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Monday, October 5, 2020

विवेकी राय की कहानी ‘बाढ़ की यमदाढ़ में’ पत्रकारीय तत्व

 



कोमल सिंह
शोधार्थी (हिंदी)
शोध केन्द्र राजकीय पी0जी0 काॅलेज,
कोटद्वार, पौड़ी गढ़वाल
श्रीनगर गढ़वाल विश्वविद्यालय


पत्रकारिता का मूल तत्व है सूचना एकत्र कर उसका प्रसार करना ताकि दूसरे लोगों को सही जानकारी मिल सके। इसी तत्व के साथ पत्रकार की नैतिकता और समाचार की सत्यता व रोचकता समाचार संकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। चूंकि कहानीकार विवेकी राय एक पत्रकार भी थे इसलिए उनके कहानी साहित्य में पत्रकारिता की झलक स्पष्ट दिखाई दे जाती है। आलोचना के लिए उनकी कहानी ‘बाढ़ की यम दाढ़’ में कहानी को चुना गया है जो कहानीकार की पुस्तक ‘गूंगा जहाज’ में संकलित है।
आलोच्य कहानी का आमुख किसी समाचार की भाँति ही अनोखा प्रतीत हो रहा है- ‘यदि यह कोई कहता कि बाढ़ का तमाम पानी जमकर ठोस चमचमाता हुआ पत्थर हो गया तो उतना आश्चर्य नहीं होता जितना यह सुन कर हुआ कि दूखनराम कोहार की सात सेर दूध देने वाली भैंस रात में किसी ने चुरा ली।’ उपरोक्त पंक्तियों में समाचार सी रोचकता बन गई है। कोई भी पाठक भैंस कहाँ गई? यह जानने के लिए समाचार की भाँति संपूर्ण कहानी पढ़ जाना पसंद करेगा।
समाचार को विस्तार देने जैसा ही कहानीकार ने कहानी को विस्तार देते हुए लिखा है- ‘विपत्तियों की सीमा नहीं है। ऊपर से पानी और हवा के तीरों की बौछार हो रही है। नीचे से भी पूरी ताकत लगा कर सावढ़ के पानी ने हमला कर दिया है। उसके सत्यानाशी घेरे में सैकड़ों गाँव त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। गाँव खुला क़िला हो गया है। मगर क्या मजाल कि कोई बाहर निकले! यदि किसी ने साहस किया तो पानी का भेड़िया उसे दबोच कर हजम कर जाने के लिए अहर्निश घात लगाये है। मुँह बाये है। दुर्दान्त जलसेना की प्रबल पंक्तियों की क्रूर लहर-थपेड़ों से गाँव के चतुर्दिक किनारे कट रहे हैं। मकान धराशायी हो रहे हैं। कितनों ने जलसमाधि ले ली। सामूहिक रूप से लोग संत्रस्त दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे में गरीब दूखनराम पर किस पिशाच की शनिदृष्टि पड़ गयी? उसकी जीविका के सार-सर्वस्व किंवा गृहस्थी की एकमात्र सजीव थाती पर किसने हाथ साफ कर इस सिद्धान्त का दिवाला निकाल दिया कि विपत्ति में पारस्परिक बैर-विद्वेष को विस्तृत कर लोग एकता के सूत्र में ग्रंथित हो जाते हैं?’
उपरोक्त पंक्तियों से सिद्ध हो जाता है कि गाँव में बाढ़ आई हुई है। चारों ओर पानी ही पानी है। ऐसे में भैंस का चोरी हो जाना सामान्य बात नहीं है। 
एक कुशल संवाददाता कहीं भी हो वह समाचार खोज ही लेता है क्योंकि एक पत्रकार अपने नाक, कान और आंख सदैव खोले रखता है। उसका मस्तिष्क सदैव सक्रिय रहता है। प्रस्तुत आलोच्य कहानी में कहानीकार ने पत्रकार की तरह अपनी समस्त इंद्रियों का प्रयोग करते हुए सजगता बरती है। यही कारण है कि कहानी में बाढ़ का दृश्य दिखाते हुए भी भैंस चोरी की घटना को पत्रकारीय घटना की ही तरह से प्रस्तुत किया है। कहानीकार बताता है- ‘गाँव में नौका है नहीं, भैंस गयी कहाँ ? तीन-चार मील तक चतुर्दिक् जल ही जल है। जल में हेलकर ले जाने का साहस कौन कर सकता है ? भैंस जा भी सकती है मगर उसके साथ की छोटी पाड़ी कैसे जायगी ? इस छोटे-से गाँव में रखकर हाथी जैसी भैंस पचायी नहीं जा सकती। तो क्या पानी में डूब गयी कहीं ? लोगों के कथनानुसार दीवार काटकर अहाते से भैंस निकाली गयी है। साफ चोरी ? भैंस के पर लग गये ?’
कहानीकार के पत्रकार मस्तिष्क ने कहाँ, कब, क्यों, कैसे, किसने, किसके लिए जैसे प्रश्नों का जवाब तलाशने का भरपूर प्रयास किया है। गाँव के चारों ओर बाढ़ का जानलेवा पानी होने के बावजूद कहानीकार भैंस कहाँ गई? इस बात पर भी नजर रखता है और अंततः भैस चोरी होने का राज भी जान जाता है। 
‘उसी दिन शाम को पता चला कि चोरी गयी भैंस ‘पनहा’ पर वापस हो गयी। पचास रुपया कोहार भाई को देना पड़ा और वह भैंस उस छोटे-से गाँव की ही एक गली में पाड़ी के साथ घास चरती पाई गयी। मेरी समझ में नहीं आया कि यह ‘पनहा’ क्या बला है ? बताया गया कि इसके माने हैं घूस। जब चैपाये चोरी कर लिये जाते हैं और वापस होते हैं तो चोरों को उनकी मेहनत के लिए यह रुपया दिया जाता है। मैंने सोचा, भला रोजगार है ! अब यारों की बाढ़ बीत जायगी।’
प्रतीत होता है कि कहानी का यह हिस्सा कहानीकार ने भैंस चोरी होने और उसकी वापसी के लिए ही लिखा है। यह वर्णित गाँवों की वास्तविक दशा भी है। उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में जब बाढ़ आती है तो गाँवों के सभी संपर्क मार्ग समाप्त हो जाते हैं, न तो कोई गाँव में प्रवेश कर पाता है और न ही गांव का कोई व्यक्ति बाहर जा सकता है इसके बावजूद भैंस जैसे जानवर की चोरी कर ली जाती है और पता ही नहीं चलता वह कहाँ गई ऐसे में चोरों को घूस देकर भैंस को प्राप्त करना भी अपने आप में बड़ी खबर है। क्योंकि गाँव के लोग जानते हैं कि गाँव में चोर कौन है इसके बावजूद वह उनके खिलाफ बोलने को तैयार नहीं होते हैं और उन्हें घूस देकर अपने जानवर वापिस लेने होते हैं।
कहानी में लेखक गांव और उसके आस-पास की परिस्थितियों को भी बताना चाहता है। यह वर्णन किसी रिपोर्ट जैसा ही है- ‘अब इस गाँव से भाग निकलने के लिए मेरा मन छटपटाने लगा। नाँव की आशा ही नहीं की जा सकती थी। वैसे सौभाग्यवश किसी ओर से भूलती-भटकती आ जाय तो बात दूसरी है। पानी पार करने लायक नहीं। पूरब की ओर लगभग दो मील दूर एक गाँव में नित्य देखता हूँ, एक पाल वाली नाँव सबेरे उत्तर की ओर कहीं जाती है और शाम को लदी हुई आती है। सम्भवतः चिमनी से ईंट लाती है। यदि वहाँ तक पहुँच जाता तो इस काल से उबर जाता। मगर यह कैसे सम्भव था? कुछ लोगों ने बताया कि एक बाँध से होते हुए हेलकर जाने में जहाँ-तहाँ तैरना पड़ेगा, बाकी स्थानों पर गरदन-भर या नाक-बराबर पानी होगा। यदि हवा का वेग रहे, तो दो आदमी साथ लेकर जाया जा सकता है। किन्तु इस हवा को कौन मनावे? जल की बौछार और तेज पुरवैया के मारे तो नाकोंदम है। लड़कों ने बताया कि अमुक धोबी ने एक ‘घिरनई’ बनाई है। उसी पर बैठकर पूरब वाले गाँव तक चले जाइये और वहाँ से नाँव मिल जायगी।’
कहानीकार ‘घिरनई’ के बारे में लिखता है- ‘जाकर ‘घिरनई’ का दर्शन किया। आठ बड़े-बड़े कुंडों का मुँह ऊपर कर दो की क़तार में चार-चार बाँस बाँध दिये गये थे। ऊपर बाँस की एक चाली रख दी गयी थी।’ लेखक इसी ‘घिरनई’ से अपनी यात्रा डरते-डरते करता है। उसे डर है कि घिरनई कहीं उलट न जाए। खेतों और रास्तों में से होती हुई घिरनई आखिर अपना सफर पूरा कर लेती है। 
कहानीकार जिस छोटे से गाँव में पहुँचता है उसकी पत्रकारिता उससे उस गाँव का वर्णन भी करा लेती है। यहाँ भी ग्रामीणों की जान पर बनी है। कब किसका मकान अचानक जोरों से शब्द करता हुआ हड़हड़ाकर बैठ जायगा, कोई ठिकाना नहीं। रात-भर नींद नहीं आती। हाथ को हाथ नहीं सूझता। तेल नहीं। सारा गाँव अन्धकार में भूत की तरह पड़ा है। लेखक बताता है- ‘एक लालटेन हमारे मित्र की उस पलानी में जलती रहती थी जिसमें मैं रहता था, परन्तु अब वह हवेली में चली गयी है। वहाँ बाढ़ का पानी चढ़ आया है। गली में बाँध बनाकर उसे रोका गया है।’ कहानीकार बताता है- ‘पानी बढ़ रहा है। उनकी हवेली को लहरें काटकर गिरा देंगी। इस आशंका ने हमें संत्रस्त कर दिया।’ ऐसे हालात में लेखक अपनी स्थिति भी बताता है- ‘मेरी चारपाई पर प्रति एक वर्ग फुट में प्रति दो मिनट के अन्दर पानी की एक बूंद टप से गिर पड़ती है। यह पर्णकुटी अधिक नीची समझ कर मेरे लिए सुरक्षित की गयी थी। जब गाँव में सर्वाधिक सम्पन्न मेरे मित्र के निवास की यह दशा है तो औरों की क्या होगी?’ लेखक रात को इसी कुटी में सोता है। अचानक खड-खड-खड धम्म-धम्म! जोरों का शब्द हुआ। लेखक की छाती धड़कने लगी। मित्र उठ बैठे। कोई बड़ा मकान धस गया था। साधारणतः दीवार, छाप, ओरी और घर का अंश तो हमेशा गिरते हैं। उनका गिरना साधारण बात थी। मित्र ने पूछा, ‘किधर से आवाज आयी है?’’ लेखक ने बताया कि ‘पश्चिम ओर से।’ इसके बाद और कुछ बातचीत नहीं हुई। ‘अब जान नहीं बच सकती।’ कहकर वे खटिया पर पड़ गये। लेखक ने सोचा, इसकी हवेली उत्तर ओर पड़ती है। अभी खैरियत है। अब गिरे हुए मकान में रहने वालों का ध्यान आया। बड़ी देर तक दुर्भाग्य के कितने चित्र बनते-बिगड़ते रहे। पानी कुछ थम गया था। इसी से एक झपकी आ गयी। लेखक को अचानक मालूम हुआ कि दाहिने हाथ की तर्जनी का अगला भाग किसी जीव ने मुँह में लेकर जोर से दबा दिया। फौरन नींद टूट गयी और वह उठ बैठा। रोशनी का कोई प्रबन्ध नहीं था। गाँव में दियासलाई शायद नहीं मिल रही थी। मन में विचार बड़ी तेजी से चक्राकार घूमने लगे। कितनी हलचल मच जायगी जब अपने मित्र को जगाऊँगा! विष उतारने वाले बुलाये जायेंगे। इस गाँव में हो सकता है, न भी हों। दूसरे गाँव से बुलाना असम्भव ही है। कहीं अस्पताल वगैरह में ले जाना असम्भव ही है। किसी डॉक्टर को बुलाना और मुझे घर पर पहुँचा देना असम्भव ही है। तब सम्भव यही है कि चुपचाप मर जाऊँ।’ लेखक की पीड़ा एक रात या कुछ घंटो की है परंतु जो पूरा जीवन इस खतरे के साथ गुजारते हैं उनका क्या हाल होगा। कहानी में यह दर्शाने का प्रयास किया गया है। जिसमें लेखक ने पूर्ण सफलता भी प्राप्त की है। तभी तो कहानीकार लिखता है- ‘धत्तेरे की! पग-पग पर काल का जाल फैला है।’ 
ऐसी परिस्थितियों में सरकारी कर्मचारी विशेष रूप से लेखपाल क्या करते हैं? इस बात पर प्रकाश डाला गया है- ‘‘खूब चली है आजकल इस लेखपाल की। एक इन्तखाब की कीमत सौ रुपया तक लेता है। एक ही खाते का इन्तखाब दो-दो आदमियों के नाम जारी कर देता है। बड़े-बड़े लोग बस्ता ढोते हैं। पुराने पटवारियों में ऐसी नीचता नहीं थी। एकदम रुपये का आदमी है। कह रहा था कि एक-एक रुपया तहरीर दो तो लगान में खरीफ की आधा छूट करा देंगे। यह नीबू मुँह लग गया है। चला आता है। आज भी ले गया पच्चीस।’’ उसकी माली हालत बताते हैं- ‘‘जन्म-भर का दरिद्र आदमी साल-भर में ही कई हजार कर्जा चुका कर पक्की इमारत बनवा डाली। पूरा शनीचर है।’’ 
बाढ़ पीड़ित क्षेत्र में तहसीलदार की बहुत जिम्मेदारियाँ होती हैं। रात को रोशनी के लिए तेल को लेकर गाँव के मुखिया की तहसीलदार साहब से बक-झक कर होती है। तहसीलदार बताता है कि ‘‘इस गाँव में सिर्फ पाँच आदमियों को एक-एक पाव तेल मिलेगा। फिर आयेगा तो देखा जायगा। सामान समाप्त हो गया है।’’ यह बात चने के लिए भी कही गई तो मुखिया कहता है ‘‘तो भला बताइ, नए इन कई सौ दरिद्रों में से पाँच को कैसे अलग किया जाय? तभी तहसीलदार रौब में बोलता है, ‘तब लिख दीजिए कि हमारे यहाँ जरूरत नहीं है?’’ मुखिया भी कम नहीं है वह कहता है ‘लाइए मैं यह लिख दूँगा कि मेरे यहाँ पाँच पाव चने की जरूरत नहीं है। मेरे यहाँ ढाई-तीन सौ बाढ़-पीड़ित हैं।’’ मुखिया भी उसी ताव में बोले। तभी एम०एल०ए० साहब बीचबचाव कराते हैं। पटवारी को हुक्म हुआ कि वह लिस्ट बनावे। तौलने को महाजन बुलाया गया। तब तक साहबों के जलपान का समय हो गया। गाँव वालों की रात भर की लगी आशा बुरी तरह टूट गयी। यदि एक वक्त के खाने भर भी नहीं मिला तो क्या मिला? इतने पर भी केवल चालीस व्यक्तियों को मिलेगा। किसको मिलेगा और कौन अपना-सा मुँह लिये रह जायगा? जहाँ-तहाँ बैठकर चर्चा होने लगी कि इस राज में कैसा अंधेर है! बाद में ज्ञात हुआ कि 6 मल्लाह, 3 चपरासी, 2 साहब, 3 नेता और 1 लेखपाल का रात में और इतने ही लोगों का दिन में तुलसीदल मुखिया के घर छूटा है। जलपान पृथक है। यानी कुल मिला कर तीस-चालीस रुपये खा गये और मुश्किल से दस रुपये का सामान बँटेगा। चालीस व्यक्तियों को एक-एक पाव चना, दो-दो छटाँक मिट्टी का तेल, एक-एक मुट्ठी नमक और प्रति दस व्यक्ति पर एक दियासलाई और ग्यारह बालकों को एक-एक छटाँक मिल्क पाउडर मिला। मजाक में एक ने सत्यनारायण बाबा की जै बोलवा दी। यानी प्रसाद खतम हो गया। सभापति ने कागज पर हस्ताक्षर कर दिया। 
और इस प्रकार बाढ़ ग्रस्त गाँवों की सामाजिकता के साथ-साथ सरकारी प्रयासों की पोल कहानीकार ने खोलकर पत्रकारिता के मानकों को पूरा किया है। एक अच्छा समाचार लिखने के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है वह सब आलोच्य कहानी में उपस्थित हैं। 
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कहानीकार का पत्रकार मस्तिष्क कहानी में भी पत्रकारिता करता हुआ दिखाई देता है। कहानी का कथ्य और शिल्प पत्रकारिता के शिल्प से बहुत भिन्न नहीं है। यही कारण है कि किसी समाचार से कहानी बनाना बहुत ही सरल है या यूँ भी कहा जा सकता है कि समाचार किसी कहानी का प्रारंभिक प्लाॅट होता है। समाचार में प्रयुक्त किए गए छः (क) अर्थात क्या, क्यों, कब, कैसे, किसने और किसको सभी का भरपूर प्रयोग किया गया है। इसके अलावा पत्रकार का साहस और उसकी सूझबूझ का अनुभव भी कहानीकार के स्व में स्पष्ट दिखाई देता है। कहानी के प्रस्तुतिकरण से लेकर अंत तक बाढ़ और उसके प्रभाव तथा सरकारी प्रयासों का जो वर्णन किया गया है वह पत्रकारिता ही है।


संदर्भ


1. बाढ़ की यम दाढ़, गूंगा जहाज, विवेकी राय, अनुराग प्रकाशन चैक वाराणसी, संस्करण 2005
2. संवाददाता: सत्ता और महत्व, हेरम्ब मिश्र, किताब महल इलाहाबाद, संस्करण 1993
3.  पत्रकारिता तब से अब तक, धनंजय चोपड़ा, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ, संस्करण 2007
4. समाचार, संकलन और लेखन, डाॅ. नन्द किशोर त्रिखा, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ, संस्करण 2008
5. समाचार-कला, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ, संस्करण 2003
6. मीडिया साहित्य और संस्कृति, ओम गुप्ता, कनिष्क पब्लिशर्स नई दिल्ली, संस्करण 2002


Tuesday, March 17, 2020

गोविन्द मिश्र के कथा साहित्य में नारी का स्वरूप



शोधार्थिनी
सुदेश  कान्त (नेट)
(हिन्दी विभाग)
बी0एस0एम0पी0जी0 रुड़की (हरिद्वार)

प्रस्तावना
नारी प्रकृति की अनुपम एवं रहस्यमयी कृति है जिसके आन्तरिक मन की पर्तों को जितना अधिक खोलते हैं, उसके आगे एक नवीन अध्याय दृष्टिगत होता है। अपने अनेक आकर्षणों के कारण नारी साहित्य का केन्द्र बिन्दु रही है। प्राचीन समय में स्त्री शिक्षा को  भले ही महत्वहीन समझा जाता रहा हो, परन्तु वर्तमान समय में इसे विशेष महत्व दिया जाने लगा है। शिक्षा के बल पर आज की स्त्री आवश्यकता पड़ने पर घर की चाहरदीवारी की कैद से निकलकर स्वतंत्र हो सकी है, उत्पीड़ित होने पर प्रतिशोध कर सकती है। उचित निर्णय लेकर उचित कदम उठाकर आत्मरक्षा कर सकती है। 
गोविन्द मिश्र जी का कथा साहित्य अधिकांश नारी केन्द्रित है। मिश्र जी का क्षेत्र शिक्षा जगत होने के कारण उनके अधिकांश नारीपात्र-बुद्धिजीवी हैं। मिश्र जी के नारी पात्र अन्तद्र्वन्द्व से घिरे कुण्ठित एवं असहाय तथा कहीं पर परम्परागत रूप दृष्टिगत हुआ है किन्तु अधिकांश नारी-पात्र किसी भी स्थिति में पुरुष की दासता सहने को तैयार नहीं हैं, भले ही उसे उसका कितना भी बड़़ा मूल्य क्यों न चुकाना पड़े। मिश्र जी ने नारी के विविध रूपों को जीवन की सच्चाई के साथ रूपांकित किया है।
नारी का परम्परागत रूप:- 
 गोविन्द मिश्र जी के कथा साहित्य में अन्य कथाकारों की अपेक्षा अधिकांशतः नारी मूल विषयक के केन्द्र में रहती है। नारी के जिस जीवन संघर्ष को उन्होंने समाज में देखा और अनुभव किया, उसे कथापात्रों के माध्यम से साहित्य में व्यक्त किया है। उनके उपन्यासों एवं कहानियों में नारी पारिवारिक मूल्यों को जोड़ने के लिए प्रयासरत है तो कहीं माता-पिता के विस्मृत होते अस्तित्व को सम्भालने के प्रयास में स्वयं टूटती तथा स्वयं को सम्बल देती दृष्टव्य होती है। यह परम्परागत नारी अपने पूर्ण सहयोग तथा सामथ्र्य से समाज को टूटने से बचा रही है। कभी ममतामयी माँ के रूप में, कभी आदर्श पत्नी के रूप में विवाह-संस्था को बनाये हुए हैं, जहाँ व्यक्ति को आर्थिक दंश तोड़ने का प्रयास करते हैं। वहाँ मिश्र जी की नारी बहुत कुछ झेलते हुए भी परिवार  को बिखरने नहीं देती। ‘‘पाँच आँगनों वाला घर’’ की जोगेश्वरी पति द्वारा प्रताड़ित एवं अपमानित होने पर भी अपने पत्नीत्व की सार्थकता परिवार व पति के समर्पण में पाती है। ‘‘माँ ने कैसे पग-पग पर पिता द्वारा दी गई यातनाएँ झेली, उनकी कमियों के एवज में अपने भीतर नई-नई खूबियाँ उभारीं। पिता उस समय के थे जब औरत को पीटना मामूली बात थी। माँ बडे़ घर की थीं........ इसलिए होशोहवास में तो पिता हिचककर रह जाते, पर नशे में हुए तो भीतर से कमरा बन्द कर पूरी कसर निकाल लेते...... जिस तरह माँ सांसारिक जीवन में उन्हें दबाकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं। माँ के सामने एक ही जोरदार इच्छा थी-उनका घर बड़ा होना है-पैसे से, परिवार से।.............. उन्होंने अपने उद्देश्य के लिए जब जरूरत हुई, अपने पति को भी एक किनारे सरका दिया।’’1
 पति के आकस्मिक दिवंगत हो जाने पर शोक व्यक्त करने का समय जोगेश्वरी के पास नहीं था। वह तटस्थ होकर उचित निर्णय लेना जानती थी। उसने बड़े बेटे राधे लाल को पिता की जगह गृहस्थी के लिए तैयार कर लिया था। जोगेश्वरी परिवार के प्रति समर्पित रहती है, ‘‘माँ को इतनी फुर्सत नहीं थी, वे पिता के असमय निधन के दुःख में घुलतीं। उन्होंने पिता की जगह तैयार करना शुरू किया राधेलाल को। जब तक राधेलाल को कुछ पता चलता ......... वे एक बड़ी गृहस्थी के स्वामी वाले साँचे में फिट किए जा चुके थे।’’2
 वर्तमान में जहाँ पारिवारिक रिश्ते क्षीण होते जा रहे हैं, वहाँ सामाजिक सम्बन्धों को बनाये रखने के लिए प्रयासरत ‘लहर’ कहानी की रश्मि तब अपने आत्मविश्वास को डिगा देती है, जब उसे पता चलता है कि उसे इस गृहस्थी को सम्भालना है। वह आत्मनिर्भर होते हुए भी पुरुष प्रधान समाज की दृष्टि में एक गृहणी है, ‘‘पुरुष प्रधान समाज उसे अपनी सोच के लायक रखता ही कहाँ है। कैसी सभ्य-सम्य मार पड़ती है उस पर। हमारी ये बड़ी-बड़ी बातें कैसी गुलामी में जकड़कर रख देती हैं उसे। एक बार विवाह हो गया तो लड़की लाख पढ़ी-लिखी हो, कमाऊ हो, आत्म निर्भर हो, सबसे पहले वह गृहस्थिन है, जिसे पति, घर और बच्चों के लिए होम होना ही है। उसकी अपनी जिन्दगी कुछ नहीं।’’3 अशिक्षा, अज्ञानता और अधीनता के अंधकार युग से शिक्षा, जागृति और समानता के प्रकाश पंुंज में आने के पश्चात् भी नारी स्वयं को शोषित तथा अस्तित्वहीन समझने के लिए विवश होती है। रश्मि वैवाहिक जीवन में सामंजस्य करती हुई चलती है। कभी-कभी वह अपने स्त्री होने पर भी दुःख व्यक्त करती है ‘‘अपना स्त्री होना खराब लगता है..... मैंने खुद को क्या बना डाला है। कभी-कभी लगता है जैसे मैं हूँ ही नहीं....... लता हूँ, हवा का कोई गड्ढा हूँ।’’4 यहाँ नारी पात्र भारतीय संस्कारों से युक्त एवं सामाजिक मान्यताओं को स्वीकार करते चलते हैं, परन्तु आधुनिक एवं पाश्चात्य प्रभावों को अलग नहीं कर सकते।
विद्रोहिणी नारी:-
 आधुनिक भारतीय नारी पुरुष के साथ अर्थोपार्जन के लिए कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। वह दोहरी भूमिका निभाते हुए अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। वह स्वयं क्यों पुरुष का उत्पीड़न, शोषण, अत्याचार तथा बन्धन सहे? नारी अपने बढ़ते कदमों में आने वाली बेड़ियों के रूप में संस्कार एवं परम्पराओं को तोड़ने में कतई संकोच नहीं करती और न ही किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए विवश होती है। मिश्र जी ने नारी का विद्रोही पक्ष अपने साहित्य में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने आज की नारी के विविध रूपों को उसकी अच्छाईयों, बुराइयों एवं कमजोरियों के साथ चित्रित करने का प्रयास किया है। ‘‘धूल पौधों पर’’ उपन्यास की नायिका में अपने पति के साथ हर कदम पर सामंजस्य करना चाहती है, परन्तु उसके ससुराल वाले उसे एक समान की तरह समझते हैं। जिस तरह वह प्रोफेसर प्रेमप्रकाश से कहती है कि ‘‘मैं कोई चीज हूँ, जानवर हूँ या पत्नी हूँ तो इसलिए मनुष्य भी नहीं हूँ? मेरी इच्छा-अनिच्छा कुछ नहीं....... रात भर उसने मुझे एक जबर कुत्ते की तरह चींधा.... मेरे शरीर का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा..... यहाँ तक कि मेरे बाल खींचे, जबरदस्ती मेरे कपड़े उतार फेंके, छाती पर नाखूनों से लकीरें खींच दीं, इधर-उधर कहीं भी दाँत गड़ाये। रात भर मुझे रौंदता रहा......।।’’5 ‘मैं’ के मन में विद्रोह चलता रहता है, विद्रोह की ज्वाला में वह प्रतिदिन जलती रहती है। उसको समझ नहीं आता कि वह क्या करे? समाज के बन्धनों में वह इस तरह बंधी हुई है कि कितना भी विद्रोह करे मगर निकलने में असफल रहती है।
 नारी की स्वतंत्रता और समानता के बाधित होन का एक पक्ष यह भी है कि नारी ही नारी की समता में सबसे बड़ा अवरोध है। घर में जब बेटी का जन्म होता है तो उसके लिए अलग संस्कार और नियम होते हैं तथा बेटे के जन्मोत्सव पर संस्कार और विधान अलग होते हैं। समाज में नारी असमानता की शिकार होती है जिसे पुरुष वर्ग अपने विधान की जंजीरों में जकड़ना चाहता है। मगर आज के समाज में स्त्री ही स्त्री की स्वतंत्रता में बाधक बनी हुई है। नारी जब नारी की प्रतिद्वन्द्वी होती है तो इसमें नारी का भी दोष नहीं है कि वह क्यों इस तरह नारी स्वतंत्रता को बाधित कर रही है। ‘खिलाफत’ उपन्यास एक इस्लामिक स्टेट की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें आयशा अन्द्राबी कैम्पेन चलाते समय स्त्रियों पर धर्म तथा संस्कारों का आरोपण करते हुए उनकी स्वतंत्रता पर रोक लगाने का प्रयास करती है ‘‘कोई मुल्क या तो मुस्लिम है या गैर मुस्लिम, तीसरी कोई चीज नहीं। उसने दुख्तरान-ए-मिल्लत चला रखी है। वह कश्मीर यूनिवर्सिटी से अरबी में पोस्ट ग्रेजुएट है, कश्मीर में बुर्का पहनने के लिए कैम्पेन चला रही है-जो औरत बिना बुर्का नजर आयी, उसके मुँह पर कालिख पोत देती हैं। काम पर जाने वाली औरतों के पीछे पड़ जाती हैं कि वे काम पर न जायें, औरतों का काम है घर पर रहना। औरतों में आजाद-ख्याली के एकदम खिलाफ हैं।’’6
 वर्तमान की नारी के पास दूसरों के विषय में सोचने का समय नहीं है। वह स्वयं के सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए इतनी दूर आ गयी है कि अपने लिए भी अपरिचित सी हो गई है। इस अपरिचय बोध की इतनी अधिकता बढ़ गयी है कि मानवीय सम्बन्धों की मिठास अब दृष्टिगत नहीं होती। 
कुण्ठित नारी:- 
 नारी की भावुकता, कोमलता, ममता और सहनता मूलभूत प्रकृति है। आधुनिक परिवेश में नारी के यहीं गुण समाज के मूलाधार हैं जिस पर वह टिका है। मिश्र जी ने नारी के भावुक रूप को अभिव्यक्त किया है। ‘तुम हो’ कहानी की सुषमा को जब उसके पिता उसके ससुराल वालों पर दहेज का झूठा आरोप लगाकर अपने घर ले आते हैं। तब सुषमा के पिता के दबाव में आकर भावनाओं को मन में समेटने के लिए विवश होती है। फिर भी न जाने क्यों उसका मन ससुराल पक्ष की ओर जाता है। वह अपने पिता के चंगुल में फंस गई थी, वहाँ से निकलने में वह असफल हो जाती है और भावुकता की ओट में निरन्तर कुण्ठित होती जाती है। वह सोचती है, ‘‘उसके बारे में क्या सोचती होगी सास या ननद! जिसके लिए उन्होंने क्या-क्या किया, वह यह कह रही हैं। ऐसा झूठ! क्या छवि बनी होगी सुषमा की वहाँ! यहाँ किसी से यह कहो तो कहेंगे अब कौन सी छवि! वहाँ किसी के सोचने-ओचने का क्या, पागल हो क्या? तुम अब तो वहाँ जाने से रहीं। रहने की बात तो और दूर की ......... तो तुम्हें क्या मतलब?’’7 सुषमा मानसिक दबावों से मुक्ति और अपने स्वतंत्र अस्तित्व की स्थापना का पूरा प्रयास करती है। वह पहले मूक-सी बनी रहती है। उसे लगता है कि वह असहनीय है। वह स्वयं निर्णय करने में अक्षम-सा महसूस करती है तथा स्वयं पिता और पति के निर्देशों का अनुसरण करती है। मगर जब वह यथार्थ की दृष्टि से दोनों के पक्षों का मूल्यांकन करती है क्योंकि पिता उसके पति पर दहेज का आरोप लगाते हैं। जिसका समर्थन सुषमा नहीं करती और कुण्ठा की ज्वाला से निकलकर वह पिता के समक्ष अपना पक्ष रखती है, ‘‘मेरे ब्याह में जो खर्चा हुआ, वह निकल आया, उससे ज्यादा ही। आगे हम उनसे कुछ नहीं लेंगे। रघु को छोड़कर बाकी सबने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया। रघु ने एक बड़ी कृपा की कि मुझे छुआ तक नहीं। जिस झूठ को लेकर हम लड़ रहे हैं, उसे मैं और नहीं खींच सकूँगी। अब यह लड़ाई बन्द करिए। मैं पुलिस में कोई शिकायत नहीं करूँगी। आप और रघु के पिता हट जाइए। रघु और मैं आपसी रजामंदी से तलाक ले लेंगे-साधारण तलाक।’’8 सुषमा अनेक विरोध तथा कुण्ठाओं के बावजूद अपने पिता का विरोध करती है। साधिकार स्वतंत्र रूप से रहना चाहती है। वह अवरोध सहन नहीं कर सकती। अपने निर्णयों पर दूसरों का हस्तक्षेप उसे अस्वीकार-सा प्रतीत होता है, ‘‘पहली बार उसने पिता से साधिकार कुछ कहा। अधिकार अपना, अपने होने का। खामोशी की अदृश्य डोर अपने पिता के चेहरे को किसी तरफ खींच रही थी। सुषमा उनके क्रोध झेलने को तैयार थी।’’9
 आधुनिक नारी पुरुष के साथ प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में उतर पड़ी है। वह पुरुष के साथ  केवल भावनात्मक रूप से जुड़ी है अपितु प्रतिस्पर्धा ने उसे पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने पर विवश किया है। पुरुष सत्ता समाज से मिलने वाले शोषण, उत्पीड़न और बन्धन के विरुद्ध लड़ने का वह साहस करती है। आज पुरुष की भोग्या बनकर जीने वाली स्त्रियों की संख्या कम होती जा रही है। ‘तुम्हारी रोशनी में’ उपन्यास में सुवर्णा नामक विवाहित स्त्री की कहानी है। वह अपने पति रमेश की युवा सोच और सहयोग के कारण पूर्ण स्वतंत्र ढंग से रहती है। वह नौकरी करने के बावजूद घर और बच्चों के प्रति न सिर्फ यह कि वह उदासीन नहीं है, इस मोर्चे पर भी वह अपनी सफलता के प्रति सजग रहती है। वह प्रतिस्पर्धा में कहती भी है, ‘‘गृहस्थिन होना गर्व की बात है मेरे लिए.....। यहाँ भी अपना काम मुझे उतना ही अच्छा लगता है जितना दफ्तार का काम। जैसे मैं दफ्तर में सफल होना चाहती हूँ वैसे ही घर में भी। वहाँ मैं किसी आदमी से पिछड़ी नहीं रहना चाहती, यहाँ किसी औरत से नहीं।’’10 सुवर्णा जब मोहन के साथ पिकनिक पर जाती है तब रमेश उसके साथ अनैतिक व्यवहार करता है, साथ ही उस पर पति के अधिकार का आरोपण लाद देता है कि वह उससे बिना पूछे किसी से नहीं मिलेगी। वह उस पर भावनात्मक हमला ही नहीं, अपितु शारीरिक यातना भी देता है। गाली-गलौज और मारपीट के साथ वह उसके संवेदनात्मक अंग रूपी बच्चों और उसके बीच दीवार खड़ी करने का प्रयास करता है। वह इस नीति को अपनाकर उसे झुकाना चाहता है, मगर वह तटस्थ होकर उत्तर देती है, ‘‘मैं यह नहीं मानती कि सिर्फ इसलिए कि तुम मेरे पति हो, तुम यह तय करो कि मैं इससे मिलूँ, उससे न मिलूँ। बात तीन चार आदमियांे की नहीं है, उस स्वतंत्रता की है जो ईश्वर ने मुझे दी है और जिसे तुम हड़प लेना चाहते हो...... पर बहस की क्या जरूरत....... तुम इन लोगों से मिलने की बात मान भी लो तब भी मेरा फैसला वही रहेगा।’’11
 सामाजिक, आर्थिक परिवेश ने जब भी पुरुष को कमजोर किया है तब उसने नारी के प्रेमपूर्ण आँचल में ही आश्रय लिया है। मिश्र जी के साहित्य में नारी जहाँ दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करती है, वहाँ वह पति की सहयोगिनी बनकर हर कदम पर उसके साथ खड़ी रहती है। ‘पाँच आँगनों वाला घर’’ की ओमी पति का अनुसरण करती हुई चलती है। पति ठीक करता है या गलत, सभी कार्यों में उसके कदम से कदम मिलाकर चलती है। ‘‘जब-जब वे ओमी को देखते हैं। यह स्त्री जिसको उन्होंने अपने प्रभावी व्यक्तित्व के सहारे अपने सिद्धान्तों पर चलने को मजबूर किया..... उसकी कितनी इच्छाएँ, आकांक्षाएँ दबी रह गई... क्या यह करने का अधिकार मोहन को था? मोहन की तरह वह भी पीछे मुड़कर देखती होगी...... जीवन में उसके प्राप्ति? बस पति का अनुसरण किया, पति ठीक था या गलत पता नहीं....... अनुसरण ही जीवन।’’12
 विविध आयामों की ओर बढ़ती हुई नारी के संघर्षों से आकर्षित होकर मिश्र जी ने उसके अनेक रूपों को चित्रित किया है। नारी के ये रूप यदि मन के परम्परागत मूल्यों तथा संस्कारों को सहलाते हैं तो कहीं पर गहरे आघात करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। परिवर्तित परिवेश एवं मूल्यों से प्रभावित नारी विभिन्न स्थानों पर नये रूप में द्रष्टव्य होती है।
उपसंहार:-
 नारी के बिना पुरुष अस्तित्व शून्य है। पुरुष जब निसहाय हुआ है, तभी उसे नारी ने सम्बल दिया है। मिश्र जी के साहित्य में नारी के विविध रूप अनेक कोणों से रूपायित होते हैं। विविध आयामों की ओर अग्रसर होती नारी से प्रभावित होकर मिश्र जी ने उसके विविध रूपों का अति सूक्ष्मांकन किया है। नारी के ये रूप एक ओर हृदय के परम्परागत संस्कारों को सहलाते हैं तो दूसरी ओर तटस्थ होकर परिवर्तन की चाह में उन्हें तोड़ने को विवश भी होते हैं। परिवर्तित परिवेश एवं मूल्यों से प्रभावित नारी अनेक स्थानों पर नवीन रूपों में दृष्टिगत होती है। 

सन्दर्भ सूची:- 
1  पाँचों आँगनों वाला घर, गोविन्द मिश्र, पृ0 28
2  पाँचों आँगनों वाला घर, गोविन्द मिश्र, पृ0 28-29
3  ‘लहर’ कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 148
4  ‘लहर’ कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 149
5  ‘धूल पौधों पर’, गोविन्द मिश्र, पृ0 23
6  ‘खिलाफत’ गोविन्द मिश्र, पृ0 141
7  ‘तुम हो! कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 253-254
8  ‘तुम हो! कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 256
9  ‘तुम हो! कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 256
10  ‘तुम्हारी रोशनी में’ गोविन्द मिश्र, पृ0 20
11. ‘तुम्हारी रोशनी में’ गोविन्द मिश्र, पृ0 149
12. पाँचों आँगनों वाला घर, गोविन्द मिश्र, पृ0 158


Friday, March 13, 2020

शोध कार्यों में साहित्यिक चोरी : कारण और निवारण


डॉ. मुकेश कुमार


एसोसिएट प्रोफ़ेसर, वनस्पतिविज्ञान विभाग, साहू जैन कॉलेज, नजीबाबाद (बिजनौर) उ.प्र.


 


साहित्यिक चोरी का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। लगभग 2000 पूर्व, सन 80 में रोमन कवि मार्शल ने आरोप लगाया था कि उनकी कविताओं को अन्य व्यक्तियों ने अपने नाम से सुनाया था। रोमन कानून में इस प्रकार के कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए ‘साहित्य चोर’ शब्द का उपयोग किया गया था। अंग्रेजी भाषा के ‘प्लेगेरिज्म’ शब्द का शाब्दिक अर्थ भी ‘साहित्यिक चोरी’ ही है। साहित्यिक अथवा वैज्ञानिक जानकारियों के आदान-प्रदान और प्रकाशन की परंपरा सदियों से चली आ रही है किंतु कई दशकों से प्रकाशन को अकादमिक प्रतिष्ठा, पदोन्नति एवं वित्त पोषण से जोड़ दिए जाने के कारण सम्बंधित व्यक्तिओं में अधिकाधिक प्रकाशन करने की होड़ मच गई है। वह कम समय में, कम परिश्रम करके अधिक से अधिक प्रकाशन करना चाहते हैं। कोई भी वैज्ञानिक जानकारी शोध पत्र के रूप में प्रकाशित की जाती है। वैज्ञानिकों अथवा साहित्यकारों द्वारा कठिन परिश्रम से किए गए अपने कार्य को विभिन्न शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित कराना शोध की एक स्वस्थ एवं महत्वपूर्ण परंपरा है। किंतु कुछ व्यक्ति बिना परिश्रम किए ही प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहते हैं ऐसे में वे अन्य व्यक्तियों द्वारा किए गए समवर्ती कार्य को अपने नाम से प्रकाशित कराने  में सफल हो जाते हैं। ऐसा करना किसी चोरी से कम नहीं है क्योंकि चोरी चाहे धन की हो, वस्तु की हो अथवा किसी के ज्ञान और परिश्रम की, वह चोरी ही कहलाएगी।


 आजकल, उच्च शिक्षा में संलग्न शिक्षकों तथा शोध संस्थानों में कार्यरत वैज्ञानिकों की अकादमिक प्रगति के लिए शोध पत्र प्रकाशन आवश्यक हो गया है जिसके कारण शोध प्रकाशन प्रक्रिया के प्रतिमान बदल गए हैं। कुछ व्यक्ति कम समय तथा कम परिश्रम अपनी व्यवसायिक आकांक्षाओं की पूर्ति करना चाहते हैं जिसके लिए वे विभिन्न प्रकार हथकंडे अपनाते हैं, अन्य क्षेत्रों के व्यक्तियों के प्रकाशित कार्यों की नक़ल करके अपने नाम से प्रकाशित करा लेते हैं। इस प्रकार की मिथ्याकांक्षा और कपटी कार्यों से वैज्ञानिक अनुसंधान एवं प्रकाशन में कदाचार का क्षरण हुआ है और वैज्ञानिक समुदाय की बदनामी। अमेरिका स्थित ‘रिसर्च इंटीग्रिटी कार्यालय’ के अनुसार अनुसंधान धोखाधड़ी अपराध के तीन प्रमुख घटक हैं, मिथ्याकरण, निर्माण और साहित्यिक चोरी। दूसरे के पाठ्य की नकल करना ‘बौद्धिक संपदा की चोरी’ की श्रेणी में आता है जो एक अनैतिक, घ्रणास्पद और निंदनीय कार्य है।


उच्च शिक्षा/ शोध संस्थानों में कार्यरत व्यक्ति समयबद्ध प्रकाशन करने के दबाव में साहित्यिक चोरी की ओर अग्रसर होने लगे हैं। भारत में भी अकादमिक अथवा साहित्यिक चोरी तेजी से बढ़ रही है। शिक्षाविदों में वैज्ञानिक कदाचार से निपटने के लिए स्पष्ट नीतियां न होने के कारण अनुसंधान कदाचार में गिरावट का उदय हुआ है जो भारत की उच्च शिक्षा के विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। प्रकाशनों की संख्या को व्यक्ति की व्यवसायिक वृद्धि, अकादमिक प्रोन्नति और वेतन वृद्धि से जोड़ने के कारण अयोग्य व्यक्ति अन्य के कार्य को ज्यों का त्यों अथवा तोड़ मरोड़कर अपने नाम से प्रकाशित करने का प्रयत्न करने लगे हैं। पिछले दशकों में कुछ लेखकों के प्रकाशित पत्रों की संख्या में हुई नाटकीय वृद्धि इसका प्रमाण है। इस कार्य में न केवल लेखक बल्कि कुछ प्रकाशक भी बराबर के भागीदार हैं। नए प्रकाशकों ने भी कम गुणवत्ता के लेखों को प्रकाशित करना प्रारंभ कर दिया है। इसे प्रकाशक पांडुलिपियों को प्रकाशित करने के लिए लेखक से भारी भुगतान प्राप्त करते हैं। सर्वविदित है कि इस प्रकार की पत्रिकाओं में प्रकाशन का कोई वैज्ञानिक मूल्य नहीं है। यह प्रकाशन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अथवा अन्य स्वीकृत सूचकांकों में अनुक्रमणित नहीं होते। इनमें प्रकाशित पांडुलिपियों की कोई समीक्षा भी नहीं की जाती है और न ही उन्हें उद्धृत किया जाता है। इनमें प्रकाशन पूर्व अथवा प्रकाशन के बाद कोई जांच भी नहीं होती है। इस तरह के प्रकाशकों का उद्देश्य उद्देश्य अनुभवहीन शोधकर्ताओं को धोखा देना है। वहीं दूसरी ओर कुछ व्यक्ति भी बिना परिश्रम किये, पैसा खर्च करके, किसी अन्य के कार्य को अपने नाम से प्रकाशित कराने में सफल भी हो जाते हैं। यह कृत्य बौद्धिक संपदा का दुरुपयोग और चोरी की श्रेणी में आता है।


भारतीय नियमों के अनुसार सभी संस्थागत, स्वतंत्र समितियों तथा समीक्षा बोर्डों को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन के साथ पंजीकृत किया जाना आवश्यक है। किंतु निर्देशों की अनदेखी के कारण इनके कामकाज पर कोई नियंत्रण नहीं है। भारत में कुछ समितियां अच्छा कार्य भी कर रही हैं। अधिकांश वैज्ञानिक अनुसंधान साहित्यिक चोरी की जांच करने के पश्चात ही प्रकाशित किए जाते हैं। अभी भी भारत के अकादमिक क्षेत्र में अनुसंधान कदाचार से निपटने के लिए एक विकसित वैधानिक निकाय का अभाव है और अधिकतर प्रकरणों को तदर्थ रूप से ही निपटाया जाता है। भारतीय वैज्ञानिक समुदाय में नैतिकता बनाए रखने के लिए वैज्ञानिकों का एक स्वतंत्र निकाय है जिसे ‘सोसायटी फॉर साइंटिफिक वैल्यू’ के नाम से जाना जाता है किंतु इसके पास कानूनी शक्तियां नहीं है। यह तभी प्रभावी हो सकता है जब कोई विश्वविद्यालय इसे स्वीकार कर ले। वर्तमान में साहित्यिक चोरी के मामलों को अधिकतर संस्थाएं नजरअंदाज कर देती हैं अथवा इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। यही कारण है कि साहित्यिक चोरी करने वाले लोग निर्भीक होकर इस कार्य में लिप्त रहते हैं।


अकादमी कदाचार और साहित्यिक चोरी रोकने के लिए लेखकों में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों में पत्रिका संपादकों और युवा शोधकर्ताओं को शैक्षिक इमानदारी और अखंडता का पालन करने के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए। युवा शोधकर्ताओं को बेहतर केंद्रित प्रशिक्षण की आवश्यकता है उन्हें यह सिखाने की आवश्यकता है कि वैज्ञानिक रूप से अपने कार्य की अभिव्यक्ति कैसे करें? युवा शोधकर्ताओं और वैज्ञानिक लेखकों को अपने कैरियर की शुरूआत से ही सजग रहने और शैक्षिक चोरी के दुष्परिणामों की जानकारी दी जानी चाहिए। शोधार्थियों को भी अपना आत्मविश्वास बनाए रखकर वैज्ञानिक जिज्ञाषा के सिद्धांतों पर विश्वास करना चाहिए। भारत में ‘करंट साइंस’ के संपादक ने वर्ष 2006 से 2008 तक एक सर्वे किया और पाया कि साहित्यिक चोरी करने वाले 80% लेखकों में भाषा कौशल की कमी कमी थी जिसके कारण उन्होंने साहित्यिक चोरी की। पत्रिकाओं के संपादक साहित्यिक चोरी का पता लगाने की प्रथम कड़ी होते हैं किंतु वह भी सत्यता की जांच करने के लिए संसाधनों और विशेषज्ञता की कमी से जूझते हुए पाए जाते हैं। वैज्ञानिक साहित्य में मौलिकता बनाए रखने के लिए लेखकों, समीक्षकों और संपादकों की ओर से एक संयुक्त प्रयास की आवश्यकता है। यदि भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अपनी वैश्विक पहचान बनाना चाहता है तो हमारे वैज्ञानिकों को अनुसंधान की अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता और अखंडता को प्राप्त करना ही होगा जो वर्तमान में बहुत निचले स्तर पर है। अकादमिक अखंडता हेतु वैज्ञानिक समुदाय को गंभीरता से विचार करना होगा। साहित्यिक चोरी रोकने के लिए स्पष्ट मापदंडों, दिशा निर्देशों और आचार संहिता को विकसित करना होगा।


दुनिया भर में साहित्यिक चोरी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारतीय लेखकों द्वारा साहित्यिक चोरी से किये गए प्रकाशनों की औसत वृद्धि की पहचान करने के लिए सन 2002 से 2016 की अवधि में एक अध्ययन किया गया। जिसके अनुसार एकल प्रकाशनों में, बहु लेखक प्रकाशनों की अपेक्षा अधिक साहित्यिक चोरी पाई गई। यह भी देखा गया कि वर्ष दर वर्ष बहुलेखक सहयोग वाले वैज्ञानिक कार्यों में सुधार हुआ। ‘नेचर’ जनरल में प्रकाशित एक अध्ययन के माध्यम से बताया गया कि विश्वविद्यालय अनुसंधान में साहित्यिक चोरी को प्रोत्साहित करने वालों से कैसे निपटा जाए। चीन के प्रमुख छह विश्वविद्यालयों के 6000 शोधकर्ताओं को अकादमिक कदाचारों के लिए सख्त कानूनी कार्यवाही के लिए बाध्य किया गया था। ऑस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालयों में साहित्यिक चोरी रोकने की नीति के अंतर्गत एशिया और विशेष रूप से चीन, भारत, दक्षिण कोरिया और जापान से आने वाले छात्रों के लेखन में साहित्यिक चोरी का पता लगाने की कोशिश की गई। परिणाम स्वरुप पाया गया कि इन देशों के प्रशिक्षु लेखन में साहित्यिक चोरी को बढ़ावा देते हैं। क्योंकि भारत, लेटिन अमेरिका, अफ्रीका और मध्य पूर्व, अन्य क्षेत्रों की तुलना में साहित्यिक चोरी के विषय में कम चिंतित हैं।


कुछ सालों पहले भारत सरकार भारत कम अनुसंधान उत्पादन के विषय में चिंतित थी। भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत शिक्षकों की प्रोन्नति के नियमों में संशोधन किया गया जो मुख्य रूप से प्रकाशनों की संख्या पर आधारित है। इस निर्णय के कारण शिक्षक अथवा वैज्ञानिक किसी भी प्रकार से प्रकाशनों की संख्या बढ़ाने में लग गए। कई प्रकरणों में अकादमी कदाचार और सांस्कृतिक चोरी भी सामने आई। अब भारत में शोध प्रकाशनों की संख्या कैरियर की उन्नति और संवर्धन का महत्वपूर्ण घटक है किन्तु उचित पालिसी के अभाव में सांस्कृतिक चोरी को प्रोत्साहन मिलता है। एक अध्ययन में दिलचस्प बात सामने आई कि जो लेखक पहले वाले के बाद पेपर लिखते हैं वह कम दक्ष होते हैं क्योंकि वह प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित नहीं कर पाते। साहित्यिक चोरी गंभीर मामला है और शोधकर्ताओं को उनके द्वारा प्रकाशित सभी कार्यों को स्वीकार करना चाहिए तथा प्रकाशन में उचित सावधानी भी बरतनी चाहिए।


सौभाग्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग नई दिल्ली की पहल पर पूरे देश में साहित्यिक चोरी पर लगाम लगाने के लिए कार्य योजना तैयार कर ली गई है। जिसके अंतर्गत कोई भी शोधार्थी अपना शोध प्रबंध तब तक विश्वविद्यालय में जमा नहीं कर सकता है जब तक की वह साहित्यिक चोरी न किए जाने का प्रमाण पत्र विश्वविद्यालय में जमा न कर दे। इस कार्य के लिए प्रत्येक विश्वविद्यालय, महाविद्यालय तथा शोध पर्यवेक्षक को एक विशिष्ट कंप्यूटर सॉफ्टवेयर उपलब्ध करा दिया गया है। आशा है कि अब विश्वविद्यालयों में साहित्यिक चोरी रहित शोध प्रबंध जमा हो सकेंगे और शोध के क्षेत्र में हमारे देश की छवि में सुधार हो पाएगा। यह भी एक विडंबना ही है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने छात्रों, शिक्षकों अथवा वैज्ञानिकों को केवल एक विशिष्ट सूची में अंकित जर्नल में ही शोध पत्र प्रकाशित करने की अनुशंसा की है। हमारे देश में ख्याति प्राप्त अधिकतर जनरल इस सूची में अंकित नहीं है। ऐसी स्थिति में, शोधकर्ताओं द्वारा इस सूची के प्रकाशन से पूर्व प्रकाशित किए गए शोध पत्रों की गुणवत्ता पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा स्वीकृत सूची में अंकित जर्नल के संपादकों ने शोध पत्र प्रकाशन शुल्क में कई गुना वृद्धि कर दी है। इन पत्रिकाओं की वार्षिक और आजन्म सदस्यता शुल्क में भी कई गुणा वृद्धि कर दी गई है, जो चिंता का विषय है। ऐसी स्थिति में शोधकर्ता इन्हीं पत्रिकाओं में प्रकाशन हेतु बाध्य हैं। साथ ही साथ, भारत में प्रकाशित होने वाली अनेक पत्रिकाओं को कोई प्रोत्साहन ना मिल पाने के कारण वह बंद होने के कगार पर हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को चाहिए कि वह देशी गुणवत्ता युक्त पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध पत्रों को भी उचित महत्व प्रदान करें। अब वैज्ञानिक पत्रिकाओं को साहित्यिक चोरी रोकने के प्रयास करने ही होंगे क्योंकि भारत सरकार कड़ाई से इस ओर प्रयत्नशील है तथा विशेषज्ञों द्वारा ‘प्लेजेरिज्म’ जांच हेतु सफल सॉफ्टवेयर भी बाज़ार में उपलब्ध करा दिए गए हैं। यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक समुदाय को स्वच्छ बनाने के लिए हम सभी योगदान दें।


 


Thursday, March 5, 2020

स्वतन्त्र होने की लड़ाई है-स्त्री विमर्श


प्रतिमा रानी
प्रवक्ता-हिन्दी
कृष्णा काॅलेज, बिजनौर


'नारीवाद’ शब्द की सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन कार्य हैं यह एक कठिन प्रश्न है राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के सोचने के तरीकों तथा उन विचारों की अभिव्यक्ति का है। स्त्री-विमर्श रूढ़ हो चुकी परम्पराओं, मान्यताओं के प्रति असंतोष तथा उससे मुक्ति पाने का स्वर है। स्त्री-विमर्श के द्वारा पितृक प्रतिमानों व सोचने की दृष्टि पर अनेक प्रश्नों द्वारा कुठाराघात करते हुए विश्व चिंतन में नई बहस को जन्म देता है।
 प्राचीन भारतीय समाज में स्त्री को देवी स्वरूप माना गया है। वैदिक काल में कहा भी गया है-
 ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते, तत्र रम्यते देवता’’ (वैदिक काल)
 परन्तु आम बोलचाल की भाषा में नारी को अबला ही कहा गया है। महान् साहित्यकारों ने भी नारी के अबला रूप को साहित्य में कुछ इस तरह वर्णित किया है।
  ‘‘हाय अबला तुम्हारी यही कहानी।’’
  आँचल में है दूध आँखों में पानी।। (मैथिलीशरण गुप्त)
 महादेवी वर्मा ने नारी को कुछ इस प्रकार दर्शाया है।
   ‘‘मैं नीर भरी दुःख की बदरी।’’
 ‘‘नारी-विमर्श को लेकर सदैव अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई पड़ता है। इंग्लैंड और अमेरिका में 19वीं शताब्दी में फेमिनिस्ट मूवमेंट के साथ नारी-विमर्श संघर्ष प्रारम्भ हुआ था। यह आन्दोलन लैंगिक समानता के साथ-साथ समाज में नारी को बराबर का दर्जा दिलाने के लिए किया गया था, जो राजनीति से होते हुए कला, साहित्य एवं संस्कृति तक जा पहुँचा था। तत्पश्चात् यह आन्दोलन विश्वव्यापी स्तर पर होते हुए भारत आ पहुँचा था।’’
 ‘‘नारी-विमर्श क्या है? पुरुष की दृष्टि में कहा जाए तो विमर्श का सम्बन्ध नारी-सौंदर्य, पहनावा, नारी उत्पीड़न, नारी का दुःख एवं कमजोरियों से होता है और नारी की नज़र में नारी-विमर्श का सम्बन्ध उसकी अपनी शक्तियों से परिचित करवाने से है।’’
  ‘‘गुंजन झाझरिया गुँज’’ (नारी-विमर्श के अर्थ निहितार्थ-2)
 इस प्रकार नारी विमर्श को लेकर पुरुषों ने भी अपने हृदय की अनुभूति को साहित्य में समय-समय पर उकेरा है।
स्त्री-विमर्श का भारतीय इतिहास
 वैदिक काल में नारी को पुरुषों के समाज में शिक्षा, धर्म, राजनीति, सम्पत्ति के अधिकार एवं अनेकों संस्कारों तथा अनुष्ठानों में शामिल होने की स्वतन्त्रता प्राप्त थी। परन्तु वैदिक काल के अन्तिम चरण में स्त्रियों की दशा बिगड़नी प्रारम्भ हो गयी। तत्पश्चात् बौ( काल में स्त्रियों की दशा में उतार-चढ़ाव काफी हुए, परन्तु मुस्लिम काल में भारत में मुगलों का आगमन होने के साथ-साथ स्त्रियों की दशा और खराब हो गयी। अंग्रेजी शासन काल के अन्तिम चरण में जब भारतीय अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ हो गए थे। भारत में अनेकों संघर्षों का प्रारम्भ हुआ। रमाबाई जैसी स्त्रियों को धर्म परिवर्तन भी करना पड़ा।
 1908 में लेडिज कांग्रेस का गठन हुआ तथा 1917 में विमेंस इण्डिया एसोसिएशन का गठन हुआ। सरला देवी ने विधवाओं की शिक्षा तथा उनके अधिकारों के लिए लड़ाईयाँ लड़ीं। पुरुषों में राजाराम मोहन राय ने समाज में विधवा महिलाओं की दशाओं को सुधारने का अथक प्रयास करते हुए सती-प्रथा पर रोक लगवाई। वहीं दयानन्द सरस्वती जी ने भी स्त्रियों की शिक्षा पर जोर देते हुए विधवा-विवाह पर बल दिया।
 इस समय स्त्रियों ने दोहरी लड़ाईयाँ लड़ीं। एक ओर उपनिवेशवादी ताकतों के साथ दूसरी अपने घर में नियति निर्धारित करने वाली पुरुषवादी सोच के साथ। स्त्री का संदेश स्त्रियों के हक में न्याय तथा तमाम मांगों से जुड़ा था, जिसके लिए काशीबाई कानितकर, आनंदीबाई, गोदावरी समस्कर, पार्वतीबाई, सरलाबाई जैसे अनेकों नारियों ने संघर्ष किया।
 भारतीय महिलाओं को शरीर ढकने तक के लिए लड़ाईयाँ लड़नी पड़ी हैं। दक्षिण भारत के कुछ हिस्से  ऐसे थे, जहाँ स्त्रियों को ऊपरी शरीर के भाग को ढकने की आजादी नहीं थी। इस भारतीय बहुस्तरीय समाज में स्त्री संघर्ष कैसे एक हो सकता है तथा स्त्री-विमर्श का पहलू भी एक कैसे हो सकता है।
 निर्विवाद रूप से भारतीय समाज में स्त्री की स्ाििति अन्तर्विरोधों से भरी पड़ी है। इसका विरोधाभास ऋग्वेद की ऋचाओं से ही प्रारम्भ हो जाता है। जहाँ कहीं पर स्त्रियों को अत्यन्त श्रेष्ठ तथा पूजनीय माना गया है तथा कहीं पर कामवासना का रूप मानते हुए मुक्ति में बाधक, त्यज्य तथा भोग्या वस्तु माना गया है।
साहित्य में स्त्री-विमर्श
 मध्यकालीन कवियों ने भी कवियों ने भी स्त्रियों को लेकर अन्तर्विरोधी उकित्याँ कही हैं। एक ओर तो कबीर, दादू, तुलसी, जायसी, सूर आदि ने मानुश जन्म को सर्वोपरि बताया है। परन्तु तुलसीदास जी ने स्त्री को प्रताड़ना/ताड़ना का अधिकारी भी कहा है।
   ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी।
   सकल ताड़ना के अधिकारी।।
 शेक्सपियर ने नारी के विषय में कहा है-
   ‘‘दुर्बलता तुम्हारा नाम ही नारी है।’’ 
 आदि कहकर नारी अस्तित्व को संकीर्ण बना दिया है।
 महादेवी वर्मा की कविताओं में वेदना का रूप अलग-अलग दिखाई दिया है-
 इसके अतिरिक्त जयशंकर प्रसाद ने नारी को श्रद्धा का पात्र बताते हुए कहा है-
    ‘‘नारी तुम श्रद्धा हो।
 नारी-विमर्श को साहित्य/कहानी/उपन्यास आदि के द्वारा पुरुषों ने भी अपनी कलम द्वारा कुछ इस प्रकार स्पष्ट किया है-
 कविवर सहाय जी के अनुसार-
   ‘‘नारी बेचारी है
   पुरुष की मारी
   तन से क्षुदित है
   लपककर झपककर
   अंत में चित्त है।’’ 
आधुनिक साहित्य में नारी-विमर्श
 आधुनिक साहित्य का चर्चित विषय नारी-विमर्श ही रहा है। सुशीला टांक भौरे के काव्य संग्रह स्वाति बूँद और खोर मोती तथा यह तुम जानों काफी चर्चित रहे हैं। इनका विद्रोही मन अपने भावों को कुछ इस प्रकार व्यक्त करता है। 
   माँ-बाप ने पैदा किया था गूँगा
   परिवेश ने लंगड़ा बना दिया
   चलती रही परिपाटी पर
   बैसाखियाँ चरमराती हैं
   अधिक बोझ से अकुलाकर
   विस्कारित मन हुँकारता है
   बैसाखियों को तोड़ दूँ।
 हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श मात्र पूर्वाग्रह या व्यक्तिगत या व्यक्तिगत विश्वासों तक ही सीमित नहीं है। उसके पीछे बहुत से आयाम हैं। कला साहित्य के हर विचारधारात्मक संघर्ष के पीछे समय परिस्थितियों तथा सामाजिक परिवर्तनों को ध्यान में रखकर लक्ष्य प्राप्त करना आवश्यक है।
 डाॅ. ज्योति किरण के अनुसार- इस समाज में जब स्त्रियाँ अपनी समझ तथा काबिलियत जाहिर करती है। वह कुलच्छनी मानी जाती है। खुद विवेक से काम करने पर र्मादाहीन कहलाती है। अपनी इच्छाओं, अरमानों को आत्मविश्वास से पूरा करते हुए जब लड़ती है तो परिवार व समाज के लिए चुनौती बन जाती है।
 आधुनिक साहित्य में सीमोन द बोउवार की ‘द सेकण्ड सेवन्स’ का हिन्दी अनुवाद कर प्रभा खेतान ने स्त्री-विमर्श की नींव तैयार की है। इन्हीं से प्रेरित होकर आधुनिक लेखिकाएँ स्त्री के प्रति समाज की मानसिकताओं व रूढ़ियों पर आधारित पारिवारिक बन्धनों से मुक्ति पाने की आकांक्षा में प्रयासरत दिखाई देती है।
 वर्तमान समय में स्त्री-शिक्षित तथा आत्म-निर्भर है तथा प्रत्येक क्षेत्र में अपना वर्चस्व दिखाकर लोहा मनवा रही है, परन्तु आज भी वह अनेकों प्रयास से संघर्ष कर रही है। निर्भया हत्याकाण्ड की घटना के बाद वर्मा कमेटी की रिपोर्ट ऐसे परिवर्तनों का परिणाम है। इन घटना के बाद होने वाले आन्दोलनों से सांस्कृतिक वर्चस्व के खिलाफ हुए संघर्षों का एक नया अध्याय है, जिसके परिणाम ने फरवरी 2020 को आना लगभग तय हुआ है। इसी तरह के अन्य मथुरा रेप केस माया त्यागी रेप केस, मनोरमा देवी रेप केस या 27 नवम्बर 2019 को हैदराबाद रेप केस पुरुषवादी सोच के विरोध में उठने वाला देशव्यापी छोटे से छोटा स्वर भी सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रतिरोध स्वरूप माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
 नारी-विमर्श की इस कड़ी को देखा जाए तो नारी आदिकाल से ही द्वन्दात्मक परिवेश से होकर गुजरी है, जहाँ एक ओर नारी को देवी माना है तथा दूसरी ओर योग्य वस्तु। पुरुष प्रधान समाज में मर्यादा की आड़ में कभी देवी बनाकर, कभी चाहरदीवार में बाँधकर, कभी सीमा रेखा बनाकर अपना आधिपत्य बनाना चाहता है।
 आज के परिदृश्य में स्त्री समस्त क्षेत्रों में पूर्ण रूप से अपना स्वतन्त्र स्थान बना चुकी है। 
 वर्तमान समय में स्त्री, पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर अपना योगदान दे रही है। अंतरिक्ष में कल्पना चावला एवं सुमीता विलियम्स, राजनीति में सुषमा स्वराज, इन्दिरा गाँधी, प्रतिभा देवी पाटिल आदि। लेखिका के रूप में अंरुधति राय, तस्लीमा नसरीन आदि आई.पी.एस. किरण बेदी, मुक्केबाजी में मेरीकाॅम, पीटी उषा मैडम, चन्दा कोचर उद्योग तथा बैंकिंग, सुनीता नारायण पर्यावरणविद, मेघा पाटकर (नर्मदा घाटी की आवाज), सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, सिने जगत माधुरी दीक्षित, एकता कपूर आदि अनेक सहस्रों नारियाँ हैं जो आज भी देशों में ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपना तथा अपने देश को गौरवान्वित कराने के लिए प्रयासरत हैं।
 भारतीय समाज पितृसत्तात्मक तथा स्तरीय समाज हैं। जहाँ स्त्रियों की स्थिति में सदैव परिवर्तन होता रहता है। इसी पितृसत्तात्मक समाज में बन्धनों रूपी बेड़ियों से स्वतन्त्र होने की लड़ाई है-स्त्री विमर्श।


सन्दर्भ ग्रन्थ
आजकल- मार्च 2013-पृष्ठ 20
पंचशील-शोधसमीक्षा-पृष्ठ 82
आजकल-मार्च 2013-पृष्ठ 20
आजकल-मार्च 2011-पृष्ठ 25
पंचशील-शोध समीक्षा-पृष्ठ 61,87
भारत में स्त्रीधन और स्त्री संधर्ष इतिहास के झरोखे से 02 फरवरी 2017 से
स्त्री-विमर्श का भारतीय आइना- जनसत्ता 08 मार्च 2016
Www.hindi kunj.com तथा स्त्री विमर्श का भारतीय
आइना- डा.धर्मेन्द्र कुमार ‘‘ भारत में शिक्षा व्यवस्था का विकास, आर.लाल पब्लिकेशन
https://www.Jansatta.com
https://Vishwahindijan.blogspot.com
https://Stervimassh.biog.spst.com
स्त्री विमर्श और हिन्दी स्त्री लेखन
सरोकार की मीडिया-10फरवरी 2012


Friday, February 28, 2020

अंतिम दशक की हिंदी कविता और स्त्री


स्वाति


किसी भी काल का साहित्‍य अपने समाज और परिवेश से कटकर नहीं रह सकता। साहित्य की प्रत्‍येक काल विशेष की रचनाओं में हम उस काल विशेष की सामाजिक स्थिति, परिवेश एवं उस परिवेश में रहने वाले लोगों की इच्‍छाओं एवं आकांक्षाओं को अभिव्‍यक्ति होते पाते हैं। कविता मनुष्य की अनुभूतियों को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करने का माध्यम है। कविता के माध्यम से कवि समाज में निहित सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं व विडंबनाओं पर प्रहार करने में सक्षम होता है। बात अगर स्त्री की कि जाए तो आदिकाल से वर्तमान युग तक की कविताओं में स्त्री अपनी उपस्थिती दर्ज कराती आयी है। फर्क सिर्फ यह है की पहले स्त्रियाँ पुरुषों की कविताओं मे दिखाई देती थी,अब खुद अपनी कविताएँ रचती हैं इतना ही नहीं अपने आत्मसम्मान एवं अस्मिता को पाने में निरंतर प्रयासरत हैं।
प्रत्येक काल में स्त्रियों को देखने की दृष्टियाँ अलग-अलग रही हैं जैसे-भक्तिकाल में स्त्री को माया, ठगिनी के रूप में प्रस्तुत किया जाता था या मोक्ष के मार्ग में बाधा के रूप में वहीं आदिकाल में स्त्रियों को पाने के लिए किस प्रकार युद्ध होते थे उनका वर्णन हमें देखने को मिलता है व रीतिकाल में स्त्री देह के मांसल सौंदर्य के अलग-अलग दृश्य दिखने को मिलते हैं। आधुनिक काल और उसमें भी नई कविता में सबसे अधिक स्त्री के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव दिखाई दिया जिसके चलते “अस्मिता की खोज” पर अधिक बल दिया गया। वहीं 1990 के बाद की कविता इन सभी परम्परागत परिपाटी को तोड़ती हुई स्त्री पराधीनता, यौन शोषण, उत्पीड़न तथा अन्य स्त्री संबंधी मुद्दों पर सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से तर्क करती दिखाई देती है। जैसे कात्यायनी की कविता ‘रात के संतरी की कविता’ में देखा जा सकता है-
“रात को/ठीक ग्यारह बजकर तैंतालिस मिनट पर
दिल्ली में जी.बी.रोड पर/एक स्त्री/ग्राहक पटा रही है
पलामू के एक कस्बे में/नीम उजाले में एक नीम-हकीम
एक स्त्री पर गर्भपात की/हर तरकीब आज़मा रहा है।
बंबई के एक रेस्त्रां में/नीली-गुलाबी रोशनी में थिरकती स्त्री ने
अपना आखरी कपड़ा उतार दिया है/और किसी घर में
ऐसा करने से पहले/एक स्त्री/लगन से रसोईघर में
काम समेट रही है/महाराजगंज के ईंट भट्टे में
झोंकी जा रही है एक रेज़ा मज़दूरिन /जरूरी इस्तेमाल के बाद...
नेल्सन मंडेला के देश में विश्वसुंदरी प्रतियोगिता के लिए
मंच सज रहा है”1


इस सम्पूर्ण कविता में आदि से अंत तक संवेदना को मूर्त करने के लिए जितने भी बिम्ब हैं,वे सभी स्त्री की भूमिकाओं से जुड़े हैं। स्त्री के इन सभी रूपों में हमें कहीं न कहीं स्त्री की विवशता दिखाई देती है, जहां एक ओर वह अपनी आजीविका के लिए जी. बी. रोड पे ग्राहक बुलाने के हर प्रयास कर रही है वहीं दूसरी ओर ग्रामीण जीवन से भी यह कविता हमें रु-ब-रु कराती है जहां एक स्त्री के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है लाज़मी है यह गर्भपात इसीलिए किया जा रहा है क्योंकि गर्भ में कन्या पल रही है। लेकिन चाह कर भी वह इसका विरोध नहीं कर पा रही । बंबई के रेस्त्रां में एक स्त्री आजीविका के लिए नाच गा कर अपने तन के कपड़े उतार रही है यह स्थिति अंतिम दशक में जन्मे भूमंडलीकरण की देन है जिसके चलते आज अलग-अलग तरीकों से स्त्री शोषण की शिकार बनाई जा रही है। भूमंडलीकरण के चलते स्त्री शोषण के तरीके बदल गए हैं। आज स्त्री स्वेच्छा से वो सब काम कर रही है जो पुरुषवादी समाज उससे कराना चाहता है जैसे – रेस्त्रां में कपड़े उतारकर नाचना, अश्लील विज्ञापन बनाना, वस्तु की तरह खुद को प्रॉडक्ट बनाने की होड में जुटे रहना इत्यादि । कवयित्री की दृष्टि से यू. पी. के एक जिले महाराजगंज में ईंट भट्टो में काम करने वाली बेबस मज़दूरिन की विवशता भी छिप नहीं सकी कवयित्री नें इस कविता के माध्यम से ग्रामीण ओर शहरी स्त्रियों के जीवन की हर विवशता को कम शब्दों में रेखांकित कर अधिक कहा है। यहाँ महानगरीय बोध, सत्ता, कला और स्त्री जीवन के विभिन्न रूपों को कात्यायनी ने एक साथ प्रकट करने का प्रयास किया है। इसी संदर्भ में मैनेजर पाण्डेय का मत दृष्टव्य है- “नई पीढ़ी की कविता में स्त्री कवियों की विशिष्ट रचना-दृष्टि के कारण उनकी अलग पहचान बनी है। उनमें कात्यायनी की दृष्टि की व्यापकता और तेजस्विता विशेष महत्वपूर्ण है। उनकी कविताओं में प्रखर राजनीतिक चेतना है और व्यापक सामाजिक चिंता भी।”2 इसी प्रकार अंतिम दशक की कविताओं में स्त्री की सामाजिक आत्मगाथा से लेकर आधुनिक बोध की नियति तक के यांत्रिक संकेत मिलते हैं। जब हम समाज की बात करते हैं तो सर्वप्रथम हमारी नज़र परिवार पर जाती है। परिवार समाज की इकाई के रूप में कार्य करता है। अंतिम दशक के कवि और कवयित्रियों ने अपनी कविताओं में पारिवारिक संरचना से लेकर आजादी के बाद हुए मोहभंग के कारण टूटते बिखरते परिवार में स्त्री के चित्र को बखूबी अपनी कविताओं में अंकित किया है। इतना ही नहीं समाज में व्याप्त रूढ़ियों, विडंबनाओं एवं त्रासदियों को भी अभिव्यक्त किया है। उदाहरण के रूप में चन्द्रकान्त देवताले की कविता ‘बेटी के घर से लौटना’ की पंक्तियाँ दृष्टव्य है-
“पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहते कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज”3


इन पंक्तियों के द्वारा हम भारतीय समाज में विद्यमान एक स्त्री की त्रासदी को अभिव्यक्त होते पाते हैं जहां वह अक्षम है अपने पिता को ससुराल में एक और दिन रोक पाने में। दरअसल हमने पूरी सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी बना दी है,जो उसके समक्ष ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर रहा है कि वह अपनी मानव सुलभ इच्छाओं को व्यक्त नहीं कर पा रही है। अपनी इच्छा को दबाने के लिए वह विवश हो रही है।
प्राचीन काल से लेकर अद्यतन हिंदी काव्य में स्त्री की स्थितियाँ निरंतर परिवर्तित होती रही है। 1990के बाद यह परिवर्तन अधिक प्रभावी रूप में सामने आता है। जिसका मुख्य कारण भूमंडलीकरण और इससे जन्मा बाज़ारवाद रहा है। बाज़ारवाद के कारण स्त्री जीवन के प्रत्येक पक्ष जैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, वैवाहिक जीवन आदि प्रभावित हुए हैं। आज सब कुछ बिकाऊ है, बाजारवाद के चलते सब बेचा जा सकता है। आज विज्ञापन से लेकर सिनेमा तक में स्त्री के अंग-प्रदर्शन का सहारा धड़ल्ले से लिया जा रहा है। कात्यायनी की कविता का उदाहरण देखिये-
“अब इतनी सकत नहीं रही
कि दिन भर मुस्कुरा सकूँ, अदाएँ दिखा सकूँ,
निर्माता निर्देशकों को रिझा सकूँ
या दूरदर्शन पर सौंदर्य-प्रसाधनों का विज्ञापन कर सकूँ।
होंगे दुर्ग के बाहर घेरा डाले हुए तुम्हारे शत्रु
मैं तो उनके लिए भी वैसे ही एक स्त्री-शरीर हूँ,
जैसे तुम्हारे नगर-जनों के लिए।”4


समाज में विविध स्तरों पर नारी यौन शोषण के ऐसे दृश्य अक्सर हमें देखने को मिलते हैं जहाँ एक स्त्री मात्र ‘देह’ समझी जाती है। निर्माता निर्देशक उसकी मजबूरीयों का फायदा उठा अपना स्वार्थ साधते हैं। कात्यायनी जी ने यहाँ समाज की वो कड़वी सच्चाई दिखाने का प्रयास किया है जिसके बारे में अक्सर तथाकथित पुरुषवर्चस्ववादी समाज का व्यक्ति बात करने से कतराता है लेकिन अवसर मिलने पे स्वयं भी पीछे नहीं हटता। इसी संदर्भ में अनामिका का मत दृष्टव्य है- “स्त्री-आंदोलन पितृसत्तात्मक समाज में पल रहे स्त्री-संबंधी पूर्वाग्रहों से पुरुषों की क्रमिक मुक्ति असंभव नहीं मानता। दोषी पुरुष नहीं,वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था है जो  जन्म से लेकर मृत्यु तक पुरुषों को लगातार एक ही पाठ पढ़ाती है कि स्त्रियाँ उनसे हीनतर हैं, उनके भोग का साधनमात्र ।”5  आज बाजारवाद ने स्त्रियों कि अनेक छवियाँ गढ़ी है, जहाँ स्त्रियों को विक्रेता भी बनाया गया है और उपभोग कि वस्तु भी। उपभोक्ताववाद के लिए स्त्री ‘देह’ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। मंगलेश डबराल अपने संग्रह ‘हम जो देखते हैं’(1995) में  लिखते हैं- 
“अमेरिका में रोना माना है
उदास होना मना है
एक बहुत बड़ी आँख सबको देख रही है
पीछे मुड़कर जीवन को देखना माना है
वह किस्सा किसे नहीं मालूम
कि आलीशान दुकान में सामान बेचती
एक दुबली-सी लड़की
जो कुछ सोचती हुई-सी बैठी थी
एक दिन एक ग्राहक के सामने मुस्कराना भूल गई
शाम को उसे नौकरी से अलग कर दिया गया।”6


यहाँ लड़की का मुसकुराना उसके काम का एक हिस्सा है प्रसन्नता नहीं ताकि उसकी मुस्कुराहट से ग्राहक आकर्षित किए जा सके। अगर वह उपभोक्तावादी संस्कृति के खिलाफ जा ऐसा नहीं करती है तो वह बाजार के काम कि भी नहीं है। कहीं न कहीं बाजार के कारण स्त्रियाँ आर्थिक रूप से सक्षम बनी लेकिन सिर्फ बाज़ार कि शर्तों पे। उसे न कुछ सोचने का अधिकार है न ही कुछ कहने का। इस संदर्भ में प्रसिद्ध नारीवादी चिंतक एवं लेखिका प्रभा खेतान का मानना है कि “भूमंडलीकरण जीवन के हर कोने में अस्तित्व के हर रूप का वस्तुकरण करता है।”7  आज बाज़ार कि नज़र स्त्री के प्रत्येक रूप पे है चाहे वो गाँव के खेत खलियान मे कार्य करती स्त्री हो, घरमे रहने वाली या घर संभालती स्त्री हो या जंगल और पहाड़ों पे जीवन जीती स्त्री हो। बाज़ार हर हालत में स्त्री को अपने चंगुल में फंसा कर अपना स्वार्थ साधना चाहता है। इसी क्रम मे आदिवासी स्त्रियों को बाज़ार कि नीतियों के प्रति आगाह करती हुई निर्मला पुतुल अपनी कविता ‘बिटिया मुर्मु के लिए’ में लिखती है कि-
“वे दबे-पाँव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में
वे तुम्हारे नृत्य कि बड़ाई करते हैं
वे तुम्हारी आँखों कि प्रशंसा में कसीदे
पढ़ते हैं
सौदागर हैं वे... समझो...
पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू.... पहचानो!”8


बाजारवाद के कारण आज एक स्त्री स्वतंत्र होकर भी गुलामी का जीवन जी रही है। उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते भोली भाली स्त्रियों को फंसाया जा रहा है ताकि चकाचौंध कि दुनिया से आकर्षित हो वे स्वयं उपभोग को तैयार हो जाए। और जब स्त्री बाज़ार के काम कि नहीं रहती उसको दूध में से मक्खी कि तरह उठाकर फेंक दिया जाता है। इसी संदर्भ में विनय विश्वास का मत दृष्टव्य है-“उपयोग कि जाने वाली वस्तु बार-बार काम आ सकती है। उपभोग जिसका किया जाए, वह एक बार इस्तेमाल के बाद नष्ट हो जाती है। मकान का उपयोग किया जाता है और अनाज का उपभोग। उपभोकतावाद में ज़ोर उपभोग पर ज़्यादा है। इसलिए कि उपभोग्य वस्तुओं कि खपत ज्यादा होती है। उनकी मांग भी अपेक्षाकृत अधिक होती  है।”9
जहां एक ओर नब्बे के बाद बाज़ार ने स्त्री का वस्तुकरण किया, स्त्री की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक स्थितियों में बदलाव आया वहीं दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने अस्तित्व और आत्मसम्मान के लिए भी सचेत दिखाई पड़ती हैं। आज की कविता स्त्री आत्माभिव्यक्ति का दस्तावेज़ है। वह अपने सुख, दुख, ममता, प्रेम और विद्रोह को कविता के माध्यम से रचती है। शोषण, दमन, उत्पीड़न, उपेक्षा जैसे स्त्री-जीवन के समस्त पहलुओं की चर्चा करते हुए आज कि कविता स्त्री-अस्मिता कि लड़ाई में सक्रिय सहयोग दे रही है। उदाहरण के लिए सविता सिंह की कविताओं को अगर हम देखें तो पाएंगे की सविता सिंह की काव्य संवेदना में उग्रता नहीं है लेकिन उनके यहाँ स्त्री अस्मिता से जुड़े अनुभवों की संश्लिष्टता है। सविता सिंह अपने औरत होने पर नहीं, बल्कि किसी की औरत होने पर प्रश्न चिन्ह लगाती है और कहती है –
“मैं किसकी औरत हूँ/कौन है मेरा परमेश्वर
किसके पाँव दबाती हूँ/किसका दिया खाती हूँ
किसकी मार सहती हूँ../ऐसे ही थे सवाल उसके
बैठी थी जो मेरे सामने वाली सीट पर रेलगाड़ी में
मेरे साथ सफर करती”


इस पर कवयित्री का जवाब देखते ही बनता है। जो भारतीय समाज कि उस स्त्री का रोल अदा कर रहा है जो आज अपने पैरों पे खड़ी है, स्वावलंबी है, अपने फैसले खुद ले सकने मे समर्थ है-
“सोचकर बहुत मैंने कहा उससे
मैं किसी की औरत नहीं हूँ/मैं अपनी औरत हूँ
अपना खाती हूँ/जब जी चाहता है तब खाती हूँ
मैं किसी की मार नहीं सहती/और मेरा परमेश्वर कोई नहीं”10  


अतःअंतिम दशक की हिंदी कविता में हम स्त्री जीवन से जुड़े हर पहलू को उद्घाटित होते पाते हैं। जहां एक ओर उदारीकरण के बाद स्त्री वस्तु के रूप में प्रस्तुत की जाती है वहीं दूसरी ओर औद्योगिक विकास ने उसे आर्थिक रूप से सबल भी बनाया है। स्त्रियाँ अब अपने आत्मसम्मान और अस्मिता के प्रति सचेत भी हो रहीं हैं और कविता के माध्यम से इन्हें मुखर रूप से अभिव्यक्त भी कर रही हैं।


संदर्भ सूची-
1. http://kavitakosh.org/kk
2. पाण्डेय, मैनेजर. आलोचना की सामाजिकता. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन
3. संपा. त्रिपाठी, प्रभात. (2013). चन्द्रकान्त देवताले प्रतिनिधि कविताएँ. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-41
4. कात्यायनी. (1999). इस पौरुषपूर्ण समय में. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन. पृष्ठ-64
5. अनामिका. (2004). कविता में औरत. दिल्ली. साहित्य उपक्रम. पृष्ठ- 9
6. डबराल, मंगलेश. (2015). हम जो देखते हैं. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-75-76
7. खेतान, प्रभा. (2004). बाज़ार के बीच बाज़ार के खिलाफ. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन. पृष्ठ-32
8. संपा. विश्वरंजन. (2011). कविता के पक्ष में. दिल्ली. शिल्पायन. पृष्ठ-222
9. विश्वास, विनय. (2009). आज की कविता. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-160
10. http://kavitakosh.org/kk


-स्वाति 
शोधार्थी- पीएच.डी. हिन्दी साहित्य
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा,महाराष्ट्र
Email- swatitasud@gmail.com  


Saturday, February 15, 2020

एक बेबाक शख्सियत : इस्मत चुगताई

आरती कुमारी

पीएच. डी. हिंदी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, त्रिपुरा, अगरतला

 

         साहित्य के क्षेत्र में अनेक विद्वानों का योगदान रहा हैं, वर्तमान  में विभिन्न विषयों से जुड़े, एक नई दृष्टि लिए रचनाकार हमारे समक्ष आ चुके हैं ।  भारतीय साहित्य में इस्मत चुगताई का भी एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, जिनका जन्म 21 अगस्त 1915 ई .  को बदायूं उत्तरप्रदेश में हुआ था। जिनका पूरा जीवन संघर्षशील तथा समस्याओं से घिरा रहा परंतु कभी  भी जिंदगी से हार नहीं मानती,जितना अनुभव जीवन में मिल पाया उसे जीवन के अंत समय तक कभी भूल नहीं पाई ।  इस्मत चुगताई उर्दू की प्रमुख व प्रसिद्ध लेखिका के रूप में जानी जाती रही हैं , उनकी प्रत्येक रचना विभिन्न भाषाओं में अनुवादित हो चुकी हैं ।  वह एक स्वतंत्र विचारक , निडर , बेखौफ, जिद्दी , जवाबदेही, तार्किक तथा विरोधी स्वभाव की थी जिन्होंने अपने जीवन में उन सभी बातों का विरोध किया जिससे जिंदगी एक जगह थम सी जा रही हो ।  इस्मत चुगताई का परिवार एक पितृसत्तात्मक विचारों वाला था उसके बावजूद वह अपने परिवार के प्रत्येक सदस्यों से विपरीत रही । स्त्रियों की समस्याओं को लेकर आजादी से पहले व बाद में अनेक चर्चा -परिचर्चा होती रही है परंतु ध्यान देने वाली बात यह है कि महिलाओं की समस्याएं दिन -प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । साहित्य समाज का दर्पण है, वह समाज की प्रत्येक समस्या उजागर करने का पूरा प्रयास करता है उसका उद्देशय यह रहता है कि  समाज का प्रत्येक वर्ग उससे प्रभावित होकर उसके समाधान के लिए अग्रसर हो सके ।

      इस्मत चुगताई के लेखन की शुरुआत हमारे देश भारत की स्वतंत्रता के पूर्व से हो चुकी थी, जिन्होंने समाज की प्रत्येक समस्या पर अपनी नज़र रखते हुए उसका अनुभव प्राप्त करती है । उनकी रचनाओं में अनेक विषय सभी पाठकों को चकित कर देते है तथा उसके साथ – साथ उनके बेबाकी व्यक्तित्व को  प्रस्तुत भी करते है । उनकी अनेक कहानी संग्रह जिसमें – चोटें, छुई -मुई, एक बात, कलियां, एक रात, शैतान, आधी औरत आधा ख्वाब आदि है , जिसमें स्त्रियों की सभी समस्याओं को आधार बनाकर लिखा गया है ।  इस्मत चुगताई की कहानियाँ स्त्री जीवन, उनका संघर्ष , पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री -पुरुष मतभेद, मुस्लिम समाज में तीन तलाक की समस्या, नारी अस्मिता, स्त्री मन का द्वन्द, दहेज प्रथा, आदि समस्याओं को प्रस्तुत करती है । वह अपने लेखन के विषय में पूरे आत्मविश्वास से कहती थी कि-

        “मेरी कहानियों को किसी सफाई की आवश्यकता हैं ऐसा मैंने कभी महसूस नहीं किया”

इस्मत अपने लेखन के प्रति सचेत थी उनके मन में कभी भी किसी तरह का भय नहीं आया तथा ऐसा कभी उन्हें नहीं लगा की जो कुछ लिखा हैं वह गलत हैं।  जीवन के प्रत्येक पक्ष को उकेरते हुए समाज की सच्चाई को अपनी रचनाओं के माध्यम से रु-ब -रु कराती हुई दिखाई पड़ती है ।

           

     इस्मत चुगताई वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसमें समाज की पूरी पृष्टभूमि नज़र आती हैं । स्त्रियों को पितृसत्तात्मक समाज ने अनेक रूढ़ियों व परंपराओं में इस प्रकार जकड़ा हुआ है जिसके  बाहर आज भी वह नहीं निकल पाई । इस्मत अपना लेखन इस बेबाकी से करती थी कि किसी भी आने वाली समस्या का भय मन में नहीं रहता था। ‘लिहाफ़’  उनकी एक ऐसी कहानी है जिसके लिए उन्हें जेल के चक्कर भी लगाने पड़ते हैं ।  इस्मत को उस वक्त भी किसी तरह का भय नहीं होता जब पुलिस उनको जेल ले जाने के लिए आती है तब वह कहती हैं –

              “जेल में ? अरे मुझे जेल देखने का बहुत शौक हैं कितनी दफा यूसुफ से कह चुकी हूँ जेल ले चलो मगर हँसता है कमबख्त और टाल जाता हैं । इंस्पेक्टर साहब मुझे जेल ले चलिए, आप हथकड़ियाँ लाए हैं”

यह वाक्य इस्मत चुगताई के व्यक्तित्व को दर्शाता है क्योंकि वह जानती थी कि समाज सच्चाई को जानकर भयभीत हो सकता हैं परंतु उनकी कहानी समाज की वास्तविक घटनाओं पर आधारित है वो गलत नहीं हैं ।

          इस्मत चुगताई के अनेक उपन्यास है जो निम्नलिखित है - जिद्दी, टेढ़ी लकीर, दिल की दुनिया, सौदाई, जंगली कबूतर, मासूम, एक कतरा-ए-खून, अजीब आदमी, बाँदी बहरूप नगर । इसके साथ -साथ उनकी आत्मकथा- कागजी है पैरहन भी काफी चर्चित हो चुकी है ।  इस्मत चुगताई मुस्लिम समाज से संबंध रखती थी जहां कई बंदिशे स्त्रियों पर थे, जिसका सामना इस्मत को भी करना पड़ा लेकिन वह उसका हमेशा विरोध करती रही । पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री अपनी अस्मिता के लिए सदियों से संघर्ष करती रही हैं , आज स्त्रियां अपनी एक पहचान बना चुकी हैं ।  परंतु इतने संघर्षों के बावजूद भी वर्तमान में अनेक समस्याओं से स्त्रियाँ जूझ रही हैं । इस्मत को पहली बार बुर्का ओढ़ना पड़ा तब वह अधिक क्रोधित होती है उसके विषय में कहती हैं कि :-

            “मुझे पहली बार जब बुर्का ओढ़ना पड़ा और बता नहीं सकती कि अपमान की भावना ने कई बार मुझे पटरी पर कट जाने की सलाह दी”

 यह  सच है जब किसी की अस्मिता खतरे में हो तब उसे बेहद निराशाजनक स्थिति से गुजरना पड़ता है ।  एक स्त्री पुरुष के समान ही समाज में अपना योगदान देती है लेकिन जब उसे समाज में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है तब  अधिक कष्ट का अनुभव करती है।

      इस्मत चुगताई बचपन से ही पढ़ने में रुचि रखती थी उनमें एक जिज्ञासा का भाव हमेशा बना रहा।  उनके मन में हमेशा अपने पितृसत्तात्मक समाज के प्रति एक क्रोध का भाव बना रहता था क्योंकि वह समाज में स्त्री की प्रत्येक कार्यों पर नज़र रखती।  उनके मन में इस बात का दुख व निराशा बनी रहती कि स्त्रियाँ घर-परिवार में शोषित, अत्याचारों का सामाना  करती हैं उसका विरोध क्यों नहीं करती ? जीवन में उदासी लिए जिंदगी गुजारने को मजबूर है । “चौथी का जोड़ा” इस्मत की एक ऐसी कहानी जिसमें स्त्री मन व निम्न मध्यवर्गीय समाज की दशा का चित्रण बहुत ही स्पष्टता से देखा जा सकता हैं । इस कहानी में इस्मत स्पष्ट रूप से दिखाती है कि जब पुरुष वर्ग स्त्री की भावनाओं का सम्मान न करें उस पर अत्याचार करें तो उसे अस्वीकार करना ही एक स्त्री का धर्म होना चाहिए –

          “क्या मेरी आपा मर्द की भूखी है ? नहीं वह भूख के एहसास से पहले ही सहम चुकी है, मर्द का तसव्वुर उनके जेहन में एक उमंग बनकर नहीं उभरा बल्कि रोटी कपड़े का सवाल बनकर उभरा है”

       इस्मत चुगताई का लेखन बेहद प्रभावित करता है, उन समस्याओं से रु-ब-रु कराता है जो समाज का प्रत्येक वर्ग झेलता हुआ नज़र आता हैं ।  यदि कोई स्त्री समाज के नियमों के विरुद्ध सवाल खड़ी करती है तब समाज उसे अच्छे -बुरे के कठघरे में लाकर खड़ा कर देता हैं । इस्मत समाज की कमियों को पूरे साहस, स्पष्टता व सहनशीलता से प्रकाशित करती थी उनके मन में किसी भी तरह का भय नहीं था । उन्हें स्वयं पर पूरा आत्मविश्वास था की जो कुछ भी वो लिख रही हैं वह एकदम सही हैं वे इस बात को मानती थी कि उनका लेखन ही जीवन जीने का आधार है इसकी मौजूदगी में वे खुद को अकेलापन महसूस नहीं करती ।  समाज में स्त्री को शृंगार तथा आभूषण से सजने -सवरने के बीच घेर कर रखा जाता रहा है जो स्त्री सज -सवरकर रहती है उसे विशेष महत्व दिया जाता रहा, परंतु इसकी आलोचना करते हुए इस्मत ने अपनी कहानी ‘निवाला’ में  कहा है कि –

              “क्या औरत होना काफी नहीं एक निवाले में आचार, चटनी, मुरब्बा क्यों”

      इस्मत का लेखन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्थितियों को बहुत ही सहजता से उल्लेखित करता है। उसके बीच एक स्त्री किन -किन समस्याओं से गुजरती है, समाज में स्त्री पुरुष मतभेद स्त्रियों के लिए अनेक समस्या उत्पन्न करता हैं ।  इस्मत ने अपने जीवन में प्रत्येक मोड़ पर पूरे साहस के साथ अपनी जिम्मेदारी को पूरा करती रही चाहे वह अपना परिवार हो या समाज ।  इस्मत अपने पति  शाहिद के विषय में कहती हैं कि –

           “मर्द औरत को पूज कर देवी बना सकता हैं, वो उसे मोहब्बत दे सकता हैं इज्जत दे सकता है सिर्फ बराबरी का दर्जा नहीं दे सकता ।  शाहिद ने बराबरी का दर्जा दिया इसीलिए हम दोनों ने एक अच्छी घरेलू जिंदगी गुजारी”

इस्मत चुगताई के पास जीवन का अनुभव था, समाज स्त्री को पुरुष की अपेक्षा कमजोर समझता रहा है।  प्रत्येक कार्यों में स्त्री-पुरुष का विभाजन दिखाई पड़ता है, स्त्री को अबला, देवी, त्यागी का रूप माना जाता परंतु उसे समानता का अधिकार नहीं दिया जाता है ।  वर्तमान समय में संविधान में स्त्री -पुरुष को समानता का अधिकार दिया गया है लेकिन भेदभाव का अनुभव महिलाएं आज भी अनेक क्षेत्रों में  करती हैं।    

           अत: इस्मत चुगताई समाज की जमीनी हकीकत को अपने समय में पहचान चुकी थी उनका लेखन आज भी प्रासंगिक है।  इस्मत के लेखन पर चेखव, बर्नाड शॉ, रशीदजहाँ, डिक्सन, प्रेमचंद तथा महात्मा गांधी आदि का प्रभाव दिखाई पड़ता हैं ।  इस्मत के समय में मंटो एक ऐसे लेखक थे जो उनके सबसे निकट रहे वह इस्मत के विचारों से पूरी तरह वाकिफ थे ।  मंटो कहते थे कि  इस्मत का कलम व जबान दोनों बहुत तेज रफ्तार में चलते है उस समय वह कुछ भी नहीं सोचती थी कि इसका प्रभाव क्या होगा ।  स्वतंत्र विचारों से जुड़ी इस्मत चुगताई समाज की परवाह किए बिना जीवन में प्रत्येक मुकाम हासिल करती हैं  जिसकी वह हकदार थी ।  उनके रास्ते में आने वाली परेशानियों को पूरे हौसले के साथ सामना करती हैं ।  उनकी रचनाओं में भी स्त्री, पितृसत्तात्मक समाज में जिस घुटनभरी जिंदगी का सामना करती है उस पर दृष्टि डाला गया हैं । भाषा लेखक की एक शक्ति होती है जिसके माध्यम से वह अपनी अलग पहचान बनाता हैं, इस्मत ने जिस भाषा का प्रयोग किया वह समाज को चकित व अत्यंत प्रभावित करने वाला हैं । इस्मत की भाषा में विरोध, बौद्धिकता, शोर, चंचलता, तेज रफ़्तार, निर्भय और साहस का भाव सब कुछ स्पष्ट रूप से दिखाई देता हैं । एक स्त्री का दर्द, मौलिकता, समाज की सच्चाई, अनुभव को व्यक्त करने की सहज अभिव्यक्ति, तार्किक भाव तथा प्रभावित करने वाली भाषा सम्पूर्ण घटनाओं को इस्मत ने व्यक्त किया हैं ।  समाज की एक अच्छी परख इस्मत के पास थी  और सच में जो व्यक्ति सच्चाई को जानता है वह किसी भी कष्ट से घबराता नहीं है बल्कि अपनी बात बहुत ही सहनशीलता व सहजता से प्रस्तुत करता है । वह किसी भी प्रश्न से भयभीत नहीं होता, जबकि वह धैर्य के साथ सभी प्रश्नों का जवाब देने में ही विश्वास करता है । इस्मत चुगताई का व्यक्तिव भी ऐसा ही था, लेखन के कारण समाज के बेरूखे स्वभाव, आलोचना का सामना करना पड़ा ।  परंतु इस्मत ने  कभी भी अपने हौसले को कम नहीं होने दिया ।  इस्मत चुगताई ने लेखन के साथ -साथ फिल्मों के लिए पटकथा लिखते हुए ‘जुनून’ फिल्म में पात्र की भूमिका भी अदा करती हैं ।  वह अपनी रचनाओं के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, इकबाल सम्मान , नेहरू अवार्ड, आदि पुरस्कार हासिल कर चुकी थी ।  इस्मत ने अपने जीवन में लेखिका की भूमिका अत्यंत जिम्मेदारी, कर्तव्यनिष्टता के भाव को समझते हुए अपनी भूमिका अदा करती हैं ।   

        आज भारत की आजादी के इतने वर्षों बाद भी स्त्रियों की समस्याएं अधिक बढ़ती जा रही है जिस पर ध्यान देना अनिवार्य है । इस्मत चुगताई पहली नारीवादी लेखिका मानी जाती हैं जो स्त्री के मुद्दों को बेहद अच्छे ढंग से प्रस्तुत करती थी । वह समाज की हर एक समस्या को हु-ब-हु प्रकाशित करती थी, समाज जिन रूढ़ियों , अंधविश्वासों से ग्रस्त होकर महिलाओं पर अत्याचार करता था उसका विरोध करते हुए अपने स्वभाव अनुसार उस पर सीधा चोट करती थी जिस कारण उनका लेखन अधिक महत्वपूर्ण लगता हैं ।  इस्मत का निधन 24 अक्टूबर 1991 ई .  को हुआ, आज भी उनका लेखन उनके  अनुभव को जीवित रखता हैं।   

 

संदर्भ ग्रंथ सूची –

  1. पॉल सुकृता संपा- कुमार अमितेश. (2016 ). इस्मत आपा . नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन .
  2. लिप्यंतरण - रिजवी शबनम. (2016 ). छुई -मुई . नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन .
  3. लिप्यंतरण - सुरजीत. (2016 ). लिहाफ . नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन .
  4. लिप्यंतरण- इफ़तीखार अंजुम. (2014 ). कागजी है पैरहन . नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन .

Tuesday, December 10, 2019

नगरों में मरती मानवीय संवेदना


डाॅ. बेगराज यादव
विभागाध्यक्ष (बीएड)
मौलाना मौहम्मद अली जौहर हायर 
एजुकेशन इंस्टीट्यूट, किरतपुर, बिजनौर


 


मानवीय संवेेदना से अभिप्राय उस प्रत्येक चिंता है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है, और निसके फलस्वरूप मनुष्य अपने व्यक्तिगत वृत को लाँघकर अपने पास-पड़ोस, समुदाय समाज, क्षेत्र तथा राष्ट्र का हित-चिंतन करता है और जो इस प्रक्रिया के उच्चतम स्तर पर पूर्ण विश्व में होने वाली घटनाओं में भी आन्दोलित होती है। संवेदना हृदय की अतल गहराई से आवाज देती प्रतीत होती है। संवेदना को किसी नियम अथवा उपनियम में बांधकर नहीं देखा जा सकता है। संवेदना की न तो कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। संवेदना मानवीय व्यवहार की सर्वोत्कृष्ट अनुभूति है। किसी को कष्ट हो और दूसरा आनंद ले, ऐसा संवेदनहीन व्यक्ति ही कर सकता है। खुद खाए और उसके सामने वाला व्यक्ति भूखा बैठा टुकर टुकर देखता रहे, यह कोई संवेदनशील व्यक्ति नहीं सह सकता। स्वयं भूखा रहकर दूसरों को खिलाने की हमारी परंपरा संवेदनशीलता की पराकाष्ठा है। संवेदना दिखावे की वस्तु नहीं बल्कि अंतर्मन में उपजी एक टीस है, जो आह के साथ बाहर आती है। संवेदना मस्तिष्क नहीं बल्कि दिल में उत्पन्न होती है। यही संवेदना मनुष्य को महान और अमर बना देती है। सरलाॅक होम्ज ने कहा है - संसार के महान व्यक्ति अक्सर बड़े विद्वान नहीं रहते, और न ही बड़े विद्वान महान व्यक्ति हुए हैं।



विद्वान होना अलग बात है और संवेदनशील होना अलग बात है। विद्वान के पास पुस्तकों और शास्त्रोक्त ज्ञान का भंडार बहुत हो सकता है परंतु उसके पास संवेदना हो यह आवश्यक नहीं है। उसी तरह धनाढ्य व्यक्ति के पास धन की अधिकता हो सकती है परंतु उसके पास संवेदना हो यह कतई आवश्यक नहीं है। यदि ऐसा होता तो उड़ीसा में एक व्यक्ति जो न तो धनाढ्य था न ही विद्वान था और न ही महान था परंतु संवेदनशील था। वह अपनी पत्नी के शव को अस्पताल में ही कंधे पर रखता है और अपने गाँव की ओर चल देता है। उस समय न तो कोई धनाढ्य उसकी मदद करता है और न ही कोई विद्वान। जिससे स्पष्ट होता है कि वहाँ मौजूद सभी व्यक्तियों की संवेदना मर चुकी थी। संवेदना क्या होती है? इसका एक उदाहरण प्रस्तुत है, अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने एक बार मार्ग से गुजरते हुए एक बीमार सूअर को कीचड़ में फँसे हुए देखा तो वह परेशान हो उठे, उन्होंने अपने मन की आवाज को सुना और उस सूअर को बचाने के लिए कीचड़ में कूद पड़े, सूअर को बाहर निकालकर उनहोंने चैन की सांस ली। वहाँ मौजूद लोगों ने हैरानी से पूछा तो वे बोले - मैंने सूअर को बचा कर अपने हृदय की वेदना का बोझ दूर किया है। 



परिस्थिति के बदलने के साथ ही व्यक्ति की संवेदनशीलता के पहलू भी बदलते है, एक समय में जो बात या घटना, मन पर गहरी छाप छोड़ जाती है, जरूरी नहीं दूसरी बार भी अपनी ओर ध्यान देने को बाध्य कर सकें।



अटल बिहारी वाजपेयी के अनुसार- सुनने वाले और सुनाने वाले के बीच तुम और मैं की दीवार टूट जाती है, जहाँ एकाकार हो जाता है। वहीं संवेदना की अवधारणा होती है।



वर्तमान की बात करें तो संवेदना या तो अपने लिए रह गई है अथवा अपनों के लिए। आज दुनिया में आतंकवाद लगातार बढ़ रहा है। संवेदना के नाम पर धर्म का बहाना लिया जाता है और लगातार खून बहाया जाता है। जबकि कोई धर्म नहीं कहता कि एकदूसरे का खून बहाओ। आइएसआइएस आतंकवादी इराक में हज़ारों लड़कियों, औरतों को जनवरों की तरह मंडी लगाकर बेचते हैं, रातों रात हज़ारों लोगों को गाजर मूली की तरह काट दिया जाता है। हमारे ही देश में जन्नत का ख्वाब देखने वाले स्वयं भी मरते हैं और दूसरों को भी मार डालते हैं। कहने का तात्पर्य है कि धर्म के नाम पर भी मानवीय संवेदनाएं मारी जा रही हैं। ऐसे में एक का धर्म दूसरे के लिए अधर्म बनता जा रहा है। यही काम राजनीति भी कर रही है। सीमा पर तैनात जवान हमले में शहीद होते हैं तो तब राजनीति के धुरंधर यहाँ तक कह देते हैं कि जवान तो मरने के लिए ही होते हैं। शहीद जवान से राजनीति को कोई हमदर्दी नहीं है। किसी ग़रीब के घर अपना सामान ले जाकर रोटी खाने का नाटक किया जाता है मगर यही राजनीति किसी शहीद के घर नहीं जाती है। 



आज प्रतिस्पर्धा के दौर में मानवीय संवेदना पूरी तरह से मृत हो गई है। आमजन के सामने हत्या लूट-पाट हो जाती है और वो सिर्फ तमाशबीन बन देखता रह जाता है, किसी के साथ कोई सड़क दुर्घटना हो जाए तो तमाशबीनों की कमी नहीं होती। अक्सर किसी व्यक्ति के सामने कुछ ग़लत हो रहा होता है तो उस समय वह संवेदनशील होने के बजाय यह सोचकर चल देता है कि समय ख़राब करने और कानून के पचड़े में फंसने से क्या लाभ? वह नहीं जानता कि उसकी यह लापरवाही किसी की जान तक ले लेती है। और फिर एक समय वह भी आता है जब वही व्यक्ति दिखावे के लिए सड़क पर मोमबत्ती लेकर पैदल मार्च कर संवेदना प्रकट करता है और अगले दिन जल्दी उठकर अख़बार में अपना नाम या फोटो देखता है। यदि उसका नाम या फोटो छपा होता है तो पूरे दिन उसका जिक्र करता है और नहीं छप पाता तो पूरे दिन अख़बार वालों को गरियाता फिरता है। क्या है ये सब? हमें कुछ तो विचार करना ही पड़ेगा। अगर हम मुंबई, संसद, पठानकोट, उड़ी पर चुप हो जाते हैं तो पुलवामा का नतीजा सामने आता है। यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जिन लोगों की संवेदनाएं मर चुकी हैं उन लोगों का भी जल्दी ही मर जाना अच्छा है। जो लोग दूसरों को मारकर जश्न मनाते हैं वह किसी भी रूप में मानवीय समुदाय में रहने योग्य नहीं होते। ऐसे लोग धर्म और समाज दोनों के नाम पर कलंक होते हैं। 



संवेदनशीलता के मर जाने का एक बड़ा कारण बढ़ती जनसंख्या और उसमें रोटी के लिए संघर्ष भी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार बीस-पच्चीस सालों में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या साठ से अधिक हो जाएगी। चैंकाने वाली बात यह है कि शहरों में ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञ आशंकित हैं कि कहीं भारत की बड़ी आबादी शहरी मलिन बस्तियों में न तब्दील हो जाए। 



देश में सौ नए शहर बसाने की तैयारी हो रही है। नए शहर का मतलब होगा कुछ हज़ार-लाख एकड़ उपजाऊ खेतों का कंक्रीट में बदल जाना, पानी के परंपरागत स्रोतों की बलि, हरियाली और नैसर्गिकता का विनाश। और नए संकट होंगे बिजली और पानी की किल्लत, सड़कों पर जाम और चारों तरफ कचरा। रीयल इस्टेट, सीमेंट लोहे का कारोबार बढ़ने से भले ही कुछ लोगों को रोजगार मिलेगा। इसे विकास भी कहा जाएगा। विकास में व्यक्ति, समुदाय और प्रकृति वगैरह सबका कल्याण शामिल होता है। लेकिन यहाँ विकास के रूप में धीमा ज़हर हमारी सांसों में घुलता जाएगा और फिर परिणाम सभी जानते हैं, कहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में यह भी विचारना उचित ही है कि क्या गाँव में मूलभूत सुविधाएं, परिवहन और संचार, कुटीर उद्योग को सशक्त कर देश के जीडीपी में इजाफा नहीं किया जा सकता? भारत में संस्कृति, मानवता और बस्तियों का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीवन फलता-फूलता रहा है। लेकिन आज नदियों की धार अवरूद्ध हो गई है। आबादी और औद्योगिक इकाइयों का गंदा पानी नदियों को समाप्त कर रहा है। 
नगरों में मरती माननवीय संवेदना के कारण



1- तीव्र गति से बढ़ती नगरीय जनसंख्या
2- तीव्र गति से बढ़ती शिक्षित बेरोजगारी
3- नैतिक मूल्क प्रेरक शिक्षा का अभाव
4- प्रतिस्पर्धा का दौर
5- संयुक्त परिवार का विघटन, एकाकी परिवार में वृद्धि
6- बच्चों के सामुहिक खेलों का अभाव
7- मोबाइल का अत्यधिक बढ़ता उपयोग।
8- दूरदर्शन पर भ्रमित करते धारावाहिक।
9- मिडिया द्वारा छोटे-छोटे घटनाओं की अधिक बढ़ाकर बताना।
10- घट रहा आपसी भाईचारा।
11- स्वयं की अधिक से अधिक घर की चार दीवारी में समेटना।
12- व्यक्तिगत वाहनों की संख्या में वृद्धि
13- लूटपाट की वारदातों में वृद्धि
14- भावुकता का नजायज लाभ उठाना
15- दूषित पर्यावरण
16- बच्चे का घर में अकेले रहना
17- बच्चों को संवेदनाओं वाली कहानी व दुनाना।
18- गाँव में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध न कराना। 


भारत में संस्कृति, मानवता और बस्तियों का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीवन फलता-फूलता रहा है। बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहाँ जगह मिली वह वहीं बहने लगी। यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर। असल में, पर्यावरण को हो रहे नुकसान का मूल कारण अनियोजित शहरीकरण है। बीते दो दशक में यह प्रवृत्ति पूर देश में बढ़ी है कि शहरों या कस्बों की सीमा से सटे खेतों में अवैध कालोनियां उग आई हैं। बाद में वहाँ कच्ची-पक्की सड़क बना कर आसपास के खेत, जंगल तालाब को वैध या अवैध तरीके से कंक्रीट के जंगलों में बदल दिया गया। 



देश के अधिकांश शहर बेतरतीब बढ़ते जा रहे हैं। न तो वहाँ सार्वजनिक परिवहन है, न ही सुरक्षा, न बिजली-पानी। देश में बढ़े काले धन को जब बैंक या घर में रखना जटिल होने लगा तो जमीन में निवेश का सहारा लिया जाने लगा। इससे खेत यानी जमीन की कीमतें बढ़ीं। पारंपरिक शिल्प और रोजगार से पेट न भरने की वजह से लोग शहरों की ओर भागने लगे। 



केवल पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं, शहर सामाजिक और सांस्कृतिक प्रदूषण से भी ग्रस्त हो रहे हैं। लोग मानवीय संवेदनाओं से, अपनी लोक परंपराओं और मान्यताओं से कट रहे हैं। तो क्या लोग गाँव में ही रहें? क्या विकास की उम्मीद न करें? ऐसे कई सवाल शहरीकरण में अपनी पूंजी को हर दिन कई गुणा होते देखने वाले कर सकते हैं। 



इंसान की क्षमता, ज़रूरत और योग्यता के अनुरूप उसे अपने मूल स्थान पर अपने सामाजिक सरोकारों के साथ जीवनयापन करने की सुविधाएं मिलनी चाहिए। अगर विकास के प्रतिमान ऐसे होंगे तो शहर की ओर लोगों का पलायन रुकेगा। इससे धरती को कुछ राहत मिलेगी। 



किसान या तो शहरों में मजदूरी करने लगता है या फिर जमीन की अच्छी कीमत हाथ आने पर कुछ दिन तक उसी में डूबा रहता है। दो दशक पहले दिल्ली नगर निगम के एक सर्वेक्षण में पता चला था कि राजधानी में अपराध में ताबड़तोड़ बढ़ोतरी के सात मुख्य कारण हैं। 



अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा और ग़रीबी, खुला आवास, बड़ा परिवार, नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के विचारों में टकराव और नैतिक मूल्यों में गिरावट। वास्तव में, यह रिपोर्ट केवल दिल्ली ही नहीं, दूसरे महानगरों और शहरों में भी बढ़ते अपराधों का भी खुलासा करती है। ये सभी कारक शहरीकरण की त्रासदी की सौगात हैं। 



आर्थिक विषमता, अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और पारंपरिक जीवकोपार्जन में बदलाव की वजह से शहरों की ओर पलायन ज्यादा बढ़ा है। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को साझा कोशिश करनी होगी। वर्ना, कुछ ही सालों में देश के सामने शहरीकरण की कठिनाइयां इतनी विकराल होंगी कि महानगर बेगार, लाचार और बीमार लोगों से ठसाठस भरे होंगे, और गाँव उजाड़ हो जाएंगे। प्रकृति विनाश गाँवों में उच्च या तकनीकी संस्थान खोलना, स्थानीय उत्पादों के मद्देनजर ग्रामीण अंचलों में छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, खेती के पारंपरिक बीज, खाद और दवाओं को प्रोत्साहित करना- ये कुछ ऐसे उपाय हैं, जो पलायन रोक सकते हैं। 



हम गाँव से शहर की ओर तो बढ़ रहे है, और पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण कर रहे है, लेकिन हम अपनी विंब प्रसिद्ध संस्कृति कोे खो रहे है। हम अपनी उस संस्कृति से अपने बच्चों अंजान रख रहे है, जिसके बल पर हम विश्व में पूजे जाते थे। हम विकास कर रहे है, हमारा समााज, देश भी विकास कर रहा है, लेकिन यह विकास तकनीकी रूप से हो रहा है, वास्तव में देखे तो हमारी संस्कृति का छात्र हो रहा है। भविष्यवादिता का में पक्षधर नहीं हैं, लेकिन अपनी संस्कृति की रीढ़ संवेदनाओं को होड़ में विकास के सपने देश ऐसा कदापि नहीं हो सकता है। मेरी सफलता की खुशी मैं अकेले नहीं मना सकता उसके लिए मुझे अपने लोग समाज में चाहिए साथ ही मुझे दुख से उभारने के लिए अपने लोगों की संवेदनाओें की अत्यधिक आवष्यकता होगी। संवेदनाओं के द्वारा हम आपस में जुड़े हुपे हे, इसके अभाव में हम सभी बिखर जाएंगे।



गाँव की अपेक्षा शहरों के लोगों की संवेदनाओं में अधिक छाप हुआ है। लेकिन प्राचीन काल से तुलना करें तो हाथ दोनों जगह हुआ है। हमें वास्तव में दुख के उभरना हो या खुशी मनानी ही दोनों में ही लोगों संवेदनाओं की अपेक्षा रहती है।
शहरों में मरती संवेदनाओं को रोेकने के लिए कुछ सार्थक प्रयास करने आवश्यक है।
1- बढ़ती नगरीय जनसंख्या पर अंकुश लगाना
2- योग्यतानुसार उचित रोजगार के अवसर उपपलब्ध कराना
3- पर्यावरण को स्वच्छ हरा-भरा बनाना
4- नैतिक शिक्षा का उचित प्रबंध
5- स्वच्छ प्र्रतिस्पर्धा एक दूसरे के सहयोग के साथ
6- संयुक्त परिवार को बढ़ावा देना
7- सामुहिक खेली को अधिक बढ़ावा देेना
8- संवेदनाओं में वृद्धि करने वाले धारावाहिकों का अधिक प्रसारण
9- बच्चों को संवेदना प्रेरक कहानी सुनाना
10- समाज में आपसी भाई-चारा बढ़ाना
11- आस-पास ;पड़ोसियोंद्ध के सुख-दुुख में शरीक होना
12- एक दूसरे के साथ खुशी बांटना
13- सभी त्यौहार मिल-झुलकर मनाना



आज हम विकासशील से विकसित भारत का सपना लेकर तो चल रहे है, उच्च तकनीकी से हम अन्य संस्कृतियों के करीब आए हैं और उनको अपना भी रहे है, हम भविष्यवादी समाज से भी निकल रहे है। लेकिन यह भी सच है कि हम अपनी विश्व धरोहर संस्कृति को भूलते जा रहे है या उसे नजर अंदाज़ कर रहे है। आज हम घर, बाहर, दफ्तर में अपने एंडराॅयड फोन में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हमें अपने घर पर बच्ची बुजुर्गों पर भी ध्यान नहीं दे पाते है। हम अपना अधिकांश समय मोबाइल पर खर्च कर रहे है। ऐसे में हम अपने बच्चचों से कैसे संवेदनाओं की अपेक्षा कर सकते है। दूूसरी तरफ शायद हम सफर में भी मोबाइल में दूरी व्यप्त हो जाते है कि हमें पता ही नहीं रहता कि हमारे पाद कब कहां कौन बैठा और कौन गया। प्रतिदिन कई घटनाएं ऐसी मिल जाती है जब व्यक्ति मोबाइल में व्यस्त ही कर मानवीय संवेदनाओं का गला घोट देता है। ऐसे में हम मरती मानवीय संवेदनाओं को नहीं रोक पाएंगे।


Thursday, December 5, 2019

21वीं सदी के कथा साहित्य में किन्नरों के प्रति समाज का वर्तमान दृष्टिकोण 


रिंकी कुमारी 


पीएचडी शोधार्थी                
हिंदी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय


इस जगत में वंशाकुल की वृद्धि के लिए प्रकृति ने स्त्री-पुरुष का निर्माण किया है, समाज में इसे दो लिंगी नाम से पहचान मिली है। परंतु समाज में एक और वर्ग उपस्थित है, जिसमें शारीरिक रूप से लैंगिक विकलांग हैं जिन्हें किन्नर, हिजड़ा, तृतीयलिंग, उभयलिंगी आदि के नामों से पहचानी जाती है। इस वर्ग को हमेशा से ही समाज द्वारा उपेक्षित किया जाता है रहा है। 'हिजड़ा' शब्द हमारे समाज का सबसे अभिशापित शब्द माना जाता रहा है, लेकिन यही शब्द किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय विशेष के लिए संबोधन किया जाता है। मानवता की भावना से विचार किया जाए तो उन के दिलो-दिमाग़ में अपने प्रति क्या विचार आते होंगे? उनकी अंतरात्मा अपने आप से क्या कहती होगी? यह प्रश्न उस समाज से है जो इस जगत में शराफत का चोला ओढ़े हुए है। क्यों इन्हें इस समाज से वाहिष्कृत कर उनकी दुनिया अलग मान बैठे हैं। समाज क्यों यह भूल जाता है कि ये लोग किसी दूसरे ग्रह से नहीं आए हैं बल्कि हमारे ही समाज के एक अंग हैं, वे देखने में भी एलिएन नहीं लगते, उनकी शारीरिक बनावट भी हमारे जैसी ही है, फिर क्यों उनको इस समाज में रहने एवं सामान्य जीवन जीने का अधिकार नहीं है? उनका कसूर क्या है? उनका दोष सिर्फ यह है कि वह न ही नर हैं और न ही नारी। ईश्वर ने उनकी पहचान तीसरी दुनिया की बना दी है। क्यों वर्तमान समय में ये लोग लगातार अपने अस्तित्व को कायम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारे समाज में हिजड़ा शब्द गाली के रूप में लिया जाता है लेकिन इस शब्द के द्वारा किसी की पहचान बनाया गया हो? उस समाज को क्या कह सकते हैं? हिजड़ा शब्द ज़ेहन में आते ही हमारी आँखों के सामने एक अविकसित छवि नजर आने लगती है। उनका रहन-सहन, चाल-ढाल, वेश-भूषा, मोटे-मोटे मेकअप आदि यह सब उभरकर सामने आते हैं।
जब बात आदिकाल की करते हैं तो उसमें भी किन्नरों के प्रति संवेदना दिखाई देती हैं। रामायण से लेकर महाभारत तक मे किन्नरों का वर्णन मिलता है, तथा उसमें उनकी स्थिति को बहुत सही ढंग से दिखाया गया है। शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव ने ब्रह्मा जी के निवेदन करने पर सृष्टि-कर्म की सुगमता के लिए अपने शरीर के आधे अंग से एक स्त्री का सृजन किया और स्वय अर्ध नारीश्वर रूप में प्रकट हुये। रामायण के अनुसार जब राम अयोध्या छोडकर वनवास जा रहे थे तो भरत के साथ सभी अयोध्यावासी राम को मनाने गये थे। उनके साथ किन्नर भी थे। जब राम ने भरत को समझाकर सभी स्त्रीयों-पुरोषों को वापस नगर लौट जाने की अनुमति दे दी, लेकिन किन्नर समुदाय वहीं पर रहने लगे। जब राम चैदह वर्षो के बाद नगर लौटे रहे थे तो रास्ते में ही उनकी मुलाकात किन्नरों से हुई। जब राम ने पूछा की आप लोग नगर लौट कर क्यों नहीं गए तो किन्नरों ने बताया कि आप सभी स्त्री-पुरुषों को लौटने की अनुमति दी थी हम लोग तो उसमें नहीं आते है, इसलिए हमलोग आपस नहीं गए। उसी समय राम ने किन्नरों को आशीर्वाद दिया जाओ तुम लोग जिसको दिल से आशीर्वाद दोगे वह लोगों को असर करेगी। इस प्रकार से मुगल काल में भी किन्नरों को इज्जत दिया गया था उनको अपने रानियों का 'हरम' की सुरक्षा को सौंपा गया था। किन्नरों की स्थिति सबसे ज्यादा दयनीय ब्रिटिश शासन काल में हुई, जब 1871 में क्रिमनल ट्राइब्स जनजाति के श्रेणी में डाल दिया गया। फिर ब्रिटिश शासन ने 1967 ब्रिटेन में इसे अपराधमुक्त कर दिया दिया था। जब भारत को आजादी मिली तथा भारतीय संविधान बनाया गया, उस समय किन्नरों को क्रिमनल ट्राइब्स से मुक्त कर दिया गया, लेकिन किन्नरों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। 
 'तीसरी ताली' उपन्यास प्रदीप सौरभ के द्वारा लिखा गया है, इस उपन्यास के माध्यम से प्रदीप सौरभ ने किन्नर समाज की कटु यथार्थ को दिखाने का प्रयास किया हैं। हमारे समाज में कुछ एक वर्ग ऐसे भी हैं जो अपने-आप को इस समाज का हिस्सा नहीं मानते हैं या यह भी कहा जा सकता है कि यह समाज उनको अपना नहीं मानती हैं। लेखक ने बड़े ही बेबाकी ढंग से लौंडों का शौक रखने वाले दबंग समाज के लोगों तथा उनकी विकृत मानसिकता पर जीवंत आघात किया हैं। इस उपन्यास का मुख्य केंद्र बिंदु एक होते हुए भी लेखक ने ग्रामीण परिवेश तथा शहरी परिवेश को विभिन्न रूपों को दिखाने का प्रयास किया हैं। एक तरफ चमचमाती माॅडलिंग का दुनिया में विनीत से विनीता बनी हुई एक किन्नर का जीवनसंघर्ष का कटु सत्य जिसने चमक-धमक की दुनिया में भी अपने-आप को खोखला एवं अकेलापन महसूस करती है। वहीं दूसरी तरफ बलिया गाँव का एक ग़रीब लड़का 'ज्योति' जमींदार 'श्यामसुंदर सिंह' की जागीर बनकर उनकी वासना का शिकार होता है, अपने तथा अपने माँ- बाप का भरण-पोषण करने के लिए उसे जमींदार श्यामसुंदर सिंह का रखैल तक बनना पड़ता है, इससे ज्यदा दुर्दशा तब होती है जब उसको गाँव के कुछ मनचलों द्वरा 'चूम' लेने के बाद ठाकुर श्यामसुंदर सिंह उसे जूठा समझ कर उसका परित्याग कर देते हैं। इस घटना के बाद जब कोई रास्ता नहीं दिखता तब चाय की दुकान खोलने का मन बनाता है फिर उसके दिमाग़ में यह बात आती है कि दलित लौंडे की दुकान की चाय कौन पिएगा? 'लौंडे की सवारी तो की जा सकती है, लेकिन उसके हाथ का खाना-पीना सभ्य लोगों के लिए हराम था'।1 भारतीय समाज में जाति पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस देश की राजनीति भी जात-पात के आधार पर की जाती है। समाज में सदियों से ये जात-पात, छुआ-छूत ऊँच-नीच आदि बेड़ियों में जकड़ा समाज एक तरह से अपाहिज होता जा रहा है। जो अपनी झूठी शानो-शौकत के लिए बनाया गया है, जिसमें ज्योति जैसे ग़रीब-लाचार, बेबस लड़के इस आडंबर का शिकार होते हैं। ज्योति एक प्रतीक चिह्न है, आर्थिक आपूर्ति के अपूर्ण पुरुषों को तीसरी दुनिया में जाने के लिए मजबूर कर देती है, जिसके कारण ज्योति को अपना लिंग कटवाकर हिजड़ा बनना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ सुविमल भाई एवं अनिल के लैंगिक संबंध को दिखाया गया है, कैसे सुविमल भाई अपने स्वार्थ के लिए रति से शादी कर लेते हैं। बाद में बात तलाक तक आ जाती है। क्या यही समाज की रीत है? इस समाज के नियमों के नीचे हमेशा ही ग़रीब, दलित, असहाय, बेबस, लाचार ही दबकर मरने पर मजबूर होते हैं? समाज में कुछ दबंग लोगों के लिए समाज का नियम-कानून कोई मायने नहीं रखता है, उनको यह लगता है कि यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है जिनको वे अपनी सुविधा के अनुसार नियम बना सकते हैं तथा उसे तोड़ भी सकते हैं, वर्तमान समय में भारतीय समाज की यही सच्चाई है।
समकालीन परिस्थितियों की बात करते हैं तो नीरजा माधव के प्रथम उपन्यास 'यमदीप' में समाज के सभी वर्गों का काला-चिट्ठा खुलता हुआ दिखाई देता है। लेखिका ने बड़ी बेबाकी के साथ परिवार, समाज, धर्म, राजनीति, मीडिया, प्रशासन व्यवस्था एवं शिक्षा आदि के चेहरो पर लगे नकाब को उतार बेनकाब किया है। सामाजिक स्तर पर किन्नरों की समस्याओं को दिखाया गया है, कैसे नंदरानी एक दिन नाजबीबी बनने पर मजबूर हो जाती है? कैसे सरहद पर दुश्मनों का सामना करने वाला मेजर ;नंदरानी का पिताद्ध अपने ही परिवार, समाज के सामने घुटने टेक देता है? नंदरानी के माता-पिता उसको पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहते हैं, पर परिवार और समाज के दबाव से नाजबीबी को घर छोड़ना पड़ता है। इस पर महताब गुरु जो किन्नरों की गुरु है, वह कहती है कि 'माता जी किसी स्कूल में आज तक किसी हिजड़े को पढ़ते-लिखते देखा है? किसी कुर्सी पर हिजड़ा बैठा है? पुलिस में, मास्टरी में, कलेक्टरी में किसी में भी? अरे इसकी दुनिया यही है, माता जी कोई आगे नहीं आएगा कि हिजड़ों को पढ़ाओ, लिखाओ नौकरी दो जैसे कुछ जतियों के लिए सरकार कर रही है।'2 इस उपन्यास में समाज का घृणित चेहरा उस समय बेनकाब होता है, जब एक पागल स्त्री बीच सड़क पर चिलचिलाती धूप में अकेले प्रसव पीड़ा से छटपटा रही है तथा कुछ गली के लड़के एवं स्त्रियाँ अपने-अपने घरों के सामने से पगली की प्रसव-पीड़ा को तमाशा समझ कर देख रहे हैं, लेकिन उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आता। तभी उधर से एक किन्नरों की टोली गुजरती है। उन लोगों की नजर उस पागल औरत पर पड़ती है, जो प्रसव पीड़ा में तड़प रही है। आख़िर में किन्नर समुदाय ही आगे आता है। नाजबीबी नामक किन्नर अपने साथियों की मदद से उसकी डिलवरी करवाती है। पागल स्त्री लड़की को जन्म देकर इस दुनिया से हमेशा के लिए मुक्त हो जाती है। अब किन्नर समुदाय के सामने यह समस्या है कि उस नवजात बच्ची को किसे सौंपे? कौन उसे अपनाएगा? नाजबीबी उस मुहल्ले के सभी दरवाज़े पर जा कर उस बच्ची को अपनाने के लिए सभी से आग्रह करती है, पर सभी मुहल्ले वाले उस बच्ची को किसी का पाप समझकर अपनाने से इंकार कर देते हैं। आख़िर में नाजबीबी समाज की सभी चुनौतियों को स्वीकार करते हुए उस नन्हीं सी बच्ची को अपने साथ अपनी बिरादरी में लेकर आती है, तथा उसको पालने का संकल्प लेती है। 'यमदीप' उपन्यास में पागल स्त्री के माध्यम से लेखिका समाज की सच्चाईयों को परत-दर परत खोलती है। इसमें पुरुष वर्ग का हैवानियत भरा चेहरा जिसमें हवस की भूख साफ दिखाई देता है। जब नाजबीबी उन लड़कों से अपने घर की औरतों को बुलाने के लिए कहती है कि आकर इस पगली की मदद कर दे, तभी एक लड़का व्यंग स्वर में बोलता 'हूँ, इस पगली के लिए?...' मंजु उन लड़कों को जवाब देते हुए कहती है ”इस पगली के लिए तुम्हारी अम्मा बाहर नहीं आ सकती और तुम्हारे ही बाप-दादों ने रात में आकर मुँह काला किया होगा... हाय, हाय रे! मरदों का जमाना!'... तभी मंजु कहती है 'तो क्या हम लोगों का बच्चा आ गया इस पागल औरत के पेट में?'3 एक पागल औरत के साथ इतना घिनौना काम किया जाता है, जिसके पाप का बोझ वह नौ महीनों तक अपने पेट में ढोती है। तथा अंत में अपने प्राण त्याग कर इस दुनिया से हमेशा के लिए मुक्त हो जाती है। 
नीरजा माधव ने 'यमदीप' उपन्यास के माध्यम से समाज में स्त्रियों के दोहरे चरित्र पर भी कड़ा प्रहार किया है। कैसे एक तरफ समाज सेवा की आड़ में रीता देवी जैसी महिलाएं चंद पैसे के लिए अनाथ एवं नाबालिग़ लड़कियों से जिस्मफरोशी का धंधा करवाती है। वहीं दूसरी तरफ मानवी जैसी लड़की इस समाज की सारी बुराइयों के खिलाफ अकेले आवाज़ उठाती हुई नजर आती है। यहाँ तक कि रीता देवी का नारी उद्धार गृह में चल रहे जिस्म के धंधे को भी सारे जोखिम उठाते हुए पर्दाफाश करती है। कैसे कुछ भ्रष्ट राजनीतिज्ञ, प्रशासनिक लोगों के बल पर अबला, नाबालिग़ लड़कियों से उद्धार के नाम पर वेश्यावृत्ति जैसा घिनौना काम कराया जाता है। तो वहीं दूसरी तरफ जो समाज में कलंकित माने जाने वाली किन्नर नाजबीबी अनाथ लड़की सोना के लिए न चाहते हुए भी एक 'गिरिया' ;रखैल पुरुषद्ध रखती है ताकि वह सोना की अच्छी परवरिश कर सके तथा उसको किसी अच्छे स्कूल में पढ़ा सके, उसको एक अच्छा भविष्य दे सके तथा समाज में उसे एक अच्छी पहचान मिले। नाजबीबी को सोना में अपना अधूरा बचपन दिखाई देता है। सोना अनाथ होने के कारण इस समाज में आई, लेकिन नाजबीबी को माता-पिता के जीवित रहते हुए इस समाज का दामन पकड़ना पड़ा ।
निष्कर्षतः देखा जाए तो हमारे समाज में अर्धनारीश्वर भगवान शिव की पूजा की जाती है जो मिथक माना गया है, लेकिन वही रूप अगर ग़लती से इंसान का हो जाता है तो उसको घर, परिवार, समाज में घृणित निगाहों से देखा जाता है तथा पूरा समाज उसे बाहिष्कृत कर देता है। इस समाज की यह बहुत बड़ी त्रासदी है। इस तरह उसे अपमानित, प्रताड़ित किया जाता है। आज समाज को अपनी घृणित मानसिकता को बदलना होगा। आज साहित्य विमर्शों का दौर माना जा रहा है। निम्नलिखित विमर्श उभरकर सामने आ रहे हैं- जैसे स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, किसान विमर्श आदि। जोरों पर आंदोलन हो रहे हैं पर क्या कभी किन्नरों की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया? यह सुनने या देखने को नहीं मिल रहा है कि किन्नरों के अधिकार के लिए किसी भी तरह का कोई आंदोलन चलाया गया हो। आज का राजनीतिक मुद्दा दलित बनाम सवर्ण है, मुस्लिम बनाम हिंदू, पर कभी भी स्त्री-पुरुष बनाम किन्नर मुद्दे को नहीं उठाया गया क्योंकि किन्नरों को वोट डालने का अधिकार नहीं दिया गया था तो उसे उन्हें राजनीति में कैसे फायदा मिल सकता था, अगर इन्हें वोट डालने का अधिकार मिला भी है तो इनकी आबादी कितनी है कि इनके विकास, अधिकार आदि के लिए मुद्दा उठाया जाए? आज पूरा देश आरक्षण के लिए आपस में लड़ रहा है। किसी को 50 प्रतिशत आरक्षण चाहिए तो किसी को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है, तथा दलतों को अपने पिछड़े होने के कारण आरक्षण उनका जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन क्या ये लोग जो आरक्षण पर अधिकार जमाकर बैठे हैं किन्नरों से भी गए गुजरे हैं कि इनके सामने किन्नरों को कोई आरक्षण की ज़रूरत नहीं है? जिनके लिए दुनिया के सभी विद्यालयों, विश्वविद्यालयों एवं काॅलेजों के दरवाज़े खुले हुए हैं। किंतु किन्नरों के लिए समाज के सभी दरवाज़े बंद कर दिए गए हैं। यहाँ तक कि किसी दफ़्तर में भी इन लोगों को नौकरियाँ नसीब नहीं होतीं। यह समाज के वह अछूत वर्ग मान लिए गए हैं जिन पर नजर पड़ते ही अपसगुन मान लिया जाता है। इस समाज ने किन्नरों को सिर्फ अपने घरों में नाचने-गाने के लिए ही स्पेशल रखा है। किन्नर अपने पेट की आग बुझाने के लिए वेश्यावृति तक को भी अपना रहे हैं। जिसका परिणाम बहुत भयानक होता जा रहा है। एड्स जैसी जानलेवा बीमारी इन लोगों में तेज़ी से बढ़ रही है। आख़िर यह लोग कहाँ जाएंगे? क्या करेंगे? जो लोग शारीरिक, मानसिक रूप से विकलांग हैं उसे आरक्षण का लाभ दिया जाता है, क्या किन्नर शारीरिक रूप से विकलांग नहीं माना जाएगा? जिसका शरीर के एक अंग पूर्ण रूप से विकास नहीं हो पाया है। यह भी तो एक प्रकार की विकलांगता ही है। किन्नरों के बारे में लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी तथा सरकार को भी इनके लिए कुछ करने की ज़रूरत हैं तभी किन्नरों की स्थिति को सुधारा जा सकता हैं और एड्स जैसे खतरनाक बीमारी पर रोक लगाया जा सकता है। सबसे ज्यादा इन लोगों को आरक्षण की ज़रूरत है। ताकि इनको समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। और वे लोग भी अपने-आप को श्रापित न समझें। इस प्रकार से किन्नरों को भी अपने जीवन-यापन के लिए रोजगार मिल सके। किन्नरों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना पड़ेगा। 
1. किन्नरों को भी शिक्षा ग्रहण करने का बराबर अधिकार मिलना चाहिए।
2. किन्नर को भी स्वास्थ, शिक्षा, नौकरी में आरक्षण होना चाहिए। 
3. किन्नर समाज के लिए भी एक अलग पुलिस स्टेशन होना चाहिए, जैसे महिला थाना है। 
4. राजनीति में भी स्त्री-पुरुष के अलावा किन्नरों को भी चुनाव लड़ने का हक होना चाहिए। 
5. किन्नरों को समाज में बराबर का दर्जा मिलना चाहिए। आदि।
संदर्भ
1. प्रदीप सौरभ,तीसरी ताली,वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली,पृ.55 
2. नीरजा माधव, यमदीप, सुनील साहित्य सदन, नई दिल्ली, पृ. 93-94  
3. माधव नीरजा,यमदीप,सुनील साहित्य सदन. नई दिल्ली. पृष्ट 10,11


Tuesday, December 3, 2019

उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी शोषण का यथार्थ:  ग़ायब होता देश


बृजेश चन्द्र कौशल
(शोध-छात्र)
(बीएड, एमफिल, जेआरएफ)
डॅा. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास,
विश्वविद्यालय लखनऊ


उजड़ते हुए मुंडा आदिवासी समाज का सच रणेन्द्र कृत 'ग़ायब होता देश' आदिवासी समाज के उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी शोषण का महाकाव्यात्मक उपन्यास है। मुख्यधारा से कटा हुआ यह समाज अशिक्षित और पिछड़ा होने से आधुनिक जनसंचार माध्यमों तक अपनी पीड़ा कथा व्यथा पहुंचाने में असमर्थ है। इस कमी का भरपूर लाभ शोषक शक्तियां आदिवासी लोगों को अपराधी और नक्सली घोषित करके भरपूर लाभ ले रही हैं। इनके इलाकों में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपने उद्योग धंधे लगाकर चिमनियों से निकला हुआ विष उनके उपर जबरदस्ती छोड़ा जाता है और कोयला निकाल कर गहरे गड्ढे उनको तथा उनके खेलते हुए बच्चों को बारिश के दिनों में डूब कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। सभी गड्ढ़ों में मच्छर के एकत्रित होने के कारण आदिवासी समाज को जीवन यापन करने के लिए बड़ी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आदिवासी समाज को सबसे ज्यादा डर बाघ, बारिश और पुलिस से होता है पुलिस के लोग शासन के आदेश पर अपनी बंदूक के बल पर जब चाहे जितनी चाहे उनकी जमीन खाली करा लेते हैं और उनको बेघर होने पर मजबूर कर देते हैं। शिक्षा के नाम पर कोई भी स्कूल नहीं, पीने के लिए पानी नहीं, बारिश में रहने के लिए घर नहीं और ना ही कोई डाक्टरी सुविधा दी जाती है।
उपनिवेशवाद के इस दौर में 'ग़ायब होता देश' नवसाम्राज्यवादी शोषण का सच जिस प्रकार से लेखक कहता है ''वह मुंडा आदिवासी समाज के संकट, शोषण, लूट पीड़ा और प्रवंचना का इतिवृत्त है। किस तरह सोना लेकिन दिसुम विकास के नाम पर रियल एस्टेट द्वारा ग्लोबल भूमंडलीकृत पतन का शिकार है।''1 साम्राज्यवादी ताकतें जिस तरह जल जंगल जमीन-पहचान को और ट्रेफिकिंग द्वारा बेटियों को हजम कर रही हैं, उसके विरूद्ध ग़ायब होता देश ने अपनी आवाज रखने में बहुत बड़ी सफलता हासिल की  है। सोना लेकिन दिसुम-सोना जैसा देश! मुंडाओं को कोकराह ऐसा ही लगा था। ''हेनसांग ने सोने के कणों से चमकती नदी का नाम स्वर्ण किरण रखा, जो बाद में स्वर्ण रेखा कहलाई।... सोने के कणों से जगमगाती स्वर्ण किरण-स्वर्ण रेखा, हीरो की कौंध से चैंधियाती शंख नदी, सफेद हाथी श्यामचंद्र और सबसे बढ़कर हरे सोने, शाल सखुआ के वन। यही था मुंडाओं का सोना लेकिन दिसुम।''2
विकास का ढोल पीटती बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आदिवासी क्षेत्रों में अपना उद्योग स्थापित करके मालिकाना हक जताती हैं क्योंकि पूंजीवादी विकास के रास्ते यहीं से होकर जाते हैं जिसमें तथाकथित लोकतंत्र आदिवासियों के इस शोषण का मूक दर्शक बनकर बराबर सहयोग दे रहा है। जो कि किशन विद्रोही नामक पात्र की हत्या कर दी जाती है जब वह अपनी आवाज़ इन लोगों के ख़िलाफ़ उठाता है। परंतु इस आदिवासी पत्रकार की हत्या का कोई भी अख़बार, टीवी, चैनल, सच कहने को तैयार नहीं होता कि किशन विद्रोही की हत्या की गयी।
'ग़ायब होता देश' उपन्यास में वसुंधरा बाॅक्साइड प्रोडक्ट प्रा. लिमिटेड, वसुंधरा आइस एंड स्टील, रियल स्टेट परियोजना, विपासा काॅरपोरेशन लि. और इसी ऐजेंसी के क्लाइंट बड़े-बड़े काॅरपोरेट्स आदि की खनन परियोजनाओं ने आदिवासी समाज के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। लेकिन लोकतंत्र इस सच से जो भाग रहा है उसके पीछे नोटों से भरी बोरियाँ और ताकतों के बल पर आदिवासी टोले ग़ायब किए जा रहे हैं। जिसका कारण रियल स्टेट, खनन और बाँध परियोजनाएँ आदि के निर्माण से संबंध ये कंपनियाँ न केवल आदिवासियांे को उनकी जमीन से उजाड़कर उनका वर्तमान बर्बाद कर रही हैं बल्कि प्रतिरोध और आंदोलन को भी कमज़ोर कर रही हैं। किशन विद्रोही की हत्या के बाद अख़बारों की उदासीनता यह बतलाती है कि किस प्रकार मीडिया इस पूँजीतंत्र की गिरफ्त में आ गया है ''किशनपुर एक्सप्रेस अख़बार तक किशन विद्रोही उर्फ के.के.की. विद्रोही चेतना बनी हुई थी, पर पूँजीपतियों द्वारा उसे टाॅर्चर करने की शुरूआत वहीं से हो गई। अंततः उसे 'किशनपुर एक्सप्रेस' छोड़ने पर बाध्य होना पड़ा पूँजी बाजार, बिल्डर माफिया और सत्ता तंत्र की किस प्रकार लोकतंत्र के चैथे खंभे का इस्तेमाल करते हैं, उसे उंगलियों पर नचाते हैं, इन्ही तिकड़मों के ब्यौरों से कथा आगे बढ़ती है। किशन विद्रोही टूट जाता है पूँजी बाजार एवं माफिया तथा राजनीतिक सत्ता के कुचक्र का शिकार हो जाती है।''3
इसके साथ ही विकास के भूमंडलीय दावे की असलियत भी खुलने लगती है कि किस प्रकार से आदिवासी आबादी के विनाश करके विकास का समाजशास्त्र रचा जा रहा है। समाज में उपनिवेशीकरण की जो प्रक्रिया आज से कुछ साल पहले शुरू हुई थी उसी का विकसित रूप आज भी विकास के नाम पर एक बड़ी आबादी को अपनी जमीन, अपने पर्यावरण और हक तथा कानूनों से वंचित होना पड़ता है। इसके विरोध में विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास 'समर शेष है' में बहुत ही आक्रामक रूप देखने को मिलता है। जब गुरू जी पूरे मामले को समझकर ललकारते हुए कहते हैं ''क्या तुम लोग इसी तरह हाथ धरे बैठे रहोगे? क्या हो गया है तुम्हें? कैसी है यह कायरता? अब उनमें से कोई इन गाँवों में आए तो तीर से बींध डालो, हाथ-पैर तोड़ दो कैसा डर? किसका डर यह ज़मीन तुम्हारी, यह आसमान तुम्हारा। यह जंगल-झाड़ सब तुम्हारे हैं। भूल जाओ कि तुमने इन्हें महाजनों के पास रेहन रखा है। किसी का कोई कर्ज़ नहीं है, तुम पर। कोई दावा करे तो सर तोड़ दो उसका।''4
आदिवासियों के विकास को कुंद करके आर्थिक विकास की गति के जो तत्व मुख्य रूप से हैं, वह डाॅ. सोमेश्वर सिंह, मुंडा, विरेन, सोनामनी दीदी, नीरज पाहन, अनुजा दी, एतवा दादा आदि आदिवासियों के संघर्षों और प्रतिरोधों के महान अतीत को विकृत करने से भी बाज नहीं आते। जागरूक आदिवासी नेतृत्व को बदनाम करने, उन्हें विकास विरोधी और नक्सली बता अवांक्षित सिद्ध करने के साथ रियल एस्टेट और खनन माफियाओं के पक्ष में माहौल बनाने के लिए पूंजीवादी कंपनियाँ अपने स्वयं के अख़बारांे, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर टी.वी. चैनल्स तक खोलने लगी है। शोषक वर्ग द्वारा किस प्रकार से किशन विद्रोही पत्रकार को डराकर अपनी क्रूरता का परिचय देता है। ''अब वे दिन दूर नहीं कि उद्योगपतियों-उद्यमियों की सफलता की कहानियाँ अख़बारों की हेडलाइंस बनेंगी। व्यूरोक्रेसी, लेजिस्लेशन की विफलता, गाँव-ग़रीबी-बदहाली के किस्से बहुत हो गए। लोकनायक का स्वर्गवास हेतु दशकों बीत गए। आप जैसे लोग वहीं खड़े कदमताल कर रहे हैं और आपको अपनी मेहनत का भ्रम भी है कि आपकी ही क्रांतिकारी लेखनी से समाज बदलेगा। ख़ुमारी से निकलिए नहीं तो दुनिया आगे निकल जाएगी, आप वहीं कदमताल करते रह जाएंगे।''5
आदिवासी समाज का सच कहीं भी अपनी जगह ठीक से तय नहीं कर पाया है, जिसकी वजह आदिवासियों का इतिहास, इतिहास की पुस्तकों में जगह ही नहीं बना पाया है और अगर कहीं हाशिए के किसी कोने से आदिवासी झाँकता मिल भी जाए, तो उसके इतिहास को इतना तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया कि सच्चाई से कोई नाता है ही नहीं ''सच्चाई से रहो, ईमानदारी से जियो, नफ़रत त्याग दो यह सब किताबों में लिखा है। एक दम झूठ। यह सब हमारे लिए नहीं है। लोग हमें डराते हैं। हम डर के मारे झूठ बोलते हैं, बेईमानी पर चलते हैं। नफ़रत करते हैं।''6 आदिवासियों के हक़ की लड़ाई का एक मात्र सहारा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही किंवदंतियों और मिथकों को अपना विषय बनाएं और यही काम जादुई यथार्थवाद करता है जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण 'ग़ायब होता देश'। उपनिवेशवाद में नवसाम्राज्यवादी का यथार्थ देखा जाय तो मैत्रैयी पुष्पा कृत 'अल्मा कबूतरी' में राणा द्वारा कहे गए वाक्य कबूतरा समाज का सच है। कबूतरा समाज के लोग भी जीवन जीना चाहते हैं लेकिन उन्हें यह नसीब नहीं होता जिसके कारण उनको संघर्ष के लिए मजबूर होना पड़ता है।
आदिवासी समाज के संघर्ष का जीता जागता उदाहरण रणेंद्र का पहला उपन्यास 'ग्लोबल गाँव का देवता' में जब असुर जनजाति के क्रमिक विघटन के लिए उत्तरोत्तर हावी होती बाज़ार शक्तियों के बीच व्यावसायिक संघर्ष का वर्णन बहुत ही अच्छी तरह से किया गया है, जो आदिवासी संघर्ष का एक प्रत्यक्ष उदाहरण बनकर सामने आता है ''इस बार कथा कहानी वाले सिंग-बोंगा नेे नहीं, टाटा जैसी कंपनियों ने हमारा नाश किया। उनकी फैक्टरियों में बना लोहा, कुदाल, खुरपी, गैती, खंती, सुदूर हाटों तक पहुँच गए। हमारे गलाए लोहे के औज़ारों की एक पूछ खत्म हो गई। लोहा डालने का हज़ारों-हज़ार साल का हमारा हुनर धीरे-धीरे ख़त्म हो गया।''7
पूँजीवादी विकास की दौड़ में शामिल लोग कैसे घास की तरह एक मानव समुदाय को चरते जा रहे हैं। यह उपन्यास इसी की मार्मिक कथा है। घास को चरने में आज का हर वह मनुष्य शामिल है, इसमें हम भी हैं आप भी हैं। हम वैचारिक धरातल पर बहस करते हैं लेकिन विडंबना यह है कि उसी के दाना-पानी से जीवित हैं, इस दौर में कोई दाना-पानी से बचा है तो आदिवासी समाज। इसलिए आज आदिवासी समाज को सबसे ज्यादा प्रलोभन देने की कोशिश की जा रही है कि वह जाल में फंस जाय और उसके पास मौजूद जल, जंगल, जमीन को उन्हें विकास के नाम पर सौंप दें। यह विकास मछली को फंसाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले चारे की तरह है जो चारे में नहीं फंसना चाहता वह विद्रोही मान लिया जाता है। जो इस प्रकार से देखा जा सकता है। ''वे अपनी प्रथाओं और मान्यताओं के अनुसार निश्चिंत होकर स्वच्छंद भाव से जीवन जीना चाहते हैं। जंगलों में प्रवेश से रोक लगने के कारण उनके रोजगार नष्ट होने लगे। इसलिए आदिवासी समाज को अपने स्थान से पलायन होने पर मजबूर होना पड़ा। यदि उनके ऊपर किसी भी प्रकार का बाहरी हस्तक्षेप किया जाता है तो उसको वो अपना शत्रु समझ लेते हैं और फिर वे आंदोलन के लिए तत्पर हो उठते हैं।''8 आदिवासियों को विकास की दृष्टि से देखा जाय तो विकास के नाम पर मची लूट के कारण सदियों से अपनी जर, जमीन और जंगल पहाड़ के बीच रह रहे लोगों के अस्तित्व की रक्षा के लिए किए जाने वाले संघर्ष की ही यह कथा है। 
गाँव के लोगों के बीच जेम्स मिल जो उपकार करता है। उसके पीछे उसकी सदाशयता नहीं, बल्कि विनाशकारी योजनाएं हैं, बड़े बांध, खनिजों की बेतहाशा लूट जंगलों को उजाड़ कर इमारतें बनवाना और अकूत पैसा बनाने की अंधाधुंध होड़ ने जंगल पर आश्रित आदिवासियों के जीवन को संकट में डाल दिया है। सरकारों का काम रह गया है बिल्डर, माफिया, ठेकेदार और पूूँजीपतियों, मल्टीनेशनल कंपनियांे के हितों की रक्षा करना। बाजार के वैश्वीकरण ने दुनिया की एक बड़ी आबादी को विकास के नाम पर निराशा की ओर धकेल दिया है। ''उधर सोनामनी दी-नीरज पाहन 'हत्यारे को फाँसी' और पाहन बाबा हत्याकंड जाँच के लिए जुलूस, धरना प्रदर्शन करते तो दूसरी ओर दुरगंदह बचाओं संघर्ष समिति नदी को अतिक्रमण मुक्त, क्लीन किशनपुर-ग्रीन किशनपुर, गंदी बस्तियों का स्थानांतरण आदि मांगों को लेकर ज्यादा बड़ा जुलूस, प्रदर्शन सेमीनार, कांफ्रेन्स की झड़ी लगा रखी थी। नतीजतन सारे शोरगुल बाबा की हत्या के सवाल खोकर रह गए।कृउसके बाद आज न किशन दा हैं और न अनुजा सोमा दी का कोई पता... आदिवासी गाँवों, बस्तियों का उजड़ना पहले से भी तेज़ी से हो रहा है।''9 आदिवासी विरोधी तथाकथित नागरिक आंदोलनों का और स्वयंसेवी संगठनों की गतिविधियों का जादू तो स्थिति को और भी उलझाने वाला है। प्रभावशाली साहब लोगों के नागरिक संगठन अपने संपर्कों और ताकत का इस्तेमाल करके आदिवासी यथार्थ को धूमिल कर रहे हैं। अशोक पोद्दार के साथ-साथ चैदह-पंद्रह साल की लड़की की लाशें मिली थीं। दोनों की गरदन पर तेज़ धारदार हथियार से काटने के निशान मौजूद थे। ''वह बच्ची ग़रीब और आदिवासी दिख रही थी। इसीलिए 'एतवा पाहन गुट के आत्मघाती दस्ते की मेंबर' वाला समाचार गढ़ा गया, क्योंकि एफआईआर के शब्द भी वही हैं। अब उस बच्ची की देह पर कपड़ा क्यों नहीं था? तेज धार वाला वह हथियार कहाँ विला गया? उसकी जांघ खून से लथपथ क्यों थी? और छातियों पर जख्म किसने लगाए थे?''10 भौतिक जगत की सीमाओं से मुक्त होने की सनातन मानवीय इच्छा। इसी इच्छा की परिणति किसी मनुष्य या प्राणी या वस्तु के ग़ायब होने जाने की फैंटेसी या मिथकीय कथा के शृजन के रूप में प्रायः देखी जा सकती है 'ग़ायब होता देश' उपन्यास में तो आदिवासियों का जीता-जागता देश ही भूमाफियाओं और खनन माफियाओं के षड़यंत्रों और छीना-झपटी में देश के मूल बाशिंदे आदिवासियों की आँखों के सामने ही ग़ायब होता जा रहा है। इस प्रकार 'ग़ायब होता देश' '' वैश्विक काॅरपोरेट कंपनियाँ आदिवासियों के देशज ज्ञान को चुरा अपने नाम पर पेटेंट कराकर उपभोक्तावादी बाजार में पूंजी के महल खड़ा कर रही है। भोला-भाला अनपढ़, ग़रीब आदिवासी अपने ज्ञान की इस पूँजीवादी लूट से अनभिज्ञ इन काॅरपोरेटों की चालों का शिकार बनता जा रहा है।''11 
आदिवासियों की जमीन पर कल-कारखाने और बड़े उद्योग बन रहे हैं, बड़े-बड़े चमकदार माॅल बन रहे हैं लेकिन उस ज़मीन के असली हक़दार उसी की चमक में दफ़न हो रहे हैं और इस आधुनिकता में नवसाम्राज्यवाद का यह यथार्थ है कि इस पर राष्ट्रीय जश्न मनाया जाता है। इस उपन्यास में राजनीतिक और प्रशासनिक मिली भगत से किस तरह झारखंड में भूमाफियाओं ने आदिवासियों की ज़मीन को कब्जाया और किस तरह से ज़मीन हाथ से निकलते ही आदिवासियों की पहचान मिट जाती है। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण 'ग़ायब होता देश' में देखने को मिलता है।
संदर्भ
1. रणेंद्र, 'ग़ायब होता देश', पेंगुइन बुक्स इण्डिया, प्रथम संस्करण-2014 की भूमिका से।
2. वही पृष्ठ-1
3. संजय सहाय, हंस, मानवीय संकट की कथा, अजय वर्मा ;समी.द्ध, जनवरी-2016, पृष्ठ-87
4. विनोद कुमार शुक्ल, 'समर शेष है', नई दिल्लीः प्रकाशन संस्थान, संस्करण-1999, पृष्ठ-87
5. ग़ायब होता देश, पृष्ठ-120-121
6. मैत्रैयी पुष्पा, 'अल्मा कबूतरी', नई दिल्लीः राजकमल प्रकाशन, तीसरी आवृत्ति-2011 पृष्ठ-99
7. रणेंद्र 'ग्लोबल गाँव का देवता' नई दिल्ली भारतीय ज्ञानपीठ, प्रथम संस्करण-2009, पृष्ठ-83
8. शैलेंद्र सागर, 'कथा क्रम', विशेषांक आदिवासी समाज और साहित्य, प्रो. वीर भारत तलवार ;साक्षा.द्ध, सभी सत्ताधारी आदिवासियों के आदिवासीपन से डरते हैं, केदार प्रसाद मीणा द्वारा, वर्ष-14, अंक-50 अक्टूबर-दिसंबर- 2011, पृष्ठ-8
9. ग़ायब होता देश, पृष्ठ-164
10. वही, पृष्ठ-291
11. डाॅ. एम. फिरोज़ अहमद, 'वाङ्मय', आदिवासी विशेषांक-3, ग़ायब होते जीते जागते आदिवासी ;शोधद्ध, प्रमोद मीणा, जुलाई-2013, पृष्ठ-24


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