Friday, February 28, 2020

अंतिम दशक की हिंदी कविता और स्त्री


स्वाति


किसी भी काल का साहित्‍य अपने समाज और परिवेश से कटकर नहीं रह सकता। साहित्य की प्रत्‍येक काल विशेष की रचनाओं में हम उस काल विशेष की सामाजिक स्थिति, परिवेश एवं उस परिवेश में रहने वाले लोगों की इच्‍छाओं एवं आकांक्षाओं को अभिव्‍यक्ति होते पाते हैं। कविता मनुष्य की अनुभूतियों को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करने का माध्यम है। कविता के माध्यम से कवि समाज में निहित सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं व विडंबनाओं पर प्रहार करने में सक्षम होता है। बात अगर स्त्री की कि जाए तो आदिकाल से वर्तमान युग तक की कविताओं में स्त्री अपनी उपस्थिती दर्ज कराती आयी है। फर्क सिर्फ यह है की पहले स्त्रियाँ पुरुषों की कविताओं मे दिखाई देती थी,अब खुद अपनी कविताएँ रचती हैं इतना ही नहीं अपने आत्मसम्मान एवं अस्मिता को पाने में निरंतर प्रयासरत हैं।
प्रत्येक काल में स्त्रियों को देखने की दृष्टियाँ अलग-अलग रही हैं जैसे-भक्तिकाल में स्त्री को माया, ठगिनी के रूप में प्रस्तुत किया जाता था या मोक्ष के मार्ग में बाधा के रूप में वहीं आदिकाल में स्त्रियों को पाने के लिए किस प्रकार युद्ध होते थे उनका वर्णन हमें देखने को मिलता है व रीतिकाल में स्त्री देह के मांसल सौंदर्य के अलग-अलग दृश्य दिखने को मिलते हैं। आधुनिक काल और उसमें भी नई कविता में सबसे अधिक स्त्री के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव दिखाई दिया जिसके चलते “अस्मिता की खोज” पर अधिक बल दिया गया। वहीं 1990 के बाद की कविता इन सभी परम्परागत परिपाटी को तोड़ती हुई स्त्री पराधीनता, यौन शोषण, उत्पीड़न तथा अन्य स्त्री संबंधी मुद्दों पर सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से तर्क करती दिखाई देती है। जैसे कात्यायनी की कविता ‘रात के संतरी की कविता’ में देखा जा सकता है-
“रात को/ठीक ग्यारह बजकर तैंतालिस मिनट पर
दिल्ली में जी.बी.रोड पर/एक स्त्री/ग्राहक पटा रही है
पलामू के एक कस्बे में/नीम उजाले में एक नीम-हकीम
एक स्त्री पर गर्भपात की/हर तरकीब आज़मा रहा है।
बंबई के एक रेस्त्रां में/नीली-गुलाबी रोशनी में थिरकती स्त्री ने
अपना आखरी कपड़ा उतार दिया है/और किसी घर में
ऐसा करने से पहले/एक स्त्री/लगन से रसोईघर में
काम समेट रही है/महाराजगंज के ईंट भट्टे में
झोंकी जा रही है एक रेज़ा मज़दूरिन /जरूरी इस्तेमाल के बाद...
नेल्सन मंडेला के देश में विश्वसुंदरी प्रतियोगिता के लिए
मंच सज रहा है”1


इस सम्पूर्ण कविता में आदि से अंत तक संवेदना को मूर्त करने के लिए जितने भी बिम्ब हैं,वे सभी स्त्री की भूमिकाओं से जुड़े हैं। स्त्री के इन सभी रूपों में हमें कहीं न कहीं स्त्री की विवशता दिखाई देती है, जहां एक ओर वह अपनी आजीविका के लिए जी. बी. रोड पे ग्राहक बुलाने के हर प्रयास कर रही है वहीं दूसरी ओर ग्रामीण जीवन से भी यह कविता हमें रु-ब-रु कराती है जहां एक स्त्री के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है लाज़मी है यह गर्भपात इसीलिए किया जा रहा है क्योंकि गर्भ में कन्या पल रही है। लेकिन चाह कर भी वह इसका विरोध नहीं कर पा रही । बंबई के रेस्त्रां में एक स्त्री आजीविका के लिए नाच गा कर अपने तन के कपड़े उतार रही है यह स्थिति अंतिम दशक में जन्मे भूमंडलीकरण की देन है जिसके चलते आज अलग-अलग तरीकों से स्त्री शोषण की शिकार बनाई जा रही है। भूमंडलीकरण के चलते स्त्री शोषण के तरीके बदल गए हैं। आज स्त्री स्वेच्छा से वो सब काम कर रही है जो पुरुषवादी समाज उससे कराना चाहता है जैसे – रेस्त्रां में कपड़े उतारकर नाचना, अश्लील विज्ञापन बनाना, वस्तु की तरह खुद को प्रॉडक्ट बनाने की होड में जुटे रहना इत्यादि । कवयित्री की दृष्टि से यू. पी. के एक जिले महाराजगंज में ईंट भट्टो में काम करने वाली बेबस मज़दूरिन की विवशता भी छिप नहीं सकी कवयित्री नें इस कविता के माध्यम से ग्रामीण ओर शहरी स्त्रियों के जीवन की हर विवशता को कम शब्दों में रेखांकित कर अधिक कहा है। यहाँ महानगरीय बोध, सत्ता, कला और स्त्री जीवन के विभिन्न रूपों को कात्यायनी ने एक साथ प्रकट करने का प्रयास किया है। इसी संदर्भ में मैनेजर पाण्डेय का मत दृष्टव्य है- “नई पीढ़ी की कविता में स्त्री कवियों की विशिष्ट रचना-दृष्टि के कारण उनकी अलग पहचान बनी है। उनमें कात्यायनी की दृष्टि की व्यापकता और तेजस्विता विशेष महत्वपूर्ण है। उनकी कविताओं में प्रखर राजनीतिक चेतना है और व्यापक सामाजिक चिंता भी।”2 इसी प्रकार अंतिम दशक की कविताओं में स्त्री की सामाजिक आत्मगाथा से लेकर आधुनिक बोध की नियति तक के यांत्रिक संकेत मिलते हैं। जब हम समाज की बात करते हैं तो सर्वप्रथम हमारी नज़र परिवार पर जाती है। परिवार समाज की इकाई के रूप में कार्य करता है। अंतिम दशक के कवि और कवयित्रियों ने अपनी कविताओं में पारिवारिक संरचना से लेकर आजादी के बाद हुए मोहभंग के कारण टूटते बिखरते परिवार में स्त्री के चित्र को बखूबी अपनी कविताओं में अंकित किया है। इतना ही नहीं समाज में व्याप्त रूढ़ियों, विडंबनाओं एवं त्रासदियों को भी अभिव्यक्त किया है। उदाहरण के रूप में चन्द्रकान्त देवताले की कविता ‘बेटी के घर से लौटना’ की पंक्तियाँ दृष्टव्य है-
“पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहते कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज”3


इन पंक्तियों के द्वारा हम भारतीय समाज में विद्यमान एक स्त्री की त्रासदी को अभिव्यक्त होते पाते हैं जहां वह अक्षम है अपने पिता को ससुराल में एक और दिन रोक पाने में। दरअसल हमने पूरी सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी बना दी है,जो उसके समक्ष ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर रहा है कि वह अपनी मानव सुलभ इच्छाओं को व्यक्त नहीं कर पा रही है। अपनी इच्छा को दबाने के लिए वह विवश हो रही है।
प्राचीन काल से लेकर अद्यतन हिंदी काव्य में स्त्री की स्थितियाँ निरंतर परिवर्तित होती रही है। 1990के बाद यह परिवर्तन अधिक प्रभावी रूप में सामने आता है। जिसका मुख्य कारण भूमंडलीकरण और इससे जन्मा बाज़ारवाद रहा है। बाज़ारवाद के कारण स्त्री जीवन के प्रत्येक पक्ष जैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, वैवाहिक जीवन आदि प्रभावित हुए हैं। आज सब कुछ बिकाऊ है, बाजारवाद के चलते सब बेचा जा सकता है। आज विज्ञापन से लेकर सिनेमा तक में स्त्री के अंग-प्रदर्शन का सहारा धड़ल्ले से लिया जा रहा है। कात्यायनी की कविता का उदाहरण देखिये-
“अब इतनी सकत नहीं रही
कि दिन भर मुस्कुरा सकूँ, अदाएँ दिखा सकूँ,
निर्माता निर्देशकों को रिझा सकूँ
या दूरदर्शन पर सौंदर्य-प्रसाधनों का विज्ञापन कर सकूँ।
होंगे दुर्ग के बाहर घेरा डाले हुए तुम्हारे शत्रु
मैं तो उनके लिए भी वैसे ही एक स्त्री-शरीर हूँ,
जैसे तुम्हारे नगर-जनों के लिए।”4


समाज में विविध स्तरों पर नारी यौन शोषण के ऐसे दृश्य अक्सर हमें देखने को मिलते हैं जहाँ एक स्त्री मात्र ‘देह’ समझी जाती है। निर्माता निर्देशक उसकी मजबूरीयों का फायदा उठा अपना स्वार्थ साधते हैं। कात्यायनी जी ने यहाँ समाज की वो कड़वी सच्चाई दिखाने का प्रयास किया है जिसके बारे में अक्सर तथाकथित पुरुषवर्चस्ववादी समाज का व्यक्ति बात करने से कतराता है लेकिन अवसर मिलने पे स्वयं भी पीछे नहीं हटता। इसी संदर्भ में अनामिका का मत दृष्टव्य है- “स्त्री-आंदोलन पितृसत्तात्मक समाज में पल रहे स्त्री-संबंधी पूर्वाग्रहों से पुरुषों की क्रमिक मुक्ति असंभव नहीं मानता। दोषी पुरुष नहीं,वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था है जो  जन्म से लेकर मृत्यु तक पुरुषों को लगातार एक ही पाठ पढ़ाती है कि स्त्रियाँ उनसे हीनतर हैं, उनके भोग का साधनमात्र ।”5  आज बाजारवाद ने स्त्रियों कि अनेक छवियाँ गढ़ी है, जहाँ स्त्रियों को विक्रेता भी बनाया गया है और उपभोग कि वस्तु भी। उपभोक्ताववाद के लिए स्त्री ‘देह’ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। मंगलेश डबराल अपने संग्रह ‘हम जो देखते हैं’(1995) में  लिखते हैं- 
“अमेरिका में रोना माना है
उदास होना मना है
एक बहुत बड़ी आँख सबको देख रही है
पीछे मुड़कर जीवन को देखना माना है
वह किस्सा किसे नहीं मालूम
कि आलीशान दुकान में सामान बेचती
एक दुबली-सी लड़की
जो कुछ सोचती हुई-सी बैठी थी
एक दिन एक ग्राहक के सामने मुस्कराना भूल गई
शाम को उसे नौकरी से अलग कर दिया गया।”6


यहाँ लड़की का मुसकुराना उसके काम का एक हिस्सा है प्रसन्नता नहीं ताकि उसकी मुस्कुराहट से ग्राहक आकर्षित किए जा सके। अगर वह उपभोक्तावादी संस्कृति के खिलाफ जा ऐसा नहीं करती है तो वह बाजार के काम कि भी नहीं है। कहीं न कहीं बाजार के कारण स्त्रियाँ आर्थिक रूप से सक्षम बनी लेकिन सिर्फ बाज़ार कि शर्तों पे। उसे न कुछ सोचने का अधिकार है न ही कुछ कहने का। इस संदर्भ में प्रसिद्ध नारीवादी चिंतक एवं लेखिका प्रभा खेतान का मानना है कि “भूमंडलीकरण जीवन के हर कोने में अस्तित्व के हर रूप का वस्तुकरण करता है।”7  आज बाज़ार कि नज़र स्त्री के प्रत्येक रूप पे है चाहे वो गाँव के खेत खलियान मे कार्य करती स्त्री हो, घरमे रहने वाली या घर संभालती स्त्री हो या जंगल और पहाड़ों पे जीवन जीती स्त्री हो। बाज़ार हर हालत में स्त्री को अपने चंगुल में फंसा कर अपना स्वार्थ साधना चाहता है। इसी क्रम मे आदिवासी स्त्रियों को बाज़ार कि नीतियों के प्रति आगाह करती हुई निर्मला पुतुल अपनी कविता ‘बिटिया मुर्मु के लिए’ में लिखती है कि-
“वे दबे-पाँव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में
वे तुम्हारे नृत्य कि बड़ाई करते हैं
वे तुम्हारी आँखों कि प्रशंसा में कसीदे
पढ़ते हैं
सौदागर हैं वे... समझो...
पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू.... पहचानो!”8


बाजारवाद के कारण आज एक स्त्री स्वतंत्र होकर भी गुलामी का जीवन जी रही है। उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते भोली भाली स्त्रियों को फंसाया जा रहा है ताकि चकाचौंध कि दुनिया से आकर्षित हो वे स्वयं उपभोग को तैयार हो जाए। और जब स्त्री बाज़ार के काम कि नहीं रहती उसको दूध में से मक्खी कि तरह उठाकर फेंक दिया जाता है। इसी संदर्भ में विनय विश्वास का मत दृष्टव्य है-“उपयोग कि जाने वाली वस्तु बार-बार काम आ सकती है। उपभोग जिसका किया जाए, वह एक बार इस्तेमाल के बाद नष्ट हो जाती है। मकान का उपयोग किया जाता है और अनाज का उपभोग। उपभोकतावाद में ज़ोर उपभोग पर ज़्यादा है। इसलिए कि उपभोग्य वस्तुओं कि खपत ज्यादा होती है। उनकी मांग भी अपेक्षाकृत अधिक होती  है।”9
जहां एक ओर नब्बे के बाद बाज़ार ने स्त्री का वस्तुकरण किया, स्त्री की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक स्थितियों में बदलाव आया वहीं दूसरी ओर स्त्रियाँ अपने अस्तित्व और आत्मसम्मान के लिए भी सचेत दिखाई पड़ती हैं। आज की कविता स्त्री आत्माभिव्यक्ति का दस्तावेज़ है। वह अपने सुख, दुख, ममता, प्रेम और विद्रोह को कविता के माध्यम से रचती है। शोषण, दमन, उत्पीड़न, उपेक्षा जैसे स्त्री-जीवन के समस्त पहलुओं की चर्चा करते हुए आज कि कविता स्त्री-अस्मिता कि लड़ाई में सक्रिय सहयोग दे रही है। उदाहरण के लिए सविता सिंह की कविताओं को अगर हम देखें तो पाएंगे की सविता सिंह की काव्य संवेदना में उग्रता नहीं है लेकिन उनके यहाँ स्त्री अस्मिता से जुड़े अनुभवों की संश्लिष्टता है। सविता सिंह अपने औरत होने पर नहीं, बल्कि किसी की औरत होने पर प्रश्न चिन्ह लगाती है और कहती है –
“मैं किसकी औरत हूँ/कौन है मेरा परमेश्वर
किसके पाँव दबाती हूँ/किसका दिया खाती हूँ
किसकी मार सहती हूँ../ऐसे ही थे सवाल उसके
बैठी थी जो मेरे सामने वाली सीट पर रेलगाड़ी में
मेरे साथ सफर करती”


इस पर कवयित्री का जवाब देखते ही बनता है। जो भारतीय समाज कि उस स्त्री का रोल अदा कर रहा है जो आज अपने पैरों पे खड़ी है, स्वावलंबी है, अपने फैसले खुद ले सकने मे समर्थ है-
“सोचकर बहुत मैंने कहा उससे
मैं किसी की औरत नहीं हूँ/मैं अपनी औरत हूँ
अपना खाती हूँ/जब जी चाहता है तब खाती हूँ
मैं किसी की मार नहीं सहती/और मेरा परमेश्वर कोई नहीं”10  


अतःअंतिम दशक की हिंदी कविता में हम स्त्री जीवन से जुड़े हर पहलू को उद्घाटित होते पाते हैं। जहां एक ओर उदारीकरण के बाद स्त्री वस्तु के रूप में प्रस्तुत की जाती है वहीं दूसरी ओर औद्योगिक विकास ने उसे आर्थिक रूप से सबल भी बनाया है। स्त्रियाँ अब अपने आत्मसम्मान और अस्मिता के प्रति सचेत भी हो रहीं हैं और कविता के माध्यम से इन्हें मुखर रूप से अभिव्यक्त भी कर रही हैं।


संदर्भ सूची-
1. http://kavitakosh.org/kk
2. पाण्डेय, मैनेजर. आलोचना की सामाजिकता. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन
3. संपा. त्रिपाठी, प्रभात. (2013). चन्द्रकान्त देवताले प्रतिनिधि कविताएँ. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-41
4. कात्यायनी. (1999). इस पौरुषपूर्ण समय में. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन. पृष्ठ-64
5. अनामिका. (2004). कविता में औरत. दिल्ली. साहित्य उपक्रम. पृष्ठ- 9
6. डबराल, मंगलेश. (2015). हम जो देखते हैं. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-75-76
7. खेतान, प्रभा. (2004). बाज़ार के बीच बाज़ार के खिलाफ. नई दिल्ली. वाणी प्रकाशन. पृष्ठ-32
8. संपा. विश्वरंजन. (2011). कविता के पक्ष में. दिल्ली. शिल्पायन. पृष्ठ-222
9. विश्वास, विनय. (2009). आज की कविता. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन. पृष्ठ-160
10. http://kavitakosh.org/kk


-स्वाति 
शोधार्थी- पीएच.डी. हिन्दी साहित्य
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा,महाराष्ट्र
Email- swatitasud@gmail.com  


राजनीति को वोट की जरूरत होती है


अमन  कुमार त्‍यागी


 


अंधे को आंख की
लंगड़े को टांग की
लूले को हाथ की
गूंगे को जीभ की
बहरे को कान की
जैसे जरूरत होती है
वैसे ही राजनीति को
वोट की जरूरत होती है


भूखे को ब्रेड की
प्रिय को प्रेम की
नंगे को वस्त्र की
योद्धा को अस्त्र की
बच्चे को मां की
जैसे जरूरत होती है
वैसे ही राजनीति को
वोट की जरूरत होती है


वोट की जरूरत
दिखाई देती है
बटन दबाने तक
या मोहर लगाने तक
उसके बाद होता है खेल
रेलमपेल धकमधकेल
धकमधकेल रेलमपेल


Thursday, February 27, 2020

बोलो हिन्दुस्तान


- इन्द्रदेव भारती

 

बोलो हिन्दुस्तान

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बोलो  हिन्दुस्तान  कहाँ तक,

कितनी  हिंसा  और  सहोगे । 

आज अगर चुप बैठे तो कल,

कहने   लायक  नहीं  रहोगे ।  

 

बारूदी   शब्दों   की  भाषा,

किसनेआखिर क्यूँ बोली है ।

अंबर   ने   बरसाये   पत्थर,

धरती  ने  उगली  गोली  है । 

 

प्यार के  गंगाजल में   कैसे,

नफरत का  तेज़ाब घुला है ।

गौतम, गाँधी का  ये आंगन,

सुबह लहू से धुला मिला है ।

 

किस  षड्यंत्री  ने  फेंकी  है, 

षड्यंत्रों   की   ये  चिंगारी ।

गलियों, सड़कों, चौराहों  पे,

मौत   नाचती  है   हत्यारी ।

 

यहीं जन्म लेकर के आखिर,

कहो अकारण क्यूँ मर जाएं ।

क्यूँ अपना घर,गली,ये बस्ती,

छोड़ वतन हम कहाँपे जायें ।

 

कहाँपे जायें ?  कहाँपे जायें ?

कहाँपे जायें ?  कहाँपे जायें ?

                - इन्द्रदेव भारती

Wednesday, February 26, 2020

हम आये तुम आये चले जायेंगे इक रोज


 


 


हम आये तुम आये चले जायेंगे इक रोज
समय के शिलापट्ट पर कालजयी कुछ होता नहीं ।


एक दो रोज पढ़े जाओगे
एक दो रोज सब गुनगुनायेंगे।
दोहरायेंगे कुछ दिन वेद ऋचा सा
फिर सब तुम्हें भूल जायेंगे।
दो चार दिन आँसू बहाते हैं सब
कोई हम पर जनम भर रोता नहीं



ये खजुराहो के मंदिर ये
अजंता एलोरा की गुफायें।
कुछ प्रतिबिंब अधूरी तपस्याओं के
कुछ में चित्रित हैं कुंठित वासनाये।
देह पर ही लिखे गए हैं नेह के इतिहास सारे
जग में मन जैसा कुछ भी होता नहीं ।


क्यूँ नाचती है मीरा दीवानी
सूफी किसके लिये गीत गाते।
प्रीत की चादर बुनते किसके लिए कबीरा
सूर किसको रहे अंत तक बुलाते।
वाचन मात्र मानस का होता यहाँ
राम चरित में कोई भी खोता नहीं ।
समय के शिलापट्ट पर कालजयी कुछ होता नहीं ।


 



Monday, February 17, 2020

स्मृृतियों के कैनवास पर : स्व० हरिपाल त्यागी

 


 

 

बाबा नागार्जुन की पंक्तियाँ, रह-रह कर स्मरण आ रही है 

 

सादौ कगद हो भले, सादी हो दीवाल।

रेखन सौ जादू मरे कलाकार हरिपाल।।

इत उत दीखै गगंजल, नहीं जहां अकाल।

घरा धन्य बिजनौर की, जहां प्रगटे हरिपाल।।

 

और हरिपाल अंकल का, मुस्कुराता चेहरा स्मृतियों के कैनवास पर, अनायास साकार हो रहा है। बिजनौर की धरती, साहित्य कला, राजनीति, पत्रकारिता आदि विभिन्न सन्दर्भ में, उर्वरा रही है। स्व० हरिपाल त्यागी का मुझ पर असीम स्नेह और आर्शीवाद रहा। अपने बचपन में ही, घर पर आने वाली, पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों के माध्यम से बाल सुलभ जिज्ञासा के चलते शब्द ओर चित्रों का आकर्षण अपनी ओर खींचने लगा था। बचपन, अपने ननिहाल ग्राम पैंजनियाँ जनपद बिजनौर, उ0प्र0 में नाना श्री स्व0 शिवचरण सिंह के सरंक्षण में बीता। उनका स्थान, भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी इतिहास में, अपना एक अलग महत्व रखता हैप्रख्यात पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी (कानपुर) की उन पर महती अनुकम्पा थी, और उन्हीं के माध्यम व निर्देश पर नाना श्री के गांव पैजनियाँ में काकोरी काण्ड के ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खाँ, अवनीकांत मुकंजी (मिदनापुर), राम सिंह, चुन्नीलाल (पंजाब), अप्पाराव (महाराष्ट्र) जैसे क्रान्तिकारियों ने अज्ञातवास किया था, तथा नाना श्री ने, अपने साधनों से क्रान्तिकारियों को हथियारों की सप्लाई का खतरनाक कार्य, अफगानिस्तान, तिब्बत, श्री लंका आदि से एक लम्बे समय तक किया।

 

यहां यह भी, उल्लेखनीय है कि, हिन्दी जगत के तुलनात्मक आलोचना के जनक स्व० पण्डित पद्र्मसिंह शर्मा (नायक नंगला) उनके खानदानी चाचा थे। जिनके यहाँ मुंशी प्रेमचन्द, नाथूराम शंकर शर्मा, अकबर इलाहावादी, शिकार कथा के प्रसिद्ध लेखक श्री राम शर्मा आदि का आना-जाना लगा रहता था। नाना श्री- महात्मा गांधी, सेठ जमना लाल बजाज, महादेव देसाई, रवीन्द्रनाथ टैगोर, पण्डित मदन मोहन मालवीय, अरविन्द घोष, रमण महर्षि, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, सुमित्रा नन्दन पंत, बनारसी दास चतुर्वेदी आदि, अपने समय के अनेक प्रख्यात विभूतियों के भी निकट सम्पकी रहे

 

नाना श्री के इसी गौरवशाली परिवेश का लाभ, अपने बचपन में मुझे भी मिला और साहित्य व कला के साथ-साथ अपनी जिज्ञासा के चलते, जीवन दृष्टि को एक परिपक्व तथा स्पष्ट दिशा बोध, स्वतः ही मिल गया।

 

उ0प्र0 के छोटे से इस जनपद बिजनौर में हिन्दी गजल विद्या के मसीहा दुष्यन्त कुमार, व्यंग्य विद्या के महत्वपूर्ण स्तम्भ रवीन्द्रनाथ त्यागी (महुवा) तथा उनके चचेरे भाई हरिपाल त्यागी जी भी, पैजनियाँ आते-जाते रहे। आगे चल कर इनका महत्व जाना, पीछे छूटे बचपन के साथ, जीवन की गुरू गम्भीर डगर पर इन विभूतियों का स्नेह मुझ पर, बना रहा।

 

स्व0 हरिपाल अंकल तो, इस क्रम में मेरे परिवार के लिये एक अभिभावक ही थे। कला और साहित्य में तो उनका, सर्वोच्च स्थान है ही, लेकिन मेरे लिये तो अपने परिवार के कैनवास पर, उनका कलाकार आज भी, स्मृतियों के चित्र उकेरने में व्यस्त है। जहां तक मुझे स्मरण आ रहा है, वर्ष 1977 या 1978 रहा होगा, हरिपाल अंकल ने "स्पार्टसक्स” शीर्षक से अपनी कृति, मुझे दी। उस पर मोती से चमकते कलात्मक अक्षरों में लिखा था "प्रिय भोला के लिये' और बस यह सिलसिला, अन्त तक बना रहा।

 

मेरे बिजनौर आवास पर उनके साथ अनेके विभूतियाँ, समय-समय पर पधारती रहीं। कभी आशा रानी व्होरा तो कभी डा0 कर्ण सिंह चौहान, कभी बाबा नागार्जुन तो कभी भीमसेन त्यागी, मुझे बरबस याद आ रहा है वह क्षण, जब एक दिन शाम के समय मेरी धर्मपत्नी डा0 ऊषा त्यागी, किचन में व्यस्त थीं, तभी बाहर हरिपाल अंकल की खनकती आवाज़ सुनाई दी। देखा तो, श्री भीमसेन त्यागी उनके साथ थे। 'आदमी से आदमी तक' का सफर, साक्षात सामने था। अगले चार-पाँच दिन कब बीत गये? पता ही नहीं चला। शहर भर से लोग बाग, आते जाते रहे, कभी श्रद्धेय बाबूसिंह चौहान, शकील बिजनौरी, तो कभी निश्तर खानकाही, अजय जन्मजेय। लगा, बाहर ड्राइंग रूम में साहित्य और कला की, प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी थी। लोग बाग आते, मिलते-जुलते और समय कब, ठहाकों और निश्च्छल मुस्कान के बीच, कला और साहित्य की महीन बतकहियों में 'मिल्खा सिंह' बन जाता, अहसास ही नहीं हुआ। यह सिलसिला पिछले तीन दशकों से चलता रहा।

 

जब कभी दिल्ली जाना हुआ, तो सादतपुर में हरिपाल अंकल का घर ही ठिकाना हुआ करता। वहां बिखरा निश्च्छल स्नेह, समेटे नहीं सिमटता। मेरी धर्मपत्नी डा0 ऊषा त्यागी के शोध विषय 'बीसवीं शती के हिन्दी साहित्य सवंर्धन में जनपद बिजनौर का योगदान' में हरिपाल अंकल का सक्रिय सहयोग शोध को, और भी प्रमाणिक बना गया।

 

मेरे बेटे विनायक और बेटी स्वाति का बचपन, अंकल की गोद में बीता। उनके बाल सुलभ सवालों का, सहज समाधान हरिपाल अंकल के पास रहता। इन्ही सब बातों के चलते, दोनों बच्चे कलात्मक दृष्टि के सवाहक बन गये हैं बेटा विनायक तो कानून और कला के क्षेत्र में अपनी कीर्ति पताका फहराने में व्यस्त है, और बेटी स्वाति डेनमार्क में अपनी व्यवसायिक कुशलता में। विनायक, तो शब्द और रंगों का, स्वयं में एक खूबसूरत संयोजन लगता है। जब अप्रैल 2019 में दिल्ली में हरिपाल अंकल बीमार थे, तो ऊषा और मेरे साथ विनायक भी उनके दर्शन के लिये गया था। अंकल को बोल पाने में कष्ट हो रहा था, चेहरे पर रहने वाली स्मित, व्याधि की औट में जा छिपी थी - लेकिन उनकी आँखे, बरबस संवाद कर रही थीहमें लग गया था कि कला और शब्दों का यह सूर्य अपने, अवसान की और बढ़ चला है, सभी की आँखें पनियां उठी थीं। तभी हरिपाल अंकल ने, विशाल को संकेत कर अपनी कुछ बहुमूल्य कलाकृतियाँ निकलवायीं, उनमें से एक कलाकृति विनायक की पसन्द से, उसे अपने आर्शीवाद के साथ जब दी, तो हम सबकी वाणी अवरूद्ध हो गई, आँखें छलक उठीं। लेकिन, अंकल अपनी रोग शय्या पर, मानों 'उत्तरायण की प्रतिक्षा' का बोलता चित्र बन चुके थे।

 

भाई रूपसिंह चंदेल, का फोन आया तो उन्होंने अंकल के स्वास्थ्य की ताजा जानकारी चाही, मैंने जव बताया, तो वह चिन्तित हो उठे। बीमारी के चलते कमजोरी बढ़ गई थी, लेकिन हरिपाल जी के चेहरे पर वहीं फौलादी निश्चय की छाया पूर्ववत कायम थी

 

लौटते समय बेटा विनायक, अपनी गाड़ी ड्राइव कर रहा था, ऊषा और में साथ में बैठे थे। हमारे बीच, मौन पसरा था, और विनायक अपने पास रखी, हरिपाल अंकल द्वारा दी गई कलाकृति को रह-रह कर निहारता रहा। घर पहुँचते ही, सबसे पहले वह चित्र उसने अपने सामने दीवार पर लगाया तो मुझे लगा कि हरिपाल अंकल की सभी स्मृतियाँ ही, सामने जा टंगी थी।

 

1 मई 2019 को फोन द्वारा हरिपाल अंकल के महाप्रयाण का समाचार मिला, तो सब स्तब्ध रह गये। कला और साहित्य के साथ ही, एक अपूर्णनीय क्षति थी-यह मेरे परिवार के लिये। अंदर तक बेधती, अंकल की विलक्षण आँखों से झांकता स्नेहिल कलाकार और साहित्कार अब, इतिहास बन चुका था। हिन्दी और कला जगत के साथ ही, उत्तर प्रदेश के जनपद बिजनौर ने तो मानों अपना अमूल्य रत्न ही खो दिया। बाबा नागार्जुन की पंक्तियां रह-रह कर, ज़हन में कौघनें लगीं।

 

अपने ग्राम 'महुवा' की नशीली महक लिये, कला और शब्दों का चितेरा अब स्मृतियों में कैद है। उनके तहेरे भाई स्व0 रवीन्द्रनाथ त्यागी, सुप्रसिद्ध  व्यंग्यकार रहे। गांव की मिट्टी से निकले, इन दोनों रत्नों ने समूचे कला और सहित्य जगत में अपने 'त्यागी' सरनेम का पंचम लहराया। लोभ और स्वार्थ से कोसों दूर रहे और जहाँ-जहाँ रहे, वहाँ इंसानियत आबाद होती गई। कला और शब्दों की समझ थिरकने लगी।

 

हरिपाल अंकल के कारण ही बिजनौर का 'इमलिया परिसर' ,  दिल्ली का सादतपुर कहा जाता है, मेरी छोटी सी कुटिया "विनायकम' पर स्व0 रामप्रसाद मिश्र, अलका सिन्हा, डा0 रामदरश मिश्र, डा0 महेश दिवाकर, रामकुमार कृषक, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, बल्लीसिंह चीमा, डा0 रामगोपाल भारतीय, महेन्द्र अश्क शिवबाबू मिश्र जैसे शब्दों के जादूगर पधारते रहे हैं, लेकिन इन सबके मूल में, हरिपाल अंकल की स्मृतियाँ अपना एक अलग ही महत्व रखती हैं। भाई नवीन, निर्दोष, विशाल से आत्मीय रिश्ता बन चुका है। बहिन श्वेता और अनिल अत्री की चर्चा हमेशा बनी रहती है शीला आंटी तो, अपना ‘फेवीकोल' वाला रोल इन सबके बीच, लम्बे समय तक बनाये रहें, यही कामना है। लिखने को तो, स्मृतियों का अंबार लगा है, लेकिन हरिपाल अंकल को लिखना सामान्य काम नहीं है वास्तव में हरिपाल जी ने कला और साहित्य को जिया था, अपनी उम भर वह व्यवसायिक सोच से कोसों दूर रहे। उनकी गंवई सरलता, निश्च्छल व्यवहार और संवदेना उनकी पूंजी थे। जिसके बूते वह दीर्घकाल तक, कला और साहित्य जगत में अपनी उपस्थिति बनाये रहेंगे।

 

मेरी बेटी स्वाति, जो पिछले कई वर्षों से, कोपेनहेगन (डेनमार्क) में कार्यरत है, बचपन से हरिपाल अंकल को 'रसमलाई' कहती रही। हरिपाल जी जब भी बिजनौर आते, स्वाति की 'रसमलाई' नहीं भूलते । फोन पर स्वाति बता रही थी कि अब जब भी रसमलाई सामने आती है, तो हरिपाल अंकल का हंसता हुआ चेहरा सामने आ जाता है, रसमलाई सरिखे  , उस कलात्मक व्यक्तित्व की पुनीत स्मृति को, हम सभी की श्रद्धाजंली अर्पित है।

 

(भोलानाथ त्यागी)

49/ विनायकम

इमलिया परिसर, सिविल लाइन्स, बिजनौर उ0प्र0

मो०- 7017261904,  9456873005

Sunday, February 16, 2020

मुझको मत मरवाय री

 



गीतकार इन्द्रदेव भारती


 



कन्या भ्रूण  की  गुहार का 

ये गीत  'शोधादर्श' पत्रिका  

में प्रकाशित करने के लिये

संपादक श्री अमन  कुमार

त्यागी का हार्दिक आभार।

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मुझको  मत  मरवाय  री ।

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माँ !  मैं  तेरी  सोनचिरैया, 

मुझको  मत  मरवाय  री ।

काली गैया  जान  मुझे  तू,

प्राण - दान दिलवाय री ।

 

हायरी मैया,क्या-क्या दैया

जाने    मुझे   दबोचे   री ।

यहाँ-वहाँ से,जहाँ-तहाँ से,

काटे  है  री,.....नोचे  री ।

सहा न जावे,और तड़पावे

चीख़  निकलती जाय री ।

मुझको.................री ।।

 

यह कटी  री, उँगली मेरी,

कटा अँगूठा जड़  से  री ।

पंजा काटा, घुटना काटा,

टाँग कटी झट धड़ से री ।

माँ लंगड़ी ही,जी लूँगी री,

अब  तो  दे  रुकवाय री ।

मुझको.................री ।।

 

पेट भी  काटा, गुर्दा काटा,

आँत औ दिल झटके में री ।

कटी सुराही, सी गर्दन भी,

पड़े   फेफड़े  फट  के  री ।

नोने - नोने  हाथ  सलोने,

कटे   पड़े   छितराय  री ।

मुझको..................री ।।

 

आँख निकाली कमलकली सी

गुल - गुलाब से  होंठ  कटे ।

नाक कटी री,  तोते - जैसी,

एक-एक करके  कान कटे ।

जीभ कटी वो,माँ कहती जो,

कंठ  रहा......गुंगयाय  री ।

मुझको...................री ।।

 

पसली  तोड़ी, हसली  तोड़ी,

तोड़ी   रीढ़   की   हड्डी  री ।

कान्धे  तोड़े,   कूल्हे   तोड़े,

उड़ी  खुपड़िया  धज्जी री ।

फूट  रहे  रे,  ख़ून  के  धारे,

अंग - अंग   से   हाय  री ।

मुझको...................री ।।

 

पप्पी   लेती,   नहीं  अघाती,

जिसके  मखना  गालों  की ।

आज उसीकी खाल खींचली,

रेशमिया   से    बालों   की ।

उधड़े - उधड़े, माँस लोथड़े,

पड़े  -  पड़े   डकराय  री ।

मुझको....................री ।।

    

गीतकार इंद्रदेव भारती

"भरतीयम"   

ए-3, आदर्श नगर,

नजीबाबाद - 246763

( बिजनौर ) उ.प्र.

मो. 99 27 40 11 11


Saturday, February 15, 2020

बाबा नागार्जुन को पढ़ते हुए


इन्द्रदेव भारती



भिखुआ उजरत लेके आया, बहुत दिनों के बाद
झोपड़िया ने दिया जलाया, बहुत दिनों के बाद


खाली डिब्बे और कनस्तर फूले नहीं समाये
नून, मिरच, घी, आटा आया, बहुत दिनों के बाद


हरिया हरी मिरच ले आया, धनिया, धनिया लाई
सिल ने बट्टे से पिसवाया, बहुत दिनों के बाद


चकला, बेलन, तवा, चीमटा खड़के बहुत दिनों में
चूल्हा चन्दरो ने सुलगाया, बहुत दिनों के बाद


फूल के कुप्पा हो गयी रोटी, दाल खुशी से उबली
भात ने चौके को महकाया, बहुत दिनों के बाद


काली कुतिया कूँ-कूँ करके आ बैठी है दुआरे
छक कर फ़ाक़ो ने फिर खाया, बहुत दिनों के बाद


दिन में होली, रात दीवाली, निर्धनिया की भैया
घर-भर ने त्योहार मनाया, बहुत दिनों के बाद



ए-3, आदर्श नगर, नजीबाबाद-246763 (बिजनौर) उप्र


एक बेबाक शख्सियत : इस्मत चुगताई


आरती कुमारी


पीएच. डी. हिंदी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, त्रिपुरा, अगरतला


 


         साहित्य के क्षेत्र में अनेक विद्वानों का योगदान रहा हैं, वर्तमान  में विभिन्न विषयों से जुड़े, एक नई दृष्टि लिए रचनाकार हमारे समक्ष आ चुके हैं ।  भारतीय साहित्य में इस्मत चुगताई का भी एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, जिनका जन्म 21 अगस्त 1915 ई .  को बदायूं उत्तरप्रदेश में हुआ था। जिनका पूरा जीवन संघर्षशील तथा समस्याओं से घिरा रहा परंतु कभी  भी जिंदगी से हार नहीं मानती,जितना अनुभव जीवन में मिल पाया उसे जीवन के अंत समय तक कभी भूल नहीं पाई ।  इस्मत चुगताई उर्दू की प्रमुख व प्रसिद्ध लेखिका के रूप में जानी जाती रही हैं , उनकी प्रत्येक रचना विभिन्न भाषाओं में अनुवादित हो चुकी हैं ।  वह एक स्वतंत्र विचारक , निडर , बेखौफ, जिद्दी , जवाबदेही, तार्किक तथा विरोधी स्वभाव की थी जिन्होंने अपने जीवन में उन सभी बातों का विरोध किया जिससे जिंदगी एक जगह थम सी जा रही हो ।  इस्मत चुगताई का परिवार एक पितृसत्तात्मक विचारों वाला था उसके बावजूद वह अपने परिवार के प्रत्येक सदस्यों से विपरीत रही । स्त्रियों की समस्याओं को लेकर आजादी से पहले व बाद में अनेक चर्चा -परिचर्चा होती रही है परंतु ध्यान देने वाली बात यह है कि महिलाओं की समस्याएं दिन -प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । साहित्य समाज का दर्पण है, वह समाज की प्रत्येक समस्या उजागर करने का पूरा प्रयास करता है उसका उद्देशय यह रहता है कि  समाज का प्रत्येक वर्ग उससे प्रभावित होकर उसके समाधान के लिए अग्रसर हो सके ।


      इस्मत चुगताई के लेखन की शुरुआत हमारे देश भारत की स्वतंत्रता के पूर्व से हो चुकी थी, जिन्होंने समाज की प्रत्येक समस्या पर अपनी नज़र रखते हुए उसका अनुभव प्राप्त करती है । उनकी रचनाओं में अनेक विषय सभी पाठकों को चकित कर देते है तथा उसके साथ – साथ उनके बेबाकी व्यक्तित्व को  प्रस्तुत भी करते है । उनकी अनेक कहानी संग्रह जिसमें – चोटें, छुई -मुई, एक बात, कलियां, एक रात, शैतान, आधी औरत आधा ख्वाब आदि है , जिसमें स्त्रियों की सभी समस्याओं को आधार बनाकर लिखा गया है ।  इस्मत चुगताई की कहानियाँ स्त्री जीवन, उनका संघर्ष , पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री -पुरुष मतभेद, मुस्लिम समाज में तीन तलाक की समस्या, नारी अस्मिता, स्त्री मन का द्वन्द, दहेज प्रथा, आदि समस्याओं को प्रस्तुत करती है । वह अपने लेखन के विषय में पूरे आत्मविश्वास से कहती थी कि-


        “मेरी कहानियों को किसी सफाई की आवश्यकता हैं ऐसा मैंने कभी महसूस नहीं किया”


इस्मत अपने लेखन के प्रति सचेत थी उनके मन में कभी भी किसी तरह का भय नहीं आया तथा ऐसा कभी उन्हें नहीं लगा की जो कुछ लिखा हैं वह गलत हैं।  जीवन के प्रत्येक पक्ष को उकेरते हुए समाज की सच्चाई को अपनी रचनाओं के माध्यम से रु-ब -रु कराती हुई दिखाई पड़ती है ।


           


     इस्मत चुगताई वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसमें समाज की पूरी पृष्टभूमि नज़र आती हैं । स्त्रियों को पितृसत्तात्मक समाज ने अनेक रूढ़ियों व परंपराओं में इस प्रकार जकड़ा हुआ है जिसके  बाहर आज भी वह नहीं निकल पाई । इस्मत अपना लेखन इस बेबाकी से करती थी कि किसी भी आने वाली समस्या का भय मन में नहीं रहता था। ‘लिहाफ़’  उनकी एक ऐसी कहानी है जिसके लिए उन्हें जेल के चक्कर भी लगाने पड़ते हैं ।  इस्मत को उस वक्त भी किसी तरह का भय नहीं होता जब पुलिस उनको जेल ले जाने के लिए आती है तब वह कहती हैं –


              “जेल में ? अरे मुझे जेल देखने का बहुत शौक हैं कितनी दफा यूसुफ से कह चुकी हूँ जेल ले चलो मगर हँसता है कमबख्त और टाल जाता हैं । इंस्पेक्टर साहब मुझे जेल ले चलिए, आप हथकड़ियाँ लाए हैं”


यह वाक्य इस्मत चुगताई के व्यक्तित्व को दर्शाता है क्योंकि वह जानती थी कि समाज सच्चाई को जानकर भयभीत हो सकता हैं परंतु उनकी कहानी समाज की वास्तविक घटनाओं पर आधारित है वो गलत नहीं हैं ।


          इस्मत चुगताई के अनेक उपन्यास है जो निम्नलिखित है - जिद्दी, टेढ़ी लकीर, दिल की दुनिया, सौदाई, जंगली कबूतर, मासूम, एक कतरा-ए-खून, अजीब आदमी, बाँदी बहरूप नगर । इसके साथ -साथ उनकी आत्मकथा- कागजी है पैरहन भी काफी चर्चित हो चुकी है ।  इस्मत चुगताई मुस्लिम समाज से संबंध रखती थी जहां कई बंदिशे स्त्रियों पर थे, जिसका सामना इस्मत को भी करना पड़ा लेकिन वह उसका हमेशा विरोध करती रही । पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री अपनी अस्मिता के लिए सदियों से संघर्ष करती रही हैं , आज स्त्रियां अपनी एक पहचान बना चुकी हैं ।  परंतु इतने संघर्षों के बावजूद भी वर्तमान में अनेक समस्याओं से स्त्रियाँ जूझ रही हैं । इस्मत को पहली बार बुर्का ओढ़ना पड़ा तब वह अधिक क्रोधित होती है उसके विषय में कहती हैं कि :-


            “मुझे पहली बार जब बुर्का ओढ़ना पड़ा और बता नहीं सकती कि अपमान की भावना ने कई बार मुझे पटरी पर कट जाने की सलाह दी”


 यह  सच है जब किसी की अस्मिता खतरे में हो तब उसे बेहद निराशाजनक स्थिति से गुजरना पड़ता है ।  एक स्त्री पुरुष के समान ही समाज में अपना योगदान देती है लेकिन जब उसे समाज में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है तब  अधिक कष्ट का अनुभव करती है।


      इस्मत चुगताई बचपन से ही पढ़ने में रुचि रखती थी उनमें एक जिज्ञासा का भाव हमेशा बना रहा।  उनके मन में हमेशा अपने पितृसत्तात्मक समाज के प्रति एक क्रोध का भाव बना रहता था क्योंकि वह समाज में स्त्री की प्रत्येक कार्यों पर नज़र रखती।  उनके मन में इस बात का दुख व निराशा बनी रहती कि स्त्रियाँ घर-परिवार में शोषित, अत्याचारों का सामाना  करती हैं उसका विरोध क्यों नहीं करती ? जीवन में उदासी लिए जिंदगी गुजारने को मजबूर है । “चौथी का जोड़ा” इस्मत की एक ऐसी कहानी जिसमें स्त्री मन व निम्न मध्यवर्गीय समाज की दशा का चित्रण बहुत ही स्पष्टता से देखा जा सकता हैं । इस कहानी में इस्मत स्पष्ट रूप से दिखाती है कि जब पुरुष वर्ग स्त्री की भावनाओं का सम्मान न करें उस पर अत्याचार करें तो उसे अस्वीकार करना ही एक स्त्री का धर्म होना चाहिए –


          “क्या मेरी आपा मर्द की भूखी है ? नहीं वह भूख के एहसास से पहले ही सहम चुकी है, मर्द का तसव्वुर उनके जेहन में एक उमंग बनकर नहीं उभरा बल्कि रोटी कपड़े का सवाल बनकर उभरा है”


       इस्मत चुगताई का लेखन बेहद प्रभावित करता है, उन समस्याओं से रु-ब-रु कराता है जो समाज का प्रत्येक वर्ग झेलता हुआ नज़र आता हैं ।  यदि कोई स्त्री समाज के नियमों के विरुद्ध सवाल खड़ी करती है तब समाज उसे अच्छे -बुरे के कठघरे में लाकर खड़ा कर देता हैं । इस्मत समाज की कमियों को पूरे साहस, स्पष्टता व सहनशीलता से प्रकाशित करती थी उनके मन में किसी भी तरह का भय नहीं था । उन्हें स्वयं पर पूरा आत्मविश्वास था की जो कुछ भी वो लिख रही हैं वह एकदम सही हैं वे इस बात को मानती थी कि उनका लेखन ही जीवन जीने का आधार है इसकी मौजूदगी में वे खुद को अकेलापन महसूस नहीं करती ।  समाज में स्त्री को शृंगार तथा आभूषण से सजने -सवरने के बीच घेर कर रखा जाता रहा है जो स्त्री सज -सवरकर रहती है उसे विशेष महत्व दिया जाता रहा, परंतु इसकी आलोचना करते हुए इस्मत ने अपनी कहानी ‘निवाला’ में  कहा है कि –


              “क्या औरत होना काफी नहीं एक निवाले में आचार, चटनी, मुरब्बा क्यों”


      इस्मत का लेखन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्थितियों को बहुत ही सहजता से उल्लेखित करता है। उसके बीच एक स्त्री किन -किन समस्याओं से गुजरती है, समाज में स्त्री पुरुष मतभेद स्त्रियों के लिए अनेक समस्या उत्पन्न करता हैं ।  इस्मत ने अपने जीवन में प्रत्येक मोड़ पर पूरे साहस के साथ अपनी जिम्मेदारी को पूरा करती रही चाहे वह अपना परिवार हो या समाज ।  इस्मत अपने पति  शाहिद के विषय में कहती हैं कि –


           “मर्द औरत को पूज कर देवी बना सकता हैं, वो उसे मोहब्बत दे सकता हैं इज्जत दे सकता है सिर्फ बराबरी का दर्जा नहीं दे सकता ।  शाहिद ने बराबरी का दर्जा दिया इसीलिए हम दोनों ने एक अच्छी घरेलू जिंदगी गुजारी”


इस्मत चुगताई के पास जीवन का अनुभव था, समाज स्त्री को पुरुष की अपेक्षा कमजोर समझता रहा है।  प्रत्येक कार्यों में स्त्री-पुरुष का विभाजन दिखाई पड़ता है, स्त्री को अबला, देवी, त्यागी का रूप माना जाता परंतु उसे समानता का अधिकार नहीं दिया जाता है ।  वर्तमान समय में संविधान में स्त्री -पुरुष को समानता का अधिकार दिया गया है लेकिन भेदभाव का अनुभव महिलाएं आज भी अनेक क्षेत्रों में  करती हैं।    


           अत: इस्मत चुगताई समाज की जमीनी हकीकत को अपने समय में पहचान चुकी थी उनका लेखन आज भी प्रासंगिक है।  इस्मत के लेखन पर चेखव, बर्नाड शॉ, रशीदजहाँ, डिक्सन, प्रेमचंद तथा महात्मा गांधी आदि का प्रभाव दिखाई पड़ता हैं ।  इस्मत के समय में मंटो एक ऐसे लेखक थे जो उनके सबसे निकट रहे वह इस्मत के विचारों से पूरी तरह वाकिफ थे ।  मंटो कहते थे कि  इस्मत का कलम व जबान दोनों बहुत तेज रफ्तार में चलते है उस समय वह कुछ भी नहीं सोचती थी कि इसका प्रभाव क्या होगा ।  स्वतंत्र विचारों से जुड़ी इस्मत चुगताई समाज की परवाह किए बिना जीवन में प्रत्येक मुकाम हासिल करती हैं  जिसकी वह हकदार थी ।  उनके रास्ते में आने वाली परेशानियों को पूरे हौसले के साथ सामना करती हैं ।  उनकी रचनाओं में भी स्त्री, पितृसत्तात्मक समाज में जिस घुटनभरी जिंदगी का सामना करती है उस पर दृष्टि डाला गया हैं । भाषा लेखक की एक शक्ति होती है जिसके माध्यम से वह अपनी अलग पहचान बनाता हैं, इस्मत ने जिस भाषा का प्रयोग किया वह समाज को चकित व अत्यंत प्रभावित करने वाला हैं । इस्मत की भाषा में विरोध, बौद्धिकता, शोर, चंचलता, तेज रफ़्तार, निर्भय और साहस का भाव सब कुछ स्पष्ट रूप से दिखाई देता हैं । एक स्त्री का दर्द, मौलिकता, समाज की सच्चाई, अनुभव को व्यक्त करने की सहज अभिव्यक्ति, तार्किक भाव तथा प्रभावित करने वाली भाषा सम्पूर्ण घटनाओं को इस्मत ने व्यक्त किया हैं ।  समाज की एक अच्छी परख इस्मत के पास थी  और सच में जो व्यक्ति सच्चाई को जानता है वह किसी भी कष्ट से घबराता नहीं है बल्कि अपनी बात बहुत ही सहनशीलता व सहजता से प्रस्तुत करता है । वह किसी भी प्रश्न से भयभीत नहीं होता, जबकि वह धैर्य के साथ सभी प्रश्नों का जवाब देने में ही विश्वास करता है । इस्मत चुगताई का व्यक्तिव भी ऐसा ही था, लेखन के कारण समाज के बेरूखे स्वभाव, आलोचना का सामना करना पड़ा ।  परंतु इस्मत ने  कभी भी अपने हौसले को कम नहीं होने दिया ।  इस्मत चुगताई ने लेखन के साथ -साथ फिल्मों के लिए पटकथा लिखते हुए ‘जुनून’ फिल्म में पात्र की भूमिका भी अदा करती हैं ।  वह अपनी रचनाओं के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, इकबाल सम्मान , नेहरू अवार्ड, आदि पुरस्कार हासिल कर चुकी थी ।  इस्मत ने अपने जीवन में लेखिका की भूमिका अत्यंत जिम्मेदारी, कर्तव्यनिष्टता के भाव को समझते हुए अपनी भूमिका अदा करती हैं ।   


        आज भारत की आजादी के इतने वर्षों बाद भी स्त्रियों की समस्याएं अधिक बढ़ती जा रही है जिस पर ध्यान देना अनिवार्य है । इस्मत चुगताई पहली नारीवादी लेखिका मानी जाती हैं जो स्त्री के मुद्दों को बेहद अच्छे ढंग से प्रस्तुत करती थी । वह समाज की हर एक समस्या को हु-ब-हु प्रकाशित करती थी, समाज जिन रूढ़ियों , अंधविश्वासों से ग्रस्त होकर महिलाओं पर अत्याचार करता था उसका विरोध करते हुए अपने स्वभाव अनुसार उस पर सीधा चोट करती थी जिस कारण उनका लेखन अधिक महत्वपूर्ण लगता हैं ।  इस्मत का निधन 24 अक्टूबर 1991 ई .  को हुआ, आज भी उनका लेखन उनके  अनुभव को जीवित रखता हैं।   


 


संदर्भ ग्रंथ सूची –



  1. पॉल सुकृता संपा- कुमार अमितेश. (2016 ). इस्मत आपा . नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन .

  2. लिप्यंतरण - रिजवी शबनम. (2016 ). छुई -मुई . नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन .

  3. लिप्यंतरण - सुरजीत. (2016 ). लिहाफ . नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन .

  4. लिप्यंतरण- इफ़तीखार अंजुम. (2014 ). कागजी है पैरहन . नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन .


Monday, February 3, 2020

एकदिवसीय राष्ट्रीय शिक्षक उन्नयन कार्यशाला

 





बैंगलोर, बिशप कॉटन वीमेन्स क्रिश्चियन कॉलेज की ओर से एकदिवसीय राष्ट्रीय शिक्षक उन्नयन कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें विभिन्न महाविद्यालयों के लगभग 75 हिंदी शिक्षक-शिक्षिकाओंऔर छात्राओं ने प्रतिभागिता निभाई। अवसर पर बेंगलुरु केंद्रीय विश्वविद्यालय एवं बेंगलुर विश्वविद्यालय के बी.काम. द्बितीय सेमेस्टर की पाठ्यपुस्तक 'काव्य मधुवन' एवं 'काव्य निर्झर' की कविताओं व उनके कवियों पर विशेषज्ञों के साथ चर्चा की गई। 


कार्यशाला का उद्घाटन मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के परामर्शी प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने बतौर मुख्य किया। उन्होंने दोनों कार्यसत्रों की अध्यक्षता भी की। 


मुख्य अतिथि प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने सभी आमंत्रित जनों के बारे में अपने स्नेह को प्रदर्शित करते हुए सभी को शुभकामनाएं दीं व सभी प्रतिभागियों को कार्यक्रम के विषय पर वार्ता के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कविता की ताकत को सभी भिन्नताओं व कुंठाओं के तालों को खोलने की चाबी बताया व इसे व्यक्तित्व के विकास की संभावनाओं का हिस्सा बताया। हिंदी कविता के शिक्षण के क्षेत्र में इस प्रकार के कार्यक्रमों से छात्रों व अध्यापकों के मार्गदर्शन के लिए मुख्य अतिथि ने ऐसे कार्यक्रमों के बार बार होने पर बल दिया । 


बिशप कॉटन वीमेन्स क्रिश्चियन कॉलेज की प्रधानाचार्या प्रोफेसर एस्थर प्रसन्नकुमार व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार यादव ने भी कविता-शिक्षण की आवश्यकता और पेचीदगियों पर सूक्ष्म चर्चा की।


दो कार्यसत्रों के दौरान डॉ. रेणु शुक्ला, डॉ. अरविंद कुमार, डॉ कोयल बिस्वास, डॉ. ज्ञान चंद मर्मज्ञ, डॉ. राजेश्वरी वीएम , डॉ. जी नीरजा डॉ. एम. गीताश्री ने बतौर विषय विशेषज्ञ  निर्धारित कविताओं की बारीकियों पर विस्तार से चर्चा की।


प्रथम सत्र में  हरिवंशराय बच्चन की कविता - जुगनू, जगदीश गुप्त की कविता - सच हम नहीं ,सच तुम नहीं, नागार्जुन की कविता -कालिदास सच सच बतलाना, अटल बिहारी वाजपेयी की कविता - मन का संतोष और जयशंकर प्रसाद की कविता -- अशोक की चिंता पर चर्चा व वार्ता की गई। द्वितीय सत्र कवि गोपाल दास नीरज की कविता -स्वप्न झरे  फूल से गीत चुभे शूल से, रामधारी सिंह दिनकर की कविता - पुरुरवा और उर्वशी पर केंद्रित रहा।


प्रतिभागियों ने बताया कि कार्यशाला छात्रों व अध्यापकों के लिए बहुत ज्ञानवर्धक  रही। कार्यक्रम की सफल प्रस्तुति का अंत राष्ट्रगान से हुआ । 


प्रस्तुति- डॉ . विनय कुमार यादव


अध्यक्ष,हिंदी विभाग, बिशप कॉटन वीमेन्स क्रिश्चियन कॉलेज, बैंगलोर।


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