Friday, May 15, 2020

परिणय की इस वर्षगांठ पर,


 


इन्द्रदेव भारती

 

 

प्रिये ! तुम्हारे,

और.....हमारे,

परिणय की इस वर्षगांठ पर,

आज कहो तो,

क्या दूँ तुमको,

जो कुछ भी है,प्रिये ! तुम्हारा,

मेरा क्या है ।।



नयन....तुम्हारे,

स्वप्न.....तुम्हारे,

मधु-रजनी नवरंग तुम्हारे।

सुबह- शाम के,

आठों याम के,

जन्म-मरण के रंग तुम्हारे।

कल-आज-कल,

सुख का हर पल,

सब पर लिक्खा नाम तुम्हारा,

मेरा क्या है ।।



स्वांस तुम्हारे,

प्राण तुम्हारे,

तन-मन के सब चाव तुम्हारे।

पृष्ठ....तुम्हारे,

कलम तुम्हारे,

गीत-ग़ज़ल के भाव तुम्हारे।

तुमको अर्पण,

और समर्पण,

मेरा यह सर्वस्व तुम्हारा,

मेरा क्या है ।।

 


48 वे "परिणय दिवस" पर उर के उद्गार 



Wednesday, April 8, 2020

महामारी में


इन्द्रदेव भारती


दाता जीवन दीप बचाले,
मौत की इस अँधियारी में।
अपने लगने लगे बेगाने,
दाता इस महामारी में।।


1.
बंद पड़ा संसार है दाता।
बंद पड़ा घर-द्वार है दाता।
बंद पड़ा व्यापार है दाता।
बंद पड़ा रुजगार है दाता।
नक़द है मेहनत, लेकिन मालिक,
धेल्ला दे न उधारी में।।


2.
छोड़ शहर के खोट हैं लौटे।
खाकर गहरी चोट हैं लौटे।
गला भूख का घोट हैं लौटे।
लेकर प्यासे होंठ हैं लौटे।
चले गाँव के गाँव, गाँव को,
आज अजब लाचारी में।।


3.
आगे-घर के राम-रमैया।
पीछे छुटके बहना-भैया।
लाद थकन को चलती मैया।
पाँव पहनके छाले भैया।
राजपथों को नापें कुनबे,
ज्यों अपनी गलियारी में।।



4.
आँगन से छत, चैबारे लो।
चैबारे से अंगनारे लो।
अंगनारे से घर-द्वारे लो।
घर-द्वारे से ओसारे लो।
घूम रहे हैं अपने घर में,
कै़द हो चार दीवारी में।।


5.
घर के बाहर है सन्नाटा।
घर के भीतर है सन्नाटा।
इस सन्नाटे ने है काटा।
घर में दाल, नमक न आटा।
उपवासों की झड़ी लगी है,
भूखों की बेकारी में।।


6.
दूध-मुहों की बोतल खाली।
चाय की प्याली अपनी खाली।
तवा, चीमटा, कौली, थाली।
बजा रहे हैं सारे ताली।
चूल्हे बैठे हैं लकड़ी के-
स्वागत की तैयारी में।।


7.
धनवानों के भाग्य हरे हैं।
महलों के कोठार भरे हैं।
एक के उनके चार धरे हैं।
घर अपने दुर्भाग्य खरे हैं।
भंडारे के बर्तन खाली,
निर्धनिया की बारी में।।


8.
एक छोटा डिब्बा दिखलाते।
दोनों हाथों में पकड़ाते।
दस-दस हाथों से दिलवाते।
एक बड़ा फोटो खिंचवाते।
अखबारों में छाप दिखाते,
सुबह की उजियारी में।।


Wednesday, April 1, 2020

एक बेगम की जिन्दगी का सच

एक बेगम की जिन्दगी का सच :


जिसमें इतिहास की गरिमा और साहित्य की रवानी है




  • अनिल अविश्रांत


 


 कहा जाता है कि कुछ सच कल्पनाओं से भी अधिक अविश्वसनीय होते हैं।


'बेगम समरू का सच' कुछ ऐसा ही सच है। एक नर्तकी फरजाना से बेगम समरू बनने तक की यह यात्रा न केवल एक बेहद साधारण लड़की की कहानी है बल्कि एक ऐसे युग से गुजरना है जिसे इतिहासकारों ने आमतौर पर 'अंधकार युग' कह कर इतिश्री कर ली है, पर उसी अंधेरे मे न जाने कितने सितारे रौशन थे, न जाने कितनी मशालें जल रही थीं और न जाने कितने जुगनू अंधेरों के खिलाफ लड़ रहे थे। फरजाना एक सितारा थी जिसने अपनी कला, अपनी बुद्धि और अपने कौशल से इतिहास में अपने लिए जगह बनाई।


साहित्यिक विधा में इतिहास लिखना एक बड़ा जोखिम भरा काम है। जरा-सा असन्तुलन रचना की प्रभावशीलता को खत्म कर सकता है। इसके लिए विशेष लेखकीय कौशल की आवश्यकता होती है। 'बेगम समरू का सच' पढते हुए यह कौशल दिखता है। यह किताब न केवल इतिहास की रक्षा करने में सफल रहती है बल्कि इसे पढ़ते हुए पाठक को साहित्य का रस भी प्राप्त होता है। लेखक का अनुसंधान, ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति ईमानदारी, और पात्रों के प्रति निर्मम तटस्थता इतिहास लेखन की बुनियादी शर्त है जिसका पालन इस किताब में हुआ है। फरजाना से बेगम समरू बनने तक के सफर में अनेक ऐसे सन्दर्भ हैं जहाँ लेखक कल्पना की उड़ान भर सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण रखा है। बावजूद इसके कि किताब की मुख्य किरदार फरजाना के प्रति उनका स्नेह स्वाभाविक है, पात्र के प्रति इस स्नेह के बगैर पुनर्सृजन संभव भी नही है, पर  पात्र यदि ऐतिहासिक हो, स्त्री हो, शासिका हो तो लेखक के सामने चुनौती बड़ी हो जाती है क्योंकि उसके इर्द-गिर्द रहस्यों-अफवाहों का बड़ा गुबार इकट्ठा हो जाता है। इसे तथ्यों के विवेकपूर्ण विश्लेषण से ही बुहारकर साफ किया जा सकता है। किताब के आंरभ में 'दो शब्द' लिखते हुए लेखक ने लिखा भी है-


फरजाना उर्फ बेगम समरू अट्ठारहवीं सदी के उत्तरार्ध का वह चरित्र है, जिसके बिना उस सदी के एक बड़े भाग से लेकर उन्नीसवीं सदी के आरम्भ तक का उत्तरी भारत का इतिहास अधूरा है, तत्कालीन दिल्ली में नृत्यांगना के रूप में जीविका चलाने वाली पन्द्रह वर्ष की वह बाला बाद में सरधना की बेगम समरू के नाम से विख्यात हुई।वह जुझारू थी, समझदार थी, कूटनीति और रणनीतियों में माहिर थी। सन् 1778 से लेकर 1836 की उनकी सक्रियता का वह कालखंड और पूर्व में अपने पति के साथ बिताये गये समझदारी के दिनों से, बेगम को श्रद्धा से देखता है।जैसा कि स्वाभाविक है कुछ लोग उसमें संशय भी ढूढ़ते हैं, पर बिना किसी प्रामाणिक तथ्यों के। इतिहास किसी शख्सियत या घटना का समग्रता में मूल्यांकन करने की शाखा है, कि कल्पनाशीलता से किसी के चरित्र हनन की। फिर किसी स्त्री शासक का मूल्यांकन करने में यूँ भी इतिहास और व्यक्ति निर्मम होते हैं, परन्तु इतिहास हमेशा शाश्वत होता है और उसके तथ्य श्लाघ्य, इसे नहीं भूला जा सकता है।'


कुल तैंतीस अध्यायों में विभाजित यह किताब पन्द्रह वर्षीय एक अनाम नर्तकी फरजाना और एक जर्मनी मूल के फ्रेंच सैनिक रेन्हार्ट सोंब्रे की चावड़ी बाजार स्थिति कोठे पर एक नाटकीय मुलाकात से शुरू होती है। सत्रहवीं सदी के हिसाब से ये दृष्य बेहद सहज और सामान्य है लेकिन यह मुलाकात इतिहास में एक असाधारण घटना की प्रस्थान बिन्दु बन जाती है जिसने लगभग आधी सदी तक अपनी उपस्थिति दर्ज करायी और हिन्दुस्तान की सियासत में अव्वल दर्जा हासिल किया। फरजाना का प्रवेश ही लेखक ने इतना मन लगाकर और साहित्यिक चाशनी के साथ किया है कि पाठक एक सम्मोहन में डूब जाता है-


'कलात्मक नक्काशीयुक्त वह विशाल दरवाजा बीच-बीच में नीले-हरे-गुलाबी और बैंगनी कांच के टुकड़ों की कलाकारी से सज्जित था। धीमे-धीमे उसके पट खुलते ही एक जोड़ी खूबसूरत हिरणी-सी, गोल-मटोल, पर सकुचाई-सी आँखों ने पल भर माहौल का जायजा लिया। वह ठिठकी,फिर चली, धीरे-धीरे, से कदमों से।उन कदमों से, जिनसे निकल रही घुंघरुओं की खनक कानों में संगीत घोल रही थी। लगता था कि विशाल कमरे के बीचो-बीच लगे रंग-बिरंगे झाड़-फानूस से परावर्तित हो रही मोमबत्तियों की रोशनियों को भी मात मिल रही थी।उसके चेहरे से टपकता नूर ही ऐसा था।माहौल की रंगीनी ने उस यौवना की खुबसूरती को कुछ ज्यादा ही बढा दिया था।'


एक सख्त और समझदार प्रशासक के साथ-साथ बेगम समरू का एक कोमल हृदय भी था। वह महज अट्ठाइस साल की थी,जब समरू साहब का इंतकाल हो गया था। वह सदैव नवाब समरू के प्रति वफादार रहीं लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनके लिए एकाकी जीवन अभिशाप सदृश था। इस बीच वह दो फ्रांसीसी सैन्य अधिकारियों के संपर्क में आईं। जार्ज थामस से उनका रिश्ता जहाँ स्नेह और मैत्री का था वहीं ली-वासे से उन्हें प्रेम भी हुआ। इन प्रसंगों पर विस्तार से अलग-अलग अध्यायों में वर्णन किया गया है। इन्हें पढ़ते हुए उपन्यास सदृश सुखानुभूति होती है। इस किताब का एक महत्वपूर्ण अध्याय वह भी है जिसमें बेगम समरू के गुप्त पति ली वाशे की आत्महत्या के बाद उनका अपने ही सौतेले पुत्र द्वारा कैद कर लिया जाना है। राजनीति कितनी क्रूर और संवेदन हीन होती है इसका एहसास इन पंक्तियों को पढ़ते हुए होता है। गुलाम कादिर द्वारा मुगल बादशाह शाह आलम के प्रति किये गये अत्याचार से भी तत्कालीन राजनीति की दुरावस्था का पता चलता है।लेकिन इसी बिन्दु पर जहाँ शाह आलम को बचाने के लिए बेगम समरू सामने आती हैं, तो वहीं स्वयं उन्हें बचाने के लिए उनका पूर्व प्रेमी जार्ज थामस आता है। यह प्रेम, मानवीय गरिमा और उदात्त जीवन मूल्यों की भव्य कथा है।


लेखक ने कथा के इतर बेगम समरू का एक मूल्यांकन भी प्रस्तुत किया है। उनकी कुशल सैन्य नेतृत्व क्षमता, दयालुता,कूटनीतिज्ञता,निष्ठा,कला, वास्तुकला साहित्य और संगीत में अभिरुचि पर स्वतंत्र अध्याय लिखकर लेखक ने बेगम समरू पर अपने अध्ययन के निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं ।उन्होंने एक दृष्टिपात उनके उत्तराधिकारी डेविड सोंब्रे पर भी किया है ,जिसके बारे में पाठकों को सहज जिज्ञासा होना स्वाभाविक ही है। बेगम समरू के बाद आधुनिक भारत के इतिहास में सरधना की भूमिका पर भी लेखक ने लेखनी चलाई है।


कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने कभी उनके विषय में लिखा था कि,


'बेगम समरू अपने समय के पतनोन्मुख काल की सर्वाधिक दुर्जेय महिला थी, उसने अपने जीवन को बेहतर ढंग से और बुद्धिमत्ता से जिया।उसका प्रशासन सौम्य और ईमानदार था।जमीनों की बेहतर देखभाल से फसलों की पैदावार उत्कृष्ट होती थी।उनकी प्रजा इतनी समृद्ध थी, जितनी कि तत्कालीन भारत की किसी अन्य रियासत की हो सकती थी।उसकी उदारता के चर्चे आम थे। उसने जो ठान लिया, वो किया--चाहे वो महलों का निर्माण हो, चर्चों को बनवाने का विषय हो, या जनता के लिए पुल और अन्य उपयोगी इमारतों का निर्माण और ऐसे जनहितकारी कामों को पूरा कराना हो, जिनके संबंध में उस समय सोचना भी अकल्पनीय था...।


किताब के आखिरी पन्ने परिशिष्ट के तौर पर संलग्न किये गये हैं जिसमें एक अध्याय बेगम समरू पर हुए अध्ययनों और लिखी गयी किताबों का ब्यौरा दिया गया है। यह लेखकीय ईमानदारी को दर्शाता है और बेगम समरू पर शोध करने वाले शोधार्थियों के लिए विशेष उपयोगी है। लेखक ने बेगम के जीवन की एक विस्तृत और संपूर्ण क्रोनोलाजी भी प्रस्तुत की है। पूरी किताब पढने के बाद उससे गुजरना अकादमिक अध्ययन के लिए काफी उपयोगी है।


कुल मिलाकर इतिहास की इस शानदार नायिका को जानने-समझने के लिए यह एक संपूर्ण किताब है। इतिहास की किताब होकर भी यह साहित्य-सा आस्वाद प्रदान करती है। लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा ने इतिहास की इस अपेक्षाकृत अज्ञात शख्सियत पर बड़े कौशल से लेखनी चलाई है और 'बेगम समरू का सच' नाम से एक मुकम्मल किताब लिखकर इस अज़ीम शख्सियत के इर्द-गिर्द घिरे रहस्य-रोमांच, किवदन्तियों और अफवाहों के घटाटोप के बीच सच की तलाश की है, यह अच्छी शुरुआत है।


-अनिल अविश्रांत,:.


(लेखक डाॅ अनिल कुमार सिंह राजकीय महिला महाविद्यालय झाँसी के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत हैं और अविश्रांत नाम से सृजनात्मक लेखन करते हैं. ऐतिहासिक, साहित्यिक और शैक्षिक विषयों में इनकी रूचि है. ये पुस्तक-संस्कृति के निर्माण हेतु आग़ाज़ विचार मंच के माध्यम से पाठकों को पुस्तक पढ़ने हेतु प्रेरित और प्रोत्साहित  भी करते हैंमोबाइल: ८७०७४९४२५६)


पुस्तक: बेगम समरू का सचलेखक--राजगोपाल सिंह वर्मा, विधा--जीवनी, प्रकाशन --संवाद प्रकाशन, मेरठ, मूल्य-- रु 300 (पेपरबैक) और रु 600 (सजिल्द).


 


Tuesday, March 17, 2020

गोविन्द मिश्र के कथा साहित्य में नारी का स्वरूप



शोधार्थिनी
सुदेश  कान्त (नेट)
(हिन्दी विभाग)
बी0एस0एम0पी0जी0 रुड़की (हरिद्वार)

प्रस्तावना
नारी प्रकृति की अनुपम एवं रहस्यमयी कृति है जिसके आन्तरिक मन की पर्तों को जितना अधिक खोलते हैं, उसके आगे एक नवीन अध्याय दृष्टिगत होता है। अपने अनेक आकर्षणों के कारण नारी साहित्य का केन्द्र बिन्दु रही है। प्राचीन समय में स्त्री शिक्षा को  भले ही महत्वहीन समझा जाता रहा हो, परन्तु वर्तमान समय में इसे विशेष महत्व दिया जाने लगा है। शिक्षा के बल पर आज की स्त्री आवश्यकता पड़ने पर घर की चाहरदीवारी की कैद से निकलकर स्वतंत्र हो सकी है, उत्पीड़ित होने पर प्रतिशोध कर सकती है। उचित निर्णय लेकर उचित कदम उठाकर आत्मरक्षा कर सकती है। 
गोविन्द मिश्र जी का कथा साहित्य अधिकांश नारी केन्द्रित है। मिश्र जी का क्षेत्र शिक्षा जगत होने के कारण उनके अधिकांश नारीपात्र-बुद्धिजीवी हैं। मिश्र जी के नारी पात्र अन्तद्र्वन्द्व से घिरे कुण्ठित एवं असहाय तथा कहीं पर परम्परागत रूप दृष्टिगत हुआ है किन्तु अधिकांश नारी-पात्र किसी भी स्थिति में पुरुष की दासता सहने को तैयार नहीं हैं, भले ही उसे उसका कितना भी बड़़ा मूल्य क्यों न चुकाना पड़े। मिश्र जी ने नारी के विविध रूपों को जीवन की सच्चाई के साथ रूपांकित किया है।
नारी का परम्परागत रूप:- 
 गोविन्द मिश्र जी के कथा साहित्य में अन्य कथाकारों की अपेक्षा अधिकांशतः नारी मूल विषयक के केन्द्र में रहती है। नारी के जिस जीवन संघर्ष को उन्होंने समाज में देखा और अनुभव किया, उसे कथापात्रों के माध्यम से साहित्य में व्यक्त किया है। उनके उपन्यासों एवं कहानियों में नारी पारिवारिक मूल्यों को जोड़ने के लिए प्रयासरत है तो कहीं माता-पिता के विस्मृत होते अस्तित्व को सम्भालने के प्रयास में स्वयं टूटती तथा स्वयं को सम्बल देती दृष्टव्य होती है। यह परम्परागत नारी अपने पूर्ण सहयोग तथा सामथ्र्य से समाज को टूटने से बचा रही है। कभी ममतामयी माँ के रूप में, कभी आदर्श पत्नी के रूप में विवाह-संस्था को बनाये हुए हैं, जहाँ व्यक्ति को आर्थिक दंश तोड़ने का प्रयास करते हैं। वहाँ मिश्र जी की नारी बहुत कुछ झेलते हुए भी परिवार  को बिखरने नहीं देती। ‘‘पाँच आँगनों वाला घर’’ की जोगेश्वरी पति द्वारा प्रताड़ित एवं अपमानित होने पर भी अपने पत्नीत्व की सार्थकता परिवार व पति के समर्पण में पाती है। ‘‘माँ ने कैसे पग-पग पर पिता द्वारा दी गई यातनाएँ झेली, उनकी कमियों के एवज में अपने भीतर नई-नई खूबियाँ उभारीं। पिता उस समय के थे जब औरत को पीटना मामूली बात थी। माँ बडे़ घर की थीं........ इसलिए होशोहवास में तो पिता हिचककर रह जाते, पर नशे में हुए तो भीतर से कमरा बन्द कर पूरी कसर निकाल लेते...... जिस तरह माँ सांसारिक जीवन में उन्हें दबाकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं। माँ के सामने एक ही जोरदार इच्छा थी-उनका घर बड़ा होना है-पैसे से, परिवार से।.............. उन्होंने अपने उद्देश्य के लिए जब जरूरत हुई, अपने पति को भी एक किनारे सरका दिया।’’1
 पति के आकस्मिक दिवंगत हो जाने पर शोक व्यक्त करने का समय जोगेश्वरी के पास नहीं था। वह तटस्थ होकर उचित निर्णय लेना जानती थी। उसने बड़े बेटे राधे लाल को पिता की जगह गृहस्थी के लिए तैयार कर लिया था। जोगेश्वरी परिवार के प्रति समर्पित रहती है, ‘‘माँ को इतनी फुर्सत नहीं थी, वे पिता के असमय निधन के दुःख में घुलतीं। उन्होंने पिता की जगह तैयार करना शुरू किया राधेलाल को। जब तक राधेलाल को कुछ पता चलता ......... वे एक बड़ी गृहस्थी के स्वामी वाले साँचे में फिट किए जा चुके थे।’’2
 वर्तमान में जहाँ पारिवारिक रिश्ते क्षीण होते जा रहे हैं, वहाँ सामाजिक सम्बन्धों को बनाये रखने के लिए प्रयासरत ‘लहर’ कहानी की रश्मि तब अपने आत्मविश्वास को डिगा देती है, जब उसे पता चलता है कि उसे इस गृहस्थी को सम्भालना है। वह आत्मनिर्भर होते हुए भी पुरुष प्रधान समाज की दृष्टि में एक गृहणी है, ‘‘पुरुष प्रधान समाज उसे अपनी सोच के लायक रखता ही कहाँ है। कैसी सभ्य-सम्य मार पड़ती है उस पर। हमारी ये बड़ी-बड़ी बातें कैसी गुलामी में जकड़कर रख देती हैं उसे। एक बार विवाह हो गया तो लड़की लाख पढ़ी-लिखी हो, कमाऊ हो, आत्म निर्भर हो, सबसे पहले वह गृहस्थिन है, जिसे पति, घर और बच्चों के लिए होम होना ही है। उसकी अपनी जिन्दगी कुछ नहीं।’’3 अशिक्षा, अज्ञानता और अधीनता के अंधकार युग से शिक्षा, जागृति और समानता के प्रकाश पंुंज में आने के पश्चात् भी नारी स्वयं को शोषित तथा अस्तित्वहीन समझने के लिए विवश होती है। रश्मि वैवाहिक जीवन में सामंजस्य करती हुई चलती है। कभी-कभी वह अपने स्त्री होने पर भी दुःख व्यक्त करती है ‘‘अपना स्त्री होना खराब लगता है..... मैंने खुद को क्या बना डाला है। कभी-कभी लगता है जैसे मैं हूँ ही नहीं....... लता हूँ, हवा का कोई गड्ढा हूँ।’’4 यहाँ नारी पात्र भारतीय संस्कारों से युक्त एवं सामाजिक मान्यताओं को स्वीकार करते चलते हैं, परन्तु आधुनिक एवं पाश्चात्य प्रभावों को अलग नहीं कर सकते।
विद्रोहिणी नारी:-
 आधुनिक भारतीय नारी पुरुष के साथ अर्थोपार्जन के लिए कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। वह दोहरी भूमिका निभाते हुए अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। वह स्वयं क्यों पुरुष का उत्पीड़न, शोषण, अत्याचार तथा बन्धन सहे? नारी अपने बढ़ते कदमों में आने वाली बेड़ियों के रूप में संस्कार एवं परम्पराओं को तोड़ने में कतई संकोच नहीं करती और न ही किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए विवश होती है। मिश्र जी ने नारी का विद्रोही पक्ष अपने साहित्य में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने आज की नारी के विविध रूपों को उसकी अच्छाईयों, बुराइयों एवं कमजोरियों के साथ चित्रित करने का प्रयास किया है। ‘‘धूल पौधों पर’’ उपन्यास की नायिका में अपने पति के साथ हर कदम पर सामंजस्य करना चाहती है, परन्तु उसके ससुराल वाले उसे एक समान की तरह समझते हैं। जिस तरह वह प्रोफेसर प्रेमप्रकाश से कहती है कि ‘‘मैं कोई चीज हूँ, जानवर हूँ या पत्नी हूँ तो इसलिए मनुष्य भी नहीं हूँ? मेरी इच्छा-अनिच्छा कुछ नहीं....... रात भर उसने मुझे एक जबर कुत्ते की तरह चींधा.... मेरे शरीर का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा..... यहाँ तक कि मेरे बाल खींचे, जबरदस्ती मेरे कपड़े उतार फेंके, छाती पर नाखूनों से लकीरें खींच दीं, इधर-उधर कहीं भी दाँत गड़ाये। रात भर मुझे रौंदता रहा......।।’’5 ‘मैं’ के मन में विद्रोह चलता रहता है, विद्रोह की ज्वाला में वह प्रतिदिन जलती रहती है। उसको समझ नहीं आता कि वह क्या करे? समाज के बन्धनों में वह इस तरह बंधी हुई है कि कितना भी विद्रोह करे मगर निकलने में असफल रहती है।
 नारी की स्वतंत्रता और समानता के बाधित होन का एक पक्ष यह भी है कि नारी ही नारी की समता में सबसे बड़ा अवरोध है। घर में जब बेटी का जन्म होता है तो उसके लिए अलग संस्कार और नियम होते हैं तथा बेटे के जन्मोत्सव पर संस्कार और विधान अलग होते हैं। समाज में नारी असमानता की शिकार होती है जिसे पुरुष वर्ग अपने विधान की जंजीरों में जकड़ना चाहता है। मगर आज के समाज में स्त्री ही स्त्री की स्वतंत्रता में बाधक बनी हुई है। नारी जब नारी की प्रतिद्वन्द्वी होती है तो इसमें नारी का भी दोष नहीं है कि वह क्यों इस तरह नारी स्वतंत्रता को बाधित कर रही है। ‘खिलाफत’ उपन्यास एक इस्लामिक स्टेट की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें आयशा अन्द्राबी कैम्पेन चलाते समय स्त्रियों पर धर्म तथा संस्कारों का आरोपण करते हुए उनकी स्वतंत्रता पर रोक लगाने का प्रयास करती है ‘‘कोई मुल्क या तो मुस्लिम है या गैर मुस्लिम, तीसरी कोई चीज नहीं। उसने दुख्तरान-ए-मिल्लत चला रखी है। वह कश्मीर यूनिवर्सिटी से अरबी में पोस्ट ग्रेजुएट है, कश्मीर में बुर्का पहनने के लिए कैम्पेन चला रही है-जो औरत बिना बुर्का नजर आयी, उसके मुँह पर कालिख पोत देती हैं। काम पर जाने वाली औरतों के पीछे पड़ जाती हैं कि वे काम पर न जायें, औरतों का काम है घर पर रहना। औरतों में आजाद-ख्याली के एकदम खिलाफ हैं।’’6
 वर्तमान की नारी के पास दूसरों के विषय में सोचने का समय नहीं है। वह स्वयं के सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए इतनी दूर आ गयी है कि अपने लिए भी अपरिचित सी हो गई है। इस अपरिचय बोध की इतनी अधिकता बढ़ गयी है कि मानवीय सम्बन्धों की मिठास अब दृष्टिगत नहीं होती। 
कुण्ठित नारी:- 
 नारी की भावुकता, कोमलता, ममता और सहनता मूलभूत प्रकृति है। आधुनिक परिवेश में नारी के यहीं गुण समाज के मूलाधार हैं जिस पर वह टिका है। मिश्र जी ने नारी के भावुक रूप को अभिव्यक्त किया है। ‘तुम हो’ कहानी की सुषमा को जब उसके पिता उसके ससुराल वालों पर दहेज का झूठा आरोप लगाकर अपने घर ले आते हैं। तब सुषमा के पिता के दबाव में आकर भावनाओं को मन में समेटने के लिए विवश होती है। फिर भी न जाने क्यों उसका मन ससुराल पक्ष की ओर जाता है। वह अपने पिता के चंगुल में फंस गई थी, वहाँ से निकलने में वह असफल हो जाती है और भावुकता की ओट में निरन्तर कुण्ठित होती जाती है। वह सोचती है, ‘‘उसके बारे में क्या सोचती होगी सास या ननद! जिसके लिए उन्होंने क्या-क्या किया, वह यह कह रही हैं। ऐसा झूठ! क्या छवि बनी होगी सुषमा की वहाँ! यहाँ किसी से यह कहो तो कहेंगे अब कौन सी छवि! वहाँ किसी के सोचने-ओचने का क्या, पागल हो क्या? तुम अब तो वहाँ जाने से रहीं। रहने की बात तो और दूर की ......... तो तुम्हें क्या मतलब?’’7 सुषमा मानसिक दबावों से मुक्ति और अपने स्वतंत्र अस्तित्व की स्थापना का पूरा प्रयास करती है। वह पहले मूक-सी बनी रहती है। उसे लगता है कि वह असहनीय है। वह स्वयं निर्णय करने में अक्षम-सा महसूस करती है तथा स्वयं पिता और पति के निर्देशों का अनुसरण करती है। मगर जब वह यथार्थ की दृष्टि से दोनों के पक्षों का मूल्यांकन करती है क्योंकि पिता उसके पति पर दहेज का आरोप लगाते हैं। जिसका समर्थन सुषमा नहीं करती और कुण्ठा की ज्वाला से निकलकर वह पिता के समक्ष अपना पक्ष रखती है, ‘‘मेरे ब्याह में जो खर्चा हुआ, वह निकल आया, उससे ज्यादा ही। आगे हम उनसे कुछ नहीं लेंगे। रघु को छोड़कर बाकी सबने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया। रघु ने एक बड़ी कृपा की कि मुझे छुआ तक नहीं। जिस झूठ को लेकर हम लड़ रहे हैं, उसे मैं और नहीं खींच सकूँगी। अब यह लड़ाई बन्द करिए। मैं पुलिस में कोई शिकायत नहीं करूँगी। आप और रघु के पिता हट जाइए। रघु और मैं आपसी रजामंदी से तलाक ले लेंगे-साधारण तलाक।’’8 सुषमा अनेक विरोध तथा कुण्ठाओं के बावजूद अपने पिता का विरोध करती है। साधिकार स्वतंत्र रूप से रहना चाहती है। वह अवरोध सहन नहीं कर सकती। अपने निर्णयों पर दूसरों का हस्तक्षेप उसे अस्वीकार-सा प्रतीत होता है, ‘‘पहली बार उसने पिता से साधिकार कुछ कहा। अधिकार अपना, अपने होने का। खामोशी की अदृश्य डोर अपने पिता के चेहरे को किसी तरफ खींच रही थी। सुषमा उनके क्रोध झेलने को तैयार थी।’’9
 आधुनिक नारी पुरुष के साथ प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में उतर पड़ी है। वह पुरुष के साथ  केवल भावनात्मक रूप से जुड़ी है अपितु प्रतिस्पर्धा ने उसे पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने पर विवश किया है। पुरुष सत्ता समाज से मिलने वाले शोषण, उत्पीड़न और बन्धन के विरुद्ध लड़ने का वह साहस करती है। आज पुरुष की भोग्या बनकर जीने वाली स्त्रियों की संख्या कम होती जा रही है। ‘तुम्हारी रोशनी में’ उपन्यास में सुवर्णा नामक विवाहित स्त्री की कहानी है। वह अपने पति रमेश की युवा सोच और सहयोग के कारण पूर्ण स्वतंत्र ढंग से रहती है। वह नौकरी करने के बावजूद घर और बच्चों के प्रति न सिर्फ यह कि वह उदासीन नहीं है, इस मोर्चे पर भी वह अपनी सफलता के प्रति सजग रहती है। वह प्रतिस्पर्धा में कहती भी है, ‘‘गृहस्थिन होना गर्व की बात है मेरे लिए.....। यहाँ भी अपना काम मुझे उतना ही अच्छा लगता है जितना दफ्तार का काम। जैसे मैं दफ्तर में सफल होना चाहती हूँ वैसे ही घर में भी। वहाँ मैं किसी आदमी से पिछड़ी नहीं रहना चाहती, यहाँ किसी औरत से नहीं।’’10 सुवर्णा जब मोहन के साथ पिकनिक पर जाती है तब रमेश उसके साथ अनैतिक व्यवहार करता है, साथ ही उस पर पति के अधिकार का आरोपण लाद देता है कि वह उससे बिना पूछे किसी से नहीं मिलेगी। वह उस पर भावनात्मक हमला ही नहीं, अपितु शारीरिक यातना भी देता है। गाली-गलौज और मारपीट के साथ वह उसके संवेदनात्मक अंग रूपी बच्चों और उसके बीच दीवार खड़ी करने का प्रयास करता है। वह इस नीति को अपनाकर उसे झुकाना चाहता है, मगर वह तटस्थ होकर उत्तर देती है, ‘‘मैं यह नहीं मानती कि सिर्फ इसलिए कि तुम मेरे पति हो, तुम यह तय करो कि मैं इससे मिलूँ, उससे न मिलूँ। बात तीन चार आदमियांे की नहीं है, उस स्वतंत्रता की है जो ईश्वर ने मुझे दी है और जिसे तुम हड़प लेना चाहते हो...... पर बहस की क्या जरूरत....... तुम इन लोगों से मिलने की बात मान भी लो तब भी मेरा फैसला वही रहेगा।’’11
 सामाजिक, आर्थिक परिवेश ने जब भी पुरुष को कमजोर किया है तब उसने नारी के प्रेमपूर्ण आँचल में ही आश्रय लिया है। मिश्र जी के साहित्य में नारी जहाँ दाम्पत्य जीवन का निर्वाह करती है, वहाँ वह पति की सहयोगिनी बनकर हर कदम पर उसके साथ खड़ी रहती है। ‘पाँच आँगनों वाला घर’’ की ओमी पति का अनुसरण करती हुई चलती है। पति ठीक करता है या गलत, सभी कार्यों में उसके कदम से कदम मिलाकर चलती है। ‘‘जब-जब वे ओमी को देखते हैं। यह स्त्री जिसको उन्होंने अपने प्रभावी व्यक्तित्व के सहारे अपने सिद्धान्तों पर चलने को मजबूर किया..... उसकी कितनी इच्छाएँ, आकांक्षाएँ दबी रह गई... क्या यह करने का अधिकार मोहन को था? मोहन की तरह वह भी पीछे मुड़कर देखती होगी...... जीवन में उसके प्राप्ति? बस पति का अनुसरण किया, पति ठीक था या गलत पता नहीं....... अनुसरण ही जीवन।’’12
 विविध आयामों की ओर बढ़ती हुई नारी के संघर्षों से आकर्षित होकर मिश्र जी ने उसके अनेक रूपों को चित्रित किया है। नारी के ये रूप यदि मन के परम्परागत मूल्यों तथा संस्कारों को सहलाते हैं तो कहीं पर गहरे आघात करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। परिवर्तित परिवेश एवं मूल्यों से प्रभावित नारी विभिन्न स्थानों पर नये रूप में द्रष्टव्य होती है।
उपसंहार:-
 नारी के बिना पुरुष अस्तित्व शून्य है। पुरुष जब निसहाय हुआ है, तभी उसे नारी ने सम्बल दिया है। मिश्र जी के साहित्य में नारी के विविध रूप अनेक कोणों से रूपायित होते हैं। विविध आयामों की ओर अग्रसर होती नारी से प्रभावित होकर मिश्र जी ने उसके विविध रूपों का अति सूक्ष्मांकन किया है। नारी के ये रूप एक ओर हृदय के परम्परागत संस्कारों को सहलाते हैं तो दूसरी ओर तटस्थ होकर परिवर्तन की चाह में उन्हें तोड़ने को विवश भी होते हैं। परिवर्तित परिवेश एवं मूल्यों से प्रभावित नारी अनेक स्थानों पर नवीन रूपों में दृष्टिगत होती है। 

सन्दर्भ सूची:- 
1  पाँचों आँगनों वाला घर, गोविन्द मिश्र, पृ0 28
2  पाँचों आँगनों वाला घर, गोविन्द मिश्र, पृ0 28-29
3  ‘लहर’ कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 148
4  ‘लहर’ कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 149
5  ‘धूल पौधों पर’, गोविन्द मिश्र, पृ0 23
6  ‘खिलाफत’ गोविन्द मिश्र, पृ0 141
7  ‘तुम हो! कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 253-254
8  ‘तुम हो! कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 256
9  ‘तुम हो! कहानी समग्र भाग-3, गोविन्द मिश्र, पृ0 256
10  ‘तुम्हारी रोशनी में’ गोविन्द मिश्र, पृ0 20
11. ‘तुम्हारी रोशनी में’ गोविन्द मिश्र, पृ0 149
12. पाँचों आँगनों वाला घर, गोविन्द मिश्र, पृ0 158


एक ज़माना था के चमचों की हनक भी ख़ूब थी


 

एक ज़माना था के चमचों की हनक भी ख़ूब थी,

आजकल नेताओं तक की भी पुलिस सुनती नहीं।            

 

एक ज़माने में गलीयों की राजनीति करने वाले चमचे भी थानों में जाकर अपने कुर्ते के कलफ़ से ज़्यादा अकड़ दिखा दिया करते थे, वे सीधे मुख्यमंत्री का आदमी होने का दावा करते थे मगर अब सारा माहौल ही बदल गया कुर्ते का कलफ़ ढीला पड़ गया चमचे कमा कर खा रहे हैं कोई बैटरी वाली रिक्शा चला रहा है कोई केले, चाउमीन,या सेव बेच रहा है।जिस पुलिस को वें हड़का दिया करते थे वही पुलिस अब उन्हें हड़का रही है लठिया रही है।अगर कोई पुराना चमचा,किसी ऐसे पुलिस वाले के हत्ते चढ़ जाता है जिसे उसने हड़काया हो तो वह पुलिस वाला उससे सारा पुराना हिसाब चुकता करता है।इस समय पुराने नेताओं की बहुत दुर्गति हुई पड़ी है।बिना पद के किसी नेता का बहुत ही बुरा हाल है वह तो थाने में जाने ही के नाम से इधर-उधर की बातें करने लगता है।पद वाला नेता भी थानों में जाना नहीं चाहता क्योंकि क्या पता कौन सा अफ़सर कैसा हो ज़रा सी देर में बेइज़्ज़ती हो जाए क्या फ़ायदा।उस ज़माने में जेबकतरों को, उठाईगिरों को,लड़कियों को छेड़ने वालों को नेता तो क्या उसका चमचा तक छुड़ा लिया करता था मगर अब चमचा तो क्या नेता तक नहीं छुड़ा सकता।वो चमचे जो बुलेट पर या बड़ी गाड़ी में बैठ कर दनदनाते फिरते थे, आजकल बुझे-बुझे से फिरते हैं।अभी एक नेता के सपरिवार जेल जाने से तो उसके जैसी सोच के सारे नेताओं को सांप सूंघ गया है।जब से उस नेता ने कहा है कि हमें जेल में पीटा जा रहा है वो भी किसी जेबकतरे की तरह नहीं एक आतंकवादी की तरह तब से तो दिखावे की सियासत करने वाले अपनी गली में पुलिस की जीप की आवाज़ सुन कर ही डरने लगे हैं।जिस नेता के फ़ोन पर ही बड़े-बड़े अफसरों का रातों रात तबादला हो जाता था वह आज आनन्द बक्षी का लिखा यह गाना गा रहा है- 

ऐ खुदा, हर फ़ैसला तेरा मुझे मंजूर है,

सामने तेरे तेरा बंदा बहुत मजबूर है....

निपटी हुई पार्टियों के नेताओं की ऐसी दुर्गति पर उनके चमचे कभी-कभी घड़ियाली आंसू भी बहा दिया करते हैं।अब तो ज़्यादातर निपटी हुई पार्टियों के नेताओं ने अपने-अपने फ़ोन में अजीब से गीतों की कॉलर टोन लगवा रक्खी है, जैसे "दुखी मन मेरे मान मेरा कहना..जहाँ नहीं चैना वहां नहीं रहना"...,"जब दिल ही टूट गया हम जी के क्या करेंगे...।कई तो दल भी बदल चुके हैं उनमें कुछ तो मज़े ले रहे हैं और कुछ अभी भी इज़्ज़त के लिए तरस रहे हैं।एक मुंडन समारोह में निपटी हुई पार्टियों के निपटे हुए नेताओं का मिलन हुआ,वहाँ मदिरा सेवन करते हुए सब अपने-अपने दुखड़े एक दूसरे को सुना रहे थे, जाम के साथ-साथ सभी का दर्द भी छलक रहा था।एक ने कहा यार तुम तो इस बात पर रो रहे हो कि तुम्हें अफ़सर ने नमस्ते नहीं की अबे मुझे देखो जो अफ़सर मेरे आगे पीछे घूमता था उसी ने मुझे बैठने तक को नहीं कहा कसम से बड़ी तौहीन महसूस हुई,जब तक हमारी पार्टी की सरकार नहीं आती सोचता हूँ किसी लोकल मन्त्री का चमचा ही बन जाऊं।एक नेता ने दूसरे के कान में कहा कि सुना है तुम्हारे दोस्त नेता को पुलिस ने थप्पड़ मारा जब वो बिजलीचोरों की हिमायत कर रहा था, इस पर उस नेता ने कहा कि झूठ है ये बात दूसरी पार्टी वाले अफ़वाह फैला रहे हैं,हड़काने और धमकाने की बात तो ठीक है मगर थप्पड़ की बात अफ़वाह है।एक नेता ने कहा यार कब तक हम यह व्यवहार सहन करेंगे,परसों बड़े वाले नेता से छोटे नेता जेल में मिलने गए,जब वें अन्दर गए तब तो तलाशी ली ही गयी मगर जब वे मिलकर बाहर आये तब भी उनकी तलाशी हुई,भला जेल से वें क्या उखाड़ कर ला सकते थे,ऊपर से अन्य कैदियों ने उनसे पानी की ख़राब टोंटियों की शिकायत भी की।एक नेता ने कहा कि अब यह सब सहन नहीं होता सोचता हूँ गांव लौट जाऊं और अपना वही झाड़ फूंक का धन्धा कर लूं,इस पर दूसरे ने कहा कि मुझे भी सिखा देना मैं भी अपने गांव में जाकर यही कर लूंगा, तो नेता ने कहा कि इसमें सीखने जैसा कुछ नहीं है बस किसी भी फ़िल्म को देखकर ड्रेस और मेकअप किये रखना और बाहर बोर्ड पर लिखवा देना "हमारे यहाँ हारे हुए निराशा में डूबे हुए नेताओं की विशेष झाड़-फूंक की जाती है"।

दिल खोल कर बोली लगाएं, मन चाहा पुरस्कार पाएं


 

अभी तक किसी भी पुरस्कार से वंचित कवियों या शायरों को निराश होने की ज़रूरत नहीं है।उन्हें इस बात की चिन्ता करने की भी ज़रूरत नहीं है कि उनकी रचनाएं पुरस्कार योग्य नहीं है, उन्हें इसकी भी फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है कि लोग उन्हें पकाऊ कहते हैं उनकी रचनाओं को बकवास कहते हैं,सभी पुरस्कार प्यासों में एक ही गुण होना आवश्यक है वह यह कि उसकी जेब भारी हो भले ही दिमाग़ ख़ाली हो। शहर के शायर,कवि,पत्रकार और पता नहीं क्या-क्या सुनील 'उत्सव' को जब किसी मूर्खों की संस्था से लेकर काग़ज़ी संस्था तक ने कोई एज़ाज़, पुरस्कार, सम्मान नहीं दिया तो उसने अपने नाम ही की एकेडमी गढ़ ली "सुनील 'उत्सव' एकेडमी" और उसके द्वारा पुरस्कार बांटने शुरू कर दिए।देखते ही देखते उसका यह गोरखधंधा चल निकला।सबसे बड़ी आसानी यह कि न जीएसटी का झंझट न इन्कम टैक्स का।"पानपीठ" पुरस्कार से लेकर "अझेल" पुरस्कारों की कई तरह की वैराइटी है।जिन सरकारी अफ़सरों ने अपनी ऊपरी कमाई से अपने मन की बातें किताब की शक्ल में छपवा रक्खी हैं उन्हें वह 10 परसेंट की छूट भी देता है।रही पात्रों,अपात्रों,कुपात्रों में से पुरस्कार के योग्य लोगों के चयन की बात तो "सुनील 'उत्सव' एकेडमी" में सब कुछ पारदर्शी है।रचना बुरी हो,ख़राब हो,चाहे पकाऊ हो सभी को पुरस्कार मिलने के चांस पक्के हैं।रचना से कोई मतलब नहीं है।सभी पुरस्कारों के नाम के आगे न्यूनतम बोली की राशि लिखी हुई है जिसकी जेब में जितने पैसे हैं वो उस हिसाब से बोली लगाकर पुरस्कार ले सकता है।जिसकी ज़्यादा बोली होगी,पुरस्कार उसी का होगा।पकाऊ साहित्यकारों के हाथ से पुरस्कार लेने पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं है मगर अपनी पसन्द के किसी नेता या उसके चमचे के हाथ से पुरस्कार लेने का शुल्क अलग से देना पड़ता है। "सुनील 'उत्सव' एकेडमी" से बहुत से लोग पुरस्कार ले चुके हैं।आए दिन पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन होता ही रहता है।एकेडमी पुस्तक प्रकाशित करने का धंधा भी करती है।अगर किसी के पास अपनी एक दो रचनाएं भी हैं वह भी पुस्तक का लेखक बन सकता है, रचनाएं बिक्री के लिए भी उपलब्ध हैं।एक पन्ने के पांच सौ रुपये के हिसाब से रचनाएं उपलब्ध हैं जैसे ही कोई पेमेन्ट जमा कराएगा रचनाओं का स्वामी हो जाएगा,अगर कोई एकेडमी ही से रचना ख़रीद कर एकेडमी ही से पुस्तक छपवाता है तो उसे दस प्रतिशत की छूट भी दी जाती है।एकेडमी अभी तक कई पुस्तकों का "सामग्री सहित" प्रकाशन कर चुकी है, उनका विमोचन समारोह भी आयोजित कर चुकी है।समारोह में आवश्यक सामग्री जैसे बैज, दीपक अथवा शमा,मंच सज्जा,प्रतीक चिह्न,शाल,बुके,नाश्ता, भोजन,श्रोताओं तक की व्यवस्था है सब का मीनू उपलब्ध है,बाज़ार से कम ही ख़र्च आता है।पुरस्कारों के लिए बोली बन्द हॉल में लगाई जाती है, हॉल में एकेडमी के सदस्य और पुरस्कारों के लिए बोली लगाने वालों के अलावा कोई नहीं होता।एक बार पुरस्कार की राशि जमा होने के बाद वापस नहीं होती केवल और राशि देकर सम्मानित होने से पहले तक पुरस्कार में बदलाव किया जा सकता है अगर किसी ने तीसरे पुरस्कार के लिए राशि दी है तो वह अन्तिम समय तक दूसरे या पहले पुरस्कार को भी पा सकता है उसे केवल इतना करना होगा कि उन पुरस्कारों की लगी बोली की दोगुनी राशि जमा करानी होगी।एक असाहित्यकार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि असाहित्यकारों को एकेडमी तक लाने वाले लोगों को एकेडमी कमीशन भी देती है।जो पुरस्कार प्राप्त कर लेता है वह अपना नुकसान पूरा करने के लिए किसी अन्य पुरस्कार प्यासे को पटा कर "सुनील 'उत्सव' एकेडमी" तक ले आता है और कमीशन ले जाता है,यही कारण है एकेडमी काफ़ी फल फूल रही है।उत्तर प्रदेश के ज़िलों के तो लोग पुरस्कार ख़रीद ही रहे हैं,उत्तराखंड, हरियाणा, मध्यप्रदेश, दिल्ली,बिहार तक के पुरस्कार के प्यासे एकेडमी से जुड़ रहे हैं।

तलवे छुपे हुए हों तो घुटने ही चाट ले


 

तलवे छुपे हुए हों तो घुटने ही चाट ले,

चमचागिरी का शौक़ भी कितना अजीब है।

 

वास्तव में चमचागिरी भी एक शौक़ है।अगर किसी के तलवे जूतों में छुपे हों तो आज के चमचे घुटने तक चाटने को तैयार रहते हैं।कई शौक़ की तरह चमचागिरी भी शौक़ है, इस शौक़ को पूरा करने के लिए लोग शानदार कपड़े तक सिलवा लेते हैं।आजकल कई प्रकार के चमचे दिखाई पड़ रहे हैं।मुख्यतः चमचे दो प्रकार के तो होते ही हैं एक अफ़सरों के चमचे दूसरे नेताओं के चमचे।मालिकों के आसपास भी चमचे मंडराते रहते हैं इन चमचों की भी कई वैराइटीयाँ हैं।अफ़सर की चमचागिरी करने वाला चमचा अभूतपूर्व अहंकार से भरा होता है।वह अपनी पत्नी पर भी रौब जमाता है भले ही उसकी पत्नी उसकी ख़बर ले लेती हो।अगर कोई अफ़सर किसी चमचे का ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए कभी चाय पिला दे तो चमचा कई दिनों तक ग्लैड रहता है।जब किसी मोहल्ले में कोई अफ़सर आता है,तो अव्वल दर्जे का चमचा सबसे पहले उसके पास पहुंचता है ताकि पूरा मोहल्ला उसे कुछ समझे।पूरा मोहल्ला उसे कुछ समझे इसके लिए वह अफ़सर से पूंछ हिलाने की मुद्रा में बात करता है।ऐसे चमचे यह जताने की कोशिश करते हैं कि इस मोहल्ले के सबसे ज़्यादा समझदार वही हैं।ऐसे चमचे यह बिल्कुल पसन्द नहीं करते कि कोई और चमचा अफ़सर के नज़दीक जाए।चमचों में भी कम्पीटिशन होता है।चमचागिरी का हास्यास्पद प्रदर्शन ऐसे कार्यक्रम में देखने को मिलता जिसमे कुछ अफ़सर मौजूद हों।सबसे ज़्यादा मज़ा वहाँ आता है जहाँ अफ़सर भी हों और नेता भी,वहाँ चमचागिरी का अद्भुत दृश्य दिखाई पड़ता है।चमचागिरी के गौहर हर शहर में मिलते हैं।अफ़सर के सामने ख़ुद को बेहतरीन चमचा साबित करने के लिए चमचे कार्यक्रम के संचालक से अपना नाम बोलने को भी कहते हैं।ऐसा नहीं है कि चमचागिरी का चमचों को फ़ायदा नहीं मिलता।अफ़सर की चमचागिरी करने वाले गाने वाले,कवि या शायर इस फ़ायदे में रहते हैं कि अफ़सर का जहां-जहां तबादला होता है अफ़सर उन्हें वहां-वहां होने वाले कार्यक्रमों में उन्हें अच्छे मेहनताने पर बुलाता है।आज कल कई चमचे कई तरह के फ़ायदे में हैं।नेताओं के चमचे भी फ़ायदे में रहते हैं कइयों का तो सारा खर्च चमचागिरी की बदौलत ही चलता है,तो ऐसा भी नहीं है कि यह सिर्फ़ शौक़ ही है यह फ़ायदे का सौदा भी है उनके लिए जो चमचागिरी को अच्छा मानते हैं।मैंने कहा है-

अफ़सर को देखते ही हिलाने लगे है दुम,

चेहरे से देखिए उसे कितना ग़रीब है।

तलवे छुपे हुएं हो तो घुटने ही चाट ले,

चमचागिरी का शौक़ भी कितना अजीब है।

 

वैशाली

  अर्चना राज़ तुम अर्चना ही हो न ? ये सवाल कोई मुझसे पूछ रहा था जब मै अपने ही शहर में कपडो की एक दूकान में कपडे ले रही थी , मै चौंक उठी थी   ...