Monday, November 11, 2019

अमनिका


पाँच पंक्तियों की कविता, जिसमें एक ही बात को चार तरीके से कहने का प्रयास किया गया है। खास बात ये है कि पाँच पंक्तियों में ऊपर-नीचे से कोई भी दो पंक्ति लेने पर बात पूरी हो जाती है। आशा है सुधि पाठक और समीक्षक अमनिका को नयी विधा के रूप में स्वीकार करेंगे। 


1
मैं एक चराग़ की तरह जलने में रह गया
मौसम की तरह रोज़ बदलने में रह गया
हर हमसफ़र ने राह में धोका दिया मुझे
मंजिल न आई और मैं चलने में रह गया
सूरज की तरह रोज़ निकलने में रह गया



2
गीत गाने को जी चाहता है
प्रीत पाने को जी चाहता है
झील सी गहरी आँख तेरी
पास आने को जी चाहता है
डूब जाने को जी चाहता है



3
मैं आंसू तुम्हारे छलकने न दूंगा
हवा से चिराग़ों को बुझने न दूंगा
मेरी ज़िंदगी एक बहता है दरिया
मैं दरिया को हरगिज़ भी रुकने न दूंगा
क़दम अपने पी कर बहकने न दूंगा



4
देख मेरी आँखों में क्या है
सुन मेरी सांसों में क्या है
दिल से दिल की बातें मत कर
दिल, दिल की बातों में क्या है
दिन में क्या रातों में क्या है



5
खुशबुओं की तरह मैं बिखर जाऊंगा
एक जगह रुक गया तो मैं मर जाऊंगा
दुनिया वाले मुझे कुछ भी समझा करें
मैं तो दुश्मन के भी अपने घर जाऊंगा
कोई आवाज़ देगा ठहर जाऊंगा



6
हंस हंस के मेरा बच्चा परछाई देखता है
छू - छू के उंगलियों से तनहाई देखता है
मशहूर हो गया है जब से जवान होकर
हर शह्र - शह्र मेरी रूसवाई देखता है
ऐसे के जैसे कोई हरजाई देखता है



7
अपने जो खास हैं वो हमसे हसद रखते हैं
नफ़रतें और अदावत की रसद रखते हैं
हमने देखा है परेशां हैं यहाँ पर वो लोग
आसमां चाहते हैं बौनों का क़द रखते हैं
काम कुछ करते नहीं झूठी सनद रखते हैं



8
बात झूंठी बनाने लगे हैं
ऊँची बोली लगाने लगे हैं
मेहरबानी पे जो थे हमारी
हमसे आँखे मिलाने लगे हैं
वो हंसी भी उड़ाने लगे हैं



9
क्या है दुनिया ये देख लेने दो
थोड़ा मुझको भी खेल लेने दो
रात बेचैनीयों में बीती है
एक झलक अपनी देख लेने दो
अपनी बाहों में घेर लेने दो



10
देवताओं की बात करते हैं
देश- जनता से घात करते हैं
पाँच सालों में आँख खुलती है
साफ वोटों पे हाथ करते हैं
रात दिन जात-पात करते हैं



11
मुझे घर बैठे शोहरत दे रही थी
हवा थी गर्म लज्ज़त दे रही थी
मेरे माथे पे था मेरा पसीना
खुशी मेरी ही मेहनत दे रही थी


ग्रामीण भारत में हो रहा है बदलाव : धर्मपाल सिंह


धर्मपाल सिंह राजपूत सेवानिवश्त शिक्षक हैं और सेवानिवश्ति के बाद राजनीति में सक्रिय हैं। आप वर्तमान में 'अखिल भारतीय हिंदू शक्ति दल' उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हैं। आपका मानना है कि ग्रामीण भारत बहुत तेजी से बदल रहा है और यह बदलाव अच्छा है। प्रस्तुत है उनसे आलोक त्यागी द्वारा की गई बात के अंश- 


सवाल- ग्रामीण भारत किसे कहेंगे?
जवाब- जो भारत गाँवों में बसता है, वही तो ग्रामीण भारत है। 
सवाल- ग्रामीण भारत को किस नजरिए से देखते हैं?
जवाब- ग्राम और कृषि भारत के विकास को निर्धारित करता है। ग्रामीण भारत में कृषि महत्वपूर्ण आय का साधन है। इसके बावजूद ग्रामीण जनसंख्या समृद्धि की ओर बढ़ रही है। आज किसान तमाम खर्च राक कर अपने बच्चों को पढ़ा रहा है और यही पढ़ाई अतिरिक्त रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर ग्रामीण भारत को समृद्ध कर रही है। 
सवाल- आजादी के बाद किसान की आय उसकी खेती की वजह से कितनी बढ़ी है?
जवाब- आजादी के बाद सरकार द्वारा भूमि सुधार कानूनों को बनाने और  क्रियान्यवन करने से काफी बदलाव आया है। अधिक कृषि योग्य सरकारी भूमि निर्धनों और जरूरतमंद खेतीहरो को आजीविका के लिए वितरित की गई। यह परिकल्पना कृषि विकास को प्रोत्साहन देने और ग्रामीण निर्धनता को समाप्त करने के लिए की गई थी। जिससे यह लाभ हुआ कि बेकार अथवा बंजर पड़ी भूमि भी धरे-धरे कृषि योग्य बनने लगी और आज हालात यह है कि बेकार भूमि दूर दूर तक नजर नहीं आती है। दूसरी बात यह कि फार्मिंग टूल्स विकसित हुए हैं और किसानों तक पहुँचे हैं जिसके कारण पारंपरिक कृषि के बजाए आधुनिक रूप से कृषि होने लगी है। ऐसे में कहा जा सकता है कि किसान की आय निश्चित रूप से बढ़ी है। 
सवाल- क्या आप मानते हैं कि किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य मिल रहा है?
जवाब- मैं तो क्या? इस देश का एक भी किसान यह बात नहीं मान सकता है। मैं पहले एक किसान हूं उसके बाद शिक्षक अथवा राजनीतिज्ञ। किसान की हाड़तोड़ मेहनत देश को तो विकसित कर रही है मगर उसकी फसल का उचित मूल्य उसे नहीं मिल पा रहा है। कभी गन्ना, कभी टमाटर, कभी आलू या फिर कभी प्याज का मूल्य इस देश की राजनीति को प्रभावित करते हुए देखे गए हैं।
सवाल- कृषि ऋण माफी के बारे में क्या कहेंगे, क्या किसान इस माफी से लाभ नहीं उठाता है?
जवाब- मजाक बना रखा है, कर्मपुत्रों को भिखारी बना कर रख दिया है। कृषि ऋण माफ कर देना किसान की समस्या का हल नहीं हो सकता है और यह सरकार के हित में भी नहीं है। कृषि ऋण माफी किसान अथवा उद्योगों के लिए हितकर नहीं हो सकती। सरकार को चाहिए कि वह किसान की फसल का उचित मूल्य दिलाए जाने की व्यवस्था करें ताकि वह बेफिक्र हो राष्ट्र के लिए फसल उगाता रहे और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहे।
सवाल- गन्ना किसान बार-बार आंदोलन करता है, सरकार वादा करती है, मगर चीनी मिल गन्ने का भुगतान करने में देरी करते हैं?
जवाब- बस इतना ही कहूंगा कि किसान और उसकी उपज के लिए कोई ठोस नीति न बन पाने के कारण ऐसा हो रहा है। किसान के सामने समस्या है कि वह अपनी उपज कहाँ लेकर जाए। यदि सरकार कोई ठोस नीति बनाए और कृषि उपज का समय से निर्यात हो सके तो भारतीय किसान लगभग आधी दुनिया के लिए अन्नदाता बन सकता है। मगर ऐसा हो नहीं पा रहा है जिसके कारण हमारी कृषि भूमि और किसान दोनों के लिए ही अच्छी स्थिति नहीं है। 
सवाल- चुनावी वादों को क्या कहेंगे?
जवाब- चुनाव में जो वादे किए जाते हैं, उन्हें पूरा किया जाना चाहिए।


कभी कश्ती कभी मुझको किनारा छोड़ जाता है


सुधीर तन्‍हा


कभी कश्ती कभी मुझको किनारा छोड़ जाता है।
ये दरिया प्यार का प्यासे को प्यासा छोड़ जाता है।।


भूलाना भी जिसे मुमकिन नहीं होता कभी अक्सर।
कई सदियों को पीछे एक लम्हा छोड़ जाता है।।


मैं जब महसूस करता हूँ मेरा ये दर्दे दिल कम है।
वो फिर से राख में कोई शरारा छोड़ जाता है।।


मैं जब भी ज़िंदगी के गहरे दरिया में उतरता हूँ।
भँवर की आँख में कोई इशारा छोड़ जाता है।।


तलब से भी ज़ियादा देना उसकी ऐन फ़ितरत है।
मैं क़तरा माँगता हूँ और वो दरिया छोड़ जाता है।।


वो मेरा हमसफ़र कुछ दूर चलकर साथ में 'तन्हा' ।
मेरी ख़ातिर वही पेचीदा रस्ता छोड़ जाता है।।


सुधीर कुमार ‘तन्हा’ की ग़ज़लों में सामाजिक यथार्थ/मंजु सिंह


सुधीर कुमार 'तन्हा'


उत्तर प्रदेश में जनपद बिजनौर के ग्राम सीकरी बुजुर्ग में जन्मे सुधीर कुमार 'तन्हा' ग़ज़ल कहते हैं और उनकी ग़ज़ल हिंदी-उर्दू के बीच की कड़ी लगती है। न तो ठेठ हिंदी और न ही ठेठ उर्दू। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल में भी यही भाषा दिखाई देती है जो साहित्य के लिए बुरी नहीं बल्कि अच्छी बात है। बिजनौर के ही एक और विद्वान पं. पद्मसिंह शर्मा ने पहले पहल यह प्रयोग किया था। तब उनकी भाषा को कुछ विद्वानों ने उछलती कूदती भाषा कहा था तो कुछ विद्वानों ने उनकी भाषा को साहित्य के लिए बहुत अच्छा माना था। पंडित जी हिंदी से बहुत प्रेम करते थे परंतु वह अन्य किसी भाषा से या उसके शब्दों से द्वेष नहीं रखते थे। यही कारण है कि आज उनकी वही भाषा आम बोलचाल की भाषा बन गई है। कवि सुधीर कुमार 'तन्हा' भी  ईर्ष्‍या अर्थात् हसद को लाइलाज बीमारी मानते हुए इससे बचने की सलाह देते हैं-



हसद बहुत ही बुरा मरज़ है, हसद से 'तन्हा' गुरेज़ करना।
हर एक मरज़ की दवा है लेकिन, हसद की कोई दवा नहीं है।।1
ग़ज़ल ने अनेक प्रतिमान गढ़े हैं। आशिक और माशूक से निकल कर ग़ज़ल ने विषय विस्तार पाया है। आज ग़ज़ल हर विषय पर कही जा रही है। कवि सुधीर कुमार 'तन्हा' ने भी विभिन्न विषयों पर अशआर कहे हैं। उनके शेरों से सामाजिक यथार्थ का बोध होता है। 
आदमी की बदलती फितरत को क्या खूब कहा है-
भाग जाते हैं अलम लेके सिपाही 'तन्हा'।
जंग में जिस घड़ी हो जाता है सरदार का क़त्ल।।2
कवि 'तन्हा' बेग़ैरती को मौत से भी बुरा मानते हैं-
बेग़ैरत का इस दुनिया में जीना क्या और मरना क्या।
मौत उसे आती है जिस की आँख में गै़रत होती है।।3
आदमी के चेहरे पर से नकाब भी उन्होंने खूब उतारी है। क़ातिल भी अपने आपको उपदेशक बना लेता है और बाकी समाज को उपदेश करता है-
एक आदमी का क़ातिल ये कहता फिर रहा था।
औरों के काम आना है काम आदमी का।।4
नफ़रतों से घर बंट जाते हैं इसलिए नफरत को बुरी चीज मानते हुए कवि धार्मिक नफरत से देश के बंट जाने की चिंता व्यक्त करता है-
इतनी नफ़रत पाल के तुमने घर आँगन तो बांट दिये।
अहले वतन को यूँ मत बाँटो मज़हब की दीवारों से।।5
और कहता है-
सारे बंधन सारे रिश्ते सारे तआल्लुक़ टूट गये।
आँगन में जिस दिन से, छाँव आई एक दीवार की।।6
कवि की चिंता निर्मूल नहीं है। धार्मिक नफरत बच्चों की मासूमियत को प्रभावित करती है। जो अभी ठीक से धर्म के बारे में नहीं जानता, वह भी धर्म के ठेकेदारों से पूछता है-
नन्हा बच्चा पूछ रहा है धर्म के ठेकेदारों से।
आज कबूतर क्यों ग़ायब हैं गुम्बद से मीनारों से।।7
दूसरों को बेघर करने वालों को कवि श्राप देता हुआ प्रतीत होता है-
दूसरों के निशाँ मिटाता है।
तू भी एक रोज़ बे निशाँ होगा।।8
जबकि कवि प्रेम को शक्ति मानते हुए लिखता है-
हम हैं तुम्हारे तुम हो हमारे, प्यार हमारी ताक़त है।
इस नुकते को ग़ौर से सोचो राम से रावण हारा क्यूँ।।9
माँ-बाप, भाई, मित्र और प्रेयसी से संबंधों को उन्होंने बड़ी ही खूबसूरती से पिरोया है।
माँ-बाप- कवि ने भगवान से भी अधिक महत्ता माँ-बाप को दी है। तभी तो कहा है-
उसका जलवा देखने वाले कहाँ भटकता फिरता है।
अपने माँ और बाप की ख़िदमत ऐन इबादत होती है।।10
कोई भी व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए परंतु माँ के लिए वह सदैव बच्चा ही रहता है। कवि ने इसी बात को बहुत ही सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया है-
वो मुझे दिन ढले बाहर नहीं जाने देती।
माँ की नज़़रों में हँू 'तन्हा' अभी बच्चा मैं भी।।11
और यदि किसी माँ का जवान बेटा गुस्से में घर से निकल जाए तो माँ की बेचैनी पहाड़ जैसी हो जाती है। जो भी उसे मिलता है वह उसी से पूछती है। पता नहीं क्या होगा? जवान बालक है-
जवान बेटा है ग़ुस्से में घर से निकला है।
हर एक शख़्स से माँ की नज़र सवाली है।।12
कवि ने उस बात को भी बड़ी ही सादगी और सुंदरता के साथ बयान कर दिया है जिसके लिए बड़े-बड़े समाजशास्त्री सर्वेक्षण करते रह गए। जहां से परिवार बिखरने की पहल हो ही जाती है। हर माँ अपने बेटे का विवाह बड़ी ही धूमधाम से करती है मगर जब सारा परिवार नवागत दुल्हन की ओर आकर्षित हो जाता है, यहाँ तक कि बूढ़ी माँ की सुध लेने वाला भी कोई नहीं होता तब कवि कहता है-
बूढ़ी माँ के कमरे में अब कोई नहीं आता।
घर का घर सिमट आया एक नई हथेली में।।13
दादा- सभी बच्चे दादा को बहुत प्यार करते हैं और दादा भी तो बच्चों को मूल से अधिक ब्याज की तरह प्यारे होते हैं। कवि ने बच्चों के इसी प्यार को उकेरा है-
तस्वीरों का ये अलबम है जान से भी प्यारा।
इस में मेरे दादा की तस्वीर पुरानी है।।14
भाई- भाई जैसा यदि दोस्त कोई नहीं होता तो भाई जैसा शत्रु भी कोई नहीं होता। एकाकी होते जा रहे परिवारों की वजह भाईयों में स्नेह की कमी होती है। कवि इस रिश्ते को बड़ी ही बेबाकी से अभिव्यक्त करता है-
अब भाई जुदा मुझसे होता है तो होने दो।
बँटवारा विरासत का घर-घर की कहानी है।15
किंतु कवि भाई से बिछड़ने की पीड़ा को भी जानता है। भाई के रिश्ते की पवित्रता और अटूटता को भी सुंदर शब्दों में व्यक्त करता है-
ख़ून के ये रिश्ते भी किस क़दर मुक़द्दस हैं।
हैं मेरी लकीरें भी भाई की हथेली में।।16
और फिर कवि की पहुंच भी निराली है। राम-लक्ष्मण जैसा प्यार अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता। वनवास तो राम को हुआ था पर कवि ने लक्ष्मण की पीड़ा को भी खूब समझा है-
दुःख तो ये है राम की ख़ातिर।
लक्ष्मण को बनवास मिला है।।17
बेटी-बेटा- समाज में दहेजप्रथा इतनी बढ़ गई है कि यह विशेष रूप से उस बाप के लिए अभिाशाप है जिसके पास पैसा नहीं है और बेटी जवान हो गई है। बाप को उसके विवाह की चिंता किसी भयानक दुख से कम नहीं होती-
दुःख भी हैं समुंदर से उस आदमी के जिसके।
पल्ले में नहीं कुछ भी बेटी भी सियानी है।।18
और ऐसे में यदि बेटा घर से चला जाए, तो दुख कितना बढ जाता है इसको एक बाप ही अच्छी तरह समझ सकता है-
आँखों में सजाया था जो सपना चला गया।
बेटी हुई जवान तो बेटा चला गया।।19
दुश्मन-दोस्त- दोस्त कब दुश्मन बन जाए कहा नहीं जा सकता न ही इसका कोई पैरामीटर ही है। इसलिए कहा जाता है कि एक अच्छा दोस्त जब दुश्मन बनता है तो यह दुश्मनी बड़ी ही खतरनाक होती है। कवि ने दुश्मन और दोस्तों पर भी कलम चलाई है। दोस्तों पर भरोसा किया और दुश्मनी पाल ली-
जिन दोस्तों पे मुझको भरोसा था आज तक।
हाथों में लिये बैठे हैं तलवार देख ले।।20
किंतु कवि यह भी मानता है कि सच्चा दोस्त कभी झूठी तसल्ली नहीं देता। वह तो स्पष्ट वक्ता होता है, बिना किसी लोभ-लालच के यथार्थ का ज्ञान कराता है परंतु जब दोस्त झूठी तसल्ली देने लगे तो कवि कहता है-
झूठी थीं दोस्त तूने जो दी थीं तसल्लियाँ।
कैसे गिरी है रेत की दीवार देख ले।।21
कई बार देखा जाता है कि आप किसी मित्र के लिए कितना भी त्याग करो मगर एक समय आता है जब वह आपका नाम लेना तो दूर की बात सुनना भी पसंद नहीं करता है-
जिसकी ख़ातिर मैंने अपना ख़ून दिया।
उसको मेरा नाम भी नश्तर लगता है।।22
और जब दोस्ती की आड़ में कोई दुश्मन वर करता है तब दृष्य कितना भयावह हो सकता है-
जंग यूँ भी हुई, गर्दन मेरी तलवार मेरी।
मेरे क़ातिल ने पहन रक्खी थी दस्तार मेरी।।23
कवि दोस्ती-दुश्मनी के सिद्धांतों को समझता है और किसी अनुचित माध्यम को अपनाने के बजाए हार जाना उचित समझता है-
मैंने भागे हुऐ दुश्मन पे नहीं वार किया।
दोस्तो इसलिए हर बार हुई हार मेरी।।24
कवि उन दोस्तों की शिकायत नहीं करता जिन्होंने उसे बहुत सताया है-
मुझे दोस्तों से शिकायत नहीं है।
मगर दोस्तों ने सताया बहुत है।।25
क्योंकि ऐसे दोस्तों की कुछ मजबूरी भी रही होगी-
शायद कुछ मजबूरी होगी यार की।
तोड़ चुकी दम हसरत भी दीदार की।।26
कवि उन लोगों के प्रति भी दोस्त को धैर्य बंधाता है जिनसे वह धोखा खा चुका होता है-
मेरे दोस्त मेरी तरह सब्र कर ले।
फ़रेब उससे मैंने भी खाया बहुत है।।27
कवि की परिकल्पना की यह पराकाष्ठा ही है कि वह दुश्मनों से भी मुस्कराकर मिलने की बात करता है-
अब तो दुश्मनों से भी मुस्कुरा के मिलते हैं।
दोस्ती गुलाबों की हो गई बबूलों से।।28
आशिक और माशूक- शायरी के इस पक्ष को भी कवि ने छोड़ा नहीं है, छोड़ता भी कैसे कविता की प्रेरणा का मुख्य तत्व प्रेम जो है। एक ख़त भर से कोई प्रेमी किस तरह खुश हो जाता है-
मुद्दतों बाद मेरे नाम तेरा ख़त आया।
एक दिया घोर अंधेरे में जला हो जैसे।।29
और जब कोई प्रेमी परदेस जाने लगे तो विरह की ज्वाला उसे जला ही डालती है। ऐसे में हर चीज़ जलती हुई प्रतीत होती है-
वो गया परदेस तो सारे वचन जलने लगे।
नर्म पलकों पर गुलाबों के सुमन जलने लगे।।30
जाना प्रेमी की मजबूरी है वह प्रेयसी को न घबराने और जल्दी आने का वादा करता है-
दूर सफ़र पर जाते हैं हम जाना भी मजबूरी है।
लौटके हम आयेंगे एक दिन देखो तुम घबराना मत।।31
विरह में प्रेमी को भी उन दिनों की याद सताने लगती हैं जब वह एक दूसरे से चोरी-चोरी मिलते थे-
क्या दिन थे जब इन साँसों में ख़ुशबुएँ सी बहती थीं।
उनकी काली आँखें मेरा रस्ता देखती रहती थीं।।32
उसके स्मृतिपटल पर तब की याद भी आने लगती है जब वह अपनी प्रेयसी की मिट्टी से तस्वीर बनाता था और पागल कहा जाता था-
मिट्टी से मैं रोज़ किसी की एक तस्वीर बनाता था।
गाँव की सारी गौरी मुझको पागल लड़का कहती थीं।।33
प्रेयसी भी ग़मों से घिरी है और वह अपने प्रेमी से शिकायत करती है-
एक तू ही था जो मेरे ग़मों में शरीक था।
कोई नहीं है अब मेरा ग़म-ख़्वार देख ले।।34
तब प्रेमी भी शिकायत करता है और कहता है-
साथ तुम भी तो दो प्यार की राह में।
बोझ 'तन्हा' ये कब तक उठाऊँगा मैं।।35
कवि ने उन प्रेमियों के बारे में कहा है जिनमें प्रेयसी का विवाह किसी अन्य के साथ हो जाता है और प्रेमी उसकी शहनाई बजते हुए देखकर अपने प्यार की हार स्वीकार कर लेता है-
दूर कहीं पर डोली उठी शहनाई बजी।
हार गये हम जीती बाज़ी प्यार की।।36
तवायफ- तवायफ भी इसी समाज का एक पक्ष है। भले ही यह समाज का काला पक्ष हो मगर उसकी बेबसी को कोई नहीं देखता है। तवायफ की मजबूरी को भी सुधीर तन्हा खूब जानते हैं-
किसी हालात की मारी तवायफ़ की कहानी है।
ये रंगीं रात और ये पायलों की आँख के आँसू।।37
सामाजिक पक्ष किसी भी कवि की कविता में अनायास ही चला आता है। इसका सबसे बड़ा कारण कवि का सामाजिक प्राणी होना है। कवि सुधीर कुमार 'तन्हा' का सामाजिक पक्ष प्रबल है और उनकी रचनाओं से सामाजिक तानेबाने का ज्ञान हो जाता है। उनकी रचनाएं यथार्थ का बोध कराती हैं।
संदर्भ
1. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 34
2. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 23
3. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 15
4. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 20
5. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 78
6. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 81
7. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 78
8. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 94
9. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 92
10. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 15
11. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 44
12. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 66
13. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 76
14. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 28
15. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 28
16. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 76
17. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 134
18. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 28
19. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 62
20. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 82
21. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 82
22. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 80
23. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 121
24. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 121
25. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 72
26. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 141
27. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 72
28. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 63
29. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 22
30. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 24
31. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 47
32. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 45
33. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 45
34. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 82
35. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 107
36. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 141
37. सुधीर कुमार 'तन्हा', सर्द मौसम की रात, परिलेख प्रकाशन नजीबाबाद, पृ. 42


मीडिया समग्र मंथन की घोषणा


प्रणाम सर


डॉ. बेगराज


 जब हम पढ़ते थे, गुरुजन को कहते थे प्रणाम सर!
 सोचते थे, कैसा लगेगा, जब हमें होगी प्रणाम सर!
 बन गए अध्यापक, और शुरु हो गई प्रणाम सर!
 जब घर से निकलते, रास्ते से शुरु हो जाती प्रणाम सर!
 कोई हंसकर कहता, तो कोई रोकर कहता प्रणाम सर!
 कोई-कोई तो लठ सा मार देता, कहकर प्रणाम सर!
 फिर भी हमें अच्छा लगता, सुनकर प्रणाम सर!
 जब हम जा रहे हों, अपने किन्हीं रिश्तेदारों के साथ,
 तब कोई आकर हमसे कहता प्रणाम सर!
 हम कनखियों से रिश्तेदार को देखते, और कहते,
 देखा, कितनी इज्जत है हमारी, सब करते हमें प्रणाम सर!
 शुरु-शुरु में अच्छा लगता, सुनकर प्रणाम सर!
 अब हम पर बंदिशे लगाने लगा, ये प्रणाम सर!
 मन कर रहा हो हमारा गोल-गप्पे खाने का,
 मन मसोस कर रह जाना पड़ता, सुनकर प्रणाम सर!
 हम गए हों किसी शादी या बर्थ-डे पार्टी में,
 हाथ में हो हमारे खाली खाने की प्लेट,
 खाने से पहले, सुनने को मिलता प्रणाम सर!
 हम गए हों किसी रेस्टोरेंट में,
 संवैधानिक या असंवैधानिक दोस्तों के साथ,
 वहाँ भी आकर कोई कह जाता, प्रणाम सर!
 दोस्तों से फटकार लगती, और सुनने को मिलता,
 यहा भी पीछा नहीं छोड़ रहा है, ये प्रणाम सर!
 हमें कुछ बंधनों में बांधता है, प्रणाम सर!
 हमें सामाजिक भी बनाता है, प्रणाम सर!
 फिर भी सुनकर अच्छा लगता है, प्रणाम सर!
 प्रणाम सर!  प्रणाम सर!  प्रणाम सर!


हौंसला अपना भी अक्सर आज़माना चाहिए


डॉ. एस. के. जौहर



हौंसला अपना भी अक्सर आज़माना चाहिए।
आंख में आंसू भी हों तो मुस्कुराना चाहिए।।


अब नहीं होती हिफ़ाज़त ग़म की इस दिल से मेरे।
अब कहाँ जाकर तेरे ग़म को छुपाना चाहिए।।


शाख पर कांटों में खिलते फूल से ये सीख लो।
वक्त कितना ही कठिन हो मुस्कुराना चाहिए।।


चांद सूरज की तरह ख़ुद को समझते हो तो फिर।
भूले भटकों को भी तो रस्ता दिखाना चाहिए।।


दूसरों के नाम करके अपनी सब खुशियां कभी।
दूसरों के दुख में भी तो काम आना चाहिए।।


दूरियां पैदा न कर दें ये ज़िदें 'जौहर' कभी।
वो नहीं आये इधर तो हमकों जाना चाहिए।।


पं. पद्मसिंह शर्मा और ‘भारतोदय’


अमन कुमार 'त्यागी'




 

पं. पद्मसिंह शर्मा का जन्म सन् 1873 ई. दिन रविवार फाल्गुन सुदी 12 संवत् 1933 वि. को चांदपुर स्याऊ रेलवे स्टेशन से चार कोस उत्तर की ओर नायक नंगला नामक एक छोटे से गाँव में हुआ था। इनके पिता श्री उमराव सिंह गाँव के मुखिया, प्रतिष्ठित, परोपकारी एवं प्रभावशाली व्यक्ति थे। इनके एक छोटे भाई थे जिनका नाम था श्री रिसाल सिंह। वे 1931 ई. से पूर्व ही दिवंगत हो गए थे। पं. पद्मसिंह शर्मा की तीन संतान थीं। इनमें सबसे बड़ी पुत्री थी आनंदी देवी, उनसे छोटे पुत्र का नाम श्री काशीनाथ था तथा सबसे छोटे पुत्र रामनाथ शर्मा थे। पं. पद्मसिंह शर्मा के पिता आर्य समाजी विचारधारा के थे। स्वामी दयानंद सरस्वती की प्रति उनकी अत्यंत श्रद्धा थी। इसी कारण उनकी रुचि विशेष रूप से संस्कृत की ओर हुई। उन्हीं की कृपा से इन्होंने अनेक स्थानों पर रहकर स्वतंत्र रूप से संस्कृत का अध्ययन किया। जब ये 10-11 वर्ष के थे तो इन्होंने अपने पिताश्री से ही अक्षराभ्यास किया। फिर मकान पर कई पंडित अध्यापकों से संस्कृत में सारस्वत, कौमुदी, और रघुवंश आदि का अध्ययन किया तथा एक मौलवी साहब से उर्दू व फारसी की भी शिक्षा ली। सन् 1894 ई. में कुछ दिन स्वर्गीय भीमसेन शर्मा इटावा निवासी की प्रयागस्थिति पाठशला में अष्टाध्यायी पढ़ी। उसके बाद काशी जाकर अध्ययन किया। पुनः मुरादाबाद, लाहौर, जालंधर, ताजपुर (बिजनौर) आदि स्थानों पर भी अध्ययन किया। अध्ययन समाप्ति के पश्चात् सन् 1904 ई. में गुरुकुल काँगड़ी में कुछ दिन अध्यापन कार्य किया। उन दिनों वहाँ पं. भीमसेन और आचार्य पं. गंगादत्त भी थे। उसी समय महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) ने पं. रुद्रदत्त जी के संपादकत्व में हरिद्वार से सत्यवादी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। उस समय पं. पद्मसिंह शर्मा भी उनके संपादकीय विभाग में थे। इनका संपादन एवं लेखन का प्रारंभ यहीं से हुआ। इसके बाद तो शर्मा जी का जीवन लेखन, संपादन एवं अध्यापन आदि में ही व्यतीत हुआ। प्रारंभ में 'सत्यवादी' में ही कई लेख लिखे। इसके बाद सन् 1908 के प्रारंभ में जब आचार्य गंगादत्त गुरुकुल काँगड़ी छोड़कर ऋषिकेश में रह रहे थे तो शर्मा जी 'परापेकारी' (मासिक) पत्रिका के 'संपादक' होकर अजमेर वैदिक यंत्रालय में गए। वहाँ पर इन्होंने 'परोपकारी' के साथ ही कुछ दिन तक 'अनाथ रक्षणम्' का भी संपादन किया। सन् 1909 ई. में इनका आगमन ज्वालापुर महाविद्यालय में हुआ। यहाँ इन्होंने 'भारतोदय' (महाविद्यालय का मुखपत्र, मासिक) का सम्पादन एवं साथ ही अध्ययन कार्य भी किया। सन् 1911 ई. में इन्होंने महाविद्यालय की प्रबंध समिति के मंत्री पद पर भी कार्य किया। इस प्रकार महाविद्यालय की अविरल सेवा करते रहे। इनके संपादकत्व में 'भारतोदय' पत्रिका ने खूब ख्याति प्राप्त की। सन् 1927 में इनके पिता जी का देहांत हो गया। इस कारण इन्हें महाविद्यालय छोड़ घर आना पड़ा।

महाविद्यालय छोड़ने के बाद श्रीयुत् शिवप्रसाद गुप्त के अनुरोध पर ये ज्ञान मंडल में गए।सन् 1920 को मुरादाबाद में संयुक्त प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति बने। इसी वर्ष इनकी माता जी का देहान्त हो गया था। सन् 1922 ई. में इन्हें 'बिहारी सतसई' पर मंगलाप्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन् 1928 में इन्होंने अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का मुजफ्फरपुर (बिहार) में सभापतित्व किया। इसी वर्ष इन्होंने गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय में हिंदी प्रोफेसर पद पर भी कार्य किया।

सन् 1911 ई. में 'पद्मपराग' और 'प्रबंध मंजरी' का प्रकाशन हुआ। एक बार ये संग्रहणी रोग से ग्रस्त हो गए तो इन्हें हरदुआगंज लाया गया, साथ में इनके पुत्र काशीनाथ शर्मा भी थे। जब वहाँ पर चिकित्सा से कोई लाभ न हुआ तो इन्हें मुरादाबाद लाया गया। वहाँ डा.ॅ गंगोली पीयूषपाणी की चिकित्सा करायी गई। किंतु ऐसी अवस्था में भी अविरत रूप से इन्होंने साहित्यिक सेवा की। उस समय भी ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जिसमें ये दस-पंद्रह चिट्ठियाँ अपने मित्रों को न लिखते हों (उस समय सेवा के लिए कवि 'शंकर' (पं. नाथूराम शर्मा के पुत्र) इनके पास थे) और इनके पास भी बड़े-बड़े साहित्यकारों की चिट्ठियां रोज आती थीं। उनका उत्तर ये अपनी भाषा में ही दिलवाते थे। डेढ़ मास तक इनकी चिकित्सा चलती रही। कोई लाभ न होने पर इन्होंने महाविद्यालय ज्वालापुर में आने की इच्छा प्रकट की ओर कहा-'चलो महाविद्यालय चलो; मरना तो है ही, उसी पुण्य भूमि में प्राण त्यागूँगा, गंगा की गोद में।' अतः स्पष्ट है महाविद्यालय के प्रति उनमें आत्मीयता एवं श्रद्धा का भाव था। उन्हें महाविद्यालय लाया गया; साथ में पं. भीमसेन शर्मा भी थे। उस समय महाविद्यालय में श्री विश्वनाथ मुख्याधिष्ठाता थे। यहाँ आने पर पं. हरिशंकर शर्मा वैद्यराज की पहली पुड़िया से ही इन्हें बहुत लाभ हुआ और ये बीस-बाईस दिन में ही पूर्ण स्वस्थ हो गए।

पं. पद्मसिंह शर्मा को पाँच बातें बहुत पसंद थी- 1. स्वाध्याय,  2. नवीन लेखकों को प्रोत्साहन,  3. साहित्यिकों से मिलना-जुलना,  4. अतिथि सत्कार,  5. मित्रमंडली के साथ यात्रा। वे साहित्यिक यात्रा बहुत करते थे। अपनी मृत्यु से पूर्व भी उनका विचार श्रावण में ब्रज की यात्रा करने का था। उनका कहना था-'भाई अब की बार श्रावण में ब्रज की यात्रा करनी चाहिए। आगरे के मिश्र भी साथ हों, कलकत्ते से बनारसीदास जी तथा श्रीराम जी को भी बुलाया जाए। किंतु इस साहित्यिक यात्रा से पूर्व ही वे जीवन की अंतिम यात्रा पर निकल पड़े।

कविजी (पं. नाथूराम शर्मा) के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे। कवि जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'अनुराग रत्न' लिखी और उसका समर्पण काव्य कानन केसरी पं. पद्मसिंह को ही किया जबकि एक सज्जन उन्हें इसके लिए पाँच हजार रुपए देने को तैयार थे। उन सज्जन के कहने पर उनका कहना था कि-मैं अपना प्रचुर परिश्रम एक कलाविद को ही अर्पण करूँगा और मेरी राय में पं. पद्मसिंह शर्मा इसके लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

हिंदी जगत में 'भारतोदय'

'भारतोदय' का प्रारंभ सन् 1909 ई. (ज्येष्ठ शुक्ल सं. 1966) में हुआ था। इसके संपादक, पद्मसिंह शर्मा और सहायक संपादक पं. नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ थे। इसे पं. शंकरदत्त शर्मा ने अपने प्रेस 'धर्मदिवाकर प्रेस' मुरादाबाद में छापा और पं. भीमसेन शर्मा ने गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर से प्रकाशित किया। इसका वार्षिक मूल्य डेढ़ रुपए तथा विद्यार्थियों के लिए एक रुपया था। यह गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर का 'मासिक पत्र' घोषित किया गया।

पत्रिका के आवरण पर सबसे ऊपर सूचना दी गई थी कि ''अगली संख्या में कविवर 'शंकर' की मज़ेदार कविता 'अंधेर खाता' छपेगी'' तत्पश्चात एक आकर्षक बार्डर और फिर ।।ओ3म।। के बाद आकर्षक साज-सज्जा के साथ लिखा गया था 'भारतोदय'। पत्रिका के शीर्षक के नीचे ध्येय स्पष्ट किया गया था-

''निशम्यतां लेखललाम संचय, प्रकाशने येन कृतोऽतिनिश्चयः।

गृहीतसद्धर्मविशेषसंशय, श्वकास्तिसोयंभुवि 'भारतोदयः''।।

'भारतोदय' के नियम इस प्रकार बनाए गए -

1. यह पत्र प्रतिमास गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर से प्रकाशित होता है।

2. उसका वार्षिक मूल्य सर्वसाधारण से डेढ़ रुपए लिया जाएगा। विद्यार्थियोें को एक रुपया में और महाविद्यालय के सभासदों को मुफ्त, पुस्तकालयों और असमर्थ विद्यारसिकों को डाकव्यय लेकर।

3. पत्र का मुख्य उद्देश्य महाविद्यालय ज्वालापुर को लोकप्रिय बनाना तथा तत्संबंधी समाचारों का प्रकाशित करना होगा।  इसमें धार्मिक, सामाजिक और शिक्षा संबंधी तथा लोकोपयोगी लेख रहा करेंगे, हिंदी साहित्य का सुधार भी इसका लक्ष्य होगा। किसी मत, जाति या व्यक्ति पर कोई असभ्य, अरुंतुद या कलहात्मक लेख इसमें प्रकाशित न होंगे।

4. बाहर से आये लेखों में काट छांट और न्यूनाधिक करने का पूरा अधिकार संपादक को रहेगा।

5. समालोचना की पुस्तकें, बदले के पत्र, लेख, संपादक के नाम आने चाहिएँ। और पत्र न पहुंचने की सूचनाएं, ग्राहक होने की दरख्वास्तें, मूल्य आदि, प्रकाशक अथवा प्रबंधकर्ता 'भारतोदय' के नाम।

6. पत्र में किसी प्रकार के असभ्य और धोखा देनेवाले विज्ञापन नहीं छपेंगे न तकसीम होंगे, ऐसे महाशयों को यह बात ध्यान में रखकर प्रार्थना करनी चाहिए। सब प्रकार का पत्रव्यवहार महाविद्यालय ज्वालापुर जिला सहारनपुर, इस पते पर होना चाहिए।

'भारतोदय' के प्रथम अंक के पृष्ठ संख्या 33 पर ''भारतोदय की उदयकथा'' शीर्षक से भी जानकारी दी गई है-

महाविद्यालय के संबंध में एक पत्र की आवश्यकता का अनुभव करके कमेटी के एक विशेष अधिवेशन में निश्चित हुआ कि विद्यालय की ओर से एक मासिक पत्र निकाला जाय जिसका मुख्य उद्देश्य विद्यालय को लोकप्रिय बनाना और तत्संबंधी समाचारों को सर्वसाधारण तक पहुँचाकर हितसाधन की चेष्टा तथा तद्र्थ सहाय्य प्राप्ति का उद्योग हो। इसके अतिरिक्त मतसंबंधी वितंडावादों से बचकर धार्मिक, सामाजिक और शिक्षा विषय पर भी उस में लिखा जाया करे, हिंदी साहित्य की पूर्ति और सुधार भी उस का प्रधान लक्ष्य हो। इत्यादि प्रयोजनों को सामने रखकर 'भारतोदय' का उदय हुआ है। जैसा कि पत्रों में सूचना दी गई थी, 1 म (प्रतिपदा), वैशाख से पत्र निकालने का विचार था, परंतु कई अनिवार्य विघ्नों से पत्र प्रतिज्ञात समय पर न निकल सका। जिसकारण अनेक भारतोदयाभिलाषी, सज्जनों ने बड़े उत्कंठा और उत्साह भरे शब्दों में पत्र प्रकाशन के लिए अनुरोध किया और इच्छा प्रकट की जिससे प्रकाशकों का उत्साह द्विगुणित हो गया। पत्र को रोचक और उपयुक्त बनाने का यथाशक्ति प्रयत्न किया जाएगा। प्रसिद्ध विद्वान और कवियों के लेख इसमें रहा करेंगे। बहुत से विद्वानों ने अपनी लेखमालिका द्वारा पत्र को अलंकृत करने का प्रण कर लिया है, जिनमें से दो चार के नाम प्रकाशित किये जाते हैं। यथा-श्रीयुत रावबहादुर मास्टर आत्मारामजी। श्रीमान् कविवर पण्डित नाथूराम शंकर शर्मा। श्रीयुक्त प्रोफेसर पूर्ण सिंहजी इंपीरियल फारेस्ट केमिस्ट। श्री बा.गंगा प्रसाद जी बी.ए., श्री बा. आशाराम जी बी.ए., श्री पं. रामनारायण मिश्र बी.ए., श्री पं. रामचन्द्र शर्मा इंजीनियर, वैद्यराज श्रीकल्याण सिंह जी, श्रीस्वामी मंगलदेव जी संन्यासी, इत्यादि।

पत्र का मूल्य बहुत ही कम। नाममात्र डेढ़ रुपए रखा गया है, इस पर विद्यार्थियों को एक में ही दिया जायगा, और विद्यालय कमेटी के मेम्बर मुफ्त पावेंगे। ऐसी दशा में 'भारतोदयाभिलाषी' महाशयों का कर्तव्य है कि वे स्वयं इसके ग्राहक बनें और दूसरों को बनावें, जिन सज्जनों के यहाँ अतिथि के रूप में ''भारतोदय'' पहुँचे, आशा है कि वे अपनी आतिथेयता का परिचय देंगे और इसे विमुख और निराश न लौटाएंगे क्योंकि:-

''अतिथिर्यस्य भग्नाशो, गृहात्प्रतिनिवर्तते।

स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा, पुण्यमादाय गच्छति।।''

भारतोदय का विषयवार अनुक्रम इस प्रकार था-


1. वेदमन्त्रार्थप्रकाश.........कृवेदतीर्थ                                    1



2. भारतोदय (कविता)......श्री पं. नाथूराम शंकर शर्मा              4



3. सुखवाद.........श्री मास्टर गंगाप्रसाद बी.ए.                         9



4. महिलामंडल.........एक ब्राह्मण                                         14



5. भ्रातृभाव......सहायक संपादक                                         18



6. प्रकृतिस्तवः (संस्कृत कविता) ...... श्री पं. भीमसेन शर्मा       21



7. मेसमेरिज़्म और संध्या...... रा.ब.मा. आतमाराम जी            22



8. महाविद्यालय समारंभ.........                                             25



9. म.वि. समाचार, लोकवृत्त इत्यादि............                          34


लोकवृत्त के अंतर्गत जो समाचार प्रथम अंक में प्रकाशित किएगए थे, उनमें- 'देशभक्त.. श्री अरविंद घोष, कवि अध्यापक और बैरिस्टर (प्रो. इक़बाल संबंधी), अमीर की उदारता (अमीर काबुल के प्राणहरण की साज़िश संबंधी समाचार), फ़ारस और टर्की (दोनों राज्यों में खूनखराबी के बाद शांति संबंधी समाचार), जल प्रलय (दक्षिण में 7-8 मई को 48 घंटे के अंदर 23 इंच पानी की बरसात से आई जलप्रलय संबंधी समाचार हैदराबाद से प्राप्त हुआ था), सिंहल द्वीप (सिलोन) में विश्वविद्यालय स्थापना का समाचार आदि समाचारों के अतिरिक्त अनेक समाचार भी प्रकाशित किए जाते थे।

-ता. 11 मई की अमृत बाज़ार पत्रिका में किसी मुम्बई के व्यापारी महोदय के टाइम्स आफ इंडिया में लिखे हुए लेख का सारांश छपा है। उससे ज्ञात होता है कि अहर्निश स्वदेशी माल की ओर व्यापारियों का ध्यान आकर्षित हो रहा है। यह ज्ञात हुआ है कि पूर्व वर्ष की अपेक्षा मुम्बई में डेढ़ लक्ष कपास के गट्ठे अधिक आए। जापान ने 290000 गट्ठे मँगाए। इससे बढ़कर स्वदेशी की कृतकार्यता का क्या प्रमाण होगा कि 12 वर्ष पूर्व स्वदेशी माल पर टैक्स द्वारा ग्यारह लाख प्राप्त हुए थे। आज उसी पर सरकारी आय 33 लक्ष हो गई है।

- अमेरिका में बिनौलों से घी बनाने के पचासों कारखाने हैं। अब समाचार पत्रों में चर्चा है कि बम्बई में भी ऐसा कारखाना खुलने वाला है। (आशा है दुग्धद्रोही ला. देवीदास जी आर्य यह सुनकर बहुत खुश होंगे)। भारतवर्ष का करोड़ों मन घी परदेश चला जाता है। अब वह दिन आने वाला है जब बिनौलों का घी मिलेगा, अमेरिका वालों की खूब बनेगी। स्वदेशी के प्रेमी उद्योग करें कि भारत का घी भारत ही में रहे। परमात्मा इस नवीन घृत से बचावे।।

- पाश्चात्य विद्वानों के बुद्धिवैशद्य को देखकर आह्लाद हुए बिना नहीं रहता, पेरिस में प्रसिद्ध अनुभवी ज्योतिशास्त्र विशारदों की एक सभा होने वाली है जिसमें आकाश के प्रत्येक भाग का चित्र खींचा जावेगा। आकाश के 22054 विभाग किए गए हैं। प्रत्येक भाग का पृथक् पृथक् चित्र रहेगा, तारे, उनकी गति व उनका स्थिति स्थान आदि का भी अद्भुत दृश्य रहेगा। ग्रीनिच की वेधशाला की ओर से इसी विषय पर दो अद्भुत ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं जिनमें 19000 तारों का सचित्र वर्णन है। इस विषय में अन्वेषण करने के लिए अन्य वेधशालाएं भी यत्न कर रही हैं।

- एक ज्योतिर्विद् का कथन है कि ये इतने असंख्य तारागण क्यों बनाए गए। हमारे प्रकाश के लिए तो इन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जितना चंद्रमा है उससे वह कुछ और बड़ा हो तो रात्रि का काम और भी अच्छा चल सकता है। हमको वृथा संदेह में डालने के लिए कहें, तो ईश्वर का इस में क्या प्रयोजन है। इससे विदिता होता है कि तारे भी सूर्यवत् स्वतंत्र प्रकाश के गोलक हैं। और न जाने क्या क्या है।

- मिलौनी नामक विद्वान् का कथन है कि चंद्रमा की किरणों में भी उष्णता का कुछ अंश होता है। वेनिस, ल्फोरेन्स व पदना के वनस्पतिगृह में कई विद्वान ने इस विषय में बहुत कुछ अनुभव करके देखा है (कहीं यह विद्वान शकुंतला के दुष्यंत तो नहीं! उन्होंने भी चंद्रमा से अग्नि झड़ते देखी थी)

- रंगून के समाचार से विदित होता है दो जर्मन विद्वान पथिक मेकांग नदी के स्रोत की खोज लगाने के लिए जा रहे थे, मार्ग में किसी दुष्ट ने उनको मार दिया। वस्तुतः पाश्चात्य विद्वान ''नाह्मस्मीति साहसम्'' इस तत्व पर चलने वाले हैं। इसीलिए प्रत्येक कार्य में ऋद्धि व सिद्धि इनके सन्मुख हाथ जोड़े खड़ी रहती हैं। इन दो महानुभावों का नाम ब्रनहेबर व हरस्क्मिट्ज है। ''लिखे जब तक जिए सफरनामे, चल दिए हाथ में कलम थामे।''

- मिस्टर एफ़. ड्यूक चीफ सेक्रेटरी बंगाल गवर्मेन्ट ने एक प्रसिद्ध पत्रक निकाला है जिसमें पुलिस को दंगे फिसाद के मौके पर बंदूकें कैसी दाग़नी चाहिए और फिसादी लोगों पर रोब डालने के लिये क्या करना चाहिए इसका वर्णन किया है। अब तक सिर्फ डराने के लिए खाली बंदूकें छोड़ी जाती थीं अब सचमुच भरी हुई छोड़ी जावेंगे।

- लोकमान्य श्रीयुत तिलक भगवद्गीता पर कुछ लिख रहे हैं। गीता के भाग्य खुले। देखें यह महापुरुष गीता पर क्या लिखते हैं। आपके दो सुप्रसिद्ध ग्रंथ ''द आर्कटिकहोम इन द वेदाज़''(1903), 'ओरिअन'(1893) देखने योग्य हैं-अगाध पांडित्य का प्रमाण हैं। आपका गीता भाष्य भी उज्ज्वल गुणों से उज्ज्वल होगा।

- बड़ोदा राज्य में प्राथमिक शिक्षा बिना शुल्कादि लिए ही दी जाती है। भारतवर्ष में यह एक ही स्टेट है जहाँ यह प्रबंध हुआ है। इस विषय में सरकार सोचते ही सोचते रह गई। आज तक कुछ न कर सकी बड़ौदा महाराज ने इस प्रथा का प्रारंभ ही कर डाला।

आर्य 'सामाजिक समाचार' भी अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित किए गए-

- गुरुकुल महाविद्यालय के उत्सव से लौटते हुए पं. गणपति शर्मा जी ने दो व्याख्यान सहारनपुर में अत्यंत प्रभावशाली दिए। फिर वहाँ से दिल्ली पहुँचे, और वहाँ एक सप्ताह व्याख्यानों की धूम मचा दी, दिल्ली वासियों पर उनका बहुत प्रभाव पड़ा।

- अप्रैल में गुरुकुल गुुजरांवाला का वार्षिकोत्सव बड़ी रौनक से हुआ। धर्मचर्चा में भिन्न भिन्न मतवादी सम्मिलित हुए थे, अच्छा आनंद रहा, म.वि. से श्री पं. नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ भी पधारे थे। गुरुकुल गुजरांवाला में इस समय 57 ब्रह्मचारी प्रविष्ट हैं। 3200 के करीब धन एकत्र हुआ। श्रीमान ला. रलारामजी का पुरुषार्थ प्रशंसनीय है।

- उसके पीछे आर्य समाज गुजरात (पंजाब) का उत्सव भी सानंद समाप्त हुआ। हमारे मुख्याधिष्ठाता श्री पं. नरदेव जी वहाँ भी पधारे थे।

- 28.05.09 से 1-6 तक दिल्ली सदर आर्य समाज का उत्सव बड़े समारोह से होगा, 3 दिन धर्मचर्चा के लिए रक्खे हैं। उस पर श्री पं. गणपति शर्मा जी, श्री पं. भीमसेन जी और श्री पं. नरदेव जी शास्त्री आदि अनेक विद्वान पधारेंगे।

अंत में 'निवेदन' किया गया

जिन सज्जनों ने 'भारतोदय' में समालोचना के लिए पुस्तकें भेजी हैं उनसे प्रार्थना है कि अगली संख्या में समालोचना निकलेगी, तब तक संतोष रखें। जिन सहयोगियों की सेवा में 'भारतोदय' पहुँचे, उनसे विनय है कि इसके बदले में अपने अमूल्य पत्र भेजकर अनुगृहीत करें। 'भारतोदय' को प्रथम अंक के बाद रजिस्ट्रेशन नं. । 476 प्राप्त हो गया। अगले अंक में यह नंबर प्रकाशित किया गया।

'भारतोदय'का संघर्ष 

'भारतोदय' सा.प.(साप्ताहिक प्रकाशन) वर्ष 1 पुनर्जन्म में प्रकाशित इस लेख से पता चलता है-भारतोदय-इस नाम में कितनी जादू भरी है, यह नाम चित्त को जितना आह्लाद् देता है, इस नाम से रह रहकर जिन जिन बातों की याद आती है और याद कर कर जिस तरह जी भर आता है वह सब अनुभव करने की बातें हैं और प्रत्येक भारतवासी स्वयं अनुभव कर ही रहा है। शब्दों से मानसिक स्थिति का घणान अशक्य है। पर भारतोदय शब्द के अर्थ को प्राप्त करने के मार्ग में जो विकट घाटियाँ हैं उनको पार करते करते कभी कभी जो निराशा छा जाती है, वह भी अवर्णनीय है। पर सच्चे यात्री को यह निराशा स्वल्पकाल तक ही घेर सकती है। जिसकी दृष्टि उद्दिष्ट स्थल पर लगी हुई है वह कब कठिनाइयों की परवाह करता है? वह कब चैन लेता है? वह अपनों की हँसी मज़ाक भी सहता है, दूसरों की मनमानी भी सहता है, और पार हो ही जाता है। जब घाटी पर चढ़कर नीचे देखने लगता है तब पहले हँसने वाले लज्जा के मारे अपनी गर्दन झुका कर खड़े रहते हैं। ऐसे वीर पुंगव का आदर करने लगते हैं, उसके पीछे चलना सीखते हैं। जो दशा असली भारतोदय के सम्मुख है वही दशा कागज़ी भारतोदय के सम्मुख है। यह किस प्रकार मासिक रूप में निकला, फिर साप्ताहिक हुआ, फिर कटारपुर के दंगल के समय घबराकर पूर्व प्रकाशक ने किस प्रकार बिना सूचना दिए ही घर बैठे डिक्लेरेशन ख़ारिज कराया, किस प्रकार अनेक विपत्तियों से महाविद्यालय की व संचालकों की जान बची, किस प्रकार फिर उद्योग हुआ और प्रथम बार 1000 रुपए की व द्वितीयवार 2000 की जमानत माँगी गई। इन सब बातों के लिखने की आवश्यकता नहीं। हम चाहते, तो भारत भर में इस बात का हल्ला मचा देते पर महाविद्यालय के संचालक चुपचाप काम करना ही अधिक पसंद करते रहे इस विश्वास पर कि कभी तो इन कठिनाइयों का अंत होगा। सुदीर्घ परिश्रम के पश्चात् अब कहीं जाकर मुरादाबाद के कलेक्टर ने बिना जमानत ''भारतोदय'' के प्रकाशन की आज्ञा दी है और इसीलिए अब यह आपकी सेवा में फिर पहुँच रहा है। इसको अपनाइए, इसको पुचकारिए, इसकी सहायता कीजिए, इसका उत्साह बढ़ाइए। इसकी अनुपस्थिति में महाविद्यालयों में भी युगांतर उपस्थित हो गया था। उस युगांतर की राम कहानी लिखने का यह प्रसंग नहीं है। उनको याद कर जी भर आता है। जिन्होंने भुगता वही जान सकते हैं कि युगांतर था, कि बला थी, महाविद्यालय के जीवन का प्रश्न था, कि मरण का। भगवान की कृपा से युगांतर आया व गया। बलाएं आईं और गईं आगे की राम जाने। अब तक राम जी ने ही रक्षा की है। 'चढ़ जा राम भली करेंगे'-यही तत्व संचालकों के सम्मुख है। भारतोदय की पुरानी नीति उस समय की उन उन परस्थितियों के कारण 'स्वात्म-रक्षा' थी। क्योंकि चहुँ ओर की मारधाड़ और जटिल तथा क्रूर संघटनों में उस नीति के बिना 'महाविद्यालय' की रक्षा होना असंभव था। अब समय बदल गया, शत्रु तथा मित्रों के दृष्टिकोण भी बदल गए, इसलिए भारतोदय में आगे बेहूदा खंडन-मंडन को स्थान न मिलेगा। रागद्वेषात्मक लेख रद्दी की टोकरियों में फेंक दिए जाएंगे। समय की गति के अनुसार जिससे भी भारतोदय होगा उन सब कार्यों में सहायक होना भारतोदय की नीति रहेगी। प्रमुख भाग निःशुल्क प्राचीन शिक्षा का रहेगा।

कुल मिलाकर 'भारतोदय' का प्रारंभ हिंदी साहित्य और पत्रकारिता जगत में महत्वपूर्ण घटना है। पत्रिका में हिंदी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी शब्दों से कोई परहेज नहीं रखा गया है, न ही पत्रिका के पाठक को।

संदर्भ

1. भारतोदय का प्रथम अंक

2. भारतोदय साप्ताहिक का पुनर्जन्मांक

3. गुरुकुल महाविद्यालय की स्मारिका (हीरक जयंती)



मणिपुरी कविता: कवयित्रियों की भूमिका


प्रो. देवराज



 आधुनिक युग पूर्व मणिपुरी कविता मूलतः धर्म और रहस्यवाद केन्द्रित थी। संपूर्ण प्राचीन और मध्य काल में कवयित्री के रूप में केवल बिंबावती मंजुरी का नामोल्लख किया जा सकता है। उसके विषय में भी यह कहना विवादग्रस्त हो सकता है कि वह वास्तव में कवयित्री कहे जाने लायक है या नहीं ? कारण यह है कि बिंबावती मंजुरी के नाम से कुछ पद मिलते हैं, जिनमें कृष्ण-भक्ति विद्यमान है। इस तत्व को देख कर कुछ लोगों ने उसे 'मणिपुर की मीरा' कहना चाहा है। फिर भी आज तक यह सिद्ध नहीं हो सका है कि उपलब्ध पद बिंबावती मंजुरी के ही हैं। संदेह इसलिए भी है कि स्वयं उसके पिता, तत्कालीन शासक राजर्षि भाग्यचंद्र के नाम से जो कृष्ण भक्ति के पद मिलते हैं उनके विषय में कहा जाता है कि वे किसी अन्य कवि के हैं, जिसने राजभक्ति के आवेश में उन्हें भाग्यचंद्र के नाम कर दिया था। भविष्य में इतिहास लेखकों की खोज से कोई निश्चित परिणाम प्राप्त हो सकता है, फिलहाल यही सोच कर संतोष करना होगा कि मध्य-काल में बिंबावती मंजुरी के नाम से जो पद मिलते हैं, उन्हीं से मणिपुरी कविता के विकास में स्त्रियों की भूमिका के संकेत ग्रहण किए जा सकते हैं। 



आधुनिक काल में मणिपुरी भाषा की कविता का प्रारंभ लमाबम कमल सिंह के सन् 1929 में प्रकाशित काव्य-संग्रह, ' लै-परेड्.',(पुष्प-माला) से हुआ। यह समय मणिपुरी साहित्य के इतिहास मेें ' नवजागरण-काल ' के रूप में प्रसिद्ध है। कवि कमल के अतिरिक्त दरेन्द्रजीत, ख्वाइराक्पम चाओबा, हिजम अड.ाड्.हल, हवाइबम नवद्वीपचन्द्र, अशाड्.बम मीनकेतन, मयूर ध्वज और राजकुमार शीतलजीत इस काल के महत्वपूर्ण कवि (इन सभी ने गद्य भी लिखा है) थे। यह आश्चर्य का विषय है कि संपूर्ण नवजागरण-काल में एक भी कवयित्री नहीं हुई। मणिपुरी समाज नारी स्वातन्त्रय की दृष्टि से सारे संसार में प्रसिद्ध है। इतना होते हुए भी यह खोज और शोध का विषय है कि उस काल मेें किसी स्त्री ने लेखनी उठाने का प्रयास क्यों नहीं किया। न केवल तब, बल्कि सन् 1950 तक भी किसी स्त्री-लेखक का नाम मणिपुरी साहित्य में नहीं मिलता। 


मणिपुरी कविता के क्षेत्र मेें स्त्री-रचनाकारों का प्रवेश साठोत्तरी काल में हुआ और आश्चर्य का यह दूसरा बिंदु है कि प्रवेश के तुरंत बाद इन कवयित्रियों ने धूमकेतु की भाँति मणिपुरी काव्याकाश को चकाचैंध से भर दिया। समकालीन जीवन के जितने भी पक्ष थे और उन पक्षों की जितनी सच्चाइयाँ थीं, स्त्री-रचनाकारों ने उन सभी को विषयवस्तु और कला-सौष्ठव, दोनों ही स्तरों पर प्रभावपूर्ण व सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की। परिणामतः मणिपुरी काव्य-धारा मेेें अत्यल्प-समय में ही उनका महत्वपूर्ण स्थान निर्धारित हो गया। स्त्री-रचनाकारों की संख्या, उनके काव्य सृजन का स्तर, परिमाण, गुणात्मकता आदि सभी पक्ष आश्चर्यचकित कर देने वाले है।


जहाँ तक मणिपुरी कविता को समृद्ध बनाने में स्त्री-रचनाकारों की भूमिका का मूल्यांकन करने का प्रश्न है, उसके लिए मैं पाठकों के समक्ष एक कविता प्रस्तुत करके मूल विषय पर आना चाहता हूँ-
   आत्मा तुम्हारी चाहे या न चाहे
   माने या न माने तुम्हारी आत्मा
   मैं 
   उत्तर हूँ युगों के प्रश्न का तुम्हारे,
   समझ बैठे थे क्या मुझे
   चाँदनी की चकोर
   या फिर भोर में
   फूलते गुलाब की 
   पंखुड़ी पर पड़ी ओस,
   नहीं हूँ मैं, वह हर्गिज नहीं
   मैं हूँ तड़ित् रानी
   समझ गए न! तड़ित् रानी !
   मेरी कर्कश-कठोर प्रतिध्वनि से
   टूट गिरेंगे 
   नव-नवीन रंगों से 
   लिपे-पुते
   सड़ चुके तुम्हारे दोंनो बाजू
   फैलाए खड़े हो जिन्हें दर्प के साथ
   एक नए इतिहास के दरवाजे पर 
   मेरे नेत्रों से परावर्तित 
   हजारों-हजार स्फुल्लिंग भस्म कर डालेंगे
   तुम्हारे युगों-युगों के
   कालिख पुते विचारों की गठरी 
   भयंकरता मेरी
   सहोगे जब मूंद कर आँखें 
   संपूर्ण हो जाएगी
   धरा की नव-सृष्टि ।


यह कविता समकालीन मणिपुरी साहित्य के 'युवा कविता आन्दोलन' की सबसे समर्थ एवं चर्चित कवयित्री मेमचैबी की रचना है और इसका आधार एक पौराणिक विश्वास है। कहा जाता है कि जब 'अतिया गुरु शिदबा (अशीबा) सृष्टि-रचना में प्रवृत्त हुए तो ' हराबा ' नामक राक्षस उसका विध्वंस करने में जुट गया। अशीबा जितनी रचना करते, हराबा उतनी ही नष्ट कर डालता। जब हराबा किसी भी उपाय से रोका नहीं जा सका तो 'मपू शिदबा' ने ' नोड्.थाड्.लैमा' नामक देवी का आह्वान किया।


तड़िताम्बरधारिणी देवी के दिव्य सौन्दर्य को देखते ही हराबा उस पर मोहित हो गया और उसका परिचय पाने को व्याकुल हो उठा। उसने नोड्.थाड्.लैमा से उसका परिचय पूछा और देवी ने उसकी जिज्ञासा का समाधान किया। इस तरह प्रश्नोत्तर शैली में दोनों के बीच प्रेम-प्रसंग घटित हुआ। इसी अवसर का लाभ उठा कर अशीबा ने सृष्टि-निर्माण किया। 


मेमचैबी ने इस पौराणिक-प्रसंग की देवी, नोड्.थाड्.लैमा को समकालीन परिस्थितियों में विकसित स्त्री-सत्ता की प्रतीक के रूप में ग्रहण करके पुरुष समाज के समक्ष अनुपेक्षणीय चुनौती  प्र्रस्तुत की है। कविता का हिन्दी अनुवाद पढ़ कर साफ समझा जा सकता है कि आज की स्त्री न तो पुरुष के दैहिक बल पर आधारित शोषण को सहन करने को तैयार है और न स्त्री के विरोध में शताब्दियों से सक्रिय कलुषित, बुर्जुआ विचारों को। इसका कारण भी साफ है। उसने अपनी आन्तरिक शक्ति को पहचान कर एक नया व्यक्तित्व अर्जित कर लिया है, जिसमें यथार्थ-दृष्टि, साहस, ईमानदारी, बौद्धिकता और संघर्षशीलता जैसे तत्वों का प्राधान्य है। भावना, प्रेम, लज्जा, और मर्यादा भी इस नवीन व्यक्तित्व में हैं, किन्तु इतनी मात्रा में नहीं कि वह परम्परागत स्त्री की भाँति 'चाँदनी की चकोर' या फिर 'गुलाब की पंखुड़ी पर पड़ी ओस' बनी रहे। यही कारण है कि नोड्.थाड्.लैमा (तड़ित् रानी) के नेत्र आग्नेय हैं, जिनसे हजारों-हजार स्फुल्लिंग फूट कर पुरुष के युगों पुराने कालिख भरे विचारों की गठरी जला डालने को तैयार हैं। ऐसा हुए बिना इस पृथ्वी पर नवीन-सृष्टि संभव नहीं है। 


एक स्वाभाविक जिज्ञासा हो सकती है कि क्या मेमचैबी ने अचानक स्त्री को इस भूमिका मेें लाकर खड़ा कर दिया है ? ऐसा नहीं है। उन्होंने उसके शोषण का निकट से निरीक्षण किया, स्त्री-शोषण के धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, यहाँ तक कि यथास्थितिवादी, निहितस्वार्थी कला और साहित्य केन्द्रित आधारों को जाँचा-परखा, युगों से चले आते पुरुष-सत्तात्मक समाज-तन्त्र के अधीन तिल-तिल टूटती-बिखरती स्त्री के जीवन को नष्ट करते विरोधाभासों कोे समझा और स्त्री के भीतरी दर्द को कुछ इस तरह अपनी कविता में उतारा - '' दरिद्र/तेरे घर में तेरी दासी/पिता ने तेरे लिए पाला मुझे/प्रदान किया निष्कलंक रूप/हे धनवान/हूँ मैं तेरे लिए कठपुतली भर/शृंगार किया माँ ने मेरा/अनेक रंगों से सजाया तेरे आकर्षण हेतु/चन्द्रिका के लावण्य से अपरिचित मैं/मेघों की, आकाश की सुन्दरता से भी/ओह/शून्य/नहीं जानती, अपरिचित/पुराण बखानते/स्वर्ग लोक है यही/अंधकार में स्वर्ग के/जीती आई तू/जिया जीवन तूने हे नारी/मृतात्मा/शोषित आत्मा/उच्च आसन पर आरूढ/कवियों की मनोज्ञ वाणी में/चेतनाशून्य जीती आई/संबोधित करता तुझे विश्व/वीरांगना मैतै लैमा।'' कविता की अन्तिम पंक्तियों में मणिपुरी स्त्री के माध्यम से स्त्री मात्र के जीवन की त्रासदी को चिन्हित कर दिया गया है। 


स्त्री के जीवन और व्यक्तित्व की सच्ची तस्वीर के साथ ही उसके भीतर की शक्ति को अभिव्यक्त करने का कार्य केवल मेमचैबी ने ही नहीं किया है, बल्कि उनके साथ अनेक अन्य कवयित्रियाँ भी हैं। अपने 'लैरोन चम्ख्रबा थाजबा' काव्य संग्रह की एक कविता में ल.इबेम्हल देवी कहती हैं- '' मांस की भूख के क्षण/कराया जाता वेश्या का अभिनय/कहा जाता सतीत्व भरी/गृहिणी की उपाधि देकर/पराजय के क्षण/देखता पशु के रूप में/अनिच्छा और घृणा के समय/माता है, पुत्री है, अनुजा है/अग्रजा है, पत्नी है, बांधवी है/और वेश्या है।'' ऐसे कठोर अभिशाप से पीड़ित स्त्री की बेबसी और अपने अस्तित्व के अहसास के क्षण उसी बेबसी की प्रतिक्रिया केा एक अन्य कवयित्री लैशाड्.थेम इबेयाइमा ने अपने 'मैरा परेड्.गी थाओ मै' काव्य-संग्रह में चित्रित करते हुए कहा है - '' मुझे मेरा अधिकार लौटाओ/लौटाओ मुझे मेरा हक./थोड़ा सा जीेने दो मुझे/जरा कहना फिर से/चाहते कौन-सा दोष मढ़ना/मेरे बंधे हाथ/खोलो जरा, आँखों की पट्टी भी खोलो/चैन से जीने दो क्षण भर को/मढ़ रहे जो दोष/सही है या गलत/सिद्ध करने दो आजाद होकर इसी जीवन में/न दो चुनौती मेरे अधिकार को हे दर्पी/देह साँस लेना बन्द कर देगी जब/करोगे बदनाम झूठा दोष मढ़ कर/लगेगा बुरा मेरी आत्मा को/मनुष्य हूँ मैं भी/मुझे मेरा अधिकार लौटाओ।'' 


यही स्त्री एक और मोड़ पर अपने समाज की सांस्कृतिक पहचान की व्याकुलता को वाणी देने की जिम्मेदारी निभाती हुई भी मिलती है। मणिपुर में राज्य-व्यवस्था का प्रारंभ सन् 33 ईसवी के लगभग हुआ माना जाता है। उस समय मणिपुरी (मीतै/मैतै) जाति सात वंशों - खाबा, चेड्.लै, लुवाड्., खुमन, मोइराड्., अड्.ोम, निड्.थौजा मेें विभक्त थी। राज्य-व्यवस्था का प्रारंभ ' इबुधौ पाखड्.बा ' (दादामह पाखड्.बा) ने किया था। कालान्तर में सातों वंशों ने अपने-अपने राज्य स्थापित किए। अन्त में सभी राज्यों का विलय ' निड्.थौजा ' के राज्य में हो गया। इसी राज्य की राजधानी 'कड्.ला' कहलाई । निड्.थौजा-शासन के अधीन मणिपुरी जनता ने लगभग दो हजार वर्ष तक स्वाधीनता का ध्वज आकाश में फहराए रखा। दुर्भाग्य से सन् 1891 मेें ' खोड्.जोम-युद्ध ' मेें अंगरेजों की सेना ने इस राज्य को जीत लिया और स्वाधीन मणिपुर ब्रिटिश साम्राज्य का छोटा सा उपनिवेश बन गया। ऐतिहासिक गौरव का 'कड्.ला' अंगरेजों के बूटों तले रौंदा जाने लगा। इसके बाद जब भारत स्वाधीन हुआ तो मणिपुर भारत-संघ की राजनैतिक इकाई बना। मणिपुरी  जनता को आशा थी कि उसके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक वैभव का जाज्वल्यमान प्रतीक कड्.ला उसके लिए खोल दिया जाएगा, किन्तु भारत सरकार ने उसे एक सैन्य-केन्द्र में बदल दिया और वहाँ असम राइफल्स की टुकड़ी रहने लगी। जनता की ओर से मांग की गई कि कड्.ला को जनता के हवाले कर दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जनता की मांग ने आन्दोलन का सहारा लिया। सरकार के कान पर फिर भी जूँ नहीं रेंगी। परिणाम यह हुआ कि कड्.ला की मुक्ति का संघर्ष मणिपुरी जनता की सांस्कृतिक पहचान बचाने का शक्तिशाली  संघर्ष बन गया,जिसमें समाज के सभी वर्ग कूद पड़े। जिन दिनों जन-संघर्ष अपने उबाल पर था, उन्हीं दिनों मेमचैबी ने एक कविता रची थी, जो इस प्रकार है- '' खोलो दरवाजा,खोलो दरवाजा/हमारे कड्.ला का खोलो दरवाजा/उस भूमि का स्पर्श होने दो एक बार/मैं हूँ कौन ?/मैं बनने वाली हूँ माँ/गर्भवती हूँ मैं/एक बार स्पर्श करने दो उस भूमि का/खोलो दरवाजा, खोलो दरवाजा/दरवाजा, जिसे कर रखा है बन्द/हमारे कड्.ला का खोलो दरवाजा। '' इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि मेमचैबी अपनी इस कविता में एक सामान्य स्त्री न रह कर जनता की सच्ची प्रतिरूप बन कर उभरी । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिस दिन कड्.ला को सैन्य बल के हाथों से मुक्त करके जनता को सौंपा, उस दिन कविता का आन्तरिक अर्थ भी जनता के हृदय की संपदा बन गया। 


मणिपुरी कविता को स्त्री-चेेेतना के साथ-साथ सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़ने का कार्य मणिपुरी भाषा की कवयित्रियों ने सफलता के साथ किया। इससे समग्र काव्य-परम्परा समृद्ध हुई। इस संदर्भ में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इन कवयित्रियों ने स्त्री की तमाम ऊर्जस्विता और शक्तिमत्ता को चित्रित करते हुए भी उसे यथार्थ अनुभवों से कटने नहीं दिया है। वे जानती हैं कि भारतीय सामाजिक  संदर्भों में स्त्री की संपूर्ण मुक्ति आज भी असंभव दिखती है, क्योकि विपरीत परिस्थितियों के चलते वह पुरुष की तुलना में आज भी निर्बल बनी  हुई है। अतः और अधिक शक्ति अर्जित करने की, अपने भीतन और अधिक साहस व वीरता जगाने की आवश्यकता है। सापम श्यामोलता सिंह अपनी 'निड्.ोल मपोक' (स्त्री जीवन) कविता में मातृ-भूमि से प्रार्थना करती हैं-'' चिंतामुक्त विश्राम नहीं/फिर भी जीते चले जाना है/बढ़ा दो माँ शक्ति अपार/स्त्री जीवन में/आँचल पसारती/हर स्त्री को/बना दो / वीरांगना''


मणिपुर के आर्थिक-विकास के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा आतंकवाद और उग्रवाद है। वर्तमान में इस राज्य में लगभग तीस उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं, जिनके एजेण्डे में भारत संघ से मणिपुर की मुक्ति सबसे ऊपर है। इनके अनुसार 15 अक्टूबर 1949 को मणिपुर का भारत-संघ में विलय अनुचित है, इसलिए इसे निरस्त करके इस राज्य को राजनैतिक-स्वाधीनता मिलनी चाहिए। इन सभी संगठनों की समय-समय पर की गई घोषणाओं के अनुसार ये उसी स्वाधीनता के लिए सुरक्षा बलों सेे सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं। आए दिन अद्र्ध सैनिक बल, सेना आदि पर किए जाने वाले हमले, जगह-जगह बम-विस्फोट, गोलीबारी उसी संघर्ष का हिस्सा है। ये उग्रवादी संगठन सहयोग के नाम पर जनता के सभी वर्गों से धन-वसूली करते हैं। कभी-कभी ये प्रेस को भी अपने आदेश के डण्डे से हाँकने की कोशिशें करते हैं। इससे समाज में आंतक का संचार होता है और आर्थिक-विकास की योजनाओं का क्रियान्वयन बुरी तरह प्रभावित होता है। 


उग्रवादी संगठनों के सामने खड़ा दूसरा पक्ष शासन है उसके अनुसार 'मणिपुर ही नहीं, पूरे राष्ट्र के विकास को उग्रवाद प्रभावित कर रहा है, अतः प्रत्येक उपाय का उपयोग करके इसे समाप्त किया जाना चाहिए। शासन इसके लिए, 'शक्ति का विनाश शक्ति से' नीति का अनुसरण करता है। सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आम्र्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट-। FSPA) और पोटा (POTA) लागू करके शासन ने अपनी नियत का परिचय दिया, जिनके अन्तर्गत सुरक्षा बलोें को विशेष छापेमारी अभियान (काॅम्बिगं आॅपरेशन) चलाने, मात्र संदेह पर किसी को भी हिरासत में लेने, प्रकृत नागरिक आजादी का हनन करने जैसी कार्यवाहियों के आधार पर शासन की नीति लागू करने की स्वतन्त्रता मिल गई। इससे समाज मेें एक और आतंक का प्रादुर्भाव हुआ, जिसे आम जनता मेें शासन के आतंक या प्रति आतंकवाद के रूप  में जाना गया। 


इस आतंकवाद और प्रति आतंकवाद (या शासन द्वारा प्रायोजित आतंकवाद) के बीच आम आदमी उसी प्रकार पिसने लगा, जैसे चक्की के दो पाटों के बीच अनाज पिस जाता है। इसका सबसे अधिक बुरा प्रभाव पड़ा स्त्री पर, क्योंकि युद्ध, चाहे वह खुला हो या छद्म या शीत-सबसे अधिक स्त्री को प्रभावित करता है। जो भी आतंक और प्रति आतंक का शिकार होकर अपने जीवन से हाथ धोता है, वह स्त्री के पिता, पति, प्रेमी, भाई आदि में से ही कोई होता है। मणिपुर में असंख्य लोग आतंकवाद की आग में झुलस चुके हैं और हर बार झुलसते हुए व्यक्ति के साथ किसी न किसी स्त्री की आँखें हमेशा के लिए आँसुओं के समुद्र में डूबी हैं। उसके विदीर्ण हृदय का रुदन सुनने के लिए भी जीते-जागते आदमी नहीं, केवल शव बचे हैं। मणिपुरी भाषा की कवयित्री शांतिबाला ने ऐसी एक स्त्री का चित्रण करते हुए कहा है-''बंदूक की नोंक पर/जबर्दस्ती/ले जाए गए पुत्र का समाचार/ अतापता न मिलने के कारण/इंतजार में डूबी है/माॅ: ग (शव-गृह) पर/निर्धन माँ/फाटक के बाहर ले जाए गए/आँखों से ओझल हुए लोगों का/पड़ाव हो गया है यह माॅ: ग/आएँगे अवश्य/विश्राम करने यहाँ/करेंगे अवश्य/आखरी दस्तखत/सुनेंगे विलाप/माँ-बाप, भाई-बहनों का।'' आतंक और प्रति आतंक की लपटों के बीच कुछ लोग ही नहीं, पूरी जाति घिर गई है। अपने ही शरीर से बहते खून के फैलाव में अपने को विविध रूपों में देखना उसकी नियति है। ऐसे में भला जीने का क्या अर्थ हो सकता है? सगोलसेम विलासिनी देवी कहती हैं-''समय के दावनल में भस्म/मेरे हृदय की बगिया में/छाई में बदल गए/हमारी जाति के फूल/बेबसी है खिलने की/इसीलिए खिलते हैं/देखें कैसे/हृदय की असह्य दुख भरे रुदन की आवाज में/अपने ही बहते हुए खून के/रोंगटे खड़े कर देने वाले विविध रूप।'' 


मणिपुरी भाषा की कवयित्रियों ने अपनी वैचारिक और सांस्कृतिक जड़ों से कटे समाज की मानसिक-त्रासदी के चित्रण पर बहुत अधिक ध्यान केन्द्रित किया है। राष्ट्र की मुख्य भूमि से दूरी, पर्वतीय क्षेत्र की परिस्थितियों, विकास योजनाओं की असफलता, शिक्षा के उच्च स्तर के अभाव आदि ने मणिपुरी समाज को आधुनिक विश्व ओैर विज्ञान केन्द्रित आधुनिक सभ्यता का अभ्यासी नहीं होने दिया। इस कारण यहाँ के लोग अपनी युगों पुरानी पारम्परीण संस्कृति से चिपके रहे। दूसरी ओर सूचना के प्रसार ने उन्हें यूरोपीय जीवन शैली व अंगरेजी पद्धति की शिक्षा के प्रति भी आकर्षित किया। इससे मणिपुरी समाज परम्परा और आधुनिकता के बीच उत्पन्न वैचारिक संघर्ष का शिकार होकर अपनी वास्तविक जड़ोें से कट कर जीने लगा। परिणाम यह हुआ कि आम जन-जीवन में भयावह खोखलेपन ने घर कर लिया, जिसने गणनातीत मानसिक समस्याओं, अजनबीपन , अकेलेपन, निष्फल होते जाने की पीड़ा, व्यक्तित्व के अधूरेपन की कसक आदि को जन्म दिया। भानुमति देवी ने कहा-''एक पंखुरी देखी/उभर आए असंख्य विचार/रोते बार बार/हँसते बार बार/नहीं अंत खोज का/नहीं विराम चर्चा पर/और अंत में/शून्य ही शून्य।'' खोखलेपन और भीतरी अनिश्चितता के यथार्थ का अंकन करते हुए मोहराड्.थेम वरकन्या ने कविता रची-''बीनाई कमजोर पड़ गई हमारी/डाॅक्टर ने/प्रेस्क्राइब्ड कर दिए चश्मे/उल्लसित हम/पहले की सी बीनाई/पाने के उत्साह में/लेकिन गुड़गोबर हो गया सब/पर्वत, झील, नदी/पेड़-पौधे, खेत खलिहान/रंच मात्र हरियाली/दिखती नहीं वनस्पतियों में/सब कुछ बेरंग/चली गई शक्ति/दावानल मेें भस्म पर्वत-माला सा दृश्य/संसार राख के टीले की तरह/उसी पर चक्कर काटते/मटमैला सा चश्मा पहने/हाथ-पैरों से टटोलते/हरे रंग का एक निशान।'' रंजिता कोन्थौजम ने वर्तमान परिवेश के प्रभाव को न केवल मनुष्यों, बल्कि प्रकृति पर भी अनुभव किया-''चाँद की वद्र्धमान कलाएँ/घट कर तुरंत/बन गई अमावस्या/अनुभव कर लिया उन्होंने/इस आकाश में/असंभव है जी पाना उनके लिए।'' जिस आकाश का यथार्थ कवयित्री ने दर्शाया है, वह उस वातावरण का नियंता है, जिसमें मार काट और अपराधाओें का बोलबाला है। उसमें स्वार्थों की आपसी टकराहट और चोरोें की दुर्नीतियों का घृणास्पद खेला है। इस वातावरण और इसे संरक्षित करने वाले कारकों से कवयित्री सन्जेन्बम भानुमति इतनी परेशान हो उठती हैं कि वे सूर्य और चन्द्रमा तक से पूछने लगती हैं कि वे इस विद्रूप संसार पर अपना प्रकाश क्यों फैला रहे हैं और अपने लिए एक नए सौर-जगत की खोज क्यों नहीं करते ? वे 'क्या लाभ' शीर्षक कविता में कहती हैं-''हे सूर्य चन्द्र तारो !/समेट लेना नहींे चाहते अब भी/अपनी रौशनी ??/भाता है क्या देना मार काट को/चोरी को, अपराधी स्वभाव को/अपना प्रकाश ??/निर्मित करो, खोजो कोई दूसरा सौर जगत/जिस पर बिखरा सको निर्मल/अपनी आभा।'' 


मानवता के विरुद्ध भंयकरतम अपराध है, व्यक्ति को उसकी इयत्ता से काट देना। यह ऐसा ही है, जैसे किसी पक्षी के पंख काट कर या उसे जन्म लेेते ही पिंजरे में बंद कर उसकी उड़ने की शक्ति नष्ट करके उसे उड़ान भरने के लिए मजबूर किया जाए। आज ऐसा ही किया जा रहा हैै। कवयित्री इबेमपिशक देवी ऐसे तोते की व्यथा बयान करती हैं, जिसे इतने छोटे पिंजरे में बन्द कर दिया गया है कि वह ढंग से अपने पंख भी नहीं फड़फड़ा सकता। लम्बे समय तक लोहे के पिंजरे से लड़ते-लड़ते उसका स्वाभाविक हरा रंग धूमिल पड़ गया है, यहाँ तक कि उसका स्वर भी अपने दोस्तों जैसा नहीं रह गया है। फिर भी उसके भीतर का तोेता अभी पूरी तरह निष्प्राण नहीं हुआ है, इसीलिए उसे अपनी पूर्व की उछल-कूद के साथ ही पेड़ों पर लगे मीठे फल याद आते हैं। उसकी इच्छा होती है कि वह जंगल में लौट जाए, किन्तु ऐसा संभव नहीं हो पाता। उसे अपनी बेबसी सालने लगती है। ऊपर से उसे बंधक बना कर रखने वाले ही उसे उड़ने को उकसा कर उसका उपहास करने लगते हैंै। उनकी बार-बार की जाने वाली वही बातें उसे खीझ से भर देती हैं। 'गिर गया था' शीर्षक कविता का तोता अपनी जिजीविषा और विवशता के द्वन्दव को इन शब्दों में बयान करता है- ''मेरा हरा रंग तक/बदल गया धूमिल रंग में/मेरा स्वर/नहीं रहा मित्रों जैसा/सुस्वादु फल/उछल-कूद यहाँ से वहाँ/फड़फड़ाना पंख/स्वच्छन्द जीवन वन का/जब भी आया सूरज पहाड़ के नजदीक/लौटने की चाह जगी मेरे भीतर भी/मन में आया फड़फड़ाऊँ पंख एक बार/फँस कर गिर गया इस पिंजरे के भीतर/घिरे हुए इस पिंजरे में।'' कवयित्री यहीं तक सीमित नहीं रही। उसने उन लोगों के स्वभाव, स्वरूप और कार्य-पद्धति का भी पर्दाफाश किया, जिन्होंने इस तोेते को उसके मूल अधिकार, उसकी स्वाधीनता से वंचित किया। शहराती चाल-चलन वाले ये लोग मनुष्यता से परे हैं, क्योंकि इनके विचारों में मात्र पशुता बची है। इनके लिए सह-अस्तित्व, सहयोग, प्रेम-प्यार, सदाशयता आदि का कोई महत्व नहीं है, इसीलिए- ''उस नगर में/होते हैं कुछ लोगों के सिर बाघ के/क्षणिक बुभुक्षा में लील जाते/बेचारे निरपराध जीवों को/''''उस विकसित नगर में/आखेटक के पीछा करने से/हिंस्र बाघ के भागने से/धूल से अट जाती हैं/नगर की चमचमाती इमारतें।''
  मणिपुरी समाज को आन्दोलित करने वाली व्यापक चिन्ताओं के साथ-साथ कवयित्रियों ने दैनन्दिन जीवन और सामाजिक रिश्तों को प्रभावित करने वाली समस्याओं को भी अपनी कविताओं में उठाया है। उदाहरण के लिए निर्धनता और उसके स्त्री पर पड़ने वाले प्रभाव को कोइजम शान्तिबाला ने इन शब्दों में चित्रित किया है-''लावण्यती/नाटक के अभिनय में/मन्त्री की पत्नी/बनी सना इबेमा/करके ललित अभिनय/मनुहार करती मन्त्री की/आग्रह करती हार बनवाने की/मिले रुपये से/लौटती है घर/भूखी/निर्बल माँ/छोट-छोटे बच्चे।'' इसी प्रकार विश्व प्रसिद्ध झील, 'लोकताक' की दुर्दशा पर चिंता व्यक्त करते हुए अनेक कवयित्रियों ने रचनाएँ की हैं। जंगल कटते चले जाने से पर्यावरण असंतुलन का संकट उत्पन्न हो गया है। इसके बावजूद यह प्रक्रिया जारी है। तोनजम कमला चनु इस समस्या को उठाते हुए कहती हैं-''कुल्हाड़ी कंधे पर/आ पहुँचा लकड़हारा/जंगल तक/देख विशाल वृक्ष/लकड़हारा मुस्कराया/जंगल भी उसे देख कर/मुस्कराया होगा क्या धीरे-धीरे/या रो पड़ा होगा विदीर्ण हृदय।''


इन सारे पक्षों के साथ मणिपुरी भाषा की कवयित्रियों ने मातृ-भूमि के प्रति जो जुड़ाव अनुभव किया है, वह अनुकरणीय है। इस जुड़ाव की विशेषता यह है कि इसमें भाववादी शैली मेें मातृभूमि का गुणानुवाद नहींे है, बल्कि उसकी उन्नति की चिन्ता है। इन कवयित्रियों का मानना है कि जब तक हम पारस्परिक फूट का शिकार रहेंगे, मातृभूमि की आँखों के आँसू नहीं पोंछ पाएँगे। इस फूट और विभेद को मिटाने का भी सबसे सार्थक उपाय यह है कि हम सब अपने सामाजिक-धार्मिक विभेदों को सदा के लिए तिलांजलि देकर अपने को केवल और केवल मनुष्य समझना प्रारंभ कर दें। सच्चे मातृभूमि प्रेम की यही कसौटी है। चिड्.गाड्.बम चन्द्रकला देवी अपनी एक कविता मेें कहती हैं-''हे मनुष्य/तुम इतने हिंस्र/तुम इतने मूर्ख/नहीं परिचित मनुष्यता से ?/'''' मैं तुम वह/हिन्दू मुस्लिम क्रिश्चियन/पहाड़ी मैदानी सब/हैं संतान जन्म भूमि की/विस्मृत कर दिया, हैं बहिन-भाई ?/ईष्र्या-द्वेष के विचार ने/विभक्तिकरण अपनी पराई भूमि का/क्यों इतनी रुचि से/हृदय से लगाया लड़ाई को/एक होकर बंध जाएँ हम/एकता के सूत्र में/गाँठ लगाएँ मजबूत/प्रेम के धागे से/दिखाएँ एकता की शक्ति/मनुष्य हैं हम सब।''
 मणिपुरी भाषा की कवयित्रियों का यह आह्वान भावी काव्य-विकास के प्रति निश्चय ही आश्वस्त करने वाला है। 
   


संत बाबा मौनी: इक पनछान 


डाॅ. प्रीति रचना



 डुग्गर दे जम्मू सूबे दी धरती रिशियें-मुनियें, पीर-पगंबरे दी धरती ऐ। इस धरती पर केईं मंदर ते देव-स्थान होने करी इस्सी मंदरें दा शैह्र गलाया गेदा ऐ। जम्मू लाके च बाह्वे आह्ली माता दा मंदर, रणवीरेश्वर मंदर, रघुनाथ मंदर, आप-शम्भू मंदर, पीरखोह् मंदर, सुकराला माता बगैरा दे मंदर ते केईं सिद्धपुरशे दियां समाधियां बी हैन। उं'दे चा गै इक समाधी बावा मौनी जी हुंदी बी ऐ, जेह्ड़ी जम्मू जिले दी अखनूर तसील दे बकोर ग्रांऽ च ऐ। एह् ग्रांऽ जम्मू थमां 50 कि॰.मी॰. दूर चनाब दरेआ दे कंडै बस्से दा ऐ। इस दरेआ करी ग्रांऽ हुन चैथी बारी नमें सिरेआ बस्सेआ ऐ। 
 इस ग्रांऽ च इक राधा-कृष्ण दा मंदर बड़ा गै प्राचीन ऐ, जेह्दा निर्माण बावा मौनी होरें करोआया हा। बावा मौनी पैह्ले कश्मीर च 'रैनाबाडी' नांऽ दी जगह् रांैह्दे हे। ओह् शुरू थमां गै अध्यात्मिक प्रवृत्ति आह्ले हे। इक दंत कथा मताबक ओह् सन् 1650 दे कोल-कच्छ घरा निकली गे ते चलदे-चलदे अखनूर तसीलै दे पं´ग्रांईं नांऽ दे ग्रांऽ च आई गे हे। उत्थै उ'नें शैल घना जंगल दिक्खियै अपनी समाधी लाई लेई ही। किश ब'रें उत्थें तप ते प्रभु भजन करदे रे। अग्गें-पिच्छंे दे लोक उ'नेंगी खाने आस्तै रस्त देई जंदे ते ओह् आपूं मन्न पकाइयै खाई लैंदे हे। इक रोज मते सारे लोक कट्ठे होइयै उं'दे कोल गे ते आखन लगे- म्हाराज! तुस इत्थें बस्ती थमां दूर घने जंगलै च की रौंह्दे ओ? अस चाह्न्ने आं जे तुस बस्ती दे कोल इक थांह् बेई जाओ ते भगती करो। बावा मौनी होरें परते च उ'नेंगी लिखियै अपने मनै दी गल्ल दस्सी जे ओह् तां जान गे जेकर उत्थें राधा-कृष्ण दे मंदर दा निर्माण होऐ। लोक मन्नी गे ते उ'ने उं'दे कन्नै मिलियै राधा-कृष्ण मंदर बनोआया, जेह्ड़ा अज्ज बी मौजूद ऐ। मंदरै दे कोल गै बावा-मौनी हुंदी समाधी बी बनी दी ऐ। इत्थें हर साल भंडारा होंदा ऐ, लोक शरदा कन्नै मत्था टेकदे ते बावा मौनी थमां शीर्बाद लैंदे न। अज्ज उस मंदर दे पुजारी 'महन्त बिल्लो राम' होर न। 
 पं´ग्र्राइं च मंदर बनोआने दे बाद बावा मौनी जी म्हाराज ल्हौर चली गे। थोड़े चिर उत्थें रेह् ते महाराजा औरंगजेब दे शासनकाल (1658-1707) च, धर्म-परिवर्तन दे दौर च ओह् बकोर ग्रांऽ आई गे। बकोर, चनाब दरेआ दे कंडै बड़ा प्राचीन बडै दा रुक्ख हा, जेह्दे कन्नै उ'नें अपनी झोली ढंगी ही, ते इस रुक्खै हेठ गै तप करने गी बेही गे हे। बावा होर जल-समाधी बी लैंदे हे। छे-छे मम्हीने रोज पानी च बेइयै किश चिर तप करदे हे। ओह् इक सिद्ध-पुरख हे, उ'नें बड़ियां सिद्धियां कीती दियां हियां। उस बड़ै हेठ तप करदे-करदे र्केइं ब'रे गुजरी गे। इस दौरान साधुयें दियां केईं जमातां उं'दे दर्शन करने गित्तै आइयां हियां। 
 इक रोज उ'नें किश साधुयें गी शारे कन्नै इक थांऽ मिट्टी पुट्टी-पुट्टियै दुए थाह्र सुट्टने दा शारा कीता। उ'नें साधुयें मिट्टी दा बडा बड्डा टिब्बा-जन बनाई दित्ता ते फ्ही उस्सै टिब्बे उप्पर बावा मौनी हौरें राधा-कृष्ण मंदर दा निर्माण करोआया। मंदरै दे अग्गै दरेआ ते पिच्छे बडी बड्डी खाई ही। उस खाई दे कंढै हा बडै दा बड़ा पराना रुक्ख। इक बारी किश साधुयें दी जमात बावा मौनी कोला आई ते आखन लगी जे अस सारे दुद्ध पीगे ते फ्ही लौंगे दी धूनी तपगे। 
 बावा होरें अपने चेलें गी अपनी गड़बी दुद्धै दी भरियै दित्ती ते शारे कन्नै समझाया जे जाओ सारे साधुयें गी पलेआई आओ। सारें साधुयें दुद्ध पीता पर गड़बी फ्ही बी खाल्ली नेईं होई। ओह्दे परैंत्त बावा होरें चेलें गी समझाया जे गमें आस्तै लाए दे पोआऽ दे पोआड़े गी पुट्टो। चेलें उ'आं गै कीता तां पोआड़ा पुट्टदे गै ओह् सब्भै र्हान होई गे। की जे पोआड़े च पोआऽ दे थाह्र लौंग गै लौंग होई गेदे हे। साधुयें लौंगे दी धूनी तप्पी ते बड़े खुश होए। 
 बावा मौनी होर म्हेशां अपनी शक्ति कन्नै, करामात कन्नै लोकें गी चमत्कार दस्सदे रौंह्दे हे। 
 इक बारी इक महात्मा उं'दे कोल आए ते आखन लगे- ''चलो बावा जी छिंज दिक्खन चलचै।'' छिंज बटालै ही, जेह्ड़ा के अज्जकल पाकिस्तान च आई गेदा ऐ। म्हात्मा होर घोडी पर बैठे दे हे ते बावा मौनी होर कंधै उप्पर। तां बावा होरंे कंधै गी अड्डी लाई ते कंध गै चली पेई। महात्मा होर उं'दा ओह् चमत्कार दिक्खियै उं'दे पैरें ढेई पे। 
 बावा मौनी हुंदे आसेआ बनोआए गेदे राधा-कृष्ण मंदरे च इक बारी किश चोर चोरी करने गी आए पर अंदर बड़दे गै ओह् अन्ने होई गे ते सवेरे तगर अंदर गै टक्करां खंदे रेह्। ओह् नां गै चोरी करी सके ते नां गै नस्सी सके। लोऽ लग्गने पर उ'नें बावा मौनी दे पैरें मत्था टेकेआ ते अग्गूं आस्तै चोरी नेईं करने दी कसम खाद्धी। बावा होरें उ'नेंगी माफ करी दित्ता। बावा होरें समाई जाने परैंत्त बी केईं चमत्कार दस्से। उं'दे बाद महन्त गंगा राम होए जि'नें मंदरै दी दिक्ख-रिक्ख ते पूजा कीती। उं'दे बाद महन्त राम जी दास होरें कीती ते अज्जकल महन्त केशवदास होर न, जेह्ड़े मंदर ते बावा हुंदी समाधी दी दिक्ख-रिक्ख ते पूजा करदे न। बावा मौनी हुंदे आसेआ बनोआए दा राधा-कृष्ण मंदर ते बावा हुंदी समाधी सन् 1978 च बरसांती दे मौसमै च दरेआ हाड़ औने करी जल-प्रवाह् होई गे हे की जे दरेआ हाड़ हा ते मंदरै गी ढाह् लग्गी दी ही। समाधी बी दरेआ दे कंढे उप्पर आई गेदी ही। 100 फुट्ट हेठ दरेआ ठाठां मारा करदा हा ते दंद्धे ढेई जा करदे हे। महन्त राम जी दास हुंदे पुत्तर श्री विधा सागर होरें समाधी अंदर जाने दी हिम्मत रखी ते मंदरै चा राधा-कृष्ण दियां मूर्तियां ते समाधी अंदरा बावा मौनी हुंदी उंगली दी अस्थि (हड्डी) आह्ली गड़बी पुट्टी आह्नने दी ध्याई लेई। ओह् घाबरी गेदे हे जे कुतै समाधी समेत गै दरेआ च नेईं पेई जान। पर, फ्ही बी हिम्मत रक्खियै समाधी अंदर गें। समाधी अंदर जंदे गै जिसलै उ'नेंगी लाल रंगै दा नाग दर्शन देइयै छपन होई गेआ तां ओह् समझी गे जे बावा मौनी होर उं'दे कन्नै गै न ते उ'नेंगी समाधी पुट्टने दा शारा देआ दे न। नागै दे छपन होंदे गै विधा सागर हुंदी हिम्मत दूनी बधी गेई। उ'नें बावा मौनी हुंदी उंगली दी हड्डी आह्ली गड़बी, जेह्ड़ी के फर्शै च दब्बी दी ही पुट्टी लेई। समाधी दे बाह्र खड़ोते दे ग्रांऽ दे लोकें दे साह् सुक्कै दे हे। ओह् सोचा दे हे जे विधा सागर होर पता नेईं वापस औंदे न जां नेईं। पर, जिस बेल्लै विधा सागर होर गड़बी समेत बाह्र निकली आए तां सारे लोक खुशी कन्नै बावा मौनी दे नांऽ दे जैकारे लान लग्गी पे ते उं'दे दिक्खदे-दिक्खदे गै समाध दरेआ च ढेई पेई। 
 राधा-कृष्ण मंदर फ्ही पैह्ले मंदरै शा 300 मीटर दी दूरी उप्पर आर्मी आह्ले बनोआया ते कन्नै गै बावा हुंदी समाधी बी बनाई गेई, जित्थें लोक जंदे, मुरादां मंगदे ते बावा होर उं'दी हर मनोकामना पूरी करदे। पर, ओह् मंदर ते समाधी बी सन् 2014 च बरसांती चनाब दरेआ च जल-प्रवाह् होई गे। ओह् मंदर ते समाधी जल-प्रवाह बशक्क सन् 2014 च होए पर मंदरै दे अंदर दियां मूर्तियां ते समाधी आह्ली गड़बी सन् 1992 च गै महन्त केशवदास होरें पुट्टियै इक स्कूलै दे कमरे च रखी दित्ते हे। की जे दरेआ च हाड़ औने करी फ्ही ढाह् लग्गी गेदी ही ते महन्त केशवदास होरें गी बी समाधी कोल नागै दे दर्शन होए हे। ओह् बी समझी गे हे जे समाधी हुन जल-प्रवाह् होई जानी ऐ। किश गै दिने च समाध दरेहा च पेई गेई ते राधा-कृष्ण मंदर इं'यां कंढे पर आई गेआ जे ओह्दे अंदर जान नेईं हा होंदा की जे मंदरै दे अग्गे दी सारी जगाह् दरेआ च पेई गेदी ही। दरेआ दे कंढे पर खड़ोते दा मंदर सन् 2014 च दरेआ च पेई गेआ ते कन्नै गै ओह् प्राचीन बड़ बी। 
 जदूं महन्त केशव दास होरें मंदरै दियां मूर्तियां चुक्कियै स्कूलै च रक्खियां ओह्दे द'ऊं ब'रें मगरा सन् 1994 च गै उ'नें इस मंदरै दा निर्माण चनाब दरेआ शा लगभग 500 मीटर दी दूरी पर करोआया हा ते मंदरै दे कन्नै-कन्नै बावा मौनी दी समाधी बी बनोआई। 
 ग्र्रांऽ बकोर दे लोक अज्ज बी अपनी मनोकामना दी पूर्ति आस्तै बावा मौनी दी समाधी परप जाइयै बड़ी शरदा-भगती कन्नै उ'नंेगी चेत्ता करियै मन्नत मंगदे न जे जेकर साढ़ी मनोकामना पूरी होग तां अस चादर, प्रसाद, भेंट चाढ़गे। अपनी मुराद पूरी होने पर ओह् चादर ते प्रसाद लेइयै खुशी-खुशी उं'दी समाधी पर जंदे ते मंदरै दे महन्त केशवदाास होरें गी दिंदे न, जेह्ड़े समाधी अंदर जाइयै बावा मौनी गी चादर ते प्रसाद चाढ़दे न। इस ग्रांऽ दे लोक बावा मौनी हुंदा नांऽ बड़े आदरमानै कन्नै लैंदे न। बावा हुंदे च उं'दी बड़ी आस्था-विश्वास ऐ। 


सूचक:- 


1. महन्त बिल्लोराम, ग्रांऽ पं´गं्र्राइं, उमर-75 साल
2. महन्त केशवदास, ग्रांऽ बकोर, उमर-48 साल
3. श्रीमती लज्या रानी, ग्रांऽ बकोर, उमर-75 साल
4. श्री गणेश दास, ग्रांऽ बकोर, उमर-70 साल
5. श्री बंसी लाल, ग्रांऽ बकोर, उमर-65 साल
6. श्री कृष्ण लाल, ग्रांऽ बकोर, उमर-64 साल


 


प्रताप सिंह पुरा (ललयाना) : इक पनछान / डोगरी लेख


शिव कुमार खजुरिया 

तसील विशनाह् दा ग्रांऽ प्रताप सिंह पुरा ललयाना बड़ा गै म्शहूर ग्रांऽ ऐ। एह् जम्मू थमां लगभग 25 किलोमीटर ते विशनाह् थमां 6 किलोमीटर दी दूरी पर बस्से दा ऐ। इत्थूं दी कुल अबादी 663 ऐ ते जमीनी रकवा लगबग 550 धमाऽं ऐ। इत्थूं दे किश लोक मलाज़म न पर, ज्यादातर लोक जीमिदारी ते मजूरी करियै अपनी गुजर-बसर करा दे न। इस ग्रांऽ दे नांऽ बारै गल्ल कीती जा तां एह्दा नांऽ डुग्गर दे प्रसिद्व महाराजा प्रताप सिंह हुंदे नांऽ पर रक्खेआ गेदा ऐ। इस ग्रांऽ च बक्ख-बक्ख जातियें ते धर्में दे लोक आपूं- चें बड़े मेल जोल ते हिरख-समोध कन्नै रौंह्दे न। इत्थै उं'दे बक्खरे बक्खरे धार्मिक स्थान बी हैन। ओह् रोज इत्थै मत्था टेकियै, ग्रांऽ दी खुशहाली आस्तै मंगलकामना करदे न। 
  इस ग्रांऽ दी अपनी इक खास म्ह्ता ऐ। इत्थै भाद्रो म्हीने दी 8 तरीक गी बाबा तंत्र बैद जी दे नां पर बड़ा बड्डा मेला लगदा ऐ ते भंडारे दा आयोजन बी कीता जंदा ऐ। 8 तरीक कोला केईं रोज पैह्लें गै मेले च औने जाने आह्लें लोकें दी चैह्ल पैह्ल शुरू होई जंदी ऐ। इस दिन गुआंडी रियासतें ते आस्सै-पास्सै दे ग्राएं थमां ज्हारें दी गिनतरी च लोक बाबा जी दी समाधी उप्पर मत्था टेकने आस्तै औंदे न। बाबा तंत्र वैद जी जिं'दी समाधी ग्रांऽ च ऐ ओह् बड़े बड्डे संत हे। ओह् सप्प दे डंगने ते त्रिण कंडे दे पिड़ित लोकें दा इलाज करदे हे। उं'दा समां दोआपर युग दा हा। उं'दा आश्रम देह्रादून दे जंगले च हा। आश्रम च रेहियै ओह् पिड़ित लोकें दा इलाज करदे रेह् ओह् बी बगैर किश लैते दित्ते दे। उं'दा एह् कम्म पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलदा रेहा। 
  सन् 1957ई॰ दे दरान बाबा हुंदी पीढ़ी दा गै इक बोरिया ग्रांऽ ललयाना च आई बस्सेआ। इत्थै रेहियै ओह् सब्जी दा कम्म करन लगी पेआ। फ्ही उ'न्नै खाल्ली पेदी जमीना उप्पर मरूदें दे बाग लोआए। ओह्दा नांऽ जगत सिंह हां। इस ग्रांऽ गी उन्नै अपनी कर्म भूमी बनाई लेआ। इत्थै बी ओह् सप्प दे डंगे ते त्रिण कंडे दे पीढ़ित लोकें दी सेवा करना शुरू करी दित्ती। इस्सै दरान ग्रांऽ दे गै दो जागत गुलदेव राज ते रामदास उं'दी इस कला थमां बड़े प्रभावत होए। इस विद्या गी सिक्खने आस्तै उ'नें जगत सिंह हुंदे अग्गै आग्रह् कीता। जगत सिंह होरें उं'दे इस आग्रह् गी स्वीकार करियै उ'नें दौंने जागतें गी अपना चेला बनाई लेआ। जगत सिंह होरें चेले गुलदेव राज दे घर बाबा तंत्र वैद दी समाधी दी स्थापना कीती। पर, किश चिरें मगरा विधिवत तरिके कन्नै ग्रांऽ दे बिच्चो-बिच्च खुल्'ली जगह च बाबा जी दी समाधी दी स्थापना करबाई गेई। लगातार सत्त साल कठोर तप करने दे बाद जगत सिंह हुंदे कोला इ'नें दौंने जागतें गी एह्कड़ी विद्या हासल होई। 1968 कोला लेइयै अज्ज अपनी बृद्ध अवस्था च पुज्जने पर बी ज्हारां लोंके दा इलाज करा करदे न। ग्रांऽ दे दौंने मनुक्खें समाज सेवा आस्तै ते अग्गै इस कम्मै गी चलाने लेई ग्रांऽ दे होर जागतें गी बी इस विद्या दा ज्ञान दित्ता जेह्ड़े अज्ज ग्रांऽ च औने आह्ले सप्प दे डंगे ते त्रिण कंडे दे रोगी दा इलाज करदे न। इस ग्रांऽ दी खासियत एह् ऐ जे बाबा जी दे थान उप्पर पुज्जने आह्ला कसरी मनुक्ख कदें खाली हत्थ नेईं गेआ। 
  सप्प डंग दे मनुक्खै दा इलाज करने दा इं'दा अपना गै तरीका ऐ। शरीर दे जिस जगह पर सप्प लड़े दा होंदा ऐ, उत्थै एह् लोक बलेट कन्नै चीरा कराइयै अपने मूंह् कन्नै रोगी दे शरीर चा सारा जैह्र कड्ढी लैंदे न। उस थाह्रै पर बाबा जी दे थानै दा चिट्टा धागा ब'न्नी उड़दे न। ओह्दे बाद त्रै,चार फांडे च गै रोगी ठीक होई जंदा ऐ। पर, केईं बारी जैह्र इ'न्ना तेज होंदा ऐ जे जैह्र कड्ढने आह्ले दे मूंह् गी बी फालके तक पेई जंदे न। पर, एह् अपनी जान दी प्रवाह् कीते बगैर रोगी दा इलाज करदे न।  
 रोगी गी अपनी जान बचाने आस्तै आपंू बी किश परहेज करने पौंदे न। जि'यांः-
''खट्टा, मिट्ठा, दुद्ध¬-देही, अण्डा, मीट-मच्छी, नशा, शराब, तड़के आह्ली चीज, लून नेईं खाना, खट्ट उप्पर नेईं सोना, जि'न्ने तगर रोगी ठीक नेईं होऐ उन्ने तगर बाबे जी दे थान्नै पर मत्था तगर नेईं टेकना।''  
मरीज गी ठीक होने दे बाद सवाऽ मीटर चिट्टा कपड़ा ते इक नारयिल बाबा जी दे थान्नै उप्पर चाढ़ना पौंदा ऐ। बाबे दे चेले गी बी मीट मास शराब ते नशे कोला परहेज रक्खना पौंदा ऐ। जेह्ड़े चेले इ'नें चीजे दा परहेज नेईं करदे उं'दे कोल एह्कड़ी विद्या नेईं रौंह्दी। ग्रांऽ च बाबा जी दी समाधी कोल दिने ते रातीं बक्खरी-बक्खरी शिफ्ट च चेले मजूद रौंह्दे न तां जे औने आह्ले रोगी गी बगैर चिर लाए दे तौले कोला तौले इलाज कीता जाई सकै। इस्सै समाधी पर 1968 भाद्रो म्हीने जी अट्ठ तरीक गी भंडारे दी शुरूआत होई ही जेह्ड़ा अज्ज तगर चला करदा ऐ। भंडारे च मिट्ठे चैल बनाए जंदे न ते इत्थै औने आह्ले हर माह्नू दी आस्था ऐ जेह्डा इस प्रसाद गी चक्खी लैंदा ऐ उसी पूरा साल सप्प-कीड़ा छ्होई गै नेईं सकदा। ग्रांऽ दी इ'यै खासियत ग्रांऽ प्रताप सिंह पुरा (ललयाना) गी डुग्गर दे होरनें ग्राएं शा इक बक्खरी पंछान दोआंदी ऐ। 
सूचकः-
1 नांऽ- विहारी लाल, ग्रांऽ-प्रताप सिंह पुरा, उम्र-90 साल
2 नांऽ- हंस राज,  ग्रांऽ-उ'ऐ, उम्र-60 साल
3 नांऽ-देब राज,  ग्रांऽ-उ'ऐ, उम्र-65 साल
4 नांऽ-नरायन दास,  ग्रांऽ-उ'ऐ, उम्र-70 साल
5 नांऽ-चिमन लाल,  ग्रांऽ-उ'ऐ, उम्र-62 साल
6 नांऽ-मोन राम,  ग्रांऽ-उ'ऐ, उम्र-50 साल
7 नांऽ-गारा राम,  ग्रांऽ-उ'ऐ, उम्र-60 साल
8 नांऽ-दास राम,  ग्रांऽ-उ'ऐ, उम्र-70 साल
9 नांऽ-अमर चंद,  ग्रांऽ-उ'ऐ, उम्र-55 साल


मिली खुशबू चमन महका


डॉ. सुशील कुमार त्यागी 'अमित'


मिली खुशबू चमन महका, 
ये कैसी है बहार आयी


मिली खुशबू चमन महका, ये कैसी है बहार आयी।
न मैं समझा, न तुम समझे, कहाँ से ये फुहार आयी।।


हुआ रँगीन ये मौसम, हवा भी गा रही गाना,
जरा आना मेरे दिलवर, मेरे दिल से पुकार आयी।।


खिले मेरे हसीं नग़में, तो ग़ज़लें संग क्यों रोयीं,
यही मैं न समझ पाता, सदा गाती बयार आयी।।


तराना प्यार का छेड़ा, अलापा राग जीवन का,
हुआ पागल खुशी से मैं, तेरे स्वर से गुँजार आयी।


खुला अम्बर खुली धरती, बसी इनमें तेरी यादें,
कभी छुप-छुप कभी खुलकर, मेरे जीवन में हार आयी।


'अमित' नित गीत प्रीति के, सुनाता दुनिया वालों को,
लबों पे खुशबू की थिरकन, हृदय से ये गुहार आयी।। 


माखनलाल चतुर्वेदी : कठिन जीवन का सृजन-धर्म


डॉ. रजनी शर्मा



 'एक भारतीय आत्मा' माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म सन् 1889 में हुआ था। बाबई में जन्मे माखनलाल जी का जन्म का नाम मोहनलाल था। उनके पिता श्री नन्दलाल जी व्यवसाय से अध्यापक और स्वभाव से आधुनिक संस्कारों तथा सेवाभावी चरित्र के स्वामी थे। माखनलाल चतुर्वेदी को वैष्णव-संस्कार अपने पिता से ही प्राप्त हुए थे। माखनलाल चतुर्वेदी के जीवन पर उनकी माता जी का बहुत प्रभाव पड़ा था। उन्होंने अपनी माँ के विषय में स्वयं लिखा है -''मेरे जीवन की कोमलतर घड़ियों का आधार मेरी माँ है। मेरे छोटे से ऊँचे उठने में भी, फूला न समाने वाला तथा मेरी वेदना में व्याकुल हो उठने वाला, उस जैसा कोई नहीं।''1  माखनलाल चतुर्वेदी की माँ ममता, वात्सल्य, साहस, त्याग और मानव सुलभ आदर्श गुणों की प्रतिमूर्ति थी। माखनलाल जी को अपने पिता के साथ ही अपनी माँ से संकल्प-शक्ति, अन्याय का विरोध करने की भावना, संघर्ष से प्रेम और विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस जैसे गुण प्राप्त हुए थे।
 माखनलाल जी अपने प्रारम्भिक जीवन में बहुत ही नटखट प्रवृत्ति के थे। बालसुलभ नटखट स्वभाव के कारण उनके पड़ोसी भी परेशान रहते थे। इस कारण से उन्हें प्रायः ही घर और विद्यालय, दोनों स्थानों पर प्रताड़ित किया जाता था, परन्तु उनके नटखट स्वभाव में कभी भी कमी नहीं आती थी। कभी पड़ौसियों को परेशान करते तो कभी साथियों को और कभी-कभी तो विद्यालय के चपरासी तक को न छोड़ते थे। बाबई में जन्मे चतुर्वेदी जी अपने बाल्य काल में ही छिदगाँव चले गये थे। ''बाबई के बाद माखनलाल अपने पिता के साथ छिदगाँव चला गया। हरदा स्टेशन से 10 मील दूर होशंगाबाद की दिशा में यह एक गाँव है और इस नाम से रेलवे स्टेशन भी है।''2 छिदगाँव की निमग्नता ने माखनलाल को अत्यधिक प्रभावित किया और यहीं पर उनके बाल्य काल का अधिकांश समय व्यतीत हुआ, ''माखनलाल चतुर्वेदी का सम्पूर्ण बाल्य काल और अधिकांश जीवन होशंगाबाद जिले की रहस्यमयी निमग्नता में डूबा रहा है।''3
 माखनलाल जी को अपने प्रारम्भिक जीवन में प्रकृति का भी रमणीय रूप देखने का भरपूर अवसर प्राप्त हुआ, क्योंकि होशंगाबाद पर्वत शृंखलाओं से आवृत्त, नदियों की कल-कल ध्वनि से ओतप्रोत एवं सुरम्य जल धारा से आच्छादित सुन्दर भूभाग है। नर्मदा नदी की जल धारा ने तो उसे और भी धन्य कर दिया है। स्वयं चतुर्वेदी ही नहीं वरन् उनका सम्पूर्ण परिवार भी अपने गाँव बाबई में, जहाँ अपने विद्यादि गुणों के लिए प्रसिद्ध था, वहीं दूसरी ओर अपने दृढ़ संकल्पों के लिए भी जाना जाता था। ये सभी गुण चतुर्वेदी जी को भी विरासत में मिले थे इसलिए तो उनकी स्मरण-शक्ति अतुलनीय थी। उन्होंने स्वयं लिखा है -''हिन्दी की पहली क्लास की पाठ्य-पुस्तक के पाठ मुझे 69 वर्ष की उम्र में भी याद हैं।''4
 माखनलाल चतुर्वेदी जी की प्रारम्भिक शिक्षा उनके गाँव बाबई में ही हुई। पढ़ने में तीव्र बुदध् विद्यार्थी होने के साथ-साथ वे एक सफल अभिनयकर्ता भी थे। प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण हो जाने के पश्चात उन्हें पं0 बालभट्ट जी के पास संस्कृत का अध्ययन करने के लिए भेजा गया। कठोर स्वभाव के गुरु होने के कारण वे उनसे पढ़ने के लिए तैयार न थे। स्वभाव से विनम्र एवं कुशल शिक्षक उनके पिता नन्दलाल जी ने अपने पुत्र को अध्ययन के लिए नादनेर भेजा।  नादनेर की शिक्षा-पद्धति गुरुकुल प्रणाली की थी। वहाँ की प्रणाली में विद्यार्थी अनेक प्रकार के सेवा कार्य भी करते थे, जो माखनलाल जी को पसन्द न थे। वे इससे असन्तुष्ट रहते थे और यहीं पर उनके विद्रोह के स्वर भी फूट पड़ते थे। हिन्दी की पुस्तकें पढ़ने की प्रबल आकांक्षा रखने वाले चतुर्वेदी जी ने नादनेर में हिन्दी का प्रयोग मना होने पर भी लल्लूलाल द्वारा विरचित प्रेमसागर का अध्ययन कर ही डाला, परिणामस्वरूप पिटाई भी मिली। अपनी शंकाओं का समाधान ढूँढने और नए-नए तथ्यों की खोजों में तो वे सदा आगे रहते थे। उनमें कितनी ही खूबियाँ तो पिता की देन थीं। वे स्वयं लिखते हैं - ''चुटकुले, उपमा, छोटी कहानियाँ, मुहावरे और उक्तियाँ मेरे पास अधिकांश में अपने पिता जी की दी हुई हैं। वे जब गाँव में अपने किसी परिचित से बात करते, तब इन चीजों का उपयोग किया करते और कौतूहलवश लगातार सुनने के कारण वे मुझे याद रह जातीं।''5 
 माखनलाल जी चैदह वर्ष की आयु में ही अपने सुन्दर गौर वर्ण, सुन्दर नेत्रों, मुस्कराहट भरे अधरों, आभायुक्त शरीर और संभाषण से किसी को भी आकर्षित कर लेते थे। उनकी इन्हीं विशेषताओं से आकृष्ट बाबई के ही एक सज्जन ने अपनी नौ वर्षीया पुत्री ग्यारसीबाई से चतुर्वेदी जी का विवाह कर दिया। अभावों से भरे वैवाहिक जीवन व निरन्तर उपेक्षा के कारण पत्नी अस्वस्थ हो गयीं और यक्ष्मा रोग की चपेेट में आ जाने से अल्पायु में ही इन्हें सदा-सदा के लिए छोड़ कर परलोकवासी हो गयीं। पत्नी की मुत्यु के कारण इन्हें जीवन अंधकार भरी रात्रि के समान लक्षित हुआ। दूसरा विवाह न करने की बात से ही प्रकट होता है कि अभावग्रस्त वैवाहिक जीवन होने पर भी पत्नी के प्रति उनकी सच्ची आस्था व प्रेम का कोई अन्त नहीं था। 'भाई छोड़ो नही मुझे' शीर्षक गीत के माध्यम से उनकी पत्नी के शोक का एक अलग ही रूप परिलक्षित होता है।
 माखनलाल चतुर्वेदी खण्डवा के स्कूल में अध्यापक थे, जहाँ उन्हें गणित के अध्यापन में पुरस्कार दिया गया था। वहाँ वे सहायक प्रधानाध्यापक भी रहे। उन्हीं दिनों उनका लिखा नाटक सहायक शिक्षा निरीक्षक के समक्ष अभिनीत हुआ था। अध्यापक के रूप में उन्होंने समाज की प्रशंसा प्राप्त की और वे छात्रों के साथ ही अभिभावकों तथा साथी     अध्यापकों में भी लोकप्रिय हुए।
 पत्रकारिता से माखनलाल चतुर्वेदी का सम्बन्ध बहुत गहरा था। उन्होंने सन् 1908 में 'राष्ट्रीय आन्दोलन और बहिष्कार' विषय पर एक निबन्ध लिखा था। उन दिनों माधवराव सप्रे द्वारा ''हिन्दी केसरी''- नामक पत्र का प्रकाशन किया गया था। माखनलाल जी का निबन्ध इस पत्र में प्रकाशित हुआ और उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला। इसी प्रकार जब ''सुबोध सिंध'' साप्ताहिक में माखनलाल जी का ''शक्ति पूजा'' शीर्षक निबन्ध प्रकाशित हुआ तो उन्हें राजद्रोही घोषित किया गया। यह एक दूसरे प्रकार का पुरस्कार था। इस घटना ने उन्हें पत्रकारिता जगत से विमुख करने के बदले जीवन भर के लिए उससे जोड़ दिया। पत्रकारिता के साथ उनका यह गठबन्धन जीवनपर्यन्त चला। उन्होंने सन् 1913 में ''प्रभा'' नामक मासिक पत्र का सम्पादन कार्य प्रारम्भ किया। यह एक ऐसा पत्र था, जिसमें तत्कालीन परिस्थितियों के यथार्थ के साथ-साथ प्रचुर मात्रा में साहित्यिक सामग्री का प्रकाशन होता था। स्मरणीय है कि इसके प्रकाशन से कुछ ही वर्ष पहले सन् 1909 में जयशंकर प्रसाद ''इन्दु'' का प्रकाशन करा चुके थे। उधर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ''सरस्वती'' के माध्यम से साहित्य, समाज और और स्वतन्त्रता के लिए अभिनव प्रयास कर रहे थे। ''प्रभा'', ''सरस्वती'' और ''इन्दु'' मिश्रित परम्परा की पत्रिकाएँ थीं। माखनलाल चतुर्वेदी ने सन् 1920 में ''कर्मवीर'' का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह एक ऐसा पत्र था, जिससे भारत पर शासन करने वाली सम्पूर्ण ब्रिटिश सत्ता थर्राती थी। श्रीकांत जोशी ने एक प्रसंग में लिखा है -''माखनलाल चतुर्वेदी के सम्पादकत्व में विगत 30 वर्षों से निकलने वाला ''कर्मवीर'' उनकी आग्नेय पत्रकारिता का तपोवन है। रक्तस्नात दुनिया की भयावह परिस्थितियाँ चाहे अपना अभिशाप फैलाने के लिए हावी हो रही हांे, चाहे देश में मदान्ध अविवेक भारतीयता की हत्या करने पर उतारू हो, इस साप्ताहिक ने विगत 25 वर्षों से हमारे अन्तःकरण की पवित्रता की अत्यधिक सुरक्षा नियोजित की है। ''कर्मवीर'' भारतीय आत्मा की शीलवती कामधेनु बना हुआ विराट रूपिणी भरत माँ के मानस चक्षुओं, वह भी खुले हुए मानस चक्षु का दायित्व वहन कर रहा है। ''कर्मवीर'' का मनोमन्थन, क्षीण-बल, क्षीण-कोष कभी नहीं रहा।''6 कर्मवीर की शक्ति क्रान्तिकारी भावना और प्रखरता को तत्कालीन क्रान्तिकारियों ने अपनी प्रेरणा का स्रोत माना ही था और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने भी इसकी महानता को स्वीकार किया था। माखनलाल जी कर्मवीर के माध्यम से भारत की दासता को नष्ट करने का अभियान चला रहे थे। उन्होंने इस पत्र को जनता के हाथ का बड़ा शक्तिशाली हथियार बना डाला था। बदले में तत्कालीन साम्राज्यवादी सरकार उनसे बहुत नाराज हो गयी थी तथा हर सम्भव उपाय अपना कर उनका मार्ग रोक देना चाहती थी। माखनलाल जी भी कोई कम कुशल नहीं थे। वे अपना वास्तविक नाम छिपाकर ''एक भारतीय आत्मा'', ''एक नवयुवक'', ''श्री गोपाल'', ''श्री विश्व व्याप्त'', ''भक्त सन्तान'', आदि नामों से अंगे्रजी सरकार को ध्वस्त करने में लगे थे तथा जनता को जगाने वाले लेख लिखते थे। ''कर्मवीर'' पहले जबलपुर से प्रकाशित होता था। सन् 1925 में वह खण्डवा आ गया। वहाँ भी उसने अपना क्रान्तिकारी कार्य जारी रखा। माखनलाल चतुर्वेदी ने सन् 1923 में कानपुर से निकलने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ''प्रताप'' का भी सम्पादन किया। गणेश शंकर विद्यार्थी माखनलाल जी की पत्रकार प्रतिभा का लोहा मानते थे। वे उनकी क्रान्तिकारी गतिविधियों से भी परिचित थे। उस युग के इन दो महान पत्रकारों ने सम्पूर्ण हिन्दी पत्रकारिता को दिशा देने का कार्य किया। यह माखनलाल जी की पत्रकारिता का ही प्रभाव था कि उन्हें सन् 1927 में ''भरतपुर सम्पादक सम्मेलन'' और सन् 1934 में ''अखिल भारतीय पत्रकार परिषद्, काशी'' का अध्यक्ष चुना गया। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकार प्रतिभा की दृष्टि से लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, गणेश शंकर ''विद्यार्थी'', महर्षि अरविन्द जैसे महामानवों के समकक्ष थे। उन्होंने सच्चे अर्थों में पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नए क्रान्तिकारी युग का सूत्रपात किया।
 माखनलाल चतुर्वेदी का कार्य-क्षेत्र पत्रकारिता के साथ-साथ राजनीति भी था। यह उस समय की आवश्यकता थी। पराधीन देश के नागरिक के रूप में वे नितान्त असन्तुष्ट और क्षुब्ध रहते थे। उन्हें जिस विवशता ने पत्रकारिता के माध्यम से देश को जगाने के लिए बाध्य किया, उसी परतन्त्रता से जन्मी विवशता ने एक राजनीतिक कार्यकर्ता भी बनाया। उस काल में भारतीय राजनीति के क्षितिज पर महात्मा गाँधी का उदय हो चुका था। माखनलाल जी को भी अन्य अनेक लोगों की भाँति गाँधी जी ने अपनी ओर आकृष्ट किया। परिणाम यह हुआ कि वे कांग्रेस के सदस्य बन गए तथा इस दल द्वारा संचालित राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेकर स्वतन्त्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे। उनका कार्य था - राजनैतिक कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करना और परतन्त्रता के विरुद्ध जगह-जगह भाषण देना। इसी क्रम में जब उन्होंने सन् 1921 में बिलासपुर में भाषण दिया तो उससे चिढ़कर अंग्रेज सरकार ने उन्हें आठ माह का सश्रम कारावास सुनाया। 1923 में झण्डा-सत्याग्रह में उनकी सक्रिय भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही। 1930 में जंगल सत्याग्रह की सक्रिय भूमिका के लिए उन्हें एक वर्ष के कारावास का दण्ड सुनाया गया। जेल में रहते हुए उन्हें बहुत सी यातनाएँ भोगनी पड़ीं। उनकी ''कै़दी और कोकिल'' कविता उन सब यातनाओं का इतिहास है। यह कविता माखनलाल चतुर्वेदी के क्रान्तिकारी व्यक्तित्व और राजनैतिक समझ का उदाहरण भी है।  इसके माध्यम से उन्होंने दासता तथा जनता पर किए जाने वाले अत्याचारों का सजीव चित्रण किया है।
 ऊपर से ऐसा प्रतीत होता हेै कि माखनलाल चतुर्वेदी प्रारम्भ से ही गाँधी-मार्ग के अनुयायी थे, किन्तु यह एक अर्धसत्य है। वास्तविकता यह हैं कि चतुर्वेदी जी मूलतः क्रान्तिकारी प्रकृति के व्यक्ति थे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए चलाए जा रहे क्रान्तिकारी आन्दोलन से ही उनका हार्दिक जुड़ाव भी था। क्रान्ति के ये संस्कार उन्हें शिक्षा प्राप्त करते समय ही मिल गए थे। उनका क्रान्तिकारी युवकों से सम्पर्क हो गया था और वे उनके दल के सदस्य भी बन गए थे। डाॅं. चन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने माखनलाल चतुर्वेदी और क्रान्तिकारी तरुणों के सन्दर्भ में लिखा है -''इन तरुणों की पाठ्य-पुस्तक बंकिम चन्द्र चटर्जी की ''आनन्दमठ'' नामक पुस्तक थी। ये तरुण एक हाथ में पिस्तौल और दूसरे हाथ में गीता लेकर अपने कर्म-पथ पर अग्रसर थे। गीता उन्हें कर्म की भाषा और वाणी दे रही थी। ''आनन्दमठ'' उस वाणी और कर्म को दिशा दिखाने का काम कर रही थी।''7 उन दिनों चतुर्वेदी जी लोकमान्य तिलक से भी बहुत प्रभावित थे। उनके जीवन का एक ही लक्ष्य बन गया था - क्रान्ति करके इस देश को अंग्रेजों से मुक्त करना। वे आत्मा की नश्वरता का मन्त्र रटते हुए हाथ में पिस्तौल लेकर क्रान्ति अभियान में प्राणपण से सक्रिय रहते थे। आगे चलकर वे गाँधी जी के सम्पर्क में आए और उनके राजनैतिक कार्यक्रम के प्रति आकर्षित हुए। इतने पर भी उनका क्रान्तिकारी स्वभाव पूरी तरह परिवर्तित नहीं हुआ। जब भी अवसर मिला उन्होंने गाँधी जी की समझौते वाली नीति का विरोध किया। माखनलाल चतुर्वेदी का राजनैतिक-जीवन स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी चलता रहा। यह अलग बात है कि जिन नेताओं के हाथों में स्वतन्त्र भारत की बागडोर आई, उन्होंने उन्हें उनका स्वाभाविक प्राप्य नहीं दिया। फिर भी वे समझौता वादी नहीं बने।
 यह आश्चर्य का विषय है कि एक भारतीय आत्मा जैसी सजग विभूति की मृत्यु-तिथि के विषय में अनेक भ्रान्तियाँ प्रचलित हो गई। कुछ ने उनकी मृत्यु 30 जनवरी 1967 (हरिकृष्ण प्रेमी - आज के हिन्दी कवि एवं डाॅ. नगेन्द्र - भारतीय साहित्य कोश आदि) को घोषित की तो कुछ ने बहुत पीछे जाते हुए सन् 1956 (अरविन्द पाण्डे - हिन्दी के प्रमुख कवि: रचना और शिल्प)। दूसरी ओर इतिहास कुछ और ही कहता है। उपलब्ध सामग्री के अनुसार मध्य प्रदेश विधानसभा ने 21 फरवरी, 1968 को माखनलाल चतुर्वेदी को श्रद्धांजलि समर्पित की थी। इस घटना के आधार पर वे उसी वर्ष हमसे विदा हुए। गम्भीर अध्येताओं ने खोज करके उनकी मृत्यु-तिथि 30 जनवरी सन् 1968 घोषित की है। 
 माखनलाल चतुर्वेदी ने एक बार अपने मन की पीड़ा को प्रकट करते हुए कहा था - ''मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना है कि अपना घर हो और उसमें एक बाथ रूम हो। किराए के घर की भी कोई जिन्दगी है ? हर क्षण लगता रहता है कि कोई, जो हमसे भी बड़ा है और उसके हम किरायेदार हैं।''8 इस प्रसंग से माखनलाल चतुर्वेदी के जीवन संघर्ष का एक ऐसा संकेत मिलता है, जो उनके द्वारा किए जाने वाले सम्पूर्ण जीवन संघर्ष को समझने में सहायक हो सकता है। माखनलाल चतुर्वेदी मूलतः जिस बिन्दु से आगे बढ़े थे, वह बिन्दु ही स्वयं में संघर्ष का प्रतिरूप था। उन्हें जीवन की वास्तविकता को समझने से पहले ही वैवाहिक जीवन में आए घोर अभाव से उत्पन्न मानसिक संघर्ष को सहन करना पड़ा था। इसके बाद तो वे समाज और राष्ट्र से जुड़ते गये तथा उनका संघर्ष भी विस्तार पाता गया। चतुर्वेदी जी के जीवन और साहित्य का अध्ययन करने वाले विद्वानों ने उनके संघर्ष के विभिन्न पहलुओं को समझा और समझाया है। अध्ययेता मानते हैं कि ''वे रचनाकार और सैनिक दोनों थे। अंग्रेजों की गुलामी में फँसे कसमसाते हुए देश की वेदना को वाणी देने वाले निर्भीक रचनाकार सैनिक माखनलाल जी काल-कोठरी में भी अपनी हुंकार भरते हुए क्रूर शासन की चूलंे हिलाने का दम-खम रखते थे। अंग्रेजों के शोषण, दमन से पूरा देश सकते में आ गया था। ऐसी स्थिति में अंग्रेजों के रू-ब-रू  होकर बात की माखनलाल जी ने। माखनलाल जी के पास लाग-लपेट नहीं है। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का खुल्लम-खुल्ला विरोध किया। वस्तुतः उनकी रचना का उत्स तो परतन्त्र राष्ट्र की व्यथा-कथा से अप्रयास उच्छवासित हो उठा था, आदि कवि के शोकोच्छवास की तरह।''9 माखनलाल जी ने जो विशाल साहित्य रचा है, उसमें ''भारतवर्ष पर बल पूर्वक शासन करने वाले विदेशी शासकों के अत्याचारों का चित्रण और उनका विरोध विद्यमान है।''10  चतुर्वेदी जी पूरे ब्रिटिश साम्राज्यवाद से अपने आत्मबल के सहारे पर टकरा जाने का साहस रखते थे। उनका यह टकराव भी बहुआयामी होता था। साम्राज्यवाद इस देश की जनता की दासता का ही प्रतीक नहीं था, वह हमारी जातीय और सांस्कृतिक अवनति का प्रतीक भी था। इसीलिए माखनलाल चतुर्वेदी ने साम्राज्यवाद से संघर्ष को अपने राष्ट्रवाद का अभिन्न अंग बनाया। परिणामस्वरूप चतुर्वेदी जी का साम्राज्यवाद विरोध, राष्ट्रीय काव्य-धारा के विशाल फलक का अंग बना।11
 माखनलाल चतुर्वेदी के जीवन-संघर्ष का एक पक्ष सामन्तवाद से संघर्ष भी है। यह भी उनके राष्ट्रीय-संघर्ष का ही एक हिस्सा था। चतुर्वेदी जी मानते थे कि भारत की अवनति के मूल में  सामन्तवाद भी एक बड़ा कारण है, क्योंकि यह साम्राज्यवाद को टिकाए रखने के लिए एक मजबूत पाए का काम करता है। माखनलाल जी के साहित्य में संघर्ष के इस रूप को बड़ी आसानी से रेखांकित किया जा सकता है। ''माखनलाल जी के लेखन-कर्म पर मूल संवेदना का गहरा असर पड़ा है। उन्होंने विभिन्न स्तरों पर साम्राज्यवाद से संघर्ष करने के साथ ही उसके सामाजिक आधार भारतीय सामंतवाद से भी संघर्ष किया है।''12 चतुर्वेदी जी ने अपने पत्रकार जीवन में भी जो संघर्ष किया था, वह बहुआयामी था। परतन्त्रता का वह काल पत्रकारिता और अन्य प्रकार के राष्ट्रवादी लेखक के लिए कोई कम कष्टपूर्ण वैसे भी नहीं कहा जा सकता। माखनलाल जी के लिए तो उसका संकटपूर्ण होना सहज ही था। श्री कान्त जोशी के अनुसार - ''सन् 1913 से सन् 1945 तक की पत्रकारिता एक बड़ी जोखिम थी। इसमें भी सन् 1913 से सन् 1935 तक की पत्रकारिता तो बड़ी कष्टप्रद थी। माखनलाल जी को और उनके मकान को पुलिस और सी.आई.डी. की नजर सतत् घेरे रहती थी, परिणामतः कर्मवीर में लिखना तो दूर की बात थी, कर्मवीर के सम्पादक से किसी का सम्पर्क है, यह बात भी नोट हो जाती थी, लोग भयभीत रहते थे।''13 इतना होते हुए भी माखनलाल चतुर्वेदी ने अपना लक्ष्य और संकल्प नहीं छोड़ा। माखनलाल जी को अपने संघर्ष का भरपूर मूल्य भी चुकाना पड़ा। ''इसकी कीमत उनसे ब्रिटिश साम्राज्य ने ही नहीं वसूली, स्वतन्त्र भारत के शासकों ने भी पूरी कीमत वसूली। भारत स्वतन्त्र हुआ, माखनलाल जी के जीवन का एक सपना पूरा हुआ, किन्तु सत्ता के गलियारों पर अधिकार जमा लेने वाले लोगों ने उन्हें धकेल बाहर किया।''14 
 संघर्ष की इसी बहुआयामी पृष्ठभूमि ने एक भारतीय आत्मा के स्पृहणीय व्यक्तित्व का गठन भी किया। 20वीं शताब्दी के स्वनामधन्य लेखक अज्ञेय ने उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन इन शब्दों में किया है - ''उस युग में जब अधिकतर लेखक विखण्डित व्यक्तित्व वाले लेखक होने लगे थे, माखनलाल जी के अखण्डित व्यक्तित्व ने अपने समकालीनों के सामने एक आदर्श भी रखा, एक चुनौती भी खड़ी की। किसी भी देश, किसी भी समाज के लिए एक अखण्ड व्यक्तित्व एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।''15 डा. के. वनजा, माखनलाल जी के व्यक्तित्व के एक अन्य पक्ष का उद्घाटन करती हैं।'' वे उनके वाणी-कौशल पर  मुग्ध हैं और मानती हैं कि माखनलाल जी के व्यक्तित्व में उनकी वक्तृत्व-शैली का बहुत महत्व है। इसका कारण उनका अध्ययन, राजनैतिक संस्कार और स्वतन्त्रता आन्दोलन में निभायी गई भूमिका तो है ही उनके हास्य-विनोदपूर्ण जीवन संस्कार भी हैं। यह कहना सही प्रतीत होता है कि - ''निर्झरणी के समान प्रवाहमान उनकी वाणी में कहीं भी कोई रुकावट नहीं होती, किन्तु मर्यादा की सीमा को वह वाणी नहीं लाँघती है, भावपूर्ण उनका वक्तव्य कभी उपदेशात्मक नहीं है, बल्कि नर्म-विनोद, हल्का सा व्यंग्य, परिहासपूर्ण है, इनकी वाणी में सचमुच गद्य और पद्य का सरस मिश्रण हुआ है।''16 माखनलाल चतुर्वेदी के व्यक्तित्व का एक पक्ष उनकी रचनाशीलता से भी जुड़ा हुआ है। रचनाकार के व्यक्तित्व में मात्र साहित्य-सृजन का गुण ही नहीं होता, बल्कि सृजन-परम्परा को प्रोत्साहित करने, आगे बढ़ाने और परिपुष्ट बनाने का गुण भी होता है। यह गुण किसी साहित्यकार के आन्तरिक वैशिष्ट्य और सौन्दर्य को प्रकट करता है। चतुर्वेदी जी कवि होने के साथ-साथ एक श्रेष्ठ गद्यकार भी थे। उनकी गद्य रचनाओं में उनका व्यक्तित्व यत्र-तत्र बिखरा पड़ा है। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी गद्य-लेखन क्षमता से सम्पूर्ण गद्य परम्परा को दिशा भी प्रदान की है। इसे उनकी साहित्य को देन भी कहा जा सकता है।17 गद्य के साथ चतुर्वेदी जी का व्यक्तित्व अपनी पूरी भव्यता में कविता में प्रकट हुआ है। उनकी कविता पढ़ कर यह पता चलता है कि उन्होंने अपनी कविताओं के शब्द-शब्द में अपना क्रान्तिकारी व्यक्तित्व उडेला है और उनके माध्यम से राष्ट्र-सेवी पीढ़ियों को प्रभावित किया है। समीक्षकों के अनुसार कविताओं में चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व का जाज्वल्यमान व्यक्तित्व प्रकट हुआ है। वहाँ वे विचारक हैं, चिन्तक हैं, बलिदानी हैं, त्यागी हैं, साहसी हैं और एक सम्पूर्ण राष्ट्रवादी हैं। उनकी कविताएँ सच्चे अर्थों में मन्त्रोच्चार की सी अनुभूति देती हैं।18 चतुर्वेदी जी दुर्धर्ष व्यक्तित्व के स्वामी थे। समझौतावादी नीति से उन्हें घृणा थी। यह विशेषता आजन्म उनके व्यक्तित्व का अंग बनी रही, यहाँ तक कि कांग्रेस की उत्तरवर्ती गतिविधियों में भी उन्होंने समझौतावाद को स्वीकार नहीं किया।19
 माखनलाल चतुर्वेदी के व्यक्तित्व का एक गुण - अन्य लोगों के व्यक्तित्व को सही-सही समझना भी था। वे अपने सम्पर्क में आये लोगों के व्यक्तित्व में पूरी पैठ बनाते थे और समय आने पर अपने अनुभव सहित उसकी प्रस्तुति करते थे। यह कार्य बहुत कठिन और यह गुण बहुत विरल होता है। कोई व्यक्ति व्यापक जीवन-बोध और सूक्ष्मग्राही दृष्टि के अभाव में इसे प्राप्त नहीें कर सकता। माखनलाल जी ने इस गुण को अपने व्यक्तित्व का अंग बनाया था। इसका उदाहरण उनके द्वारा लिखे संस्मरण हैं। उनकी रचनावली में इस प्रसंग का उल्लेख इन शब्दों में हुआ है  - ''एक भी संस्मरण ऐसा नहीं, जिसमें अभीष्ट व्यक्ति का समूचा व्यक्तित्व मुखर न हुआ हो। व्यक्ति के कार्य-क्षेत्र के अनुसार परिस्थिति विश्लेषण, शारीरिक-मानसिक गठन, प्रभाव आदि का विवरण प्रस्तुत करने में वह सफल इतिहासकार कवि की दृष्टि का सम्मिलित प्रयत्न दृष्टिगोचर होता है।''20
 माखनलाल चतुर्वेदी के जीवन-संघर्ष और उनके व्यक्तित्व से जुड़कर ही उनकी विचारधारा का अध्ययन किया जा सकता है। उनके विषय में यह जानना बहुत आवश्यक है कि ''उनका चिन्तन निठल्लों का मानस-खाद्य कभी नहीं बना। वे शौर्य-पराक्रम की भाषा में चिन्तन करते रहे हैं और मैंने देखा, इस समय उनके संघर्षशील चेतना के पौरुष दृप्त तेज से युक्त आर्य मुख पर बस दो ही सत्य अवशेष रह गए हैं, जीवन कर्म भेदी दृष्टि और उसके नीचे श्वेत श्मश्रु।''21 चतुर्वेदी जी की जीवन गाथा के अनुसार जब वे क्रान्तिकारी गतिविधियों में विश्वास प्रकट करके क्रान्तिकारी दल से जुड़े थे और देश की स्वतन्त्रता के लिए मर-मिटने का संकल्प करके बलिपंथी बने थे, उस समय उन्हें अन्य वस्तुओं के साथ गीता की एक प्रति भी भेंट की गयी थी। इसका उनकी विचारधारा पर अमिट प्रभाव पड़ा। उससे कुछ पहले वे बंकिम के आनन्द मठ के सम्पर्क में आ ही चुके थे। उस उपन्यास कृति ने उन्हें दृढ़ संकल्प और चुनौतीपूर्ण घड़ी में दूरदर्शितापूर्ण निर्णय लेने की प्रेरणा दी थी। इन घटनाओं का माखनलाल जी की विचारधारा से महत्वपूर्ण रिश्ता है। चतुर्वेदी जी के संस्कार बचपन से ही वैष्णव-संस्कार थे। उनके माता-पिता द्वारा प्रदŸा इन संस्कारों ने भी उनके विचारों को संबल प्रदान किया। इतना होने पर भी यह उनकी जन्मजात क्रान्तिकारिता ही थी, जिसने उन्हें वैष्णव रूढ़ियों से भी बचाया। उनके विषय में कहा जाता है कि ''माखनलाल जी वैचारिक-दार्शनिक दृष्टि से एक विशिष्ट प्रकार की वैष्णवी विचारधारा के प्रणेता थे। यह परम्परागत वैष्णवी विचारधारा से सर्वथा भिन्न है। इसे नव वैष्णववाद कह सकते हैं।''22 माखनलाल जी का यह नववैष्णववाद देश-हित को सर्वोपरि मानता है। यही कारण है कि वे धर्म परायण तो थे, किन्तु धार्मिक कर्मकाण्ड के पीछे अन्धे होकर दौड़ने वाले नहीं। उनकी वैष्णवी विचारधारा ने उनके राष्ट्रवाद का पूरी तरह पोषण किया था।23 माखनलाल जी की विचारधारा का निकट से  अध्ययन करने पर यह भी स्पष्ट होता है कि वे अपने विद्रोही स्वभाव के कारण धर्म, राष्ट्र, जाति, संस्कृति आदि के सम्बन्ध में पहले कुछ सीमाएँ खींचते थे और फिर उनका अतिक्रमण भी करते थे। यह एक विस्मयकारी तथ्य है कि चतुर्वेदी जी की वैष्णव-चेतना और उनके क्रान्तिकारी दर्शन के मध्य निरन्तर एक सन्तुलन बना रहा। उनके जीवन में भी और उनके साहित्य में भी।24 इससे चतुर्वेदी जी के वैचारिक क्षितिज की निस्सीमता भी प्रकट होती है। उन्होंने जीवन भर धर्मान्धता का विरोध किया। भारतीय लेखकों में इस दृष्टि से गणेश शंकर विद्यार्थी उनके समकक्ष कहे जा सकते हैं। ये दोनों महापुरुष धर्म को मानव के लिए आवश्यक मानते थे, किन्तु किसी व्यक्ति अथवा वर्ग विशेष के स्वार्थों की पूर्ति के लिए उसके प्रयोग के कट्टर विरोधी थे।
 यह माखनलाल चतुर्वेदी के प्रौढ़ विचार-दर्शन का ही परिणाम है कि उनमें जातिवाद विरोध के साथ-साथ व्यापक मानवतावाद का भी विकास हुआ। इसी के साथ वे सम्पूर्ण कट्टरतावाद और पुरातनपंथी प्रवृŸिा के विरोधी हो गये। माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने गहन-अनुभव के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि भारतवर्ष में हिन्दुओं और मुसलमानों के मध्य जो विरोध भाव है, उसके लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद तो जिम्मेदार है ही, किन्तु इन दोनों जातियों की पुरातनपंथी प्रवृŸिा भी कम जिम्मेदार नहीं है। अपने इसी विचार के आधार पर उन्होंने पुरातन रूढ़ियों और प्रतिगामी प्रवृŸिायों पर भारी प्रहार किये हैं।25 चतुर्वेदी जी के पास एक अखण्ड और ठोस सामाजिक दर्शन भी था। इसका पता नारियों के सम्बन्ध में उनके दृष्टिकोण से चलता है। आधुनिक काल के आगमन के परिणामस्वरूप शताब्दियों से दबी-कुचली नारियों के प्रति सामाजिक जागरण का प्रारम्भ हुआ। स्वयं पुरुषों ने यह सोचना शुरु किया कि जीवन के निर्माण में नारी की महती भूमिका है; अतः उसे उसके सामाजिक अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता। माखनलाल चतुर्वेदी ऐसा सोचने वालों में सबसे आगे थे। वे बहुत प्रबल रूप में यह प्रश्न उठाते हैं कि नारी जाति स्व निर्णय अथवा स्वतन्त्रतापूर्वक विचार करने का अधिकार क्यों नहीं प्राप्त कर सकती ? फिर इसके उŸार में इस सत्य का उद्घाटन भी करते हैं कि नारी की इस दशा के लिए पुरुष जाति का स्वार्थी स्वभाव ही जिम्मेदार है। उन्होंने माना कि नारी समाज के संदर्भ में पुरुष जाति अपने स्वार्थ की सीमा का उल्लंघन कर गई है।26
 माखनलाल चतुर्वेदी की विचारधारा का एक पक्ष आर्थिक चिन्तन से भी जुड़ा हुआ है। इसके दो रूप हैं - एक उद्योगों के सम्बन्ध में उनका चिन्तन और दो, किसानों की समस्याओं के सम्बन्ध में उनकी दृष्टि। माखनलाल चतुर्वेदी उद्योग-धन्धों के विकास और देश की आर्थिक उन्नति पर बल देते थे, किन्तु वे यह कभी नहीं चाहते थे कि उद्योगों के नाम पर बड़े उद्योगों का साम्राज्य स्थापित हो जाए और छोटे उद्योगों का गला घोट दिया जाय। उन्होंने हमेशा लघु उद्योगों का पक्ष लिया। उससे जहाँ उनके पूंजीवाद-विरोध का पता चलता है,27 वहींे भारतीय अर्थव्यवस्था सम्बन्धी उनकी गहन गम्भीर जानकारी भी प्रकट होती है। माखनलाल चतुर्वेदी ने हमेशा शोषक और शासक का विरोध किया। स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करते समय भी और स्वतन्त्रता के बाद भी। इसके पीछे भी जनता की आर्थिक समस्याएँ ही मुख्य कारण हैं। वे भारत की कृषि व्यवस्था तथा उसकी समस्याओं को अच्छी तरह जानते थे। उन्हें पता था कि कृषक ही इस देश की आर्थिक रीढ़ तथा अर्थ व्यवस्था के केन्द्र में है। अंग्रेजी साम्राज्यवाद इसी कृषक समाज का शोषण और भारत की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का विनाश कर रहा था। माखनलाल चतुर्वेदी ने इसका विरोध किया। उनका ''कर्मवीर'' किसान जनता को शोषण से बचने के लिए उत्साहित करता था और कृषक समाज में व्याप्त अशिक्षा को समाप्त करने का अभियान चलाता था।  यदि ध्यान से देखें, तो यह सब भी एक भारतीय आत्मा के राष्ट्रवादी दृष्टिकोण और विचारधारा का ही अनिवार्य अंग था।
 ''माखनलाल जी का रचनाकाल भी 1905-06 से 1965-66 के लगभग तक साठ-इकसठ वर्षों के विस्तार में फैला हुआ है।28 यही वह समय था, जब माखनलाल जी का सीधा सम्बन्ध क्रान्तिकारियों से बना रहा। 1916 के लगभग माखनलाल जी गाँधी जी के भी प्रभाव में आए, परन्तु यहाँ भी क्रान्तिकारियों से प्राप्त मत, सलाह आदि बराबर बने रहे। माखनलाल जी का साहित्य कभी भी ठीक समय पर प्रकाशित नहीं हुआ। उनकी प्रथम प्रकाशित कृति है - कृष्णार्जुन युद्ध(1918)। यह एक सफल और अत्यधिक लोकप्रिय नाटक है। 1916 में जबलपुर के अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अवसर पर इसकी प्रथम प्रस्तुति हुई थी, किन्तु उसके बाद 1943 तक यानी लगभग पच्चीस वर्षों तक माखनलाल जी की कोई किताब न आ सकी। यह वह समय था जब वे अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के हरिद्वार अधिवेशन के सभापति चुने गए थे। उनकी उम्र 54 वर्ष के आसपास थी। उनकी द्वितीय कृति थी - ''हिमकिरीटिनी''।29 ''उनकी विख्यात कृति ''साहित्य देवता'' का प्रकाशन 1943 में हुआ था। प्रकाशन के साथ सम्पूर्ण हिन्दी जगत में ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय साहित्य जगत में इसने तहलका मचा दिया।''30 इससे बड़ी और कौन सी बात हो सकती थी, जो माखनलाल जी को गद्यकारों की उच्च शृंखला से जोड़ पाती। ''माखनलाल जी केवल कालजयी कवि ही नहीं, वरन् प्रखर, जागरूक, मनस्वी पत्रकार भी थे। ब्रिटिश दासता और देशी रियासतों के राजाओं के दमन के जमाने में पत्र निकालना अत्यन्त कठिन कार्य था। लेकिन चुनौती के रूप में यह कार्य स्वीकार कर आजीवन पत्रकारिता के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया।''31 अंग्रेजी शासन के समय पत्रकारिता का जीवन कोई आसान कार्य नहीं था और इस कार्य की परिणति के लिए किसी वीर योद्धा के समान ही लौह-लेखनी वाले माखनलाल जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन  पत्रकारिता पर न्योछावर कर दिया। ''पत्रकारिता में माखनलाल जी की प्रतिभा अलौकिक है। इस उदात्त और गौरवपूर्ण व्यवसाय के बारे में उनके जो विचार हैं और दृष्टि है, वह भी सचमुच अद्भुत है। बड़ा अचरज होता है कि इतना सारा ज्ञान यह आदमी कहाँ से पा गया ? लेकिन इसका भी मुझे रंज रहा है कि इस ज्ञान से और अनुभव से कमायी जाने वाली क्रान्तिकारी शक्ति की ओर ''दादा'' ने कभी विशेष ध्यान नहीं दिया। दादा यदि निष्ठा और लगन के साथ उसी क्षेत्र में जुटे रहते तो तिलक, अरविन्द की लौह-लेखनी की तरह अपनी लेखनी से हिन्दी भाषी संसार के सबसे जबरदस्त, सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि बन जाते।''32 काव्य के क्षेत्र में  माखनलाल चतुर्वेदी ने हिमकिरीटिनी के साथ ही हिमतरंगिणी, वेणुलो गूँजे धरा, माता, युगचरण, मरण ज्वार, बीजुरी काजल आँज रही जैसी श्रेष्ठ काव्य रचनाओं के माध्यम से प्रखर राष्ट्रवादी भाव धारा का नव्य-प्रणयन किया। डाॅ. चन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने उनके काव्य को निराले पथ का संधानक कहा है। उन्हीं के शब्दों में - ''माखनलाल जी की कविता भावबोध और संवेदना के धरातल पर अपनी निजी विशेषताओं का परिचय देती हुई एक निराले पथ का संधान करती है।''33 इसी सृजन-संसार में माखनलाल चतुर्वेदी का वैचारिक जगत भी व्याप्त है।


सन्दर्भ:
1. माखनलाल चतुर्वेदी: यात्रा पुरुष, सम्पादन एवं संकलनकर्ता: श्रीकान्त जोशी, पृ. - 11.2. माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली, सम्पादन - श्रीकान्त जोशी, प्रथम     संस्करण 1983, पृ. 25.
3. वही, पृ. 23.
4. वही, भाग - 1, पृ. 45.
5. वही, भाग - 1, पृ. 47.
6. वही, भाग - 1, पृ. 21.
7. माखनलाल चतुर्वेदी और स्वाधीनता आन्दोलन, डाॅ. चन्द्रभानु प्रसाद सिंह, प्रथम संस्करण  1983, पृ. 39.
8. माखनलाल चतुर्वेदी: यात्रा पुरुष, सम्पादन एवं संकलनकर्ता: श्रीकान्त जोशी, पृ. 14.
9. माखनलाल चतुर्वेदी और स्वाधीनता आन्दोलन, डाॅ. चन्द्रभानु प्रसाद सिंह, प्रथम संस्करण  1983, पृ. 55.
10. ''माखनलाल जी की राष्ट्रीय कविताओं में ब्रिटिश साम्राज्य के अत्याचार और उसे ललकारने की जैसी अभिव्यक्ति हुई है, वैसी उस युग में किसी दूसरे हिन्दी कवि की रचनाओं में नहीं हुई है।'' वही, पृ. 57.
11. ''वे पापी ब्रिटिश शासन पर निर्भय होकर अप्रिय उपजाते रहे। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ बहुआयामी संघर्ष किया। हिन्दी की राष्ट्रीय काव्यधारा में यह बहु आयामी संघर्ष एक विशाल स्थान रखता है।'' वही, पृ. 57.
12. वही, पृ. 103.
13. माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली, सम्पादन - श्रीकान्त जोशी, प्रथम संस्करण 1983.
14. ''स्वतन्त्रता संग्राम के अन्तर्गत माखनलाल जी के सक्रिय जीवन की समाप्ति तो मृत्युपर्यन्त नहीं हो सकी, पर उस युग की जो सत्ताकांक्षी गतिविधि हुई थी, उसमें वे एक तरह से पीछे ढकेल दिए गए।'' - डाॅ. चन्द्रभानु प्रसाद सिंह, माखनलाल     चतुर्वेदी और स्वाधीनता आन्दोलन, पृ. 48.
15. माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली, सम्पादन - श्रीकान्त जोशी, प्रथम संस्करण 1983.
16. माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं में मानव मूल्यों की अवधारणा, डाॅ. के. वनजा, सं. 1995, पृ. 28.
17. वही, पृ. 22.
18. वही, पृ. 18.
19. यह व्यक्तित्व कांग्रेस के विरोधी दल ''स्वतन्त्र कांग्रेस'' की तरफ से पूर्व में कांग्रेस का  विरोध कर चुका था। माखनलाल जी ने केन्द्रीय नेता की बात को अस्वीकार     कर दिया। -माखनलाल चतुर्वेदी और स्वाधीनता आन्दोलन डाॅ. चन्द्रभानु प्रसाद     सिंह, प्रथम संस्करण 1983, पृ. 48.
20. माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली, भाग-5.
21. वही भाग-1 जीवन, पृ. 28.
22. माखनलाल चतुर्वेदी और स्वाधीनता आन्दोलन डाॅ0 चन्द्रभानु प्रसाद सिंह प्रथम संस्करण 1983, पृ. 136.
23. माखनलाल चतुर्वेदी और स्वाधीनता आन्दोलन डाॅ0 चन्द्रभानु प्रसाद सिंह प्रथम संस्करण 1983, पृ. 135.
24. माखनलाल जी अपनी सीमाएँ खींचते हैं और फिर अतिक्रांत भी करते है, वैष्णवता और क्रान्तिकारिता के बीच एक सुखद संतुलन स्थापित करते हैं। --वही, पृ. 140.
25. माखनलाल जी हिन्दू-मुस्लिम विभेद के संदर्भ में सिर्फ साम्राज्यवादी शासन को ही दोषी नहीं ठहराते वरन् वे इसके लिए इन दोनों कौमों की पुरातन पंथी प्रवृत्ति     पर भी प्रहार करते हैं। -वही, पृ. 96.
26. वही, पृ. 114.
27. माखनलाल जी ने देशी उद्योग और व्यवसाय की उन्नति पर बल दिया है, लेकिन हर समय बड़े और छोटे उद्यमियों के फर्क को भी ध्यान में रखा, उन्होंने हर समय छोटे उद्यमियों की वकालत की और बड़े उद्यमियों को आड़े हाथों लिया। यह उनकी पूँजीवाद विरोधी दृष्टि का परिचायक है। -वही, पृ. 84.
28. माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली, सम्पादक श्रीकान्त जोशी, 1983.
29. वही,
30. वही,
31. माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं में मानव मूल्यों की अवधारणा डाॅ. के. वनजा जुलाई  1995, पृ. 21.
32. मध्य प्रदेश संदेश, स्व. अनन्त गोपाल पृ. 88 (माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं में मानव मूल्यों की अवधारणा से उद्धृत पृ. 22)।
33. माखनलाल चतुर्वेदी और स्वाधीनता आन्दोलन, डाॅ. चन्द्रभानु प्रसाद सिंह, प्रथम संस्करण 1983, पृ. 76.


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