Thursday, November 7, 2019

कृषि में नीली-हरी काई का जैव-उर्वरक के रूप में उपयोग


डाॅ. मुकेश कुमार
एसोसिएट प्रोफेसर, वनस्पतिविज्ञान विभाग,
साहू जैन काॅलेज, नजीबाबाद- 246763 उ.प्र.



भारत एक कृषि प्रधान देश है यहाँ की अधिकांश जनसंख्या का मुख्य भोजन चावल है। धान का उत्पादन करने वाले प्रदेशों में उत्तर प्रदेश का अग्रगण्य स्थान है। यहाँ लगभग 56.15 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान का उत्पादन किया जाता है। परंतु औसत उपज मात्र 18.27 कुंतल प्रति हेक्टेयर ही है जबकि अन्य प्रदेशों जैसे पंजाब, तमिलनाडु एवं हरियाणा में औसत उपज क्रमशः 35.10, 30.92 एवं 27.34 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। उपज में बढोत्तरी के लिए उन्नत बीजों के साथ-साथ उर्वरकों की समुचित मात्रा की भी आवश्यकता होती है। रासायनिक उर्वरक आयातित पैट्रोलियम पदार्थों से बनते हैं जिसके कारण ऐसे उर्वरकों के दाम दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं और यह लघु एवं सीमांत कृषकों की क्रय क्षमता के बाहर होते जा रहे हैं। अतः ऐसे किसान धान की भरपूर उपज प्राप्त करने में असमर्थ रह जाते हैं। साथ ही दूसरा मुख्य कारण यह है कि पानी भरे धान के खेतों में डाली गई रासायनिक नत्रजन उर्वरक का मात्र 35 प्रतिशत भाग ही धान के नवोद्भिद उपयोग कर पाते हैं, शेष नत्रजन उर्वरक बेकार चला जाता है। इस परिस्थिति में नीली-हरी काई जैव-उर्वरक ;बीजीएद्ध का प्रयोग एक विकल्प ही नहीं अपितु वरदान है। नीली-हरी काई जैव-उर्वरक को 12.5 किग्रा./है. की मात्रा 30 किग्रा./नत्रजन प्रति हेक्टेयर देती है। जहाँ पर रासायनिक नत्रजन उर्वरकों का उपयोग आवश्यक मात्रा में संभव नहीं हो पाता, वहाँ शैवालीकरण द्वारा 25-30 किग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर का लाभ फसल को मिलता है। भूमि सुधार के लिए भी नीली-हरी काई जैव उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। इनके प्रयोग से भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है तथा मिट्टी की भौतिक स्थिति में भी सुधार होता है। मिट्टी में नत्रजन तथा फास्फोरस की मात्रा में वृद्धि होने होती है। अम्लीय भूमि में लौहे आदि तत्वों की विषालुता कम होती है। कार्बनिक तत्वों की मात्रा में वृद्धि से मिट्टी की जल-धारण क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
नीली-हरी काई मानव जाति के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। यह प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष दोनों ही रूप से हमारे लिए लाभकर हैं। नीली-हरी काई  का एक विशेष गुण है कि वे वातावरण की नत्रजन को नाइट्रेट में बदल देते हैं जिसका उपभोग पादप इनके जीवित रहते अथवा इनकी मृत्यु के पश्चात भूमि से प्राप्त कर लेते हैं। धान के खेतों में तो अलग से नत्रजन खाद देने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। इस प्रकार नीली-हरी काई की समुचित उपस्थिति के कारण किसान भाई काफी धन बचा पाते हैं। नीली-हरी काई जैव-उर्वरक कई दृष्टियों से उपयोगी हैं। यह रासायनिक खाद के मुकाबले कम कीमत पर उपलब्ध है। इनके प्रयोग से कोई प्रदूषण नहीं होता अतः यह पर्यावरण, भूमि की उपजाऊ शक्ति तथा मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए घातक नहीं हैं। रासायनिक उर्वरकों के लगातार प्रयोग से भूमि क्षारीय होकर ऊसर हो जाती है तथा इस मिट्टी में उगाए गए अनाजों में कई तत्वों की कमी हो जाती है। अतः इन अनाजों को खाद्य रूप में प्रयोग करने से हमारे शरीर में रोगों के प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। अतः विशेषज्ञ किसानों को जैव उर्वरकों का प्रयोग करने की सलाह देते हैं।
राजस्थान की सांभर लवण झील में एनाबीनाप्सिस तथा स्पाइरुलाइना जैसे शैवाल प्राकृतिक रूप में उगते हैं। वहाँ के किसान इन्हें खाद के रूप में प्रयोग करते हैं। यह काई मिट्टी की उर्वरता को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। उदाहरणार्थ इनके कोशिकाबाह्य उत्पाद मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्म जीवों के लिए कार्बन और नाइट्रोजन के स्रोत हैं। यह सूक्ष्मजीवी मिट्टी में आवश्यक तत्वों जैसे नत्रजन, सल्फर, फाॅस्फोरस आदि का अनुरक्षण करते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ शैवालों के कोशिकाबाह्य उत्पाद अकार्बनिक तथा कार्बनिक आयनों को ऐसे रूपों में संचित करते हैं, जिन्हें पौधे सरलतापूर्वक उपयोग कर सकें। 
देश में हरित क्रांति के लिए खेती में अधिक निवेश और ऊर्जा का उपयोग सुझाया गया है, जिसमें उन्नत बीजों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, सिंचाई, मशीनों आदि का उपयोग करना पड़ता है। परंतु हरित क्रांति ने पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव भी पैदा किया है। यह स्थिति भूमि, पानी और जैव-संसाधनों पर स्पष्टतः देखे जा सकते हैं। पानी के भराव और लवणीकरण के कारण भूमि उपजाऊ नहीं रही और फसल कटाई के बाद की हानियाँ भी चिंता का कारण है। इसलिए भारत भी जैविक खेती को बढ़ावा दे रहा है। कई राज्यों में 38 लाख  हैक्टेयर भूमि पर अधिक मूल्यवान फसलें ;जैसे मसाले, फल, सब्जियाँ, दूध आदिद्ध पैदा की जा रही हैं और मुर्गी पालन भी किया जा रहा है। इन उत्पादों की बाजार में 25-30 प्रतिशत अधिक कीमत मिलती है। पिछले एक वर्ष में भारत ने इन उत्पादों को अमेरिका, जापान तथा यूरोपीय देशों को निर्यात कर 780 करोड़ डाॅलर विदेशी मुद्रा अर्जित की है। आजकल कुछ देश ;अमेरिका, कनाड़ा, पौलेंड आदिद्ध रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बिना उगाए गए जैविक खाद्य पदार्थ को बढ़ावा दे रहे हैं। यह उत्पाद पौष्टिक होने के साथ-साथ अधिक स्वादिष्ट भी होते हैं। जैविक फल और सब्जियों में रासायनिक उर्वरकों से उगाई गई फल-सब्जियों की अपेक्षा 40 प्रतिशत अधिक एंटी-आॅक्सीडेंट विद्यमान होते हैं। वहाँ इन उत्पादों की गुणवत्ता एक एजेंसी से प्रमाणित कराने की आवश्यकता होती है।
जैविक खेती से पर्यावरण को कोई हानि नहीं होती है और यह भूमि की उर्वराशक्ति को भी बनाए रखती है। इनकी लागत अपेक्षाकृत कम होती है, जिससे गरीब किसानों की आमदनी बढ़ने लगी है और ग्रामीण गरीबी में कमी होने की आशा है। पंजाब में, जैविक खेती किसानों के लिए एक वरदान है, क्योंकि इसमें आने वाली कम लागत के कारण उन्हें कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती और घरेलू गोबर की खाद के उपयोग से ही काम चल जाता है। केरल में उपजाऊ खेती के 20 प्रतिशत भाग पर जैविक खेती हो रही है और वहीं जैव-उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। 
आज खेती में नत्रजन की खपत अधिक ;लगभग 100 किग्रा. प्रति हैक्टेयरद्ध होती है। नत्रजन की वर्तमान आवश्यकता कृत्रिम उर्वरकों से पूरी होती है। प्रति वर्ष इनका उपयोग अंधाधुंध बढ़ रहा है, साथ ही इसका एक बड़ा भाग आयात से पूरा किया जाता है। यह उर्वरक बहुत महँगे भी हैं। इनके उत्पादन में ऊर्जा भी अधिक लगती है। इसलिए ऊर्जा की कमी के समय से इस बात पर ध्यान दिया गया है कि वायुमंडल की नत्रजन को जैविक तरीके से सीधे ही उपयोग किया जाए। वर्तमान में भारतीय कृषि में 10,000 टन से ज्यादा जैव-उर्वरकों का उपयोग हो रहा है। सामान्य उपयोग में आ रहे जैव-उर्वरकों में राइजोबियम एजेटोबैक्टर नामक जीवाणुओं की प्रजातियाँ तथा नीली-हरी काई हैं। वैसे तो यह शैवाल भूमि में प्राकृतिक रूप से विद्यमान होते हैं किंतु जैव-उर्वरक के रूप में प्रयोग करने के लिए इन्हें संबंधित खेतों में अलग से भी डालने की आवश्यकता होती है ताकि इनकी संख्या में तेजी से वृद्धि हो सके। नीली-हरी काई सामान्यतः तालाबों और धान के खेतों के रुके हुए पानी की सतह पर उगती हैं। इनकी अच्छी किस्में अलग करके उन्हें बड़ी मात्रा में व्यापारिक स्तर पर उगाया जा रहा है ताकि अनेक फसलों में उपयोग किया जा सके। एजोस्पारिलम आधारित उर्वरक भी आजकल उपयोग किए जा रहे हैं। इन्होंने अच्छे परिणाम दिए हैं और भविष्य में और भी अच्छी संभावनाएं है। इनके उपयोग से अनाज की पैदावार में बढ़ोत्तरी होती है और 20-40 किग्रा. नत्रजन प्रति हैक्टेयर की बचत होती है। सहजीवी नत्रजन स्थिरीकरण पद्धति में जीवाश्म ईंधन के स्थान पर प्रकाश-संश्लेषण से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग होता है। इस क्रम में वायुमंडल की नत्रजन अमोनिया में परिवर्तित की जाती है। इस कार्य में कुछ पौधों में उपस्थित जैविक उत्प्रेरक अथवा प्राकृतिक तौर पर भूमि में पाए जाने वाले जीवाणु और नीली-हरी काई सहायता करते हैं। जैविक तंत्र में विकरों के नियमन करने वाले जीवों के जीन पहचाने जा चुके हैं। साथ ही ऐसे प्रयास भी किए जा रहे हैं कि यह जीन दलहन फसलों में प्रवेश कर जाएं। गेहूँ जैसी महत्वपूर्ण फसलों में नीली-हरी काई से सहसंबंध बढ़ाकर नाइट्रोजन स्थिरीकरण शुरू करवाने में संसार भर के वैज्ञानिक दिलचस्पी ले रहे हैं। 
आजकल नीली-हरी काई को व्यापारिक स्तर पर उगाकर, सुखाकर, पैकिटों में जैव-उर्वरक की तरह बेचा जा रहा है। इसका वार्षिक उत्पादन लगभग 500 टन है। पांच प्रतिशत नील-हरित शैवाल युक्त मिट्टी जैव-उर्वरक के रूप में उपयोग की जाती है। यह मृदा में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा में वृद्धि करती हैं जिससे मृदा की उर्वरता और भी बढ़ जाती है। नीली-हरी काई का अतिरिक्त लाभ यह है कि इसके उपयोग से लवणीय मृदाओं की लवणीयता का ह्रास होता है। धान की कृषि में यह विशेषतः लाभदायक है, क्योंकि वहाँ इसे अपनी सतत वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं। इन शैवालों का गेहूँ के खेतों में उपयोग नहीं किया जा सकता है क्योंकि गेहूं की फसल के लिए अपेक्षाकृत कम पानी के आवश्यकता होती है। इसमें धान की तरह पानी को भरा नहीं रख सकते हैं। फिर भी इस जैव-उर्वरक का दोहन ;विशेषकर प्रतिकूल परिस्थितियों के लिएद्ध शैवालों की अनुकूल किस्म के विकास पर निर्भर करेगा। कृषि वैज्ञानिक इन कठिनाईयों को दूर करने के लिए लगातार अनुसंधान कर रहे हैं और कृषि का दूरगामी भविष्य इन प्रयासों की सफलता पर निर्भर करता है क्योंकि यह रसायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करके पुनः प्रकृति पर निर्भर होकर आगे बढ़ना सिखाते हैं। 
संदर्भ
1. कुमार मुकेश 2002. बायोडायवर्सिटी आॅफ साइनोफाईसी आॅफ दी सब-हिमालयन बेल्ट, मेजर प्रोजेक्ट फाइनल रिपोर्ट, यू.जी.सी. नई दिल्ली 
2. ड्रीम-2047, विज्ञान प्रसार ;2017द्ध, कुतुब इंस्टिट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली। 
3. देसिकाचारी टी.वी. 1959. सायनोफाईटा, आई.सी.ए.आर., नई दिल्ली। 
4. सिंह आर.एन. 1961. रोल आॅफ ब्लू ग्रीन एल्गी इन दी नाइट्रोजन इकोनोमी आॅफ इंडियन एग्रीकल्चर, आई.सी.ए.आर., नई दिल्ली।
5. वनस्पतिविज्ञान शब्द-संग्रह, 1997. वैज्ञानिक तथा तकनीकी आयोग, नई दिल्ली।


ग्रामीण भारत: समस्याएं और भी बहुत हैं


डाॅ. नरेन्द्र पाल सिंह


एसोसिएट प्रोफेसर, वाणिज्य विभाग, 
साहू जैन काॅलेज नजीबाबाद उ.प्र. 246763
ई-मेल: drnps62@gmail.com



भारतीय कृषि संबंधी समस्याएं एवं समाधान


भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है और आर्थिक विकास की ओर अग्रसर होते हुए भी यहाँ गरीबों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है। आजादी के बाद से देश का संतुलित विकास करने तथा भारतीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से आर्थिक विकास की नीति को अपनाया है। भारत की अधिकांश जनसंख्या की आजीविका का साधन खेती है तथा देश की कार्यशील जनसंख्या का 52 प्रतिशत भाग कृषि पर निर्भर है, जिनमें 31.7 प्रतिशत कृषक के रूप में तथा शेष मजदूर के रूप में खेती में कार्यरत है, देश की कुल जनसंख्या का 72.2 प्रतिशत भाग गाँव में वास करता हैं, जिनका मुख्य व्यवसाय खेती ही है हमारे यहाँ कुल कृषि भूमि का लगभग 66 प्रतिशत भाग खाद्यान्न फसलों में तथा शेष 34 प्रतिशत भाग व्यापारिक फसलों के काम में लिया जाता है, देश में जनसंख्या की अधिकता के कारण कृषि जोतों का आकार निरंतर घटता जा रहा है, यहाँ की 80 प्रतिशत जोते दो हेक्टेयर या इससे भी कम है और कुल जोतों का औसत आकार 1.4 हेक्टेयर है जो अन्य देशों की तुलना में बहुत ही कम है। भारत में आधुनिक कृषि तकनीकि उपलब्ध होने के बावजूद जोतों का आकार छोटा होने के कारण, उसका पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता की दर भी नीची रहती है। भारत में जहाँ एक हेक्टेयर भूमि में 2806 किग्रा गेहूँ पैदा होता है, वहीं ब्रिटेन में 7770 किग्रा गेहूँ पैदा होता है। आजादी के 67 साल बीतने के बाद भी मात्र कुल कृषि भूमि का 40 प्रतिशत भाग ही सिंचित क्षेत्र है जबकि 60 प्रतिशत भाग मानसून पर निर्भर है, यदि रोजगार की दृष्टि से देखें तो सभी किसानों व कृषि श्रमिकों को पूरे साल भर रोजगार सुविधायें उपलब्ध नहीं हो पाती और किसान लगभग 150 व श्रमिक 270 दिन तक बेकार रहते हैं, इसीलिए कृषि के क्षेत्र में अदृश्य बेरोजगारी देखने को मिलती है, यहाँ कृषि जोत बहुत छोटी होने के कारण किसान केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही कृषि उत्पादन कर पाता है और विपणन हेतु बहुत कम मात्रा में अधिक्य उपलब्ध होता है जिससे उसकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं हो पाती और वह कृषि में पूंजीगत साधनों और कृषि उपकरणों का उपयोग भी समुचित रूप से नहीं कर पाता। इन सब के बावजूद राष्ट्रीय आय में कृषि एवं उससे संबंधित क्षेत्र का योगदान 20 प्रतिशत है। भारतीय कृषि, जनसंख्या के आधे से अधिक भाग को, प्रत्यक्ष रूप से रोजगार दे रही है साथ ही राष्ट्रीय आय में भी पांचवें हिस्से का योगदान कर रही है। कृषि, उद्योगों को कच्चे माल के रूप में आपूर्ति कर, उनको आधार प्रदान करती है। खाद्यान्नों की आवश्यकताओं की अधिकांश पूर्ति भारतीय कृषि के द्वारा ही की जा रही है तथा अतिरिक्त खाद्यान्न को निर्यात कर सरकार के राजस्व में भी योगदान करती है। इन सब के बावजूद भी भारतीय कृषि क्षेत्र में अनेकों समस्याएं आज भी विद्यमान हैं, जिनमें प्रमुख निम्न हैं।
- आजादी के दशकों बाद भी हम कृषि क्षेत्र के लिए आधारभूत ढाँचा तैयार नहीं कर पाए हैं, वर्षा-जल का उचित संरक्षण नहीं हो रहा है, जिस कारण हम जल के महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत का दोहन नहीं कर पा रहे हैं, अधिकांश गाँव अभी भी पक्की सड़कों से नहीं जुड़ सके हैं, जिस कारण किसानों के समस्त क्रियाकलाप एक छोटे से क्षेत्र में ही सीमित रह गए हैं।
- भारत में कृषि क्षेत्र में विकास की बाधा का दूसरा बड़ा कारण यह है कि हमारे गाँव अभी भी मूलभूत आवश्यकताओं की कमी से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य, भोजन, आवास एवं शिक्षा जैसी आवश्यक आवश्यकताओं का स्तर बहुत नीचा है। अधिकांश किसान आज भी परंपरागत स्थितियों का अनुसरण किए हुए हैं, ऐसी परिस्थितियों में ऊँची उत्पादकता प्राप्त करना दिवास्वपन ही होगा। यहाँ शिक्षा का अर्थ, महज़ औपचारिक शिक्षा से नहीं वरन् किसान तक नवीन विचार तथा नवीन तकनीक पहुँचे और वह उनको खुले दिल से स्वीकार करने के लिए तैयार हो, यही शिक्षा का असली उद्देश्य है, किंतु हमारी योजनाएं इस दिशा में पूर्ण सफल नहीं हो पायी हैं।
- भारतीय कृषि की सबसे प्रमुख समस्या उत्पादन की अधिक लागत है, सिंचाई के लिए पानी दर, रासायनिक खादों के मूल्य, भूमिकर में मूल्यों की अपेक्षा काफी वृद्धि हुई है, जिस कारण उत्पादन लागत निरंतर बढ़ी है, जहाँ तक कृषि में पूँजीगत लागत का प्रश्न है, जोतों के छोटा होने के कारण उत्पादन के अनेक आधुनिक यंत्रों का पूर्ण दोहन नहीं हो पा रहा है, इसमें ट्रैक्टर, ट्यूबवैल, कीटनाशक छिड़कने के यंत्र, बुवाई एवं कटाई की आधुनिक मशीने सभी शामिल हैं। इनके लिए बैंक से ऋण तो आसानी से मिल जाता है किंतु उसके मूल एवं ब्याज की लागत भूमि की उपज में जुड़ जाती है और किसान की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। छोटी जोतों में पूर्ण एवं आधुनिक यांत्रिकीकरण संभव नहीं है और महंगे कृषि-यंत्र, मात्र कुछ बड़े किसानों द्वारा ही उपयोग में लाये जा रहे हैं।
- हमारे देश की एक बड़ी समस्या यह भी है कि हमारे किसान अनुगामी नहीं हैं। अशिक्षा एवं दोशपूर्ण नीतियों के कारण अनुसंधानों का लाभ अन्तिम सिरे तक नहीं पहुँचा है सामान्य एवं छोटे किसान इन अनुसंधानों के लाभ से वंचित रहे हैं तथा बड़े किसानों ने इन अनुसंधानों का लाभ उठाकर अपनी स्थिति को बेहतर किया है, जबकि छोटे एवं सीमान्त किसान अभी भी पुरानी तकनीक पर ही कार्य करने को विवश हैं, जिससे इनकी उत्पादन लागत मानकों से बहुत अधिक है। 
- भारतीय किसान आज भी कर्ज़ में डूबे रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महाजनों एवं साहूकारों की शोषण-नीति के कारण किसान ऋण से मुक्त नहीं हो पाते, जबकि सरकार एवं बैंकों द्वारा ऋण के क्षेत्र में काफी सराहनीय प्रयास किए हैं किंतु इनका फ़ायदा बड़े किसान ही उठाते हैं जबकि छोटे एवं सीमांत किसान इससे वंचित रह जाते हैं और वे भूमि-सुधार, और यंत्रीकरण आदि में पर्याप्त पूँजी लगाने में असमर्थ रहते हैं।
- कृषि में लगने वाले उपादान, यथा- बीज, खाद, यंत्र, आदि लगातार महंगे होते जा रहे हैं और सरकार द्वारा भी अनुदानों में निरंतर कमी की जा रही है, जिसका बोझ सीधे-सीधे किसानों पर पड़ रहा है। 
- किसानो द्वारा अनेक क्षेत्रों में आज भी जानकारी के अभाव में वर्ष में मात्र एक अथवा दो फसलें ही उगायी जा रही हैं, जबकि आधुनिकीकरण के इस युग में बहु-फ़सली खेती का दौर है। 
- भारतीय किसान आज भी फ़सल मिलते ही उसको बेचने के लिए विवश है क्योंकि फ़सलों के भंडारण की समस्या अभी भी बनी हुई है। किसान के सामने अपनी फ़सल का भण्डारण न कर पाने की समस्या के कारण फसल आते ही उसको बाज़ार में लाना उसकी मजबूरी होती है, जिस कारण फ़सल आते ही उसका मूल्य गिर जाता है और किसान अपनी फ़सल का उचित मूल्य नहीं लें पाते।
- किसानों के समक्ष एक बड़ी समस्या उनके लिए धन की आवश्यकता है। किसानों को अपने विभिन्न कार्य, मात्र फ़सल से प्राप्त आय से ही पूरे करने होते हैं, जबकि उन्हें बचत नहीं हो पाती और वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विभिन्न स्रोतों से धन उधार लेते रहते हैं जिसका भुगतान फ़सल आने पर उन्हें करना होता है, अतः फ़सल आते ही उसे बेचना, उनकी मजबूरी है। 
- भारत में कृषि वस्तुओं के क्रय विक्रय के लिए संगठित एवं सुव्यवस्थित बाज़ार का अभाव रहा है। अतः किसान, कृषि कार्यों में व्यस्तता के कारण, अपनी उपज को मंडियों में ले जाने के बजाय गाँव में ही साहूकार, महाजनों एवं दुकानदारों को ओने-पोने भाव पर ही बेचता है। 
- हमारे किसानों को बाज़ार के बारे में सही जानकारी एवं अनुमान नहीं हो पाता है। अतः वे सही फ़सल के उत्पादन के बारे में फैसला करने में चूक कर जाते हैं। प्रायः देखा गया है कि यदि एक वर्ष किसी फ़सल के मूल्य में वृद्धि होती है, तो अगले वर्ष अधिकांश किसान उसी फ़सल को पैदा करते हैं, जिस कारण अगले वर्ष उस फ़सल का उत्पादन, बाज़ार माँग की अपेक्षा बहुत अधिक हो जाता है, परिणामस्वरूप उस वस्तु का विक्रय मूल्य घट जाता है और किसान फिर हानि उठाते हैं।
- हमारे किसान आज भी पारंपरिक फसलों की ही खेती कर रहे हैं। वह अभी तक नए उत्पादों को जानकारी के अभाव में, उनका उत्पादन करने में सक्षम नहीं हो रहे हैं। ये किसान लाभकारी फ़सलें, जैसे- फल, सब्जी, औषधीय एवं मसालों की खेती नहीं कर पा रहे हैं, जो पारंपरिक फसलों के मूल्य की तुलना में अधिक आय देने वाली होती हैं।
- हमारे छोटे एवं सीमान्त किसान, शिक्षा एवं जानकारी के अभाव में अपनी फ़सल के विक्रय के समय पूरा मोल भाव नहीं कर पाते और ये ही वे किसान होते हैं, जिनको धन की तुरन्त आवश्यकता होती है और वे अपनी फ़सल शीघ्र बेचने के लिए बाध्य होते हैं। परिणामस्वरूप उनको अपनी फ़सल का मूल्य भी कम मिलता है। 
- जो किसान ऋण लिए रहते हैं, उन पर बैंक, साहूकार एवं महाजन अपना ऋण एवं किस्त वसूलने के लिए फसल आते ही दबाव बनाना प्रारंभ कर देते हैं। अतः किसान फ़सल आते ही उसे बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
- अधिकांश लघु एवं सीमान्त किसानों के पास वर्ष भर के लिए काम नहीं होता है। वे वर्ष के चार से आठ माह तक बेरोज़गार रहते हैं, तथा इस समय के सदुपयोग की कोई भी योजना उनके पास नहीं होती है। 
- भारत की कृषि मानसून एवं प्रकृति पर निर्भर है। वर्शा कभी अधिक तो कभी कम हो जाती है, यहाँ की मिट्टी में कहीं नाइट्रोजन की कमी, तो कहीं भूमि का कटाव, तथा कहीं पानी का भराव आदि देखने को मिलता है, जो कृषि उपज को प्रभावित करते हैं।
- भारत में कृषि की एक प्रमुख समस्या फसलों को कीड़े-मकौड़ों व रोगों से सुरक्षा न कर पाना भी है। भारत में कुल खाद्यान्नों का 16 प्रतिशत इन कीड़ों व रोगों से नष्ट हो जाता है। 
उपरोक्त सभी समस्याओं का प्रभाव यह है कि भारतीय किसान, ग़रीबी के दुश्चक्र में फँसा हुआ है, जिसमें से छूट पाना उसके लिए संभव नहीं हो पा रहा है। सरकारी स्तर पर किए जा रहे प्रयासों को यदि देखा जाय तो ये राजनैतिक अधिक प्रतीत होते है तथा इनसे किसानों की भलाई बहुत ही कम हुई है। किसान इन समस्याओं को अपनी अगली पीढ़ी को भी दे रहे हैं, जिस कारण से अभी लंबे समय तक किसानों का इस दुश्चक्र से बाहर निकलना संभव नहीं दिख रहा है। 
कृषि के क्षेत्र में उपरोक्त समस्याओं को देखते हुए सरकार द्वारा समय-समय पर कृषि उत्पादन बढ़ाने एवं देश का विकास करने हेतु निम्न कदम उठाए गए हैं।
- सरकार द्वारा कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना की गई है, ताकि अधिक उपज देने वाले बीज तैयार कर, इन्हें समुचित रूप से किसानों के मध्य वितरित किया जा सके। नई पौध, प्रजातियों के विकास हेतु अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय बीज-नीति 2002 बनाई गई है। 
- कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने हेतु रासायनिक खादों का प्रयोग भी तेजी से बढ़ा है, जिसके लिए भिन्न-भिन्न स्थानों पर रासायनिक खाद-कारखाने, भारतीय खाद निगम व अन्य संस्थाओं द्वारा खोले गए हैं।
- सिंचाई सुविधाओं को बढ़ाने के लिए लघु, मध्यम व बड़ी सिंचाई परियोजनायें शुरू की गई हंै। विभिन्न क्षेत्रों में सिंचाई हेतु सरकारी नलकूपों का निर्माण भी कराया गया है। 
- फसलों को रोग एवं कीड़े-मकौड़ों से बचाने हेतु 14 केंद्रीय फ़सल संरक्षण केंद्रों की स्थापना की गई हैं।
- सरकार द्वारा तकनीकी व्यक्तियों में व्यावसायिक साहस की क्षमता को विकसित करने के उद्देश्य से कृषि सेवा केंद्र स्थापित किए गए है, जो किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।
- सरकार द्वारा हरित क्रान्ति के अंतर्गत बहुफ़सली कार्यक्रम को अपनाया गया है। वर्तमान में सरकार द्वारा 57 अग्रगामी परियोजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें दो या तीन फसलों को पैदा करने से संबंधित प्रयोग एवं प्रदर्शन किए जाते हैं तथा किसानों को नवीन तकनीक को समझाने तथा उनको कार्यरूप देने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई है। 
- कृषि भूमि का उपविभाजन व अपखंडन होने से किसानों के छोटे-छोटे व बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर करने के लिए चकबंदी कार्यक्रम लागू किया गया है। वर्ष 2011 तक लगभग 1739.01 लाख एकड़ भूमि में चकबंदी की जा चुकी है। 
- कृषि यंत्रों, ट्रैक्टरों तथा अन्य उपकरणों के प्रयोग को किसानों के बीच लोकप्रिय बनाने के प्रयास सरकार द्वारा किए गए हैं, जिसके लिए किसानों को सहकारी समितियों, ब्लाक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, भूमि विकास बैंक तथा अन्य बैंकों के माध्यम से सस्ती दर पर ऋण किसान क्रेडिट कार्ड तथा अन्य योजनाओं के माध्यम से उपलब्ध कराये जा रहे हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों को अपनी शाखायें खोलने के लिए भी निर्देशित किया गया है। 
- कृषि उपज के मूल्यों में स्थिरता लाने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की स्थापना सरकार द्वारा की गई है जो कृषि उपज मूल्यों के निर्धारण में सरकार को समय-समय पर सुझाव देता है। 
- सरकार द्वारा कृषि भूमि के विकास के लिए भूमि सर्वेक्षण कर इसको समतल बनाने, ढलान देने, कटान रोकने तथा सीढ़ीदार खेत बनाने आदि के प्रबंध किए गए है तथा वैज्ञानिक ढंग से खेती करने के गुरों को भी किसानों को बताया जाता है, जिसके लिए टेलीफोन के टोल फ्री नंबर पर किसान अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं।
- कृषि क्षेत्र को बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा ग्रामीण विद्युतीकरण निगम की स्थापना की गई है, जहाँ 1950-51 में केवल तीन हजार गाँवों को बिजली मिलती थी, वहीं आज 90 प्रतिशत गाँवों का विद्युतीकरण किया जा चुका है। 
- सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में जोतों को अधिक छोटा होने से रोकने के लिए संबंधित कानून में संशोधन किए गए हैं तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों द्वारा अन्य जाति के लोगों को भूमि हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाया गया है। 
- कृषि अनुसंधान एवं पशु पालन विकास हेतु अनेक कृषि एवं पशु पालन अनुसंधान केंद्र तथा विश्वविद्यालय खोले गए हैं।
कृषि क्षेत्र की समस्याओं एवं सरकारी प्रयासों का विवेचन करने से स्पष्ट होता है कि कृषि क्षेत्र की उन्नति, सरकारी प्रयासों या कम दर पर प्रदत्त ऋणों के द्वारा संभव नहीं है। जब तक किसान की उत्पादन क्षमता का विकास नहीं होगा, तब तक किसी भी सकारात्मक परिणाम की आशा नहीं की जा सकती है। ऐसी परिस्थिति में सरकार को भी कुछ अन्य उपायों को अपनाने की जरूरत है, ताकि उक्त समस्याओं का निस्तारण किया जा सके। कृषि क्षेत्र की  कुछ समस्याओं का निस्तारण केंद्र सरकार के अधीन है और कुछ का निस्तारण राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, अतः आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र एवं राज्य सरकार के बीच समन्वय हो और दोनों सरकारें मिलकर ही कुछ ठोस प्रयास करें। अतः कृषि समस्याओं के संबंध में निम्न सुझाव लाभकारी हो सकते हैं।
- देश में लघु एवं सीमांत किसानों की स्थिति सर्वाधिक शोचनीय हैं क्योंकि साधनों के अभाव में ना तो वे नई तकनीक का उपयोग कर सकते हैं और न ही आधुनिक कृषि यंत्रीकरण का। अतः सरकार को चाहिए कि वह योजना बनाते समय प्रयास करे कि ऐसे किसानों को परती पड़ी भूमि आवंटित कर दी जाय, ताकि वे लघु एवं सीमान्त कृषक की सीमाओं से बाहर आ सकें। एक प्रयास यह भी किया जा सकता है कि ये किसान अनुबंधित खेती, सहकारी अथवा सामूहिक कृषि या स्वयं सहायता समूह के माध्यम से कृषि जोतो का आकार बड़ा बनाकर समुचित सुविधाओं एवं यान्त्रिकीकरण का लाभ उठा सकें।
- वैसे तो फसल बीमा की योजना हमारे देश में लागू कर दी गई है किंतु यह अभी भी सच्चे अर्थों में पूर्णतः क्रियान्वित नहीं हो पायी है। छोटे एवं सीमान्त किसानों तथा भूमिहीन मजदूरों के लिए, इसके प्रीमियम का भुगतान सरकार द्वारा वहन किया जा सकता है। यदि किसान की फ़सल ख़राब होती है तो फ़सल बीमा धारक को इतना न्यूनतम भुगतान अवश्य किया जाय कि वह अपने परिवार का गुजारा कर सके अन्यथा की स्थिति में उसे धनराशि के स्थान पर खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जा सकती है। - बैंकों द्वारा कृषि ऋणों के लिए प्रतिभूति एवं मार्जिन संबंधी नियमों को सरल बनाया जाना चाहिए। यदि बैंकों द्वारा ऋण के प्रति, भूमि बंधक करने में छूट दी जाय तो इससे ऋण लेने की लागत भी गिर जाएगी और किसान भी अधिक ऋण प्राप्त कर सकेंगे, जो पहले अधिक मार्जिन संबंधी आवश्यकताओं के कारण ऋण प्राप्त करने में अक्षम थे।
- यदि किसान प्राकृतिक आपदा जैसे सूखा, बाढ़, फसलों में बीमारी आदि आने पर ऋण की किस्त नहीं चुका पाते तथा जल्दी-जल्दी एक से अधिक बार प्राकृतिक आपदा का शिकार हो गए है उनके पुराने ऋणो को पुनर्निर्धारित कर साथ में नया )ण भी बैकों एवं सरकार द्वारा दिया जाना चाहिए।
- यदि किसान द्वारा पूर्व में किन्हीं कारणों से ऋण न चुकाने की स्थिति में समझौता प्रक्रिया द्वारा खाता बंद कराया गया हो तो ऐसे किसानों को भी पुनः नए ऋण प्रदान किए जाने चाहिए क्योंकि ऐसे किसानों के ऋण आवेदन-पत्रों को निरस्त कर दिया जाता हैं।
- छोटे एवं सीमान्त किसानों को ऋण की एक सीमा तक ब्याज दर में छूट दी जानी चाहिए। वैसे तो सरकार द्वारा किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से यह योजना चलाई गई है किंतु देखने में आया है कि इस योजना का लाभ भी बड़े किसानों द्वारा ही उठाया जा रहा है। जिन छोटे किसानों को इस योजना के अंतर्गत लाभ मिला है किंतु चीनी मिलों द्वारा उनके गन्ने का भुगतान नहीं किया गया है, तो वे किसान या तो अधिक ब्याज देने के लिए बाध्य हुए हैं या फिर बैंक अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा कुछ अतिरिक्त पैसा लेकर उनके ऋण खातों को परिवर्तित कर दिया गया है अतः इस प्रवृत्ति पर रोक लगाई जानी चाहिए।
- कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि आदान जैसे-बीज, खाद, कीटनाशक दवाई आदि को उचित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में ग्राम पंचायत के माध्यम से सरकार द्वारा उचित व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि उसका लाभ आखिरी कड़ी तक पहुँच सके।
- कृषि में पर्याप्त विनियोग को प्रोत्साहित करने के लिए यह भी आवश्यक है कि कृषि मूल्यों में उतार-चढ़ाव को रोका जाय तथा फ़सल बुवाई से पहले ही सरकार उन मूल्यों की घोशणा अवश्य करे, जिस पर तैयार फ़सल सरकार द्वारा अथवा बाजार में खरीदी जा सके।
- छोटे एवं सीमान्त किसानों द्वारा अपनी भूमि का पूर्ण उपयोग करने के लिए एक विकल्प अनुबंधित खेती के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है, इससे किसानों को धन के साथ-साथ नयी तकनीक की जानकारी एवं रोजगार भी उपलब्ध हो जाएंगे।
- खेती की जमीन का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने हेतु किसानों द्वारा मिश्रित एवं गहन खेती की जानी चाहिए। फ़सलों के साथ-साथ पशुपालन, डेयरी एवं सब्जियों आदि का उगाना तथा कृषि आधारित सहायक उद्योगों को भी विकसित किया जाना चाहिए।
- मानसून पर कृषि की निर्भरता को कम करने तथा दोहरी फ़सले उगाने के लिए सिंचाई सुविधाओं का विकास किया जाना चाहिए, साथ ही जहाँ-जहाँ बाढ़ की समस्या है, वहाँ बाढ़ नियंत्रण की व्यवस्था भी की जाय।
- सरकार द्वारा किसानों के प्रशिक्षण की विशेष व्यवस्था की जाय ताकि वे कृषि की नवीनतम तकनीक से परिचित हो सकंे और नवीनतम अनुसंधानों का लाभ उठा सकंे। ग्राम्य विकास विभाग इस दिशा में सार्थक सिद्ध हो सकता है। 
- सरकार द्वारा किसानों को उनकी फ़सल के बदले में समर्थन मूल्य का भुगतान करने के साथ-साथ उन्हें एक फसल बांड भी जारी किया जा सकता है, जिसका विक्रय किसान एक वर्ष की अवधि में कभी भी कर सकते हैं। बांड का मूल्य फसल के समर्थन मूल्य से जब अधिक हो तब किसान अपने बांड को भुनाकर शेष धनराशि प्राप्त कर सकता है। ये बांड एक प्रकार से कृषक की तरलता के साथ-साथ फ़सल का बेहतर मूल्य दिलाने में सक्षम हो सकते हैं।
मुख्य रूप से हमें यह सोचना है कि जब तक हम अपने किसानों में उत्पादन एवं क्रय क्षमता का सृजन नहीं करेंगे तब तक उनका उत्थान संभव नहीं है। कृषि हमारे देश में केवल जीवन-यापन का साधन या उद्योग धंधा ही नहीं है बल्कि अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है। खेती को सर्वाधिक प्राथमिकता देने की जरूरत है अन्यथा देश का पूर्ण विकास संभव नहीं है। सरकार को कृषि क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी कार्य पद्धति में परिवर्तन करना होगा, तभी हम, देश एवं किसानों का भला कर कृषि संबंधी समस्याओं से निजात पा सकेंगे और देश को विकास की राह पर ले जाने में सफ़ल हो सकेंगे।



भुगतान संकट से उभरता चीनी उद्योग
भारतवर्ष को गन्ने और चीनी के मूल स्थान के रूप में देखा जाता है, जोदुनिया में ब्राजील के बाद चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। अर्थव्यवस्था में भी भारत के चीनी उद्योग ने अनेक उपलब्धियाँ हासिल की हैं। भारत में यह उद्योग बहुत विकसित है और देश की समस्त आबादी इसकी उपभोक्ता है, साथ ही यह दूसरे नंबर का कृषि प्रसंस्करण उद्योग है। केंद्र और राज्य सरकार के राजकोशों में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। चीनी उद्योग में करोड़ो लोगों को सीधे रोजगार मिला हुआ है एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भी कृषि से जुड़े अधिकांश परिवार भी इसी उद्योग पर निर्भर हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में लगभग 32 लाख गन्ना किसान गन्ना उत्पादन पर निर्भर हैं। भारत में चीनी उद्योग बहुत ही बिखरा हुआ है और प्रमुखत: महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश राज्यों में विकसित हुआ है। लगभग 60 प्रतिशत चीनी मिलें सहकारी क्षेत्र में 35 प्रतिशत निजी क्षेत्र में और बाकी सार्वजनिक क्षेत्र में लगाई गई हैं। देश में गन्ने की खेती लगभग 49 लाख हेक्टेयर भू-क्षेत्र में की जाती हैजिसमें से अकेले उत्तर प्रदेश का रकबा लगभग 20 लाख हेक्टेयर है। देश में गन्ने की औसत उपज लगभग 68 टन प्रति हेक्टेयर है। उत्तर प्रदेश में चालू सत्र में 116 चीनी मिलों ने गन्ना पेराई की है। इनमें 91 निजी 24 सहकारी तथा 1 चीनी निगम की मिल है। जिन्होंने 7963.89 लाख कुंटल गन्ने की पेराई कर 842.44 लाख कुंटल चीनी का उत्पादन किया है। जबकि विगत सत्र में यह 117 चीनी मिलों द्वारा 6368.35 लाख कुंटल गन्ने की पेराई कर 675.21 लाख कुंटल चीनी बनाई थी। चीनी उद्योग की प्रगति एवं वर्तमान स्थिति को निम्न तालिका द्वारा दर्शाया गया है। 
यह लगभग हर वर्ष की कहानी है कि गन्ना किसानों को अपने पिछले बकाए का भुगतान और गन्ने के दाम बढ़ाने के लिए मजबूर होकर सड़कों पर उतरना पड़ता है, किंतु गन्ना किसानों की मूलभूत माँगों को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और चीनी मिल मालिकों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। राज्य सरकार ने चार वर्ष पूर्व 2012-2013 में गन्ने के 17 प्रतिशत दाम बढ़ाकर 280 रुपए प्रति कुंटल किए थे जो वर्ष 2016-17 में बढ़ाकर 305 रुपए प्रति कुंटल किए गए है। पिछले चार वर्ष में यदि मुद्रा स्फीति को देखें तो किसानों की गन्ने का दाम बढ़ाने की मांग वाजिब लगती है। दूसरी तरफ चीनी मिल मालिकों की दलील है कि चीनी के दामों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। अतः वह अधिक भुगतान देने की स्थिति में नहीं हैं। किंतु इस वर्ष चीनी की रिकवरी बढ़कर 10.58 प्रतिशत रहने और चीनी के भाव बढ़ने से मिलों की स्थिति में सुधार आया है। विडम्बना तो यह है कि गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य घोषित हो या न हो किसानों को अपना गन्ना मिलों तक पहुँचाना ही होता है। संभवतः ऐसा कोई और उद्योग-धन्धा नहीं है जिसमें उत्पादक अपने उत्पाद को बाजार में बेच आये और उसे यह भी पता न हो कि आखिर उसे इसके एवज में दाम क्या मिलेगा? इस वर्ष भी यही हुआ, जब राज्य सरकार ने पेराई सत्र शुरू होने के डेढ़ महीने बाद गन्ने के दाम तय किए। 
गन्ने के मूल्य एवं उसकी लागत में 2007-08 के बाद तेजी से वृद्धि हुई है। जबकि एक कुंटल गन्ने में दस किलो तक चीनी बन रही थी। जो बढ़कर इस वर्ष औसत 10.58 प्रतिशत हो गई है। जिन मिल क्षेत्रों में अगेती गन्ने का रकबा अधिक है वहाँ तो चीनी का उत्पादन एक कुंटल में ग्यारह किलो तक आ रहा है, साथ ही रिजेक्ट प्रजातियों के गन्ने का क्षेत्र भी निरंतर कम हो रहा है। उत्तर प्रदेश में चार साल में गन्ने के रकबे में 3.72 लाख हैक्टेयर की कमी आई है, यानि हर साल 93 हजार हैक्टेयर रकबा कम हो रहा है। वर्ष 2012-13 से 2014-15 के बीच गन्ना उत्पादन में भी 104.92 लाख टन की कमी आई है। किंतु चालू वर्ष में गन्ने की प्रजातियों में सुधार आने से पैदावार बढ़ी है। अब नई पीढ़ी के लोगों का मन गाँव, खेत-खलिहानों से हट रहा है दूसरी ओर प्रत्येक घर में बंटवारे की वजह से भी खेती का रकबा तेजी से घट रहा है। अतः नई-नई तकनीक एवं तरीके अपनाकर खेती की लागत कम करना और उत्पादन को बढ़ाकर आमदनी को बढ़ाना है जिससे गन्ने की फसल भी प्रभावित हुई है। 
उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान शाहजहांपुर द्वारा गन्ना उत्पादन लागत मूल्य 282.14 रुपए प्रति कुंटल का आकलन किया गया है। लगातार बढ़ रही मजदूरी की लागत, जुताई, कटाई, विद्युत, उर्वरकों, कीटनाशकों के बढ़ते रेट तथा भूमि के बढ़ते किराये के कारण पिछले तीन वर्शों में गन्ना उत्पादन लागत लगभग 25 प्रतिशत बढ़ गई है। किसानों के आकलन में एक एकड़ खेत में गन्ना उत्पादन करने पर 77,710 रुपए की लागत आती है, इसमें जुताई, पाटा चलाना, बीज, निराई गुड़ाई, छिलाई, मेढ बनाने, खाद, दवा से लेकर बधाई और ट्रांसपोर्टेशन तक का खर्च शामिल है। प्रति एकड़ गन्ने की उपज औसतन करीब 256 कुंटल मिलती है। इस हिसाब से एक कुंटल गन्ना उगाने पर किसान 303 रुपए लगाता है मगर उसे विगत वर्षों में मिलते थे सिर्फ 280-290 रुपए जो वर्ष 2016-17 में 305-315 रुपए हो गए हैं।
चीनी मिलें, चीनी मूल्य को ही गन्ना खरीद का आधार बनाती हैं। जबकि गन्ने से चीनी के अलावा शीरा, खोई और मैली भी मिलती है, इसके अलावा एथेनाॅल, एलकोहल, प्लाईवुड, टाॅफी आदि सह-उत्पादों का भी निर्माण होता है। इन उप-उत्पादों एवं सह-उत्पादों से मिलने वाले फायदों को चीनी मिलें छिपा लेती हैं और इस वर्ष तो चीनी की रिकवरी भी गत वर्ष के मुकाबले औसतन 0.8 प्रतिशत ज्यादा मिल रही है। एक विश्लेषण के अनुसार चीनी मिल दस कुंटल गन्ने की पेराई पर 1300 रुपए का लाभ अथवा एक कुंटल गन्ने पर करीब 130 रुपया कमा रही है। 
दस कुंटल गन्ने से प्राप्त उत्पादों की कुल कीमत 4500 रुपए आती है जबकि एक कुंटल चीनी की मय दस कुंटल गन्ना उत्पादन लागत 3200 रुपया होती है। अतः प्रति कुंटल गन्ने पर औसतन 130 रुपया अभी भी चीनी मिलों को फायदा हो रहा है। इसके अलावा विगत वर्ष में एसएपी का भुगतान दो किृतों में करने की छूट दी गई थी।
विगत वर्ष में चीनी उद्योग का कहनाथा कि उत्पादन लागत के मुकाबले चीनी का मूल्य कम होने के कारण मिलें लगातार घाटे की ओर बढ़ रही थी। चीनी मिलों को संकट से उबारने के लिए केंद्र सरकार ने एक अरब दस करोड़ रुपए का ब्याज मुक्त ऋण तथा छः हजार करोड़ रुपए का राहत पैकेज सीधा किसानों के खाते में भेजदिया था। जिसका ब्याज 600 करोड़ रुपया चीनी विकास निधि से दिया गया। इसके अतिरिक्त 4000 रुपया प्रति टन चीनी पर निर्यात सब्सिडी और एथेनाॅल पर उत्पाद शुल्क में छूट भी दी गई थी। किसानों के खातों में 4.50 रुपए प्रति कुंटल की दर से 1147 करोड़ रुपए प्रोत्साहन सब्सिडी भेजने का फैसला भी किया गया था। पर यह राशि एफआरपी का ही हिस्सा बनी रही। इससे किसानों को सीधे कोई लाभ नहीं हुआ। सरकार द्वारा चीनी मिलों पर पिछले वर्ष का देय 490 करोड़ ब्याज भी माफ कर दिया गया था किंतु फिर भी प्रदेश के किसानों का 1800 करोड़ रुपया और विगत वर्ष का 8000 करोड़ रुपए का भुगतान चीनी मिलों पर शेष था। वर्तमान सरकार के गठन के बाद अब तक 2923 करोड़ रुपए गन्ना मूल्य का भुगतान किसानों को कराया गया है। गत वर्ष की तुलना में वर्तमान वर्ष में 7918 करोड अर्थात् 21 प्रतिशत अधिक गन्ना मूल्य का भुगतान हुआ है। चालू सीजन में स्थिति में काफी सुधार आया है और 17921.99 करोड़ रुपए कुल गन्ना मूल्य का भुगतान किया गया है। जो कुल भुगतान का 81.08 प्रतिशत है। जहां तक बकाया की स्थिति है वर्ष 2014-15 का 43.75 करोड़ रुपए वर्ष 2015-16 का 162.63 करोड़ रुपए शेष है और इस वर्ष बजाज समूह पर जिसकी 15 मिलें है 2325.18 करोड़ रुपए, सिंभावली (3 मिले) 408.45 करोड रुपए, मोदी समूह (2 मिले) 397.25 करोड़ रुपए मवाना समूह (2 मिले) 305.04 करोड़ रुपए उत्तम ग्रुप (3 मिले) 123.67 करोड़ रुपए व ऐरा (एकल समूह) 108.76 करोड़ रुपए बकाया है। यहाँ सवाल यह भी उठता है कि जब देश की सहकारी मिलें भुगतान कर सकती हैं तो निजी मिले क्यों नहीं? वर्तमान में चीनी का मूल्य भी बाजार में बढ़ा है। चीनी मिलों द्वारा चीनी बाजार में न बेचकर अपने गोदामों में भाव बढ़ने की प्रत्याशा में, रखे हुए थे और किसानों के भुगतान पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा था। सहकारी एवं सरकारी चीनी मिलों के द्वारा तो भुगतान में सरकार के दबाव में कुछ तेजी आई है किंतु निजी चीनी मिलों में यह प्रगति अभी भी पूर्णतः दिखायी नहीं दे रही है। किसानों से बात करने पर आम किसान का कहना था कि सरकार, चुनाव के लिए निजी चीनी मिलों से पैसा उगहाकर किसानों के हितों पर ध्यान नहीं देती थी। जिससे आम किसान के सम्मुख भुगतान संकट बना रहता था। अब शायद इस स्थिति में सुधार होगा।
वर्ष 2010-11 में चीनी उद्योग की हालत खराब होने से बसपा सरकार ने जुलाई से अक्टूबर 2010 और जनवरी से मार्च 2011 के बीच दो चरणों में क्रमशः दस और ग्यारह चीनी मिलों को बेच दिया था पहले दौर की बिक्री वाली दस मिलों को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन पोटास लिमिटेड ने खरीदा जबकि दूसरे दौर की ग्यारह मिलो को एक ही प्रबंधन में अलग-अलग कंपनियों के नाम से खरीद लिया था। पहले दौर की दस चालू मिलों में अमरोहा, चांदपुर, जरवल रोड, सिसवा बाजार, बुलन्दशहर, सहारनपुर, खड्डा, रोहाना कला, सकौती टांडा की चीनी मिले बेची गई जबकि ग्यारह बंद चीनी मिलों में देवरिया, बेतालपुर, भटनी, शाहगंज, लक्ष्मीगंज, रामकोला, छितौनी, घुघली, बरेली, हरदोई और बाराबंकी मिल शामिल रही इन सभी चीनी मिलों के पास बेशकीमती जमीन है इसकी आधी चैथाई कीमत भी नहीं वसूली गई साथ ही मिल प्लांट और मशीनरी भी नाम मात्र में बिकी। राज्य सरकार ने इक्कीस चीनी मिलों की अनुमानित कीमत मात्र 725.52 करोड रुपए आंकी थी इनका विक्रय मूल्य 542.44 करोड़ रुपए तय किया गया इसके विपरीत ये मिले मात्र 427.45 करोड़ रुपए में बिक गई। सैद्धांतिक रूप से चार जून 2007 को राज्य चीनी निगम की मिलों को बेचने का निर्णय ले लिया गया था। इक्कीस चीनी मिलों की बिक्री पर भारत के नियंत्रक महापरीक्षक ने अपने प्रतिवेदन में मिलों को बेचने में 1179.84 करोड़ रुपए का नुकसान माना था और कहा था कि चीनी मिलों का मूल्यांकन तर्क संगत नहीं किया गया और बीडिंग प्रक्रिया में स्पर्धा की कमी रही, अव्यवहारिक रूप से बिड वापस ली गई। अर्हता के मानकों को बदला गया, स्टांप ड्यूटी एवं प्रक्रियात्मक खामियां रहीं, उसके बाद सपा सरकार ने भी इस घोटाले पर पर्दा डाल दिया जबकि अब नयी सरकार के आने से नए सिरे से जांच का फैसला लिया गया है। 1180 करोड़ रुपए के इस घोटाले ने चीनी उद्योग की कमर तोड़ दी थी।
चीनी उत्पादन के अतिरिक्त मिलों को दूसरे बाई प्रोडक्ट भी मिलते हैं। वहीं किसान गन्ना देकर भी भुगतान के लिए भटकता रहता है। वास्तव में समय आ गया है जब प्रदेश के 50 लाख गन्ना किसानों की माँगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर सुनियोजित व्यवस्था बनाई जाय, ताकि उन्हें सम्मानजनक तरीके से भुगतान हो सके और किसान एवं चीनी मिल अपनी खोई हुई खुशहाली को पुनः प्राप्त कर सकें, साथ ही चीनी मिलों को भी आवश्यकता इस बात की है कि अपने संसाधनों का बेहतर प्रबंधन एवं अधिकतम इस्तेमाल की तरफ ध्यान आकृष्ट कर अपनी लागतों को न्यूनतम करें, ताकि चीनी उद्योग को बर्बादी से बचाया जा सके और किसानों का भी भला हो सके। अन्यथा सरकार और चीनी मिल मालिकों के बीच चल रही नूराकुश्ती में किसान बुरी तरह फंसकर रह जाएगा।
ग्रामीण विकास में बैंक ऋण का योगदान
आजादी के बाद से ही हमारी सरकार की प्राथमिकता, ग्रामीण विकास के लिए सर्वोपरि रही है किंतु छः दशक बीत जाने के बाद भी हमारा अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र अविकसित अवस्था में पड़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, बिजली, स्वास्थ्य, परिवहन, बैंकिंग और अन्य ढाँचागत सुविधाओं की कमी एवं गरीबी के चलते लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। ग्रामीण लोग, खेती पर आधारित होने के कारण गरीबी की मार झेलते हैं और गुणवत्तापरक शिक्षा के अभाव में अपनी उन्नति भी नहीं कर पाते। ग्रामीण परिवेश में मूल समस्या ऋण प्राप्त करने एवं उसकी अदायगी से संबंधित है। ग्रामीण विकास में बाधक कुछ सामाजिक समस्याएं जैसे-जाति व्यवस्था, जनसंख्या की अधिकता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी, निरक्षरता, बाल विवाह, छुआछूत, कृषि पर अधिक निर्भरता आदि भी है। स्वतंत्रता के समय ग्रामीण ऋणों में सर्वाधिक हिस्सेदारी 44.8 प्रतिशत साहूकारों की, उसके बाद 24.9 प्रतिशत बड़े किसान एवं महाजनों की तथा 14.2 प्रतिशत रिश्तेदारों की थी, सबसे कम भाग 0.9 प्रतिशत वाणिज्य बैंकों द्वारा, 3.3 प्रतिशत सरकार द्वारा, 3.1 प्रतिशत सहकारिताओं द्वारा तथा 5.5 प्रतिशत व्यापारी एवं आढ़तियों का था। किंतु वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देशों ने स्थिति को बिलकुल ही उलट दिया है और बैंकों के लिए निवल बैंक ऋण का कम से कम 40 प्रतिशत कृषि, लघु उद्योग तथा अन्य प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में विनियोजित किए जाने की बाध्यता रखी है तथा निवल बैंक ऋण का 18 प्रतिशत केवल कृषि क्षेत्र को ही प्रदत्त किया जाना चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित इन मानदंडों को प्राप्त करने हेतु बैंकों द्वारा लचीले, आसान एवं लागत प्रभावी ऋण प्रदान करने के लिए प्रतिस्पर्धात्मक ब्याज दरों को अपनाया गया है। सरकार का रुझान भी अब किसानों के प्रति और बढ़ा है। सरकार द्वारा किसानों की कर्ज माफी योजना एवं राहत योजना जो वर्ष 2008 में लागू की थी, उसको बढ़ाकर 31 दिसंबर 2009 तक कर दिया गया है, जिसके तहत चार सौ लाख किसानों को समाविष्ट करते हुए लगभग 71 हजार करोड़ रुपए की एक मुश्त बैंक कर्ज माफी की गई है। दो हेक्टेयर से अधिक भूमि मालिकों को अपने बकाया के 75 प्रतिशत का भुगतान करने के लिए 30 जून 2009 तक का समय दिया गया था जिसमें छः महीने की और वृद्धि की गई है। कुछ राज्यों में बहुत से किसानों ने महाजनों से ऋण ले रखे है और उनकी हालत काफी खराब है और वे सरकार की ऋण माफी योजना में भी नहीं आए हैं अतः सरकार ने इन किसानों पर विशेष ध्यान देने और गहन जांच करने तथा भविश्य की कार्ययोजना से संबंधित सुझाव देने के लिए एक कार्यदल का गठन भी किया है। वित्त मंत्री द्वारा कृषि क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि को लगभग 4 प्रतिशत सुनिश्चित करने के लिए किसानों को सात प्रतिशत ब्याज दर पर तीन लाख रुपया प्रति किसान तक अल्पावधि फसल ऋण हेतु ब्याज सहायता योजना भी जारी रखने की घोषणा की गई है। जो किसान अल्पावधि फसल ऋणों की अदायगी निर्धारित समय पर करेंगे उन किसानों को ब्याज दर में एक प्रतिशत ब्याज की छूट भी सुनिश्चित की गई है। अभी तक निजी एवं विदेशी बैंक अपने व्यापार को शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रखते थे किंतु अब वह दौर शुरू हो गया है कि ये बैंक भी ग्रामीण क्षेत्रों में संभावनाएं तलाशने लग गए हैं। किसान क्रेडिट कार्ड, स्वयं सहायता समूह का वित्त पोषण लघु ऋण जैसे नए-नए क्षितिज ग्रामीण बैंकिंग के क्षेत्र में उदय एवं लोकप्रिय हो रहे हैं। 
ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रमुख रूप से कृषि पर ही आधारित है। आजादी से पूर्व गाँव में फैले लघु एवं कुटीर उद्योगों को अंग्रेज सरकार द्वारा बंद करने के लिए अनेक नीतियां अपनायी गई, साथ ही किसानों का शोशण निजी स्तर पर, ब्याज पर पैसा देने वाले सेठ, साहूकारों एवं महाजनों द्वारा भी किया गया। आजादी के बाद से ही सरकार यह प्रयास करती आ रही है कि किसानों को कैसे इनके चंगुल से मुक्त कराया जाए। बैंको की सेवायें जन-जन को उपलब्ध कराने के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना, सहकारी बैंकिंग को प्रोत्साहन, भूमि विकास बैंक एवं राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण बैंक की स्थापना, भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक का गठन ;जो कि लघु उद्योग क्षेत्र में योगदान कर रहा हैद्ध भी ग्रामीण विकास के क्षेत्र की वित्तीय समस्याओं के निराकरण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
बैंकों द्वारा कृषि ऋण को, सरकार द्वारा सांविधिक बाध्यता के रूप में न अपनाकर, अपने कारोबार के मुख्य हिस्से के रूप में अपनाना चाहिए तभी ग्रामीण विकास को सुनिश्चित करने में बैंकों की हिस्सेदारी हो सकेगी, अतः बैंकों को चाहिए कि - ग्रामीण ऋणों में वृद्धि करने के लिए वे ऋण प्रक्रिया में स्थानीय भाषा का प्रयोग करें। ग्रामीण ऋण में वृद्धि हेतु बैंक किसानों के कृषि उत्पादों की बिक्री में उनकी सहायता करें। बैंकों की कृषि शाखाओं को चाहिए कि वे कृषक हितैशी उत्पादों (ऋण) का समुचित प्रचार-प्रसार करें। बैंक, ग्रामीण ऋण योजनाओं को किसी समय के लिए प्रतिबंधित न करें। बैंकों द्वारा शाखा स्तर पर कृषि मूल्यांकनकर्ताओं की नियुक्ति की जाए। बैंकों को चाहिए कि वह क्षेत्रीयता के आधार पर जहां जो भी फसल अधिक मात्रा में उगाई जाती है अथवा दुग्ध एवं मुर्गी पालन होता है, उसके उत्पादकों से सीधा संपर्क एवं ताल-मेल रखे। ग्रामीण ऋणों की संभावना तलाशने के लिए तहसील अथवा ब्लाॅक स्तर पर कृषि विभाग से जुड़े कर्मचारियों की सहायता ली जाए। ग्रामीण ऋण प्रस्तावों पर निर्णय लेने हेतु बैंक द्वारा कम से कम समय लगाया जाना चाहिए किंतु साथ ही गुणवत्ता का ध्यान भी रखा जाए। ग्रामीण ऋणों में वृद्धि हेतु बैंकों को चाहिए कि वे कृषि परियोजनाओं, कोल्ड स्टोरेज इकाईयों, कृषि क्लीनिकों एवं ग्रामीण गोदामों पर वित्तीयन हेतु सक्रिय प्रयास करें। बैंकों द्वारा शाखा स्तर पर ग्रामीणों को आमंत्रित कर ऋण की उपयोगिता के बारे में जानकारी प्रदान की जाए। बैंक कर्मियों द्वारा ग्रामीणों को विभिन्न ऋण/जमा योजनाओं के बारे में एक निश्चित समय अंतराल पर जानकारी दी जाए, विशेष तौर पर ब्याज दर की जानकारी अवश्य दी जाए एवं जमा रसीदों तथा ऋण खातों को समय पर पूरा करने और उनको सुरक्षित रखने की सलाह दी जाए। बैंकों द्वारा अपनी ग्रामीण अंचल की शाखाओं की मासिक आधार पर समीक्षा की जाए तथा ग्राहक गोष्ठी का भी आयोजन किया जाए। कृषि ऋणों में वृद्धि के लिए बैंकों को चाहिए कि वे कृषि से संबंधित उपकरणों, खाद, बीज, कीटनाशक दवाओं के विक्रेताओं से सीधा संपर्क स्थापित करें और वहीं पर ऋण प्रदान करें। बैंकों को चाहिए कि वे ऋण अनुभाग में अनुभवी एवं पूर्ण जानकारी वाले कर्मचारी ही नियुक्त करें ताकि ग्रामीणों को वह अच्छी तरह योजना के बारे में जानकारी दे सके ताकि आपसी शंकाएं उत्पन्न न हों। 
बैंक एवं सरकार, ग्रामीण विकास के लिए ऋण प्रदान करते हैं, उससे ग्रामीण विकास तो हो रहा है किंतु ऋण ब्याज सहित वापिस नहीं होता है अतः बैंक के सम्मुख वसूली संबंधी अनेक समस्यायें आती हैं। कुछ ऋणी तो अधिक जोखिम वाले कारोबार के लिए ऋण स्वीकृत करा लेते हैं और बाद में कोई भी जोखिम आने पर ऋण वापिस नहीं करते। कुछ ऋणी पहले से ही ऋण वापिस न करने की मंशा बना लेते हैं और इन्तजार करते हैं कि सरकार ऋण माफी कर देगी अथवा बैंक से ही सेटलमेंट करा लेंगे। कुछ ऋणी जानबूझकर ऋण वापिस नहीं करते क्योंकि उनकी पहुँच ऊपर राजनैतिक स्तर पर होती है और उन्हें विश्वास होता है कि बैंक उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही में आसानी से सफल नहीं हो पाएंगे। कुछ परिस्थितियों में बैंक द्वारा ऐसी परियोजनाओं के लिए ऋण स्वीकृत कर दिए जाते हैं जो धन के अभाव में पूरी नहीं हो पाती और वसूली में कठिनाई आती है। बैंक यदि सरकारी तंत्र, तहसील, ब्लाॅक स्तर के कर्मचारियों का सहयोग लेते हैं तो कुछ मामलों में मिलीभगत कर कर्मचारी ही ऋणों को अनर्जक बना देते हैं। सरकार यदि बैंकों द्वारा प्रदत्त कृषि ऋण को माफ करती है तो जो ईमानदार कृषक अथवा ऋणी हैं और ऋण की समय से अदायगी करता है, अपने को बेवकूफ एवं ठगा महसूस करता हैं, क्योंकि उसी के सामने ऋण की परवाह नहीं करने वाला, ऋण माफी का लाभ उठाता है। अतः भविष्‍य में जो ऋण की अदायगी करने वाले लोग हैं, वे भी ऋण माफी का इन्तजार करते हैं, जो बैंकों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सरकार द्वारा, बैंकों की ऋण वसूली का ध्यान रखते हुए, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों को आर्थिक विकास की योजनाओं से जोड़ा जाना चाहिए। ग्रामीण ऋणों की वसूली में बैंकों के सम्मुख समस्या यह भी है कि उनका नेटवर्क ग्रामीण क्षेत्र में अभी तक पूर्ण रूप से नहीं फैला है और क्षेत्र विस्तृत होने से बैंकों पर कार्यभार की अधिकता रहती है। बैंक में खातेदार तो अधिक होते हैं किंतु उनके खातों में जमा धनराशि कम रहती है अतः वसूली की समस्या सदैव ही बनी रहती है, जिसमें जानबूझकर चूक, ऋणों का दुरुपयोग, अनुवर्ती कार्यवाही की कमी, ऋण प्राप्तकर्ताओं का गलत चयन, बेनामी ऋण, कर्मचारियों का आंदोलन और सरकारी नीतियां भी बाधक बनती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण प्राप्तकर्ता अधिकांश कमजोर वर्ग के होते हैं जो समय पर बैंकों की ऋण अदायगी नहीं करते है तथा उनके पास ऋण प्राप्ति के समय भी जमा करने के लिए प्रतिभूति पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होती और ऋणों के लक्ष्य प्राप्त करने हेतु ऋण स्वीकृत कर दिए जाते हैं। 
ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक एवं उधारकर्ताओं के बीच बैंकिंग संस्कृति विकसित करने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण व्यक्ति आज भी ऋण लेने में डरता है किंतु यदि बैंक स्वयं सहायता समूह के माध्यम से ऋण प्रदान करते हैं तो उसमें ऋण अदायगी की संभावना अधिक होती है और समूह भी अपना उद्देश्य प्राप्त करने की कोशिश करता है। अतः बैंकों को चाहिए कि ग्रामीण परियोजनाओं के चयन एवं कार्यान्वयन के लिए मानक लागू करें और ऋणी के कार्य निष्पादन के लिए भी निरंतर निगरानी की व्यवस्था करें ताकि ऋणों का समुचित एवं प्रभावपूर्ण उपयोग हो सके। किसानों के लिए क्रेडिट कार्ड तथा लघु उद्योग आदि के लिए नये-नए उत्पाद निर्गत किए जाएं और आधारभूत संरचना के लिए भी ऋण दिए जाए। ग्रामीण क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए नवोन्मेशी कदम उठाये जाएं। आज ग्रामीण क्षेत्र को ऋण प्रदान करना सामाजिक दायित्व भर न होकर एक सोची समझी रणनीति एवं अपना व्यापार बढ़ाने का तरीका है, इसीलिए आज निजी एवं विदेशी क्षेत्र के बैंक भी अपना बाजार ग्रामीण क्षेत्र में ही तलाशने में जुटे हुए हैं। बिना बैंकों के ऋण प्रदान किए हमारा ग्रामीण विकास संभव नहीं हो सकता, अतः ग्रामीण क्षेत्रों में विकास हेतु ऋण की आज भी महती आवश्यकता है। 
संदर्भ सूची:
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2. मोर नचिकेत जार्ज दीप्ति, ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण व्यवस्था की मजबूती, योजना मार्च 2014, प्रकाशन विभाग, आर. के. पुरम नई दिल्ली-66, पृ.सं. 28-30
3. रावत गजेन्द्र कुमार, ग्रामीण कृषकों के लिए ऋण व्यवस्था, कुरुक्षेत्र जून 2011, प्रकाशन विभाग, आर.के. पुरम नई दिल्ली-66, पृ.सं. 10-14
4. शर्मा अर्चना, भारत में ग्रामीण साख व्यवस्था वर्तमान प्रवृत्तियां, कुरुक्षेत्र दिसम्बर 2013, प्रकाशन विभाग, आर.के. पुरम नई दिल्ली-66, पृ.सं. 31-35
5. सिन्हा बी.सी., भारतीय आर्थिक समस्याएं, एसबीपीडी पब्लिशिंग हाउस आगरा 2011-12 पृ. सं. 143-149
6. पन्त जेसी भारतीय आर्थिक समस्याएं, साहित्य भवन पब्लिकेशन्स आगरा 2011-12 पृ.सं. 127-137
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8. रिपोर्ट आॅन ट्रेंड एंड प्रोग्रेस बैंकिंग इन इंडिया 2006-12 भारतीय रिजर्व बैंक मुम्बई
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11. अग्रवाल उमेश चंद, भारत में जैविक कृषि का विकास, योजना, योजना भवन संसद मार्ग नयी दिल्ली, सितम्बर 2006, पृष्ठ संख्या-31
12. शर्मा सुभाष, भारत में खेती की समस्यायें, योजना, योजना भवन संसद मार्ग नयी दिल्ली, जनवरी 2011, पृष्ठ संख्या-25
13. मिश्र गिरीश, कृषि में बड़ी पूंजी का निवेश, तथ्य भारती, 46 तिलक नगर, कोटा, पृष्ठ संख्या-10
14. आर्थिक सर्वे-2009 से 2014 तक
15. भारतीय अर्थव्यवस्था, प्रतियोगिता दर्पण, उपकार प्रकाशन आगरा
16- www.publicationsdivision. nic.in
17- wwww.tathyabharti@gmail.com
18- www.yoana.gov.in
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21. चैहान श्यामसुंदर सिंह, सन 2022 तक कृषकों की आय को दोगुना करना, प्रतियोगिता दर्पण, 2/11ए स्वेदशी बीमा नगर, आगरा, अगस्त 2017 पृष्ठ संख्या 79-82
22. उपाध्याय देवेन्द्र, भारत के सर्वांगीण विकास की व्यापक योजनाएं, कुरूक्षेत्र, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली, अक्टूबर 2014, पृष्ठ संख्या 8-9
23. सोलंकी अर्जुन, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, कुरूक्षेत्र, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली, मार्च 2014, पृष्ठ संख्या 8-10
24. प्रतियोगिता दर्पण, भारतीय अर्थव्यवस्था, 2013-14, 2/11ए स्वेदशी बीमा नगर, आगरा, पृष्ठ संख्या 199-206
25. स्वावलंबन योजना और अटल पेंशन योजना, योजना, 648 सूचना भवन लोधी रोड, नई दिल्ली, जुलाई 2017, पृष्ठ 38-40
26. शर्मा भरत, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना: किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में एक बड़ा कदम, कुरूक्षेत्र, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली, नवंबर 2017, पृष्ठ संख्या 9-12


आजीविका: बदलता ग्रामीण जीवन


अक्षि त्यागी



जीविका की योजना बनाना बताता है कि हमें जीवन में क्या करना है और हम क्या कर रहे हैं? जीविका का चयन एक कुंजी का कार्य करता है। कोई व्यक्ति अपने बारे में विश्लेषण करके उचित निर्णय ले सकता है। जीविका का चुनाव हमारा भविष्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गाँवों के अधिकांश लोग अपनी आजीविका कृषि या हस्तशिल्प से अर्जित करते हैं। सीमित कृषि भूमि के कारण रोजगार की तलाश में लोग कस्बों और शहरों का रुख कर रहे हैं लेकिन आवश्यक योग्यता के अभाव में कई बार उन्हें रोजगार पाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। सरकार इन समस्याओं को दूर करने के लिए नई कृषि तकनीकों के प्रयोग द्वारा उसी भूमि से उत्पादन की मात्रा बढ़ाने के साथ-साथ गाँव के भीतर या समीप ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के प्रयास कर रही है। राष्ट्रीय कृषक नीति का शुभारंभ कृषि और सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय द्वारा सितंबर 2007 में किया गया। इस नीति का लक्ष्य किसानों की शुद्ध आय में बढ़ोत्तरी करना और उन्हें उनकी फसलों का अच्छा मूल्य दिलाना है। सरकार भूमि और जल सुविधाओं के विकास के लिए काम कर रही है। इस नीति के तहत मंत्रालय के पास किसानों के लाभ के लिए बहुत से कार्यक्रम और योजनाएं हैं। इनमें से कुछ योजनाएं किसानों को प्रत्यक्ष और कुछ अन्य अप्रत्यक्ष रूप से लाभ प्रदान करती हैं। बीज उपचार अभियान के द्वारा सरकार उपचारित बीज किसानों को उपलब्ध कराती है। ये उपचारित बीज अधिक उपज तो देते ही हैं साथ ही बीमारियों और कीटों के खिलाफ संघर्ष करने की क्षमता भी इनमें अधिक होती है। इस योजना में रुचि रखने वाले किसान अपने प्रदेश के संपर्क स्थल के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। सरकार कृषि आधारित व्यवसाय के द्वारा आय प्राप्त करने के लिए किसानों द्वारा गठित सहकारी समितियों को अनुदान प्रदान करती है। अनुदान के लिए लघु किसान कृषि व्यवसाय संघ के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। अपनी फसलों की कीटों से सुरक्षा करने के लिए समन्वित कीट प्रबंधन योजना की सहायता ली जा सकती है। फसल को होने वाली क्षति से किसानों की रक्षा करने के लिए राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना प्रारंभ की गई है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, बीज ग्राम योजना, राष्ट्रीय वाटरशेड विकास परियोजना, वर्षापोषित क्षेत्र के लिए, कृषि में सूचना के उपयोग को प्रोत्साहन, प्रशिक्षण, परीक्षण और प्रदर्शन के माध्यम से कृषि यंत्रीकरण का विस्तार और सुदृढ़ीकरण, ग्रामीण विकास, पशुपालन आदि योजनाएं भी हैं।
भूमिहीन मजदूरों, लघु और सीमांत किसानों और महिलाओं को रोजगार प्रदान करने तथा उनकी पारिवारिक आय बढ़ाने में पशुपालन, डेयरी विकास और मत्स्य पालन महत्वपूर्ण योगदान देता है। राष्ट्रीय कृषक नीति के माध्यम से इन मुद्दों के समाधान की परिकल्पना की गई है। चलाई जा रही कुछ प्रमुख योजनाएं इस प्रकार हैं- केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाएं, ग्रामीण पशुधन स्वास्थ्य, राष्ट्रीय पशु तथा भैंस प्रजनन योजना, दाने और चारे के विकास के लिए राज्यों को सहायता, पशुधन गणना, मुख्य पशुधन उत्पाद के आकलन हेतु समन्वित नमूना सर्वेक्षण योजना, पशु स्वास्थ्य निदेशालय, पशु रोग रोकथाम के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम, केंद्रीय पशु प्रजनन फार्म, चारा फसलों की जांच के लिए केंद्रीय मिनीकिट जांच कार्यक्रम, केंद्रीय कुक्कुट विकास संस्थान, चारा उत्पादन और प्रदर्शन हेतु क्षेत्रीय स्टेशन आदि तथा केंद्र प्रायोजित योजनाएं, गहन डेयरी विकास कार्यक्रम, गुणवत्तापूर्ण एवं स्वच्छ दुग्ध उत्पादन के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा, सहकारी समितियों को सहायता आदि।
बीजों, कृषि मशीनों तथा भूमि की खरीदी के लिए तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसानों को साख की जरूरत होती है। साहूकारों के शिकंजे मे फंसने से बचने से अच्छा है कि सरकारी योजनाओं के माध्यम से प्रदान की जा रही साख सुविधाओं का लाभ उठाया जाए। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक ;नाबार्डद्ध कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के लिए काम करने वाला सबसे बड़ा बैंक है। विभिन्न केंद्रीय बैंकों द्वारा किसानों और ग्रामीणों को उपलब्ध कराए जा रहे विभिन्न प्रकार के )णों के बारे में जानकारी। अल्पावधि की जरुरतों को पूरा करने के लिए किसानों को साख उपलब्ध कराने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड योजना चालू की गई है। 
आपदाएं और दुर्घटनाएं किसी भी समय हो सकती हैं। इनके कारण जीवन और आजीविका के साधन अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। इनसे उबरने में ग्रामीण भागों को लंबा समय लग जाता है। सरकार ने ऐसे किसी खतरे से राहत के लिए इन क्षेत्रों के लिए विशेष योजनाओं का निर्माण किया है। ये योजनाएं विशेष रूप से इन क्षेत्रों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई हैं। डाक जीवन बीमा और कृषि बीमा योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों की खास जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। डाक विभाग ने पांच जीवन बीमा योजनाएं विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए प्रारंभ की हैं। ये योजनाएं ग्रामीण क्षेत्र की बीमा आवश्यकताओं को काफी हद तक पूरा करती हैं। ये बीमा योजनाएं हैं- ग्राम संतोष ;बंदोबस्ती आश्वासनद्ध, ग्राम सुरक्षा ;जीवन भर का आश्वासनद्ध, ग्राम सुविधा ;परिवर्तनीय जीवन भर का आश्वासनद्ध, ग्राम सुमंगल ;प्रत्याशित बंदोबस्ती बीमाद्ध, ग्राम प्रिय ;10 वर्षीय आरपीएलआईद्ध। कृषि के क्षेत्र में जोखिम प्रबंधन के एक भाग के रूप में लागू की जा रही एक केंद्रीय योजना है। यह प्राकृतिक आपदाओं, कीट और रोग की वजह से फसलों को हानि पहुँचने की स्थिति में किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। यह योजना सभी प्रकार के किसानों के लिए उपलब्ध है, भले ही उनकी जोत का आकार कुछ भी क्यों न हो। इस बीमा योजना के तहत ऐसी सभी फसलें अनाज, जौ और दालें, तिलहन और वार्षिक वाणिज्यिक/बागवानी फसलें आदि सम्मिलित की गई हैं, जिनकी पैदावार के संबंध में पिछले कुछ साल के आंकड़े उपलब्ध हैं। प्रीमियम दर 1.5 प्रतिशत और 3.5 प्रतिशत के मध्य ;बीमा राशि काद्ध खाद्य और तिलहनी फसलों के लिए होता है। इस योजना के तहत वर्तमान में प्रीमियम में 10 प्रतिशत की सब्सिडी छोटे और सीमांत किसानों के लिए उपलब्ध है। 
केंद्रीय ग्रामीण विकास, पंचायतीराज और खान मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने सरस आजीविका मेला 2018 का उद्घाटन करते हुए कहा था कि आजीविका मिशन ग्रामीण महिलाओं के जीवन में बड़ा सामाजिक आर्थिक परिवर्तन ला रहा है। सरस आजीविका मेला ग्रामीण महिला उत्पादकों को प्रत्यक्ष विपणन प्लेटफाॅर्म उपलब्ध कराने का प्रयास है, ताकि ग्रामीण महिला उत्पादक बिना किसी बिचैलिए के अपने उत्पादों का उचित मूल्य प्राप्त कर सकें। 
संदर्भ
1. राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित 11-03-2011 
2- https://hi.wikipedia.org
3- http://performindia.com
4- https://khabar.ndtv.com/news/india
5-https://rural.nic.in/hi
6- http://pib.nic.in


शहर एवं गाँवों में खराब होता पेयजल 


डाॅ. रजनी शर्मा


पीने का पानी उच्च गुणवत्ता वाला होना चाहिए क्योंकि बहुत सारी बीमारियां पीने के पानी के कारण ही घेर लेती हैं। विकासशील देशों में जलजनित रोगों को कम करना सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रमुख लक्ष्य है। सामान्य पानी आपूर्ति नल से ही उपलब्ध होती है। यही पीने, कपड़े धोने या जमीन की सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है। अच्छे स्वास्थ्य की सुरक्षा और उसे बनाए रखने के लिए पेयजल और स्वच्छता-सुविधाएँ, मूल आवश्यकताएँ हैं। विभिन्न अंतरारष्ट्रीय मंचों से समय-समय पर इस पर विचार-विमर्श हुआ है। 
जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। पानी के महत्त्व का वर्णन वेदों और दूसरी अन्य रचनाओं में भी मिलता है। जल न हो तो हमारे जीवन का आधार ही समाप्त हो जाए। दैनिक जीवन के कार्य बिना जल के संभव नहीं हैं। धीरे-धीरे जल की कमी होने के साथ जो जल उपलब्ध है वह प्रदूषित है। जिसके प्रयोग से लोग गंभीर बीमारियों से परेशान हैं, जो गंभीर चिंता का विषय है। दुनियाभर में लगभग एक अरब लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं। 'ग्लोबल एनवायरमेंट आउट लुक' रिपोर्ट बताती है कि एक तिहाई जनसंख्या पानी कि कमी की समस्या का सामना कर रही है। सन 2032 तक विश्व की लगभग आधी जनसंख्या पानी की भीषण कमी से पीड़ित हो जाएगी। शहर और ग्राम दोनों ही पेयजल संकट से ग्रस्त हैं। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विद्यमान पेयजल संकट के प्रमुख कारण हैं- अनियमित वर्षा। उचित उपयोग न होना। जमीन से अधिक पानी निकालना। तेजी से बढ़ता जल प्रदूषण। 
जल की समस्या से निपटने के लिए प्रयास करने ही होंगे। वर्षा की बूंदों को सहेजना होगा तथा जल का उपयोग उचित प्रकार से करना होगा। इसके लिए जनप्रतिनिधियों विशेषकर ग्राम पंचायतों के पंच तथा सरपंचों को जिम्मेदारी के साथ आंदोलन कर रूप में जल संरक्षण के इस पावन कार्य को आगे बढ़ाना होगा। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम से प्रेरणा लेकर हमें ग्रामीण अंचलों में जल संरक्षण एवं संवर्धन हेतु जन भागीदार पर आधारित नए कार्यक्रम की शृंखला शुरू करनी होगी। हैंडपंप, ट्यूबवेल एवं कुओं तथा तालाबों का पुनर्भरण करना होगा। खेत में तालाब बनाकर उसका संरक्षण  तथा वर्षा जल को रोकना होगा। खेत का पानी खेत में और गाँव का पानी गाँव में' सिद्धांत को चरितार्थ करना होगा। राजस्थान जैसे सूखा क्षेत्रों में किए गए प्रयासों को आदर्श मानकर कार्य करना होगा। देश के लगभग सभी ग्रामीण क्षेत्रों में महात्मा गाँधी ग्रामीण रोजगार योजना संचालित है। इस कार्यक्रम के तहत व्यक्ति जहाँ रहता है, वहीं उसके आस-पास उसे रोजगार उपलब्ध कराने कि कोशिश की जाती है, ताकि गरीब लोग रोजगार हेतु पलायन करने को मजबूर न हों। इस योजना में  राष्ट्रीय पेयजल कार्यक्रम का समन्वय स्थापित कर तालाबों, स्टापडैम आदि के लिए काम लेकर जल संचयन किया जा सकता है।   
किसानों को फसल काटने के बाद खेत में आग नहीं लगानी चाहिए ताकि खेत के जैव-पदार्थ जिनसे खेत में जल संवर्धन होता है वह न जल पाएं और खेत की नमी खत्म न हो सके। खेत में पानी का ठहराव जितना अधिक होगा जल का जमीन में रिसाव भी उतना ही अधिक होगा। खेत में पानी का रिसाव अधिक हो, इसके लिए छोटे-छोटे तालाब बनाए जाने चाहिए। जो कुएं सूख गए हैं, उनकी गाद एवं गंदगी साफ कर उन्हें पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।  नवनिर्मित घरों के आस-पास तथा कुओं और हैंडपंपों के पास सोखता गड्ढों को भरने के लिए सुरक्षित दूरी पर जल संचय के गड्ढे बनाए जाने चाहिए। ये गड्ढे एक से दो मीटर चैड़े तथा दो से तीन मीटर गहरे बनाए जाते हैं। गड्ढा खोदने के बाद उसे कंकड़, रोड़ी, ईट के टुकड़े और बजरी से भरा जाता है। वर्षा जल संरक्षण के समय यह सावधानी बरती जानी चाहिए कि संरक्षित किया जाने वाला पानी किसी रसायन या जहरीली चीजों के संपर्क में न आए। 
जल संरक्षण की प्रचलित विधि मकान छतों से गिरने वाले वर्षा जल का संग्रहण भी है। इसमें छत से गिरने वाले वर्षा जल को विशेष रूप से बनाए गए जलाशयों में जमा किया जाता है। बाद में इस पानी को साफ कर इसका उपयोग किया जा सकता है। वर्षा जल जैव दृष्टि से शुद्ध होता है इसलिए वर्षा के जल का संरक्षण पीने के लिए भी उपयोग हो सकता है। बरसात के पानी बहाव के रास्ते में बाधा डाल उसकी गति को कम किया जाना चाहिए। ताकि पानी बहाव जमीन के अंदर गड्ढों के माध्यम से जमीन के अंदर जा सके। खुली जगहों पर घास आदि बो देनी चाहिए ताकि उसकी जड़ें जमीन के कटाव को रोक सकें और पानी को जमीन के अंदर जाने में मदद कर सकें। 
किसान गर्मी में खेत की जुताई करे तो उसे ढेलेदार अवस्था में रहने दे। बरसात में उथली और गहरी जड़ वाली फसलें बोए। कम वर्षा वाले स्थानों पर खेत में मेड के स्थान पर नाली बनाए। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में खेत के चारों ओर मेड़ बनाना। घर में पानी का उपयोग करते समय भी निम्नलिखित अन्य सावधनियां भी बरती जानी चाहिए - पेयजल को हमेशा ढककर जमीन से ऊँचे स्थान पर रखना। जल स्रोतों के आस-पास हमेशा स्वच्छता बनाए रखना। पेयजल को हमेशा लंबी डंडी वाले बर्तन से निकालना। स्त्रोत के आस-पास गंदा पानी एकत्र नहीं होने देना एवं मल-मूत्र का विसर्जन कतई नहीं करना। कुआँ-तालाब आदि का पानी साफ रहे, इसके लिए आवश्यक है कि उसमें कचरा तथा पूजा सामग्री न डाली जाए तथा संभव हो तो नहाने और कपड़े धोने आदि का काम भी न किया जाए। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि शौचालय का निर्माण जल स्रोत से कम से कम 15 फीट की दूरी पर हो। रिपोर्ट आ रही है कि 2050 तक भारत में पानी की बेहद कमी हो जाएगी। ऐसा अनुमान है कि आने वाले दिनों में औसत वार्षिक पानी की उपलब्धता काफी कम होने वाली है। ऐसे में यदि समय रहते नहीं चेते तो निश्चित रूप से एक दिन वह भी आएगा जब पानी के बिना जीवन सूना हो जाएगा। 
संदर्भ
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2. जल की गुणवत्ता: शुचिता के व्यवहार का प्रभाव, ए.के.सेनगुप्ता, सुलभ इंडिया दिसम्बर 2012
3. भारत में पानी की आपूर्ति और मलजल कैसे उपलब्ध है?
4. गाइडलाइन, 2010, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, राजीव गाँधी राष्ट्रीय पेयजल मिशन, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली
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6- http://hi.vikaspedia.in/rural&energy/best&practices
7- https://m.dailyhunt.in/news/india/hindi


हमारा भारत, स्वच्छ भारत


रश्मि अग्रवाल


आज स्वच्छता की बेहद आवश्यकता है। आज हम अपनी वैज्ञानिक एवं औद्योगिक प्रगति पर गौरवान्वित हैं क्योंकि इसी के कारण हम अनेक सुख-सुविधाओं का उपयोग/उपभोग करते हुए जीवन यापन कर रहे हैं परंतु इनके कारण जहाँ जीवन में गुणवत्ता आई है वहीं पर्यावरण अपकर्षण यानि कचरा निपटान या उससे जुड़ी समस्याएँ भी उजागर हुई हैं। इस समस्या का विश्लेषण करें तो इसकी प्रकृति, दुष्प्रभाव व तरीकों सभी को गंभीरता से समझना होगा। 2 अक्टूबर 2019 तक स्वच्छ भारत के मिशन और दृष्टि को पूरा करने के लिए भारतीय सरकार द्वारा कई सारे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की गई जो कि महान महात्मा गाँधी का 150वाँ जन्म दिवस होगा। ऐसा अपेक्षित है कि भारतीय रुपए में 62000 करोड़ अनुमानित खर्च है। सरकार द्वारा घोषणा की गई है कि ये अभियान राजनीति के ऊपर है और देशभक्ति से प्रेरित है। स्वच्छ भारत अभियान के निम्न कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्य।
- भारत में खुले में मलत्याग की व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन।
- अस्वास्थ्यकर शौचालयों को बहाने वाले शौचालयों में बदलना।
- हाथों से मन की सफाई करने की व्यवस्था को हटाना।
- लोगों के व्यवहार में बदलाव कर अच्छे स्वास्थ्य के लिए जागरुक करना।
- जन-जागरुकता पैदा करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य और साफ-सफाई के कार्यक्रम से लोगों को जोड़ना।
- साफ-सफाई से संबंधित सभी व्यवस्था को नियंत्रित, डिजाइन और संचालन करने के लिए शहरी स्थानीय निकाय को मजबूत बनाना।
- पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से निपटानों का दुबारा प्रयोग और म्यूनिसिपल ठोस अपशिष्ट का पुनर्चक्रण।
- सभी संचालनों के लिए पूँजीगत व्यय में निजी क्षेत्र को भाग लेने के लिए जरूरी वातावरण और स्वच्छता अभियान से संबंधित खर्च उपलब्ध कराना।
भारत में स्वच्छता के दूसरे कार्यक्रम जैसे केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का प्रारंभ 1986 में पूरे देश में हुआ जो कि गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए स्वास्थ्यप्रद शौचालय बनाने पर केंद्रित था। इसका उद्देश्य सूखे शौचालयों को अल्प लागत से तैयार स्वास्थ्यप्रद शौचालयों में बदलना, खासतौर से ग्रामीण महिलाआंे के लिए शौचालयों का निर्माण करना तथा दूसरी सुविधाएँ जैसे हैंड पम्प, नहान-गृह, स्वास्थ्यप्रद, हाथों की सफाई आदि था। यह लक्ष्य था कि सभी उपलब्ध सुविधाएँ ठीक ढंग से ग्राम पंचायत द्वारा पोषित की जाएगी। गाँव की उचित सफाई व्यवस्था जैस जल निकासी व्यवस्था, सोखने वाला गड्ढा, ठोस और द्रव अपशिष्ट का निपटान, स्वास्थ्य शिक्षा के प्रति जागरुकता, सामाजिक, व्यक्तिगत, घरेलू साफ-सफाई व्यवस्था आदि की जागरुकता हो।
ग्रामीण साफ-सफाई कार्यक्रम का पुनर्निमाण करने के लिए भारतीय सरकार द्वारा 1999 में भारत में सफाई के पूर्ण स्वच्छता अभियान की शुरुआत हुई। पूर्ण स्वच्छता अभियान को बढ़ावा देने के लिए साफ-सफाई कार्यक्रम के तहत जून 2003 के महीने में निर्मल ग्राम पुरस्कार की शुरुआत हुई। ये एक प्रोत्साहन योजना थी जिसे भारत सरकार द्वारा 2003 में लोगों को पूर्ण स्वच्छता की विस्तृत सूचना देने पर, पर्यावरण को साफ रखने के लिए साथ ही पंचायत, ब्लाॅक, और जिलों द्वारा गाँव को खुले में शौच करने से मुक्त करने के लिए प्रारंभ की गई थी।
इस वर्ष यानि 2018 के सर्वेक्षण में 4302 शहरों और नगरपालिकाओं के क्षेत्रों ने इसमें भाग लिया जबकि पिछले वर्ष मात्र 432 शहरों ने और 2016 में मात्र 73 शहरों ने भाग लिया था। पश्चिम बंगाल के शहरों ने इस वर्ष पहली बार स्वच्छता सर्वेक्षण में भाग लिया तो देश भर के कैंटोनमेंट बोर्डाें को भी इसी वर्ष सर्वेक्षण से जोड़ा गया। मध्य प्रदेश का इंदौर निरंतर दूसरे वर्ष भी देश का स्वच्छ नगर पालिका परिषद हैं, जिसे 'स्वच्छ छोटी सिटी' का तमगा मिला है। ऐसे ही झारखंड को देश का सबसे स्वच्छ राज्य आंका गया है, इस सूची में उत्तर प्रदेश की रैंकिग 18वी है, तो झारखंड के नौ शहर शीर्ष सौ स्वच्छ शहरों में भी शामिल हैं। इस वर्ष के सर्वेक्षण ने दिल्ली और उत्तर प्रदेश केा थोड़ा गौरवान्वित होने का अवसर दिया है। नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् के अतिरिक्त दक्षिण दिल्ली नगर निगम पिछले साल की 202वीं रैंकिग से सुधकर 32वें स्थान पर पहुँच गया है, हालांकि पूर्व और उत्तर दिल्ली नगर-निगम की दशा बदतर है। उत्तर प्रदेश मंें वाराणसी सूबे का सबसे अच्छा शहर है, जिसकी गिनती 32 से सुधरकर 29  हो गई है, पर सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि गाजियाबाद, अलीगढ़ की है, जो पिछले वर्ष 351वीं पायदान से उछलकर 36वें स्थान पर आ गया है। गाजियाबाद, अलीगढ़ और समधर ;झांसीद्ध को कचरा निस्तारण में सर्वोत्तम निस्तारण में सर्वोत्तम बंधन हेतु पुरस्कृत भी किया गया है। जबकि उत्तर प्रदेश के तीन शहर सबसे गंदे शहरों में भी हैं, जिनमें गौंडा के अतिरिक्त गाजियाबाद की खोड़ा-मकनपुर नगरपालिका परिषद् भी है। देश के 25 सबसे गंदे शहरों में से 19 शहर पश्चिम बंगाल के हैं, पर आशा की किरण दिखाई देती है कि साफ-सफाई का वातावरण बनने से इस राज्य मंे भी स्थिति सुधरेगी, जो अभी नागालैंड, पुडुचेरी और त्रिपुरा के साथ देश के सबसे गंदे राज्यों में से हैं। इस प्रकार के सर्वेक्षण तो होते रहने चाहिए ताकि देश के प्रत्येक हिस्से की स्वच्छता का ज्ञान होता रहे पर सिर्फ सर्वेक्षणों से तो बात नहीं बनती, स्वच्छता को स्थायी रूप से हमारी संस्कृति का हिस्सा बनना चाहिए क्योंकि देखा गया है कि सर्वेक्षण के समय शासन-प्रशासन इस मोर्चे पर अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं। 
1975 में शिव रामन समिति को सुझाव कुछ इस प्रकार थे कि बड़े-बड़े कूड़ेदानों की स्थापना, मानव द्वारा अपशिष्टों को भूमि में दबाना (जिसमें प्लास्टिक न हो) रेनडरिंग के अंतर्गत वसा, पंख, रक्त आदि पशु-अवशेषों को पकाकर चर्बी, जिसमें साबुन बनाना, कचरे से ऊर्जा प्राप्ती इसमें मिश्रित कार्बनिक पदार्थों का विशेष प्रक्रिया से गर्म कर 'मिथेन गैस' ईंधन के रूप में तैयार करना, नगरीय जल-मल को नगर से दूर गर्त में डालना ताकि वहीं  से शुद्धिकरण के पश्चात्  सिंचाई आदि में  प्रयोग किया जाए। उद्योगों में कचरा निस्तारण हेतु कानूनी रूप से बाध्य किया जाना, अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण कर रद्दी कागज, लोहे की कतरनों से स्टील, एल्युमीनियम के टुकड़ों से पुनः एल्युमीनियम, व्यर्थ प्लास्टिक की समुचित व्यवस्था, सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर अपशिष्ट पदार्थों का प्रबंधन एवं उनके उपयोगों के संबंध में निरंतर शोध एवं विकसित देशों को विकासशील देशों की वे सभी तकनीकें प्रदान करनी चाहिए जो अपशिष्ट निस्तारण एवं पर्यावरण संतुलन में सहायक हों।
संदर्भ- 1. अमर उजाला  2. दैनिक जागरण  3. दैनिक हिंदुस्तान  4. जनवाणी


राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत (लेखिका)
वाणी अखिल भारतीय हिंदी संस्थान, बालक राम स्ट्रीट, नजीबाबाद-246763 (बिजनौर) 


E.mail- rashmivirender5@gmail.com


सबसे प्यारी संस्कृति हमारी


अमन कुमार


भारत की संस्कृति महान है और इसका इतिहास गौरवशाली है। यहाँ के रीति-रिवाज, भाषाएँ और परंपराएँ परस्पर विविधताओं के बावजूद एकता स्थापित करती हैं। हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख जैसे अनेक धर्मों की जन्मभूमि होने का गौरव भारत को प्राप्त है। भारतीय संस्कृति को जानने से पहले संस्कृति शब्द को समझने का प्रयास करते हैं। 'संस्कृति' संस्कृत भाषा की धातु 'कृ' (करना) से बना है। 'कृ' धातु से तीन शब्द बनते हैं 'प्रकृति' (मूल स्थिति), 'संस्कृति' (परिष्कृत स्थिति) और 'विकृति' ;अवनति स्थितिद्ध। जब 'प्रकृत' या कच्चा माल परिष्कृत किया जाता है तो यह 'संस्कृत' हो जाता है और जब यह बिगड़ जाता है तो 'विकृत' हो जाता है। इस प्रकार संस्कृति का अर्थ है - उत्तम स्थिति। 
रीति-रिवाज, रहन-सहन, आचार-विचार, अनुसंधान आदि से मनुष्य पशुओं से अलग दिखता है। यही सभ्यता और संस्कृति है। सभ्यता भौतिक सुखों की प्रतीक होती है और संस्कृति मानसिक समृद्धि की प्रतीक होती है। मानसिक उन्नति ही उत्तम संस्कृति का कारण बनती है। जिसमें धर्म, दर्शन, सभी ज्ञान-विज्ञानों और कलाओं, सामाजिक तथा राजनीतिक संस्थाओं और प्रथाओं का दर्शन होता है। 
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के शब्दों में - 'संस्कृति जीवन की उन अवस्थाओं का नाम है, जो मनुष्य के अंदर व्यवहार, लगन और विवेक पैदा करती है। यह मनुष्यों के व्यवहारों को निश्चित करती है, उनके जीवन के आदर्श और सिद्धांतों को प्रकाश प्रदान करती है। '
पं. जवाहरलाल नेहरू ने विचार प्रकट किए हैं कि - 'संस्कृति का अर्थ मनुष्य का आंतरिक विकास और उसकी नैतिक उन्नति है, पारंपरिक सदव्यवहार है और एक-दूसरे को समझने की शक्ति है।'
सत्यकेतु विद्यालंकर ने लिखा है - 'मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग कर कर्म के क्षेत्र में जो सृजन करता है, उसको संस्कृति कहते हैं।'
रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार - 'संस्कृति मानव जीवन में उसी तरह व्यापत है, जिस प्रकार फूलों में सुगंध और दूध में मक्खन। इसका निर्माण एक या दो दिन में नहीं होता, युग-युगांतर में संस्कृति निर्मित होती है।'
संस्कृति और सभ्यता दोनों शब्द प्रायः पर्याय के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। परंतु दोनों में भिन्नता है, दोनों के अर्थ अलग हैं। संस्कृति व्यक्ति और समाज में निहित संस्कारों से है जिसका वास मानस है। जबकि सभ्यता क्षेत्र व्यक्ति और समाज के बाह्य स्वरूप में है। 'सभ्य' का शाब्दिक अर्थ है, 'जो सभा में सम्मिलित होने योग्य हो'। इसलिए, सभ्यता ऐसे सभ्य व्यक्ति और समाज के सामूहिक स्वरूप को आकार देती है। 
हमारे देश में बोली जाने वाली भाषाओं की बड़ी संख्या ने यहाँ की संस्कृति और पारंपरिक विविधता को सुदृढ़ बनाया है। यहाँ दो प्रमुख भाषा संबंधी परिवार हैं - आर्य भाषाएं और द्रविण भाषाएं, इनमें पहली भाषा के परिवार मुख्यतः भारत के उत्तरी, पश्चिमी, मध्य और पूर्वी क्षेत्रों में हैं जबकि दूसरा भाषा परिवार दक्षिणी भाग में। भारत में धर्म विभिन्नता भी है। भारत हिंदू बाहुल्य होते हुए भी सभी धर्मों का सम्मान करता है। सिख, जैन और  बौद्ध भारत में जनमे हैं। इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी और बहाई धर्मों के मानने वाले लोग भी काफी मात्रा में यहाँ रहते हैं। भारत में जाति व्यवस्था बड़ी प्रबल है। जाति के आधार पर चार प्रमुख विभाजन हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। विभिन्न धर्म और जातियों के कारण परंपराओं की विभिन्नता स्पष्ट देखने को मिल जाती है। गाय और गाय के दूध का महत्वपूर्ण स्थान है। सुबह के खाने से पहले इन्हें भोग लगाना शुभ माना जाता है। 
नमस्ते या नमस्कार या नमस्कारम् अथवा प्रणाम भारतीय उपमहाद्वीप में अभिनंदन या अभिवादन करने के सामान्य तरीके हैं। 
विभिन्न धर्मों के त्योहारों पर सार्वजनिक छुट्टियां होती हैं। तीन राष्ट्रीय अवकाश  हैं, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंती। लोकप्रिय धार्मिक त्यौहार में हिंदुओं की दिवाली, गणेश चतुर्थी, होली, नवरात्रि, रक्षाबंधन और दशहरा के अलावा संक्रांति, पोंगल और ओणम हैं। कुंभ का मेला प्रति 12 साल के बाद 4 अलग-अलग स्थानों हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन में लगता है, जिसमें करोड़ों हिंदू हिस्सा लेते हैं। कुछ त्योहार कई धर्मों द्वारा मनाया जाता है। हिंदुओं, सिखों और जैन समुदाय के लोगों द्वारा मनाई जाने वाली दिवाली और बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के लोगों द्वारा मनाई जाने वाली बुद्ध पूर्णिमा। इस्लामी त्यौहार ईद-उल-फित्र, ईद -उल-अजा और रमजान भी पूरे भारत के मुसलामानों द्वारा मनाए जाते हैं। भातीय व्यंजनों में मसालों और जड़ी-बूटियों का प्रयोग होता है। भारतीय व्यंजन अलग-अलग क्षेत्र के साथ बदलते हैं। महिलाओं के लिए पारंपरिक भारतीय कपड़ों में शामिल हैं, साड़ी, सलवार कमीज और घाघरा चोली, धोती, लुंगी, और कुर्ता पुरुषों के पारंपरिक वस्त्र हैं। दक्षिण भारत के पुरुष सफेद रंग का लंबा चादरनुमा वस्त्र पहनते हैं जिसे अंग्रेजी में धोती और तमिल में वेष्टी कहा जाता है। धोती के ऊपर, पुरुष शर्ट, टी शर्ट या और कुछ भी पहनते हैं जबकि महिलाएं साड़ी पहनती हैं। बिंदी महिलाओं के शृंगार का हिस्सा है। लाल बिंदी और सिंदूर केवल शादीशुदा हिंदू महिलाओं द्वारा ही लगाई जाती है।
रामायण और महाभारत प्रसिद्ध माहाकाव्य हैं। भारतीय संगीत का प्रारंभ वैदिक काल से भी पूर्व का है। पंडित शारंगदेव कृत संगीत 'रत्नाकर' ग्रंथ में भारतीय संगीत की परिभाषा 'गीतम, वादयम्' तथा 'नृत्यं त्रयम संगीत मुच्यते' कहा गया है। गायन, वाद्य वादन एवम् नृत्य तीनों कलाओं का समावेश संगीत शब्द में माना गया है। भारत की सभ्यताओं में संगीत का बड़ा महत्व है। संगीत भारतीय संस्कृति की आत्मा कही जाती है। भारतीय नृत्य में भी लोक और शास्त्रीय रूपों में कई विविधताएं हैं। लोक नृत्यों में पंजाब का भांगड़ा, असम का बिहू, झारखंड और उड़ीसा का छाऊ, राजस्थान का घूमर, गुजरात का डांडिया और गरबा, कर्नाटक का यक्षगान, महाराष्ट्र का लावनी और गोवा का देखननी शामिल हैं। भारत की संगीत, नृत्य और नाटक की राष्ट्रीय अकादमी द्वारा आठ नृत्य रूपों, कई कथा रूपों और पौराणिक तत्व वाले कई रूपकों शास्त्रीय नृत्य का दर्जा दिया गया है। ये हैं- तमिलनाडु का भरतनाट्यम, उत्तर प्रदेश का कथक, केरल का कथककली और मोहिनीअट्टम, आंध्र प्रदेश का कुच्चीपुड़ी, मणिपुर का मणिपुरी, उड़ीसा का ओडिसी और असम का सत्तिरया।
रवीन्द्रनाथ टैगोर को आधुनिक साहित्य का प्रतिनिधि माना जाता है। रामधारी सिंह दिनकर, सुब्रमनियम भारती, राहुल सांकृत्यायन, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, माइकल मधुसूदन दत्त, मुंशी प्रेमचंद, देवकी नंदन खत्री, गिरीश कर्नड, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, वैकोम मुहम्मद बशीर,  महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम, कुर्रतुलएन हैदर आदि भारत के प्रसिद्ध लेखक हुए हैं। भारत में ऋग्वेद के समय से कविता के साथ-साथ गद्य रचनाओं की परंपरा है। कविता प्रायः संगीत की परंपराओं से संबद्ध होती है और कविताओं का एक बड़ा भाग धार्मिक आंदोलनों पर आधारित होता है या उनसे जुड़ा होता है। स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रवाद और अहिंसा को प्रोत्साहन के लिए कविता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  भारतीय संगीत और नृत्य के साथ-साथ भारतीय नाटक और थियेटर का भी लंबा इतिहास है। कालिदास के नाटक शाकुंतलम् और मेघदूत पुराने नाटक हैं, जिनके बाद भास के नाटक आए। 
भारतीय चित्रकला की सबसे शुरूआती कृतियाँ पूर्व ऐतिहासिक काल में शैलचित्रों के रूप में थीं। अजंता, बाघ, एलोरा गुफा चित्र और मंदिरों में बने चित्र प्रकृति प्रेम को प्रमाणित करते हैं। सबसे पहली और मध्यकालीन कला, हिंदू, बौद्ध या जैन हैं। रंगे हुए आटे से बनी रंगोली दक्षिण भारतीय घरों के दरवाजे पर आम तौर पर देखी जा सकती है। मधुबनी चित्रकला, मैसूर चित्रकला, राजपूत चित्रकला, तंजौर चित्रकला और मुगल चित्रकला, भारतीय कला की उल्लेखनीय विधाएं हैं। भारत की पहली मूर्तिकला के नमूने सिंधु घाटी सभ्यता के जमाने के हैं। उत्तर पश्चिम में भारतीय, शास्त्रीय हेलोनिस्टिक या ग्रीक-रोमन प्रभाव का मिश्रण भी मिलता है। मौर्य और गुप्त साम्राज्य तथा उनके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में, कई बौद्ध वास्तुशिल्प परिसर, जैसे कि अजंता, एलोरा और सांची स्तूप बनाया गया। बाद में, दक्षिण भारत में कई हिंदू मंदिरों का निर्माण हुआ। बेलूर का चेन्नाकेसवा मंदिर, सोमनाथ का केसव मंदिर, तंजावुर का ब्रिहदीस्वर मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर, श्रीरंगम का श्री रंगनाथस्वामी मंदिर और भट्टीप्रोलू का बुद्ध स्तूप, अंगकोरवट, बोरोबुदूर और अन्य बौद्ध और हिंदू मंदिर जो कि पारंपरिक भारतीय धार्मिक भवनों की शैली में बने हैं। श्री स्वामीनारायण मंदिर, वडताल, गुजरात पश्चिम से इस्लाम के आगमन के साथ ही, भारतीय वास्तुकला ने भी नए धर्म की परंपरा को अपनाया। इस दौर में फतेहपुर सीकरी, ताजमहल, गोल गुंबद, कुतुब मीनार दिल्ली का लाल किला आदि इमारतें तथा यूरोपीय शैलियों में विक्टोरिया मेमोरियल, विक्टोरिया टर्मिनस इसके उदाहरण हैं। 
हाॅकी भारत का राष्ट्रीय खेल है, मुख्य रूप से क्रिकेट भारत का सबसे लोकप्रिय खेल है, बल्कि न केवल भारत बल्कि पूरे उपमहाद्वीप में ये खेल मनोरंजन और पेशेवर तौर पर फल फूल रहा है। पारंपरिक स्वदेशी खेलों में शामिल हैं कबड्डी और गिल्ली-डंडा, जो देश के अधिकांश भागों में खेला जाता है। शतरंज, सांप और सीढ़ी, ताश, पोलो, कैरम, बैडमिंटन भी लोकप्रिय हैं। शतरंज का आविष्कार भारत में किया गया था। प्राचीन भारत में रथ दौड़, तीरंदाजी, घुड़सवारी, सैन्य रणनीति, कुश्ती, भारोत्तोलन, शिकार, तैराकी और दौड़ प्रतियोगिताएं होती थीं। 
भारत के विचारकों ने विश्वभर में प्रसिद्धि प्राप्त की। स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए और वहाँ उन्होंने विश्व धर्म संसद में वक्तव्य देकर सबको प्रभावित किया। महात्मा गाँधी, रवींद्रनाथ टैगोर आदि ने राजनीतिक दर्शन के नए रूप को जन्म दिया जिसस आधुनिक भारत और उदारवाद बना।
संदर्भ
1. संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर
2. हिंदू सभ्यता, डाॅ. राधाकुमुद मुखर्जी
3. प्राचीन भारत का इतिहास
4- https://hi.wikipedia.org
5- http://bharatdiscovery.org
6- Meaning of culture- Cambridge English Dictionary
7- https://hindi.mapsofindia.com/culture


मैं और मेरा विद्यालय


सुधीर राणा
प्रभारी प्रधानाध्यापक
-पू.मा. विद्यालय अकबरपुर आॅवला


प्रकृति श्रेष्ठ कार्य के लिए श्रेष्ठ पर्सन का चुनाव करती है। मैं हृदय से प्रकृति का आभारी हूँ कि उसने अध्यापन जैसे श्रेष्ठ कार्य करने के लिए मेरा चुनाव किया। मैं और मेरी टीम विद्यालय के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हैं।
पू.मा. विद्यालय अकबरपुर आंवला जनपद बिजनौर (उ.प्र.) के विकास खंड नजीबाबाद की ग्राम पंचायत अकबरपुर आंवला के ग्राम किशनपुर मुरशदपुर लिंक मार्ग पर 29.590 अक्षांश तथा 78.390 देशान्तर पर अवस्थित है। बेसिक शिक्षा परिषद्/शाखा द्वारा 2007 में विद्यालय की स्थापना हुई और 01 जुलाई 2008 से कक्षा 6-8 का संचालन आरम्भ हुआ।
इसके पूर्व ग्राम पंचायत में प्राथमिक स्तर पर सरकारी तथा उच्च शिक्षा के लिये निजी संस्थाएं व मदरसे संचालित थे। सांविधानिक बाल अधिकार के अंतर्गत लागू कार्यक्रम सर्व शिक्षा अभियान में इस विद्यालय की स्थापना उच्च प्राथमिक कक्षाओं के लिए की गई।
आरंभ में विद्यालय में प्रधानाध्यापक श्री मदनगोपाल टाॅक व श्रीमती सरिता रानी, सहायक अध्यापक दो टीचर नियुक्त हुए तथा लगभग 900 वर्गमीटर में बने विद्यालय में लगभग 60-80 बच्चे अध्ययन करते थे। चार दीवारी न होने तथा असमतल परिसर के कारण गैर शैक्षणिक गतिविधियों तथा अच्छा शैक्षणिक वातावरण प्रदान करना जटिल रहा पर टीचर्स द्वारा अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयासों से विद्यालय का नामांकन बढ़कर 100 की संख्या को पार कर गया। 2013 में शासन द्वारा 100 से अधिक नामांकन द्वारा उच्च प्राथमिक विद्यालयों में अंशकालिक अनुदेशकों की नियुक्ति की गई थी। इस योजना में आलोक कुमार खेल एवं स्वास्थ्य, शाजिया कला तथा सुमित कुमार (1 वर्ष बाद) कृषि विषय के रूप में नियुक्त हुए। मुस्लिम बहुल गांव होने के कारण वैकल्पिक विषय/भाषा के रूप में अधिकतर बच्चों उर्दू का चयन करते थे। फरवरी 2014 में शबाना उर्दू टीचर की नियुक्ति के बाद सभी विषय-भाषा के टीचर की पूर्ति हुई तथा विद्यालय का शैक्षणिक वातावरण और सुधरने लगा।
01 जुलाई 2014 को प्रधानाध्यापक मदन गोपाल जी के सेवानिवृत्त होने पर मुझे विद्यालय प्रधानाध्यापक का दायित्व विभाग द्वारा सौंपा गया। इससे पहले मेरा अनुभव 04 वर्ष निजी विद्यालय तथा 13 वर्ष प्राथमिक विद्यालय में अध्ययन कार्य था।
मैंने अपने सभी टीचर्स के साथ पहली बैठक में विद्यालय को आदर्श व प्रगतिशील रूप देने का सपना देखा व इसे करने में तन्मयता के साथ जुट गए। हमारे प्रयासों में खंड शिक्षा अधिकारी, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी तथा डायट से उचित दिशा निर्देश तथा ग्राम पंचायत सचिव और प्रधान श्री सुशील चैहान का पूरा सहयोग मिला।
विद्यालय की विकास यात्रा को असली पंख तब लगे जब वर्ष 2015 में विद्यालय का नामांकन राष्ट्रीय स्वच्छता/बच्चों के व्यवहार परिवर्तन के लिए किया गया। विद्यालय परिसर के ठीक सामने कूड़ी (ग्रामीणों के कूड़े के ढेर) पड़ी होने के कारण हम उक्त पुरस्कार से वंचित कर दिए गए, पर हमने आगे बढ़ने की प्रेरणा ली। समुदाय के तथ प्रशासन के सहयोग से हमने विद्यालय के सामने स्वच्छता अभियान चलाकर कूड़े के स्थान पर खड़ंजा बिछवाया और पौधारोपण किया।
परिसर के ठीक ऊपर से गुजरने वाली 440 वोल्ट की विद्युत लाइन को सड़क पर शिफ्ट कराया। बालक-बालिका के अलग-अलग नए शौचालय, मल्टी हैंड वाश काॅर्नर बनवाए, रसोईघर को नया रूप दिया। एमडीएम टीन शेड का निर्माण कराया। प्रे-ग्राउंड/चबूतरा/मंच तथा लघु वाटिका विकसित की। सबमर्सेबल विद ओवर हैड टैंक तथा इंवरटर से निरंतर निबार्धित पानी व बिजली की सप्लाई प्राप्त होने लगी।
इसमें ग्राम पंचायत से निरन्तर सहयोग मिलता रहा, अब तक विद्यालय भौतिक रूप से नये क्लेवर में आ चुका था।
अगस्त 2016 में विद्यालय का चयन ज्योतिर्गमय योजना के लिए किया गया। इसके 02 वर्ष बाद जिला अधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी, व बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा उत्कृष्ट कार्य के लिए विद्यालय को जनद स्तर पर सम्मानित किया गया।
हमारे द्वारा किए गए विशिष्ट प्रयास निम्न प्रकार रहे:-
1. नामांकन:- वर्ष 2014-15 में 108 से बढ़कर वर्तमान में 289 बच्चे नामांकित है।
2. उपस्थिति:- दैनिक उपस्थिति 95 प्रतिशत तक रहती है। वार्षिक उपस्थिति औसत 83 प्रतिशत है।
3. हिंदी पखवाड़ा:- मातृभाषा हिंदी में सभी बच्चे प्रवीण ही इसके लिए प्रतिवर्ष 15 दिन केवल हिंदी लेखन-वाचन-पाठन का आरंभ कराया जाता है।
4. अकादमिक समूह:- सभी बच्चों को कक्षा/सैक्सनवार एवं परिवार/गली अथवा मौहल्ले के अनुसार बिना जाति-धर्म, लिंग भेद किये 3 से 5 बच्चों के समूह में विभाजित कर दिया शर्त केवल ये रही कि वे बेरोकटोक एक-दूसरे के घर आ जा सके। इनका लीडर कक्षा के टाॅप टेन बच्चों में से कोई एक रही।
इसके उद्देश्य निम्न प्रकार रहे-
क. अनुपस्थित बच्चों की सूचना:- उसी दिन प्राप्त होना
ख. अनुपस्थित बच्चों का गृह कार्य:- उसी दिन जाकर पूर्ण कराया जाना
ग. समूह में बैठकर गृह कार्य/ स्वाध्याय करना।
5. प्रोत्साहन:- अनुशासन बनाने के लिए दंड के स्थान पर प्रोत्साहन को बढ़ावा दिया गया। बैस्ट अटैन्डैन्स, फ्लावर एंड पर्सनैलिटी आॅफ द वीक स्टाॅर आॅफ द मंथ, प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार, परीक्षा में प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं टाॅप टैन को पुरस्कार/प्रोत्साहन दिए जाते हैं। साथ ही प्रतिदिन स्कूल आने वाले बच्चों के अभिभावकों को भी सम्मानित किया जाता है।
6. इकोक्लब:- शासन के आदेशानुसार विद्यालय में एक लघुवाटिका विकसित की गई तथा एक इको समिति बनाई गई जो विद्यालय के साथ-साथ सार्वजनिक स्थलों पर पेड़-पौधे लगाने तथा लोगों से लगवाने का कार्य एवं देख-रेख का कार्य करती है।
7. आईसीटी/स्मार्ट क्लास:- विद्यालय में कम्प्यूटर एवं प्रोजेक्टर के प्रयोग से स्मार्ट क्लास का संचालन किया जा रहा है। बच्चों को विभिन्न विषयों की जानकारी आॅडियो , विडियो के साथ दी जाती है।
8. स्टूडेंट पुलिस कैडेट:- शासनादेश व कार्यालय से प्राप्त निर्देशों के आधार पर एसपीसी कार्यक्रम का संचालन किया जा रहा है। जिसमें बच्चों को सड़क के निमय तथा कानूनी धाराओं की जानकारी दी जाती है।
9. सामाजिक सरोकार एवं स्वच्छता:- विद्यालय अपने सामाजिक सरोकार के लिए आना जाता है, विद्यालय का अपना विशिष्ट अभियान ''स्वच्छ भारत नशामुक्त समाज'' के लिए शपथ, नुक्कड़ बैठके एवं रैलियों का आयोजन किया जाता है।
10. शैक्षिक टूर/आउटिंग:- बच्चों को समय-समय पर आउटिंग के अवसर प्रदान किए जाते हैं। जैसे-बिजनौर, रेडियो स्टेशन, अकाशवाणी, कोटद्वार (कण्व ऋषि आश्रम) आदि स्थानों पर ले आया जाता है।
11. अनुशासन:- विद्यालय का ध्येय वाक्य:- अनुशासन फस्र्ट प्रवेश के समय बच्चों को पानी की बोटल निःशुल्क दी जाती है ताकि बच्चा पानी पीने के बहाने कक्षा छोड़कर बार-बार न भागे।
12. खेल एवं स्वास्थ्य:- विद्यालय में कबड्डी, खो-खो, वैडमिंटन, हाई जंप, पीटी के साथ-साथ स्काउट/गाइड की टीम प्रतिवर्ष बनाई जाती है। जो जिलास्तर तक प्रतिभाग करती है।
13. समय सारिणी में नवीनता:- समय सारिणी में मुख्य धारा के विषयों के अतिरिक्त वाचनालय/पुस्तकालय, गृह विज्ञान, व्यक्तित्व विकास, बागवानी, खेल, योग, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं सामान्य ज्ञान को स्थान दिया गया है एवं समय विभाजन का पालन किया जाता है?
14. पुस्तकालय:- विद्यालय में 1000 से अधिक पुस्तकें सरकारी/व्यक्तिगत प्रयासों से एकत्रित की गई है जो निःशुल्क बच्चों को उपलब्ध कराई जाती है।
15. अभिभावक संपर्क:- प्रत्येक शनिवार को लगातार या अधिक अनुपस्थित बच्चों के अभिभावकां से सम्पर्क कर समस्या की जानकारी एवं समाधान किया जाता है।
16. संगीतमय असेंबली:- विद्यालय में प्रतिदिन म्यूजिक सिस्टम से प्रेयर, प्रेरणा गीत, राष्ट्रीय गान तथा प्रतिभा मंचन ;2 बच्चों से प्रतिदिन मंच पर बुलाकर कोई भी प्रस्तुति देनाद्ध किया जाता है।
17. मीना मंच:- महिला सशक्तिकरण/बालिका व्यक्तित्व विकास के लिए समय-समय पर वर्कशाॅप आयोजन एवं मीनाक का जन्मदिन मनाया जाता है।
18. भौतिक सुधार:- विद्यालय में अच्छे से रंगाई-पुताई, फ्लैक्स बोर्ड चार्ट, वाइट बोर्ड तथा मिड-डे-मील टीन शेड, वाश बेसिन सबमर्सेबल आदि उल्लेखनीय कार्य कराए गए है।
19. पीएलसी वर्कशाॅप:- जनपद स्तर पर एससीईआरटी के निर्देशन पर डायट द्वारा प्रभावी रूप से चलाए जा रहे पीएलसी कार्यक्रम की प्रभावशाली वर्कशाॅप का आयोजन किया जाता है।
विद्यालय को प्राप्त प्रोत्साहन
1. बेसिक शिक्षा निदेशक महोदय एवं बेसिक शिक्षा सचिव महोदया द्वारा 27 अप्रैल 2019 को उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में प्रशस्ति पत्र दिया गया।
2. मंडलायुक्त मुरादाबाद महोदय द्वारा सामाजिक सरोकार के लिए सम्मानित किया गया।
3. ज्योतिर्गमय योजना में अच्छे कार्य के लिए उपजिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी/बेसिक शिक्षा अधिकारी बिजनौर द्वारा सम्मानित।
4. जिला अधिकारी महोदय द्वारा बेस्ट नवाचारी शिक्षक 2018 का पुरस्कार।
5. जिला अधिकारी महोदय द्वारा महिला सशक्तिकरण वर्कशाॅप 2018 में रुपये 15000/- का चैक विद्यालय को दिया गया।
6. राष्ट्रीय स्वच्छता पुरस्कार 2016-17 में नामांकन-जिले में द्वितीय स्थान।
7. मंडल स्तर पर स्मार्ट क्लास प्रदर्शन।
8. राज्य स्तर पर केस स्टडी, उत्कृष्ट विद्यालय, एवं स्मार्ट क्लास के लिए नामांकन।
9. महा-प्रबंधक जल विगम द्वारा औचक निरीक्षण के समय विद्यालय की व्यवस्था से संतुष्ट होकर रुपए 2100.00 का नकद पुरस्कार।
10. विद्यालय के विभिन्न बच्चों को जिला स्तरीय कई प्रतिस्पधाओं में सम्मानित।
विद्यालय परिवार समस्त बच्चों जो सारी व्यवस्था के केंद्र बिंदु है, अभिभावकों, एसएमसी, ग्राम पंचायत, प्रशासनिक अधिकारियों जिनका समय-समय पर सहयोग मिलता है, विभागीय अधिकारियों/समन्वयकों एवं खंड शिक्षा अधिकारी नजीबाबाद जिनके निर्देशों में संप्रत्तियाँ संभव हो पा रही हैं एवं मित्रों तथा परिवार का हृदय से आभार व्यक्त करता है।
मुझे अपने विद्यालय परिवार पर गर्व है।
सुधीर कुमार, प्रधानाध्यापक (प्रभारी)
पूर्व माध्यमिक विद्यालय अकबरपुर आंवला,
नजीबाबाद, बिजनौर
E-mail- skrana1774@gmaill.com



ग्राम प्रधान श्री सुशील कुमार चौहान जी के साथ 


स्वच्छ भारत एवं ग्रामीण विकास


धनीराम
ईमेल- dhaniram1251@gmail.com



इस बार महात्मा गांधी की जयंती 'स्वच्छ भारत' अभियान के रूप में मनायी गई। स्वच्छता की आवश्यकता सभी ने महसूस की तो लोगों ने साफ-सफाई के इस नए अभियान को अपने-अपने तरीके से अपनाया। महात्मा गांधी का मानना था कि 'भगवान के बाद स्वच्छता का स्थान है।'यह भी विदित है कि सफाई न होने के कारण बहुत सी बीमारियां होती हैं, जिनके ऊपर बहुत सा पैसा खर्च होता है। उदाहरण के तौर पर भारत में गंदगी के कारण हर नागरिक को वार्षिक लगभग 6500 रुपए की हानि होती है। यह बीमारी के कारण होता है। अगर संपन्न लोगों को इससे दूर कर दिया जाए तो गरीबों पर सालाना 12-13 हजार का बोझ केवल गंदगी के कारण होता है। अगर स्वच्छता हो जाए तो फिर इस पैसे को अन्य कार्यों में लगाया जा सकता है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत इन पांच वर्षों में 62 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। अगले पांच वर्ष के बाद यानी 2019 में गांधीजी की 150वीं जयंती के मौके पर भारत स्वच्छ देशों की कतार में खड़ा होगा। यहाँ पर हम चर्चा कर रहे हैं कि इस मिशन को कैसे सफल बनाया जा सके, कैसे आम आदमी इस आंदोलन का हिस्सा बन सके? पंचायतों की भूमिका को कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है?
स्वच्छ भारत अभियान को स्वच्छ भारत मिशन और स्वच्छता अभियान भी कहा जाता है। यह एक राष्ट्रीय स्तर का अभियान है और सरकार द्वारा चलाया जा रहा है। इस अभियान को अधिकारिक तौर पर राजघाट नई दिल्ली में 2 अक्टूबर 2014 को महात्मा गाँधी की 145 वीं जयन्ती पर हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी के द्वारा प्रारंभ किया गया। भारत सरकार इस वर्ष 2 अक्टूबर 2019 को जब गाँधी जी की 150 वीं जयन्ती होगी तब यह दिन हम सभी के लिए महत्वपूर्ण होगा क्योंकि 2 अक्टूबर 2019 तक भारत को स्वच्छ भारत बनाने का लक्ष्य रखा गया है। यह कार्यक्रम हमारे ग्रामीण विकास को एक गति प्रदान करेगा।
इस अभियान में बहुत ही रुचि पूर्ण तरीका अपनाया जा रहा है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति 9 लोगों को इस कार्य में आमंत्रित करेगा और उसके पश्चात् के 9 लोग अपने साथ अलग-अलग अन्य 9 लोगों को जोड़ेंगे इस प्रकार यह एक बहुत बड़ी शृंखला बन जाएगी। इस कार्यक्रम के शुभारंभ के दिन प्रधानमंत्री जी ने नौ लोगों के नामों की घोषणा भी की थी और इस अवसर पर 30 लाख स्कूल काॅलेज के छात्र-छात्राऐं, शिक्षक, कर्मचारी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। प्रधानमंत्री जी ने देश के प्रत्येक नागरिक से प्रतिवर्ष 100 घंटे साफ-सफाई करने का अनुरोध किया था।
इस कार्यक्रम की सफलता वर्ष 2018 में देखने को मिली जब उत्तर प्रदेशसरकार के आंकड़े सामने आए और जिला बिजनौर खुला शौच मुक्त' (ओडीएफ) में प्रथम स्थान पर आया और बिजनौर जिले की नजीबाबाद तहसील से नगर पंचायत साहनपुर प्रथम स्थान पर रही।
यह कार्यक्रम ग्रामीण विकास की राह खोलता है ग्रामीण क्षेत्रों का विकास होता है। सारी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती होती है स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, निरोग स्वास्थ्य, साफ गलियाँ, साफ सड़के, साफ नालिया आदि इस प्रकार के कार्यक्रम को अपनाकर हम अपने देश के प्रति कर्तव्य को भी पूरा करते हैं और ग्रामीण विकास को बिना किसी अवरोध के गतिशील करते हैं।
दो गाँव की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार- ग्रामीण क्षेत्र में 60 प्रतिशत शौचालय प्रयोग में नहीं लिए जा रहे हैं। उनको स्पेयर के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।
महात्मा गांधी ने स्वच्छता के साथ-साथ एक अन्य महत्वपूर्ण बात कही थी 'स्‍वराज' अर्थात लोगों का अपना राज यानी पंचायती राज। संविधान में पंचायतों को स्थान मिलने का श्रेय भी महात्मा गांधी को जाता है। उन्हीं के प्रभाव के कारण ही पंचायतें संविधान का अंग बनी थीं। स्वच्छता अभियान को सफल बनाने के लिए पंचायतों को ग्रामीण क्षेत्र में और नगरों में नगर पंचायतों को प्रभावी रूप से शामिल करना जरूरी है। इस समय देश में लगभग 2 लाख 25 हजार ग्राम पंचायतें हैं। लगभग 6000 पंचायत समितियां/ क्षेेत्र पंचायत हैं और 600 से अधिक जिला पंचायतें हैं। इनमें लगभग 30 लाख चुने हुए प्रतिनिधि पंच, सरपंच, अध्यक्ष आदि पदों पर आसीन हैं। इनमें लगभग एक तिहाई अर्थात 10 लाख के करीब महिलाएं हैं, जो विभिन्न नगरों से हैं और लगभग 8 लाख के करीब अनुसूचित जाति व जनजाति के नगरों के प्रतिनिधि हैं। गाँवों की हर गली में एक चुना हुआ प्रतिनिधि है, जो यह सोचता है कि वह क्या करे और वह क्यों चुना गया है। अगर उन सभी को इस मिशन में लगा दिया जाए तो वे स्वयं अपने बारे में समझेंगे कि उनकी भी कुछ पहचान है और गाँव भी स्वच्छ होंगे। 73वें संविधान संशोधन के अनुसार पंचायतें अपने स्तर पर आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय की योजना बनाएंगी और ऐसा करते समय वे संविधान की अनुसूची ग्यारह में दर्ज 29 विषयों का भी संज्ञान लेगी। इस अनुसूची में 23वें स्थान पर स्वास्थ्य और स्वच्छता, जिसके अंतर्गत अस्पताल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और औषधालय भी हैं, दर्ज है। जब स्वच्छता इतना महत्वपूर्ण विषय है तो क्यों नहीं पंचायतों को सशक्त करने की जरूरत है। क्यों नहीं उन्हें उचित अधिकार पैसा एवं कर्मी दिए जाने की जरूरत है ताकि वे अपने स्तर पर उचित योजना बनाएं जिसमें स्वच्छता भी शामिल हो।
स्वच्छता मुद्दा यह भी आया कि शहरों का जो कचरा है उसका कैसे निष्पादन किया जाए, क्योंकि कुछ जगहों पर यह विवाद का कारण बना। इस समस्या का समाधान भी संविधान में दिया गया है। संविधान में जिला स्तर पर जिला नियोजन समिति गठित करने का प्रावधान है। इस समिति में तीन चैथाई सदस्य जिला पंचायत एवं नगर पालिकाओं से होंगे। यह समिति जिले की विकास योजनाओं का मसौदा तैयार करेगी और ऐसा करते हुए यह समिति पंचायत एवं नगरपालिकाओं के बीच के मुद्दों पर ध्यान देने के साथ-साथ पानी के बंटवारे व अन्य प्राकृतिक संसाधनों, एकीकृत रूप से संरचना का विकास एवं पर्यावरण संरक्षण को भी ध्यान में रखेगी। स्वच्छता के लिए इस प्रावधान को अमल में लाने की जरूरत है। अफसोस की बात यह है कि कुछ राज्यों को छोड़कर कहीं भी ये समिति गठित ही नहीं हुई और जहां गठित हुई भी तो कार्य नहीं कर रही हैं। स्वच्छता को सफल बनाने के लिए अन्य महत्वपूर्ण पहलू पानी की उपलब्धता है, क्योंकि अगर पानी ही नहीं है तो स्वच्छता को लागू करना कठिन कार्य है। पानी की उपलब्धता के लिए एकीकृत रूप से कार्य करने की जरूरत है। उदाहरण के लिए छतों पर वर्षा जल संग्रह, वृक्षारोपण, जल संचय प्रबंधन की जरूरत है। इसके लिए ग्राम पंचायत स्तर पर ग्राम स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समितियों की सबसे अहम भूमिका है। इन समितियों को समुदाय आधारित स्वास्थ्य सेवाओं के क्रियान्वयन और निगरानी में शामिल किया जाना चाहिए। इन समितियों की भागीदारी पंचायत समिति एवं जिला पंचायत स्तर पर भी होनी चाहिए ताकि स्वच्छता के मुद्दों पर तीनों स्तरों पर चर्चा एवं निर्णय लिए जाएं और फिर सामूहिक रूप से उनको लागू किया जाए।
स्वच्छता के संबंध में अध्ययन एवं मूल्यांकन बताते हैं कि जहां कहीं पंचायतों को पैसा, कार्य एवं कर्मचारी उपलब्ध है वहाँ पर जल एवं स्वच्छता के बारे में परिणाम अच्छे आए हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं ने जहां-जहां ग्रामीणों को संगठित करके उनमें स्वच्छता के प्रति मांग सृजित की है वहाँ पर भी परिणाम अच्छे दिखाई दिए हैं। स्वच्छता के संदर्भ में हमें लोगों की की सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। लोगों को उन गाँवों को दिखाया जाए जहां स्वच्छता के द्वारा अनेक बीमारियों की रोकथाम हुई है। 
देश में इस समय 56.4 करोड़ लोग शौचालय का इस्तेमाल करने में असमर्थ हैं। ये लोग खुले में रेलवे पटरी, पार्क, खेत या सड़कों के किनारे बने खड्डों में शौच के लिए जाते हैं। यह आँकड़ा देश की करीब आधी आबादी से कुछ कम है। ग्रामीण इलाकों में विभिन्न प्रकार के सामाजिक और आर्थिक समूह से संबंधित कुल 61 प्रतिशत लोग खुले में शौच जाते हैं।
एक अनुमान के मुताबिक समूचे विश्व में खुले में शौच जाने वालों की कुल संख्या का 60 प्रतिशत हिस्सा भारत में है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ इन समस्याओं का अधिक शिकार होती हैं। केवल भारत में 30 करोड़ महिलाएँ और लड़कियाँ खुले में शौच जाती हैं। स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टि से महिलाओं को शौचालय की अधिक आवश्यकता होती है। महिलाओं और लड़कियों के लिए शौचालय उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और आत्मसम्मान के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है। 
हमारे देश में स्वच्छता से जुड़ी बीमारियों से मरने वाले बच्चों और महिलाओं की संख्या अधिक है। भारत में समूचे विश्व में डायरिया से मरने वालों की संख्या सबसे अधिक है। यूनिसेफ के मुताबिक हमारे देश में पाँच साल से कम आयु के 400 बच्चे प्रतिदिन डायरिया के कारण मरते हैं। डायरिया का सीधा संबंध शौचालय और स्वच्छता से है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक लाखों महिलाओं और लड़कियों को शौचालय के इस्तेमाल के लिए अपने घर से 300 मीटर तक चलना पड़ता है। गाँवों में निरंतर विकास और निर्माण के कारण खुली जगह कम होती जा रही है ऐसे में कभी-कभी उन्हें खुली जगह ढूँढने के लिए बहुत अधिक दूरी भी तय करनी पड़ती है। 
बहुत से सर्वेक्षणों से साबित होता है कि महिलाओं पर शौचालय की कमी का प्रभाव अधिक पड़ता है। क्योंकि पुरुषों की अपेक्षा उनको नहाने और स्वच्छता बनाए रखने के लिए शौचालय की अधिक जरूरत होती है। सुबह सूरज निकलने से पहले या रात में जब वे शौच के लिए जाती हैं तो उनके साथ हिंसा और शारीरिक शोषण की संभावना बढ़ जाती है। शौच के दौरान घर से निकलने वाली महिलाओं के साथ हिंसा और रेप जैसे मामले समय-समय पर प्रकाश में आते रहे हैं। बहुत से ऐसे मामले पुलिस तक पहुँचते भी नहीं। लेकिन मई 2014 में उत्तर प्रदेश के बदायू में सुबह शौच के लिए घर से निकली दो बहनों के साथ रेप के बाद उन्हें पेड़ से लटकाने की बर्बर घटना ने खुले में महिलाओं के शौच जाने के खतरनाक परिणामों की तरफ नए सिरे से चेताने का काम किया है। 
शौचालय तक पहुँच न रखने वाली 94 प्रतिशत महिलाओं और लड़कियों ने बातचीत में स्वीकार किया कि शौच जाने के दौरान उन्हें विभिन्न प्रकार की हिंसा और यातना का शिकार होना पड़ा। दिल्ली की लड़कियों ने भी माना कि शौच जाने के दौरान रेप और छेड़खानी या फिर शारीरिक यातनाएँ अक्सर होती हैं। शहरों में सामुदायिक शौचालय के इस्तेमाल के लिए भी लड़कियों को घर से दूर जाना पड़ता है। महिलाओं को अक्सर घर या घर के नजदीक या काम पर जन-सुविधाओं के अभाव में मूत्र को रोकना पड़ता है। मूत्र रोकने से ब्लैडर में दबाव बढ़ता है जिससे मूत्राशय का स्तर बढ़कर कभी-कभी किडनी तक पहुँच जाता है। जिससे वे वल्वोवोवे जिनाइटीस जैसी बीमारियों का शिकार होती हैं। इसके अतिरिक्त खुले में शौच जाने वाली महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद कई प्रकार के इन्फेक्शन होने की संभावना अधिक रहती है। 
शौचालों का निर्माण कोई नई योजना नहीं है। इसके प्रयास 1999 से 'संपूर्ण स्वच्छता अभियान' से शुरू हो गए थे। इसका उद्देश्य स्कूलों और आँगनवाड़ी में शौचालयों का निर्माण था। इस अभियान की अवधारणा शौचालय की माँग बनाना और समुदायों को शौचालयों के निर्माण में शामिल करना था। इसके लिए वर्ष 2010 तक का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इस अभियान ने बहुत से घरों में शौचालय तो बना दिए लेकिन लोगों में उसके इस्तेमाल की सोच पैदा करने में असमर्थ रहे। गाँवों के बहुत से घरों में शौचालय तो बने लेकिन घर की लड़कियाँ और महिलाएँ भी उसका इस्तेमाल नहीं कर पाईं क्योंकि इन्हें गोदाम या स्टोर रूम की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा।
सोच बदलने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रणनीतियाँ अपनाई जा रही हैं। इसके पंचायतों की महिलाओं को बकायदा सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों से प्रशिक्षण भी प्राप्त कर रही हैं। 
गाँवों में घूँघट की बात की जाती है तो दूसरी तरफ उन्हीं महिलाओं को परिवार के लोग खुले में शौच के लिए भेजकर शर्मिन्दा करते हैं। पड़ोसी के शौच पर बैठी मक्खी का बाल कैसे उनके खुद के पीने के पानी में पहुँच जाता है, इसे प्रदर्शित कर महिला पंचों और सरपंचों को गाँवों में जागरुकता फैलाने के लिए समझाया जाता है। ऐसे ही तरीकों को बाद में ये महिलाएँ गाँवों में इस्तेमाल करती हैं।
देश में कुल 2.5 लाख पंचायतें हैं। इनमें कुल तीस लाख के करीब प्रतिनिधि पंचायतों में काम कर रहे हैं। इनमें करीब 40 प्रतिशत संख्या महिलाओं की है। संविधान के 73वें संशोधन से वर्ष 1992 से महिलाओं को पंचायतों में मिले आरक्षण के साथ प्रशासन को संभालने का उनका सफर शुरू हुआ था। शुरू में एक तिहाई और बाद में कई राज्यों में पचास प्रतिशत तक मिले इस आरक्षण से करीब 14 लाख महिलाएँ पंचायतों के कामों में हिस्सा ले रही हैं।
संदर्भ
1. ग्राम इस्लामाबाद एवं रामपुर गढ़ी, ब्लाॅक कोतवाली, जनपद बिजनौर में किया गया सर्वेक्षण 
2.अमर उजाला, मेरठ संस्करण
3. दैनिक जागरण, मेरठ संस्करण
4.डाॅ. महीपाल, https://www.jagran.com
5- www.wikipedia.com


तेलुगु भाषा और साहित्य की समग्र झाँकी 


 


प्रख्यात जर्मन दार्शनिक हेगेल (जिन्हें हिंदी वाले प्यार से हीगल कहते हैं) कहा करते थे कि पुस्तक की भूमिका स्वरूप लिखे गए उनके वक्तव्य को गंभीरता से न लिया जाए क्योंकि मुख्य है उनकी कृति। लेकिन उनके विपरीत फ्रेंच दार्शनिक जाक देरिदा ने कहा कि भूमिका-लेखन कृति के पाठ के पश्चात तैयार किया गया वक्तव्य है जो कृति से पहले पढ़ा जाता है। उन्होंने भूमिका-लेखन से परहेज किया और माना कि प्रस्तुत कृति उनकी अगली कृति की भूमिका है और उनका समस्त लेखन भूमिकाओं की एक अखंड शृंखला।  गुर्रमकोंडा नीरजा की इस कृति 'तेलुगु साहित्य: एक अंतर्यात्रा' के प्रथम पाठ से ये दो विचारक और उनके विचार अनायास  सामने आते हैं। 
इस कृति में लेखिका द्वारा दी गई कोई भूमिका नहीं है किंतु समस्त टेक्स्ट उस भूमिका का साधिकार और समर्थ निर्वाह है। भूमिका स्वरूप चार विद्वानों - प्रो.राज मणि शर्मा, प्रो. देवराज, प्रो. योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण' और प्रो. एम. वेंकटेश्वर -  के अभिमत और पाठ हैं जिनसे एक और पाठकीय पाठ तैयार हो सकता है। प्रो. ऋषभदेेेव शर्मा की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर उन्हें यह कृति सादर भेंट की गई है। लेखिका ने इस दशक में ही दर्जन भर ग्रंथों का लेखन, संपादन और अनुवाद करके अपनी प्रांजल प्रतिभा से अमित पहचान बनाई है। इतने ही पुरस्कार प्राप्त करके यश भी कमाया है। हिंदी और तेलुगु भाषियों के बीच की अपरिचय की गोल-गाँठ को ढीला किया है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय से प्राप्त वित्तीय अनुदान से ;प्रकाशित और निदेशालय के 'हिंदीतर भाषी हिंदी लेखक पुरस्कार द्वारा पुरस्कृत भीद्ध इस पुस्तक में हिंदी भाषा के माध्यम से दक्षिण भारत की एक महत्वपूर्ण भाषा के साहित्य और साहित्यकारों से परिचय तो प्राप्त होता ही है, कई रचनाकारों के प्रति जिज्ञासा, भक्ति और प्रेम भी उत्पन्न हो जाता है। यह इस रचना का प्रभाव है। 
सात खंडों में निबद्ध इस टेक्स्ट में पहला खंड तेलुगु भाषा और साहित्य का प्रामाणिक परिचय देता है और अंतिम खंड इस भाषा के प्रमुख रचनाकारों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करता है। इन दोनों खंडों के बीच तेलुगु साहित्य का मानो समस्त संसार ही हस्तामलकवत प्रस्तुत है। हिंदी के आम पाठक को इस कृति के पाठ से अहसासे कमतरी ;पदमितपवपतजल बवउचसमगद्ध होगा जैसा  मुझे भी हुआ। कितना कम जानते हैं हम अपने ही देश के रचनाकारों को! महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बहुत साल पहले इंग्लिश और संस्कृत से ही नहीं, भारत की अन्यान्य भाषाओं से 'ज्ञान रत्न' लेने की अनुशंसा की थी। तुलनात्मक अध्ययन तथा अनुवाद के माध्यम से बहुत कुछ सुलभ है भी। हमें इस प्रकार के ग्रंथों से बहुत कुछ एक स्थान पर मिल जाता है। इसलिए इस कृति का दोगुना महत्व है। शोधरथी और शोधार्थी दोनों को इसमें अनेक शोधकार्यों की प्रेरणा मिलेगी। तुलनात्मक अध्ययन और साहित्य के अनुवाद में लगे विद्वानों का मन इसमें रमेगा। आम पाठक को तेलुगु साहित्य, भाषा और भाषाविज्ञान का सहज बोध होगा। 
निश्चय ही इस पुस्तक के लेखन में एक दशक लगा होगा। तेलुगु गद्यदृपद्य का अनुवाद प्रस्तुत करना, समुचित संदर्भ देकर अपनी बात को प्रमाण सहित प्रस्तुत करना, रचनाओं और रचनाकारों के वैविध्य को रेखांकित करते हुए चलना, साहित्य के विभिन्न आंदोलनों और विमर्शों को स्थापित करना लेखिका का साध्य रहा है। साधन रहा है तेलुगु भाषा के माध्यम से किया गया सृजनात्मक लेखन - विपुल लेखन। पता चलता है कि  तेलुगु साहित्य और संवेदना का विकास भी उसी प्रकार हुआ है जैसे हिंदी और भारत की अन्य भाषाओं का। यह जानकर उत्साहित पाठक इस पुस्तक को कई बार पढ़ता है। जैसे दूध का भरा कटोरा और उसके ऊपर सरस मलाई, वैसा है दृखंड एक। और दूध के घूँट जैसे अन्य आलेख किसी को भी गटकोय कंठ तर होगा। मैं  'न. गोपि' के खंड को कई बार पढ़कर सोचने लगा था यह अलग से ही एक पुस्तक हो सकती थी। कई प्रकरण पुस्तकों की रूपरेखाओं से कम नहीं। 
कई विद्वान दूसरों की रचनाएँ नहीं पढ़ते और इसे वे गर्व से स्वीकार भी करते हैं। उत्तर आधुनिक काल में यह दंभ नहीं, मूर्खता है। यदि आप इस कृति का एक से अधिक बार पारायण करते हैं तो कम से कम एक दर्जन पुस्तकों के लिए आधार वक्तव्य मिल जाएगा और इतने ही शोध के उपयुक्त विषय भी। अनेक सूक्तियाँ मिलेंगी जो आपको किसी 'सेल्फ-हेल्प' बुक में भी न मिल सकेंगी। एक उदाहरण देता हूँ ...पत्नी की बातों में आकर भाई-भाई लड़कर / एक दूसरे से जुदा होने वाले मूर्ख हैं / कुत्ते की पूँछ को पकड़कर गोदावरी को पार करना क्या संभव है?/ विश्वदाभिराम सुन रे वेमा। आप यहाँ उन रचनाकारों को भी हिंदी में पढ़ सकते हैं जिनकी कृति को पढ़ना 'शैतानिक वर्सिज' पढ़ने जैसा तलवार की धार पर दौड़ना है। वरवर राव की कविता हो या अली की बेबसी (... मेरा नाम अली जानकर / रद्दी कागज के समान / फेंक दिया करते हैं ...) सब यहाँ हैं।
एक साथ सैकड़ो रचनाकार। पर यह इतिहास नहीं। समीक्षा या आलोचना भी नहीं। टेक्स्ट है, पाठ है, अनुवाद है, विश्लेषण और विवेचन है। एक यात्रा है जिसे आपका 'अंतरगत' अवश्य सराहेगा। और हाँ, ख़रीदकर पढ़ने योग्य ...मूल्य लागत मात्र। पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी।
समीक्षित पुस्तक: तेलुगू साहित्य: एक अंतर्यात्रा/ गुर्रमकोंडा नीरजा/ 2016/ प्रकाशक-परिलेख प्रकाशन / वितरक - श्रीसाहिती प्रकाशन, 304 मेधा टावर्स, राधाकृष्ण नगर, अत्तापुर रिंगरोड, हैदराबाद ;9849986346द्ध/ 231 पृष्ठ/ मूल्य - 80 रु.  
- प्रो. गोपाल शर्मा 
प्रोफेसर, अरबा मिंच विश्वविद्यालय, अरबा मिंच, इथियोपिया 
चतवहिवचंसेींतउं/हउंपसण्बवउ


गँवई प्रेम का संस्कार: सूर की कृष्णभक्ति 


प्रो. ऋषभदेव शर्मा 


वैशाख शुक्ल पंचमी को महाकवि सूरदास की जयंती मनाई जाती है। सूरदास के जन्मस्थान, नाम, जाति, संप्रदाय और जन्मांधता को लेकर अनेक मत हो सकते हैं, किंवदंतियां हो सकती हैं लेकिन इस सत्य पर कोई मतभेद नहीं कि वे कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा ही नहीं बल्कि समूचे हिंदी काव्य के सर्वश्रेष्ठ कवियों में सम्मिलित हैं। वे कृष्ण-प्रेम के अमर गायक हैं। सूर के यहाँ भक्ति और प्रेम परस्पर पर्याय हैं। जाति-पांति, कुल-शील आदि यहाँ नगण्य हैं, सर्वथा तुच्छ - 'जाति गोत कुल नाम गनत नहिं, रंक होय कई रानो!' कृष्ण स्वयं प्रेम हैं। उन्हें केवल प्रेम से ही पाया जा सकता है -
प्रेम प्रेम सो होय, प्रेम सों पारहि जैये।
प्रेम बंध्यो संसार, प्रेम परमारथ पैये।
एकै निश्चय प्रेम को, जीवन्मुक्ति रसाल।
सांचो निश्चय प्रेम को, जिहिं तैं मिलैं गुपाल। 
कहना न होगा कि सूर हिंदी के भागवतकार हैं जिन्होंने कृष्ण को पंडितों की कैद से निकालकर जनसाधारण के आँगन में खेलने के लिए उन्मुक्त किया। उन्होंने 'सूरसागर' के दसवें स्कंध में अपने काव्य नायक कृष्ण की बचपन और किशोरावस्था की लीलाएँ गाई हैं। परिवार, प्रेम और गाँव की निरंतर उपस्थिति ने इन लीलाओं को भारतीय लोकमानस का कंठहार बना दिया है। परिवार और प्रेम दोनों ही के केंद्र में हैं कृष्ण. कृष्ण अवतारी पुरुष और राजपुत्र नहीं हैं यहाँ। वे तो पूरे नंदगाँव के बेटे हैं। उनका जन्म गाँव भर को उछाह से भर देता है। सूरदास स्वयं इस उछाह में भागीदार बने हैं और तब तक नंदबाबा की ड्योढ़ी पर अड़े रहने की जिद बाँधे हुए हैं जब तक बालक कृष्ण हँसकर उनसे कुछ बोल नहीं लेते। विचित्र है यह अंधा बाबा भी। अरे बाबा अब जाओ भी। पर नहीं, अड़े हैं कि जब गोवर्धन से दौड़कर आए हैं तो भला ऐसे ही थोड़े चले जाएँगे. बड़े गँवार हो बाबा। कोई ऐसे भी हठ करता है? बधावे और आशीष दिए जा रहे हैं - 
;नंद जूद्ध मेरे मन आनंद भयौ, मैं गोवर्धन तैं आयौ।
तुम्हारे पुत्र भयौ, हौं सुनि कै, अति आतुर उठि धायौ।
नंदराइ सुनि बिनती मेरी तबहि बिदा भल है हौं।
जब हँसि कै मोहन कछु बोलैं, तिहि सुनि कै घर जाऊँ।
हौं तो तेरे घर कौ ढाढ़ी 'सूरदास' मोंहि नाऊँ। 
कृष्ण की समस्त बाललीला में सूरदास ने पूरे ब्रजमंडल को शामिल किया है जो उनके मन में बसे सामूहिकता के गँवई संस्कार का प्रतीक है। कृष्ण का सोना, जागना, रेंगना, रीझना, खेलना - सब कुछ सार्वजनिक हैं। वे सबके हैं। सबका उन पर एक-सा प्यार है। एक-सा अधिकार। 'कृष्ण जितने यशोदा को प्रिय हैं, ब्रजवासियों को उससे कम प्रिय नहीं हैं। उलूखल बंधन के समय सारे ब्रजवासी यशोदा को क्या नहीं सुनाते - विशेषतः गोपियाँ. यशोदा का हृदय पत्थर है। उसमें दया-ममता नहीं है, वह निर्मोही है। उम्र में बड़ी और सयानी होने पर भी उसे यही बुद्धि मिली है। कितनी मनौतियाँ मानने पर एक बेटा हुआ है। उसे कितनी विपत्तियाँ झेलनी पड़ी हैं। उसी को मारकर पितरों को पानी दे रही है। ऐसे निर्दयी के पास कौन बैठे? अत्यंत खिन्न ब्रजबालाएँ अपने-अपने घर चली जाती हैं। बलराम भी दुखी हो उठते हैं। तात्पर्य यह है कि इस सुख-दुःख में पूरा समुदाय सम्मिलित है। ' (डाॅ.बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, पृ.133)। 
सबको भली प्रकार मालूम है कि कृष्ण बेहद उधमी, उपद्रवी और आतंककारी बालक हैं। पर नहीं, आप माँ हैं तो क्या हुआ? उन्हें इस तरह बाँधकर नहीं रख सकतीं। लगता है, सारा गाँव बच्चों के मानवाधिकारों का अलमबरदार बन गया हो। यशोदा की हिम्मत नहीं है कि कह दें तो जरा, हमारा घरेलू मामला है जी ये। ना, यह तो सबका मामला है, पूरे ब्रज का मामला है। तभी तो ये ही गोपियाँ शिकायत के बहाने जब-तब कृष्ण को देखने आती रहती हैं। इस सारे व्यवहार में लोकजीवन का वह रस झलकता और छलकता है जिसकी मधुरता का पान कराकर सूरदास ने मध्यकाल में दबी-कुचली भारतीय जाति को जीवनेच्छा का पाठ पढ़ाया। वास्तव में यहाँ केवल वात्सल्य का चित्रण नहीं वरन उसे केंद्र में रखकर समूचा घर-परिवार-कुटुंब चित्रित होता है। कृष्ण की ब्यौरेवार दिनचर्या, संस्कारों और उत्सवों के क्रमिक चित्रण में एक पूरा परिवार और ग्रामीण समाज उभर कर सामने आता है। आगे चलकर युवा कृष्ण का जीवन भी एकदम निरपेक्ष या एकांतिक नहीं है, पूरा गाँव किसी-न-किसी रूप में उसमें भागीदार है। बसंतोत्सव और रास के विविध सामूहिक आयोजन इसके व्यावहारिक प्रमाण हैं।'(डाॅ.रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ.54)। 
गँवई संस्कार का प्यार भी किसी तरह की कुंठा और व्यक्तिगतता नहीं जानता. साहचर्य से उपजता है न। राधा और कृष्ण दोनों ही अपरूप रूपवान हैं। बड़ी-बड़ी आंखों वाली राधा। माथे पर रोली लगाने वाली राधा। गोरे तन पर नील वसन पहनने वाली राधा। पीठ पर वेणी लहराती राधा। बचपना है तो क्या - 'सूर श्याम देखत ही रीझे नैन-नैन मिली पड़ी ठगौरी।'बातों-बातों में रसिक शिरोमणि ने भोली बालिका को मोह लिया। संबंध पल-प्रतिपल बढ़ने लगा। एक अप्रतिम प्रेम जगा और गाँव की मिट्टी में परवान चढ़ा। अनन्य प्रेम। प्रगाढ़ प्रेम। प्रतिपल आत्मसमर्पण को विकल प्रेम। लड़कपन का यह प्यार तकरार में भी बढ़ता गया। गाय चराना हो या दुहना, प्यार भरी तकरार चलती रही और कभी दान के बहाने तो कभी मान के बहाने, कभी पनघट पर तो कभी मधुबन में गोपियाँ कृष्ण पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करती रहीं। और तब आया वह क्षण। देह से प्राण को खींचकर ले जाने का क्षण! कृष्ण तो पूरे ब्रजमंडल के थे - सबके अपने, सबके प्रिय, सबके वल्लभ, सबके प्राण। और वही मथुरा गए तो वहीं के हो गए। कहने को तो कहते रहे 'ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।' पर नदी पार करके मथुरा से गोकुल न आ सके। शहर से गाँव नहीं लौट सके। 
सूरदास जानते हैं, शहर आदमी को किस तरह चालाक बना देता है। इस काजल की कोठरी में जो गया, वही काला हो गया। गोपियों का प्रेम उज्ज्वल है, एकनिष्ठ है। गँवार जो ठहरीं! कृष्ण मथुरा में जाकर सचमुच काले हो गए हैं। उनमें वह पहले-सी पारदर्शिता नहीं रही. अब वे राजपुरुष हो गए हैं - 'हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।' राजनीति मनुष्य को लंपट बना देती है। 'भ्रमरगीत' का भँवरा इस नगरीय लंपटता का भी प्रतीक है। इसी से कृष्ण और उनके संदेशवाहक उद्धव की कोई बात गोपियों की समझ में नहीं आती. डाॅ. बच्चन सिंह ने इस ओर ध्यान खींचा है - 'राजनीतिज्ञों की बात न तब समझ में आती थी और न अब आती है। सारी कथनी ऊलजलूल, सारी करनी छल-प्रपंच। वे कहती हैं कि राजधर्म तो वह है जहाँ प्रजा सताई न जाए। 'राजगतिक लीला' बेचारे अहीर क्या जानें। गोपियाँ जानती हैं कि मुरली धारण करना उन्हें अच्छा नहीं लगता, गोपियों का नाम लेने पर सहम जाते हैं, गायों का चित्र देखने से उनके बड़प्पन को धक्का लगता है। वे मर्माहत होकर व्यंग्य से कहती हैं - 'वै राजा तुम ग्वारि बुलावत'। अरे वे राजा हैं, गँवारों के बीच क्यों आने लगे? कृष्ण की बाललीला, रासलीला आदि की ओर पंडितों का ध्यान गया है, पर 'राजगतिक लीला' की ओर नहीं गया है। सूर ने अन्य लीलाओं की तरह कृष्ण की 'राजगतिक लीला' भी लिखी है। ' 
कृष्ण तो आखिर कृष्ण ठहरे। कल तक 'चोर-जार-शिखामणि' थे। आज 'अनासक्त-योगेश्वर' बन गए. कल तक 'राधा-वल्लभ' थे। आज रुक्मणि-रमण' हो गए. जैसे ब्रज की गायों, कुंजों और यमुना का स्मरण करते थे, वैसे ही गोपियों और राधा का भी। पर राधा भी राधा ही थीं। कृष्ण वंशीधर से चक्रधर हो गए, लेकिन राधा की साड़ी नीली ही रही। कृष्ण की स्मृतियों की गंध से भरी साड़ी भला धोई कैसे जा सकती है। यह नीला वर्ण तो कृष्ण का वर्ण है। राधा से अलग कैसे हो सकता है। है न गँवई प्यार के पागलपन का चरम उत्कर्ष? अहेतुक परमप्रेम ही तो भक्ति है! सूर की राधा परमप्रेम रूपा हैं - स्वयं भक्ति हैं। 
'सूरसागर' के अंत में राधा-कृष्ण मिलते हैं - कुछ पल के लिए। यह मिलन भी कोई मिलन है? कृष्ण तो अपनी महारानी से राधा का परिचय कराने आए हैं। क्या गुजरी होगी राधा पर जब दूर से कृष्ण ने इशारा करके कहा होगा - 'वह जो युवतियों के बीच में खड़ी है ना - अरे वही गोरे वाली - हाँ, जिसने नीली साड़ी पहनी है - वही तो है राधा।'चरम कारुणिक है राधा के प्रेम का यह अंत जिसमें मिलकर भी मिलना संभव नहीं. ऊपर से कृष्ण का यह आश्वासन कि मैं तो निरंतर तुम्हारे ही साथ हूँ, अब लौट जाओ। एक परम विश्वासिनी स्त्री के समक्ष एक विश्वासघाती विवश पुरुष की खिसियानी हँसी - 
बिहँसि कह्यौ हम तुम नहिं अंतर, यह कहि कै उन ब्रज पठई।
सूरदास प्रभु राधा-माधव, ब्रज-बिहार नित नई-नई।।... 


मजदूरी और प्रेम

- सरदार पूर्ण सिंह हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन ...