

त्यागी के कृतित्व के संबंध में लिखते समय मुझे प्रसन्नता है कि मेरे पास अनावश्यक रूप से लिखने के लिए कुछ भी नहीं है। न तो उसकी भाषा में ही ऐसा कुछ अजीबो-ग़रीब है जिसे भाषाशास्त्र के संदर्भों की दरकार हो, न उसकी शैली ही ऐसी है कि काव्य शास्त्र अथवा अलंकार शास्त्र की बारीकियों में उलझना पड़े, न वह इतना आधुनिक है कि किसी विदेशी महाकवि के साथ उसकी तुलना ज़रूरी हो और न ही वह इतना पुरातन कि उसे किसी आदि कवि के समकक्ष रखा जा सके। वह इतना आसान और अपना है कि उस पर कोई तुलना और विशेषण फिट नहीं बैठ पाता। सच बात तो यह है कि इस कवि के काव्य को सुनने-पढ़ने का अपना अलग ही सुख है और स्वयं उन्हीं के शब्दों में मात्र इतना कहा जा सकता है -

विचारक हैं, न पंडित हैं, न हम धर्मात्मा कोई

बड़ा कमज़ोर जो होता वही बस आदमी हैं हम,

हमें इतिहास में कोई जगह मिलती नहीं माना

मगर इस ज़िंदगी के वास्ते कुछ लाज़िमी हैं हम।

(‘गीत बोलते हैं’ से)

आठवां स्वर की भूमिका

 राममधारी सिंह ‘‘दिनकर’’


त्यागी ने एक जगह गीत की परिभाषा देते हुए कहा है-

गीत क्या है? सिर्फ़ छंदों में सजाई,

आदमी की शब्दमय तस्वीर ही तो।

लेकिन, आदमी की शब्दमय तस्वीर तो साहित्य मात्र है। इसलिए, गीतों का महत्व मैं एक दूसरी तरह से आंकता हूं। साहित्य का सर्वश्रेष्ठ अंश कवित्व है और कवित्व उपन्यासों से अधिक कविता में और कविताओं में भी सबसे अधिक गीतों में रहता है। गीतों में सिमट कर बैठने वाला कवित्व साहित्य की चरम शक्ति का पर्याय होता है। उपन्यास कुछ सफल और कुछ असफल हो सकते हैं, खंड काव्य और महाकाव्य भी अंशतः सफल और अंशतः असफल हो सकते हैं, किंतु, गीतों में आधी सफलता और आधी असफलता की कल्पना नहीं की जा सकती-गीत या तो पूर्ण रूप से सफल होते हैं अथवा ये होते ही नहीं।

गीतों से जिसे स्वयं आनंद नहीं मिलता, उसे उनका अर्थ समझाकर आनंदित करना बड़ा ही कठिन काम है। कई बार यह कार्य मुझसे नहीं हो पाता। गीतों में ऐसे संकेत होेते हैं जो बहुत दूर तक जाते हैं, उनके भीतर मनोदशाएं होेती हैं, जिनके पीछे अनुभूतियों का विशाल इतिहास पड़ा होता है, और सबसे बढ़कर तो यह कि उनके शब्दों की अदाएं ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ देखते बनती हैं, जिनके विषय में बहुत कुछ बोलकर भी कुछ कहा नहीं जा सकता। फूूल पर शबनम चमकती है तो देखने वाली आंखें निहाल हो जाती हैं। मगर, उंगली से छूूकर शबनम को परखनेे की कोशिश मर्कटों का काम है। त्यागी ने ठीक ही कहा है-

‘मन का एक झरोखा खोलो,/ मेरी बात सुनाई देगी।’

अभी हाल में ही, मैंने कहीं लिखा है कि कविता का स्वाद बदलने वाला है, ग़ज़ल, दादरे और ठुमरी का ज़माना बदलने लगा है। ग़ज़ल, दादरे और ठुमरी की विदाई यानी संगीत अलग और कवित्व अलग। मगर ग़ज़ल, दादरे और ठुमरी का ज़माना भले ही लद जाय, गीतों का ज़माना हमेशा बरक़रार रहेगा, क्योंकि भावाविष्ट अवस्था में कवि महाकाव्य नहीं लिखता, वह छोेटा-सा गीत लिख देता है।

और कितने अच्छे होते हैं ये गीत। दर्द की छोटी-सी टीस, मगर पता नहीं, वह कहां से उठती और कहां जाकर विलीन हो जाती है। उमंग का एक मतवाला झोंका जो आता तो बड़ी ही गर्मी से है, मगर सारी वाटिका के भीतर एक सिहरन-सी दौड़ जाती है! किसी नन्हीं उंगली की एक हल्की-सी चोट पड़ती तो एक तार पर है, किंतु जीवन-वीणा के सारे तार एक साथ झनझना उठते हैं।

‘मृत्यु की भाषा कठिन होती बहुत ही,

ज़िंदगी उसका सरलतम व्याकरण है।’

त्यागी की कविताओं पर विचार करते हुए कई बातें ध्यान में आती हैं।

महादेवी और बच्चन ने जो परंपरा चलाई वह जनता की अब भी पसंद है। वही परंपरा नीरज, त्यागी, वीरेन्द्र, राही आदि कवियों के भीतर से अपना प्रसार कर रही है।

बच्चन तक हिंदी गीतों के छंद केवल हिंदी के छंद से लगते थे, अब वेे उर्दूू के पास पहुंच रहे हैं। भाषा भी इन गीतों की हिंदुस्तानी रूप ले रही है। कहां है हिंदी में रिवाइवलिज़्म? यह तो रिवाइवलिज़्म के ठीक विपरीत चलने वाली धारा है।

तीसरी बात यह है कि जिस ज़ोर से प्र्रयोगवादी कवि अपना नूतन प्रयोग कर रहेे हैं, उसी ज़ोर से इस पीढ़ी के अनेक नव कवि गीतों में अपना अंतर उड़ेल रहे हैं। यह ठीक है कि नए आलोेचकों ने अपनी आशा प्रयोगवाद से बांध रखी है, किंतु जनता का प्रेेम आज भी इन गीतों पर ही बरस रहा है।

और त्यागी के गीतों में भी यह प्रमाण मौजूद है कि हिंदी के नए गीत अपने साथ नई भाषा, नए मुुहावरे, नई भंगिमा और नई विच्छित्ति ला रहे हैं। प्रयोगवाद सर्वथा नवीन वृक्ष उगाने के प्रयास में है। हिंदी के नए गीतकार परंपरा की डालों में से नई टहनियों की तरह फूट निकले हैं।

त्यागी के गीत मुझे बहुत पसंद आते हैं। उसके रोने, उसके हंसने, उसके बिदकने और चिढ़ने, यहां तक कि उसके गर्व में भी एक अदा है जो मन को मोेेह लेती है।

लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी

 क्षेमचंद्र ‘सुमन’



‘‘मेरी हस्ती को तोल रहे हो तुम,

है कौन तराज़ू जिस पर तोलोगे?

मैं दर्द-भरे गीतों का गायक हूं,

मेरी बोली कितने में बोलोगे ?’’


त्यागी की ये पंक्तियां हालांकि मेरे लिए चुनौती हैं, फिर भी मैं उसकी हस्ती को तोलने और उसके दर्द-भरे गीतों की बोली बोलने की हिम्मत कर रहा हूं। इसका कारण साफ़ है कि त्यागी से आंख मिलाए बग़ैर आधुनिक गीत-काव्य से परिचय प्राप्त करना संभव नहीं है। वह स्वभाव से अक्खड़, आदतों से आवारा, तबियत से जिद्दी और आचरण से बेहद तुनुक-मिज़ाज है। अगर यों कहूं तो आप इसे और भी अच्छी तरह समझ सकेंगे कि यह वह ख़ुद भी नहीं जानता कि वह क्या है! उसके बहुत-से साथी उसके व्यक्तित्व को असंगतियों और विरोधाभासों का ‘एलबम’ कहते है, तो मैं भी उनके स्वर-में-स्वर मिलाकर इतना कहने की स्वतंत्रता और चाहूंगा कि केवल उसका व्यक्तित्व ही नहीं, पूरा जीवन ही असंगतियों से रंगा हुआ हैऋ और शायद उसकी कविता में भी उसके स्वभाव की ये असंगतियां स्पष्ट रूप से उतरी हैं।

त्यागी के व्यक्तित्व की असंगतियों को और भी साफ़़ तौर से आपके सामने रखने के लिए मैं एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा। 1957 की एक शाम। दरियागंज के ‘रंगमहल होटल’ का अस्त-व्यस्त कमरा। सिगरेट का धुआं और उनके पिये-अधपिये बे-शुमार टुकड़े ! इधर-उधर बेतरतीब फैली किताबें और पत्र-पत्रिकाएं। कमरे में उस समय मैं और वह दो ही प्राणी हैं। इन दिनों वह अपनी बदनाम किताब ‘चरित्रहीन के पत्र’ लिख रहा है। उसमें से एक पत्र वह मुझे पढ़कर सुनाता है। पत्र नहीं है वह, असल में एक निहायत तल्ख़-सी चीज है कुछऋ जिसमें उसके अनुभवों की पूरी कड़वाहट उतर आई है। वह एक प्रणय-पत्र है, जो है तो कल्पित, किंतु लिखा गया है एक ऐसी औरत के नाम, जो कल्पित नहीं है। उस पत्र में जितना सोज़ है, उससे कहीं ज़्यादा कड़वाहट छिपी हैऋ जितनी मुहब्बत है, उससे कहीं अधिक नफ़रत। उसके आखिर में एक ऐसी पंक्ति आती है कि जिसका भाव यह है-‘‘मुझे घृणा हो गई है सारे नारीत्व से, संपूर्ण नारी-जाति से।’’ जिस समय पत्र के इस वाक्य को उसने पढ़ा उसके होठ घृणा से सिकुड़ गए। और तभी मैंने देखा कि अचानक उसकी आंख से आंसू का एक गरम क़तरा निकलकर उस पत्र पर जा गिरा और तभी उसने सहसा दोनों हाथों से अपना मुंह ढांप लिया।

यह है त्यागी का सही चित्र। इसके अतिरिक्त जो कुछ वह अपने को समझता है, या और लोग उसे समझते हैं, वह झूठ है या प्रचार है। वैसे ये दोनों शब्द पर्यायवाची हैं। जब वह यह कहता है कि मैं हर औरत से नफ़रत करता हूं, तब उसका अर्थ यह होता है कि वह किसी एक औरत बेइंतहा मुहब्बत करता है। जब वह दोस्ती के नाम पर नफ़रत से थूक रहा होता है, तभी वह किसी दोस्त के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी कुर्बान कर देने की योजना बना रहा होता है। सारे दिन हर आस्तिक मूल्य की पूरी वंश-परंपरा को कोस लेने के बाद भी शाम को उसका मस्तक किसी मंदिर की देहरी पर झुका होता है।

बात ज़रा अजीब-सी है, किंतु है बेहद साफ़। क्या कभी आपने किसी हद दरज़े के ग़मगीन आदमी की शक्ल ग़ौर से देखी है? यदि नहीं देखी तो त्यागी के चेहरे को देखिए। उसके चेहरे पर कुछ ऐसी आड़ी-तिरछी रेखाएं आपको दिखाई देंगी, जिनका प्रभाव आप पर सौम्य नहीं पड़ेगा। उसकी आंखों के गिर्द फैली रेखाएं आपको पसंद नहीं आएंगी। उसके होठों की नीली शिकनें आपको बदनुमा मालूम होंगी। लेकिन जब कभी परेशानी के वक़्त वह आहिस्ता से आपके कंधे पर हाथ रखकर कहेगा-‘‘मैं जानता हूं आपको क्या चाहिए? मेरे पास एक ही है, पर आपकी ज़रूरत मुझसे ज़्यादा है, इसलिए आप इसे ले लें।’’ तो उसके चेहरे की वह बदसूरती किसी जादुई प्रभाव से अचानक ग़ायब हो जाएगी और वह आपको संसार का सबसे सुंदर इंसान दिखाई देने लगेगा।

त्यागी की ज़िंदगी उसके जीवन में समाए हुए दर्द ने बिगाड़ दी है। ऐसी अवस्था में अगर वह सौंदर्य-चेताओं, नाज़ुक-मिज़ाजों को कहीं खटकती है, बदसूरत लगती है, तो वह दुरुस्त है, उचित है। मुझे उसके पक्ष में कुछ नहीं कहना है। मुझे तो आपसे उस अंधियारे के संबंध में कुछ बात कहनी हैं, जो हर सूरज का जनक है, पिता है। मुझे तो उस कीचड़ के संबंध में कुछ कहना है, जो कमल का सृष्टा है। यदि त्यागी का जीवन समतल और बेदाग़ होता तो मुझे संदेह है कि वह सौंदर्य को इतने निकट से प्यार कर पाता। मझधार में से होकर आने वाली लहर किनारे का हाथ ज़रा मज़बूती से थामती है। यह सही है कि पगडंडी पर चलने वालों के चेहरों पर ज़रा गर्द ज़्यादा जमती है, लेकिन वे राजपथ पर चलने वालों से पहले ही मंज़िल पर पहुंच जाते हैं।

पिछली पंक्तियों में मैंने यह ठीक ही लिखा है कि त्यागी बड़ा अक्खड़ है। जी हां, यदि वह अक्खड़ न होता तो अक्सर लोग, यहां तक कि उसके बहुत नज़दीकी दोस्त भी उससे असंतुष्ट क्यों रहते? मैं स्वयं भी उनमें  से हूं, जो त्यागी के इसी स्वभाव के कारण काफ़ी दिन तक उससे बेहद नाराज़ रहा था। एक समय था जबकि दिल्ली की गलियों में त्यागी के अक्खड़पन की बड़ी चर्चा रहती थी। शायद ही कोई ऐसा सौभाग्यशाली दिन बीतता होगा जिस दिन उसका कोई-न-कोई कारनामा सुनाई न दिया हो। ऐसे अवसर तो उसके जीवन में अनेक बार आए हैं, जब मित्र मंडली में बातें करते हुए उसका हाथ अपनी पैंट की जेब में न रहकर दूसरे के गरेबान पर पहुंच जाता था। मुझे यह अच्छी तरह याद है कि उसकी इन बेतुकी और ग़ैर-शायराना आदतों को देखकर एक दिन उर्दू के किसी शायर ने कहा था-‘‘त्यागी में मंटो जैसी ख़राबियां पाई जाती हैं।’ पर मैं यहां लिखने की आज़ादी चाहता हूं कि मंटो और त्यागी में एक बड़ा फ़र्क है। मंटों लोगों को अपनी और रुजू करने के लिए यह सब करता था, पर त्यागी ऐसा करता है अपने और उन लोगों के बीच खाई बनाने के लिए-जिन्हें वह पसंद नहीं करता। त्यागी ने जीवन में समझौता करना कभी पसंद नहीं किया। इसीलिए वह ज़िंदगी के हर मैदान में (कविता में छोड़कर) बे-तरह नाकामयाब रहा है। उसे केवल एक ही क्षेत्र में कामयाबी मिली है-बदनामी कमाने और लड़ाई मोल लेने में। और उसे अपनी इस नाकामयाबी, इस बदनामी पर बड़ा अभिमान है। उसका कहना है कि यह मैंने बड़ी मेहनत से कमाई है। गांव में पैदा होने के कारण शहरी ज़िंदगी की नफ़ासत को वह अपने में पूरी तरह उतार न सका, अपने को उसके अनुकूल ढाल न सका। आज भी वह बिना सोचे-समझे सादगी से ईमानदारी की बात कर जाता है। तो यह है रामावतार त्यागी का ऊपरी चित्र और चरित्र, जिसने ज़िंदगी में अनेक कठिनाइयों का भीषण हलाहल पीकर अपनी कविताओं के द्वारा मुहब्बत की शराब बड़ी उदारता से बांटी है।

त्यागी का जन्म 8 जुलाई 1925 को मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) की तहसील सम्भल के ‘कुरकावली’ नामक गांव में एक त्यागी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पुरानी वंश-परंपरा के अनुसार उसका परिवार अच्छा-खासा ज़मींदार घराना था, जो निरंतर मुकदमेबाज़ी में लगा रहने के कारण धीरे-धीरे मामूली किसान परिवार में बदल गया। घर की आर्थिक दशा अच्छी न होने के कारण वह सदा प्रभावों और संघर्षों से जूझता रहा। परिवार में चार भाई और एक बहन। उनमें सबसे बड़ा रामावतार। यद्यपि परिवार की अवस्था उन दिनों कुछ अच्छी नहीं थी, किंतु उसके रीति-रिवाज-व्यवहार सब-के-सब ज़मींदारों-जैसे ही थे। इसी कारण उसे छोटी जाति के बच्चों के साथ खेलने तक की मनाही थी। लेकिन घरेलू परंपराओं के प्रति मन में शुरू से ही विद्रोह होने के कारण वह खेलता था उन्हीं के साथ। परिणामस्वरूप खूब पिटाई होती थी। त्यागी का मन पढ़ने की ओर इसलिए घूमा कि उसे पढ़ने से रोका गया, वैसे शिक्षा के प्रति कोई विशेष मोह उसके मन में नहीं था। स्वांग, गाने, भजन, रामायण और आल्हा आदि में उसका मन शुरू से ही रमता था। लाख बार रोके-टोके जाने के बावजूद अपने परिवार के विरोधी परिवारों में वह नित्य आता-जाता था। त्यागी को अपनी दादी का प्यार और दुलार बहुत अधिक मिला। हर वक़्त होने वाली पिटाई से उसकी रक्षा वे ही करती थीं। स्थिति यह थी कि शत्रुओं के परिवार त्यागी को उसके अपने परिवार से अधिक प्यार करते थे। आख़िर रोज़-रोज़ की मारपीट और विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि परिवारों की शत्रुता मित्रता में बदल गई। वह अभी दस ही वर्ष का था, कि उसे पढ़ने के लिए शहर भेज दिया गया। स्कूल गांव से 5 मील दूरऋ और पैदल ही रोज़ वहां आना-जाना। कभी मौज आई तो रास्ते में ही बैठकर कहीं तुकें जोड़ने लग जाता था। इस तरह कविता किसी-न-किसी रूप में बचपन से ही उसके साथ थी।

इस दौरान सन् 1941 में, जब वह सातवीं कक्षा में ही था, उसका विवाह भी कर दिया गया। जिस परिवार में उसका विवाह हुआ, वह भी पढ़ने का घोर विरोधी था। पत्नी अपढ़ होने के साथ-साथ बदज़ुबान थी। जीवन में यदि थोड़ा-बहुत आगे बढ़ने का संबल किसी ने दिया तो वह थी उसकी मां। दादी के अतिरिक्त मां से ही उसे आंतरिक ममता मिली। परिवार में केवल दो ही व्यक्ति ऐसे थे, जिन पर घर के बड़ों की कोपदृष्टि रहती थी, एक उसकी मां और दूसरा वह स्वयं। मां की पीड़ा का त्यागी के मन पर बड़ा असर पड़ाऋ और यही एक बात थी जिसने उसे शिक्षा की प्रेरणा भी दी। उसने मन-ही-मन यह निश्चय कर लिया था कि मां को सुखी करने के लिए उसका पढ़ना ज़रूरी है।

सन् 1944 में सम्भल के किंग जार्ज यूनियन हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा देने के बाद उसने जब काॅलिज में पढ़ने की इच्छा प्रकट की तो घर-भर ने इंकार कर दिया। दूर-दूर से नाते-रिश्तेदारों को बुलाकर सिफ़ारिशें कराई गईं, किंतु सब बेकार। एक तो उन दिनों निरंतर मुकदमेबाज़ी में फंसे रहने के कारण घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी, दूसरे पिता उसे आगे पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन जन्म के विद्रोही को रोक भी कौन सकता था? दूर के रिश्ते के एक ताऊ से सौ रुपए उधार लिए और सिर पर सामान लादकर वह काॅलिज में दाख़िला लेने के लिए चंदौसी पहुंच गया। चंदौसी के श्यामसुंदर मैमोरियल काॅलिज के एक लोकप्रिय छात्र के रूप में उसने सन् 1948 में बी.ए. किया। इसी बीच पत्नी के परिवार वालों से उसका गहरा मन-मुटाव हो गया। वह इस सीमा तक पहुंचा कि उन्होंने उसका बहुत अपमान किया। बात यहां तक बढ़ी कि पत्नी नाता तोड़कर अपने मायके चली गई। यहीं से त्यागी के जीवन का मोड़ आता है। वह नौकरी करने की नीयत में दादी से कुछ रुपए ले कर चुपचाप बे-सरो-सामान दिल्ली के लिए चल दिया। पर रास्ते में ही उसकी तबियत बेईमान हो गई और मन-ही-मन पढ़ाई जारी रखने का निश्चय भी हो गया।

दिल्ली एक अजनबी जगह, और एक मामूली-सी संदूकची उसके पास। उसमें पांच रुपए और कुछ आने। कई दिन तक दिल्ली-जंक्शन के मुसाफ़िरख़ाने में ही आवारगी। दिल्ली में रहने वाले एक दूर के रिश्तेदार से उसने कभी श्री वियोगी हरि का नाम सुना था। उनसे मिलने का मन-ही-मन निश्चय करके वह उनका पता निकालता-निकालता वहां पहुंच गया। हरिजी ने उसकी दुःख-गाथा सुनी और ‘हरिजन उद्योगशाला’ में उसे ठहरने का स्थान मिल गया। शर्त थी कि हरिजन बच्चों को उसे कुछ समय पढ़ाना होगा। त्यागी का स्वप्न धीरे-धीरे साकार होने लगा था।

एक दिन वह समय निकालकर एम.ए. (हिंदी) की कक्षा में प्रवेश पाने की इच्छा से हिंदू काॅलिज में जा पहुंचा। उन दिनों वहां हिंदी-विभाग के अध्यक्ष डाॅक्टर सुरेंद्रनाथ शास्त्री थे। इस समय तक त्यागी की कुछ कविताएं स्थानीय ‘वीर अर्जुन’ में प्रकाशित हो चुकी थीं, अतः जब त्यागी ने श्री शास्त्री जी से उनके काॅलिज में प्रवेश पाने की इच्छा व्यक्त की और अपना नाम बताया तो उन्होंने नाम सुन कर उसे प्यार से अपने पास बिठाया। लेकिन त्यागी का सीधा सवाल था, ‘दाख़िले के भी पैसे पास नहीं हैं, और पढ़ने की हार्दिक इच्छा है, कहीं से कर्ज़ की व्यवस्था हो जाए तो भी काम पूरा हो सकता है।’

अब वह उस दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था, जहां फैशन का कोई ठिकाना नहीं। उसके पास पहनने और फैशन करने के लिए उन दिनों केवल एक हरी कमीज़़ और सफेद लट्ठे का एक पाजामा ही था। लेकिन थोड़े ही दिनों में अपनी कविता और अध्ययन में रुचि होने के कारण वह अपने साथियों और गुरुजनों की निगाह में जम गया।

सन् 1950 में उसकी भेंट ख्याति और श्री महावीर अधिकारी से एक साथ हुई। उन दिनों अधिकारी जी ‘नवभारत’ के रविवासरीय संस्करण का संपादन करते थे और ‘नवयुग’ पर सहायक संपादक के रूप में उनका नाम प्रकाशित होता था। अधिकारी जी ने त्यागी की साहित्यिक प्रतिभा को परखा और इस जगमगाते हीरे को हिंदी-साहित्य-जगत के सामने लाकर अपने जीवन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य का संपादन किया। ‘सिकंदर’ नामक खंडकाव्य के कुछ अंश भी उन दिनों ‘नवयुग’ में प्रकाशित हुए थे, जिन्हें पढ़कर हिंदी कविता के पारखियों को इस नए नक्षत्र के उदय का आभास हो गया था। धीरे-धीरे त्यागी की प्रतिभा तथा योग्यता से दिल्ली का साहित्यिक वातावरण महक उठा। यहीं से उसके विद्रोह और दर्दभरे गीतों की दास्तान शुरू होती है।

मैंने उसे किस प्रकार जाना, इसकी भी एक रोचक कहानी है। सन् 1950 का 16 अगस्त। सब्जी मंडी की रामरूप धर्मशाला में स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में कवि-सम्मेलन का आयोजन। सम्मेलन की अध्यक्षता मैं कर रहा हूं। कार्यवाही प्रारंभ करते हुए एक तरुण का नाम मैं सूची में से घोषित करता हूं। कवि है रामावतार त्यागी। देखता हूं कि औसत कद का सांवले रंग का एक तरुण काला चश्मा लगाए मंच की ओर आ रहा है। इससे पूर्व मैंने उसे नहीं सुना था। लेकिन उस दिन मैंने जो कुछ सुना, वह आज भी नहीं भूला हूं -

पुरातन व्यवस्था बदलता नया युग,

नया ख़ून लेकर चला आ रहा है।

नई नाव जर्जर पुराने पुलिन पर,

मिलन को उतरना नहीं चाहती है।

नई वायु सूखे हुए उपवनों में,

ठहरकर गुज़रना नहीं चाहती है।।

यह था विद्रोह और क्रांति का संदेश, जो उस दिन स्वतंत्रता के शुभागमन पर मुझे त्यागी से सुनने को मिला था। मैंने तभी जान लिया था कि त्यागी का कवि समाज के नव निर्माण के लिए अत्यंत आतुर और आकुल है। वह चाहता है समाज में विषमता का जो जाल फैला हुआ है, उसका शीघ्र ही अंत हो और देश का नव निर्माण करने के लिए तरुणों में त्याग और बलिदान की पावन गंगा प्रवाहित हो उठे।

त्यागी के काव्य में अपने पारिवारिक जनों से निरंतर मिलने वाली प्रताड़नाएं और लांछनाएं समय की हवा पाकर असंतोष और विद्रोह के रूप में बदल गई। धीरे-धीरे उसका वही असंतोष परिवार के प्रति न रहकर समाज की विषमताओं के प्रति हो गया और एक स्थिति ऐसी आई कि उसकी रचनाओं में समाज की समग्र व्यवस्था के प्रति असंतोष दिखाई देने लगा। उसे जीवन के प्रारंभ से ही किसी का प्यार और दुलार नहीं मिला था। शायद इसीलिए समाज के प्रत्येक प्राणी में उसे शोषक और हिंसक का रूप ही दिखाई देने लगा। यहां तक कि समाज की व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने के लिए उसका कवि व्यग्र हो उठा। उसने युग के इतिहास को बदलने के लिए देश के तरुणों को चुनौती दी और लिखा -

तुम समझोगे, मैं बाग़ी हूं, विद्रोही हूं,

तुम कहकर मुझको ‘पागल’ एक पुकारोगे।

तुम ‘महा नास्तिक’ कहकर ग़ाली भी दोगे,

हो सका अगर तो मुझ पर पत्थर मारोगे।

पर मैं तो बंधन तोड़ ज़माने-भर के ही,

इस एक बग़ावत को सुलगाने आया हूं।

मैं चमचम करते फाड़ समाजी परदे को,

अंदर सड़ती तसवीर दिखाने आया हूं।

तथा

सौगंध हिमालय की तुमको,

युग का इतिहास बदल दो!

ये भूखे कंगाल सिकुड़ते सड़कों पर रातों में,

दिया गया नूतन विधान का ध्वज जिनके हाथों में,

इससे तो पतझर अच्छा,

ऐसा मधुमास बदल दो!

सौगन्ध हिमालय की तुमको

युग का इतिहास बदल दो!

निरंतर अभावों और संघर्षों से जूझते रहने के कारण कवि त्यागी का यह विद्रोही रूप अपने छात्र-जीवन में ही पनप चुका था। सन् 1950 में दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. करने से पूर्व ही दिल्ली के साहित्यिक तथा सामाजिक जीवन में उसका अच्छा स्थान बन चुका था। कुछ समय बेकार रहने के बाद उसे यहां की ‘रामरूप विद्या मंदिर’ नामक शिक्षण संस्था में अध्यापन-कार्य मिल गया और उसके जीवन में कुछ स्थायित्व भी आ गया। इसी दौरान उसने परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को यहां तक निबाहा कि यह संघर्ष करते हुए भी अपने दो छोटे भाइयों को पढ़ाने में भरपूर मदद की। लेकिन स्वाभिमानी और लड़ाकू स्वभाव होने के कारण वह रामरूप विद्यामंदिर में अधिक दिन नहीं टिक सका और फिर उसके जीवन में एक नई आंधी आ गई।

यहीं से उसकी अनगिन असफल प्रेम-कथाओं का आरंभ होता है। पत्नी से सदा-सर्वदा के लिए रिश्ता टूट चुका था। ख्याति उसके चारों और घूमने लगी थी। फिर क्या था, रूप की तितलियां आती रहीं, और एक के बाद एक, कभी अनेक भी उसके जीवन को डसकर जाती रहीं। उसका जीवन पूरी तरह विषाक्त हो उठा। कभी मूचर््िछत, और कभी अर्ध-मूचर््िछत मैंने उन दिनों उसे देखा। जब-जब ग़ौर से देखा, दर्द के सिवा उसके पास कुछ भी नहीं दिखाई दिया।

अब उसकी कविता में विद्रोह की आग नहीं थी। केवल प्रेम और शृंगार के अनूठे गीतों की रचना ही इस बीच हुई। यह बात ज़रूर है कि उसकी ऐसी रचनाओं में भी सौंदर्य और प्रेम की विषमता के प्रति विद्रोह परिलक्षित होता है। इस दौर की उसकी रचनाओं की गंध दिल्ली की गली-गली में बिखरकर सारे हिंदुस्तान में फैल गई।

‘ज़िंदगी’ नामक कविता ने तो उन दिनों देश की तरुणाई के मानस में अचेतन रूप से सुप्त वियोग के ज्वार को बुरी तरह जागृत कर दिया था। त्यागी के साथ-साथ बे-शुमार कंठ गुनगुना उठे -

आंख दो टकरा गई हों, जब किसी के लोचनों से

हो गया हो मुग्ध जो भी रूप के कुछ कंपनों से,

मौन जीवन-वाटिका में प्यार के तरुवर तले,

मिल गए हों प्राण जिसको राह में गाते वनों से

उन मिलन के दो क्षणों का नाम केवल ज़िंदगी,

रात को इन तड़पनों का नाम केवल ज़िंदगी।


बंधनों से चाहता है मुक्त होना सब ज़माना

चाहता हूं मैं किसी के लोचनों में घर बसाना

बंध गया जो दो भुजों के बंधनों में एक पल भी

चाहता है मौन कारावास में जीवन बिताना।

प्यार के इन बंधनों का नाम केवल ज़िंदगी,

रात की इन तड़पनों का नाम केवल ज़िंदगी।


मुझको भी प्यार मिला दो दिन

कोमल भुज-हार मिला दो दिन

उन आंखों में रहने का भी

मुझको अधिकार मिला दो दिन

जिन आंखों की गहराई में, तुम डूब रहे, मैं उबर चुका,

पथ एक वही अंतर इतना, तुम गुज़र रहे, मैं गुज़र चुका।

विश्वास किया सौगंधों पर

मैंने उस दिन तुमसे बढ़कर

कल मुझे लिखा जो आज तुम्हें

मज़मून वही, तिथि का अंतर।

त्यागी ने अपने थोड़े-से जीवन में स्वप्न की भूमि पर कल्पना के अनेक महल बनाए और मिटाए हैं और उसने उनमें आकंठ डूबकर ‘सृजन’ और ‘पतन’ की गहराई को क़रीब से देखा है। इसकी घोषणा उसने ख़ुद यों की है -

मैं चला हूं जहां भी मरुस्थल वहीं, घोर संवेदनों को चला झूमता, 

जीवनाकाश में चंद दुर्दैव का, रात में और दिन में रहा घूमता। 

प्यार मुझको सुलाता रहा दर्द की लोरियां ज़िंदगी में सुनाकर सदा, 

दोपहर दुर्दिनों का निराशा लिए, पैर मेरे जलाकर रहा चूमता। 

परिच्छेद मैंने बहुत ज़िंदगी के लिखे, पर सभी की कथा एक-सी

दीप पहले जला औ शलभ बाद में राख दोनों हुए, थी ख़ता एक-सी 

दर्द की एक मदिरा दवाई किसी ने बताई इसीसे बहुत पी गया, 

पी गया हूं गरल, पी गया अश्रु भी, पी गया हूं सुधा,

पर व्यथा एक-सी।

ज़िंदगी से मरा, मौत से जी गया, आंधियों में पला, 

सांस से बुझ गया, मैं जनम को मरण को बहुत जानता हूं।

त्यागी सरल था, सहज था। इसलिए छला भी उसे जी भरकर गया। लालची निगाहें आती रहीं और उसके स्वप्न तोड़कर जाती रहीं। कलियों ने, फूलों ने, भंवरों ने, उपवन ने, यहां तक कि मालियों ने भी उसे नोचा। उसके जीवन में कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां कोई-न-कोई खरोंच न हो। अब वह टूटा हुआ, बिखरा हुआ इंसान था। एक नाकामयाब सपने की तरह मैंने उसे भटकते देखा है। लेकिन भटका सिर्फ़ उसका व्यक्ति ही, गीत उसका कभी नहीं भटका। उसने जहां भी थोड़ा-सा स्नेह मिलता देखा, उधर ही निकल गया। किंतु सब मृग-मरीचिका ही सिद्ध हुआ और उसने अपने अरमानों की होली जलानी शुरू कर दी - 

कल्पना के पुष्प चुन-चुन स्वप्न थे मैंने सजाए

भावना को साधना कह, गीत कितने गुनगुनाए

जो हुआ अपराध मुझसे, सब हृदय की भावना थी,

उन मधुर आकर्षणों में मैं रहा सुध-बुध भुलाए।


याद मत मुझको दिलाओ भूत की भूली कहानी,

आज मैं अरमान की होली जलाकर जा रहा हूं

गीत जो मैंने बनाए थे, मिटाकर आ रहा हूं।

सन् 1953-55 के बीच एक संगीन घटना उसके जीवन में घट चुकी थी, इस कविता को लिखने के बाद से उसके गीतों में पीड़ा का जो सागर लहराया उसकी कल्पना करके भी रोमांच हो आता है। ये वे दिन थे जब त्यागी अपनी वाणी और लेखनी दोनों के द्वारा असंतोष से भरी पीड़ा की उपासना में रत था। उन्हीं दिनों त्यागी ने लिखा था -

मेरी आंख कुछ नम ही रहने दो,

मुझको थोड़ा-सा ग़म ही सहने दो,

जीवन की आंखें पोंछ सके कोई-

ऐसा आंचल हो तो मुझको ला दो।

......

जो समुंदर की सतह पर, तैरती हो बाल खोले,

अब उसी बाग़ी लहर के हाथ का कंगन बनूंगा।

मैं रहूं प्यासा, यही काफी नहीं है,

होठ भी मेरे किरन से छील डालो।

फिर उदासी की गुफा में बंद कर दो

माफ़ कर दूंगा तुम्हें संसार वालो !

लाज को बे-बात जिसकी, दे गया ग़ाली स्वयंवर,

मैं उसी घायल दुल्हन की, बेज़ुबां तड़पन बनूंगा।

आज मैं सुख के लिए चिंतित नहीं हूं,

दर्द तो यह है कि दुःख घटने लगा है।

चल रहा था जिस उदासी के सहारे,

हाथ उसका हाथ से छुटने लगा है।

तोड़कर सारे नियम जो कल्पना को पूजती है,

मैं उसी चंचल जवानी का सरल बचपन बनूंगा।

.......

तुम कृपण ऐसे कि मेरे मांगने पर,

और क्या आशीष भी तो दे न पाए,

दर्द इतना दे दिया देने लगे यदि,-

उम्र-भर भी नींद जो मुझको न आए,

त्यागी ने अपने लिए जिस मार्ग का वरण किया, ज़ाहिर है कि वह साधारण मार्ग नहीं हैऋ बड़ा अनगढ़ और पथरीला मार्ग है वह। इसी कारण उसे अपने अभीष्ट की प्राप्ति में भारी संघर्ष करना पड़ा है। उसके जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप यही है कि उसे समझौता करना नहीं आता। किसी के सामने झुकना नहीं आता। यही कारण है कि उसका विरोध भी काफी हुआ है, और हो भी रहा है। इसकी सफ़ाई में त्यागी ने एक जगह पर लिखा है -

मेरे पीछे इसीलिए तो धोकर हाथ पड़ी है दुनिया,

मैंने किसी नुमाइशघर में सजने से इंकार कर दिया।

मन का घाव हरा रखने को

अनचाहे हंसना पड़ता है,

दीपक की ख़ातिर अंगारा,

अधरों में कसना पड़ता है।

आंखों को रोते रहने का ख़ुद मैंने अधिकार दिया है,

सच को मैंने सुख की ख़ातिर तजने से इंकार कर दिया।

.....

मेरा मोल लगाने का वे दम भरते हैं,

जिनका मन सौ-सौ हाथों नीलाम हुआ है

मैं उनकी ड्यौढ़ी का गायक हूं, याचक हूं

विष को छोड़ जिन्होंने अमृत नहीं छुआ है,

हिंदी में नई पीढ़ी के जितने भी कवि पिछले दस वर्षों में उभरे हैं उनमें त्यागी ही मात्र ऐसा कवि है, जिसने सरल शब्दावली में गहरी-से गहरी अनुभूति गीतों के माध्यम से प्रस्तुत की है। त्यागी के गीत उसके शब्दों के जादू और अर्थ-बोध दोनों ही दृष्टि से हिंदी-कविता में अपना विशिष्ट स्थान बना चुके हैं। त्यागी का मत है कि ‘भाव का उद्भव-मात्र ही गीत को जन्म देने के लिए पर्याप्त नहीं है, वरन् जो भाव मन में जीते-जीते जीवन का दुःख-सुख बन जाता है, वही गीत को जन्म देने में समर्थ होता है।’ गीत की परिभाषा में उसने ख़ुद यों लिखा है -

गीत क्या है, सिर्फ़ छंदों में सजाई,

आदमी की शब्दमय तसवीर ही तो,

ज्ञान है अज्ञान का उपनाम केवल,

अश्रु ममता की विकल तक़रीर ही तो।

.....

ये मन की गहराई से निकले हैं,

जीवन की अमराई से निकले हैं,

ये यौवन की रामायण-जैसे हैं,

ये स्वर की शहनाई से निकले हैंऋ

गीत की महिमा का वर्णन त्यागी ने अपनी कविताओं में अनेक स्थानों पर सूक्ति के रूप में किया है। दो उदाहरण इस प्रकार हैं-

डगमगाई नाव जब-जब भी किसी की

गीत ने हंसकर किनारा दे दिया,

उस दिए का मोल बोलो कौन देगा,

आंधियों के रोष को जिसने पिया?

लाख चांदी को पसारो,

किंतु तन के साहुकारों,

प्यार के निर्धन वचन बिकते नहीं है।

.....

गीत की डोर को ही पकड़कर बढ़ो,

फूल हो तो किसी देवता पर चढ़ो,

घंटियों की तरह तुम जहां बज उठो,

मैं वहीं प्रार्थना की तरह गा उठूं,

त्यागी ने इन गीतों के निर्माण में अपने जीवन का सर्वस्व तक होम दिया है। जीवन का सारा हास-उल्लास तक उसने अपने गीतों में समोकर मानव-जगत् के कल्याण के लिए रख दिया है। इन गीतों के निर्माण में उसे कितना त्याग करना पड़ा है, इसका अनुमान आप उसकी इन पंक्तियों से लगा सकते हैं। उसका कहना है -

जितने गीत रचे हैं मैंने,

इस लंबी बीमार उमर में,

उन सबको बेचूं तो शायद

आधा कफ़न मुझे मिल जाए।

मैं न जनम लेता तो शायद

रह जाती विपदाएं क्वांरी

मुझको याद नहीं है मैंने

सोकर कोई रात गुज़ारी

मुझको अपनी निष्ठाओं का

कुछ तो फल मिलना है आख़िर

मेरे बाद बहुत संभव है

सारी धरन मुझे मिल जाए।

त्यागी के जीवन में जितनी पीड़ा, वेदना और कसक है, यदि उतनी पीड़ा किसी और व्यक्ति ने जीवन में सही होती तो कदाचित् वह पागल हो जाता। उसने अपनी पीड़ा को अपने इन गीतों में उड़ेलकर वास्तव में एक प्रशंसनीय कार्य किया है। कदाचित् उसका कोई भी ऐसा गीत नहीं, जिसको पढ़कर या सुनकर हिंदी का कोई भी सहृदय पाठक या प्रेमी झूम न उठे, छलछला न उठे। आज हिंदी के कवि-सम्मेलन जो इतने लोकप्रिय हो रहे हैं, उनकी लोकप्रियता में यदि किसी कवि ने साहित्यिकता को उल्लेखनीय रूप में जोड़ा है, तो वह रामावतार त्यागी है। उसकी रचनाओं और उसके गीतों की सफलता का एक कारण यह भी है कि वह उनके द्वारा हिंदी में नई भाषा, नए मुहावरे, नई उपमाएं और नए छंद लाया है। हिंदी के मूर्धंय कवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने उसके कवित्व की प्रशंसा करते हुए उसकी नई काव्य-कृति ‘आठवां स्वर’ की भूमिका में लिखा है- ‘‘त्यागी के गीत मुझे बहुत पसंद आते हैं। उसके रोने, उसके हंसने, उसके बिदकने और चिढ़ने, यहां तक कि उसके गर्व में भी एक अदा है, जो मन को मोह लेती है।’’  इसी प्रकार डाॅ. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ ने त्यागी के संबंध में कहा है-‘‘त्यागी प्रणय की विभिन्न परिस्थितियों का जिस मार्मिकता से चित्रण करते हैं वह अद्वितीय है। सहज भाषा लिखने में वह हिंदी के आधुनिक गीतकारों में सबसे आगे हैं। अछूती उपमाएं, ताज़ी सूक्तियां और मौलिक प्रयोग त्यागी जी की कविता के ऐसे गुण हैं, जो गीतकारों के लिए ही नहीं, प्रयोगवादियों के लिए भी आदर्श हो सकते हैं।’’

ये दो उदाहरण तो हिंदी की दो पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन उसके पाठकों का उसकी रचनाओं के संबंध में जो अभिमत है। वह अधिक वास्तविक है। एक पाठक ने उसको अपने एक पत्र में महोबा से लिखा है-‘‘आपके गीतों में कुछ इतनी पीड़ा और कसक मिलती है कि अकेला मैं ही नहीं, मेरे-जैसे कितने अनेक पाठक उसमें अलग-अलग अपनी-अपनी तस्वीर देखते हैं।’’

त्यागी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यह है कि उसने संसार के पीड़िता, तिरस्कृत और लांछित वर्ग की पीड़ा को अपनी ही पीड़ा समझ कर उस भाषा में चित्रित किया है, जो जन साधारण की है, और जिसे स्वाभाविक बनाने में उसके छंदों ने पर्याप्त सहायता दी है। कभी-कभी त्यागी ने अपने इन गीतों में प्राणों की वह संजीवनी पाठकों को प्रदान की है कि बहुत से लोगों ने उनसे पर्याप्त प्रेरणा ग्रहण की है। किसी कवि की कविता पढ़कर कोई व्यक्ति अगर आत्म-हत्या करने का अपना इरादा बदल दे तो इसे आप क्या कहेंगे? रामपुर के एक ऐसे ही व्यक्ति ने त्यागी को पत्र लिखा, जो जीवन से निराश होकर आत्म-हत्या करने तक का निश्चय कर चुका था। उसने अपना निश्चय त्यागी की कविता पढ़कर बदल डाला और अपने पत्र में लिखा-‘‘मैंने आपकी रचना पढ़कर ही अपना विचार बदला। उसने मुझे जीने की प्रेरणा दी। धन्यवाद।’’

त्यागी जीवन में सौंदर्य और अनुभूति का चित्रण करने वाला कवि है। उसके गीतों में जहां संध्या के डूबते हुए सूर्य की सुनहली छाया है वहां उसने संसार की वेदना को अपने गीतों के गंगा-जल के समान पवित्र आंसुओं से पखारा है! धूल और आंसुओं से लिपटे त्यागी के गीत हृदय की उष्णता में तपकर बाहर निकले हैं, और ये कंचन के समान खरे लगते हैं। नपे-तुले शब्दों में लिखे गए त्यागी के गीत स्नेह-शिखर से झरते हुए झरने के समान मानव-मन की अतल गहराइयों में बैठकर उसे इस प्रकार आप्लावित कर देते हैं कि ऐसा लगने लगता है, जैसे जीवन के सफेद-सफेद फूलों पर गीतों की रंग-बिरंगी तितलियां छोटे-छोटे पंख पसारकर उड़ रही हों। उसके गीतों की सादगी ने त्यागी को अपने पाठकों के मन में जो स्थान दिलाया है, वह आज की पीढ़ी के कवियों के लिए ईष्र्या की वस्तु है। उसके गीतों में बातचीत का ऐसा लहज़ा होता है कि वह साधारण पाठक के मन को अपील कर जाता है, छू जाता है। कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं -

मंदिर में सौगंध दिला लो

मुझसे गंगा-जल उठवा लो

.....

मैं चला आया निमंत्रण पर तुम्हारे

द्वार तक भी क्या न पहुंचाने चलोगे?

.....

मेरे पीछे धोकर हाथ पड़ी है दुनिया

.....

एक कोई है कि जिसका ध्यान करके

गांठ आंचल में लगाकर जोड़ लेते।

.....

मृत्यु की भाषा कठिन होती बहुत ही

ज़िंदगी उसका सरलतम व्याकरण है।

.....

त्यागी ने गीतों के क्षेत्र में जो सफलता प्राप्त की है, वह उसकी पीढ़ी के बहुत कम कवियों को मिली है। इतनी छोटी सी उम्र में उसने जहां हिंदी के साधारण-से-साधारण पाठक का प्यार और दुलार प्राप्त किया, वहां प्राचीन पीढ़ी के लिए भी वह एक कौतूहल का सृष्टा रहा। यह त्यागी की सफलता नहीं तो क्या है कि दिल्ली की एक गोष्ठी में हिंदी के शीर्षस्थ कवि डाॅ. हरिवंशराय बच्चन ने यह कहा था-‘‘रामावतार त्यागी आज की पीढ़ी के कवियों में भारत-भर में अकेला है। वह गीतों का बादशाह है।’ किसी ने उसे मजाज़ बताया, और किसी ने जिगरऋ लेकिन वह सिर्फ़ त्यागी है ! जो बिलकुल मौलिक है, बिल्कुल ताज़ा है।

त्यागी ने अपनी पीड़ा, वेदना और व्याकुलता को जहां अपने काव्य का माध्यम बनाया है, वहां उसने अपने गीतों में ऐसी अनेक विचार सूक्तियां भी लिखी हैं, जो हिंदी के प्रत्येक वर्ग के पाठक के लिए पठनीय ही नहीं, मननीय भी हैं। कुछ उदाहरण लीजिए -

कालियों को बेदाग़ ताज़गी,

पूजा के कुछ काम न आई,

बासी फूल चढ़े मंदिर में,

अनुभव की दी गई दुहाई,

.....

पाप बचपन ने न जाने क्या किया है,

शाप यौवन का किसी ने दे दिया है,

इसलिए बेचैन से मिलते सभी है,

अनमने-से राह पर चलते सभी हैं।

.....

माना मिट्टी का एफ खिलौना हूं

लेकिन कुछ का मन तो बहलाया है

आख़िर इतना बेकार नहीं हूं मैं,

जो कोई जग के काम न आया है।

.....

सुधि का दीप जला लेने से

दुःख आपस में बंट जाता है।

रोशनदान खुले रखने से

कुछ सूनापन घट जाता है।

.....

मेरे जीवन के सूने आंगन में

जिसने दुःख का मेहमान बसाया है

वह मेरे लिए न ईश्वर से कम है

जिसने मेरा सुनसान घटाया है।

.....

समय का महाजन बड़ा ही कृपण है

निवेदन किया, किंतु देता न ऋण है।

त्यागी ने कविता के क्षेत्र में तो यश प्राप्त किया ही, सांसारिक क्षेत्र में भी उसने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।

सन् 1955 में उसके जीवन में एक संगीन घटना घट गई। यों इस बदनाम कहानी का प्रारंभ सन् 1954 में ही हो चुका था। उसके स्नेहसिक्त और विषादमय जीवन में अचानक एक सुबह ऐसी किरण उतरी कि जिसने उसकी अंधेरी दुनिया को जगमगा दिया। ग़रज़ कि जब त्यागी मायूस होकर दिल्ली की अंधेरी और तंग गलियों में रोशनी की खोज में भटक रहा था, तभी उसके झुलसते मस्तक पर एक कोमल हथेली ने शीतलता बिखेर दी। यह हथेली किसकी थी, इसकी चर्चा मैं जानबूझकर नहीं करूंगा। अक्सर मैंने, औरों ने, और शायद सभी ने त्यागी को उन दिनों अकेला कभी नहीं देखा था। जब देखा, तभी उस परिचित और सौम्य चेहरे के साथ। असली नाम जाने उसका क्या था, लेकिन त्यागी की ‘चरित्रहीन के पत्र’ नामक पुस्तक के मुताबिक़ उसका कल्पित नाम ‘सोमी’ है। त्यागी की ज़िंदगी का शायद सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि उसकी छोटी-से-छोटी ख़ुशी से लगा हुआ कोई इतना बड़ा ग़म उसके साथ ज़रूर आया है कि मुसकुराने के लिए उसे एक पल भी नहीं मिला। जिस दिन यह रूप-किरण त्यागी के आंगन में उतरी उसी शाम ‘रामरूप विद्या मंदिर’ से उसकी नौकरी छूट गई। फिर भी उन दिनों वह ख़ुश नज़र आता था। हालांकि मैं अचरज से उसके तंग हाल को देखता था और सोचता था कि न जाने कैसा यह आदमी है जिसे रोटी से ज़्यादा भूख प्यार की है। त्यागी की ज़िंदगी को वह रंगीन (या जैसी भी हो) कहानी चली, और चलती गई। इसके बारे में त्यागी ने अपनी पुस्तक ‘चरित्रहीन के पत्र’ में ख़ुद लिखा है- ‘दिवाली आई और चांद के तारे-जैसा एक चांदी का चिराग़ लेकर तुम मेरे घर आई थीं, क्योंकि तुम्हें मालूम था कि तुम न आईं तो मेरे घर रोशनी को जन्म नहीं मिलेगा।’’

‘‘उन दिनों तुम्हें मेरे स्वप्न आते थे, नींद में अक्सर तुम मेरी आहटों से चैंक उठती थीं। ढेर-सा दर्द न जाने कहां से तुम्हारे मन में समा गया था। और एक भी दिन ऐसा नहीं होता था जब तुम अपने आंसुओं से मेरी छाती को पानी-पानी न कर देती हो।’’

‘‘मुझे याद है, रात को जब मैं तुम्हारे घर से विदा होता था तो द्वार तक तुम मुझे प्रकाश दिखाने आती थीं। कई बार तुम कह चुकी थीं कि जब मैं तुम्हें विदा करके लौटती हूं तो लौटकर तब तक उस मोमबत्ती को नहीं बुझाती जब तक मुझे यह यक़ीन न हो जाए कि तुमने अपने कमरे की रोशनी जला ली होगी। कभी-कभी तो मैं तुम्हारे जाने के बाद इतनी ज़ोर से सिसक उठती हूं कि कई दिन तक मां के सवालों के जवाब सोच-सोचकर देने होते हैं।’’

आख़िर दो वर्ष तक बेकार रहने के बाद उसे ‘समाज’ के संपादन का काम मिल गया। रोटी घर आई, तो प्यार जा चुका था। क्यों चला गया, कुछ मालूम नहीं। शायद इसीलिए कि हमेशा ख़ुशी के साथ ग़म उसकी ज़िंदगी में आता ही रहा है। अब त्यागी वह त्यागी नहीं था, बल्कि लगता था कि दर्द आदमी की देह धारण किए भटक रहा है। बदनाम गलियों में, शराबख़ानों में, खंडहरों में, बियाबान जगहों पर, जब भी देखो, उदासी में डूबा, चुपचाप पागलों की तरह वह घूमता रहता था। परिणाम-स्वरूप लंबी बीमारी ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी मनःस्थिति उसके इन वाक्यों में अंकित है- ‘‘रात का यह वक़्त, शायद काफी बजे होंगे, मैं लेटा हूं, गुर्दे में फिर हल्का-हल्का दर्द हो रहा है। डाॅक्टर तक जाने की हिम्मत नहीं, दर्द को सहने का बल नहीं। चारों तरफ़ मौत मंडरा रही है, लेकिन पास नहीं आती। इस सुनसान में मुझे एक ही स्वर सुनाई देता है। एक झनझनाहट जो बार-बार मुझसे कहती है कि जब तुम्हारा स्वर मेरी तरह गूंजने लगे तब तुम इस बेक़रारी से मुक्त हो जाओगे।’’ ये वे दिन थे, जब त्यागी ‘समाज’ का संपादन करता था। लेकिन बड़ी लाचारी, मायूसी के दिन थे। किसी भी काम में उसका मन नहीं लगता था। आख़िर महावीर अधिकारी ‘समाज’ को छुड़ाकर उसे अपने साथ ‘समाज कल्याण’ में ले गए। जगह बदल जाने पर भी दर्द नहीं बदला। स्वभाव इतना अधिक चिड़चिड़ा हो गया था कि त्यागी एक दिन ख़ुद अधिकारी जी से भी झगड़ बैठा और नौकरी छोड़कर फिर बेकारी-बेरोज़गारी के आलम में आ पहुंचा।

यहां यह उलल्ेखनीय है कि ‘समाज’ में 6 महीने तथा ‘समाज कल्याण’ में लगभग 1 वर्ष कार्य करने के अतिरिक्त त्यागी ने कुछ दिन ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में भी काम किया है। उसकी इस आदत से कि वह कहीं भी जमकर काम नहीं करता, उसके सभी हितैषी नाराज़ हैं। लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि अब उसके जीवन में कुछ स्थायित्व आ गया है। पिछले लगभग सवा साल से, जब से वह ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादकीय विभाग में कार्य करने लगा है उसमें कुछ दुनियादारी आ गई है, उसे नौकरी करनी आ गई है। कदाचित् इसका कारण उसकी दूसरी शादी है, जो उसने पिछले वर्ष (1960) 26 जनवरी को नागपुर के एक पंजाबी परिवार की एक महिला सुश्री सुयश एम.ए.बी.टी. से की है। अब तो पहली पत्नी से प्राप्त उसकी एक-मात्र 11 वर्षीया कन्या राजबाला भी त्यागी के पास ही दिल्ली में रहकर पढ़ रही है और त्यागी अपने परिवार के लोगों के निर्वाह के लिए भी तीस रुपए मासिक बराबर भेजता जा रहा है। सन् 1955 से 1958 तक की त्यागी की जो भी रचनाएं हैं, वे ऐसी हैं कि जिनके आधार पर उसे ‘पीड़ा का गायक’ कहा जा सकता है। शायद पीड़ा की इतनी सजीव अभिव्यक्ति भक्तिकालीन कुछ कवियों को छोड़कर हिंदी के किसी कवि की रचनाओं में नहीं मिलती। उसकी इसी दौर की चुनी हुई रचनाओं का संकलन ‘आठवां स्वर’ है, जिसमें त्यागी के कवि की अमरता निवास करती है। त्यागी का पहला काव्य-संग्रह ‘नया ख़ून’ 1953 में प्रकाशित हुआ था। उसमें उसकी असंतोष, विद्रोह और क्रांति से परिपूर्ण वे रचनाएं संकलित हैं, जिसके कारण त्यागी ने कविता की विशाल अट्टालिका में अपने लिए उल्लेखनीय स्थान बनाया है। त्यागी ने एक उपन्यास भी लिखा है, जिसका नाम ‘समाधान’ है। इसके अतिरिक्त ‘मैं दिल्ली हूं’ नामक एक छोटा-सा बालोपयोगी काव्य भी उसने लिखा है, जिस पर भारत सरकार के शिक्षा-सचिवालय ने इस वर्ष पुरस्कार भी प्रदान किया है। त्यागी के ‘आठवां स्वर’ को पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने भी पुरस्कृत किया था। ‘राजधानी के कवि’ के अतिरिक्त त्यागी की साहित्यिक प्रतिभा और उसकी सूझ-बूझ का परिचय ‘प्रगीति’ नामक उस त्रैमासिक पत्र के पहले अंक को देखने से मिलता है, जो उसने श्री बालस्वरूप ‘राही’ के सहयोग से संपादित किया था, और जो केवल अपने जन्म की घोषणा करके साधनों के अभाव में असमय ही मौत की नींद सो गया।

त्यागी अब कवि होने के साथ-साथ एक अच्छे गृहस्थ-जैसा जीवन जी रहा है, यह कम आश्चर्य की बात नहीं। कारण कि जिसने पुराने त्यागी को देखा है उसे यह स्वप्न में भी गुमान नहीं हो सकता कि त्यागी इतना बदल चुका है। किंतु इसका आशय यह कदापि नहीं कि कविता से उसका दामन छूट गया है। बात असल यह है कि अब तो उसने जमकर लिखना शुरू किया है। उसके जीवन में जो अतृप्ति, असंतोष, विद्रोह और वितृष्णा थी, वह सब दूर होकर अब उसकी प्रतिभा हिंदी-गीत-काव्य को नई शब्दावली, नई अभिव्यक्ति, सूक्तियां, भाव-भूमि और छंद-विधान देने लगी है। हिंदी-कविता में विदेशी संस्कृति को लाने को उत्सुक प्रयोगवादी कवि-आलोचकों ने जब हिंदी-गीति-काव्य पर पुनरावृत्ति, पुरानेपन और अक्षमता-जैसे आरोप लगाए तो जिनके हाथों में हिंदी के गीत-काव्य की पताका थी वे अलमबरदार भी बहक गए। तब हर नए विचार और भाव को नई शब्दावली से परिपूर्ण सरस अभिव्यक्ति देने की गीत की क्षमता को जिन कवियों ने घोषित किया उनमें त्यागी का नाम पहली पंक्ति में आता है। आज की पीढ़ी में हिंदी में ऐसे कवि कम ही होंगे, जिन्होंने इतनी अधिक संख्या में इतनी श्रेष्ठ रचनाएं हिंदी को दी हों, जितनी कि त्यागी ने। किसी भी कवि के व्यक्तित्व एवं कृकृतित्व को आंकने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि उसके संबंध में उससे बड़े, उसके समकालीन और उसके पाठक क्या विचार रखते हैं। पिछली पंक्तियों में हम त्यागी के संबंध में हिंदी के कुछ मूर्धंय साहित्यकारों के अभिमत दे चुके हैं। अब आप देखें कि त्यागी के बिल्कुल समकालीन कवि और उसके अनन्य स्नेही श्री बालस्वरूप ‘‘राही’’ उसकी ‘आदतों को छोड़िए भी आदमी वैसे गुणी हूं’ नामक पंक्ति को ही त्यागी का परिचय मानकर उसके संबंध में क्या लिखते हैं- ‘उसका जीवन उत्तरदायित्वहीनता, घुटन, संघर्ष ओर फ़ाक़ामस्ती की एक अनंत शृंखला, उसका व्यक्तित्व परस्पर-विरोधी असंगतियों का एक विलक्षण संगठन। प्यार करे तो ज़िंदगी निसार कर दे, नाराज़ हो जाए तो औपचारिकता भी नहीं बरत सकता। विद्रोह और मोह, अहं और समर्पण का ऐसा अद्भुत संयोग मैंने कहीं नहीं देखा। अविनम्रता की सीमा को छूता हुआ स्वाभिमान, असहिष्णुता तक पहुंचने वाली संवेदनशीलता, तुनुकमिज़ाजी, ये उसके व्यक्तित्व के दो ख़ास पहलू हैं। सोचता हूं, इतने निर्मम व्यक्ति ने इतनी सहृदयता कहां से पाई। पर यह भी सच है कि निर्झर चट्टान का वक्ष तोड़कर ही प्रवहमान होते हैं।’’

त्यागी के एक पाठक के पत्र का उल्लेख करके मैं इस वक्तव्य को समाप्त करूंगा। यह त्यागी की लोकप्रियता नहीं तो और क्या है कि उसकी रचनाओं को पढ़ने के लिए आतुर एक पाठक ने उसको अपने 10 दिसंबर, 1960 के पत्र में लिखा - ‘‘दो रुपए के डाक-टिकट पत्र के साथ भेज रहा हूं, ‘आठवां स्वर’ के लिए। संभव हो तो भिजवा दीजियेगा। शेष क़ीमत अगले मास भेज दूंगा। चाहूंगा कि साथ में अपनी एक अन्य पुस्तक भी रखवा दें। विश्वास करें सुविधानुसार क़ीमत भेज दूंगा।’’

यह साधारण पत्र नहीं है। त्यागी ने अपने पाठकों का एक वर्ग बना छोड़ा है, जो उसके पीछे भी उसकी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक होगा। उक्त पाठक ने अपने इसी पत्र में त्यागी की प्रशस्ति में कुछ ‘रूबाइयां’ भी लिखी थीं। उनमें से एक यों है -

‘‘छलकता हुआ इक जाम है त्यागी

दिल की दुनिया में सरनाम है त्यागी

वास्तविक नाम तो कुछ और है शायद,

यह तो उसका उपनाम है त्यागी।’’


रामावतार त्यागी: एक अतुलनीय कवि

बालस्वरूप राही 


ज़्यादातर लोग होते हैं महज़ होने के लिए। बहुत कम लोग होते हैं जिनका होना महसूस किया जाता है। रामावतार त्यागी उन्हीं चंद लोगों में से हैं जो जहां मौजूद होते हैं वहां पूरी तरह मौजूद होते हैं। उपस्थिति की ख़ास अदा मेरे विचार से त्यागी जी की एक प्रमुख पहचान है। यह हो ही नहीं सकता कि वे किसी सभा, समारोह में जाएं और वहां कोई संस्मरण न छोड़ आएं। हां, वह संस्मरण कैसा भी हो सकता है। वह उन्हें प्रशंसा का पात्र भी बनवा सकता है और ऐतराज़ का भी। वे अपने दोस्तों और आलोचकों पर समान रूप से मेहरबान रहते हैं। वे दोनों ही के लिए समान रूप से चर्चा की सामग्री मुहैया करते रहते हैं। उनके संपर्क में आने वाले किसी व्यक्ति को शायद ही कभी यह शिक़ायत भी रही हो कि उनके बारे में कहने के लिए उसके पास कुछ नहीं है। त्यागी जी में बहुत कुछ ऐसा है जो परिष्कृत होने से, सांचे में ढल कर सुगढ़ बनने से इंकार करता रहा है। हालात ने उन्हें हमवार करने की बड़ी कोशिशें कीं लेकिन उनका बांका तेवर आज तक बरक़रार है। उनकी उपस्थिति उनकी कविता में भी बड़ी तेज़ी के साथ अनुभव की जा सकती है। यों, यह बात आज के फैशन के ख़िलाफ़ है।

लोग कितनी जल्दी मंझ जाते हैं, घिस जाते हैं, गंभीर और परिपक्व हो जाते हैं। आदर्शों के मुखौटे पहन लेते हैं, उपदेश का धंधा अपना लेते हैं। लोग कितनी जल्दी बुढ़ाने लगते हैं, खासतौर पर हमारे देश में। यह बुजर्गीं, जिसे पढ़े-लिखे लोग परिपक्वता या बौद्धिकता भी कहते हैं, त्यागी जी पर कभी हावी नहीं हो पाई। इसलिए कोई पीढ़ी उनके लिए उनके बाद की पीढ़ी नहीं है, कोई व्यक्ति उनके लिए जूनियर नहीं है। कोई भी नया काम वह आज भी बड़े उत्साह और विश्वास के साथ आरंभ कर सकते हैं, बिना इस सोच में पड़े कि अब इसके लिए बहुत देर हो चुकी है।

कविता के क्षेत्र में जब मैंने तुतलाना शुरू किया था तब वह पत्र-पत्रिकाओं पर छाए हुए थे, कवि-सम्मेलनों में ‘सेन्सेशन’ बने हुए थे। आज जब उनकी पीढ़ी के बहुत-से कवि बुजुर्गी का लबादा ओढ़ चुके हैं, ‘आइवरी टावर’ पर चढ़ कर बैठ चुके हैं और प्रतिष्ठित, पुरस्कृत साहित्यकारों की सूचियों में अपना नाम ऐनक लगा-लगा कर ढूंढने की कोशिश में जुटे रहते हैं, तब भी त्यागी जी पहले की तरह ही एक ‘सेन्सेशन’ बने हुए हैं। ज़िंदगी आज भी जैसे उन से यह कह रही हो कि इंतजार करो, मैं तुम में अभी शुरू होने ही वाली हूं। क्या यही वजह नहीं है कि उनकी कविता आज भी पहले की ही तरह नौजवान है और कल लिखना शुरू करने वाला लड़का भी अपनी कविता के पास ही उनकी कविता की उपस्थिति अनुभव करता है। कुछ वैसे ही, जैसे मैंने अपने विद्यार्थी-जीवन में अनुभव की थी। 

त्यागी जी मुझसे बड़े हैं और मेरा संस्कार मुझे अनुमति नहीं देता कि मैं अपने से बड़े को जी का प्रयोग किए बिना संबोधित करूं। किंतु त्यागी जी ने जो आत्मीयता मुझे दी उसने मुझे निरस्त्र कर दिया। यहां भी मैं जी का प्रयोग केवल तकल्लुफ़ में कर रहा हूं और आश्वस्त हूं कि त्यागी जी की यहां चल नहीं सकती। कहीं और मैंने उनके नाम के साथ जी का प्रयोग किया होता, तो वह अबे-तबे पर उतर आते।

काग़ज़ बहुत महंगा हो गया है और वक़्त बहुत क़ीमती। इसलिए कम-से-कम शब्दों में अपनी बात कहने की लाचारी सामने हो और मुझ से यह प्रश्न कर दिया जाए कि उनकी कविता में आपको सबसे ख़ास क्या लगता है? तो मेरा उत्तर यही होगा कि उनकी कविता में आम है ही क्या? अच्छे-से-अच्छे कवि की तुलना किसी पूर्ववर्ती अथवा सहवर्ती कवि से की जा सकती है और समानता के सूत्र खोजे जा सकते हैं। मगर जरा कोशिश करके देखिए और किसी की कविता में वह बात ढूंढ निकालिए जो त्यागी की कविताओं में है। असफलता निश्चित है। त्यागी जी किसी भी पूर्ववर्ती या सहवर्ती कवि-जैसे नहीं हैं। वे समकालीन हिंदी कविता के सर्वाधिक अतुलनीय कवि हैं। यही कारण है कि इस दौर में भी जबकि कविता भुलाई जा रही है, उनकी काव्य-पंक्तियां हर पीढ़ी के व्यक्ति को सबसे ज़्यादा याद होंगी।

उनकी वर्षगांठ पर केवल यह कह कर मुझे संतोष नहीं हो सकता कि वह चिरजीवी हों, मेरी शुभकामना तो यह भी है कि उनकी तरुणाई चिरजीवी हो।

चिरंतन प्रश्न: सामयिक उत्तर

 रामावतार त्यागी



अपने उन अनेेक काव्य-पे्रमियों के आग्रह पर जिन्होंने बार-बार मेरी रचनाओं को संकलित रूप में पढ़ने की इच्छा व्यक्त की है, अपनी कुछ कविताएं आपको भेंट कर रहा हूं-यों मेरी आपकी जान-पहचान तो पुरानी है। जानता हूूं अपने बारे में कुछ कहना शिष्टाचार की बात नहीं है, किंतु पूछे जाने पर मौन रहना भी कम असभ्यता की बात नहीं होती। मुझे मालूम है कि आप मेरा वक्तव्य सुनने की बजाए अपने प्रश्नों के उत्तर सुनना अधिक पसंद करेंगे। हां, काव्य-प्रेेमियों के भी कुछ प्रश्न होते हैं। मैंने उन्हें अपने ढंग से समझने का यत्न किया है, क्योंकि एक कवि को काव्य-पारखी का हर प्रश्न समझना भी चाहिए। इस सिलसिले में कुछ नया न लिखकर एक प्रश्नकर्ता के प्रश्न और उसको दिए गए अपने उत्तरों को उद्धृत कर देने से मेरा कार्य अधिक सरल हो जाता है। तो लीजिए मैं हाज़िर हूं।

इंटरव्यू:

नोट - (केवल बौैद्धिक वयस्कों और जोे कविताएं न पढ़ना चाहें उनके लिएद्ध

पिछले कुुछ दिनों से कविता-क्षेत्र में इतना अधिक कोलाहल क्यों है?

कवि अधिक हैं, पुराने भी नए भी, वादी भी विवादी भी। अच्छे कितनेे हैं, मालूम नहीं लेकिन महाकवि अधिक हैं। अधिक कहना ख़तरे से ख़ाली नहीं है, क्योंकि अभी हिंदी मेें बोलनेे की स्वतंत्रता भी पूूरी नहीं मिली है, सच बोलनेे की कौन कहे। किंतु मैं कोलाहल से अधिक दुःखी नहीं हूं क्योंकि मुझेे मालूम है कि हिंदी कविता का इतिहास शीघ्र ही नए सिरे से लिखा जाएगा और उसमें आधुनिक-कविता का परिच्छेद लिखने के लिए उन आलोचकों को हरगिज़़ निमंत्रित नहीं किया जाएगा जो निराला, बच्चन और दिनकर को आधुनिक हिंदी कविता के सबसे बड़ेे कवि कहते-कहते किसी आलोचक-सम्राट के पूर्वाग्रह को पढ़कर बिदक जाते हैं या घबरा कर अपने आपको ही युग-कवि घोषित कर बैठते हैं।

आधुनिक हिंदी कविता और आलोचकों की स्थिति?

आधुनिक हिंदी कविता बड़ी विवादास्पद स्थितियों से गुज़र रही है। ठीक उन्हीं परिस्थितियों से, जिनमें होकर सन् 47 से पूर्व हमारे देश को गुज़रना पड़ा है। तब हमारे आचरण को सत्-असत् इंगलैंड के लोग घोषित करते थे। आज हिंदी कविता के गुण-दोष के संबंध में निर्णय देने का अधिकार उनके पास है जिन्हें बीसवीं शताब्दी केे योरोपीय कवियोें और आलोचकों के नामों की सूची कंठस्थ हो। अलग-अलग देशों की कविता अलग-अलग शैलियों में लिखी गई है और उसके निर्माण में वहां की संस्कृति, परंपराओं, सीमाओं, तथा जन-रुचि का योग रहा है। हमारी भाषा में कुछ प्रबुद्ध कवियों की पैदावार इधर बढ़ी है। और उनका आग्रह है कि समस्त देशों की समस्त शैलियों में कविता लिखकर ही हिंदी की नाक ऊंची हो सकेगी। इसलिए भारतीय नारी की तरह हिंदी कविता के लिए भी सभी देशों की पोशाकें तैयार की जा रही हैं। आलोचक इसे नई अभिरुचि मानता है। मेरे विचार से इसमें चिढ़ने की गुंजाइश अधिक नहीं है क्योंकि पोशाक की काट-छांट पर शरीर और उसमें निवास करने वाली आत्मा की अच्छाई-बुराई का निर्णय अधिक दिन निर्भर नहीं करेगा। साड़ी भी पहनी जा सकती है, गाउन भी, स्कर्ट भी। हां यह बात अलग है कि आप प्रबुद्ध होते हुए भी माता जी या बहन जी को साड़ी पहनेे देखना अधिक पसंद करते हों।

कवि की लोक-प्रियता श्रेष्ठ कविता की पहचान है?

वह अच्छी कविता की पहली शर्त है पर उससे भी बड़ी एक शर्त और है। उस लोकप्रियता को किस माध्यम से अर्जित किया गया है। वह शब्दों के जादू की देन है या अर्थ-बोध की। कवि के सुरीलेपन से मिली है या कृतित्व के तप से। निर्णय कान ने दिया है या हृदय ने।

कविता को व्यापक और समृद्ध बनाने के लिए मुक्त-वृत्त में लिखना आवश्यक लगता है?

शायद आपने भूगोल पढ़कर ऐसी धारणा बनाई है। क्योंकि भूगोल के अनुसार समुद्र-तट के अधिक कटे-फटे होने पर ही देश की समृद्धि निर्भर करती है। मेरे विचार से छंद एक व्यवस्था का नाम है। और हिंदी कविता की तो छंद संस्कृति है। इतना संशोधन इसमें जोड़ा जा सकता है कि अनुप्रास-हीन भी छंद हो सकता है। धर्म को रहना है तो पूजा होगी ही। मुझे पता नहीं पूजा के समय उपन्यासों को गाने की प्रथा कभी शुरू होेगी या नहीं पर कविता हमेशा गाई जाएगी जो अपनी संस्कृति में होगी, विदेशी संस्कृति में नहीं।

कविता की भाषा के संबंध में आपके विचार?

भाषा के बारे में मुझे बहुत कुछ कहना है लेकिन समय की कोताई के कारण एक संस्मरण सुना कर ही काम चलाना सरल है। एक आदर्श कवि ने मेरी भाषा पर आपत्ति प्रकट करते हुए डांटा-‘‘आत्मा’ में पांच मात्राएं क्यों मानते हो, श्मशान को शमशान क्यों लिखतेे हों’’। मैं जानबूझकर कर ऐसा गुनाह करता हूं क्योंकि हिंदी छंद-शास्त्र के कुछ नियम ग़लत हैं। ‘आत्मा’ में चार मात्राएं तब हो सकती हैं जब ‘त’ की ध्वनि को स्वीकार न किया जाय। ‘आमा’ और ‘आत्मा’ में कोई भेद है या नहीं। कविता में तीन स्थानों से शब्द आते हैंऋ शब्द-कोश से, बोल-चाल से, वे शब्द जो कोष में मुद्रित होने के अभिलाषी हैं और शब्दाभाव की स्थिति में किसी भाव-विशेष को व्यक्त करने के लिए कवि की नए शब्द सृजन की क्षमता से। कविता का काम जीवन दर्शन को सुुगम बनाना हैऋ इसलिए उन शब्दों के प्रयोग की स्वतंत्रता मैंने ली है जिन्हें अभी शब्दकोष में आना है। दूसरे, शब्द तो मात्र संदेशवाहक हैं, संदेश नहीं हैं। एक बात और भी हैऋ आदमी की तरह भाव की भी एक रुचि होती है, इसलिए उसे अपने अनुकूल शब्द स्वयं चुननेे दोे, नहीं तो शब्द और भाव का यत्नज संबंध अनमेेल-विवाह की तरह होगा।

महान कवि के लिए महान व्यक्ति होना ज़रूरी है या नहीं?

‘महान’ बहुत ही आतंकित करने वाला शब्द है। मैं समझता हूं महान से आपका अर्थ ‘अच्छे’ से है। मैं निःसंकोच रूप से यह मानता हूं कि भ्रष्ट व्यक्ति अच्छी कविता नहीं लिख सकता। किंतु कुत्सित समाज शास्त्र और सदाचार संहिता द्वारा निर्धारित ‘भ्रष्ट’ की परिभाषा भी कुत्सित ही है। कोई हृदय-हीन व्यक्ति सरस कविता को जन्म नहीं दे सकता क्योंकि कविता बौद्धिक-व्यायाम के निष्कर्ष का फल नहीं है बल्कि वह हृदय की कठिन भाषा का सरल अनुवाद है। हां, सदाचार शास्त्र ने महान कवियों को दोषी ठहराया है। किंतु इसका उत्तर इतिहास के पास है। हर युग का शासन सूत्र द्वितीय श्रेणी की प्रतिभा के हाथ में रहता है क्योंकि थोड़ी-बहुत युगीन ख्याति के अतिरिक्त उसमें पद और परिस्थिति से समझौता करने की क्षमता भी होती है। प्रथम श्रेणी की प्र्रतिभा एक भी कुत्सित परंपरा या नाटकीय व्यवहार से समझौता नहीं करती। फलस्वरूप सामाजिक प्रतिष्ठा से प्रायः वंचित रह जाती है। साथ ही द्वितीय श्रेणी की प्रतिभा अपनी नैतिक दुर्बलता को छिपाने के लिए उसके विरुद्ध आंदोलन करती रहती है ताकि सत्ता उसी के हाथोें में सुरक्षित रहे।

गीत के कुछ सिद्धांत भी हैं क्या?

जी हां है, और वे भी बड़े बारीक हैं। हरेक गीत एक महाकाव्य होता है। महाकाव्य के भी कुछ सिद्धांत हैं, गीत के भी। फ़िल्मी गीत लिखने के बाद नहीं, गाने के बाद गीत बनता है। और गानेे के बाद फिर गीत नहीं रहता। किंतु कविता का गीत तीनों स्थितियों में गीत ही रहता है क्योंकि उसका संगीत शब्द-गत न होकर भाव-गत होता है। गीतकारों को एक बात और भी समझ लेनी चाहिए कि भाव का उद्भव मात्र ही गीत को जन्म देने में पर्याप्त नहीं है वरन् जो भाव मन में जीते-जीते जीवन का दुःख-सुख बन जाता है वही गीत को जन्म देने में समर्थ होता है। हमारे अनेक सुख-दुःख सामान्य होते हुए भी उन्हें भोगने की परिस्थितियां, पद्धतियां और मात्राएं सामान्य नहीं होतीं। अनुभूति की तीव्रता, उसका समय विस्तार (कितने अधिक समय वह टिकती है) और उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम के निर्वाचन पर ही गीत की श्रेष्ठता निर्भर करती है। सब भावों के लिए हमारे यहां पृथक-पृथक छंद निर्धारित हैं। मैं आवेगपूर्ण भावाभिव्यक्ति के लिए क्षिप्रगामी और सुकुमार लजीले भावों के लिए मंथर गति वाले छंदों को चुनता हूं। इधर गीतकारों पर पुनरुक्ति दोष अधिक लगाया जाता है। मैं इस दोष से सहमत हूं, किंतु भाव की पुनरुक्ति ही दोष मानी जानी चाहिए न कि शब्द की। इधर पुनरावृत्ति के जितने दोष गिनाए जाते हैं उनमें शब्दों के सिपाही बार-बार खड़े किए जाते हैं। चंद्रमा, सूर्य, सुमन, शूल प्रेम, और घृणा के बार-बार प्रयोग से कविता में यह दोष पैदा नहीं होता, यदि नए-नए भावों को प्रकट करने के लिए इनका प्रयोग किया जाए। और अगर शब्दों का नयापन ही अच्छी कविता की कसौटी है तो अमर कोष को सूर सागर से श्रेष्ठतर कृति माना जाना चाहिए। और हां, नए-नए शब्दों का जितना प्रयोग गीतकारों ने किया है उतना नई कविता के अलमबरदारों ने नहीं किया है। अंग्रेज़ी और बंगला के दर्ज़ी-कट शब्दों कोे गूंथने में वे हम से बहुत आगेे हैं। गीतों में सूत्रात्मकता भी रहनी चाहिए। बीच में भाव-परिवर्तन से रस-विरोध की स्थिति का भय बना रहता है। सरलतम शब्दों में महानतम भावों को समो देनेे वाला कवि सबसेे बड़ा गीतकार होगा।

आधुनिक युग में पुरानी और नई पीढ़ी के कुछ श्रेष्ठतम कवियों के नाम बताइए?

मालूम होता है आप मुझसे रुष्ट हैं, नहीं तो ऐसा प्रश्न नहीं करतेे जो मुझे जोखम में डाल सकता है। उत्तर भी मैं उलझा हुआ ही दूंगा। और देखिए जब कोई क्रोध प्रकट करे तो मेरे इस सत्य-कथन के लिए क्षमा उससे आपको मांगनी होगी।

सर्वश्री प्रसाद, निराला, बच्चन और दिनकर पिछली सीढ़ी के सबसे बड़े कवि हैं। श्री नरेन्द्र शर्मा और शंभुनाथ सिंह के नाम उनके बाद लिए जा सकते हैं बाकी अधूरे कवि तो सभी हैैं।

नई पीढ़ी के बारे में अभी निर्णय नहीं दिया जा सकता। फिर भी नीरज आत्म-निरीक्षण के बाद, रमानाथ नया जन्म पाने के बाद, राही लंबी उम्र पाने के बाद और त्यागी और भी पीड़ा सहने के बाद इस पीढ़ी के सबसे बड़े कवि माने जा सकेंगे। और हां, मुकुट बिहारी सरोज ने भी इधर नई संभावनाओं को जन्म दिया है। कुछ और लोग भी आ रहे हैं जिनका स्वागत हमें करना चाहिए। न जाने कौन कालवैतरणी को लांघ जाने की शक्ति पांवों में लिए है। प्रयोगवादियों में सर्व श्री भारती, दुष्यंत और श्रीकांत वर्मा को छोड़कर सबने चित्रकारी की है। उसे दृष्टि काव्य माना जा सकता है काव्य नहीं।

हां, ऊपर दिए गए सब नामों के अतिरिक्त एक नाम ऐसा और है जिसे अलग से लेने की ज़रूरत है। वह नाम है श्री बलवीर सिंह ‘रंग’ का। रंग जी के साथ जितना अन्याय हुआ है उतना कम लोगों के साथ हुआ है। हालांकि वह सबसे अधिक मौलिक कवि हैं। मैं उन्हें युग-कवि की संज्ञा देने में किसी भी संकोच का अनुभव नहीं करता।

श्री वीरेन्द्र मिश्र के बारे में आपका क्या विचार है?

जी श्री नरेश मेहता के बारे में है। और कुछ नहीं कहूंगा। वीरेन्द्र मेरे अच्छे मित्रों में से एक हैं इसलिए ज़्यादा न कहलाइए।

लीजिए यह बात समाप्त हुई।

अंत में मैं कुछ लोगों के प्रति आभार प्रदर्शन करना लाज़मी समझता हूं क्योंकि इन रचनाओं के सृजन में उनका भी योग है। धन्यवाद करता हूूं गोेपाल सिंह का जिसने मुझे भोजन देकर ये कविताएं लिखने के लिए जीवित रखा, प्रणाम करता हूं श्री सुमन जी और विद्रोही जी को जिनकी सद्भावनाओं ने मुझे जीनेे की प्रेरणा प्रदान की, स्नेेहांजलि अर्पित करता हूं श्री बांके बिहारी भटनागर को जो कविता विरोधियों के विरोध के बावजूद मेरी रचनाएं प्रकाशित करने की बदनामी सहते रहे, नमस्कार करता हूूं राही को जिसकी प्रतिद्वंद्विता मुझे रात-दिन सोने नहीं देती क्षमा याचना करता हूं श्री सुरेन्द्र कुमार मल्होत्रा से, और आभार प्रकट करता हूूं अपनेे प्रकाशक और पाठकों का। बस और कहूं भी क्या।


Monday, May 9, 2022

नजीबाबाद और नवाब नजीबुद्दौला

अमन कुमार त्यागी




मुरादाबाद-सहारनपुर रेल मार्ग पर एक रेलवे जंकशन है - नजीबाबाद। जब भी आप इस रेलमार्ग पर यात्रा कर रहे हों तब नजीबाबाद के पूर्व में लगभग तीन किलोमीटर और रेलवे लाइन के उत्तर में लगभग 200 मीटर दूरी पर एक विशाल किला देख सकते हैं। सुल्ताना डाकू के नाम से मशहूर यह किला रहस्य-रोमांच की जीति जागती मिसाल है। अगर आपने यह किला देखा नहीं है, तो सदा के लिए यह रहस्य आपके मन में बना रहेगा कि एक डाकू ने इतना बड़ा किला कैसे बनवाया ? और यदि आपसे कहा जाए कि यह किला किसी डाकू ने नही, बल्कि एक नवाब ने बनवाया था। तब भी आप विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति आपको बताएगा कि इस किले में कभी सुल्ताना नामक डाकू रहा करता था। बात सच भी है। भाँतू जाति का यह डाकू काफी समय तक इस किले में रहा। तब बिजनौर, मुरादाबाद जनपद का हिस्सा होता था और यहां यंग साहब नाम के एक पुलिस कप्तान तैनात थे, जिन्होंने सुल्ताना डाकू को काँठ के समीपवर्ती रामगंगा खादर क्षेत्र से गिरफ्तार कर इस किले में बसाने का प्रयास किया था। उन दिनों देश में आजादी के लिए देशवासी लालायित थे। जगह-जगह अंगे्रजों से लड़ाइयां चल रही थीं। बिजनौर में भी अंग्रेजों की ताक़त कमज़ोर पड़ती जा रही थी।  

नजीबाबाद और पत्थरगढ़ किले का निर्माण

    इतिहास विशेषज्ञ इस किले के महत्व को जानते हैं। पत्थर गढ़ के नाम से मशहूर यह किला सन् 1754 में बनकर तैयार हुआ और अपने निर्माण काल से ही इस किले ने दिल्ली सल्तनत में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू कर दी। एक समय तो ऐसा भी आया कि जब दिल्ली के महत्वपूर्ण फैसले इस किले में लिए जाने लगे। कौन था इस किले का निर्माता और कौन था वह, जिसने दिल्ली सल्तनत पर एक तरह से कब्जा ही जमा लिया था ? आप जानने का प्रयास करेंगे, तब आपको पता चलेगा कि जिसके नाम पर नजीबाबाद नगर आबाद है, वही इस किले का निर्माता भी है। भारत के मुख्य तीर्थों में से एक हरिद्वाार से मात्र 50 किलोमीटर पूर्व, उत्तराखण्ड के प्रवेश द्वार अर्थात कोटद्वार से 24 किलोमीटर दक्षिण में स्थित यह नगर सन् 1754 में रूहेला नवाब नजीबुद्दौला ने बसाया था। वर्तमान में इस नगर की आबादी लगभग डेढ़ लाख से ऊपर है और यह नगर साम्प्रदायिक सद्भाव का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है। यदि नजीबाबाद और इसके इतिहास को जानना है तो नवाब नजीबुद्दौला के इतिहास को जानना ही होगा ।

नजीबुद्दौला एक परिचय

नवाब नजीबुद्दौला को भारतीय इतिहास नजीब खान के नाम से भी जानता है। नजीब खान के पिता मलिक असालत खान युसुफ़ जई जाति के रूहेले सरदार थे। प्रसिद्ध इतिहासकार सत्यकेतु विद्यालंकार ने इस जाति के सम्बंध में लिखा है कि भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर अनेक ऐसी जातियों का निवास था, जो कहीं स्थिर रूप से बसकर नहीं रहती थीं, अपितु लूट-मार द्वारा अपना निर्वाह किया करती थीं। इनमें युसुफ़ जई और अफरीदी जातियाँ मुख्य थीं। ये जातियाँ भारत से काबुल जाने वाले काफिलों को लूट लेतीं और मुगल सेना इनसे सदा परेशान रहा करती। अकबर, जहांगीर और शाहजहां ने इन्हें काबू में लाने के लिए प्रयत्न किये, पर वे उन्हें पूर्णतया कभी अपने अधीन नहीं कर सके। औरंगज़ेब के शासन काल में इन जातियों  के उपद्रव ने सन् 1670 में बहुत गम्भीर रूप धारण कर लिया था। जब लड़ाई द्वारा मुगल बादशाह इन जातियों को काबू करने में सफ़ल नहीं हुए, तब उन्होंने घूस देने की नीति का प्रयोग किया। जिसमें मुगल बादशाह सफ़ल भी हुए। आर्थिक मदद पा जाने के बाद यह जातियाँ कारोबार और नौकरी की तलाश में इधर-उधर बस गयीं। 

‘सरगुज़श्त नवाब नजीबुद्दौला’ और ‘तारीख़-ए-खुर्शीद जहां’ पुस्तकों का अध्ययन करने से पता चलता है कि युसुफ़ जई जाति का एक सरदार ‘उमर खान, जिसे उमर खैल के नाम से भी जाना जाता था, वह मानेरी में बस गया। मानेरी अब पाकिस्तान में है। उमर खान युसुफ़ जई के दो निकाह हुए थे। पहला मही (महर खैल) के साथ और दूसरा बेसु के साथ। जिनमें मही से मीर इस्माइल खान का जन्म हुआ। मीर इस्माइल का बेटा हुआ जहांगीर खान और जहांगीर खान के नजीर खान। नजीर खान के सय्यद खान और सय्यद खान के मलिक इनायत खान। मलिक इनायत खान के तीन पुत्र थे, फ़ाज़िल खान, इसालत खान और बिशारत खान। यही बिशारत खान सन् 1708 में जन्मे अपने भतीजे से काफी मोहब्बत रखता था। जब भतीजा बारह वर्ष का हुआ, तब सन् 1720 में बिशारत खान घोड़ों का व्यापार करता हुआ हिन्दुस्तान आकर रामपुर-बरेली के पास सिरसा में बस गया था। इस क्षेत्र में रूहेले अपना वर्चस्व बढ़ाते जा रहे थे। डा0 परमात्मा शरण लिखते हैं, कि औरंगज़ेब के समय में कंधार के एक अफ़गान सिपाही दाऊद ने बरेली जिले में एक छोटी सी जागीर स्थापित कर ली थी। उसके अपने कोई सन्तान न थी। बाद में उसके दत्तक पुत्र अली मुहम्मद खां ने, जो एक जाट वंश से था, बरेली जिले के आंवला नगर को अपना केन्द्र बनाकर और मुहम्मद शाह के समय की अराजकता से लाभ उठाकर अपनी जागीर को बहुत विस्तृत कर लिया था। बिशारत खान की सेवाओं से खुश होकर अली मुहम्मद खां ने उसे बिलासपुर (जो अब रामपुर जिले की तहसील है) में नियुक्त कर दिया। बाद में बिशारत खान ने वहीं पास ही में अपने नाम पर एक नगर बसाया। जिसका नाम आज भी बिशारत नगर है। यही वह घटना है, जिसने नजीब खान के दिल में रोमांच पैदा कर दिया था। वह हिन्दुस्तान आने के लिए मचल उठा। 

नजीब खान का संघर्ष

सन् 1740 में जब नजीब खान बत्तीस वर्ष का हुआ तब वह कुछ घोड़ों और कुछ साथियों के साथ अपने चाचा के पास बिशारत नगर पहुँचा। यकायक भतीजे को अपने पास देखकर बिशारत खान खुश हो गया। अब चाचा-भतीजे ने आगे की योजना बनाई और यह तय किया कि अब नजीब खान वहीं रहेगा तथा नौकरी कर आगे के रास्ते तलाश करेगा। बिशारत खान ने अपने जांबाज भतीजे नजीब खान को अली मुहम्मद खान के यहां नौकरी दिला दी। नजीब खान की महत्वाकांक्षा और वफ़ादारी ने उसे तरक्की भी दिलायी। बिसौली का नवाब दूंदे खान नजीब खान से बहुत प्रभावित था। उसने अपनी बेटी वर बेगम ;कुछ विद्वान इन्हें दुर बेगम भी कहते हैंद्ध का निकाह भी नजीब खान के साथ कर दिया और सन् 1748 में उसे बिसौली का रिसालदार भी बना दिया। इसी साल अली मुहम्मद की मृत्यु हो गयी। हाफ़िज रहमत खां नामक एक रूहेला सरदार अली मुहम्मद का उत्तराधिकारी बनाया गया। हाफ़िज रहमत खां भी काफी महत्वाकांक्षी था और वह अपने छोटे से राज्य की सीमाओं को बढ़ाता जा रहा था। इस काम में नजीब खान की बहादुरी और दूरदर्शिता उसके बड़े काम आ रही थी। लेकिन पड़ौसी सफ़दरजंग रूहेलों के उत्थान को नहीं देख सकता था। उसने हाफ़िज रहमत खां पर सेना से हमला करा दिया। कुशल योद्धा और नेतृत्व ने हाफ़िज रहमत खां का साथ दिया। किस्मत भी रहमत खां के साथ थी। उसने सफ़दर जंग की भेजी हुई सेना को पूरी तरह तहस-नहस कर डाला। इस कामयाबी से रूहेलों के हौसले बुलंद हो गये। इसी समय बरेली के निकट फ़र्रूखाबाद के अफ़गान फ़ौजदार कायम खां बंगश ने भी अपनी ताक़त काफी बढ़ा ली थी। सफ़दर जंग ने कायम खां को रूहेलखण्ड का फ़ौजदार नियुक्त कराकर हाफ़िज रहमत खां से उसकी भिड़न्त करा दी। कायम खां ने हाफ़िज रहमत खां का अनुरोध- ‘उसे एक अफ़गान भाई से लड़ना न चाहिए ।’ नहीं सुना और रूहेलखण्ड पर हमला कर दिया। मजबूरी थी। हाफ़िज रहमत खां को भी लड़ाई के लिए तैयार होना पड़ा। इस लड़ाई की सारी कमान नजीब खान के हाथ में थी। नजीब खान को जैसे इसी मौके की तलाश थी। उसने अपनी कुशाग्रबुद्धि और चट्टानी जिस्म का प्रयोग कर युद्ध का बिगुल बजा दिया। घमासान हुआ। नजीब खान के हाथ की तलवार आसमानी बिजली के समान चमक रही थी। कायम खँा की सेना गाजर-मूली की तरह कट रही थी। अन्ततः नजीब खान ने कायम खां बंगश को बदायँू के निकट घेर लिया। इस लड़ाई में कायम खां बंगश को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और नजीब खान की बहादुरी चर्चा का विषय बन गयी। हाफ़िज रहमत खां ने कायम खां बंगश की जागीर पर कब्जा कर लिया। थोड़ा सा हिस्सा सफ़दरजंग भी कबजाने में कामयाब रहा। हाफ़िज रहमत खां नेक दिल भी था, उसने कायम खां की माँ को फ़र्रूखाबाद शहर तथा बारह गांवों की आमदनी छोड़ी। लेकिन सफ़दरजंग अपनी करतूतों से अभी भी बाज़ नहीं आ रहा था। उसने अपने कारिंदों से कायम खंा बंगश के छोटे भाई अहमद खां बंगश को तरह-तरह से परेशान कराया। तब अहमद खां बंगश ने सफ़दर जंग की सेना को नष्ट कर दिया और पुनः अपना शासन स्थापित कर लिया। उसने अवध सूबे पर भी चढ़ाई कर दी। संकट जानकर सफ़दरजंग ने मल्हार राव होल्कर, जयप्पा सिंधिया तथा सूरजमल जाट से मैत्री कर ली। इस नयी मैत्री का लाभ उठाकर उसने फ़र्रूखाबाद पर चढ़ाई कर दी। मराठों ने इस अवसर पर फ़र्रूखाबाद और दोआब की भूमि को जी भरकर लूटा और वापिस चले गये। इधर अहमद शाह अब्दाली सन् 1752 में पंजाब पर चढ़ आया। इसकी खबर पाते ही सफ़दर जंग ने बंगश से मराठों की चढ़ाई का खर्च देने की बात कही। बंगश को धनाभाव में जमानत के रूप में अपनी रियासत का आधा भाग मराठों को देना पड़ा। (हम प्रदेश पर मराठों का शासन सन् 1803 तक रहा बाद में अंग्रेज सेनापति लार्डलेक ने उसेे सिन्धिया से जीतकर कम्पनी में मिला लिया था ।) हालांकि इस क्षेत्र में हाफ़िज रहमत खां, दूंदे खां और नजीब खान ज्यादा चक्कर में नहीं पड़े। वह खामोशी के साथ अपनी ताक़त बढ़ाते हुए दिल्ली सुल्तान के नजदीक आने का प्रयास करते रहे। इस समय सफ़दरजंग अपने आपको बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ मानता था, जबकि नजीब खान उसकी एक-एक चाल को अच्छी तरह समझ रहा था। इसी दौरान सफ़दरजंग ने एक और चाल चली। वह दिल्ली बादशाह के विश्वासपात्र जावेद खवास के व्यवहार से बहुत असंतुष्ट रहता था। एक दिन उसने मौका पाकर जावेद को एक दावत में बुलवाया। यह दावत जावेद खवास की मृत्यु का सामान बना दी गयी। जावेद खवास को मरवाकर सफ़दरजंग ने चैन की सांस लेनी चाही। लेकिन बादशाह से उसका मनमुटाव बढ़ता ही गया। उसी समय आसफ़जाह निजाम के बेटे गाज़िउद्दीन की दक्षिण भारत में मृत्यु हो गई और उसका बेटा गाज़िउद्दीन द्वितीय दिल्ली दरबार में उसकी जगह पर नियुक्ति पा गया। गाज़िउद्दीन द्वितीय बड़ा ही तीव्र बुद्धि किन्तु अत्यन्त दुष्ट तथा क्रूर प्रड्डति का था। वह बहुत ही शीघ्र दिल्ली दरबार में सबसे अधिक प्रभावशाली हो गया और उसने सफ़दरजंग को कई मामलों में नीचा दिखाना शुरू कर दिया। अन्ततः सफ़दरजंग ने बादशाह के विरूद्ध विद्रोह कर दिया और एक दूसरा बादशाह उसके मुकाबले पर खड़ा कर दिया। गाज़िउद्दीन के पक्ष में नजीब खान रूहेला था और सफ़दरजंग की सहायता जाट राजा सूरजमल कर रहा था। कई महिने के परस्पर संघर्ष के बाद जयपुर के राजा माधव सिंह ने दोनो दलों के बीच समझौता कराया। जिसके चलते सफ़रदरजंग को वज़ीर का पद छोड़कर अवध और इलाहाबाद के अपने प्रान्त की सूबेदारी पर ही सन्तोष करना पड़ा। वज़ीर का पद गाज़िउद्दीन के चाचा कमरूद्दीन को दिया गया। सफ़दरजंग इस राजनीतिक हार को पचा नहीं पाया। सदमे की वजह से वह बीमार रहने लगा। वह अपनी हार का मुख्य कारण नजीब खान को मानता था। जिस वक्त सफ़दरजंग ने दिल्ली के बादशाह अहमद शाह पर सूरजमल जाट और इन्द्रगुसाई से हमला कराया था उस वक्त नजीब खान किसी भयानक तूफ़ान की माफिक आया था और उसने इन्द्रगुसाई को देखते ही देखते धूल चटा दी थी। इस लड़ाई में इन्द्रगुसाई के मारे जाने से सफ़दरजंग की जैसे कमर ही टूट गयी थी। उधर बादशाह ने नजीब खान की बहादुरी और वफ़ादारी से खुश होकर उसे नवाब का खिताब दिया था। साथ ही मुजफ्फरनगर और सहारनपुर की जागीरें भी नजीब खान को उपहार में दे दी थी। जल्दी ही सफ़दरजंग हार के सदमे के चलते चल बसा। अब नजीब खान नवाब नजीबुद्दौला बन गया था। उसने अब अपनी जागीरों की देखभाल करने के लिए तीन किले बनवाए, जिनमें मुजफ्फरनगर ज़िले में शुक्रताल तथा सहारनपुर ज़िले में गौसगढ़ किलों के अलावा मुख्य किला साहनपुर रियासत में बनवाया। पत्थरगढ़ नाम से विख्यात हुए इस किले से लगभग डेढ़ किलोमीटर पश्चिम में एक नगर भी बसाया, जिसका नाम नजीबाबाद रखा गया। इस नगर को बसाने में नवाब नजीबुद्दौला ने दूरदर्शिता से काम लिया। अफ़गानिस्तान, मुल्तान और न जाने कहाँ-कहाँ से कारीगर बुलाये गये। व्यापारियों को भी बाहर से ही बुलाया गया। बस्ती की व्यवस्था हिन्दू और मुसलमानों की मिली-जुली की गयी। सिक्के गढ़ने के लिए टकसाल बनायी गयी। किसानों को कर में रियायत दी गयी। व्यापारियों पर कम से कम कर लगाया गया। आम आबादी में भी नवाब ने अपने लिए एक महल बनवाया। वहीं पर एक सराय भी बनवायी जो महल सराय के नाम से प्रसिद्ध है। इस महल से पत्थर गढ़ किले तक एक सुरंग का निर्माण भी कराया गया। आबादी के लोगों की बात सुनने के लिए महल और किले के दरवाज़े सदैव खुले थे। नवाब नजीबुद्दौला ने अपने नाम से बसाये इस नगर की जो कल्पना की थी, वह साकार हो उठी। नवाब ने पत्थरगढ़ का किला सामरिक दृष्टि से बनवाया था। किला बहुत ही मजबूत और सुव्यवस्थित था। सन् 1754 में यह किला और नजीबाबाद आबाद हो गया था। यह किला चैकोर है। इस किले की लम्बाई और चैड़ाई 1400 फिट है। उँचाई 40 फिट और दीवारों की मोटाई 16 फिट है। दीवारों की मोटाई में लगभग 3 फिट व्यास वाले कुए जगह-जगह बने हुए हैं। किले के दो मुख्य दरवाज़े हैं, जिनमें एक पूरब की ओर तथा दूसरा पश्चिम की ओर स्थित है। इसमें दो मेहराब तथा चार बुर्ज हैं। किले में मस्जिद, महल, दीवान ख़ान और बाज़ार आदि थे। एक बावड़ी थी। किले के चारो ओर कच्ची मिट्टी की काफ़ी चैड़ी दीवार थी। जिसे दमदमा कहा जाता था। उसके चारो ओर गहरी खाई थी। जिसमें पानी भरा रहता था। इस प्रकार मानेरी से ख़ाली हाथ आया नजीब खान अपनी कुशाग्र बुद्धि एवं बहादुरी से नवाब बन गया था और जागीरें स्थापित कर ली थीं। यही नहीं वह धीरे-धीरे दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हो गया। एक समय तो ऐसा आया कि नवाब नजीबुद्दौला के मुँह से निकली बात दिल्ली सुल्तान के मुँह से निकली बात होती थी। बाद के हालात पर इतिहासकार डा0 परमात्मा शरण लिखते हैं- 

आलमगीर को मारकर गाज़िउद्दीन ने एक और शहजादे को गद्दी पर बैठाने का प्रयास किया, परन्तु इसी समय अब्दाली की चढ़ाई की खबर आई और वह जान बचाकर दिल्ली से भाग निकला। तब नजीबुद्दौला, शुजाउद्दौला तथा अहमद शाह अब्दाली ने सहमत होकर विगत बादशाह के पुत्र अलीगौहर को, जो उस समय बिहार में था, बादशाह घोषित कर दिया। उसने अपना नाम शाह आलम रक्खा किन्तु वह 1772 से पहले दिल्ली न आ सका। उसकी अनुपस्थिति में शासन का कार्य नजीबुद्दौला करता रहा। अहमद शाह अब्दाली ने नजीबुद्दौला को मीरबख्शी नियुक्त कर दिया था। वह राजधानी में अब्दाली का प्रतिनिधि बन गया। इस प्रकार अहमदशाह अब्दाली का चैथा आक्रमण नजीब खान के लिए फ़ायदे का सिद्ध हुआ। इतिहासकार अवध बिहारी पाण्डेय लिखते हैं- अब्दाली के लौटते ही स्थिति में फिर तीव्रगति से परिवर्तन आरम्भ हो गया। रघुनाथ राव, सखाराम बापू, मल्हार राव होल्कर आदि मराठा सेनापति फिर प्रकट हो गये और नजीब के व्यवहार से असंतुष्ट सम्राट तथा वज़ीर उनका चरण-चुम्बन करने के लिए आतुर हो गए। सखाराम बापू ने दोआब में प्रवेश किया और उसने वहाँ से नजीब के प्रतिनिधियों को हटा दिया। रघुनाथराव राजपूताना से दिल्ली की ओर बढ़ा। पेशवा का कर्ज़ बढ़ रहा था और उसे सम्राट से उसकी रक्षा के लिए 5000 सैनिकों के वेतन के उपलक्ष में 13 लाख वार्षिक तथा अन्य बकाया रुपया वसूल करना था। सखाराम बापू ने सूचना दी कि दोआब में इतनी अव्यवस्था है कि वहां से कुछ पाना कठिन है। इसलिए मराठे स्वयं भी दिल्ली जाने और वहां अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करने के पक्ष में थे। नजीब खान ने दिल्ली के किले के भीतर से बचाव की लड़ाई का प्रबंध किया। परन्तु रसद की कमी के कारण उसे संधि कर लेनी पड़ी। इस समय से लेकर अप्रैल 1758 तक रघुनाथ राव ने अनेक ऐसी भूलें की जिनके कारण मराठों को कोई लाभ होने के स्थान पर उन्हें अब्दाली और नजीब खान का घातक विरोध सहना पड़ा। मल्हारराव और नजीब खान में सद्भाव था। होल्कर उसकी योग्यता का कायल था। दिल्ली में घेरे ने उसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी दिया था। इसलिए वह चाहता था कि नजीब को शत्रु न बनाया जाय और उसे मीर बख्शी के पद से न हटाया जाय। नजीब ने यह वादा भी किया था कि यदि उससे मित्रता कर लें तो वह अहमदशाह अब्दाली से मिलकर शांतिमय ढंग से मराठा-अब्दाली प्रभाव-क्षेत्र निश्चित करा देगा, जिससे दोनों पक्षों को लाभ होगा। परन्तु रघुनाथराव ने उसकी बात नहीं मानी। नजीब खान को अपने समस्त सैनिकों के साथ दिल्ली से निकल जाना पड़ा, उसे मीरबख्शी के पद से हटाकर अहमद बंगश को उसके स्थान पर नियुक्त किया गया और उसकी जागीर का बहुत सा भाग छीन लिया गया। अस्तु, यह स्वाभाविक था कि वह इसकी फ़रियाद अब्दाली से करे और उसे आक्रमण करने केे लिए आमंत्रित करे। मराठों ने इस संभावना पर विचार किए बिना मार्च-अप्रैल 1758 में सरहिंद तथा लाहौर पर भी अधिकार कर लिया और प्रकटतः अटक तक हिंदू साम्राज्य का विस्तार कर दिया। परन्तु उन्होंने पंजाब की रक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया। अदीना बेग जिससे अब्दाली बहुत असंतुष्ट था वहां का सूबेदार नियुक्त किया गया और उसने 75 लाख प्रतिवर्ष देने का वादा किया। किन्तु रघुनाथराव ने नदियों के घाटों, मार्ग के दुर्गों तथा सीमान्त मार्गों की रक्षा के लिए कोई प्रबल सेना वहां नहीं छोड़ी। जब यह सब समाचार अब्दाली को प्राप्त हुआ तब वह बहुत कुपित हुआ और उसने मराठों को दण्ड देने के लिए पाँचवी बार भारत पर आक्रमण किया। पहले उसने अपने सेनापति जहां खां को भेजा। उस समय अदीना बेग मर चुका था और दत्ता जी सिंधिया ने पेशवा के आदेशानुसार वहां मराठों का सीधा शासन स्थापित करके सबाजी को सूबेदार नियुक्त किया था। सबाजी ने जहाँ खाँ को हरा दिया। अब अब्दाली ने स्वयं आक्रमण किया। उसकी सेना का सामना करने की क्षमता सबाजी में नहीं थी। इसलिए वह लाहौर, सरहिंद, मुलतान स्थानों के सेनापतियों को वापिस लौटने का आदेश देकर दिल्ली की ओर चल पड़ा और दत्ता जी से जा मिला। इस भांति सन् 1759 के अंतिम महिनों में पंजाब पर अब्दाली का पुनः अधिकार हो गया और वह सदा के लिए सम्राट के अधिकार से निकल गया। अब्दाली ने सन् 1757 में जो व्यवस्था की थी वह सबकी सब उलट चुकी थी और वह अनेक लोगों को दण्ड देने का संकल्प कर चुका था। मराठों से वह सबसे अधिक अप्रसन्न था क्योंकि उन्होंने उसके द्वारा नियुक्त अफ़गान सरदार नजीब खान का अपमान किया था और उसका राजनीतिक महत्व समाप्त करने का उद्योग किया था। उन्होंने उसके संबंधी सम्राट आलमगीर के हत्यारे का साथ दिया था और उसके बेटे को पंजाब से निकाल दिया था। उसे सम्राट से भी असंतोष था क्योंकि उसने अब्दाली द्वारा नियुक्त व्यक्ति को निकालकर इस्लाम के शत्रु मराठों से मेल कर लिया था, परन्तु वह पहले ही मारा जा चुका था। इन सब दुर्घटनाओं में वज़ीर का दोष मराठों से भी अधिक था क्योंकि उसी ने उनको बुलाया था, नजीब को हटवाया था और सम्राट आलमगीर द्वितीय का वध किया था। इन सबको दण्ड देने और विशेष कर मराठों को परास्त करने के लिए अब्दाली इतना आतुर था कि उसने पंजाब के शासन और सिखों की दमन की ठीक व्यवस्था किये बिना ही दोआब में प्रवेश किया। यहां आने पर उसकी सिंधिया से मुठभेड़ हुई, जिसमें दत्ता जी मारा गया। इसके बाद मल्हारराव होल्कर ने छापामार लड़ाई करके शत्रु को तंग करना चाहा किन्तु अफ़गान सैनिकों ने उसे घेर लिया और बड़ी कठिनाई से वह अपनी रक्षा कर सका। इन दुर्घटनओं का समाचार सुनकर पेशवा ने उद्गिर के विजेता सदाशिवराज भाउ को उत्तर भारत जाने का आदेश दिया। उसने उसके साथ अपने बेटे विश्वास राव और अनेक अनुभवी सेनापति भी भेजे। उत्तर भारत में जखोजी सिंधिया, मल्हारराव होल्कर, गोविंद बल्लाल आदि को आदेश दिया गया कि वे भाउ के आदेश के अनुसार चलते हुए विदेशी यवन को शीघ्र से शीघ्र निकालने की व्यवस्था करें। इसी के साथ उत्तर भारत में स्थित महाराष्ट्र के सभी व्यक्तियों को पेशवा यह भी लिखता रहता कि पैसा इकट्ठा करके उत्तर भारत की सेना का खर्च चलाओं तथा मेरे कर्ज़ की अदायगी के लिए रुपये भेजो। इस संबंध में राजपूतों, जाटों, सम्राट के वज़ीर, बंगाल-बिहार के नवाब सभी के विषय में आदेश आते हैं और प्रायः प्रत्येक पत्र के अंत में यह निर्देश रहता है कि रुपया प्राप्त करो चाहे जिस ढंग से भी हो। इसमें मराठा सेना की प्रधान दुर्बलता प्रकट हो जाती है। रसद का ठीक प्रबंध हुए बिना विजय की आशा करना मृगमरीचिका थी। परन्तु मराठे उधार लेकर साम्राज्य विजय के शेखचिल्लीवाले मंसूबे बना रहे थे। अहमदशाह अब्दाली उत्तर भारत के लिए नया नहीं था। वह यहां की दशा से स्वयं परिचित था। नजीब खान उसका सहायक था। उसके प्रभाव तथा अब्दाली के आतंक से अवध का नवाब शुजाउद्दौला, रूहेलों के सरदार हाफ़िज रहमत, सादुल्ला और दूंदे उससे मिल गए तथा जाट और राजपूत निरपेक्ष रहे। सदाशिवराव को उत्तर भारत का कोई ज्ञान नहीं था और सिंधिया अथवा होल्कर से उसका कोई विशेष सम्पर्क नहीं रहा था। इसलिए उनसे ठीक सहयोग रख सकना उसके लिए कठिन था। पेशवा उसे रुपये नहीं भेजता था, उसके सैनिक धन की कमी से परेशान थे और अक्सर भूखों मरने लगते थे। उत्तर भारत के कर उगाहने वाले मराठा कर्मचारी उसकी दशा खराब होती जा रही थी। फिर भी उसने धैर्य अथवा साहस नहीं खोया और दिल्ली पर अधिकार कर लिया। अहमदशाह स्वयं भारतवर्ष में अपना सीधा शासन स्थापित करने का इच्छुक नहीं था। वह केवल पंजाब, सिंध और काबुल चाहता था। जिन पर उसका अधिकार हो चुका था। शेष भाग के राजाओं से वह 40 लाख वार्षिक कर चाहता था, जिसे सम्राट का वज़ीर इकट्ठा करके भेज दिया करे। वह मराठों की शक्ति का अंत नहीं चाहता था, वह चाहता था केवल यह कि वे सम्राट से कोई निश्चित और स्थायी संधि कर लें ताकि उत्तर भारत की अशांति का अंत हो, सम्राट की ओर से कर वसूल किया जा सके और उसमें से अब्दाली को घर बैठे चालीस लाख रुपया मिल जाया करे। उसने नजीब खान, हाफ़िज रहमत खां तथा शुजाउद्दौला के द्वारा संधि की बात चलायी। भाऊ को यदि पूरी स्वतंत्रता होती तो संभव है वह सूरजमल और मल्हारराव होल्कर की सम्मति मानकर संधि कर लेता। पर पेशवा उसे बराबर पंजाब तथा दिल्ली पर अधिकार रखने के लिए निर्देश भेज रहा था। अस्तु भाऊ की शर्ते अब्दाली को ही नहीं वरन् सूरजमल को भी असम्भव प्रतीत हुई। इसलिए वह उसके विरूद्ध हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार एल.पी. शर्मा ने लिखा है- 1752 में मुगल बादशाह अहमदशाह ने अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण करने पर पंजाब और सुल्तान उसे सौंप दिये थे और अब्दाली इन सूबों को मुइन-उल-मुल्क के हाथों में देकर वापस चला गया था। 1753 ई. में मुइन-उल-मुल्क की मृत्यु हो गयी और उसकी विधवा मुगलानी बेगम शासन की ठीक प्रकार देखभाल न कर सकी। उसी समय दिल्ली की राजनीति में परिवर्तन हुआ। रघुनाथराव के नेतृत्व में मराठों ने उत्तर भारत पर आक्रमण किया और वज़ीर गाज़ीउद्दीन को मुगल बादशाह अहमदशाह को सिंहासन से उतारने में सहायता दी। उसके पश्चात् आलमगीर द्ववीतिय मुगल बादशाह बना। मराठों का प्रभुत्व दिल्ली और दोआब में स्थापित हो गया। परन्तु इससे विदेशी मुलसमानों का वर्ग बहुत असन्तुष्ट हुआ जिनमें एक प्रमुख रूहेला सरदार नजीबुद्दौला भी था। 1756 ई. में वज़ीर गाज़ीउद्दीन इमाद-उल-मुल्क ने पंजाब और सुल्तान को मुगलानी बेगम से छीन लिया और अदीब को अपना सूबेदार बनाकर वह प्रदेश उसे सौंप दिये। अब्दाली इससे असंतुष्ट हुआ। नजीबुद्दौला और मुगलानी बेगम ने उससे सहायता मांगी। रूहेला सरदार नजीबुद्दौला और अहमदशाह अब्दाली का गठजोड़ पारम्परिक स्वार्थों के कारण था। अब्दाली भारतीय भूमि से आय प्राप्त करता था, जो उसे एक बड़ी सेना रखने में सहायक थी। अफ़गानिस्तान का स्वयं का राज्य अब्दाली को यह सुविधा प्रदान करने में सर्वथा असमर्थ था। इस कारण अब्दाली पंजाब पर अपने प्रभुत्व को खोने के लिए तत्पर नहीं था। उसके हर उद्देश्य की पूर्ति में मराठे एक बड़ी बाधा थे। दूसरी तरफ नजीबुद्दौला दिल्ली पर अफ़गानों के प्रभुत्व को बनाये रखने के लिए उत्सुक था। उसमें भी मराठे ही बाधा डाल रहे थे। इस कारण अब्दाली और नजीबुद्दौला की मराठों के विरूद्ध सांठगांठ सहज हो गयी। 1756 ई. में अब्दाली ने पंजाब पर आक्रमण किया। वह पंजाब को जीतकर 1757 ई0 में दिल्ली पहुँचा और समीपवर्ती इलाके को लूटकर तथा नजीबुद्दौला को मीरबख्शी बनाकर उसी वर्ष काबुल चला गया। जाते समय अब्दाली अपने पुत्र तैमूर खां को पंजाब का सूबेदार बना गया। अब्दाली के इस आक्रमण के अवसर पर पेशवा ने रघुनाथ राव को दिल्ली की ओर भेज दिया था, परन्तु उसके दिल्ली पहँुचने से पहले ही अब्दाली वापस जा चुका था। रघुनाथराव ने नजीबुद्दौला के स्थान पर अहमद शाह बंगश को मीरबख्शी बनाया यद्यपि मल्हारराव होल्कर के हस्तक्षेप के कारण नजीबुद्दौला को क्षमा कर दिया गया था। तत्पश्चात् रघुनाथ राव ने तैमूर खां को परास्त करके पंजाब सूबेदार अदीना बेग को दे दिया। इसके बाद तुको जी होल्कर और सबाजी सिंधिया को उत्तर-भारत में छोड़कर रघुनाथराव 1758 ई0 में पूना वापस चला गया। पेशवा ने रघुनाथराव को पूना बुलाकर दत्ताजी सिंधिया को उत्तर भारत भेज दिया। दत्ताजी ने सबाजी सिंधिया को पंजाब का सूबेदार बनाया और दोआब की व्यवस्था करने के लिए नजीबुद्दौला से बातचीत की। परन्तु दत्ताजी प्रारम्भ से ही नजीबुद्दौला के प्रति शंकालु था और उधर नजीबुद्दौला उससे घृणा करता था। उसने अब्दाली को भारत पर आक्रमण करने के लिए पहले से ही बुलावा दे रखा था। इस कारण नजीबुद्दौला से कोई समझौता होने की बजाय युद्ध आरम्भ हो गया और दत्ता जी ने नजीबुद्दौला को शुक्रताल में घेर लिया। इसी अवसर पर अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब पर आक्रमण किया और सबाजी सिंधिया को पंजाब छोड़कर भागना पड़ा। अब्दाली के आक्रमण से भयभीत होकर वज़ीर इमाद-उल-मुल्क ने मुगल बादशाह आलमगीर द्वीतिय का वध कर डाला और स्वयं भरतपुर के जाट-शासक सूरजमल की शरण में चला गया। अब्दाली दिल्ली की ओर बढ़ता गया। दिल्ली की रक्षा हेतु दत्ता जी ने शुक्रताल का घेरा उठा लिया और 1759 ई0 में दिल्ली की ओर बढ़ा। दिल्ली से दस मील दूर लोनी के निकट, जनवरी 1760 ई0 में दत्ता जी का अब्दाली से मुकाबला हुआ, जिसमें दत्ता जी मारा गया और मराठों की पराजय हुई। अब्दाली ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। नजीबुद्दौला उस समय तक अब्दाली से मिल गया था उसने अब्दाली से कुछ समय भारत में रुकने की प्रार्थना की, जिससे मराठों की शक्ति को पूर्णतया समाप्त किया जा सके। जब पेशवा को दत्ताजी की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ तो उसने अपने चचेरे भाई सदाशिवराव भाउ के नेतृत्व में अब्दाली को भारत से निकालने के लिए एक बड़ी सेना उत्तर-भारत भेजी। अगस्त 1760 ई0 में मराठे दिल्ली पहंुचे। उस समय तक अब्दाली दिल्ली को छोड़कर जा चुका था। उस समय से अब्दाली और सदाशिव राव का कूटनीतिक युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों ने अपने-अपने पक्ष को शक्तिशाली बनाने के लिए उत्तर भारत के विभिन्न सरदारों को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न किया। इस सन्दर्भ में नजीबुद्दौला ने अब्दाली की विशेष सहायता की और वह सफल भी हुआ। उसने ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा देकर अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा भारतीय मुसलमानों के बड़े वर्ग को अपने पक्ष में करने में सफ़लता प्राप्त की। निस्सन्देह, सदाशिवराव एक बहाुदर और योग्य सैनिक था, परन्तु वह कूटनीतिज्ञ न था तथा कुछ दम्भी भी था। इस कारण वह कूटनीति में नजीबुद्दौला के मुकाबले सफल न हो सका। अब्दाली ने घोषणा की कि उसका उद्देश्य स्वयं भारत में रहने का नहीं है, बल्कि वह केवल दक्षिण के मराठों से उत्तर-भारत को स्वतंत्र कराने तथा मुगल बादशाह शाहआलम को, जो उस समय अवध में था, दिल्ली के सिंहासन पर बैठाने के लिए रुका हुआ है। सदाशिवराव ने प्रचारित किया कि यह युद्ध भारतीयों का विदेशियों से है और वह आक्रमणकारी को स्वेदश से निकालने के लिए संघर्ष कर रहा है, परन्तु इस प्रचार के बावजूद सदाशिव राव मुसलमानों का विश्वास अर्जित न कर सका, बल्कि वह अपनी भूल से सूरजमल जाट को भी खो बैठा। सूरजमल उत्तर-भारत का एक शक्तिशाली राजा था। युद्ध-नीति और मुगल बादशाह के प्रति व्यवहार के प्रश्न को लेकर उसका सदाशिवराव से मतभेद हो गया और वह अपने राज्य में वापस चला गया। राजपूत सरदार पहले से ही मराठों से असंतुष्ट थे। इस कारण उनमें से कोई भी मराठों की सहायता के लिए नहीं आया। दूसरी ओर नजीबुद्दौला ने धर्म की दुहाई देकर अवध के नवाब शुजाउद्दौला को ही अपने पक्ष में नहीं किया, वरन् चालाकी से मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर से भी सांठगांठ कर ली। इस प्रकार अब्दाली के पक्ष में बल की वृद्धि हुई।

सेनापति की दृष्टि से भी सदाशिवराव अब्दाली के मुकाबले अयोग्य सिद्ध हुआ। दिल्ली में उसके पास रसद की कमी होने लगी। उधर अब्दाली भी रसद की कमी अनुभव कर रहा था। दोनों ओर से सन्धि की चर्चा हुई, परन्तु नजीबुद्दौला के विरोध के कारण सन्धि न हो सकी। कुजपुरा पर अधिकार करने से मराठों को कुछ मात्रा में रसद प्राप्त हो गयी, परन्तु वह लम्बे समय तक काम नहीं दे सकती थी। अन्त में, युद्ध करने की नियत से मराठे पानीपत के मैदान में पहुँच गये, जहाँ अब्दाली पहले ही  पहुंच चुका था। नवम्बर 1760 ई0 में दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सामने पहुँच गयी थीं, जबकि युद्ध 14 जनवरी 1761 ई0 को हुआ। पानीपत की तीसरी लड़ाई के कारणों पर प्रकाश डालते हुए डा0 परमात्मा शरण लिखते हैं- नजीबुद्दौला व रूहेले सरदार हाफ़िज रहमत खां आदि अब्दाली से जा मिले। मराठा सरदार दत्ता जी सिंधिया और मल्हार राव होल्कर को उन्होंने पंजाब से निकाल बाहर किया। इसकी सूचना पाते ही पेशवा ने एक बड़ी सेना सदाशिवराव भाउ के नेतृत्व में अब्दाली से युद्ध करने के लिए भेजी। यह सेना 1760 के मध्य में दिल्ली तक पहुंच गई। इस समय अब्दाली ने कब्जा कर लिया। इस अवसर पर मुसलमानों के एक नेता ने, जो बड़ा विद्वान था और जिसका बड़ा प्रभाव समस्त मुसलमानों पर था, इस लड़ाई को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की। वह बड़े ज़ोर से यह प्रचार कर रहा था कि मराठों के आतंक से इस्लाम खतरे में पड़ जायेगा। अब्दाली को बुलाने में उसका बड़ा हाथ था। यद्यपि मराठे मुगल बादशाह और दिल्ली की रक्षा करने के लिए बढ़ रहे थे और गाजिउद्दीन वज़ीर को जाट व मराठे दोनों ही सहायता दे रहे थे और नवाब वज़ीर व नजीबुद्दौला में गहरी शत्रुता थी। इस महान नेता का नाम था, ‘शाह वलीउल्लाह’ इसके प्रभाव से, इस्लाम के नाम पर शुजाउद्दौला, हाफ़िज रहमत खां और नजीबुद्दौला सब अब्दाली से मिल गये। अब्दाली ने मराठा सरदार से समझौता करने की बातचीत की परन्तु नजीबुद्दौला ने, जो मराठों को नष्ट करने पर उतारू था, बड़े प्रपंच से इस समझौते को न होने दिया। उसने यह खबर उड़ाई कि पेशवा के बेटे विश्वास राव की मराठों ने दिल्ली तख्त पर बिठा दिया है। इस झूठे लाइन की सफाई देने के लिए सदाशिव राव ने दिल्ली में एक आम समारोह करके बादशाह आलम (जो उस समय बिहार में था) का स्थानापन्न उसके बेटे मिर्जाजवान बख्त को घोषित किया और बादशाह के नाम का सिक्का चलाया। वजीर शुजाउद्दौला को अपनी तरफ तोड़ने की भी कोशिश की। साथ ही दिल्ली के कोई 80 मील ऊपर, यमुना के निकट, कंजपुरे को भी, जहां अब्दाली ने अपनी सेना के लिए हर प्रकार का सामान इक्ट्ठा कर रखा था, सदाशिव राव ने ले लिया। इससे अब्दाली को भारी ध्क्का लगा, परन्तु लड़ाई किस युक्ति से लड़ी जाये। इस प्रश्न पर मराठा सरदारों में मतभेद हो गया। एक दल की राय थी कि अपने पुराने छापामार तरीके से ही लड़ा जाये, परन्तु सदाशिव राव ने खुले मैदान में लड़ने का निश्चय किया। इस ढंग से लड़ने का अनुभव उसकी सेना को नहीं था। अब्दाली अलीगढ़ से चलकर जमना पार कर पानीपत के पड़ाव पर आ जाये और उसने सदाशिव राव का, जो इस समय पंजाब में घुस चुका था, दिल्ली लौटने का रास्ता रोक लिया। तब सदाशिवराव वापस लौटा। दो महीने तक दोनो सेवायें आमने-सामने पड़ी रही। सदाशिव ने अपने मद में सेना की तैयारी में लापरवाही की, परन्तु अब्दाली हर प्रकार से अपनी स्थिति को पक्का करता रहा। उसने अपनी रसद आदि का पूरा प्रबन्ध कर लिया और मराठों का रसद पहुँचाना रोक दिया। अपनी स्थिति को निर्बल देखकर सदाशिवराव ने सन्धि करने का भी प्रयत्न किया, पर नजीबुद्दौला ने अब्दाली को सलाह दी कि इस्लाम की रक्षा के हेतु इन काफिरों को कुचलने का यह अवसर हाथ से न जाने देना चाहिए। मराठा सेना भूखों मरने लगी थी। स्थिति बिगड़ते देखकर कई मराठे सरदार अलग हो गये। सदाशिवराव को विवश होकर लड़ाई करनी पड़ी। सवेरे से तीसरे पहर तक दोनो दलों में घमासान युद्ध हुआ। अन्त में मराठा सेना परास्त हुई, महाद जी सिंधिया घायल हुआ ओर बड़ी कठिनाई से बचकर वापस पहंुचा। नाना फड़नवीस भी किसी प्रकार बचकर निकल गया। मराठा सेना के लगभग एक लाख आदमी मारे गये। बाकी जो जान बचाकर भागे, उन्हें उन गांव वालों ने मार डाला, जो मराठों की लूटमार से दुखी थे। यह घटना जनवरी 1761 में हुई। एल.पी. शर्मा लिखते हैं- 14 जनवरी, 1761 ई0 को प्रातः 9 बजे मराठों ने आक्रमण किया। युद्ध के बीच में ही मल्हार राव होल्कर मैदान छोड़कर भाग गया। इब्राहीम गार्दी के तोप खाने ने अब्दाली की सेना को बहुत हानि पहुँचायी, परन्तु शाम तक सम्पूर्ण मराठा सेना भाग गयी अथवा कत्ल कर दी गयी। पेशवा का ज्येष्ठ पुत्र विश्वास राव, सदाशिव राव, जसवन्त राव पवार, तुको जी सिंधिया आदि युद्ध में मारे गये। 31 अक्टूबर सन् 1770 को नवाब नजीबुद्दौला दिल्ली से नजीबाबाद वापिस आ रहा था। अभी वह हापुड़ में ही था कि काल के क्रूर हाथों ने नवाब नजीबुद्दौला को हमेशा के लिए छीन लिया। नवाब के बेरूह जिस्म को नजीबाबाद लाया गया और जावेद बाग में स्थित उसकी बीवी की कब्र के पास ही दफ़नाया गया, जहाँ आज भी मकबरे के रूप में बेहतरीन इमारत बुलन्द है। कुछ इतिहासकार नवाब की मृत्यु की तारीख़ 4 अक्टूबर सन् 1770 भी मानते है। नजीब खान के तीन सगे भाई थे, सुल्तान खान, अमीर खान मुनीर खान। एक बहन थी जवार बेगम। इनके अलावा तहेरे भाई अमान खान और अफ़जल खान थे, जो ताउळ फ़ाजिल खान की औलाद थे। जवार बेगम का विवाह नजीब खान के खानदानी अलिफ़खान के पौते बाज़ खान के साथ हुआ। बाज़ खान को किरतपुर के पास बसीकोटले की जागीर मिली। सुल्तान खान और मुनीर खान नजीब खान के साथ नजीबाबाद में ही बस गये। अमीर खान अपने चाचा बिशारत खान के पास बिशारत नगर में बस गया। अमान खान भाई अफ़जल खान के साथ अफ़जलगढ़ बसाकर वहीं रहे। नजीब खान की बीवी की मृत्यु पहले ही हो गयी थी। नजीब खान के बेटों में एक बेटे जाब्ताखान ने भी मराठों के कई हमले झेले। इसी का एक पुत्र था गुलाम कादिर खान। यह बड़ा ही खूबसूरत नौजवान था। इसी ने बादशाह आलम की आँखें निकाल ली थी। गुलाम कादिर खान का निकाह बाज खान की बहन रोशन आरा के साथ हुआ था, जिससे कोई औलाद नहीं हुई। गुलाम कादिर खान ने बाज खान के पुत्र सादुल्लाह खान को गोद ले लिया था। 

मुगलवंश की अन्तिम कहानी

मुगलवंश की अन्तिम कहानी के लिए डा0 परमात्मा शरण लिखते हैं- शाह आलम सानी 1765 से अंग्रेजों की रक्षा में प्रयाग में रहने लगा था। उत्तर भारत में मराठों ने पिफर प्रभुत्व जमा लिया और महाद जी सिंधिया ने 1771 में उसे प्रभावित करके दिल्ली बुला लिया। मुगल सम्राट की शक्ति नाम मात्र को रह गयी। सारा देश दूसरों के हाथों में चला गया। एक तरफ मराठे, दूसरी तरपफ अंगे्रज ओर अवध के नवाब, इत्यादि मालिक बन बैठे। आगरे के आस-पास जाट प्रबल हो रहे थे, रूहेलखण्ड रूहेला हाफ़िज रहमत खां के हाथ में था और पंजाब में सिक्ख उठ रहे थे। 1772 के बाद भिन्न-भिन्न दलों में प्रभुत्व के लिए झगड़े होने आरम्भ हुए। इन झगड़ों में मुख्य तथा मराठे, अवध् का नवाब वजीर शुजाउद्दौला, रूहेला हाफ़िज रहमत खां ओर जाट शामिल थे। मराठा दल के नेता महाद जी को थोड़े दिन बाद पूना जाना पड़ा, इस कारण दिल्ली में नजफ खां और अवध का वज़ीर ही ज़ोरदार रह गये। इन दोनों ने मिलकर जाटों को दबाया और शुजाउद्दौला ने अंग्रेजों से मिलकर 1774 में रूहेलों को नष्ट किया परन्तु शुजाउद्दौला 1775 में मर गया और नजफ खंा 1782 में। इसके बाद नजफ खां के नातेदार ही आपस में प्रभुत्व के लिए लड़ने लगे। इस अवस्था में शाहआलम ने मराठों से सहायता चाही और महाद जी ने आकर 1785 में दिल्ली पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उसके बर्ताव से मुगल दरबारी नाराज़ हो गये और राजपूतों तथा नजीबुद्दौला के पौत्र ;जाब्ता खां के पुत्रद्ध गुलाम कादिर की सहायता से सराद जी को दिल्ली से हटाया। गुलाम कादिर ने दिल्ली में आकर बादशाह और उसके सम्बन्धियों, स्त्री-बच्चों के साथ हृदय-विदारक क्रूरता का व्यवहार किया। उनसे खजाने ओर धन-संपत्ति का पता लेने के लिए सबको कोड़ो से पिटवाया और बादशाह की आँखें अपने भाले से खोदकर निकाल लीं। स्त्रियों को खुले तौर पर अपमानित कराया। सिंधिया को इस घटना की खबर मिलते ही उसने सेना भेजी। गुलाम कादिर मेरठ से भागता हुआ पकड़ा गया और उसे अपने किये की अच्छी सजा दी गयी। उसे मुँह काला करके गधे पर चढ़ाकर मथुरा के चारों ओर घुमाया गया, फिर उसकी आँखें निकाली गई, हाथ पैर काटे गये और तब उसे फँासी दी गयी। शाह आलम को फिर से तख्त पर बिठाया गया परन्तु अधिकार इस समय सिंधिया का था। 


मजदूरी और प्रेम

- सरदार पूर्ण सिंह हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन ...