Tuesday, June 23, 2020

उच्च शिक्षा और भारतीय भाषाएँ' पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार संपन्न


 

हैदराबाद (प्रेस विज्ञप्ति)। 

 

भारत सरकार ने उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों में क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय के स्तर की पाठ्य सामग्री को आठवीं अनुसूची में उल्लिखित 22 भाषाओं में अनुवाद करने तथा प्रकाशित करने की योजना बनाई है। प्रकाशन के लिए अनुदान भी प्रदान किया जा रहा है। भारत के पास सुनिश्चित भाषा नीति नहीं है। इसीलिए भाषा नीति तैयार करने और उसे क्रियान्वित करने के लिए मैसूर में केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान की स्थापना की गई थी। अब अनेक विश्वविद्यालयों में लुप्तप्राय भाषाओं के लिए अलग केंद्र भी खोले जा रहे हैं। साथ ही संस्कृत भाषा के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। आज हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में बुनियादी और उच्च शिक्षा से संबंधित मौलिक  सामग्री उपलब्ध कराने के लिए अनेक कदम उठाए जा रहे हैं। 

 

इन सब विषयों पर विमर्श हेतु गठित "वैश्विक हिंदी परिवार" के तत्वावधान में 'उच्च शिक्षा और भारतीय भाषाएँ' विषय पर 21 जून, 2020 को ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी/ वेबिनार संपन्न हुई। बतौर मुख्य वक्ता रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं की स्वीकार्यता तब बढ़ेगी जब भारतीय भाषाएँ स्कूली शिक्षा में स्थापित होंगी। यह स्वीकार्यता तब और सुनिश्चित होगी जब रोजगार का सृजन होगा। 

 

विषय को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि सारी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर एक डोमेन बनाते हुए हमें आगे चलना चाहिए। उच्च शिक्षा हमें अपनी अपनी भाषाओं में ही देनी चाहिए। और यह ग्रास रूट स्तर पर होना चाहिए। इसके लिए कौशल विकास जरूरी है। और इस काम को हिंदी और भारतीय भाषाओं में करना होगा। इतना ही नहीं भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ने की जरूरत को महसूस करना होगा। उन्होंने यह चिंता व्यक्त की कि ज्यादातर बच्चे निजी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं। और वहाँ अंग्रेजी को बढ़ावा दिया जा रहा है।अतः भारतीय भाषाओं को प्रोमोट करने का काम इन निजी विश्वविद्यालयों को करना चाहिए। 

 

संतोष चौबे ने यह भी कहा कि हमारे पास जो रोल मॉडल है वह है शांतिनिकेतन। इस रोल मॉडल के साथ क्या नहीं किया जा सकता। और तो और भारतीय भाषओं में लिबरल आर्ट्स के रूप में बहुत बड़ा काम हो सकता है। कल्चरल डिस्कोर्स में 'गाना' एक महत्वपूर्ण चीज है। इससे अपनी भाषा के प्रति सम्मान बढ़ता है। अलग अलग मातृभाषा भाषियों के बीच यह गीत सौहार्दपूर्ण वातावरण का निर्माण करता है। बच्चों के बीच सौहार्द पैदा करना चाहिए क्योंकि इससे भाषाओं के बीच सौहार्द की भावना पैदा हो सकती है जो अत्यंत आवश्यक है। 

 

भारत के समक्ष आज एक चुनौती है। अब करोना महामारी के बाद उच्च शिक्षा की पूरी पद्धति बदलने वाली है। अतः उन्होंने कहा कि अब समय आ चुका है मैकाले की भाषा नीति को उलटने की। इस हेतु उन्होंने सुझाव दिया कि वर्चुअल लैब्स का निर्माण करना होगा। तत्काल सामग्री को डिजिटाइज़ करने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि एक तरह से भाषा विमर्श सत्ता विमर्श है।

 

'संकल्प फाउंडेशन ट्रस्ट' के अध्यक्ष और शिक्षाविद संतोष तनेजा ने अपने विचार रखते हुए यह चिंता व्यक्त की कि अंग्रेजी भाषा में उच्च शिक्षा के लिए काफी सामग्री उपलब्ध है लेकिन भारतीय भाषाओं में बहुत कम। अतः उन्होंने सबसे यह आग्रह किया कि पहले सामग्री निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि आज मुद्दा अंग्रेजी बनाम भारतीय भाषाएँ नहीं है बल्कि हिंदी बनाम भारतीय भाषाएँ है। क्योंकि हम अंग्रेजियत के गुलाम बन चुके हैं। और यह चिंता का विषय है। उच्च शिक्षा के स्तर पर भारतीय भाषाओं को डिमांड की भाषाएँ बनाना होगा। उन्हें उचित सम्मान दिलाना होगा। पैराडाइम शिफ्ट लाने के लिए ऊपर से तार हिलाने ही पड़ेंगे।

 

इस वेबिनार  में वरिष्ठ भाषा चिंतक राहुल देव और डॉ. कविता वाचक्नवी सहित अनूप भार्गव, वीरेंद्र शर्मा, उषा राजे सक्सेना, रंजना अरगड़े, अनुपमा, ममता, राजीव कुमार 

रावत, गुर्रमकोंडा नीरजा आदि देश- विदेश के  हिंदी प्रेमी सम्मिलित हुए।

 

'अक्षरम्' के अध्यक्ष अनिल जोशी ने विषय प्रवर्तन एवं संचालन किया तथा पद्मेश गुप्त ने धन्यवाद ज्ञापित किया। 

 

 'अक्षरम्' (भारत), हिंदी भवन , भोपाल, वातायन (यू. के.), हिंदी राइटर्स गिल्ड (कनाडा), झिलमिल (अमेरिका), विश्वंभरा (हैदराबाद और अमेरिका), सिंगापुर संगम, कविताई (सिंगापुर) के सहयोग से यह महत्वपूर्ण आयोजन संपन्न हुआ। 

 

प्रस्तुति : डॉ गुर्रमकोंडा नीरजा

असिस्टेंट प्रोफेसर

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा

खैरताबाद, हैदराबाद - 500004

लौकी की बेल


इन्द्रदेव भारती




रामा !  बेल  चढ़ी  लौकी की,
लो  अपने  भी  द्वार  चढ़ी ।।


भोर  भये   में   कलियां   फूटैं,
सूरज    चढ़ते    चटकै     हैं ।
भरी   दुपहरी   फूलन    फूलैं,
देख  सभी   जन   मटकै   हैं ।


चोबाइन    के    चौबारे   पै,
त्यागन   की   दीवार  चढ़ी ।।


छुटकी-छुटकी कोमल जइयाँ,
बड़की - बड़की जब  होंगी ।
जब होंगी जी,  तब  होंगी वो,
और  ग़ज़ब  की   सब  होंगी ।


धोबनिया  के  घाट  पै  फैली,
नाइन    के   ओसार   चढ़ी ।।


घोसनिया   के   घेर  चढ़ी जी,
बामनिया    के     बंगले   पै ।
चौहनिया  के  चौक  चढ़ी  तो,
जाटनिया    के    जंगले   पै ।


गुरुद्वारे   के   गुम्बद  ऊपर,
मंदिर  जी   के   द्वार  चढ़ी ।।


मनिहारन  की   चढ़ी  मुंडेरी,
चढ़ी  जुलाहन   के   घर  पै ।
चढ़ी   लुहारन  के   हाते   में,
छिप्पीयन   के    छप्पर   पै ।


गिरजाघर  के  गेट  चढ़ी  तो,
मस्ज़िद  की   मीनार  चढ़ी ।।


चढ़ी  अमीरन  के  आंगन  में,
नीम   चढ़ी    निर्धनिया  के ।
चढ़ी  खटीकन की   खोली पै,
बिना   भेद    तेलनिया   कै ।


हिंदू, मुस्लिम,सिक्ख,ईसाई
वार के  सब पे  प्यार चढ़ी ।


ग़ज़लिया


इन्द्रदेव भारती



आधी रख,या सारी रख ।
लेकिन  रिश्तेदारी  रख ।।


छोड़ के  तोड़  नहीं प्यारे,
मोड़ के अपनी यारी रख ।


शब्दों  में  हो  शहद  घुला,
नहीं  ज़बाँ पर आरी रख ।


भले  तेरी   दस्तार   गयी,
तू  सबकी  सरदारी  रख ।


"देव''  नहीं   दुनिया  तेरी,  
पर  तू   दुनियादारी  रख ।


 


एक ग़ज़लिया


इन्द्रदेव भारती



खुशियाँ  दे  तो   पूरी दे ।
बिल्कुल  नहीं अधूरी दे ।


कुनबा  पाल सकूँ  दाता,
बस  इतनी  मजदूरी  दे ।


बेशक आधी  प्यास बुझे,
लेकिन   रोटी   पूरी   दे ।


बिटिया  बढ़ती  जावे  है,
इसको  मांग  सिंदूरी  दे ।


पैर  दिये   हैं  जब   लंबे,
तो  चादर  भी   पूरी  दे ।


आँगन   में   दीवार  उठे,
ऐसी   मत  मजबूरी  दे ।


'देव'  कपूतों  से  अच्छा,
हमको  पेड़  खजूरी  दे । 


पर्यावरण अपना


ज्योत्सना भारती




यह.... धरती !
रहे....सजती !
सजे पर्यावरण अपना ।
यही   विनती !
कलम करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।
            ( 1 )
ये  जीवनदायनी  वायु,
ये जीवनदायी पानी है ।
ये माटी  उर्वरा  माँ  है,
ये ऊर्जा भी बचानी है ।
वो वापिस लो !
गया   है   जो !
हरा पर्यावरण अपना ।।
यही   विनती !
कलम करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।
             ( 2 )
कहीं पे  रात हैं  दहकी,
कहीं पे दिन हैं बर्फानी ।
कहीं भूकंप,कहीं सूखे,
कहीं वर्षा की मनमानी ।
न कर दूषित !
करो  पोषित !
बचा पर्यावरण अपना ।।
यही   विनती !
कलम करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।
              ( 3 )
है कटना वृक्ष जरूर एक,
तो पौधें दस वहाँ  लगनी ।
नहीं कंक्रीट  की  फसलें,
किसी भी खेतअब उगनी ।
न  शोषित   हो !
औ शोभित हो !
सदा  पर्यावरण अपना ।।
यही    विनती !
कलम  करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।
              ( 4 )
न भाषण हों,न वादे हों,
न  बातें हों,  कहानी हों ।
यही शुभ कर्म,मानें धर्म,
यदि  स्वांसें  बचानी  हों ।
ये  घोषित हो !
प्रदूषित    हो !
नहीं  पर्यावरण अपना ।।
यही   विनती !
कलम करती !
बचे  पर्यावरण अपना ।।


 


 श्याम रंग वाला कागा


इन्द्रदेव भारती




(1)
भोर   भये    वो,
आता   है    जो,
काँव-काँव  करता कागा ।
नंद   के    नंदन,
के   शुभ  दर्शन,
करता है  वो  बिन नागा ।
(2)
हाथ में....पौंची,
गल.....वैजन्ती,
कान में कुंडल मधुर बजे ।
कटि करधनिया,
पग....पैंजनिया,
पंख  मोर का शीश सजे ।
(3)
जसुमति  मैया,
कृष्ण  कन्हैया,
को माखन - रोटी देके ।
चुपके -चुपके,
ओट में छुपके,
रूप  देखती  कान्हा के ।
(4)
ठुमक-ठुमक के,
आये जो चलके,
आँगन बीच कन्हाई ज्यों ।
ताक   में   बैठे,
काग   ने   देखे,
दृष्टि  उधर   गड़ाई   त्यों ।
(5)
माखन    रोटी,
हरि  हाथ  की,
चोंच दबा कर के भागा ।
जगत अभागा,
मगर   सुभगा,
श्याम रंग  वाला  कागा ।


गीतकार - इन्द्रदेव भारती


मजदूरी और प्रेम

- सरदार पूर्ण सिंह हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन ...